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Chapter Solutions: Class 10 Sanskrit (UP Board) - Chapter 7 विद्यार्थीचार्य
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कक्षा 10 संस्कृत पाठ 7 हिंदी अनुवाद विद्यार्थिचर्या के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड
परिचय
स्मृति ग्रंथों में जीवन के सही तरीके, कौन से काम करने चाहिए और कौन से नहीं करने चाहिए, उनके सही-गलत होने और नियमों का खास वर्णन किया गया है। अट्ठारह मुख्य स्मृति ग्रंथ माने जाते हैं। इनमें सबसे जरूरी ग्रंथ 'मनुस्मृति' है। इसे आदिपुरुष मनु ने लिखा है।
यह पाठ मनुस्मृति से लिया गया है। यह समाज और व्यक्ति के जीवन के कई पहलुओं पर रोशनी डालता है। इसकी उपयोगिता और तर्क को इससे समझा जा सकता है कि आज भी अदालतों में मनुस्मृति को प्रमाण मानकर फैसले किए जाते हैं। इसी ग्रंथ से विद्यार्थियों के लिए व्यवहार से जुड़े नियम इकट्ठे किए गए हैं।
पाठ-सारांश
विद्यार्थी को सूर्योदय से पहले सुबह उठकर अपने धर्म, धन, शरीर के कष्टों और वेदों के ज्ञान के बारे में सोचना चाहिए। भोजन करने के बाद नहाना नहीं चाहिए। बीमार होने पर, रात में, कपड़े पहनकर और अनजान तालाब में कभी नहीं नहाना चाहिए। विद्यार्थी को अपना जूठा भोजन किसी को नहीं देना चाहिए। उसे समय पर और सही मात्रा में भोजन करना चाहिए। खाना खाने के बाद अपना मुँह जरूर साफ करना चाहिए।
जो विद्यार्थी बड़ों को प्रणाम करते हैं और उनकी सेवा करते हैं, उनकी उम्र, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं। विद्यार्थी को गीले पैरों से खाना खाना चाहिए, पर गीले पैरों से सोना नहीं चाहिए। गीले पैरों से खाना खाने से उम्र लंबी होती है। विद्यार्थी को हमेशा मीठा सच बोलना चाहिए। जो सच अप्रिय हो या जो झूठ प्रिय हो, उसे नहीं बोलना चाहिए। यही सबसे बड़ा धर्म है। उसे चंचल हाथ-पैर, चंचल आँखें, कठोर स्वभाव, चंचल वाणी वाला और दूसरों से दुश्मनी रखने वाला नहीं होना चाहिए।
अगर किसी व्यक्ति में सारे अच्छे लक्षण न हों, फिर भी वह सदाचारी हो, श्रद्धावान हो और दूसरों की निंदा न करता हो, तो वह सौ साल तक जीता है। आजादी ही सुख है और दूसरों के अधीन रहना दुख है। विद्यार्थी को सुख-दुख को इसी तरह समझना चाहिए। अकेले बैठकर सोचना ही फायदेमंद होता है; इसलिए विद्यार्थी को अपनी भलाई के बारे में अकेले में बैठकर सोचना चाहिए।
पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या
Question 1. ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत्, धर्मार्थी चानुचिन्तयेत् कायक्लेशांश्च तन्मूलान्, वेदतत्त्वार्थमेव च ॥
Answer: विद्यार्थी को ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिए, जो सूर्योदय से लगभग 48 मिनट पहले का समय होता है। उसे अपने धर्म और धन के बारे में गहराई से सोचना चाहिए। उसे अपने शारीरिक कष्टों, उनके कारणों और उन्हें दूर करने के तरीकों पर भी विचार करना चाहिए। साथ ही, वेदों के असली अर्थ को समझना भी उसके लिए महत्वपूर्ण है। यह व्यक्ति को अपने जीवन के लक्ष्य और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक बनाता है।
