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Step-by-Step Textbook Solutions for Class 10 Home Science Chapter 06 घरेलू गणित

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. जल के कार्य लिखिए। मानव-शरीर के लिए जल क्यों उपयोगी है?
या
जल के कार्यों एवं उपयोगिता का वर्णन कीजिए।
या
जल मनुष्य के लिए क्यों उपयोगी है?
या
मानव शरीर के लिए जल क्यों आवश्यक है?
या
शरीर के लिए जल क्यों उपयोगी है?
या
जल ही जीवन है, इसका मूल्य पहचानें, इसे बरबाद न करें।” संक्षेप में लिखिए।
या
मानव जीवन में जल का क्या महत्त्व है?

Answer: जल की उपयोगिता एवं महत्त्व जल अथवा पानी का जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राणी-जगत तथा वनस्पति-जगत के अस्तित्व का एक आधार जल ही है। जल के अभाव में व्यक्ति केवल कुछ दिन तक ही कठिनता से जीवित रह सकता है। वास्तव में व्यक्ति के स्वस्थ एवं चुस्त रहने के लिए जल अति आवश्यक है। जल जीवन की। एक मूल आवश्यकता है जो कि प्यास के रूप में अनुभव की जाती है। शारीरिक आवश्यकता के अतिरिक्त मानव जीवन के सभी कार्य-कलापों में जल की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे भोजन पकाने, नहाने-धोने, सफाई करने तथा फसलों को उँगाने के लिए एवं अन्य प्रकार के उत्पादनों के लिए जल की अत्यधिक आवश्यकता एवं उपयोगिता होती है। सभ्य जीवन के लिए वरदान स्वरूप विद्युत ऊर्जा का निर्माण भी प्रायः जल से ही होता है। जल की उपयोगिता एवं महत्त्व को बहुपक्षीय विवरण निम्नवर्णित है

(क) मानव-शरीर सम्बन्धी उपयोग

(1) पीने के लिए:
हमारे शरीर का 70-75% भाग जल से बना है; अतः जल का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपयोग पीने के लिए ही है। अत्यधिक गर्मी या अन्य किसी कारण से शरीर में होने वाली जल की कमी की पूर्ति हमें तुरन्त जल पीकर कर लेनी चाहिए अन्यथा जल की कमी अथवा ही-हाइड्रेशन के भयानक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। जल की शारीरिक आवश्यकता प्यास के रूप में महसूस होती है। प्यास एक अनिवार्य आवश्यकता है तथा इसकी पूर्ति तुरन्त होनी आवश्यक होती है।
(2) आन्तरिक शारीरिक प्रक्रियाएँ: मानव शरीर की लगभग सभी जैविक एवं जैव-रासायनिक क्रियाओं के संचालन के लिए सर्वाधिक आवश्यक तत्त्व जल ही है। उदाहरण के लिए-पाचन क्रिया का मूल आधार भी जल है। इसी प्रकार उत्सर्जन की क्रिया भी (जैसे-स्वेद एवं मूत्र निष्कासन) जल पर ही आधारित रहती है। इसके अतिरिक्त जितने भी पेय पदार्थ; जैसे कि दूध, फलों का रस आदि; हम लेते हैं उनका अधिकांश भाग जल होता है।
(3) शारीरिक तापमान का नियमन: हमारे शरीर में उपस्थित जल हमारे शरीर के तापमान को सामान्य रखता है। बाह्य रूप में भी हम ग्रीष्म ऋतु में शीतल तथा शीत ऋतु में गर्म जल से स्नान कर शारीरिक तापमान को सामान्य रखने का प्रयत्न करते हैं।
(4) रक्त संचार व्यवस्था: हमारे रक्त का अधिकांश भाग (लगभग 80%) जल होता है जो कि रक्त की तरलता का मूल आधार है। तरल अवस्था में ही रक्त शरीर की धमनियों एवं शिराओं में संचार करता है। जल ही रक्त को तरलता प्रदान करता है। रक्त में जल की कमी हो जाने पर रक्त गाढ़ा हो जाता है तथा रक्त के गाढ़ा हो जाने पर न तो रक्त का संचार सुचारु रूप से हो पाता है और न ही शरीर स्वस्थ रह पाता है।
(5) शारीरिक स्वच्छताः जल शारीरिक स्वच्छता का प्रमुख साधन है। नियमित रूप से किया गया स्नान हमारी त्वचा को स्वच्छ एवं यथासम्भव रोगमुक्त बनाये रखता है ।
(6) चुस्ती-फुर्ती के लिए: शरीर को चुस्त एवं फुर्तीला बनाए रखने में भी जल का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। जल की कमी होने पर व्यक्ति आलस्य एवं उदासीनता का शिकार रहता है।

