UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 13 GuruNanakDevh

NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit: Chapter 13 गुरु नानक देव

Access comprehensive textbook solutions for Chapter 13 गुरु नानक देव using the official curriculum guides for Class 10 Sanskrit. Designed to align with the 2026 27 UP Board standards, these detailed answers help students reinforce core academic concepts.

Practice Class 10 Sanskrit Solutions: Chapter 13 गुरु नानक देव

View or download the dedicated Chapter 13 गुरु नानक देव solution resource below. Engaging with these textbook answers under focused study conditions ensures continuous academic progress and mastery of the 2026 27 curriculum for Sanskrit.

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 13 हिंदी अनुवाद गुरुनानकदेवः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय

गुरु नानकदेव को सभी धर्मों के संस्थापकों में सबसे आधुनिक और व्यावहारिक माना जाता है। उन्होंने लोगों की सेवा, उद्धार और समानता के लिए सिख धर्म की स्थापना की। आज सिख धर्म के अनुयायी पूरी दुनिया में फैले हुए हैं और अपनी मेहनत, ईमानदारी, लगन और हिम्मत से सभी को प्रेरित कर रहे हैं। उन्होंने धर्म का पालन करने के लिए घर छोड़ने की बजाय घर में रहकर ही पूजा करने का उपदेश दिया। उनके समय में हिंदू धर्म में जाति-भेदभाव और छुआछूत बहुत ज़्यादा थी। नानकदेव को ये दोनों प्रथाएँ इंसानियत के खिलाफ लगती थीं, इसलिए उन्होंने इन्हें खत्म करने के लिए 'लंगर' नाम से सभी को एक साथ बैठाकर भोजन कराने की प्रथा शुरू की। यह प्रथा आज भी चल रही है और लोगों में एकता और समानता की भावना पैदा करती है।

इस पाठ में गुरु नानकदेव के जीवन और मानव सेवा के लिए उनके किए गए कामों के बारे में भी ज़िक्र किया गया है।

पाठ-सारांश

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक का जन्म पंजाब के तलवण्डी गाँव में वैशाख शुक्ल तृतीया, विक्रम संवत् 1526 में हुआ था। यह जगह अब पाकिस्तान में 'ननकाना साहेब' के नाम से जानी जाती है। उनकी माता का नाम तृप्तादेवी और पिता का नाम मेहता कल्याणदास (कालू मेहता) था।

गुरु नानक अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे। उनका पालन-पोषण बड़े प्यार से हुआ था। वे बचपन से ही अकेले बैठकर कुछ ध्यान करते थे। एक बार उन्होंने अपनी पढ़ाई की पट्टी पर पाठ की जगह भगवान की महिमा लिख दी थी, जिसे देखकर उनके शिक्षक बहुत हैरान हुए। उन्होंने जनेऊ को हमेशा न रहने वाला मानकर धारण नहीं किया था। पिता ने व्यापार के लिए बीस रुपये दिए थे, जो उन्होंने भूखे साधुओं को दान कर दिए और इसे ही अपनी सबसे बड़ी व्यापारिक सफलता माना। इस घटना से पिता बहुत चिंतित हुए। पिता के गुस्से के बाद उनके बहनोई उन्हें अपने साथ सुलतानपुर ले गए। वहाँ के नवाब दौलत खाँ ने उनके स्वभाव और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हें अनाज गोदाम का अधिकारी बना दिया। वे वहाँ बहुत ईमानदारी और लगन से अपना काम करते थे। कुछ राज-कर्मचारी उनके यश को सहन नहीं कर पाए और दौलत खाँ के कान भरते थे, लेकिन दौलत खाँ पर उनका कोई असर नहीं होता था।

शाम के समय नानक अपने साथी नौजवानों के साथ भगवान का ध्यान और कीर्तन करते थे। नानक को संसार से वैराग्य रोकने के लिए उनके बहनोई जयराम ने 19 साल की उम्र में सुलक्खिनी नाम की लड़की से उनकी शादी कर दी।

एक बार वे स्नान करने के लिए एक सेवक को अपने कपड़े देकर नदी में उतरे, लेकिन वापस नहीं आए। सेवक ने सोचा कि नानक को किसी जल-जंतु ने खा लिया है। उसने वापस आकर यह बात सभी को बताई और सभी ने उस पर विश्वास कर लिया। तीन दिन बाद जब नानक प्रकट हुए और अपने घर पहुँचे तो उनके मुख पर अद्भुत तेज देखकर सभी हैरान रह गए। नानकदेव ने गाँववालों को बताया कि भगवान के दूत परमात्मा के सामने ले गए थे। वहाँ परमात्मा ने उनसे कहा कि उन्हें दुखियों के दुखों को दूर करने और परमात्मा के सत्य का उपदेश देने के लिए संसार में भेजा गया है। इसके बाद उन्होंने अपने परिवार के लोगों से वैराग्यपूर्ण जीवन जीने की अनुमति ली और घर छोड़कर चले गए।

नानक ने गरीबों को ऊपर उठाने, इंसानों में फैले भेदभाव को दूर करने और तीनों तरह के दुखों से पीड़ित संसार को अपने उपदेशों से शांत करने के लिए बीस साल तक पूरे देश का भ्रमण किया। उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों और पाखंडों को गलत ठहराया और धर्म का सच्चा रूप बताया। उन्होंने दलितों, गरीबों और दुखियों के पास जाकर उन्हें उपदेश देकर शांति दी। वे केवल दीन-दुखियों का ही आतिथ्य स्वीकार करते थे। भारत में भ्रमण करते हुए उन्होंने देश की खराब हालत देखी और देश की तरक्की के लिए मेहनत को सम्मान देने, गरीबी छोड़ने, कम सामान रखने और सेवा भाव को फैलाया। उन्होंने देश को एकता के सूत्र में पिरोने की कोशिश की और 'भारत' को 'हिंदुस्तान' कहकर पुकारा।

अपने विचारों को व्यवहारिक रूप देने के लिए वे कर्तारपुर गाँव में रहने लगे। उन्होंने ज्ञानयोग और कर्मयोग का सही तालमेल बिठाया। उन्होंने बताया कि निष्काम कर्म (बिना फल की इच्छा के काम करना), सेवा भाव, दया और अच्छे आचरण जैसे गुण भगवान को पाने का कारण हैं। यहीं पर उन्होंने 'लंगर' नाम की सहभोज प्रथा का चलन शुरू किया, जिसमें जाति, धर्म और ऊँच-नीच का भाव भुलाकर सभी लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। यह प्रथा आज भी गुरुद्वारों में वैसे ही चल रही है।