In simple words: विद्यार्थी को सुबह जल्दी उठना चाहिए। उसे अपने धर्म, पैसे, शरीर की तकलीफों और वेदों के ज्ञान के बारे में सोचना चाहिए।
🎯 Exam Tip: जब भी किसी श्लोक की व्याख्या करें, तो उसके मुख्य शब्दों के अर्थ स्पष्ट करें और यह बताएं कि वह शिक्षा किस बारे में है।
Question 2. न स्नानमाचरेद भुक्त्वा, नातुरो न महानिशि । न वासोभिः सहाजस्त्रं, नाविज्ञाते जलाशये ॥
Answer: विद्यार्थी को भोजन करने के तुरंत बाद कभी नहीं नहाना चाहिए, क्योंकि इससे पाचन खराब हो सकता है। बीमार होने पर भी स्नान नहीं करना चाहिए, और न ही बहुत देर रात में नहाना चाहिए। उसे कपड़ों के साथ लगातार या बहुत समय तक स्नान नहीं करना चाहिए, और किसी अनजान तालाब या जलाशय में तो बिल्कुल भी नहीं नहाना चाहिए। स्वास्थ्य का ध्यान रखने से पढ़ाई में मन लगता है।
In simple words: विद्यार्थी को खाना खाने के बाद, बीमार होने पर, आधी रात में, कपड़ों के साथ और अनजान जगह पर नहाना नहीं चाहिए।
🎯 Exam Tip: नियमों को याद रखने के लिए उन्हें अपनी दिनचर्या से जोड़ें, जैसे 'भोजन के तुरंत बाद नहीं नहाना' एक अच्छा स्वास्थ्य नियम है।
Question 3. नोच्छिष्टं कस्यचिद् दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा । न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद् व्रजेत् ॥
Answer: विद्यार्थी को अपना जूठा भोजन किसी और को नहीं देना चाहिए। उसे दो भोजन के समयों के बीच में बार-बार या बहुत से लोगों के सामने भोजन नहीं करना चाहिए। अत्यधिक भोजन करने से बचना चाहिए, क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। साथ ही, जूठे मुँह (बिना मुँह धोए) कहीं भी नहीं जाना चाहिए। यह नियम स्वच्छता और संयम सिखाते हैं।
In simple words: विद्यार्थी को जूठा खाना किसी को नहीं देना चाहिए। बीच-बीच में और बहुत ज्यादा खाना नहीं खाना चाहिए। जूठे मुँह कहीं नहीं जाना चाहिए।
🎯 Exam Tip: स्वच्छता और भोजन संबंधी आदतों पर आधारित सवालों में 'अति' या 'बहुत अधिक' से बचने पर जोर दें।
Question 4. अभिवादनशीलस्य, नित्यं वृद्धोपसेविनः ।। चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशो बलम् ॥
Answer: जो विद्यार्थी स्वभाव से ही विनम्र होता है और हमेशा बड़ों को प्रणाम करता है, तथा प्रतिदिन बड़े-बुजुर्गों की सेवा करता है, उसकी चार चीजें बढ़ती हैं। ये चार चीजें हैं – आयु (लंबी उम्र), विद्या (ज्ञान), यश (ख्याति) और बल (शक्ति)। बड़ों का सम्मान करने से व्यक्ति को उनका आशीर्वाद मिलता है, जिससे उसका जीवन बेहतर होता है।
In simple words: जो बड़ों को प्रणाम और उनकी सेवा करता है, उसकी उम्र, ज्ञान, इज्जत और ताकत ये चार चीजें बढ़ती हैं।
🎯 Exam Tip: इस श्लोक को मनुस्मृति के सबसे महत्वपूर्ण उपदेशों में से एक माना जाता है, इसलिए इसके चारों फलों को याद रखना जरूरी है।
