UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 9 Gitamritamer

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Detailed Chapter 9 गीतामरीतामर UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit

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Class 10 Sanskrit Chapter 9 गीतामरीतामर UP Board Solutions PDF

परिचय

समस्त उपनिषदों की सारभूत ‘श्रीमद्भगवद्गीता' भारतीय दर्शन की अमूल्य निधि है। यह महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित अनुपम ग्रन्थ; 'महाभारत' जिसे पंचम वेद भी माना जाता है; के अन्तर्गत सात-सौ श्लोकों का संकलन है। श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया; निष्काम कर्म करने का; उपदेश ही इसका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। 'श्रीमद्भगवद्गीता' का एक भी वाक्य सदुपदेश से रहित नहीं है। यह भारत के समस्त आध्यात्मिक ग्रन्थों की चरम परिणति है। प्रस्तुत श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता से ही संगृहीत हैं।

पाठ-सारांश

श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, फल की प्राप्ति में नहीं: अतः तुम निरन्तर कर्म करते रहो । हे अर्जुन! सफलता और असफलता को एक समान मानकर कर्म करो; ऐसा करने की बुद्धि रखने वाला व्यक्ति ही योगी कहलाता है। कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है; क्योंकि बिना कर्म किये तो जीवन ही सम्भव नहीं है। इसलिए अपने निर्धारित कर्मों को करो। हे भरतवंशी अर्जुन ! लोक-कल्याण को चाहने वाले विद्वान् तो राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करते हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे मूर्ख हैं। प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं से सन्तुष्ट, ईर्ष्या से रहित, सफलता-असफलता को एक समान मानकर कार्य करने वाला और सुख-दुःख में तटस्थ व्यक्ति सांसारिक बन्धनों में नहीं बँधता है। श्रद्धावान्, प्रयत्नशील और इन्द्रियों को संयमित रखने वाला मनुष्य ही ज्ञान को प्राप्त कर परम शान्ति को प्राप्त करता है। इसके विपरीत ज्ञानहीन, श्रद्धाहीन और संशय से युक्त मन वाला व्यक्ति न तो इहलोक में और न ही परलोक में सुख-शान्ति प्राप्त करता है।

पाण्डुपुत्र अर्जुन ! जो व्यक्ति मुझे बड़ा मानकर, कुसंगति एवं विद्वेषरहित होकर कर्म करता है, वह मुझे प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति प्रसन्नता, द्वेष, शोक, शुभ-अशुभ में तटस्थ रहकर त्याग एवं भक्ति का जीवन बिताता है, जो शत्रु-मित्र, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी एवं सुख-दुःख को एकसमान मानता है और आसक्ति से रहित है; जो निन्दा-प्रशंसा में समान भाव रखता है, प्राप्त वस्तु से सन्तुष्ट रहता है, गृह-त्यागी, स्थिर बुद्धि और भक्ति में लीन रहता है, वह मनुष्य मुझे प्रिय है।

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

 

Question 1. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं। तुम्हें कर्म के फल का कारण नहीं बनना चाहिए, और न ही कर्म न करने में तुम्हारी आसक्ति होनी चाहिए। इसका मतलब है कि तुम्हें अपना काम करते रहना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। कर्म से दूर रहना गलत है। अपने कर्तव्यों को निभाना ही सबसे महत्वपूर्ण है, और इसका फल भगवान पर छोड़ देना चाहिए।
In simple words: भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हमारा पूरा ध्यान बस अपना काम करने पर होना चाहिए। हमें उसके नतीजे की चिंता नहीं करनी चाहिए और न ही काम करने से बचना चाहिए।

🎯 Exam Tip: ऐसे श्लोकों की व्याख्या करते समय, उनके मुख्य संदेश पर ध्यान दें, जैसे कर्म की महत्ता और फल की चिंता न करना।

 

Question 2. योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । सिद्धचसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम फल की इच्छा छोड़कर और सफलता-असफलता को एक जैसा मानकर योग में स्थित होकर अपने कर्तव्य करो। सफलता और असफलता में समान भाव रखना ही सच्चा योग कहलाता है। इसका अर्थ है कि हमें हमेशा शांत मन से काम करना चाहिए, चाहे परिणाम कुछ भी हो। यह संतुलन हमें आंतरिक शांति देता है।
In simple words: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि फल की चिंता किए बिना काम करो। जीत या हार को एक समान समझो। इसी बराबर सोच को योग कहते हैं।