(ख) घरेलू उपयोग

शरीर के समान घरेलू दैनिक जीवन के संचालन के लिए भी जल अत्यधिक आवश्यक है। जल के प्रमुख घरेलू उपयोग निम्नलिखित हैं
1. भोजन पकाने के लिए,
2. वस्त्रादि की धुलाई के लिए,
3. रसोईघर व बर्तनों की सफाई के लिए,
4. फर्श, खिड़कियाँ, दीवारों, स्नानागार व शौचालय इत्यादि की सफाई के लिए,
5. विभिन्न प्रकार के पेय पदार्थों को बनाने में तथा
6. घरेलू पेड़-पौधों की सिंचाई करने के लिए।

(ग) सामुदायिक उपयोग

जल किसी भी समाज, प्रदेश अथवा राष्ट्र की मूल आवश्यकता है। सामुदायिक जनजीवन की विभिन्न सुविधाओं एवं उपलब्धियों की प्राप्ति के लिए जल अत्यधिक आवश्यक है। इसकी पुष्टि में जल के सामुदायिक उपयोग निम्नलिखित हैं
1. नगर एवं देहात की गलियों, सड़कों व नालियों आदि की सफाई के लिए जल एक प्रमुख साधन है।
2. सार्वजनिक पार्को, बाग-बगीचों व वृक्षारोपण जैसे महत्त्वपूर्ण लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जल अति आवश्यक है।
3. कृषि आधारित समाज अथवा राष्ट्र के लिए जल की पर्याप्त उपलब्धि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।
4. जल से आज अति महत्त्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत विद्युत की प्राप्ति होती है।
5. हमारे आधुनिक समाज के अनेक उद्योग जल पर आधारित हैं।
6. अग्नि को नियन्त्रित करने के लिए भी जल की आवश्यकता पड़ती है। अग्निशामक विभाग जल का मुख्य रूप से उपयोग करके ही अवांछित एवं भयानक अग्निकाण्डों पर नियन्त्रण पाने का प्रयास करता है।
In simple words: जल जीवन का आधार है, यह शारीरिक क्रियाओं, तापमान नियंत्रण, रक्त संचार, स्वच्छता और चुस्ती-फुर्ती के लिए महत्वपूर्ण है। घरेलू कार्यों जैसे भोजन पकाने, सफाई और सिंचाई में भी जल आवश्यक है। यह सामुदायिक जरूरतों, कृषि और औद्योगिक विकास के लिए भी अपरिहार्य है, साथ ही विद्युत ऊर्जा का स्रोत भी है।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न जल के विभिन्न उपयोगों और मानव जीवन में इसके महत्व पर केंद्रित है। उत्तर में शारीरिक, घरेलू और सामुदायिक उपयोगों को स्पष्ट रूप से वर्गीकृत करना और उदाहरण देना उच्च अंक प्राप्त करने में मदद करेगा।

 

Question 2. जल का संघटन बताइए । जल-प्राप्ति के स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
या
जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत बताइए व जल प्रदूषण के कारण बताइए ।
या
जल-प्राप्ति के साधन क्या हैं? जल के अशब्द होने के कारण लिखिए। जल को शब्द करने की दो घरेलू विधियों का वर्णन कीजिए।
या
जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत बताइए।
या
जल का संघटन क्या है?