Question 5. आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत, नार्दपादस्तु संविशेत् । आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो, दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥
Answer: विद्यार्थी को गीले पैरों से (यानी पैर धोकर बिना पोंछे) भोजन करना चाहिए। हालांकि, गीले पैरों से सोना नहीं चाहिए। जो व्यक्ति गीले पैरों से भोजन करता है, वह लंबी उम्र प्राप्त करता है। पैरों को गीला रखना पाचन क्रिया के लिए लाभदायक माना जाता है, पर सोने से पहले उन्हें सुखा लेना चाहिए ताकि शरीर को ठंड न लगे।
In simple words: गीले पैरों से भोजन करना चाहिए, पर गीले पैरों से सोना नहीं चाहिए। गीले पैरों से भोजन करने से लंबी उम्र मिलती है।
🎯 Exam Tip: इस श्लोक में 'भुञ्जीत' और 'संविशेत्' शब्दों पर ध्यान दें, जो खाने और सोने के नियमों को बताते हैं।
Question 6. सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न बूयोत्सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं बूयादेष धर्मः सनातनः ।।
Answer: विद्यार्थी को हमेशा सच बोलना चाहिए और उसे प्रिय (जो सुनने में अच्छा लगे) बोलना चाहिए। हालांकि, उसे ऐसा सच नहीं बोलना चाहिए जो अप्रिय (बुरा लगने वाला) हो। इसी तरह, उसे ऐसा झूठ भी नहीं बोलना चाहिए जो सुनने में प्रिय हो। यही शाश्वत धर्म है, यानी हमेशा सही रहने वाला नियम। हमेशा सोच-समझकर बोलना चाहिए।
In simple words: सच बोलो, प्रिय बोलो। अप्रिय सच मत बोलो। प्रिय झूठ भी मत बोलो। यही सच्चा धर्म है।
🎯 Exam Tip: यह श्लोक वाणी के संयम और धर्म के मूल सिद्धांत को बताता है, जिसमें सत्य और प्रियता का संतुलन महत्वपूर्ण है।
Question 7. न पाणिपादचपलो, न नेत्रचपलोऽनृजुः ।। न स्याद्वाक्चपलश्चैव, न परद्रोहकर्मधीः ॥
Answer: विद्यार्थी को अपने हाथों और पैरों से चंचल नहीं होना चाहिए, यानी उन्हें व्यर्थ में नहीं हिलाना चाहिए। उसकी आँखें भी चंचल नहीं होनी चाहिए और उसका स्वभाव कठोर या कुटिल नहीं होना चाहिए। उसे वाणी से भी चंचल नहीं होना चाहिए (अनाप-शनाप नहीं बोलना चाहिए)। सबसे महत्वपूर्ण, उसे दूसरों के प्रति दुश्मनी या बुराई करने वाली बुद्धि नहीं रखनी चाहिए। यह उसे विनम्र और शांत रहने में मदद करता है।
In simple words: विद्यार्थी को चंचल हाथ-पैर, चंचल आँखें, कठोर स्वभाव और चंचल वाणी वाला नहीं होना चाहिए। उसे दूसरों से दुश्मनी रखने की बुद्धि भी नहीं रखनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: विद्यार्थी के उत्तम गुणों को दर्शाने वाले इस श्लोक में 'न' का प्रयोग निषेध के अर्थ में कई बार हुआ है, जो उसके व्यवहार के लिए दिशानिर्देश देता है।
Question 8. सर्वलक्षणहीनोऽपि, यः सदाचारवान्नरः श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥
Answer: अगर कोई व्यक्ति सभी अच्छे लक्षणों से रहित हो, फिर भी वह सदाचारी (अच्छे आचरण वाला) है, श्रद्धावान है और दूसरों से ईर्ष्या नहीं करता है, तो वह सौ साल तक जीवित रहता है। यहाँ 'जीवित रहता है' का अर्थ सिर्फ शारीरिक जीवन नहीं, बल्कि समाज में उसका यश और सम्मान हमेशा बना रहता है। यह हमें सिखाता है कि अच्छे गुण बाहरी सुंदरता से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
In simple words: जिस व्यक्ति में कोई खास लक्षण न हो, पर वह सदाचारी, श्रद्धावान और दूसरों से ईर्ष्या न करता हो, वह सौ साल तक जीता है।
🎯 Exam Tip: इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि सदाचार, श्रद्धा और ईर्ष्यारहित स्वभाव व्यक्ति को दीर्घायु और सम्मान दिलाते हैं।
Question 9. सर्वं परवशं दुःखं, सर्वमात्मवशं सुखम् ।। एतद्विद्यात् समासेन, लक्षणं सुख-दुःखयोः ॥
Answer: जो कुछ भी दूसरे के अधीन (पराधीन) है, वह सब दुख है। और जो कुछ भी अपने अधीन (स्वाधीन) है, वह सब सुख है। इसे ही संक्षेप में सुख और दुख का लक्षण समझना चाहिए। स्वतंत्रता ही सबसे बड़ा सुख है और दूसरों पर निर्भरता सबसे बड़ा दुख है। पराधीनता व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार कार्य करने से रोकती है, जिससे मन दुखी होता है।
In simple words: जो दूसरों के हाथ में है, वह दुख है। जो अपने हाथ में है, वह सुख है। यही सुख और दुख की पहचान है।
🎯 Exam Tip: यह श्लोक स्वतंत्रता के महत्व और परतंत्रता के दोष को बहुत सीधे शब्दों में बताता है; इसे ध्यान में रखें।
Question 10. एकाकी चिन्तयेन्नित्यं, विविक्ते हितमात्मनः । एकाकी चिन्तयानो हि, परं श्रेयोऽधिगच्छति ॥
Answer: व्यक्ति को हमेशा एकांत में बैठकर अपनी भलाई के बारे में सोचना चाहिए। जो व्यक्ति अकेले में बैठकर अपनी भलाई के बारे में सोचता है, वह सबसे बड़े कल्याण को प्राप्त करता है। एकांत में सोचने से मन एकाग्र होता है और कोई बाहरी बाधा नहीं आती। इससे सही फैसले लेना आसान हो जाता है और व्यक्ति को आत्म-कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने में मदद मिलती है।
In simple words: व्यक्ति को हमेशा अकेले में बैठकर अपनी भलाई के बारे में सोचना चाहिए। जो अकेला सोचता है, उसे सबसे अच्छा लाभ मिलता है।
🎯 Exam Tip: 'एकांत' और 'आत्म-कल्याण' इस श्लोक के मुख्य शब्द हैं, जो आत्म-चिंतन के महत्व पर जोर देते हैं।
सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या
Question 1. ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत, धर्माचानुचिन्तयेत्।।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि विद्यार्थी को ब्रह्म मुहूर्त में जागना चाहिए और अपने धर्म तथा धन के बारे में सोचना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय से एक घंटे पहले का समय होता है, जो पढ़ाई के लिए बहुत शुभ माना जाता है। इस समय की गई पढ़ाई दिमाग में स्थायी रूप से बैठ जाती है। धर्म का अर्थ है अपने नैतिक कर्तव्यों और ईश्वर की आराधना करना। इस समय जागने से व्यक्ति मानसिक रूप से शांत और एकाग्र रहता है, जो पढ़ाई और आत्म-चिंतन के लिए उत्तम है।
