UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 15 Gajendramokshah

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कक्षा 10 संस्कृत पाठ 15 हिंदी अनुवाद गजेन्द्रमोक्षः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय

पुराणों में भगवान् विष्णु को हमेशा भक्तवत्सल के रूप में दिखाया गया है। उनकी भक्तवत्सलता की कई कहानियाँ भारतीय लोगों में मशहूर हैं। इन्हीं में से एक कहानी गजेन्द्र मोक्ष के नाम से भी जानी जाती है। कहानी के अनुसार, एक हाथी को अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था। वह हाथियों का राजा भी था। एक बार वह पानी पीने एक तालाब पर गया। वहाँ वह अपने साथी हाथियों और हथिनियों के साथ पानी में खेलने लगा। उसे अपनी शक्ति पर गर्व था और पानी में खेलते हुए उस हाथी को किसी का डर नहीं था। तभी अचानक एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। हाथी मगरमच्छ को पानी से बाहर खींच रहा था और मगरमच्छ उसे पानी के अंदर खींच रहा था। जब हाथी लड़ते-लड़ते थक गया, तब उसने भगवान् विष्णु को मदद के लिए पुकारा। भगवान् विष्णु ने हाथी को मगरमच्छ से छुड़ाया। यह पाठ भगवान् विष्णु के भक्त-प्रेम के साथ-साथ भक्त की विनम्रता को भी दिखाता है।

पाठ-सारांश

वरुण के उद्यान का वर्णन: प्रसिद्ध त्रिकूट पर्वत पर देवताओं की अप्सराओं के खेलने की जगह के रूप में भगवान् वरुण का 'ऋतुमत्' नाम का उद्यान था। इस उद्यान में सुंदर फल और फूलों वाले पारिजात, अशोक, आम, कचनार, अर्जुन, चन्दन आदि के पेड़ लगे हुए थे।

सरोवर का वर्णन: उस उद्यान में कई कमल के फूलों से सजा हुआ; हंस, सारस आदि की आवाज़ों से गूँजता हुआ; कदम्ब, कुन्द, शिरीष आदि के फूलों; मल्लिका, माधवी आदि खुशबूदार बेलों से सजा हुआ, सुंदर आवाज़ वाले पक्षियों से घिरा हुआ, मगरमच्छ और कछुए आदि पानी के जीवों से भरा एक सरोवर था।

गजेन्द्र का वर्णन: उस जंगल में हाथिनियों के साथ घूमता हुआ एक बड़ा हाथी (गजेन्द्र) बाँस और बेंत के झुंडों को तोड़ता रहता था। उसकी गंध से ही शेर, बाघ, सूअर, गैंडे, भेड़िये आदि खतरनाक और हिंसक जानवर डरकर भाग जाते थे। उसकी कृपा से हिरन, खरगोश आदि छोटे पशु बिना डर के घूमते थे। एक दिन धूप से परेशान होकर वह हाथियों और हथिनियों के साथ, हाथी के बच्चों के पीछे भागता हुआ, भ्रमरों से घिरा हुआ और अपनी गरिमा से पर्वत को हिलाता हुआ उस सरोवर के पास गया। वह उस सरोवर में डुबकी लगाकर, साफ पानी पीकर और स्नान करके अपनी थकान मिटा ली।

ग्राह से युद्ध: अपनी सूंड से पानी उठाकर हाथिनियों और हाथी के बच्चों को पानी पिलाकर और स्नान कराकर पानी में खेल रहे उस बड़े हाथी को एक ताकतवर मगरमच्छ ने गुस्से में पकड़ लिया और उसे तेज़ी से खींचा। इस संकट से

उसे दूसरे हाथी भी नहीं बचा पाए। इस तरह मगरमच्छ और हाथी में बहुत सालों तक युद्ध चलता रहा। बहुत समय तक युद्ध करते-करते हाथी का मनोबल और शारीरिक बल कम होता गया, जबकि मगरमच्छ को इससे उल्टा फायदा हुआ, यानी उसका आत्मबल और शारीरिक बल बढ़ता गया।