गुरु नानक विक्रम संवत् 1596 में सत्तर वर्ष की आयु भोगकर परमात्मा में विलीन हो गए। वे लगातार सेवा भाव, प्रेम, राष्ट्रभक्ति, देश प्रेम, देश की एकता, परमात्मा और दया के गीत गाते रहे। उनका नाम भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा रहेगा।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)

सिक्खधर्मस्याद्यसंस्थापकः गुरुनानकः पञ्जाबप्रदेशे तलवण्डीनाम्नि स्थाने षड्विशत्युत्तरपञ्चादशशततमे वैक्रमे वर्षे वैशाखमासस्य शुक्ले पक्षे तृतीयायान्तिथौ (वै० शु०-३, वि० 1526) क्षत्रियवंशस्य वेदीकुले जन्म लेभे । तस्य जन्मस्थानं 'ननकानासाहेब' इति नाम्ना ख्यातमद्यत्वे पाकिस्तानदेशेऽस्ति । अस्य मातुर्नाम तृप्तादेवी, पितुश्च मेहता कल्याणदासः कालूमेहतेति नाम्ना ख्यातः ।

शब्दार्थ: आद्य = पहला । षड्विशत्युत्तरपञ्चदशशततमे = पन्द्रह सौ छब्बीस में । लेभे = पाया । अद्यत्वे = आजकल । ख्यातः = प्रसिद्ध ।

सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत' के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती' में संकलित 'गुरुनानक देवः' शीर्षक पाठ से उद्धृत है। [संकेत: इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा ।]

प्रसंग: इस गद्यांश में गुरु नानक के जन्म, जन्म-स्थान और माता-पिता के बारे में बताया गया है।

अनुवाद: सिक्ख धर्म के पहले संस्थापक गुरु नानक का जन्म पंजाब राज्य के 'तलवण्डी' नाम के स्थान पर विक्रम संवत् 1526 में वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को क्षत्रिय वंश के वेदी कुल में हुआ था। उनका जन्म-स्थान 'ननकाना साहेब' के नाम से प्रसिद्ध है, जो आजकल पाकिस्तान देश में है। इनकी माता का नाम तृप्तादेवी और पिता का नाम मेहता कल्याणदास था, जिन्हें कालू मेहता के नाम से भी जाना जाता था।

(2)

गुरुनानकः स्वपित्रोरेक एव पुत्र आसीत् । अतस्तस्य जन्मनाऽऽह्लादातिशयं तावनुभवन्तौ स्नेहाशियेन तस्य लालन पालनं च कृतवन्तौ । बाल्यकालादेव तस्मिन् बालके लोकोत्तराः गुणाः प्रकटिता अभवन् । रहसि एकाकी एवोपविश्य नेत्रे अर्थोन्मील्य किञ्चिद् ध्यातुमिव दृश्यते स्म।।

शब्दार्थ: आह्लादातिशयम् = बहुत खुशी । अनुभवन्तौ = अनुभव करते हुए । रहसि = अकेले में । उपविश्य = बैठकर । अर्थोन्मील्य = आधी आँखें खोलकर ।

प्रसंग: इस गद्यांश में गुरु नानकदेव के बचपन के बारे में बताया गया है।

अनुवाद: गुरु नानक अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे। इसलिए उनके जन्म से उन दोनों को बहुत खुशी हुई और उन्होंने बड़े प्यार से उनका पालन-पोषण किया। बचपन से ही उस बालक में असाधारण गुण दिखने लगे थे। वे अकेले बैठकर अपनी आँखों को आधा खोलकर कुछ ध्यान करते हुए दिखाई देते थे।

(3)

यथाकाले पित्रा विद्याध्ययनाय पाठशालायां स प्रेषितः । अन्यैः सहपाठिभिः सह विद्यालये पठन्नेकदा स्वलेखनपट्टिकायां किञ्चिदुल्लिख्य शिक्षकं प्रादर्शयत् । तल्लेखं दृष्ट्वा शिक्षको विस्मितो जातः । पट्टिकायां परमात्मनो माहात्म्यं तेन वर्णितमासीत्। तथैव यज्ञोपवीतसंस्कारावसरे आचार्येण प्रदत्तं कार्पासं यज्ञोपवीतमनित्यमिति प्रतिपादयन् न तज्जग्राह । तस्य पिता कालूमेहता जगत्प्रति तस्याप्रवृत्तिं दृष्ट्वा भूयसा चिन्तितोऽभवत् । वाणिज्यकर्मणि लिप्तस्तत्पिता कथमपि स जगत्कर्मणि प्रवृत्तो भवेदिति प्रायतत । किं च वहिं पत्रजालैर्पिधातुमाचकाङ्क्ष ।

शब्दार्थ: यथाकाले = सही समय पर । पठन्नेकदा = पढ़ते हुए एक बार । स्वलेखनपट्टिकायां = अपनी स्लेट पर । प्रादर्शयत् = दिखाया । यज्ञोपवीतसंस्कारावसरे = जनेऊ धारण करने के समय । कार्पासम् = कपास । तज्जग्राह = उसे लिया । अप्रवृत्तिम् = उदासीनता को । भूयसा = बहुत अधिक । प्रायतत = प्रयास किया । पिधातुम् = ढकने के लिए । आचकाङ्क्ष = इच्छा की ।

प्रसंग: इस गद्यांश में गुरु नानक की अलौकिक प्रतिभा के बारे में बताया गया है।

अनुवाद: सही समय पर पिता ने उन्हें पढ़ाई के लिए पाठशाला भेजा। दूसरे साथियों के साथ विद्यालय में पढ़ते हुए एक दिन उन्होंने अपनी स्लेट पर कुछ लिखकर शिक्षक को दिखाया। उस लेख को देखकर शिक्षक हैरान रह गए। उन्होंने स्लेट पर परमात्मा की महिमा का वर्णन किया था। उसी प्रकार जनेऊ संस्कार के समय आचार्य द्वारा दिए गए कपास के जनेऊ को उन्होंने यह कहकर नहीं लिया कि यह हमेशा नहीं रहने वाला है। उनके पिता कालू मेहता उनकी संसार के प्रति उदासीनता देखकर बहुत चिंतित हुए। व्यापार के काम में लगे उनके पिता ने हर संभव प्रयास किया कि वह (नानक) संसार के कामों में लग जाएँ, और आग को पत्तों के समूह से ढकने की इच्छा की।