In simple words: सुबह जल्दी उठो और धर्म-धन के बारे में सोचो। यह पढ़ाई और आत्म-विकास के लिए सबसे अच्छा समय है।
🎯 Exam Tip: इस सूक्ति में 'ब्रह्म मुहूर्त' की महत्ता को समझाएं और बताएं कि यह समय पढ़ाई और चिंतन के लिए सर्वोत्तम क्यों है।
Question 2. न स्नानमाचरेद् भुक्त्वा नातुरो न महानिशि ।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि भोजन करने के बाद, बीमार होने पर और आधी रात में स्नान नहीं करना चाहिए। भोजन के बाद स्नान करने से पाचन अग्नि धीमी हो जाती है, जिससे भोजन ठीक से नहीं पच पाता। बीमारी में स्नान करने से स्वास्थ्य और बिगड़ सकता है, और आधी रात में स्नान हानिकारक हो सकता है। स्वस्थ रहने के लिए इन नियमों का पालन करना बहुत जरूरी है।
In simple words: खाना खाने के बाद, बीमार होने पर और आधी रात में नहाना ठीक नहीं है।
🎯 Exam Tip: स्वास्थ्य संबंधी नियमों को बताते समय, उनके पीछे के कारणों को भी संक्षेप में बताएं ताकि छात्र अच्छी तरह समझ सकें।
Question 3. अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि जो व्यक्ति स्वभाव से ही विनम्र होता है और हमेशा बड़ों को प्रणाम करता है, तथा प्रतिदिन वृद्धों की सेवा करता है। ऐसे व्यक्ति को बड़ों का आशीर्वाद मिलता है, जिससे उसे जीवन में सफलता मिलती है। बड़ों के प्रति सम्मान और सेवा एक महत्वपूर्ण नैतिक गुण है, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करता है।
In simple words: जो बड़ों को प्रणाम करता है और उनकी सेवा करता है, वह अच्छा इंसान होता है।
🎯 Exam Tip: 'अभिवादनशील' और 'वृद्धोपसेविनः' शब्दों का महत्व समझाएं और बताएं कि ये गुण कैसे व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाते हैं।
Question 4. चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ।
Answer: यह सूक्ति बताती है कि अभिवादनशील और वृद्धों की सेवा करने वाले व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल ये चारों चीजें बढ़ती हैं। बड़ों का आदर-सत्कार करने और उनकी सेवा करने से व्यक्ति को उनका स्नेह और ज्ञान मिलता है। इन गुणों से व्यक्ति समाज में सम्मान पाता है और उसका जीवन सफल होता है। विनम्रता एक गुण है जो दूसरों को प्रभावित करता है और व्यक्ति को बेहतर बनाता है।
In simple words: ऐसे व्यक्ति की उम्र, ज्ञान, इज्जत और ताकत ये चारों चीजें बढ़ती हैं।
🎯 Exam Tip: इस सूक्ति को पिछली सूक्ति के साथ जोड़कर समझाएं, क्योंकि यह उसके परिणाम को बताती है।
Question 5. सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् ।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि हमेशा सच बोलना चाहिए और प्रिय (मीठा) बोलना चाहिए। लेकिन ऐसा सच नहीं बोलना चाहिए जो अप्रिय (कड़वा) हो। उदाहरण के लिए, किसी अंधे व्यक्ति को 'अंधा' कहना सच है, पर वह अप्रिय है, इसलिए ऐसा नहीं बोलना चाहिए। वाणी में मधुरता और सत्य का संतुलन ही उत्तम व्यवहार है।