विष्णु द्वारा मुक्ति: जब गजराज मगरमच्छ की पकड़ से छूटने में असमर्थ हो गया और उसकी जान खतरे में पड़ गई, तो उसने अपनी रक्षा के लिए भगवान् विष्णु की स्तुति की। गजराज की दुखभरी विनती सुनकर भगवान् विष्णु स्वयं गरुड़ पर सवार होकर देवताओं के साथ उसके पास आए। गजराज को दुखी देखकर उन्होंने उसे मगरमच्छ सहित तालाब से उठा लिया और देखते ही देखते, यानी बहुत तेज़ी से, गजराज को मगरमच्छ के मुँह से छुड़ा दिया।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)

विश्रुते त्रिकूटगिरिवरे सुरयोषितामाक्रीडं सर्वतो नित्यं दिव्यैः पुष्पफलद्रुमैः मन्दारैः पारिजातैः पाटलाशोकचम्पकैः प्रियालैः पनसैरामैराम्रातकैः क्रमुकैर्नालिकेरैश्च बीजपूरकैः खर्जुरैः मधुकैः सालतालैस्तमालैः रसनार्जुनैररिष्टोदुम्बरप्लक्षैर्वटैः किंशुकचन्दनैः पिचुमन्दैः कोविदारैः सरलैः सुरदारुभिः द्राक्षेक्षुरम्माजम्बूभिर्बदर्यक्षाभयामलैः बिल्वैः कपित्थैर्जम्बीरैः भल्लातकादिभिः वृतं महात्मनो भगवतो वरुणस्योद्यानमृतुमन्नाम बभूव ।

शब्दार्थ

विश्रुते = प्रसिद्ध । सुरयोषिताम् = देवांगनाओं का । आक्रीडम् = क्रीड़ा का स्थान । मन्दारैः = आक के पौधे से । पाटलाशोकचम्पकैः = पाटल, अशोक और चम्पा के फूलों से । प्रियालैः = चिरौंजी से । पनसैः = कटहल से । आम्रातकैः = आँवला से । क्रमुकैः = सुपारी से । नारिकेलैः = नारियल के वृक्षों से । बीजपूरकैः = चकोतरे से । मधुकैः = मुलेठी, महुआ से । सालतालैस्तमालैः = साल, ताड़ और तमाल के वृक्षों से । उदुम्बर = गूलर । प्लक्ष = पाकड़ वट = बरगदा किंशुक = ढाका पिचुमन्दैः = नीम से । कोविदारैः = कचनार से । सुरदारुभिः = देवदारु के वृक्षों द्वारा । द्राक्षा = अंगूर) इक्षु = ईख । रम्भा = केला । जम्बू = जामुन । बदरी = बेर । अभय = हरड़ । कपित्थ = कैथ । जम्बीरैः = नींबू । भल्लातक = भिलावा । वृत्तम् = घिरा हुआ । वरुणस्योद्यानमृतुमन्नाम = वरुण का ऋतुमत नाम का उद्यान ।

सन्दर्भ

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत' के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती' में संकलित 'गजेन्द्रमोक्षः' शीर्षक पाठ से उधृत है।

प्रसंग

प्रस्तुत गद्यांश में वरुण के उद्यान के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है।

अनुवाद

प्रसिद्ध सुन्दर त्रिकूट पर्वत पर मन्दार, पारिजात, पाटल, अशोक, चम्पक, चिरौंजी, कटहल, आम, आँवला, सुपारी, नारियल, खजूर, महुआ, साल, ताड़, तमाल, रसनार्जुन, अरिष्ट, उदुम्बर, पीपल, बड़, ढाक, चन्दन, नीम, कचनार, सरल देवदारु के वृक्षों और अंगूर, ईख, केला, जामुन, बेर, अक्ष, हरड़, बेल, कैथ, नींबू, भिलावाँ आदि दिव्य पुष्प और फलों आदि से युक्त वृक्षों वाला देवांगनाओं का क्रीड़ास्थल महात्मा भगवान् वरुणें का ऋतुमत् नाम का उद्यान था।