Answer:

जल का संघटन

जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का एक यौगिक है। इसमें दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन (\(H_2O\)) है। यही शुद्ध जल होता है। सामान्यतः जल में कई प्रकार के घुलनशील पदार्थ घुले रहते हैं जिसके कारण यह अशुद्ध हो जाता है। जल एक महत्त्वपूर्ण विलायक होने के कारण अनेक पदार्थों; जैसे-अनेक तत्त्वों के लवण इत्यादि; को आत्मसात् कर लेता है। प्राचीनकाल में जल को एक तत्त्व के रूप में जाना जाता था। वैज्ञानिकों ने बाद में विभिन्न प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि जल हाइड्रोजन (दो भाग) व ऑक्सीजन (एक भाग) का यौगिक है तथा इसे \(H_2O\) का सूत्र प्रदान किया। जल का वैज्ञानिक विश्लेषण सर्वप्रथम इंग्लैण्ड निवासी वैज्ञानिक केवेन्डिस ने किया था। प्रकृति में जल तीन निम्नलिखित अवस्थाओं में पाया जाता है

(1) ठोस अवस्थाः हिमाच्छादित पर्वत शिखरों पर पाई जाने वाली हिम अथवा बर्फ जल की ठोस अवस्था है। सामान्य जल को \(0^\circ C\) तक ठण्डा करके बर्फ में परिवर्तित किया जा सकता है।

(2) द्रव अवस्थाः सामान्य जल इस अवस्था का उदाहरण है। अधिक तापमान पर बर्फ तथा ठण्डा करने पर जल-वाष्प सामान्य जल की द्रव अवस्था में परिवर्तित हो जाते हैं।

(3) गैस अवस्थाः आकाश में दिखाई पड़ने वाले मेघ अथवा बादल जल की गैस अवस्था (जल-वाष्प) के उदाहरण हैं। सामान्य जल गर्म करने पर पहले खौलने लगता है तथा धीरे-धीरे जल वाष्प में परिवर्तित हो जाता है। वायु में सदैव जलवाष्प विद्यमान रहती है।

जल-प्राप्ति के स्रोत मनुष्य हो अथवा पेड़-पौधे या फिर अन्य प्राणी एवं जीवधारी, जल सभी के जीवन का आधार है। प्रकृति ने अपनी इस अमूल्य देन के पृथ्वी पर अनेक स्रोत उपलब्ध किए हैं। इन साधनों अथवा स्रोतों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है (1) समुद्र का जल, (2) वर्षा का जल, (3) धरातलीय जल तथा (4) भूमिगत जल ।

(1) समुद्र का जलः पृथ्वी का लगभग 2/3 भाग समुद्र है। यह जल का विशालतम एवं प्रमुख स्रोत है। सूर्य की गर्मी से समुद्र का जल-वाष्प बनकर ऊपर उठता है। यह जल-वाष्प बादलों में परिवर्तित होकर जल के दूसरे स्रोत वर्षा के जल को जन्म देती है। वर्षा का जल पर्वतों एवं घा झीलों, झरनों एवं नदियों के जल में वृद्धि करता है। पृथ्वी के धरातल पर गिरने वाला वर्षा का जल भूमिगत जल-स्रोतों का निर्माण करता है। अन्त में नदियों द्वारा जल पुनः समुद्र में जा मिलता है। समुद्र के जल में लगभग तीन प्रतिशत सामान्य नमक घुला होता है। इस प्रकार समुद्र का जल हमारे लिए नमक का एक अति महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि भले ही समुद्र जल के विशालतम स्रोत हैं, परन्तु समुद्र का जल खारा होने के कारण पीने एवं खाना पकाने आदि के काम में नहीं लाया जा सकता। लवण की अधिक मात्रा होने के कारण इसे सिंचाई के कार्य में भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता ।