(4)

एकदा तस्य जनकः विंशतिरूप्यकाणि तस्मैं दत्वा वाणिज्यार्थं तं प्रेषितवान् । पथि क्षुत्पिपासादिभिः क्लिश्यमानान् दुर्बलान् क्षीणकायान् साधून् सोऽपश्यत्। तेषां क्लेशातिशयतापसन्तप्तां दशामवलोक्य तस्य हृदयं नवनीतमिव द्रवीभूतं जातम्। ताभिः मुद्राभिरत्नं क्रीत्वा तेभ्यः समर्थ्य परां शान्तिमनुभूयमानः गृहं प्रत्याजगाम । पित्रा लाभाय रूप्यकाणि प्रदत्तानि । मया तु पूर्णलाभः लब्धः । तस्यादेशस्यानुपालनमेव मया कृतामिति सोऽचिन्तयत्।।

शब्दार्थ: क्षुत्पिपासादिभिः क्लिश्यमानान् = भूख-प्यास आदि से दुखी । क्षीणकायान् = कमजोर शरीर वालों को । क्लेशातिशयतापसन्तप्तां = कष्ट की अधिकता से पीड़ित । नवनीतमिव = मक्खन की तरह । अनुभूयमानः = अनुभव करते हुए । प्रत्याजगाम = वापस आ गए । लब्धः = प्राप्त किया ।

प्रसंग: इस गद्यांश में नानकदेव की परोपकारिता की प्रवृत्ति को दर्शाया गया है।

अनुवाद: एक दिन उनके पिता ने उन्हें बीस रुपये देकर व्यापार करने के लिए भेजा। रास्ते में उन्होंने भूख-प्यास से दुखी, कमजोर शरीर वाले साधुओं को देखा। उनके अत्यधिक कष्ट को देखकर उनका हृदय मक्खन की तरह पिघल गया। उन रुपयों से उन्होंने भोजन खरीदा और उन्हें देकर बहुत शांति का अनुभव करते हुए (वे) घर लौट आए। पिता ने उन्हें लाभ कमाने के लिए रुपये दिए थे, लेकिन उन्होंने सोचा, "मैंने तो पूरा लाभ प्राप्त कर लिया है। मैंने उनके आदेश का पालन ही किया है।"

(5)

पिता तस्य तद्वृत्तं संश्रुत्य खिद्यमानः भृशं चुकोप । तदानीमेव नानकस्य भगिनीपतिः जयराम आगतः। तदखिलमुदन्तं ज्ञात्वा तं स्वनगरं सुलतानपुरमनयत्। तत्रत्यः शासकः नवाबदौलतखाँ युवकनानकस्य व्यवहारकौशलेन शीलेन मधुरया वाचा सन्तुष्टः सन् तं स्वान्नभाण्डागारे नियुक्तवान्। स्वनिस्पृहवृत्या, श्रमेण, कर्मणा च नानकः स्वस्वामिनं दौलतखाँमहाशयं तुतोष ।

शब्दार्थ: तद्वृत्तं = वह बात । संश्रुत्य = सुनकर । खिद्यमानः = दुखी होते हुए । भृशम् = बहुत अधिक । चुकोप = गुस्सा किया । भगिनीपतिः = बहनोई । उदन्तम् = समाचार । तत्रत्यः = वहाँ का । स्वान्नभाण्डागारे = अपने अनाज के गोदाम में । निस्पृहवृत्या = बिना लालच के स्वभाव से । तुतोष = खुश किया ।

प्रसंग: इस गद्यांश में नानक को सुलतानपुर के नवाब द्वारा अपने अनाज गोदाम में नियुक्त किए जाने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद: उनके पिता ने वह समाचार सुनकर दुखी होकर बहुत गुस्सा किया। उसी समय नानक के बहनोई जयराम आ गए। उन्होंने सारी बात जानकर उन्हें (नानक को) अपने शहर सुलतानपुर ले गए। वहाँ के शासक नवाब दौलत खाँ ने युवा नानक के व्यवहार की कुशलता, अच्छे स्वभाव और मीठी वाणी से संतुष्ट होकर उन्हें अपने अनाज गोदाम का अधिकारी नियुक्त कर दिया। अपने निःस्वार्थ व्यवहार, परिश्रम और काम से नानक ने अपने मालिक दौलत खाँ को खुश कर दिया।

(6)

नानकः तेन समादृतो जातः । ताशोऽसहमानैः बहुभिः दोषादिक्षुभिः राजपुरुषैः कर्णेजपैः बोधितोऽपि दौलतखाँमहाशयः नानके दोषं नाऽपश्यत् । महत्सु दोषदर्शनं राजकुलस्य सहजा रीतिः । आदिवस स्वकार्य सम्पादयन्नसौ सन्ध्याकालेऽन्यैः युवकैः सह एकत्रोपविश्य परमात्मचिन्तनं तन्नामकीर्तनञ्च करोति स्म । दानादिकं च तस्य कर्म तत्रापि सातत्येन चलति स्म।

शब्दार्थ: तदाशोऽसहमानैः = उनका यश सहन न कर पाने वालों ने । दोषादिदृक्षुभिः = दोष देखने वालों की इच्छा रखने वालों ने । कर्णेजपैः = चुगलखोरों से, कान भरने वालों से । आदिवसैः = दिन भर । एकत्र उपविश्य = एक जगह बैठकर । सातत्येन = लगातार, नियमित रूप से ।

प्रसंग: इस गद्यांश में गुरु नानक के द्वारा दौलत खाँ के यहाँ सेवा करने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद: नानक को उनसे (उनके मालिक से) बहुत आदर मिला। उनके यश को सहन न कर पाने वाले, दोष देखने की इच्छा रखने वाले कई चुगलखोर राजकर्मचारियों ने दौलत खाँ को भड़काया, फिर भी दौलत खाँ ने नानक में कोई गलती नहीं देखी। बड़े लोगों में दोष ढूँढना राजकुल की स्वाभाविक आदत होती है। दिन भर अपना काम पूरा करते हुए वे शाम को दूसरे युवाओं के साथ एक जगह बैठकर परमात्मा का चिंतन और उसके नाम का कीर्तन करते थे। उनके दान आदि का काम भी वहाँ लगातार चलता रहता था।