(2)

तस्मिन् सुविपुलं लसत्काञ्चनपङ्कजं कुमुदोत्पलकल्हारशतपत्रश्रियोर्जितं मत्तषट्पदनिर्घष्टं हंसकारण्डवाकीर्ण सारसजलकुक्कुटादिकुलकूजितं कदम्बवेतसनलनीपवजुलकैः कुन्दैरशोकैः शिरीषैः कुटजेदैः कुब्जकैः नागपुन्नागजातिभिः स्वर्णयुथीभिः मल्लिकाशतपत्रैश्च माधवीजाल- कादिभिरन्यैः नित्यर्तुभिः तीरजैः द्रुमैः शोभितं कलस्वनैः शकुन्तैः परिवृतं मत्स्यकच्छपसञ्चार- चलत्पद्मपयः सरोऽभूत् ।।

शब्दार्थ

लसत्काञ्चनपङ्कजम् = सुवर्ण (सुनहरे) कमलों से सुशोभित । उत्पल = कमला कल्हार = लाल कुमुद । श्रियोजितम् (श्रिया + ऊर्जितम्) = शोभा से ऊर्जित । मत्त = मतवाले । षट्पदनिर्युष्टम् = मौरों से गुंजायमान । कारण्डवाकीर्णम् = जल के पक्षियों से व्याप्त। सारंसजलकुक्कुटादिकुलकूजितं = सारस, जलमुर्गा इत्यादि के समूह के द्वारा शब्दायमान वेतस = बेंता नीप = कदम्बा शिरीषैः = सिरस वृक्षों के द्वारा । कुटजेङगुदैः = कुटज और इंगुदी वृक्षों द्वारा स्वर्णयुथीभिः = सोनजुही लताओं के द्वारा । मल्लिका = चमेली । शतपत्र = कमल । तीरजैः = किनारों पर उगे हुए। कलस्वनैः = मधुर ध्वनि वाले । शकुन्तैः = पक्षियों के द्वारा । परिवृतम् = घिरा हुआ । मत्स्यकच्छपसञ्चारचलत्पद्मपयः = मछली, कछुआ के वेग के कारण हिलते हुए कमलों से युक्त जल वाला।

प्रसंग

प्रस्तुत गद्यांश में वरुण के उद्यान में स्थित सुन्दर सरोवर के सुरम्य वातावरण का मनोहारी वर्णन किया गया है।

अनुवाद

उस (उद्यान) में सुनहरे कमलों से सजा हुआ; कुमुद, नीलकमल, लाल कुमुद, कमल की सुंदरता से भरा; मतवाले भौरों की गूँज से गूँजता हुआ, हंस और जल-पक्षियों से भरा; सारस, जलमुर्गी आदि के समूह की आवाज़ों से भरा; कदम्ब, बेंत, कमलिनी, कुन्द, अशोक, शिरीष, कुटज, इङगुदी, कुब्जक, नागफनी, सोनजुही, मल्लिका, माधवी आदि बेलों के समूह से और दूसरी सभी ऋतुओं में उगने वाले, किनारे के वृक्षों से सजा हुआ; सुंदर आवाज़ करने वाले पक्षियों से घिरा हुआ; मछली, कछुओं के चलने से हिलते हुए कमलों वाला, स्वच्छ जल से भरा एक बहुत बड़ा तालाब था।

(3)

अथ तदिगरिकाननाश्रयो वारणयूथपः करेणुभिश्चरन् कीचकवेणुवेत्रवद्विशालगुल्मं प्ररुजन्नासीत् । तस्य गन्धमात्राद्धरयो व्याघ्रादयो व्यालमृगाः सखङ्गाः सगौरकृष्णाः शरभाश्चमर्यः वृकाः वराहाः गोपुच्छशालातृकाः भयाद् द्रवन्ति । तस्यानुग्रहेण क्षुद्राः हरिणशशकादयोऽभीताश्चरन्ति । स एकदा घर्मतप्तः करिभिः करेणुभिः वृतो मदच्युत्कलभैरनुदुतः मदाशनैरलिकुलैः निषेव्यमाणः स्वगरिम्णा गिरिं परितः प्रकम्पयन् मदविहृलेक्षणः पङ्कजरेणुरुषितं सरोऽनिलं विदूराजिघ्रन् तृषार्दितेन स्वयूथेन वृतः तत्सरोवराभ्याशं द्रुतमगमत्। तस्मिन् विगाह्य हेमारविन्दोत्पलरेणुवासितं निर्मलाम्बु निजपुष्करोदधृतं निकामं पपौ स्नपयन्तमात्मानमभिः गतक्लमो जातः।