(2) वर्षा का जलः पृथ्वी पर पाए जाने वाले अन्य जल-स्रोतों का मूल वर्षा का जल है। यह पूर्णतया शुद्ध होता है, परन्तु पृथ्वी पर पहुँचते-पहुँचते इसमें वायुमण्डल की अनेक गैसों; कार्बन डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजने आदि; धूल कणों एवं पर्यावरणीय अशुद्धियों व रोगाणुओं के मिल जाने के कारण यह अशुद्ध एवं हानिकारक हो जाता है। औद्योगीकरण के कारण वायु-प्रदूषण की दर बढ़ जाने के कारण वर्षा को जल प्रायः प्रदूषित हो जाता है। इस स्थिति में एक-दो बार वर्षा हो जाने पर वर्षा के जल को पीने के लिए एकत्रित करना कम हानिकारक रहता है। वर्षा का जल मृदु होता है तथा घरेलू उपयोगों के लिए उपयुक्त रहता है।

(3) धरातलीय जलः धरातलीय जल-स्रोत नदियाँ, झीलें, झरने, तालाब इत्यादि हैं। इन सभी स्रोतों की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ एवं उपयोग हैं जो निम्नलिखित हैं

(क) नदियाँ: तीव्र प्रवाह वाली नदियों का जल प्रायः मृद् एवं शुद्ध होता है। प्रायः उद्गम स्थान पर सभी नदियों का जल पीने योग्य होता है, परन्तु बड़े शहरों अथवा औद्योगिक क्षेत्रों के किनारों पर पहुँचकर अनेक सार्वजनिक एवं औद्योगिक अशुद्धियाँ मिल जाने के कारण नदियों का जल पीने के योग्य नहीं रह पाता है। इस स्थिति में नदियों के जल को किसी उपयुक्त उपाय द्वारा शुद्ध एवं साफ करके ही उसे पीने के काम में लाना चाहिए।

(ख) झीलें: झीलें वर्षा के जल का संगृहीत रूप हैं। ये प्रायः गहरी भूमि में बनती हैं। इनमें बर्फ पिघलने पर पर्वतीय नदियों का तथा वर्षा का जल एकत्रित होता रहता है। इस प्रकार की झील प्राकृतिक होती है; जैसे-कश्मीर की डल झील, तथा नैनीताल की झील । मानव द्वारा निर्मित झील कृत्रिम झील कहलाती है। यह बाँधों द्वारा बनाई जाती है; जैसे-पंजाब में भाखड़ा बाँध की झील । झील के जल को शुद्ध करके पीने योग्य बनाया जा सकता है तथा इससे विद्युत उत्पादन भी किया जा सकता है।

(ग) सोते एवं झरने: जल प्राप्ति के प्राकृतिक स्रोत सोते एवं झरने भी हैं। जब कहीं कठोर चट्टान को फोड़कर भूमिगत जल बाहर निकलने लगता है, तब उसे जल को सोता या स्रोत कहते हैं। पानी के सोते अनेक प्रकार के होते हैं। कुछ सोतों से तो केवल शुद्ध जल ही निकलता है तथा कुछ सोतों से लवणयुक्त तथा गर्म पानी भी प्राप्त होता है। सोतों का जल भिन्न-भिन्न गुणों से युक्त होता है। सोतों के जल को अनेक बार पेट तथा त्वचा सम्बन्धी रोगों के उपचार के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। कुछ सोतों में गन्धक की पर्याप्त मात्रा घुलित अवस्था में पाई जाती है। यह जल अनेक प्रकार से । स्वास्थ्य-लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सोतों के समान झरने भी जल प्राप्ति के प्राकृतिक स्रोत होते हैं। झरने मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। झरने का जल ऊँचाई से नीचे गिरता है। झरनों का जल भी सोतों के ही समान होता है। सोतों तथा झरनों के पानी का इस्तेमाल करने से पूर्व उनके गुणों की जाँच कर लेनी चाहिए, क्योंकि इनमें कुछ हानिकारक लवण भी विद्यमान हो सकते हैं।