(7)

युवकस्य नानकस्य तथाविधां प्रवृत्तिमवेक्ष्य तस्य भगिनीपतिः जयरामः चिन्तितः सन् विवाहबन्धनेन तस्य तां प्रवृत्तिं नियन्तुमियेष । ऊनविंशवर्षे वयसि गुरुदासपुरमण्डलान्तर्गतबहालाग्रामनिवासिनः बाबामूलामहोदयस्य सुलक्षणया 'सुलक्खिनी' नाम्न्या कन्यया सह तस्योद्धाहो जातः।।

शब्दार्थ: अवेक्ष्य = देखकर । नियन्तुमियेष = रोकने की इच्छा की । ऊनविंश = उन्नीस । तस्य = उनका । उद्वाहः = विवाह । जातः = हुआ ।

प्रसंग: इस गद्यांश में नानक के विवाहित होने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद: युवक नानक की उस प्रकार की प्रवृत्ति को देखकर उनके बहनोई जयराम चिंतित हुए और उन्होंने विवाह के बंधन से उनकी उस प्रवृत्ति को रोकने की इच्छा की। उन्नीस वर्ष की आयु में गुरुदासपुर जिले के "बहाला" गाँव में रहने वाले बाबामूला की गुणवान 'सुलक्खिनी' नाम की कन्या के साथ उनका विवाह हो गया।

(8)

एकदा सः स्नानाय नदीं प्रति सेवकेनैकेन सह प्रस्थितः । स्ववस्त्रादीनि सेवकाय समर्थ्य सः नद्यामवतीर्णः । बहुकाले व्यतीते स न निष्क्रान्तस्तदा तस्य सेवकः तं नद्यां निमग्नमित्यनुमाय गृहं प्रतिनिवृत्य वृत्तमिदं सर्वानश्रावयत् । सर्वे विस्मिताः तद्विरहतापसन्तप्ताः परं का गतिरिति चिन्तयन्तो सर्वथा स्तब्धाः जाताः। तस्य भगिनी ‘नानकी' तुन विश्वसिति स्म। संसारसागराज्जनानुद्धर्तुं जगति यस्य जनिः कथं वा नदीजले निमग्नो भवेदिति तस्याः दृढो विश्वासः आसीत्।।

शब्दार्थ: सेवकेनैकेन सह = एक सेवक के साथ । प्रस्थितः = गए । अवतीर्णः = उतर गए । निमग्नमित्यनुमाय = डूब गए, ऐसा अनुमान करके । प्रतिनिवृत्य = लौटकर । वृत्तमिदं = यह समाचार । सर्वानश्रावयत् = सभी को सुनाया । स्तब्धाः = हैरान । विश्वसिति स्म = विश्वास किया । उद्धर्तुं = उद्धार करने के लिए । जनिः = जन्म ।

प्रसंग: इस गद्यांश में गुरु नानक के जीवन से संबंधित उस घटना का वर्णन किया गया है, जिसमें वे नदी में विलुप्त हो गए थे।

अनुवाद: एक बार वे (नानक) स्नान करने के लिए एक सेवक के साथ नदी की ओर गए। अपने कपड़े आदि सेवक को देकर वे नदी में उतर पड़े। बहुत समय बीतने पर जब वे नहीं लौटे, तब उनके सेवक ने उन्हें 'नदी में डूब गए' ऐसा अनुमान करके, घर लौटकर, सबको यह समाचार सुनाया। सभी हैरान और उनके विरह के दुख से दुखी हुए, परन्तु क्या किया जाए, ऐसा सोचते हुए सभी अवाक् रह गए। उनकी बहन नानकी ने तो विश्वास नहीं किया। संसार-सागर से लोगों का उद्धार करने के लिए जिसका जन्म हुआ, वह कैसे नदी के जल में डूब जाएगा, ऐसा उनका दृढ़ विश्वास था।

(9)

दिनत्रयानन्तरं नानकः प्रकटितोऽभूत् । परमाह्लादिताः जनाः ज्योतिषा देदीप्यमानं तस्य मुखमण्डलं दर्श दर्श विस्मिता अभूवन् । मनसो बुद्धेरगोचरं किञ्चिद् दिव्यत्वं तस्मिन् प्रतिष्ठितमिति सर्वेऽन्वभवन् । तस्य मुखादेव दिनत्रयानुपस्थितिरहस्यं जना अशृण्वन् । नदीजले निमग्नं तं परमात्मनो दूताः परमात्मनः समीपमनयन्। जगतः विधाता तस्मैऽमृतोपदेशं प्रादात् । दुःखदैन्यतप्तानां क्लेशान् अपहर्तुं सदुपदेशेन परमात्मतत्त्वं सत्स्वरूपं च व्याख्यातुं जगति पुनः तस्यादेशात् आगतः इति तेनोक्तम् । भक्तः नानकः गुरुः जातः ।

शब्दार्थ: ज्योतिषा = प्रकाश से । देदीप्यमानं = चमकते हुए । दर्श-दर्शी = देख-देखकर । सर्वेऽन्वभवन् = सभी ने अनुभव किया । अशृण्वन् = सुना । अमृतोपदेशं = अमरता का उपदेश । अपहर्तुम् = दूर करने के लिए ।

प्रसंग: इस गद्यांश में नानक के नदी में विलुप्त होकर वापस लौट आने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद: तीन दिन के बाद नानक प्रकट हुए। बहुत प्रसन्न होकर लोग अत्यधिक तेज से चमकते उनके मुखमंडल को देख-देखकर आश्चर्यचकित हो गए। मन और बुद्धि से न समझी जा सकने वाली कुछ दिव्य शक्ति उनमें मौजूद है, ऐसा सभी ने अनुभव किया। उनके मुख से ही लोगों ने तीन दिन तक की अनुपस्थिति का रहस्य सुना। नदी के जल में डूबे हुए उन्हें परमात्मा के दूत परमात्मा के पास ले गए थे। संसार के रचयिता ने उन्हें अमरता का उपदेश दिया। दुख और गरीबी से पीड़ित लोगों के कष्टों को दूर करने के लिए, सुंदर उपदेश द्वारा परमात्मा के सत्य स्वरूप को समझाने के लिए संसार में फिर से उनके आदेश से आया हूँ, ऐसा उन्होंने कहा। भक्त नानक गुरु बन गए।