🎯 Exam Tip: योग और समत्व के अर्थ को स्पष्ट करें, जिसमें सफलता और असफलता को समान भाव से देखने पर जोर दिया जाता है।

 

Question 3. नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम्हें अपने तय किए हुए काम (कर्तव्यों) को करते रहना चाहिए। क्योंकि काम न करने से काम करना ज्यादा अच्छा है। अगर तुम कर्म नहीं करोगे, तो तुम्हारा जीवन भी नहीं चल पाएगा। जीवन चलाने के लिए काम करना बहुत जरूरी है। अपने कर्तव्यों को पूरा करना ही जीवन का आधार है।
In simple words: कृष्ण कहते हैं कि अपने काम करो। काम न करने से बेहतर है काम करना। काम किए बिना जीना मुश्किल है।

🎯 Exam Tip: इस श्लोक में 'कर्म' की अनिवार्यता पर जोर दें, यह बताते हुए कि जीवन के लिए कर्म कितना आवश्यक है।

 

Question 4. सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! जैसे अज्ञानी लोग काम करते हुए उसमें लगे रहते हैं और फल की इच्छा रखते हैं, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति को भी लोक-कल्याण के लिए काम करना चाहिए, लेकिन बिना किसी लगाव या फल की इच्छा के। ज्ञानी व्यक्ति दूसरों को सही राह दिखाने और समाज का भला करने के लिए काम करता है, बिना किसी निजी फायदे की चाह के।
In simple words: अज्ञानी लोग फल की इच्छा से काम करते हैं। बुद्धिमान लोग लोक-कल्याण के लिए बिना लगाव के काम करते हैं, जैसे दूसरों को सिखा रहे हों।

🎯 Exam Tip: ज्ञानी और अज्ञानी व्यक्ति के कर्म करने के तरीके में अंतर स्पष्ट करें, खासकर लोक-कल्याण के भाव को उजागर करें।

 

Question 5. यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो इंसान खुद-ब-खुद मिले हुए लाभ से खुश रहता है, सुख-दुख जैसी भावनाओं से ऊपर उठ चुका है, किसी से ईर्ष्या नहीं करता, और सफलता-असफलता को एक समान मानता है, वह ऐसे कर्म करके भी कर्मों के बंधन में नहीं फंसता। ऐसे व्यक्ति का मन हमेशा शांत रहता है, जिससे वह सही निर्णय ले पाता है और जीवन में संतुष्ट रहता है।
In simple words: जो अपनी इच्छा के बिना मिली चीजों से खुश रहता है, सुख-दुःख में एक जैसा रहता है, ईर्ष्या नहीं करता, और जीत-हार को समान मानता है, वह काम करने के बाद भी कर्मों से बंधता नहीं।

🎯 Exam Tip: उन गुणों को विस्तार से समझाएं जो व्यक्ति को कर्मबंधनों से मुक्त रखते हैं, जैसे संतोष, ईर्ष्या-रहितता और समभाव।

 

Question 6. श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धावान होता है, ज्ञान पाने के लिए हमेशा तैयार रहता है और अपनी इंद्रियों को काबू में रखता है, उसे ही ज्ञान मिलता है। ज्ञान मिलने के बाद वह बहुत जल्दी परम शांति को प्राप्त कर लेता है। सच्ची श्रद्धा हमें सही ज्ञान की ओर ले जाती है और जीवन में संतोष भरती है।
In simple words: जो भरोसा रखता है, सीखने में लगा रहता है और अपनी इंद्रियों को काबू में रखता है, उसे ज्ञान मिलता है। ज्ञान पाकर वह जल्द ही बहुत शांति महसूस करता है।

🎯 Exam Tip: ज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक गुणों पर ध्यान दें, जैसे श्रद्धा, तत्परता और इंद्रियों पर नियंत्रण।

 