In simple words: सच बोलो, मीठा बोलो। बुरा लगने वाला सच मत बोलो।
🎯 Exam Tip: सत्य और प्रियता के संतुलन पर जोर दें, और उदाहरण के साथ समझाएं कि अप्रिय सत्य क्यों नहीं बोलना चाहिए।
Question 6. श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि जो व्यक्ति श्रद्धा रखने वाला है और दूसरों से ईर्ष्या नहीं करता है, वह सौ वर्ष तक जीवित रहता है। यहाँ 'सौ वर्ष जीवित रहना' का मतलब केवल लंबी उम्र नहीं, बल्कि समाज में सम्मान और यश के साथ जीना है। श्रद्धा और ईर्ष्यारहित स्वभाव व्यक्ति को मानसिक शांति और सामाजिक स्वीकृति प्रदान करता है, जिससे उसका जीवन खुशहाल बनता है।
In simple words: जो श्रद्धा रखता है और ईर्ष्या नहीं करता, वह लंबी और अच्छी जिंदगी जीता है।
🎯 Exam Tip: 'श्रद्धा' और 'अनसूय' (ईर्ष्यारहित) गुणों का महत्व समझाएं, जो व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता लाते हैं।
Question 7. सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।। एतद्विद्यात् समासेन, लक्षणं सुखदुःखयोः ॥
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि जो कुछ भी दूसरों के अधीन (पराधीन) है, वह सब दुख है, और जो कुछ भी अपने अधीन (स्वाधीन) है, वह सब सुख है। इसे ही संक्षेप में सुख और दुख की पहचान समझना चाहिए। पराधीनता से व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन जाती है, जिससे वह दुखी रहता है। स्वाधीनता से व्यक्ति अपनी इच्छा से कार्य कर सकता है और सुख का अनुभव कर सकता है।
In simple words: दूसरे पर निर्भर होना दुख है, खुद पर निर्भर होना सुख है। यही सुख-दुख का नियम है।
🎯 Exam Tip: स्वतंत्रता और परतंत्रता के अंतर को स्पष्ट करें, और बताएं कि ये दोनों कैसे क्रमशः सुख और दुख का कारण बनते हैं।
Question 8. एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति ।
Answer: इस सूक्ति का अर्थ है कि निश्चय ही अकेला मनुष्य चिंतन करने पर परम कल्याण को प्राप्त करता है। एकांत में बैठकर सोचने से मन शांत रहता है, जिससे व्यक्ति अपने विचारों पर बेहतर तरीके से ध्यान केंद्रित कर पाता है। बाहरी शोर और भटकाव से दूर रहकर, व्यक्ति अपनी समस्याओं और लक्ष्यों के बारे में स्पष्टता से सोच सकता है। यह उसे सही निर्णय लेने और अपने जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करता है।
In simple words: जो अकेला बैठकर सोचता है, उसे सबसे अच्छा फायदा मिलता है।
🎯 Exam Tip: 'एकांत चिंतन' के लाभ बताएं, जैसे एकाग्रता और सही निर्णय लेने की क्षमता, जो व्यक्ति के विकास में सहायक होते हैं।
श्लोक का संस्कृत-अर्थ
Question 1. ब्राह्म मुहूर्ते (...) वेदतत्त्वार्थमेव च ॥
Answer: स्मृतिकार मनुः कथयति यत् छात्रः प्रातःकाले ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत्। सः धर्मान् अर्थान् च अनुचिन्तयेत्। कायस्य क्लेशान् तन्मूलान्, तेषां निवारणोपायान्, वेदस्य तत्त्वानाम् अर्थस्य च चिन्तयेत्। एतेन छात्रः स्वजीवनं सफलंकर्तुं शक्नोति।
