UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 9 Sanskritbhashayah Gauravam

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Detailed Chapter 9 संस्कृतभाषयः गौरवम् UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit

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Class 10 Sanskrit Chapter 9 संस्कृतभाषयः गौरवम् UP Board Solutions PDF

परिचय

संस्कृत भाषा दुनिया की सभी भाषाओं में सबसे पुरानी है। यह ज्ञान, विज्ञान, सरल शब्दों, मधुरता और सुंदरता से भरी हुई है। इस बात को सभी पश्चिमी भाषा विशेषज्ञ भी मानते हैं। संस्कृत भाषा के दो रूप हैं—
• वैदिक
• लौकिक ।

हमारे बहुत पुराने ग्रंथ जैसे वेद और उपनिषद जिस भाषा में लिखे गए हैं, वह वैदिक संस्कृत है। आजकल जिस भाषा का अध्ययन किया जाता है, वह लौकिक संस्कृत है। वैदिक संस्कृत की तुलना में लौकिक संस्कृत समझना ज़्यादा आसान है।

संस्कृत को सभी भारतीय भाषाओं की जननी कहा जाता है। संस्कृत से ही प्राकृत, फिर अपभ्रंश और उसके बाद अलग-अलग प्रांतीय भाषाओं का विकास हुआ है। भारत का पूरा प्राचीन साहित्य संस्कृत में ही लिखा गया है। गद्य, पद्य, नाटक, व्याकरण, ज्योतिष, दर्शन, गणित जैसे विषयों का बड़ा साहित्य इस भाषा को बहुत खास बनाता है। इसीलिए इसे देववाणी, गीर्वाणवाणी और देवभाषा भी कहा जाता है।

इस पाठ में संस्कृत भाषा की प्राचीनता, वैज्ञानिकता, ज्ञान से भरा होना और भावात्मकता के बारे में बताया गया है, और इसकी अहमियत समझाई गई है। इसमें यह भी बताया गया है कि इसी भाषा से दुनिया में शांति लाई जा सकती है।

पाठ-सारांश

प्राचीनता के हिसाब से संस्कृत भाषा दुनिया की सभी भाषाओं में सबसे पुरानी है। इसमें बहुत सारा साहित्य और ज्ञान है, और यह सरल, मधुर, सरस और मनमोहक है। संस्कृत भाषा को देववाणी या गीर्वाणभारती भी कहते हैं। पश्चिमी भाषा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि यह ग्रीक और लैटिन जैसी भाषाओं से भी पुरानी है, और इसमें बहुत सारा साहित्य है। सर विलियम जोन्स ने यह बात दो सौ साल पहले ही बता दी थी। पुराने समय में यही भाषा आम लोगों के बोलने-चालने की भाषा थी। इस भाषा की प्राचीनता और आम लोगों के लिए आसान होना दुनिया में एक खास नजरिया है। एक कहानी के अनुसार, एक बार एक लकड़हारा अपने सिर पर लकड़ियों का गट्ठर रखकर जा रहा था। उसे देखकर राजा ने पूछा, "अरे, क्या तुम्हें यह बोझ परेशान कर रहा है?" तब लकड़हारे ने जवाब दिया कि महाराज, लकड़ियों का बोझ उतना परेशान नहीं कर रहा, जितना आपके द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द 'बाधति' परेशान कर रहा है। राजा ने 'बाधति' शब्द का इस्तेमाल किया था जो कि परस्मैपदी रूप होने के कारण गलत था। यहाँ आत्मनेपदी रूप 'बाधते' का इस्तेमाल होना चाहिए था।

यह बात लकड़हारे ने राजा को एक कहानी के माध्यम से बताई थी, जो यह साबित करती है कि संस्कृत एक लोक-भाषा थी। रामायण के समय भी यह भाषा आम लोगों में इस्तेमाल होती थी। रामायण में एक जगह संस्कृत को ब्राह्मणों की भाषा कहा गया है।

विशाल और प्राचीन साहित्य

संस्कृत भाषा का साहित्य बहुत बड़ा है। यह गद्य, पद्य और चम्पू नामक तीन प्रकार का होता है। दुनिया का सबसे पुराना ग्रंथ 'ऋग्वेद' इसी भाषा में है। इसी भाषा में वेद, वेदांग, दर्शन, उपनिषद, स्मृति, पुराण, धर्मशास्त्र, महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथ लिखे गए हैं। इन सभी साहित्यों में विषय के हिसाब से सरल और कठिन रूप देखने को मिलते हैं। वाल्मीकि, व्यास, भवभूति, कालिदास, अश्वघोष, बाण, सुबन्धु, दण्डी, भारवि, माघ और श्रीहर्ष जैसे महान कवि और लेखक संस्कृत भाषा के गौरव को बढ़ाते हैं। संस्कृत का व्याकरण दुनिया में अनोखा है। इसमें सन्धि, समास और अलंकारों का गहरा विश्लेषण मिलता है। इसके काव्य में ध्वनि और श्रुति (सुनने में) की मधुरता बहुत सुंदर है।

भाषागत विशिष्टता

संस्कृत भाषा में वाक्य बनाते समय शब्दों का स्थान तय नहीं होता, मतलब वाक्य में इस्तेमाल किए गए शब्दों को कहीं भी रखा जा सकता है। इससे वाक्य के अर्थ में कोई बदलाव नहीं आता। संस्कृत में शब्द का अर्थ उसके मूल रूप के अनुसार ही बनता है, और इसी आधार पर सार्थक शब्दों की रचना की जाती है।

सामाजिक विशिष्टता

संस्कृत भाषा की सामाजिक विशेषता भी बहुत महत्वपूर्ण है। इसकी कुछ सूक्तियों का हिंदी अनुवाद नीचे दिया गया है, जो इसे और स्पष्ट करता है-

  • माँ और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती हैं।
  • यह मेरा है और यह पराया है; ऐसी सोच छोटे विचारों वाले लोगों की होती है।
  • बड़े मन वाले लोगों के लिए पूरी धरती ही परिवार के समान है।
  • विद्वान लोग कुत्ते और चाण्डाल (नीचे जाति के व्यक्ति) के प्रति भी एक समान भाव रखते हैं।