Question 7. अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति नायं लोकोऽस्ति नपरोन सुखं संशयात्मनः ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति अज्ञानी है, जिसके मन में श्रद्धा नहीं है, और जो हमेशा शक (संशय) करता रहता है, वह बर्बाद हो जाता है। ऐसे शंकालु मन वाले व्यक्ति को न तो इस दुनिया में सुख मिलता है और न ही अगले जन्म में। संशय हमारे मन की शांति छीन लेता है और हमें सही काम करने से रोकता है। इसलिए जीवन में सुख पाने के लिए अज्ञान, अश्रद्धा और संशय को छोड़ना बहुत जरूरी है।
In simple words: जो अज्ञानी है, भरोसा नहीं करता और हमेशा शक करता है, वह नष्ट हो जाता है। ऐसे शंकालु आदमी को इस दुनिया में भी और मरने के बाद भी सुख नहीं मिलता।

🎯 Exam Tip: संशय और अज्ञानता के नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट करें, यह बताते हुए कि ये विनाश का कारण कैसे बनते हैं।

 

Question 8. मत्कर्म कृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ! ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे पाण्डुपुत्र! जो व्यक्ति मेरे लिए कर्म करता है, मुझे ही सबसे महान मानता है, मेरा भक्त है, किसी भी चीज से लगाव नहीं रखता, और सभी प्राणियों से वैर-भाव (दुश्मनी) नहीं रखता, वह मुझे प्राप्त कर लेता है। इसका अर्थ है कि ऐसा व्यक्ति मोक्ष पा लेता है। यह श्लोक भगवान कृष्ण के स्वरूप को बताता है, जो सर्वोच्च सत्य हैं और सभी के प्रति प्रेम सिखाते हैं।
In simple words: कृष्ण कहते हैं कि जो मेरे लिए काम करता है, मुझे सबसे बड़ा मानता है, मेरा भक्त है, किसी से लगाव नहीं रखता, और सब प्राणियों से दोस्ती रखता है, वही मुझे पा लेता है।

🎯 Exam Tip: भगवान को प्रिय भक्त के गुणों को बताएं, जैसे निःस्वार्थ कर्म, भगवान को श्रेष्ठ मानना और सभी जीवों से प्रेम।

 

Question 9. यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति न तो बहुत खुश होता है, न किसी से द्वेष करता है, न किसी बात पर शोक करता है और न ही किसी चीज़ की इच्छा रखता है, जो शुभ और अशुभ दोनों तरह के फलों को छोड़ देता है, और जो भक्तियुक्त है, ऐसा इंसान मुझे बहुत प्रिय है। ऐसे व्यक्ति का मन हर स्थिति में शांत और स्थिर रहता है, जिससे वह सच्ची भक्ति कर पाता है।
In simple words: कृष्ण कहते हैं कि जो खुश नहीं होता, नफरत नहीं करता, उदास नहीं होता, कुछ चाहता नहीं, अच्छे-बुरे को छोड़ देता है, और भक्ति से भरा है, वह मुझे बहुत प्यारा है।

🎯 Exam Tip: भक्त के लक्षणों को स्पष्ट करें, जैसे सुख-दुःख में समभाव, इच्छाओं का त्याग और भक्ति में लीन रहना।

 

Question 10. समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने शत्रु और मित्र को एक समान देखता है, मान-अपमान में एक जैसा रहता है, सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में भी समान भाव रखता है, और किसी भी चीज़ से लगाव नहीं रखता, वह मुझे प्रिय है। ऐसे व्यक्ति का मन शांत और संतुलित रहता है, जिससे वह जीवन की हर स्थिति को धैर्य से झेल पाता है और आंतरिक शांति प्राप्त करता है।
In simple words: कृष्ण कहते हैं कि जो दोस्त और दुश्मन को एक जैसा मानता है, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, सुख-दुख में समान रहता है, और लगाव से दूर रहता है, वह मुझे प्यारा है।

🎯 Exam Tip: समत्व भाव के विभिन्न पहलुओं पर जोर दें, जैसे शत्रु-मित्र, मान-अपमान और सुख-दुःख में एकरूपता।

 