In simple words: छात्रः ब्राह्म मुहूर्ते उत्तिष्ठेत्। धर्मार्थं च चिन्तयेत्। शरीरकष्टान् वेदार्थान् च चिन्तयेत्।
🎯 Exam Tip: संस्कृत व्याख्या में मुख्य क्रियाओं (जैसे 'बुध्येत्', 'चिन्तयेत्') और उनके कर्ताओं पर ध्यान दें, ताकि अर्थ स्पष्ट रहे।
Question 2. न स्नानमाचरेद (...) नाविज्ञाते जलाशये ॥
Answer: स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् छात्रः भोजनं कृत्वा कदापि स्नानं न आचरेत्। रोगी अपि, दीर्घ निशायाम् अपि, वस्त्राणि परिधायापि, अविज्ञाते सरोवरे वा नद्यां कदापि स्नानं न आचरेत्। एते नियमाः स्वास्थ्यरक्षायाः कृते सन्ति।
In simple words: छात्रः भुक्त्वा, आतुरः, महानिशायां वा अविज्ञाते जलाशये स्नानं न कुर्यात्।
🎯 Exam Tip: 'न' का प्रयोग निषेध के लिए होता है, इस पर ध्यान केंद्रित करें और बताएं कि किन स्थितियों में स्नान वर्जित है।
Question 3. नोच्छिष्टं कस्यचिद् (...) क्वचिद् व्रजेत् ॥
Answer: स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् विद्यार्थी कस्यचित् उच्छिष्टं भोजनं न दद्यात्। द्वौ भोजनस्य मध्ये अतिभोजनं न कुर्यात्। अत्यधिकं भोजनं न कुर्यात्। उच्छिष्टः मुखात् क्वचित् अपि न गच्छेत्। एतेन स्वच्छतायाः संयमस्य च महत्वं ज्ञायते।
In simple words: विद्यार्थीः उच्छिष्टं भोजनं न दद्यात्। अत्यशनं न कुर्यात्। उच्छिष्टः मुखात् क्वचित् न व्रजेत्।
🎯 Exam Tip: भोजन संबंधी शुद्धता और संयम पर आधारित इस श्लोक के नियमों को ध्यान से याद करें।
Question 4. अभिवादनशीलस्य (...) यशो बलम् ॥
Answer: स्मृतिकारः अभिवादनशीलतायाः वृद्ध-सेवायाः च लाभं वर्णयति। यस्य स्वभावः स्वपूज्यानाम् अभिवादनम् अस्ति, यः सदा वृद्धानां सेवां करोति, तस्य जनस्य आयुः, विद्या, यशः, शक्तिः च इति चत्वारि वस्तूनि वृद्धिं लभन्ते। एतैः गुणैः मानवः समाजे सम्मानं प्राप्नोति।
In simple words: यः वृद्धान् नमस्करोति सेवते च, तस्य आयुः, विद्या, यशः, बलं च वर्धन्ते।
🎯 Exam Tip: इस श्लोक के 'चत्वारि वर्धन्ते' वाले भाग को स्पष्ट रूप से समझाएं, क्योंकि यह श्लोक का केंद्रीय बिंदु है।
Question 5. आर्दपादस्तु भुञ्जीत (...) दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥
Answer: अस्मिन् श्लोके चरण-प्रक्षालनस्य नियमानां वर्णनम् अस्ति। जनः जलेन चरणौ प्रक्षाल्य आर्द्रपादः एव भोजनं कुर्यात्, परम् आर्द्राभ्यां पादाभ्यां शयनं न कुर्यात्। यः जनः जलेन चरणौ प्रक्षाल्य आर्द्रपादः भोजनं करोति सः दीर्घम् आयुः प्राप्नोति। एषः नियमः आरोग्यवर्धनार्थं महत्त्वपूर्णः।
In simple words: आर्द्रपादः सन् भुञ्जीत, न तु संविशेत्। आर्द्रपादभोजनात् दीर्घम् आयुः भवति।
🎯 Exam Tip: 'भुञ्जीत' (खाए) और 'संविशेत्' (सोए) क्रियाओं के अंतर को स्पष्ट करें, जो यहाँ दो अलग-अलग सलाह देते हैं।
Question 6. सत्यं ब्रूयात्प्रियं (...) धर्मः सनातनः ॥