अध्ययन की आवश्यकता

संस्कृत भाषा के ज्ञान के बिना एकता और अखंडता का पाठ बेमानी है। पुराने भारतीय विचारकों के सबसे अच्छे विचार और खोज इसी भाषा में लिखे गए हैं। अपनी सभ्यता, धर्म और संस्कृति को अच्छी तरह समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन बहुत जरूरी है। इस भाषा को आगे बढ़ाने के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी आत्मकथा में संस्कृत भाषा के महत्व के बारे में लिखा है कि "संस्कृत भाषी भारत की एक अनमोल धरोहर है। इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वतंत्र भारत की है।"

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)

संस्कृतभाषा विश्वस्य सर्वासु भाषासु प्राचीनतमा विपुलज्ञानविज्ञानसम्पन्ना सरला सुमधुरा हृद्या चेति सर्वैरपि प्राच्यपाश्चात्यविद्वद्भिरेकस्वरेणोररीक्रियते । भारतीयविद्याविशारदैस्तु “संस्कृतं नाम दैवी वागन्वाख्याता महर्षिभिः” इति संस्कृतभाषा हि गीर्वाणवाणीति नाम्ना सश्रद्धं समाम्नाता।

शब्दार्थ: प्राचीनतमा = सबसे अधिक पुरानी; सम्पन्ना = भरी हुई; हृद्या = मन को खुश करने वाली; प्राच्य = पूर्वी; उररीक्रियते = स्वीकार किया जाता है; विद्याविशारदैः = विद्या में निपुण; वागन्याख्याता = वाणी कही गई; सश्रद्धम् = श्रद्धा के साथ; समाम्नाता = मानी गई है।

सन्दर्भ: यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत' के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती' में दिए गए 'संस्कृतभाषायाः गौरवम्' नामक पाठ से लिया गया है। [ इस पाठ के बाकी सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ रहेगा ]

प्रसंग: इस गद्यांश में संस्कृत भाषा की प्राचीनता और उसे देवभाषा होने के बारे में बताया गया है।

अनुवाद: संस्कृत भाषा दुनिया की सभी भाषाओं में सबसे पुरानी है, जिसमें बहुत ज्ञान-विज्ञान है, जो सरल, बहुत मीठी और सभी के मन को लुभाने वाली है। इस बात को पूर्वी (भारतीय) और पश्चिमी विद्वान एक सुर में मानते हैं। भारतीय विद्या के जानकार विद्वानों ने तो इसे "महर्षियों द्वारा कही गई दिव्य वाणी" यानी देवभाषा या गीर्वाणवाणी के नाम से श्रद्धा के साथ माना है। यह भाषा ईश्वर की देन मानी जाती है।

(2)

ग्रीकलैटिनादि प्राचीनासु भाषासु संस्कृतभाषैव प्राचीनतमा प्रचुरेसाहित्यसम्पन्ना चेति । श्रीसरविलियमजोंसनाम्ना पाश्चात्यसमीक्षकेणापि शतद्वयवर्षेभ्यः प्रागेव समुद्घोषितमिति सर्वत्र विश्रुतम् ।।

शब्दार्थ: प्रचुरसाहित्यसम्पन्ना = बहुत साहित्य से भरी हुई; शतद्वयवर्षेभ्यः = दो सौ साल से; प्रागेव = पहले ही; विश्रुतं = मशहूर है।

प्रसंग: इस गद्यांश में संस्कृत भाषा की प्राचीनता और बहुत बड़े साहित्य की पुष्टि के लिए पश्चिमी विद्वान का उल्लेख किया गया है।

अनुवाद: ग्रीक, लैटिन आदि पुरानी भाषाओं में संस्कृत भाषा ही सबसे पुरानी है और इसमें बहुत साहित्य है। श्री सर विलियम जोन्स नाम के एक पश्चिमी आलोचक ने भी यह बात दो सौ साल पहले ही कह दी थी, और यह बात हर जगह मशहूर है। यह दिखाता है कि संस्कृत कितनी पुरानी और समृद्ध है।

(3)

संस्कृतभाषा पुराकाले सर्वसाधारणजनानां वाग्व्यवहारभाषा चासीत्। तत्रेदं श्रूयते यत्. पुरा कोऽपि नरः काष्ठभारं स्वशिरसि निधाय काष्ठं विक्रेतुमापणं गच्छति स्म । मार्गे नृपः तेनामिलदपृच्छच्च, भो! भारं बाधति? काष्ठभारवाहको नृपं तत्प्रश्नोत्तरस्य प्रसङ्गेऽवदत्, भारं न बाधते राजन्! यथा बाधति बाधते । अनेनेदं सुतरामायाति यत्प्राचीनकाले भारतवर्षे संस्कृतभाषा साधारणजनानां भाषा आसीदिति । रामायणे यदा भगवतो रामस्य प्रियसेवको हनूमान् कनकमयीं मुद्रामादाय सीतायै दातुमिच्छति तदा विचारयति स्म [2014] वाचं चोदाहरिष्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् । रावणं मन्यमानां मां सीता भीता भविष्यति ॥ एतेनापि संस्कृतस्य लोकव्यवहारप्रयोज्यता अवगम्यते ।

शब्दार्थ: वाग्व्यवहार-भाषा = बोलचाल की भाषा; तत्रेदं = इस बारे में; पुरा = पहले, पुराने समय में; निधाय = रखकर; विक्रेतुमापणं = बेचने के लिए बाजार में; अपृच्छत् = पूछा; बाधते = कष्ट दे रही है; अनेनेदम् = इससे; कनकमयीम् = सोने की बनी; मुद्राम् = अंगूठी को; द्विजातिरिव = ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य जैसे; संस्कृताम् = संस्कार वाली; मन्यमाना = मानती हुई; भीता = डरी हुई; प्रयोज्यता = उपयोग में आना; अवगम्यते = जानी जाती है।

प्रसंग: इस गद्यांश में उदाहरणों द्वारा बताया गया है कि पुराने समय में संस्कृत आम लोगों की बोलचाल की भाषा थी।