Question 11. तुल्यनिन्दास्तुतिमनी सन्तुष्टो येन केनचित् अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति निंदा और प्रशंसा को एक समान मानता है, चुप रहता है (शांत मन से विचार करता है), जो कुछ भी मिल जाए उसी से संतुष्ट रहता है, जिसका कोई निश्चित घर नहीं (जो संसार से विरक्त है), जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो भक्ति से भरा है, ऐसा मनुष्य मुझे बहुत प्रिय है। ऐसा व्यक्ति संसार के बंधनों से मुक्त होकर सच्चे सुख की ओर बढ़ता है और भगवान के करीब होता है।
In simple words: कृष्ण कहते हैं कि जो बुराई और तारीफ को एक जैसा मानता है, चुप रहता है, जो मिलता है उसी से खुश रहता है, घर की परवाह नहीं करता, जिसकी सोच पक्की है, और जो भक्त है, वह मुझे बहुत प्रिय है।

🎯 Exam Tip: शांत और स्थिर बुद्धि वाले भक्त के गुणों पर ध्यान दें, जिसमें निंदा-स्तुति में समता और संतोष शामिल हैं।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

 

Question 1. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार सिर्फ काम करने पर है, उसके नतीजे पर नहीं। तुम्हें काम के फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। इसका मतलब है कि सिर्फ अपने कर्तव्य पर ध्यान दो और फल की इच्छा छोड़ दो। बिना काम किए रहना सही नहीं है, क्योंकि काम के बिना जीवन संभव नहीं है। अपने काम को पूरी लगन से करना ही हमारा धर्म है। फल की अपेक्षा के बिना कर्म करना ही सच्चा कर्म योग है।
In simple words: कृष्ण कहते हैं कि हमें केवल काम करने का अधिकार है, फल पर नहीं। फल के बारे में सोचना छोड़कर अपना काम करते रहो।

🎯 Exam Tip: इस सूक्ति का मुख्य अर्थ स्पष्ट करें कि हमारा ध्यान कर्म पर होना चाहिए, न कि उसके फल पर।

 

Question 2. ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।।
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम्हें काम न करने में (यानी आलस्य में) रुचि नहीं रखनी चाहिए। आलस्य करके काम से दूर रहना गलत है, क्योंकि बिना कर्म के जीवन जीना संभव नहीं। हमें हमेशा अपने कर्तव्य करते रहना चाहिए, चाहे हमें उसका फल तुरंत न मिले। फल कब और कितना मिलेगा, यह सोचना हमारा काम नहीं, यह भगवान पर छोड़ देना चाहिए। कर्म ही हमारी पहचान बनाता है।
In simple words: कृष्ण कहते हैं कि तुम्हें काम न करने की आदत नहीं डालनी चाहिए। हमेशा अपने काम करते रहो और फल की चिंता भगवान पर छोड़ दो।

🎯 Exam Tip: कर्महीनता से दूर रहने और आलस्य न करने के महत्व पर प्रकाश डालें।

 

Question 3. योगस्थः कुरु कर्माणि ।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि तुम्हें योग में स्थित होकर काम करना चाहिए। योग में स्थित होने का मतलब है कि सफलता और असफलता दोनों में मन को शांत और एक समान रखना। काम करते समय यह नहीं सोचना चाहिए कि जीत मिलेगी या हार। चाहे सफलता मिले या असफलता, हमें हमेशा एक जैसा भाव रखना चाहिए। ऐसा समान भाव रखकर काम करना ही सच्चा योग है। इससे मन शांत और स्थिर रहता है।
In simple words: योग में रहकर अपने काम करो। इसका मतलब है कि सफलता और असफलता दोनों को एक समान मानकर शांत मन से काम करो।

🎯 Exam Tip: योग में स्थित होकर कर्म करने का अर्थ स्पष्ट करें, जिसमें परिणामों से अप्रभावित रहना शामिल है।

 

Question 4. समत्वं योग उच्यते ।। सिध्यसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।
Answer: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सफलता (सिद्धि) और असफलता (असिद्धि) दोनों में मन को समान रखना ही योग कहलाता है। मनुष्य को काम करते हुए यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे सफलता मिलेगी या नहीं। जीत मिलने पर बहुत खुश न होना और हारने पर दुखी न होना ही सच्चा योग है। हमेशा आसक्ति छोड़कर सुख और दुःख में एक जैसा रहना चाहिए। यह हमें शांत और संतुलित रखता है और जीवन के उतार-चढ़ाव में सहारा देता है।
In simple words: सफलता और असफलता को एक समान मानना ही योग है। इसका मतलब है कि सुख-दुःख में एक जैसा भाव रखते हुए काम करते रहना चाहिए।