Answer: महर्षिः मनुः सत्यभाषणस्य विषये नियमं कथयति यत् मनुष्यः सदा सत्यं वदेत्। सदा प्रियं वदेत्। तादृशं सत्यं न वदेत् यत् कस्यापि अप्रियं वा कटु च अस्ति। तादृशं प्रियम् अपि न वदेत् यत् सत्यं न अस्ति। इत्थं प्रकारेण सत्यं-प्रियं-भाषणं सर्वेषां समीचीनः धर्मः अस्ति। एषः वाणी संयमस्य उत्तमः मार्गः।
In simple words: सत्यं वदेत्, प्रियं वदेत्। अप्रियं सत्यं, असत्यं प्रियं च न वदेत्। एषः सनातनः धर्मः।
🎯 Exam Tip: इस श्लोक में 'अप्रियं सत्यम्' और 'अनृतं प्रियम्' के उदाहरणों पर चर्चा करें ताकि छात्र इन सूक्ष्म भेदों को समझ सकें।
Question 7. न पाणिपादचपलो (...) परद्रोहकर्मधीः ॥
Answer: स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् विद्यार्थी हस्त-पादयोः चापल्यं न कुर्यात्। इत्यमेव अनृजुः सन् वाक्चापल्यमपि न कुर्यात्। परेषां द्रोहकर्मणि बुद्धिः अपि न कुर्यात्। एतेन विद्यार्थी अनुशासितः विनीतश्च भवति।
In simple words: विद्यार्थी हस्त-पाद-नेत्र-वाक्-चपलः न स्यात्। परद्रोहकर्मधीः अपि न स्यात्।
🎯 Exam Tip: इस श्लोक में नकारात्मक वाक्यों पर ध्यान दें, जो विद्यार्थी के लिए 'क्या नहीं करना चाहिए' बताते हैं।
Question 8. सर्वलक्षणहीनोऽपि (...) वर्षाणि जीवति ॥
Answer: मनुः महाराजः कथयति यत् यः नरः सर्वलक्षणैः हीनः अस्ति, परञ्च सदाचारयुक्तः, श्रद्धायुक्तः, ईर्ष्यारहितः च अस्ति, सः शतं संवत्सराणि जीवति। अत्र 'जीवति' इत्यस्य अर्थः यशसा सह जीवनम् अस्ति।
In simple words: यः सदाचारी, श्रद्धायुक्तः, ईर्ष्यारहितः च नरः, सः शतं वर्षाणि जीवति।
🎯 Exam Tip: 'सर्वलक्षणहीनोऽपि' वाक्यांश के बावजूद व्यक्ति के अन्य गुणों के महत्व को रेखांकित करें।
Question 9. सर्वं परवशं दुःखं, (...) सुखदुःखयोः ॥
Answer: स्मृतिकारः मनुः कथयति-अस्मिन् संसारे यदपि पराधीनम् अस्ति, तत्सर्वं दुःखस्वरूपम् अस्ति। यत् स्वाधीनम् अस्ति, तत्सर्वं सुखस्वरूपम् अस्ति। पराधीनतां दुःखस्य स्वाधीनतां च सुखस्य सङ्क्षेपेण लक्षणं जानीयात्। स्वाधीनता मनुष्यस्य सर्वोत्तमं सुखं ददाति।
In simple words: यत् परवशं तत् दुःखं, यत् आत्मवशं तत् सुखम्। एतत् सुखदुःखयोः लक्षणम् अस्ति।
🎯 Exam Tip: इस सूक्ति में 'परवशं' और 'आत्मवशं' शब्दों को स्पष्ट करें और उनके अर्थ में अंतर को समझाएं।
Question 10. एकाकी चिन्तयेन्नित्यं (...) श्रेयोऽधिगच्छति ।
Answer: अस्मिन् श्लोके एकान्तचिन्तनस्य महत्त्वं प्रदर्शितम् अस्ति। प्रत्येकं मानवः एकान्तस्थले स्थित्वा प्रतिदिनं स्वहिताय चिन्तनं कुर्यात्। यः मानवः नित्यप्रति एकाकी भूत्वा स्वहितकारिणं विषयं प्रति चिन्तयति, सः सर्वथा स्वकल्याणं प्राप्नोति। एकाग्रतायै एकांतं महत्त्वपूर्णम् अस्ति।
In simple words: मानवः एकाकी सन् नित्यं स्वहितं चिन्तयेत्। एकाकी चिन्तनात् परं श्रेयः लभ्यते।
🎯 Exam Tip: 'एकाकी' और 'श्रेयः' शब्दों पर जोर दें, और बताएं कि अकेले चिंतन से कैसे व्यक्ति को परम लाभ मिलता है।
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