अनुवाद: संस्कृत भाषा पुराने समय में आम लोगों की बातचीत और व्यवहार की भाषा थी। इस बारे में एक कहानी सुनी जाती है कि पुराने समय में एक आदमी लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर रखकर बाजार जा रहा था ताकि उन्हें बेच सके। रास्ते में उसे राजा मिला और राजा ने उससे पूछा, "क्या यह बोझ तुम्हें परेशान कर रहा है (भो! भारं बाधति)?" लकड़ियों का बोझ ढोने वाले उस लकड़हारे ने राजा के सवाल के जवाब में कहा, "हे राजन! यह बोझ मुझे परेशान नहीं कर रहा, बल्कि 'बाधति' शब्द का आपका इस्तेमाल मुझे परेशान कर रहा है।" इससे यह साफ होता है कि पुराने समय में भारत में संस्कृत भाषा आम लोगों की भाषा थी। रामायण में, जब भगवान राम के प्यारे सेवक हनुमान सोने की अंगूठी लेकर सीता को देना चाहते हैं, तब वह सोचते हैं, "अगर मैं ब्राह्मणों जैसी संस्कृत वाणी बोलूंगा, तो सीता मुझे रावण समझकर डर जाएंगी।" इससे भी यह पता चलता है कि संस्कृत का इस्तेमाल आम बोलचाल में होता था।

(4)

अस्याः भाषायाः साहित्यं सर्वथा सुविशालं विद्यते । तत्र संस्कृतसाहित्यं गद्य-पद्य-चम्पू-प्रकारैः त्रिधा विभज्यते । संस्कृतसाहित्यं नितान्तमुदात्तभावबोधसामर्थ्यसम्पन्नसाधारणं श्रुतिमधुरञ्चेति निर्विवादम् । वस्तुतः साहित्यं खलु निखिलस्यापि समाजस्य प्रत्यक्ष प्रतिबिम्बं प्रस्तौति । अस्मिन् साहित्ये विश्व-प्राचीनतमा ऋग्यजुः सामाथर्वनामधेयाश्चत्वारो वेदाः, शिक्षा-कल्पो, व्याकरणं, निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमित्येतानि वेदानां षड‌ङ्गानि, न्याय-वैशेषिक-साख्य-योग-मीमांसा-वेदान्तेति आस्तिकदर्शन शास्त्राणि; चार्वाक्-जैन-बौद्धेति नास्तिकदर्शनशास्त्राणि, उपनिषदः, स्मृतयः, सूत्राणि, धर्मशास्त्राणि, पुराणानि, रामायणं महाभारतमित्यादयः ग्रन्थाः संस्कृतसाहित्यस्य ज्ञानरत्नप्राचुर्य समुद्घोषयन्ति। वाल्मीकि-व्यास-भवभूति-दण्डि-सुबन्धु-बाण-कालिदास-अश्वघोष-भारवि-जयदेव-माघ-श्रीहर्षप्रभृतयः कवयः लेखकाश्चास्याः गौरवं वर्धयन्ति । अहो! संस्कृतभाषायाः भण्डारस्य' निःसीमता, यस्याः शब्दपारायणस्य विषये महाभाष्ये लिखितं वर्तते यद दिव्यं वर्षसहस्रं वृहस्पतिः इन्द्राय शब्दपारायणमिति कोष-प्रक्रिया आसीत्। संस्कृतव्याकरणेन एवंविधा शैली प्रकटिता पाणिनिना, यथा शब्दकोषाः अल्पप्रयोजना एवं जाता। तस्य व्याकरणं विश्वप्रसिद्धम् एव न अपितु अद्वितीयमपि मन्यते ।।

शब्दार्थ: सर्वथा सुविशालं = बहुत विशाल; त्रिधा = तीन प्रकार से; विभज्यते = बांटा जाता है; निर्विवादम् = बिना विवाद के; प्रस्तौति = प्रस्तुत करता है; षडङ्गानि = छह अंग; प्राचुर्यम् = अधिकता को; समुद्घोषयन्ति = बताते हैं; वर्धयन्ति = बढ़ाते हैं; निःसीमता = असीमता, जिसकी कोई सीमा नहीं; दिव्य वर्षसहस्रम् = हजार दिव्य सालों तक; पारायणम् = पढ़ना; अल्पप्रयोजना = कम उपयोग वाले।

प्रसंग: इस गद्यांश में संस्कृत-साहित्य की विशालता और उसके ग्रंथ, कवि, व्याकरण, और कोष आदि के बारे में बताया गया है।

अनुवाद: इस भाषा का साहित्य सभी तरह से बहुत विशाल है। संस्कृत साहित्य को गद्य, पद्य और चम्पू के भेद से तीन प्रकार में बांटा गया है। संस्कृत साहित्य में बहुत ऊँचे विचारों को व्यक्त करने की क्षमता है, और यह सुनने में बहुत मधुर है – यह बात बिना किसी विवाद के कही जा सकती है। असल में, साहित्य पूरे समाज का सीधा प्रतिबिंब होता है। इस साहित्य में दुनिया के सबसे पुराने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद नामक चार वेद; शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष – ये वेदों के छह अंग; न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त – ये छह आस्तिक दर्शनशास्त्र; चार्वाक, जैन, बौद्ध – ये तीन नास्तिक दर्शनशास्त्र; उपनिषद, स्मृतियाँ, सूत्र, धर्मशास्त्र, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथ संस्कृत साहित्य के ज्ञान के रत्नों की अधिकता को दिखाते हैं। वाल्मीकि, व्यास, भवभूति, दण्डी, सुबन्धु, बाण, कालिदास, अश्वघोष, भारवि, जयदेव, माघ, श्रीहर्ष आदि कवि और लेखक इसके गौरव को बढ़ाते हैं। संस्कृत भाषा का भंडार असीमित होना आश्चर्यजनक है। इसके शब्दों की व्याख्या के बारे में महाभाष्य में लिखा है कि बृहस्पति ने हजार दिव्य वर्षों तक इंद्र को शब्द की व्याख्या की थी। यह कोष बनाने का एक तरीका था। महर्षि पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण से ऐसी शैली बनाई कि शब्दकोश कम उपयोगी हो गए। उनका व्याकरण सिर्फ दुनिया में प्रसिद्ध ही नहीं, बल्कि अनोखा भी माना जाता है।

(5)

अन्यासु भाषासु वाक्ययोजने प्रथमं कर्तुः प्रयोगः पुनः अन्येषां कारकाणां विन्यासः, पश्चात् क्रियायाः उक्तिः । कस्याञ्चित् भाषायां क्रियायाः विशेषणानां कारकाणाञ्च पश्चात् प्रयोगः, किन्तु संस्कृतव्याकरणे नास्ति एतादृशाः केऽपि नियमाः। यथा-आसीत् पुरा दशरथो नाम राजा अयोध्यायाम् । अस्यैव वाक्यस्य विन्यासः एवमपि भवति-पुरा अयोध्यायां दशरथो नाम राजा आसीत्, अयोध्यायां दशरथो नाम राजा पुरा आसीत्, इति वा । कस्यापि पदस्य कुत्रापि स्थानं भवेत् न कापि क्षतिः ।