(घ) तालाब: झीलों की तरह तालाबों में भी वर्षा का जल एकत्रित होता है। देहात में जल-प्राप्ति का यह एक प्रमुख प्राकृतिक साधन है। ग्रामीण लोग इसमें स्नान करते हैं एवं वस्त्र आदि धोते हैं। पशुओं के नहाने के पीने के पानी का तालाब एक महत्त्वपूर्ण साधन है। तालाब का जल ठहरा होने के कारण शीघ्र ही दूषित हो जाता है; अतः इसे ज्यों-का-त्यों पीने के काम में नहीं लाना चाहिए। यदि इसे पीना आवश्यक हो, तो किसी घरेलू उपाय द्वारा इसे शुद्ध करना अति आवश्यक होता है।

(4) भूमिगत जल: वर्षा का जल जब भूमि पर गिरता है, तो इसका एक बड़ा भाग बह जाता है। इसका शेष भाग भूमि द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। यह अवशोषित जल भूम्याकर्षण शक्ति के कारण नीचे की ओर खिसकता रहता है। मार्ग में अभेद्य चट्टान के आ जाने पर यह एकत्रित हो भूमिगत जल-स्तर का निर्माण करता है। जल के इस स्रोत का उपयोग कर साधारण कुएँ, विद्युत कुएँ भूमिगत जल-स्तर तक भूमि को बेधकर कुओं का निर्माण किया जाता है। कुएँ प्रायः निम्न प्रकार के होते हैं

(क) उथले कुएँ: भूमि की प्रथम अप्रवेश्य स्तर तक ही खुदाई करके इन कुओं का निर्माण किया जाता है। इनकी गहराई लगभग तीस फीट होती है। भूमि में उपस्थित लवणों के कारण उथले कुओं का जल प्रायः कठोर होता है। गन्दी जगह अथवा नाले के आस-पास स्थित कुओं का जल पीने योग्य नहीं होता है।

(ख) गहरे कुएँ: इन कुओं की गहराई लगभग सौ फीट तक होती है। इनका जल मृदु तथा अशुद्धियों से मुक्त होता है। इन कुओं से लगभग सभी ऋतुओं में जल प्राप्त होता है।

(ग) आदर्श कुएँ: देहात क्षेत्र में पीने के पानी का मुख्य स्रोत प्रायः कुएँ ही होते हैं; अतः मृदु एवं शुद्ध जल वाला आदर्श कुआँ प्रत्येक गाँव के लिए आवश्यक है। आदर्श कुएँ का निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए
1. आदर्श कुएँ का निर्माण गन्दे स्थानों; नाले, तालाब आदि; से कम-से-कम 100 फीट की दूरी पर किया जाना चाहिए ।
2. कुएँ की भीतरी सतह पक्की ईंटों अथवा पत्थरों की बनी होनी चाहिए तथा कुएँ की दीवार भूमि की सतह से काफी ऊपर तक निर्मित होनी चाहिए। इससे बाहर का गन्दा पानी कुएँ में प्रवेश नहीं कर पाता।
3. कुआँ अधिकाधिक गहरा होना चाहिए।
4. कुएँ के ऊपर यदि सम्भव हो, तो चारों ओर खम्भे लगाकर ऊँचाई पर छत डलवा देनी चाहिए। इससे कुएँ में पेड़ों की टहनियाँ व पत्तियाँ आदि नहीं गिरतीं तथा कुआँ पक्षियों की बीट जैसे अवांछनीय तत्त्वों से भी सुरक्षित रहता है।
5. कुएँ के चारों ओर न तो स्नान करना चाहिए और न ही वस्त्रादि धोने चाहिए ।
6. कुएँ से जल खींचते समय गन्दे बर्तन वे गन्दी रस्सी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
7. कुएँ के जल में माह में कम-से-कम एक बार पोटैशियम परमैंगनेट अथवा लाल दवा अवश्य डालनी चाहिए। इससे जल के कीटाणु मर जाते हैं।