🎯 Exam Tip: 'समत्व' की अवधारणा को समझाएं, जिसमें सफलता और असफलता को समान भाव से देखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करके बहुत जल्दी परम शांति पा लेता है। इस दुनिया में अज्ञानता ही हमारे दुखों का कारण है। जब इंसान को सच्चा ज्ञान मिलता है, तो वह समझ जाता है कि संसार के सुख सिर्फ दिखावा हैं। तब वह ईश्वर की भक्ति में लग जाता है और उसे संसार की चीजों से कोई लगाव नहीं रहता। जब व्यक्ति पूरी तरह से भगवान को खुद को सौंप देता है, तो उसे सबसे बड़ी शांति मिलती है। ज्ञान हमें सही रास्ता दिखाता है और मन को शांत रखता है।
In simple words: ज्ञान मिलने पर इंसान को तुरंत ही सबसे बड़ी शांति मिलती है। अज्ञानता दुख देती है, जबकि ज्ञान हमें असली सुख और ईश्वर से जोड़ता है।

🎯 Exam Tip: ज्ञान को परम शांति प्राप्त करने का साधन बताते हुए, अज्ञान के दुष्प्रभावों का उल्लेख करें।

 

Question 6. श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् तत्परः संयतेन्द्रियः ।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि जो व्यक्ति श्रद्धा रखता है, हमेशा ज्ञान पाने के लिए तैयार रहता है, और अपनी इंद्रियों को काबू में रखता है, उसे ही ज्ञान मिलता है। ज्ञान हमें गुरु से मिलता है, और गुरु के प्रति श्रद्धा होना बहुत जरूरी है। अहंकार करने वाले को कभी ज्ञान नहीं मिलता। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण का यह कहना कि श्रद्धा से ही ज्ञान मिलता है, बिल्कुल सही है। विनम्रता के साथ ज्ञान प्राप्त करने पर ही हमें परम शांति मिलती है।
In simple words: जो श्रद्धा रखता है, सीखने में लगा रहता है और अपनी इंद्रियों को काबू में रखता है, उसे ज्ञान मिलता है। श्रद्धा और विनम्रता से ही सच्चा ज्ञान मिलता है।

🎯 Exam Tip: ज्ञान प्राप्ति के लिए श्रद्धा, तत्परता और इंद्रिय-संयम के महत्व पर जोर दें।

 

Question 7. संशयात्मा विनश्यति । न सुखं संशयात्मनः ।।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि जिस व्यक्ति के मन में संदेह (संशय) होता है, वह नष्ट हो जाता है। ऐसे शंकालु इंसान को कभी सुख नहीं मिलता। भगवान श्रीकृष्ण गीता में बताते हैं कि जो अज्ञानी है, श्रद्धा नहीं रखता और हमेशा संशय में रहता है, वह इस लोक और परलोक दोनों में नष्ट हो जाता है, उसे कहीं भी सुख नहीं मिलता। ज्ञान की कमी, श्रद्धा का अभाव और संदेह, ये तीनों चीजें इंसान के विनाश का कारण बनती हैं। संशय में फंसा व्यक्ति सही निर्णय नहीं ले पाता और जीवन में सफल नहीं हो पाता। इसलिए, सुख पाने के लिए अज्ञान, अश्रद्धा और संशय को छोड़ना चाहिए।
In simple words: जो हमेशा शक करता है, वह बर्बाद हो जाता है और उसे कभी खुशी नहीं मिलती। बिना ज्ञान, बिना भरोसे और शक करने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता।

🎯 Exam Tip: संशय और अज्ञानता के विनाशकारी प्रभावों को स्पष्ट करें, यह बताते हुए कि इनसे सुख कैसे दूर रहता है।

 