शब्दार्थ: वाक्ययोजने = वाक्य की बनावट में; अन्येषां = दूसरों के; विन्यासः = रचना; उक्तिः = कथन; एतादृशाः = इस तरह के; अस्यैव = इसका ही; कुत्रापि = कहीं भी; क्षतिः = नुकसान।

प्रसंग: इस गद्यांश में संस्कृत की वाक्य-रचना के बारे में बताया गया है।

अनुवाद: अन्य भाषाओं में वाक्य बनाते समय पहले कर्ता का प्रयोग होता है, फिर दूसरे कारकों का प्रयोग, और बाद में क्रिया का इस्तेमाल होता है। कुछ भाषाओं में क्रिया का प्रयोग विशेषणों और कारकों के बाद होता है, लेकिन संस्कृत व्याकरण में ऐसे कोई नियम नहीं हैं। जैसे, "पुरा दशरथो नाम राजा अयोध्यायाम् आसीत्।" (पुराने समय में अयोध्या में दशरथ नाम का एक राजा था।) इसी वाक्य को ऐसे भी लिखा जा सकता है: "पुरा अयोध्यायां दशरथो नाम राजा आसीत्," या "अयोध्यायां दशरथो नाम राजा पुरा आसीत्।" संस्कृत में किसी भी शब्द को कहीं भी रखने से अर्थ में कोई बदलाव नहीं होता। इससे भाषा में लचीलापन आता है।

(6)

सन्धीनां विधानेन वाक्यस्य विन्यासे सौकर्यं जायते । एकस्यां पङ्क्त समासेन बहूनां शब्दानां योजना भवितुं शक्या, यथा-कविकुलगुरुकालिदासः । एकस्याः क्रियायाः विभिन्नार्थद्योतनाय दशलकारा वर्णिताः । लकाराणां प्रयोगज्ञानेन इत्थं ज्ञायते इयं घटना कियत्कालिकी, किंकालिकी, यथा—हरिश्चन्द्रो राजा बभूव । रामो लक्ष्मणेन सीतया च सह वनं जगाम अत्र लिट्प्रयोगेण ज्ञायते इयं घटना पुरा-कालिकी सहस्रवर्षात्मिका लक्षात्मिका वा स्यात् । गन्तास्मि वाराणसी कथनेनैव ज्ञायते श्वः गन्तास्मि । सामान्यभविष्यत्काले लुट् प्रयोगो भवति, एवं भूतकालेऽपि अद्यतनस्य अनद्यतनस्य च भूतकालस्य कृते पृथक् पृथक् लकारस्य प्रयोगोऽस्ति ।

शब्दार्थ: सौकर्यम् = आसानी; विभिन्नार्थ = अलग-अलग अर्थ; द्योतनाय = बताने के लिए; कियत्कालिकी = कितने समय की; किंकालिकी = किस समय की; सहस्रवर्षात्मिका = हजार साल की; लक्षात्मिका = लाख साल की; गन्तास्मि = मैं जा रहा हूँ; अद्यतनस्य = आज का; अनद्यतनस्य = आज से अलग का।

प्रसंग: इस गद्यांश में संस्कृत में संधि, समास और लकारों के प्रयोग के महत्व को बताते हुए इस भाषा की लोकप्रियता समझाई गई है।

अनुवाद: संधियों के इस्तेमाल से वाक्य बनाना आसान हो जाता है। समास की मदद से एक ही पंक्ति में कई शब्दों का उपयोग किया जा सकता है; जैसे, 'कविकुलगुरुकालिदासः' (कवियों के गुरु कालिदास)। एक क्रिया के कई अर्थों को बताने के लिए दस लकारों का वर्णन किया गया है। लकारों के प्रयोग को जानने से यह पता चल जाता है कि यह घटना कितने समय की है और किस समय की है; जैसे – 'हरिश्चन्द्रो राजा बभूव' (हरिश्चन्द्र राजा थे)। 'रामो लक्ष्मणेन सीतया च सह वनं जगाम' (राम, लक्ष्मण और सीता के साथ वन गए)। यहाँ (बभूव और जगाम में) लिट् लकार का प्रयोग करने से पता चलता है कि यह घटना बहुत पुराने समय की है – शायद हजार या लाख साल पुरानी। 'गन्तास्मि वाराणसीम्' (मैं वाराणसी जाऊँगा) कहने से पता चलता है कि मैं कल जाऊँगा। सामान्य भविष्यकाल में लुट् लकार का प्रयोग होता है। इसी तरह भूतकाल में भी आज के और पुराने समय के लिए अलग-अलग लकारों का प्रयोग होता है।

(7)

संस्कृते अर्थान् गुणांश्च क्रोडीकृत्य शब्दानां निष्पत्तिः, यथा-पुत्रः कस्मात् पुत्रः? पुं नरकात् त्रायतेऽसौ पुत्रः, आत्मजः कस्मादात्मजः? आत्मनो जायतेऽसौ आत्मजः, सूर्यः कस्मात् सूर्यः? सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयति अतः सूर्यः । सूर्यः यदा नभोमण्डलमारोहति प्रेरयति लोकं, कस्मात् शेषे? उत्तिष्ठ, वाति वातः, स्वास्थ्यप्रदायकं प्राणवायुं गृहाण, नैत्त्यिकानि कर्माणि कुरु, इत्थं प्रेरयन्, आकाशमागच्छति अतः सूर्य इति । खगः कस्मात्? खे (आकाशे) गच्छति अस्मात् खगः? एवमर्थज्ञानाय व्यवस्थान्यासु भाषासु नास्ति । अव्युत्पन्नाः शब्दाः तेषामपि निरुक्तिः अर्थानुसन्धानिकी भवत्येव इति नैरुक्ताः । सर्वं नाम च धातुजमाह इति शाकटायनः, उणादिसूत्रेषु एषैव प्रक्रिया वर्तते ।