(10)

लोकरक्षायै दीनानामुद्धाराय मानवजातिषु जातान् वर्णजातिधर्मरूपान् भेदान् अपनेतुं सर्वेषु साम्यं प्रतिष्ठापयितुं त्रिविधतापसन्तप्तं लोकममृतोपदेशेन शीतलयितुं गुरुर्नानकः भारतभ्रमणाय मतिं चकार । स्वमातापितरौ स्वपत्नीं स्वसुतौ स्वभगिनीं नानकीं स्वमित्राणि चे साधु समाश्वास्य स सुलतानपुरनगरान्निर्जगाम । नगरान्नगरं ग्रामोद् ग्राममटन धर्मस्य बाह्याचारानाडम्बरभूतान् व्यापारान् विखण्डयन् धर्मस्य सत्स्वरूपं स्थापयन् सर्वस्मिन् तदेकमिति प्रतिपादितवान्।

शब्दार्थ: अपनेतुम् = दूर करने के लिए, मिटाने के लिए । प्रतिष्ठापयितुं = स्थापित करने के लिए । सन्तप्तं = पीड़ित । अमृतोपदेशेन = अमृत के समान उपदेश से । शीतलयितुं = शीतल करने के लिए । मतिं चकार = विचार किया । समाश्वास्य = आश्वासन देकर । निर्जगाम = निकल पड़े । अटन् = घूमते हुए । व्यापारान् = गतिविधियों को । विखण्डयन् = खंडित करते हुए ।

प्रसंग: इस गद्यांश में गुरु नानक द्वारा देश का भ्रमण करने और पाखंड के उन्मूलन के लिए किए गए अथक प्रयासों का वर्णन है।

अनुवाद: लोगों की रक्षा के लिए, गरीबों का उद्धार करने के लिए, मानव-जातियों में उत्पन्न वर्ण, जाति, धर्म के भेदों को दूर करने के लिए, सभी में समानता स्थापित करने के लिए, तीन प्रकार के (दैहिक, दैविक, भौतिक) तापों से पीड़ित संसार को अमृत के समान उपदेश से शीतल करने के लिए गुरु नानक ने भारत में घूमने का विचार किया। अपने माता-पिता, अपनी पत्नी, अपने दोनों बेटों, अपनी बहन नानकी और अपने मित्रों को अच्छी तरह दिलासा देकर वे सुलतानपुर शहर से निकल पड़े। नगर-नगर, गाँव-गाँव घूमते हुए उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों और दिखावों को खंडित किया और धर्म का सच्चा स्वरूप स्थापित करते हुए 'सबमें वह एक (ईश्वर) है' ऐसा बताया।

(11)

“नेह नानास्ति किञ्चन्” इति जनान् सम्यक् बोधयन् जातिवर्णधर्मजनितोच्चावचभेदानपनयन् देशस्योत्तरदक्षिण-पूर्व-पश्चिमभागानां भ्रमणमसौ कृतवान् । सर्वत्र दलितानां पतितानां अपहृताधिकाराणां दैन्यग्रस्तानां दुःखतप्तहृदयानां जनानामन्तिकं गत्वा स्वप्रेम्णा मधुरया वाचा अमृतोपदेशेन च तान् सान्त्वयामास । भ्रमणकाले दुःखदैन्यग्रस्तानामुपेक्षितानामेवातिथ्यं तेनाङ्गीकृतम्। परपरिश्रमेणार्जितधनेन जनाः धनिनो जायन्ते; अतः ऐश्वर्यवतो निमन्त्रणमपि तस्मै न रोचते स्म। स्वश्रमेणोपार्जिते वित्ते विद्यमाना पवित्रता परपरिश्रमार्जितवित्ते कुत्र इति श्रमं प्रति प्रशस्यभावः तेनोदाहृतः ।

शब्दार्थ: नेह नानास्ति किञ्चन = यहाँ कुछ भी अनेक नहीं है । सम्यक् = अच्छी तरह । बोधयन् = समझाते हुए । उच्चावचभेदान् = ऊँचे-नीचे भेदों को । अपनयन् = दूर करते हुए । अपहृताधिकाराणां = अधिकार छीने हुए लोगों का । अन्तिकम् = पास । सान्त्वयामास = धीरज बँधाया । आतिथ्यम् = अतिथि-सत्कार । अङ्गीकृतम् = स्वीकार किया । उपार्जिते वित्ते = कमाए हुए धन में । कुत्र = कहाँ । इति = इस प्रकार । प्रशस्यभावः = प्रशंसनीय भाव । उदाहृतः = प्रकट किया ।

प्रसंग: इस गद्यांश में गुरु नानक के उच्च विचारों तथा उनके द्वारा किए गए धर्म-प्रचार का वर्णन किया गया है।

अनुवाद: "इस संसार में उसके (ईश्वर) के बिना कुछ नहीं है," ऐसा लोगों को अच्छी तरह समझाते हुए, उन्होंने जाति-धर्म-वर्ण से उत्पन्न ऊँच-नीच के भेदों को दूर करते हुए देश के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भागों का भ्रमण किया। सब जगह दलितों, पतितों, अधिकार छीने हुए, दीन-दुखियों और पीड़ा से ग्रस्त हृदय वाले लोगों के पास जाकर, अपने प्रेम से, मधुर वाणी से और अमृत के समान मीठे उपदेशों से उन्हें सांत्वना दी। भ्रमण के समय उन्होंने दुखियों, दीनों और उपेक्षितों का ही आतिथ्य स्वीकार किया। दूसरों के परिश्रम से कमाए गए धन से लोग धनवान हो जाते हैं; अतः वैभवशाली लोगों का निमंत्रण भी उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने श्रम के प्रति प्रशंसा भाव प्रकट करते हुए कहा कि "अपने श्रम से कमाए गए धन में जो पवित्रता है, वह दूसरों के श्रम से कमाए गए धन में कहाँ है।"

(12)

विंशतिवर्ष यावद् तेन समग्रदेशस्य भ्रमणं कृतम् । भ्रमता तेन देशस्य चिन्तनीया दशा दृष्टा । देशचिन्ताचिन्तितः स देशस्योन्नत्यै श्रमस्य प्रतिष्ठां, दैन्यपरित्यागमपरिग्रहं, सेवाभावादि भावान् प्रसारयामास । समग्रदेशमेकसूत्रे आबद्धं प्रयतमानः स प्रथम भारतीयो महापुरुषः आसीत् । यवनशासकैः कृतानत्याचारान् वीक्ष्य भृशं खिद्यमानः परमात्मानमुपालम्भितवान् । तेनैव महात्मना भारतं 'हिन्दुस्तान इति नाम्ना सम्बोधितवान् ।