शब्दार्थ

अथ = इसके बाद । तदिगरिकाननाश्रयो = उस पर्वतीय वन में रहे वाला। वारणयूथपः = हाथियों के समूह का स्वामी । करेणुभिश्चरन् = हथिनियों के साथ चलता हुआ । कीचकवेणुवेत्रविशालगुल्मम् = बाँस, वेणु और बेंत वाले विशाल झुरमुट को । प्ररुजन् = तोड़ता हुआ, रौंदता हुआ । हरयः = शेर! व्याघ्रादयः = बाघ आदि । व्यालमृगाः = साँप और हिरन| सखङ्गाः = गेंडों सहित सगौरकृष्णाः शरभाः = गोरे और काले शरभ (आख्यायिकाओं में वर्णित आठ पैरों का जन्तु, जो सिंह से बलवान् होता है)। चमर्यः = चमरी हिरनियाँ। वृकाः = भेड़िये । वराहाः = सूअर गोपुच्छशालावृकाः = बन्दर, गीदड़ आदि । द्रवन्ति = भागते हैं। अभीताः = निडर होकर घर्मतप्तः = गर्मी में तपा हुआ । वृतः = घिरा हुआ । मदच्युतकलभैः = मदे टपकाने वाले हस्ति-शावकों के द्वारा। अनुतः = पीछा किया गया । मदाशनैः = मद का भक्षण करने वाले । अलिकुलैः = भौरों के समूह के द्वारा । निषेव्यमाणः = सेवित, लगे हुए। गरिम्णा = भारीपन से । परितः = चारों ओर । मदविह्वलेक्षणः = मद के कारण व्याकुल नेत्रों वाला पङ्कजरेणुरुषितम् = कमल के पराग से सुगन्धित । विदूराज्जिघ्रन् = अधिक दूर से हूँघता हुआ । तृषादितेन = प्यास से व्याकुल अभ्याशम् = पास । विगाह्य = मथकर, नहाकर, डुबकी लगाकर । हेमारविन्दोत्पलरेणु = सुनहरे कमल के पराग। वासितम् = सुगन्धित निजपुष्करोधृतम् = अपनी सँड़ से उठाये गये। निकामं = पर्याप्त, अधिक गतक्लमः = थकानरहित।।

प्रसंग

प्रस्तुत गद्यांश में गजराज का वर्णन किया गया है।

अनुवाद

इसके बाद उस पहाड़ी वन में रहने वाला, हाथियों के समूह का स्वामी, हाथिनियों के साथ घूमता हुआ, कीचक, बाँस और बेंतों से भरे विशाल झुरमुट को तोड़ रहा था। उसकी गंध से ही शेर, बाघ आदि; साँप, हिरन, गेंडे, गोरे और काले शरभ, चमरी गाएँ, भेड़िये, सूअर, बन्दर, गीदड़ आदि डरकर भाग जाते हैं। उसकी कृपा से छोटे (पशु) हिरन, खरगोश आदि बिना डर के घूमते हैं। एक दिन गर्मी से परेशान, हाथियों और हथिनियों से घिरा हुआ, मदजल वाले हाथी के बच्चों के साथ, मद पीने वाले भ्रमरों के समूह से घिरा हुआ, अपने भारीपन से पर्वत को चारों ओर से हिलाता हुआ, मद से आधी खुली आँखों वाला, कमल के पराग से भरी तालाब की हवा को दूर से ही सूंघता हुआ, प्यास से परेशान अपने हाथी-झुंड से घिरा हुआ, उस सरोवर के पास तेज़ी से गया। उसमें डुबकी लगाकर, सुनहरे कमल और नीलकमल के पराग से खुशबूदार, अपनी सूंड से उठाए गए तालाब के साफ पानी को उसने खूब पिया। पानी से स्नान करके वह थकानरहित हो गया।