शब्दार्थ: क्रोडीकृत्य = मिलाकर; निष्पत्तिः = निर्माण, उत्पत्ति; पुं नरकात् त्रायते = 'पुम्' नामक नरक से बचाता है; सुवति = प्रेरित करता है; नभोमण्डलमारोहति = आकाश में चढ़ता है; प्रेरयति = प्रेरित करता है; नैत्यिकानि = रोज़ के करने योग्य; इत्थं प्रेरयन् = इस तरह प्रेरित करता हुआ; खे = आकाश में; अव्युत्पन्नाः = बिना व्युत्पत्ति के; अर्थानुसन्धानिकी = अर्थ की खोज से संबंधित; नैरुक्ताः = निरुक्त शास्त्र के आचार्य; धातुजमाह = धातु से उत्पन्न कहा है; एषैव = यह ही।

प्रसंग: इस गद्यांश में शब्दों की उत्पत्ति और उनके अर्थ के बारे में बताया गया है।

अनुवाद: संस्कृत में अर्थ और गुणों को मिलाकर शब्दों की उत्पत्ति होती है; जैसे, 'पुत्र' किस कारण से पुत्र है? ('पुम्' नामक नरक से बचाता है, इसलिए वह 'पुत्र' है)। 'आत्मज' किस कारण से आत्मज (पुत्र) है? (अपने से पैदा होता है, इसलिए वह 'आत्मज' है)। 'सूर्य' किस कारण से सूर्य है? (यह संसार को अपने काम में लगाता है, इसलिए वह 'सूर्य' है)। जब सूर्य आकाश में आता है, तो वह संसार को प्रेरित करता है। "किस कारण से सो रहे हो? उठो, हवा चल रही है, स्वास्थ्य देने वाली प्राणवायु लो, रोज़ के काम करो," इस तरह प्रेरित करता हुआ वह आकाश में आता है, इसलिए वह सूर्य है। 'खग' (पक्षी) किस कारण से खग है? (वह आकाश में जाता है, इसलिए वह 'खग' है)। इस तरह से अर्थ जानने की व्यवस्था अन्य भाषाओं में नहीं है। जो शब्द व्युत्पत्तिरहित हैं, उनकी भी व्याख्या अर्थ की खोज से ही होती है, ऐसा निरुक्त शास्त्र के आचार्यों ने कहा है। शाकटायन ने कहा है कि सभी संज्ञा शब्द धातुओं से बनते हैं, और उणादि सूत्रों में भी यही प्रक्रिया है। यह दर्शाता है कि संस्कृत में शब्दों का हर पहलू अर्थ से जुड़ा है।

(8)

इयं वाणी गुणतोऽनणीयसी, अर्थतो गरीयसी, एकस्य श्लोकस्य षषडर्थाः प्रदर्शिताः नैषधे, वाङ्मयदृष्ट्या महीयसी, भावतो भूयसी, अलङ्कारतो वरीयसी, सुधातोऽपि स्वादीयसी, सुधाशनानामपि प्रेयसी, अत एव जातकलेखकाः बौद्धाः सर्वात्मना पालिं प्रयोक्तुं कृतप्रतिज्ञा अपि संस्कृतेऽपि स्वीयान् ग्रन्थान् व्यरीरचन् । एवं जैनाः कवयः दार्शनिका अपि संस्कृतभाषामपि स्वीकृतवन्तः यद्यपि ते विचारेषु विपक्षधरा एवं आसन्।

शब्दार्थ: गुणतोऽनणीयसी = गुणों के कारण अधिक विस्तृत; गरीयसी = गौरवशाली; वाङ्मयदृष्ट्या = साहित्य की दृष्टि से; महीयसी = महत्वपूर्ण; भूयसी = श्रेष्ठ; वरीयसी = श्रेष्ठ; सुधातोऽपि = अमृत से भी; स्वादीयसी = अधिक स्वादिष्ट; सुधाशनानाम् = अमृत पीने वालों की; स्वीयान् = अपने; व्यरीरचन् = रचना की; स्वीकृतवन्तः = स्वीकार किया; विपक्षधराः = विरोधी पक्ष वाले।

प्रसंग: इस गद्यांश में संस्कृत भाषा का महत्व और उसकी लोकप्रियता बताई गई है।

अनुवाद: यह वाणी गुणों से भी बड़ी है, और अर्थ में भी महान है। नैषध (श्रीहर्ष द्वारा लिखा गया ग्रंथ) में एक श्लोक के छह-छह अर्थ दिखाए गए हैं। साहित्य की दृष्टि से यह बहुत खास है। यह भाव से भी अधिक समृद्ध है, अलंकारों में श्रेष्ठ है, और अमृत से भी ज़्यादा स्वादिष्ट है। अमृत पीने वालों को भी यह बहुत पसंद है। इसीलिए 'जातक' (बौद्ध ग्रंथ) के लेखकों, जो बौद्ध थे, ने पूरी तरह से पालि भाषा का इस्तेमाल करने का वादा करने के बाद भी संस्कृत में अपने ग्रंथ लिखे। इसी तरह जैन दार्शनिकों और कवियों ने भी संस्कृत भाषा को अपनाया, भले ही वे विचारों में विरोधी पक्ष के थे। संस्कृत की यह स्वीकार्यता उसकी व्यापकता और महत्व को दर्शाती है।

(9)

अस्याः काव्यभाषायाः शब्दगतमर्थगतञ्च ध्वनिमाधुर्यं श्रावं आवं सुराङ्गनापदनूपुरध्वनिमाधुर्यं धिक्कुर्वन्ति वाङ्मयाध्वनीनाः, काव्यक्षेत्रे शब्दगतानर्थगतांश्च विस्फुरतोऽलङ्कारान् विलोक्य पुनर्नावलोकयन्ति मणिमयानलङ्कारान्।।

शब्दार्थ: ध्वनिमाधुर्यं आवं आवं = ध्वनि की मधुरता को बार-बार सुनकर; सुराङ्गनापदनूपुरध्वनिमाधुर्यम् = देवांगनाओं के पैरों के घुंघरू की ध्वनि की मधुरता को; धिक्-कुर्वन्ति = अपमानित करते हैं; विस्फुरतः = प्रकट होते हुए; मणिमयान् = मणियों से बने।

प्रसंग: इस गद्यांश में संस्कृत भाषा की मधुरता का वर्णन किया गया है।

अनुवाद: इसकी काव्य भाषा की शब्द और अर्थ की ध्वनि की मधुरता को सुन-सुनकर, संस्कृत साहित्य का अध्ययन करने वाले विद्वान देवांगनाओं के पैरों के घुंघरू की ध्वनि की मधुरता की भी निंदा करते हैं। काव्य के क्षेत्र में, शब्दों और अर्थों से प्रकट होते अलंकारों को देखकर वे फिर मणियों से बने आभूषणों को नहीं देखते हैं। यह बताता है कि संस्कृत की सुंदरता और गहराई किसी भी भौतिक आभूषण से कहीं अधिक मूल्यवान है।