शब्दार्थ: समग्रदेशस्य = पूरे देश का । चिन्तनीया = सोचने लायक । दृष्टा = देखी । प्रसारयामास = फैलाया । आबद्धम् = बाँधने के लिए । प्रयतमानः = प्रयास करता हुआ । कृतानत्याचारान् = किए गए अत्याचारों को । वीक्ष्य = देखकर । खिद्यमानः = दुखी होते हुए । उपालम्भितवान् = उलाहना दिया ।

प्रसंग: इस गद्यांश में गुरु नानक के देश-प्रेम संबंधी विचारों तथा कार्यों का उल्लेख किया गया है।

अनुवाद: बीस साल तक उन्होंने पूरे देश का भ्रमण किया। घूमते हुए उन्होंने देश की सोचने लायक हालत देखी। देश की चिंता से चिंतित उन्होंने देश की उन्नति के लिए श्रम की प्रतिष्ठा, गरीबी त्यागने, कम सामान रखने और सेवा भाव आदि विचारों को फैलाया। पूरे देश को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास करने वाले वे पहले भारतीय महापुरुष थे। यवन शासकों द्वारा किए गए अत्याचारों को देखकर बहुत दुखी होते हुए उन्होंने ईश्वर को उलाहना दिया। उसी महात्मा ने भारत को 'हिंदुस्तान' नाम से संबोधित किया।

(13)

अथ स स्वविचारान् यथातथ्ये परिणेतुं पजाबप्रदेशे कर्तारपुरे स्ववसतिं चकार । स्वानुयायिभिः सह कृषिक्षेत्रे कृषिकर्म कुर्वन् वृद्धपितेव तेषु स्थितः परमात्मतत्त्वं चिन्तयन् विदेह इव सुस्थिरं स्थितः। गुरुणा नानकेन ज्ञानयोगस्य कर्मयोगस्य चादभूतं सामञ्जस्यं स्थापितम् । निष्काम-कर्मणा सेवावृत्या करुणया सच्छीलेन च गुणैः सच्चारित्र्यस्य सृष्टिर्जायते । सच्चारित्र्यमेव परमात्मनो प्राप्तिहेतुरिति तेन प्रतिपादितम् । तत्रैवासौ लंगर' इति नाम्नीं सहभोजप्रथां प्रारब्धवान् । तत्र स्वेन निर्मितं भोजनमाबालवृद्धं नराः नार्यः जातिधर्मवर्णनिर्विशेषाः सर्वेषु सहैवोपविश्य भुञ्जते स्म । एषा प्रथाऽधुनापि गुरुद्वारेषु प्रचलिता दृश्यते ।

शब्दार्थ: यथातथ्ये परिणेतुम् = वास्तविक रूप में बदलने के लिए । स्ववसतिम् = अपना निवास । कृषिक्षेत्रे = खेत में । वृद्धपितेव = बूढ़े पिता की तरह । विदेह इव = राजा जनक की तरह । सामञ्जस्यम् = तालमेल, समन्वय । सेवावृत्या = सेवा-कार्य से । सच्छीलेन = अच्छे स्वभाव से । सृष्टिर्जायते = निर्माण होता है । तत्रैवासौ = वहीं पर इन्होंने । सहभोजप्रथाम् = एक साथ भोजन करने की प्रथा को । जातिधर्मवर्णनिर्विशेषाः = जाति, धर्म और वर्ण की विशेषता से रहित । सह एव उपविश्य = साथ ही बैठकर ।

प्रसंग: इस गद्यांश में गुरु नानकदेव द्वारा किए गए व्यावहारिक कार्यों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद: इसके बाद उन्होंने अपने विचारों को सही रूप देने के लिए पंजाब प्रदेश के कर्तारपुर में अपना निवास बनाया। अपने अनुयायियों के साथ खेत में खेती करते हुए वे बूढ़े पिता की तरह उनके बीच रहते हुए परमात्मा का चिंतन करते थे और विदेह (राजा जनक) की तरह स्थिर रहते थे। गुरु नानक ने ज्ञानयोग और कर्मयोग का अद्भुत तालमेल स्थापित किया। उन्होंने बताया कि निष्काम कर्म, सेवा भाव, दया और अच्छे आचरण जैसे गुणों से अच्छे चरित्र का निर्माण होता है। उन्होंने यह भी बताया कि अच्छा चरित्र ही परमात्मा को पाने का साधन है। वहीं पर उन्होंने 'लंगर' नाम की सहभोज प्रथा शुरू की। वहाँ उनके द्वारा बनाया गया भोजन बच्चे से लेकर बूढ़े तक, स्त्री-पुरुष, जाति-धर्म-वर्ण के भेदभाव के बिना सभी एक साथ बैठकर खाते थे। यह प्रथा आज भी गुरुद्वारों में प्रचलित है।

(14)

षण्णवत्युत्तरपञ्चदशशततमे वैक्रमे वर्षे आश्विनमासस्य कृष्णपक्षे दशम्यान्तिौ (आO कृ० 10, वि० 1516) गुरोरात्मतत्त्वं परमात्मतत्त्वे विलीनम् । गुरुः सप्ततिवर्ष यावद् धरामलङ्कुर्वाणः सेवाभावस्य, परस्परं प्रेम्णः, राष्ट्रभक्तेः, देशानुरागस्य, देशस्याखण्डतायाः परमात्मनः करुणायाश्च गीतं जिगाय । गुरुनानकोऽस्माकमितिहासपृष्ठेषु स्वर्णाक्षरैरङ्कितः सदा स्थास्यति ।।

शब्दार्थ: षण्णवति = छियानबे । गुरोरात्मतत्त्वम् = गुरु का आत्मतत्त्व । सप्ततिवर्ष = सत्तर वर्ष तक । जिगाय = गाया । स्थास्यति = स्थायी रहेंगे ।

प्रसंग: इस गद्यांश में गुरु नानक के परलोकवास एवं उनकी अमरता का वर्णन किया गया है।