(4)

स्वपुष्करोद्धृतशीकराम्बुभिः करेणूः कलभांश्च निपाययन् संस्नपयन् जलक्रीडारतोऽसौ महागजः केनचिबलीयसा ग्राहेण रुषा गृहीतः । बलीयसा तेन तरसा विकृष्यमाणं यूथपतिमातुरमपरे गजास्तं : तारयितुं नाशकन् । इत्थमिभेन्द्रनक्रयोर्मिथः नियुध्यतोरन्तर्बहिर्विकर्षतोर्बहुवर्षाणि व्यगमन् । ततो गजेन्द्रस्य सुदीर्घण कालेन नियुध्यतः मनोबलौजसा महान् व्ययोऽभूत् । जलेऽवसीदतो जलौकसः नक्रस्य तद्विपर्ययो जातः । ग्राहस्य पाशादात्मविमोक्षणेऽक्षमः गजेन्द्रो यदा प्राणसङ्कटमाप तदा सः तमीशं शरण्यं स्तोतुमुपचक्रमे । स एवेशः प्रचण्डवेगादभिधावतो बलिनोऽन्तकात् भृशं प्रपन्नं परिपाति, तस्यैव भयाच्चमृत्युः दूरमपसरति । गजेन कृतम् आर्तस्तोत्रं जगन्निवासः निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः गरुडेन समुह्यमानः चक्रायुधो गजेन्द्रमाशु अभ्यगमत् । पीडितं च तं वीक्ष्य सहसावतीर्य सरसः सग्राहमुज्जहार । विपाटितमुखाद ग्राहात दिविजानां सम्पश्यतां हरिः गजेन्द्रममुमुचत् ।।

शब्दार्थ

शीकराम्बुभिः = पानी की बौछार से । करेणूः = हथिनियों को। कलभान् = हाथी के बच्चों को। निपाययन् = पिलाता हुआ| बलीयसा = शक्तिशाली । ग्राहेण = मगर के द्वारा रुषा = क्रोध से तरसा = वेग से । विकृष्यमाणं = खींचा जाता हुआ । यूथपतिमातुरम् = हाथियों के दुःखी स्वामी को। इत्थमिभेन्द्रनक्रयोः (इत्थम् + इभेन्द्र + नक्रयोः) = इस प्रकार हाथियों के सरदार और मगर के । मिथः = आपस में। नियुध्यतोः-अन्तः-बहिः-विकर्षतोः-बहुवर्षाणि = युद्ध करते हुए और भीतर-बाहर खींचते हुए बहुत वर्ष । व्यगमन् = बीत गये । नियुध्यतः = युद्ध करते हुए का । मनोबलौजसाम् = मनोबल और शक्ति का अवसीदतः = बैठे हुए । जलौकसः = जल में निवास करने वाले । आत्मविमोक्षणेऽक्षमः = अपने को छुड़ाने में असमर्थ। आप = प्राप्त किया। शरण्यम् = शरण देने वाले । स्तोतुम् उपचक्रमे = स्तुति करने वाला। अन्तकात् = यमराज से । भृशम् = अधिक प्रपन्नम् = शरण में आये हुए को। परिपाति = रक्षा करता है। दूरमपसरति = दूर भाग जाती है। जगन्निवासः = परमात्मा । निशम्य = सुनकर । दिविजैः सह = देवताओं के साथ । समुह्यमानः = ढोये जाते हुए । चक्रायुधः = भगवान् विष्णु। अभ्यगमत् = पास में पहुँचे । वीक्ष्य = देखकर । अवतीर्य = उतरकर । संग्राहमुज्जहार = मगर सहित उठा लिया। विपाटितमुखात् = फटे हुए मुख वाले । सम्पश्यतां = देखते-देखते । गजेन्द्रममूमुचत् = गजेन्द्र को छुड़ा लिया ।