(10)

भारतीय धर्म इव संस्कृतभाषापि भारतीयानां वरिष्ठः शेवधिः । इयमेव भाषा शाखाप्रशाखारूपेण प्रान्तीयासु तासु-तासु भाषासु तिरोहिता वर्तते । अद्य केचन धर्मान्धाः राजनीतिभावनाभाविताः भारतस्य खण्डनमभिलषन्ति । कारणं तेषां संस्कृतभाषायाः अज्ञानम्। “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”, “अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्”, “उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्”, “शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः”, “मा हिस्स र्वभूतानि”;”मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव” इमे उपदेशाः यदि भारतीयानां संमक्षं समीक्ष्यन्तां तदा सकलं भारतं स्वयमेव एकसूत्रे अखण्डतासूत्रे च निबध्येत| “अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः”, “मानसं यान्ति हंसाः न पुरुषा एव?” इति सडिण्डिमं घोषयति इयं भाषा ।

शब्दार्थ: वरिष्ठः = उत्तम; शेवधिः = निधि, खजाना; तासु-तासु = उन-उन; तिरोहिता = छिपी हुई; खण्डनमभिलषन्ति = टुकड़े करना चाहते हैं; परोवेति = या पराया है; वसुधैव = धरती ही; शुनि = कुत्ते में; श्वपाके = चाण्डाल में; प्रोतं = पिरोया हुआ है; निबध्येत = बंध जाएगा।

प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने संस्कृत भाषा के महत्व पर प्रकाश डाला है।

अनुवाद: भारतीय धर्म की तरह संस्कृत भाषा भी भारतीयों की सबसे अच्छी धरोहर है। यही भाषा शाखाओं और उपशाखाओं के रूप में प्रांतों की अलग-अलग भाषाओं में छिपी हुई है। आज कुछ धर्म के प्रति अंधे और राजनीति से प्रभावित लोग भारत के टुकड़े करना चाहते हैं। इसका कारण संस्कृत के बारे में उनका अज्ञान है। "माँ और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है," "यह मेरा है या पराया – ऐसी सोच छोटे दिमाग वालों की होती है," "बड़े दिल वाले लोगों के लिए पूरी दुनिया ही परिवार है," "पंडित कुत्ते और चांडाल में समान दृष्टि रखते हैं," "सभी प्राणियों को चोट नहीं पहुँचानी चाहिए," "मुझ (कृष्ण) में यह सारा संसार धागे में मोतियों की तरह पिरोया हुआ है," – ये उपदेश यदि भारतीयों द्वारा अच्छे से समझे जाएँ, तो पूरा भारत खुद ही एक धागे में बंधकर अखंड हो जाएगा। "उत्तर दिशा में देवताओं की आत्मा वाला हिमालय नाम का पर्वतों का राजा है," "क्या मानसरोवर पर हंस ही जाते हैं, मनुष्य नहीं?" – ये बातें यह भाषा ढोल पीटकर घोषित करती है। संस्कृत सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और एकता का प्रतीक है।

(11)

संस्कृतं विना एकताया अखण्डतायाः पाठः निरर्थक एव प्रतीयते । नेहरूमहाभागेनापि स्वकीयायाम् आत्मकथायां लिखितं यत् संस्कृतभाषा भारतस्य निधिस्तस्याः सुरक्षाया उत्तरदायित्वं स्वतन्त्रे भारते आपतितम् । अस्माकं पूर्वजानां विचाराः अनुसन्धानानि चास्यामेव भाषायां सन्ति । स्वसभ्यतायाः धर्मस्य राष्ट्रियेतिहासस्य, संस्कृतेश्च सम्यग्बोधाय संस्कृतस्य ज्ञानं परमावश्यकमस्ति । केनापि कविना मधुरमुक्तम् भवति भारतसंस्कृतिरक्षणं प्रतिदिनं हि यया सुरभाषया । सकलवाग्जननी भुवि सा श्रुता बुधजनैः सततं हि समादृती ॥ तथा भूतायाः अस्याः भाषायाः पुनरभ्युदयाय भारतीयैः पुनरपि सततं यतनीयम्।

शब्दार्थ: निरर्थक = बेकार, व्यर्थ; प्रतीयते = लगता है; निधिः = खजाना; आपतितम् = आ पड़ा है; अनुसन्धानानि = खोजें; सम्यग्बोधाय = अच्छी तरह से जानने के लिए; भारतसंस्कृतिरक्षणम् = भारत की संस्कृति की रक्षा; सुरभाषया = देवभाषा संस्कृत के द्वारा; सकलवाग्जननी = सभी भाषाओं की माँ; सततं = हमेशा; समादृता = आदर के योग्य; यतनीयम् = प्रयास करना चाहिए।

प्रसंग: इस गद्यांश में भाषा की सुरक्षा, उसका ज्ञान और उसके विकास के लिए भारतीयों को प्रेरित किया गया है।

अनुवाद: संस्कृत के बिना एकता और अखंडता का पाठ बेमानी लगता है। नेहरू जी ने भी अपनी आत्मकथा में लिखा है कि संस्कृत भाषा भारत की धरोहर है, और इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वतंत्र भारत पर है। हमारे पूर्वजों के विचार और खोज इसी भाषा में हैं। अपनी सभ्यता, धर्म, राष्ट्रीय इतिहास और संस्कृति को अच्छी तरह समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान बहुत जरूरी है। किसी कवि ने अपनी मधुर वाणी में कहा है कि जिस संस्कृत भाषा से भारत की संस्कृति की रक्षा हर दिन होती है, वह धरती पर सभी भाषाओं की जननी है, ऐसा विद्वानों ने सुना है और वह हमेशा आदर के योग्य है। ऐसी इस भाषा को फिर से उठाने के लिए भारतीयों को लगातार प्रयास करना चाहिए। यह भाषा भारतीय विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके पुनरुत्थान से देश को बहुत लाभ होगा।

लघु उत्तटीय प्रश्न

 