अनुवाद: विक्रम संवत् 1596 में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को गुरु का आत्मतत्त्व परमात्मा के तत्व में विलीन हो गया। गुरु ने सत्तर वर्ष तक पृथ्वी को सुशोभित करते हुए, सेवा भाव, आपसी प्रेम, राष्ट्रभक्ति, देश प्रेम, देश की अखंडता और परमात्मा की करुणा के गीत गाए। गुरु नानक हमारे इतिहास के पृष्ठों में सदा सुनहरे अक्षरों में अंकित रहेंगे।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. गुरु नानक देव का परिचय दीजिए। [2007]
या
गुरु नानक का जन्म कहाँ हुआ था और उनके माता-पिता का क्या नाम था? [2006,11,15]
या
सिक्ख धर्म के आदि संस्थापक का नाम लिखिए। [2013]

Answer: गुरु नानकदेव सिख धर्म के पहले संस्थापक थे। उनका जन्म पंजाब के तलवण्डी गाँव (जो अब पाकिस्तान में ननकाना साहिब कहलाता है) में विक्रम संवत् 1526 में हुआ था। उनकी माता का नाम तृप्ता देवी और पिता का नाम मेहता कल्याणदास था। उन्होंने मानवों के बीच भेदभाव को खत्म करने और तीनों तरह के दुखों से पीड़ित संसार को अपने अमृत जैसे उपदेशों से शांत करने के लिए माता-पिता, पत्नी, बच्चों और मित्रों को छोड़कर यात्रा शुरू की। उनका जीवन हमें सिखाता है कि निस्वार्थ सेवा और प्रेम से ही समाज में बदलाव लाया जा सकता है। उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों और पाखंडों को गलत बताया और धर्म का सच्चा स्वरूप समझाया। उन्होंने गरीब, पीड़ित और अधिकारहीन लोगों को उपदेश देकर शांति दी। उन्होंने ही भारत को 'हिंदुस्तान' कहकर पुकारा और पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने का प्रयास किया।
In simple words: गुरु नानकदेव सिख धर्म के संस्थापक थे। उनका जन्म तलवण्डी में हुआ था, और उनके माता-पिता तृप्ता देवी तथा मेहता कल्याणदास थे। उन्होंने समाज से भेदभाव खत्म करने और धर्म का सही रास्ता दिखाने के लिए काम किया।

🎯 Exam Tip: परिचय देते समय जन्म स्थान, माता-पिता का नाम और मुख्य शिक्षाएँ ज़रूर शामिल करें ताकि पूरा विवरण मिले।

 

Question 2. लंगर-प्रणाली क्या है? इसका प्रारम्भ किसने किया?
Answer: लंगर एक ऐसी प्रथा है जहाँ सभी लोग, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म या वर्ण के हों, बिना किसी भेदभाव के एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। गुरु नानक ने बीस वर्षों तक भ्रमण करने के बाद पंजाब के कर्तारपुर नामक स्थान पर स्थायी रूप से रहते हुए इस प्रथा को शुरू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य सभी को एक समान मानना और एकता को बढ़ावा देना है। इस प्रथा में स्वयं उनके द्वारा तैयार किया गया भोजन बच्चों से लेकर वृद्धों तक सभी स्त्री-पुरुष बिना किसी भेदभाव के साथ बैठकर खाते थे। यह प्रथा आज भी गुरुद्वारों में चल रही है।
In simple words: लंगर एक ऐसी खाने की व्यवस्था है जहाँ हर कोई, बिना किसी भेदभाव के, एक साथ बैठकर भोजन करता है। गुरु नानकदेव ने इस प्रथा को समाज में समानता लाने के लिए शुरू किया था।

🎯 Exam Tip: लंगर प्रथा के बारे में बताते समय उसके उद्देश्य (समानता) और वर्तमान स्थिति (गुरुद्वारों में प्रचलित) का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. गुरु नानकदेव का ईश्वर से साक्षात्कार किस प्रकार हुआ? विस्तार सहित लिखिए ।
या
नानकदेव के नदी में डूबने और वापस आकर परमात्म-तत्त्व-प्राप्ति तक की घटना का वर्णन कीजिए ।

Answer: एक बार गुरु नानकदेव एक सेवक के साथ नदी में स्नान करने गए। उन्होंने अपने कपड़े सेवक को दिए और नदी में उतर गए। जब वे बहुत देर तक बाहर नहीं आए, तो सेवक ने उन्हें नदी में डूबा हुआ मान लिया और यह खबर सबको बताई। तीन दिन बाद गुरु नानकदेव अचानक प्रकट हुए। उनके चेहरे पर अद्भुत और दिव्य प्रकाश देखकर सभी लोग हैरान रह गए, क्योंकि वह प्रकाश मन और बुद्धि से परे था। यह घटना उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ थी, जिसने उन्हें अपनी दिव्य यात्रा के लिए प्रेरित किया। नानक ने बताया कि इन तीन दिनों के दौरान, परमात्मा के दूत उन्हें भगवान के पास ले गए थे। वहाँ भगवान ने उन्हें अमरता का उपदेश दिया और दुखियों के कष्टों को दूर करने तथा परमात्मा के सच्चे स्वरूप को समझाने के लिए उन्हें वापस संसार में भेजा।
In simple words: गुरु नानक नदी में स्नान करते समय तीन दिन के लिए अदृश्य हो गए थे। जब वे लौटे, तो उन्होंने बताया कि परमात्मा के दूत उन्हें भगवान के पास ले गए थे, जहाँ उन्हें दुखियों की मदद करने और भगवान का ज्ञान फैलाने का आदेश मिला था।

🎯 Exam Tip: इस घटना का वर्णन करते समय 'तीन दिन की अनुपस्थिति', 'परमात्मा के दूत' और 'संसार में पुनरागमन का उद्देश्य' जैसे मुख्य बिंदुओं पर ध्यान दें।

 

Question 4. गुरु नानकदेव के मुख्य उपदेश बताइए । [2011]
या
गुरु नानक ने किन बातों में समन्वय स्थापित किया? [2009]

Answer: गुरु नानकदेव के मुख्य उपदेश निम्नलिखित हैं:

  • जाति, धर्म और वर्ण के आधार पर होने वाले ऊँच-नीच के भेदभाव को खत्म करना चाहिए।
  • भारत के सभी दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण) के लोग एक हैं; उनके निवासियों में कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए।
  • गरीब, पीड़ित, अधिकार छिने हुए लोगों, दीन-दुखियों और उपेक्षित लोगों को दिलासा देना चाहिए, उनका सम्मान करना चाहिए और उनका आतिथ्य स्वीकार करना चाहिए।
  • 'श्रम से कमाया गया धन पवित्र और श्रेष्ठ है', इस भावना को महत्व देना चाहिए। उन्होंने एकता, समानता और निस्वार्थ सेवा के सिद्धांतों पर ज़ोर दिया, जो आज भी प्रासंगिक हैं।

In simple words: गुरु नानकदेव ने सिखाया कि सभी लोग बराबर हैं, हमें भेदभाव नहीं करना चाहिए, पूरे देश को एक समझना चाहिए, गरीब और दुखियों की मदद करनी चाहिए और ईमानदारी से की गई मेहनत को सम्मान देना चाहिए।

🎯 Exam Tip: उपदेशों को बताते समय, मुख्य संदेश जैसे 'समानता', 'एकता', 'सेवा' और 'श्रम का महत्व' स्पष्ट रूप से उजागर करें।

 

Question 5. गुरु नानक का विवाह किसके साथ हुआ था? [2006,08,09]
Answer: गुरु नानक का विवाह सुलक्खिनी नाम की कन्या के साथ हुआ था। उनके बहनोई जयराम ने उनकी शादी कराई थी ताकि वे संसारिक जीवन में भी संतुलन बना सकें।
In simple words: गुरु नानक की शादी सुलक्खिनी नाम की लड़की से हुई थी।

🎯 Exam Tip: सीधे उत्तर वाले प्रश्नों में, केवल सटीक जानकारी दें और नाम का सही उल्लेख करें।

 

Question 6. नानक ने बाल्यकाल में कौन-सा सौदा किया?
Answer: बाल्यकाल में एक बार गुरु नानक के पिता ने उन्हें बीस रुपये व्यापार करने के लिए दिए थे। नानक ने उन रुपयों से भोजन खरीदा और रास्ते में मिले गरीब और भूखे साधुओं को खिला दिया। इस दान से उन्हें जो खुशी और संतुष्टि मिली, उसे ही उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा और सच्चा व्यापार माना। यह घटना उनके परोपकारी स्वभाव और निस्वार्थ सेवा भाव को दर्शाती है।
In simple words: गुरु नानक को उनके पिता ने व्यापार के लिए बीस रुपये दिए थे, पर उन्होंने उन पैसों से भूखे साधुओं को खाना खिला दिया। इस दान को ही उन्होंने अपने बचपन का सबसे अच्छा 'सौदा' माना।

🎯 Exam Tip: 'सच्चा सौदा' घटना को स्पष्ट रूप से समझाएँ, जिसमें दान का महत्व और उससे मिली संतुष्टि शामिल हो।

 

Question 7. नानक देव की बहन का क्या नाम था? [2007, 14]
Answer: गुरु नानकदेव की बहन का नाम 'नानकी' था। वे अपने भाई पर गहरा विश्वास रखती थीं और उनकी आध्यात्मिक यात्रा में सहायक थीं।
In simple words: गुरु नानक देव की बहन का नाम नानकी था।

🎯 Exam Tip: ऐसे सीधे प्रश्नों में केवल सटीक जानकारी दें।

 

Question 8. “दोषदर्शनं राजकुलस्य सहजा रीतिः” का भाव स्पष्ट कीजिए ।
Answer: "दोषदर्शनं राजकुलस्य सहजा रीतिः" का अर्थ है कि राजघरानों या बड़े लोगों में दूसरों में कमी निकालना एक आम बात है, भले ही उनमें कोई गलती न हो। इस पाठ में बताया गया है कि नवाब दौलत खाँ के दरबार के बाकी लोग गुरु नानक में कमियाँ निकालने की कोशिश करते थे, लेकिन नवाब को उनमें कोई दोष नहीं मिला। यह वाक्य दर्शाता है कि सच्चे गुणों वाले व्यक्ति पर गलत आरोप बेअसर होते हैं। इससे यह साफ पता चलता है कि गुरु नानक का स्वभाव बहुत शुद्ध और पवित्र था।
In simple words: इस कहावत का मतलब है कि राजघराने के लोग अक्सर दूसरों में गलतियाँ निकालते हैं। पर गुरु नानक में कोई गलती नहीं मिली, जिससे उनकी पवित्रता साबित होती है।

🎯 Exam Tip: इस तरह के भावार्थ वाले प्रश्नों में, पहले कहावत का अर्थ बताएँ और फिर उसे पाठ के संदर्भ में स्पष्ट करें।

UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 13 गुरु नानक देव

Chapter Exercise Answers for Class 10 Sanskrit

Review comprehensive exercise answers for Class 10 Sanskrit Chapter 13 गुरु नानक देव. Fully updated to match current UP Board syllabus guidelines, these textbook solutions help students verify their work and maintain accurate study notes.

Detailed Answer Guides for Chapter 13 गुरु नानक देव

Clear, methodical explanations accompany every challenging problem within the Class 10 Sanskrit text. Engaging with these detailed answers lays a solid foundation for advanced learning and improves foundational clarity for upcoming assessments.

Complete Preparation Kit for Class 10 Exams

These resources act as an effective roadmap for daily homework tasks and independent study. Supplement your review of Chapter 13 गुरु नानक देव with official sample papers and interactive practice tests available on our platform free of charge.

FAQs

Where can I find the latest UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 13 गुरु नानक देव for the 2026 27 session?

The complete and updated UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 13 गुरु नानक देव is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 10 Sanskrit are as per latest UP Board curriculum.

Are the Sanskrit UP Board solutions for Class 10 updated for the new 50% competency-based exam pattern?

Yes, our experts have revised the UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 13 गुरु नानक देव as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Sanskrit concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.

How do these Class 10 UP Board solutions help in scoring 90% plus marks?

Toppers recommend using UP Board language because UP Board marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 13 गुरु नानक देव will help students to get full marks in the theory paper.

Do you offer UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 13 गुरु नानक देव in multiple languages like Hindi and English?

Yes, we provide bilingual support for Class 10 Sanskrit. You can access UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 13 गुरु नानक देव in both English and Hindi medium.

Is it possible to download the Sanskrit UP Board solutions for Class 10 as a PDF?

Yes, you can download the entire UP Board Solutions Class 10 Sanskrit Chapter 13 गुरु नानक देव in printable PDF format for offline study on any device.