प्रसंग

प्रस्तुत गद्यांश में मगरमच्छ द्वारा गजराज को पकड़ने, दोनों में युद्ध होने और गजराज द्वारा प्रार्थना किये जाने पर विष्णु भगवान् द्वारा उसे छुड़ाये जाने का वर्णन है।

अनुवाद

अपनी सूंड द्वारा उठाई गई जल की बूंदों से हाथिनियों और हाथी के बच्चों को पानी पिलाते और स्नान कराते हुए, जल-क्रीड़ा में लगे उस विशाल हाथी को किसी बलवान मगरमच्छ ने गुस्से में पकड़ लिया। उस बलवान मगरमच्छ द्वारा तेज़ी से खींचे गए, व्याकुल यूथपति उस गजराज को दूसरे हाथी बचा नहीं पाए। इस प्रकार गजराज और मगरमच्छ के आपस में युद्ध करते हुए, अंदर-बाहर खींचते हुए बहुत साल बीत गए। तब गजराज की इतने लंबे समय तक युद्ध करते हुए मनोबल और शक्ति की बहुत हानि हुई। पानी में बैठे मगरमच्छ का इससे उल्टा हुआ, यानी उसकी शक्ति बढ़ गई। मगरमच्छ के फंदे से खुद को छुड़ाने में असमर्थ गजराज जब जान के संकट में पड़ गया, तब उसने उस शरण देने वाले श्रेष्ठ ईश्वर की स्तुति करनी शुरू की। वही भगवान, जिनके डर से मृत्यु दूर भागती है, तेज़ गति से दौड़ते हुए, बलवान यमराज से डरे हुए शरण में आए लोगों की रक्षा करते हैं। हाथी द्वारा की गई दुखभरी स्तुति को लोकरक्षक (भगवान) ने सुनकर देवताओं द्वारा प्रार्थना किए जाने पर गरुड़ पर सवार होकर चक्रपाणि भगवान (विष्णु) तुरंत गजराज के पास आए। उसे दुखी देखकर शीघ्रता से तालाब में उतरकर मगरमच्छ सहित उसे (गजराज को) उठा लिया। फटे हुए मुँह वाले मगरमच्छ से देवताओं के देखते-देखते विष्णु ने गजराज को मुक्त करा दिया।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. गजेन्द्र मोक्ष कैसे हुआ?
Answer: सरोवर में नहाते हुए हाथी को मगरमच्छ ने पकड़ लिया था। कई सालों तक हाथी और मगरमच्छ में लड़ाई चली। जब हाथी मगरमच्छ की पकड़ से छूट नहीं पाया और उसकी जान खतरे में पड़ गई, तब उसने भगवान विष्णु को याद किया। हाथी की दुखभरी पुकार सुनकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर वहाँ आए। उन्होंने मगरमच्छ सहित हाथी को तालाब से बाहर निकाला और देखते ही देखते उसे मगरमच्छ के मुँह से बचा लिया। इससे हमें यह सीख मिलती है कि संकट में भगवान को याद करने से अवश्य मदद मिलती है।
In simple words: हाथी को मगरमच्छ ने पकड़ लिया था। जब वह संकट में फंसा, तो भगवान विष्णु ने आकर उसे मगरमच्छ से बचाया।

🎯 Exam Tip: इस प्रकार के प्रश्नों में कहानी के मुख्य बिंदुओं को क्रम से लिखना महत्वपूर्ण है, जिससे उत्तर स्पष्ट और सटीक लगे।

 