Question 8. निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डवः ।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि हे पाण्डुपुत्र! जो व्यक्ति सभी जीवों से कोई दुश्मनी नहीं रखता (सबसे प्रेम करता है), वह मुझे प्राप्त कर लेता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो सब प्राणियों से प्यार करता है और किसी से दुश्मनी नहीं रखता, वह मुझे बहुत प्रिय है। सभी जीव भगवान ने बनाए हैं, इसलिए किसी से ईर्ष्या या द्वेष करना सही नहीं है। अगर हम चाहते हैं कि भगवान की कृपा हम पर बनी रहे, तो हमें अपने मन से ईर्ष्या और नफरत निकालकर सभी से प्रेम करना चाहिए।
In simple words: कृष्ण कहते हैं कि जो सभी जीवों से दुश्मनी नहीं रखता, वही मुझे पा सकता है। हमें सबसे प्यार करना चाहिए और ईर्ष्या-द्वेष छोड़ना चाहिए।

🎯 Exam Tip: सभी प्राणियों के प्रति वैर-भाव न रखने और प्रेम करने के महत्व को बताएं, जिसे भगवान की प्राप्ति का मार्ग माना गया है।

 

Question 9. शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि जो व्यक्ति अच्छे और बुरे दोनों तरह के फलों को छोड़ देता है और भगवान की भक्ति में लगा रहता है, वह मुझे प्रिय है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ऐसा भक्त जो शुभ और अशुभ (पवित्र और अपवित्र) का भेद किए बिना सभी चीजों को समान भाव से त्याग देता – यानी उसे अच्छी चीजों से बहुत लगाव नहीं होता और बुरी चीजों से नफरत नहीं होती – और जो मुझमें मन लगाता है, वही मुझे (भगवान को) प्रिय है। ऐसे भक्त का मन हर स्थिति में शांत रहता है, जिससे वह सच्ची भक्ति कर पाता है।
In simple words: कृष्ण कहते हैं कि जो अच्छे और बुरे फल को छोड़कर भक्ति में लगा रहता है, वह मुझे बहुत प्यारा है। उसे किसी चीज से बहुत लगाव या नफरत नहीं होती।

🎯 Exam Tip: शुभ-अशुभ के त्याग और भगवान की भक्ति में लीन भक्त के गुणों को समझाएं।

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

 

Question 1. कर्मण्येवाधिकारस्ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ (श्लोक 1)
Answer: गीतायां भगवान् कृष्णः अर्जुनं कर्म कर्तुम् उपदिशति यत् भोः अर्जुन ! कर्मकरणे एवं तव अधिकारः अस्ति, कर्मणः फले तव अधिकारः न अस्ति । अतः त्वं कर्मणः फलस्य कारणं मी भव । कर्मणां फलस्येच्छां त्यक्त्वा कर्म कर्त्तव्यम् । कर्म न करणे तव आसक्तिः अपि न स्यात् । अतः त्वं कर्म एव कुरु, तस्य फलस्य इच्छां मा करु ।
In simple words: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार सिर्फ काम करने का है, फल का नहीं। फल की इच्छा छोडकर अपना कर्म करते रहो।

🎯 Exam Tip: संस्कृत में श्लोक का अर्थ लिखते समय, मूल शब्दों के भाव को बनाए रखें और सरल संस्कृत का प्रयोग करें।

 

Question 2. योगस्थः कुरु योग उच्यते ॥ (श्लोक 2)
Answer: गीतायां भगवान् कृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् हे अर्जुन! सफलता-असफलतयोः समं भूत्वा, रागं त्यक्त्वा, योगस्थः भूत्वा च कर्माणि कुरु । यः पुरुषः सिद्धयसिद्धयोः समं मत्वा कार्यं कुरुते तस्य समत्वं योगः उच्यते ।
In simple words: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जीत-हार को एक जैसा मानकर, लगाव छोड़कर और शांत मन से काम करो। यही समता वाला भाव योग कहलाता है।

🎯 Exam Tip: योगस्थ होकर कर्म करने के संस्कृत अर्थ को स्पष्ट करें, जिसमें समत्व और अनासक्ति का भाव प्रमुख है।

 

Question 3. श्रद्धावान् लभते अचिरेणाधिगच्छति ॥ (श्लोक 6)
Answer: गीतायां भगवान् कृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् यः व्यक्ति श्रद्धावान् भवति, ज्ञानम् आप्तुं सदैव तत्परः भवति, इन्द्रियाणि संयमते, सः व्यक्तिः सद्ज्ञानं प्राप्य शीघ्रम् एव परां शान्ति प्राप्य सुखी भवति ।।
In simple words: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो श्रद्धावान है, ज्ञान पाने को उत्सुक है और इंद्रियों को काबू में रखता है, वह सच्चा ज्ञान पाकर जल्दी ही परम शांति से सुखी होता है।