Question 1. संस्कृत भाषा में निबद्ध वेदांगों की संख्या तथा नाम लिखिए।
Answer: संस्कृत भाषा में छह वेदांग हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं—
• शिक्षा
• कल्प
• व्याकरण
• निरुक्त
• छन्द
• ज्योतिष
In simple words: वेदांग वो ग्रंथ हैं जो वेदों को समझने में मदद करते हैं, और इनकी संख्या छह है। ये शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष हैं, जो प्राचीन भारतीय ज्ञान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

🎯 Exam Tip: वेदांगों के नाम और उनकी संख्या को हमेशा याद रखें, क्योंकि यह अक्सर सीधे प्रश्न के रूप में पूछा जाता है।

 

Question 2. चार वेदों के नाम लिखिए।
Answer: चार वेद इस प्रकार हैं—
• ऋग्वेद
• यजुर्वेद
• सामवेद
• अथर्ववेद
In simple words: भारत के चार मुख्य वेद हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये सभी ज्ञान के पुराने स्रोत हैं।

🎯 Exam Tip: चारों वेदों के नाम सही क्रम में याद रखने से आपको परीक्षा में पूरे अंक मिलेंगे।

 

Question 3. संस्कृत का महत्त्व समझाइए।
Answer: संस्कृत भाषा दुनिया की सभी भाषाओं में सबसे पुरानी है। यह ज्ञान और विज्ञान से भरी है, सरल और मधुर है, और सभी के मन को लुभाने वाली है। पूर्वी (भारतीय) और पश्चिमी दोनों तरह के विद्वान इस बात को एक स्वर में मानते हैं। ग्रीक और लैटिन जैसी प्राचीन भाषाओं में भी संस्कृत ही सबसे प्राचीन और विशाल साहित्य वाली भाषा है। इसकी संरचनात्मक शुद्धता इसे एक अद्वितीय भाषा बनाती है।
In simple words: संस्कृत भाषा बहुत पुरानी और खास है। इसमें बहुत ज्ञान है, यह सीखने में आसान है, और दुनिया के कई विद्वान इसे बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं।

🎯 Exam Tip: संस्कृत के महत्व को बताते समय उसकी प्राचीनता, ज्ञान का स्रोत होना, और विद्वानों द्वारा मान्यता जैसे मुख्य बिंदुओं पर जोर दें।

 

Question 4. दर्शन मुख्य रूप से कितने भागों में विभक्त हैं?
Answer: दर्शन मुख्य रूप से दो भागों में बंटा हुआ है—
(क) आस्तिक दर्शन
(ख) नास्तिक दर्शन । आस्तिक दर्शन के अंतर्गत छह दर्शन आते हैं—
• न्याय
• वैशेषिक
• सांख्य
• योग
• मीमांसा
• वेदान्त
नास्तिक दर्शन के अंतर्गत तीन दर्शन आते हैं—
• चार्वाक
• जैन
• बौद्ध
In simple words: भारतीय दर्शन को दो मुख्य भागों में बांटा गया है: आस्तिक (जो वेद को मानते हैं) और नास्तिक (जो वेद को नहीं मानते)। आस्तिक में छह और नास्तिक में तीन उपभाग हैं।

🎯 Exam Tip: दर्शन के मुख्य विभाजन और उनके अंतर्गत आने वाले सभी दर्शनों के नाम सही से याद करें।

 

Question 5. संस्कृत भाषा की विपुल साहित्य-राशि का संक्षेप में परिचय दीजिए।
Answer: संस्कृत साहित्य में दुनिया के सबसे पुराने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद जैसे चार वेद शामिल हैं। इसमें शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष—ये छह वेदांग भी हैं। न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त—ये छह आस्तिक दर्शनशास्त्र हैं। चार्वाक, जैन और बौद्ध—ये तीन नास्तिक दर्शनशास्त्र हैं। उपनिषद, स्मृतियां, सूत्र, धर्मशास्त्र, पुराण, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ भी संस्कृत साहित्य की विशालता को दर्शाते हैं। यह ज्ञान का एक अद्भुत स्रोत है।
In simple words: संस्कृत साहित्य बहुत बड़ा है। इसमें वेद, वेदांग, दर्शनशास्त्र (आस्तिक और नास्तिक दोनों), उपनिषद, पुराण, रामायण और महाभारत जैसे कई महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।

🎯 Exam Tip: संस्कृत साहित्य की व्यापकता बताते समय प्रमुख ग्रंथों और दर्शनों के उदाहरण दें।

 

Question 6. संस्कृत साहित्य किन तीन प्रकारों में से विभाजित है? इसके कुछ प्रमुख कवियों-लेखकों के नाम बताइए।
Answer: संस्कृत साहित्य को गद्य, पद्य और चम्पू—इन तीन प्रकारों में बांटा गया है। वाल्मीकि, व्यास, भवभूति, दण्डी, सुबन्धु, बाण, कालिदास, अश्वघोष, भारवि, जयदेव, माघ और श्रीहर्ष जैसे कवि और लेखक संस्कृत साहित्य के गौरव को बढ़ाते हैं। इन कवियों की रचनाएँ भाषा को और भी समृद्ध बनाती हैं।
In simple words: संस्कृत साहित्य तीन तरह का होता है: गद्य, पद्य और चम्पू। वाल्मीकि, व्यास, कालिदास जैसे बड़े कवि और लेखक संस्कृत को महान बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: संस्कृत साहित्य के तीन प्रकारों के नाम और कम से कम पाँच प्रमुख कवियों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. राजा ने लकड़हारे से किस शब्द का गलत प्रयोग किया था? सही शब्द क्या होना चाहिए था?
Answer: राजा ने लकड़हारे से बातचीत करते समय 'बाधति' क्रिया का गलत प्रयोग किया था। यह क्रिया परस्मैपदी होने के कारण अशुद्ध थी। इसके स्थान पर 'बाधते' क्रिया का आत्मनेपदी रूप इस्तेमाल होना चाहिए था। यह छोटी सी गलती भाषा के सही व्याकरण को दिखाती है।
In simple words: राजा ने 'बाधति' शब्द गलत बोला था; उसे 'बाधते' बोलना चाहिए था।

🎯 Exam Tip: संस्कृत में क्रिया के सही रूप (परस्मैपदी या आत्मनेपदी) का ध्यान रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि एक छोटी सी गलती से अर्थ बदल सकता है।

 