Question 2. वरुण के उद्यान का वर्णन 'गजेन्द्रमोक्षः' पाठ के आधार पर कीजिए।
Answer: वरुणदेव का उद्यान त्रिकूट पर्वत पर स्थित था और उसका नाम 'ऋतुमत्' था। यह उद्यान बहुत ही सुंदर था और देवताओं की अप्सराओं के खेलने की मशहूर जगह थी। इस उद्यान में कई तरह के सुंदर पेड़-पौधे थे, जैसे मन्दार, पारिजात, अशोक, आम, नीम, चंदन, केले, जामुन आदि। यहाँ पर दिव्य फूल और फल भी थे, जो इसकी सुंदरता को और बढ़ाते थे। यह उद्यान प्रकृति की अद्भुत सुंदरता का एक बेजोड़ उदाहरण था।
In simple words: वरुण का उद्यान त्रिकूट पर्वत पर बहुत सुंदर था और उसका नाम ऋतुमत् था। इसमें कई तरह के फूल और फल वाले पेड़ थे, और यह देवताओं के खेलने की जगह थी।

🎯 Exam Tip: जब किसी स्थान का वर्णन करना हो, तो उसके नाम, स्थान और मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए।

 

Question 3. 'गजेन्द्रमोक्षः' पाठ के आधार पर गजेन्द्र की जल-क्रीड़ा का वर्णन कीजिए।
Answer: एक गरम दिन गजराज अपने हाथी-झुंड के साथ एक तालाब पर आया। उसे बहुत प्यास लगी थी, इसलिए तालाब के पास जाकर उसने अपनी सूंड से खूब सारा साफ पानी पिया। नहाने के बाद उसकी सारी थकान दूर हो गई। फिर उसने पानी में खेलना शुरू किया। उसने अपनी सूंड से पानी उठाकर अपने साथी हाथियों और बच्चों पर डाला और उन्हें भी स्नान कराया। जल क्रीड़ा करके सभी हाथी बहुत खुश हुए और उनकी सारी थकावट दूर हो गई।
In simple words: एक गर्मी के दिन गजराज अपने झुंड के साथ तालाब पर आया। उसने पानी पीकर और स्नान करके थकान मिटाई, फिर अपनी सूंड से पानी उठाकर हाथिनियों और बच्चों को नहलाया।

🎯 Exam Tip: किसी घटना या गतिविधि का वर्णन करते समय, क्रमबद्धता और स्पष्टता बनाए रखें, ताकि कहानी आसानी से समझ में आए।

 

Question 4. वरुणदेव के उद्यान का नाम लिखिए।
Answer: वरुणदेव के उद्यान का नाम 'ऋतुमत्' था। यह उद्यान त्रिकूट पर्वत पर बना था। यह जगह स्वर्ग की अप्सराओं के खेलने की मशहूर जगह थी। इस उद्यान का नाम 'ऋतुमत्' होने से यह हर मौसम में सुंदर रहता था।
In simple words: वरुणदेव के बगीचे का नाम ऋतुमत् था। यह त्रिकूट पर्वत पर स्थित था, जहाँ अप्सराएँ खेलने आती थीं।

🎯 Exam Tip: नाम संबंधित प्रश्नों के उत्तर हमेशा सीधे और संक्षेप में दें, साथ ही यदि स्थान का भी उल्लेख हो, तो उसे भी शामिल करें।

 

Question 5. हरि गजेन्द्र के पास क्यों आये?
Answer: जब गजराज तालाब में खेल रहा था, तब एक मगरमच्छ ने उसे तेज़ी से पकड़ लिया। गजराज बहुत कोशिश करने पर भी मगरमच्छ की पकड़ से छूट नहीं पाया। उसने बहुत दुख भरी आवाज़ में भगवान हरि (विष्णु) को पुकारा। उसकी पुकार सुनकर भगवान हरि वहाँ आए। उन्होंने गजराज को मगरमच्छ से बचाकर आज़ाद किया। भगवान हमेशा अपने सच्चे भक्तों की पुकार सुनकर उनकी मदद करने आते हैं।
In simple words: गजराज को जब मगरमच्छ ने पकड़ लिया और वह छूट नहीं पाया, तब उसकी दुख भरी पुकार सुनकर भगवान हरि उसे बचाने आए और उसे मगरमच्छ से मुक्त कर दिया।

🎯 Exam Tip: किसी पात्र के कार्य के पीछे के कारण को बताते समय, उस कारण से जुड़ी मुख्य घटना को भी संक्षेप में स्पष्ट करें।

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