🎯 Exam Tip: ज्ञान प्राप्ति के लिए श्रद्धा, तत्परता और इंद्रिय-संयम के संस्कृत विवरण को सटीक रूप से प्रस्तुत करें।

 

Question 4. यो न हृष्यति स मे प्रियः ॥ (श्लोक 9)
Answer: गीतायां भगवान् श्रीकृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् यः पुरुषः सुखे न प्रसन्नं भवति, कस्मै न ईष्ण्यति, दुःखे न शोकं करोति, कस्मै न स्पृह्यति, शुभम् अशुभम् च परित्यजति, यः मां भजति, सः पुरुषः मे प्रियः अस्ति ।
In simple words: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो सुख-दुख में एक जैसा रहता है, ईर्ष्या, शोक और इच्छा से दूर रहता है, अच्छे-बुरे को छोड़ देता है और मेरी भक्ति करता है, वह मुझे प्यारा है।

🎯 Exam Tip: संस्कृत में भक्त के गुणों का वर्णन करते समय, प्रत्येक विशेषण का अर्थ स्पष्ट करें।

 

Question 5. समः शत्रौ च समः सङ्गविवर्जितः ॥ (श्लोक 10)
Answer: श्रीकृष्णः अर्जुनं कथयति यत् यः नरः रिपो सुहृदि च समानं व्यवहरति, आदरे अनादरे च तुल्यरूपः भवति, शीतम् उष्णं सुखं दुःखं च समानं मन्यते, एवेषु किमपि भेदं न करोति, आसक्तिहीनः च भवति, सः नरः मम (भगवतः) प्रियः भवति ।
In simple words: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो शत्रु-मित्र, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, सुख-दुख में एक जैसा रहता है और लगाव से दूर है, वह मनुष्य मुझे प्यारा है।

🎯 Exam Tip: समत्व के विभिन्न आयामों को संस्कृत में समझाएं, जैसे शत्रु-मित्र और मान-अपमान में समान व्यवहार।

 

Question 6. तुल्यनिन्दास्तुतिः प्रियो नरः ॥ (श्लोक 11)
Answer: गीतायां भगवान् श्रीकृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् यः पुरुषः निन्दायां स्तुतौ च समः भवति, मौनी तथा सर्वासु अवस्थासु सन्तुष्टः, गृहे ममत्वरहितः, स्थिरमतिः अस्ति, स एव भक्तिमान् पुरुषः मे प्रियः भवति ।
In simple words: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो निंदा-प्रशंसा, सुख-दुख में एक जैसा रहता है, शांत रहता है, संतुष्ट है, घर से लगाव नहीं रखता और जिसकी बुद्धि स्थिर है, वह भक्त पुरुष मुझे प्यारा है।

🎯 Exam Tip: संस्कृत में उस भक्त के लक्षणों का वर्णन करें जो निंदा-स्तुति में समान, मौन, संतुष्ट और स्थिर बुद्धि वाला हो।

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FAQs

Where can I find the latest UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 9 गीतामरीतामर for the 2026 27 session?

The complete and updated UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 9 गीतामरीतामर is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 10 Sanskrit are as per latest UP Board curriculum.

Are the Sanskrit UP Board solutions for Class 10 updated for the new 50% competency-based exam pattern?

Yes, our experts have revised the UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 9 गीतामरीतामर as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Sanskrit concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.

How do these Class 10 UP Board solutions help in scoring 90% plus marks?

Toppers recommend using UP Board language because UP Board marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 9 गीतामरीतामर will help students to get full marks in the theory paper.

Do you offer UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 9 गीतामरीतामर in multiple languages like Hindi and English?

Yes, we provide bilingual support for Class 10 Sanskrit. You can access UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 9 गीतामरीतामर in both English and Hindi medium.

Is it possible to download the Sanskrit UP Board solutions for Class 10 as a PDF?

Yes, you can download the entire UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 9 गीतामरीतामर in printable PDF format for offline study on any device.