Question 8. रामायण के अनुसार हनुमान ने सीताजी से किस भाषा में बातचीत की थी? उद्धरणपूर्वक लिखिए।
Answer: रामायण के अनुसार हनुमान ने सीताजी से बातचीत करते समय सामान्य लोगों में प्रचलित संस्कृत भाषा का उपयोग करने का सोचा था। उन्होंने विचार किया था—
वाचं चोदाहरिष्यामि, द्विजातिरिव संस्कृताम् ।
रावणं मन्यमानां मां, सीता भीता भविष्यति ॥
यह बताता है कि हनुमान ने सीता को डरने से बचाने के लिए आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया।
In simple words: हनुमान ने सीता से आम लोगों वाली संस्कृत में बात की थी। उन्होंने सोचा था कि अगर वह ब्राह्मणों जैसी संस्कृत बोलेंगे, तो सीता उन्हें रावण समझकर डर जाएंगी।

🎯 Exam Tip: हनुमान के भाषा चुनाव से संबंधित इस उद्धरण को याद रखें और उसके पीछे का कारण भी स्पष्ट करें।

 

Question 9. भारतीय संस्कृति को प्रतिबिम्बित करने वाली भाषा कौन-सी है?
Answer: भारतीय संस्कृति को प्रतिबिम्बित करने वाली भाषा संस्कृत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस भाषा में रचा गया पूरा साहित्य भारतीय समाज का सीधा प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय विचारों और परंपराओं का भंडार है।
In simple words: संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति को दर्शाती है, क्योंकि इसके साहित्य में भारतीय समाज की पूरी झलक मिलती है।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न के उत्तर में संस्कृत के साथ भारतीय संस्कृति के संबंध को स्पष्ट करना और इसके साहित्यिक योगदान का उल्लेख करना जरूरी है।

 

Question 10. संस्कृत भाषा के सम्बन्ध में नेहरू जी ने अपनी आत्मकथा में क्या लिखा था?
Answer: पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में संस्कृत भाषा के महत्व के बारे में लिखा है कि, "संस्कृत भाषा भारत की अनमोल निधि है। उसकी सुरक्षा का दायित्व स्वतंत्र भारत पर है।" यह वाक्य संस्कृत के दीर्घकालिक महत्व को दर्शाता है।
In simple words: नेहरू जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि संस्कृत भारत की एक अनमोल धरोहर है, और इसे बचाना स्वतंत्र भारत की जिम्मेदारी है।

🎯 Exam Tip: नेहरू जी के कथन को सटीक रूप से उद्धृत करना और उसका अर्थ समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 11. हनुमान् ने सीता को मुद्रिका देते समय सीता से संस्कृत में वार्तालाप क्यों नहीं किया?
Answer: हनुमान ने सीता को अंगूठी देते समय उनसे संस्कृत में बात इसलिए नहीं की, क्योंकि उन्हें डर था कि सीता उन्हें रावण समझकर डर जाएंगी। उस समय संस्कृत भाषा का एक विशेष प्रयोग ब्राह्मणों द्वारा होता था।
In simple words: हनुमान ने सीता से संस्कृत में बात नहीं की क्योंकि उन्हें लगा कि सीता उन्हें रावण समझकर डर जाएंगी।

🎯 Exam Tip: हनुमान के इस निर्णय के पीछे के मनोवैज्ञानिक कारण को स्पष्ट करें।

 

Question 12. भारत की अखण्डता को बनाये रखने वाली दो सूक्तियाँ लिखिए।
Answer: भारत की अखंडता को बनाए रखने वाली दो सूक्तियाँ इस प्रकार हैं—
• अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् । (यह मेरा है और यह पराया है, ऐसी सोच छोटे मन वालों की होती है।)
• मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।। (मुझमें यह सारा संसार धागे में मोतियों की तरह पिरोया हुआ है।)
ये सूक्तियाँ एकता और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को बढ़ावा देती हैं।
In simple words: भारत को एकजुट रखने वाली दो सूक्तियाँ हैं: "यह मेरा-तेरा सोचना छोटी सोच है" और "सारा संसार मुझमें धागे में मोतियों जैसा पिरोया हुआ है"।

🎯 Exam Tip: इन सूक्तियों को सही अर्थ के साथ याद रखें और उनका महत्व भी समझें।

 

Question 13. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' कथन का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस कथन का अर्थ है कि माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक महान हैं। वास्तव में, स्वर्ग को किसी ने देखा नहीं है कि वह कैसा है या वहाँ कितना सुख मिलता है। लेकिन माता और जन्मभूमि हमारे सामने प्रत्यक्ष रूप से हैं। माँ हमें जन्म देती है और कई दुख-कष्ट सहकर हमें हर संभव सुख देती है। इसी तरह हमारी मातृभूमि हमें अन्न, जल और विभिन्न प्रकार के धन-धान्य उपलब्ध कराकर स्वर्ग जैसा सुख देती है। इसलिए यह कहना बिल्कुल सही है कि "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।"
In simple words: इस कथन का मतलब है कि हमारी माँ और हमारी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। हमें इनकी इज्जत करनी चाहिए।

🎯 Exam Tip: इस सूक्ति का अर्थ समझाते समय माता और जन्मभूमि के महत्व पर विशेष बल दें, और स्वर्ग से तुलना को स्पष्ट करें।

 

Question 14. “शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः” का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस कथन का अर्थ है कि ज्ञानी लोग कुत्ते और चाण्डाल (नीची जाति के व्यक्ति) दोनों को समान दृष्टि से देखते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्ञानी व्यक्ति जानता है कि स्वार्थी स्वभाव के कारण, दोनों ही अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। वे अपना पेट भरने के लिए अपने परिवार या किसी को भी मारने को तैयार हो सकते हैं। इसलिए, विद्वान व्यक्ति सभी जीवों में एक समान स्वभाव देखते हैं। यह उनके गहरे ज्ञान को दर्शाता है।
In simple words: इसका मतलब है कि ज्ञानी लोग सभी प्राणियों को एक जैसा देखते हैं, चाहे वे कुत्ता हों या नीची जाति के लोग, क्योंकि उन्हें पता है कि स्वार्थ के लिए कोई भी कुछ भी कर सकता है।

🎯 Exam Tip: इस सूक्ति का अर्थ बताते समय यह स्पष्ट करें कि विद्वान व्यक्ति किसी के बाहरी रूप या सामाजिक स्थिति पर नहीं, बल्कि उनके स्वभाव और आत्मज्ञान के आधार पर समानता देखते हैं।

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