(घ) आर्टीजन कुएँ:
इने कुओं से जल पृथ्वी के दबाव के कारण स्वतः निकला करता है। फ्रांस के आर्टाइथ स्थान में प्राचीनकाल में इस प्रकार के कुएँ बनाए जाते रहने के कारण इनका नाम आर्टीजन कुएँ पड़ा। इन्हें ही पाताल-तोड़ कुएँ भी कहते हैं। इनका सिद्धान्त है कि यदि किसी स्थान पर किसी दूसरे स्थान की अपेक्षा भूमिगत जल-स्तर बहुत नीचा हो गया है और पत्थरों की चट्टान के कारण रुका हुआ हो तो यदि चट्टान में छेद कर दिया जाए, तो पानी स्वतः ही ऊपर की ओर दबाव के साथ उतना ही ऊँचा उछलता है जितनी कि ऊँची सतह होती है। आर्टीजन कुओं का जल गहरे कुओं के जल के समान शुद्ध होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक आर्टीजन कुएं को दर्शाता है जिसमें भूमिगत जल दबाव के कारण स्वतः ही ऊपर की ओर उछलता है। इसमें अप्रवेश्य स्तरों के बीच फंसे पानी को दर्शाया गया है जो सतह पर छेद करने पर बाहर निकलता है।


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक नलकूप को दर्शाता है जहाँ भूमि में गहराई तक पाइप डालकर जल स्तर से पानी ऊपर खींचा जाता है। इसमें एक पम्प या मशीन की सहायता से पानी निकालने की प्रक्रिया को सचित्र किया गया है, जो सिंचाई और पीने के लिए उपयोग होता है।

(ङ) नलकूपः भूमि में जल-स्तर को गहराई तक छेदकर लोहे का पाइप डाल दिया जाता है। इस जल को ऊपर खींचने के लिए हाथ के पम्प अथवा विद्युत मशीन का प्रयोग किया जाता है। नलकूपों का प्रयोग सिंचाई एवं पीने के जल की प्राप्ति के लिए किया जाता है। अधिक गहराई वाले नलकूप का जल प्रायः शुद्ध होता है।
In simple words: जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का यौगिक (\(H_2O\)) है, जो प्रकृति में ठोस, द्रव और गैस तीन अवस्थाओं में पाया जाता है। जल के मुख्य स्रोत समुद्र, वर्षा, नदियाँ, झीलें, तालाब और भूमिगत जल (कुएँ, आर्टीजन कुएँ, नलकूप) हैं। समुद्र का जल खारा होता है, जबकि वर्षा का जल शुद्ध होता है लेकिन वायुमंडल में अशुद्ध हो सकता है। विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जल को अक्सर पीने योग्य बनाने के लिए शुद्धिकरण की आवश्यकता होती है।

🎯 Exam Tip: जल के रासायनिक संघटन (\(H_2O\)) और इसकी तीनों अवस्थाओं (ठोस, द्रव, गैस) का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है। जल-प्राप्ति के स्रोतों को वर्गीकृत करके, प्रत्येक स्रोत की विशेषताओं और उससे प्राप्त जल की गुणवत्ता का वर्णन करने से उत्तर अधिक प्रभावी होगा।

 

Question 3. गाँवों में जल-प्राप्ति के मुख्य साधन क्या हैं? वहाँ जल को दूषित होने से किस प्रकार बचाया जा सकता है? .
या
देहात में पेयजल के स्रोत क्या हैं? कुओं और तालाबों का जल किस प्रकार दूषित हो जाता है? इनको दूषित होने से किस प्रकार बचाया जा सकता है?
या
तालाब के जल की अशुद्धियों को रोकने तथा दूर करने के पाँच उपाय लिखिए।
या
नदियों का जल किस प्रकार से दूषित हो जाता है? नदियों के जल को दूषित होने से बचाने के उपायों का भी वर्णन कीजिए ।

Answer:

गाँवों में जल-प्राप्ति के साधन

नगरों की अपेक्षा गाँवों में पेयजल की व्यवस्था अधिक जटिल है। इसके प्रमुख कारण हैं सुदूर देहात क्षेत्र में नगरपालिका जैसी व्यवस्थित संस्थाओं का न होना तथा उपयुक्त स्वास्थ्य सम्बन्धी शिक्षा का अभाव । अतः ग्रामीण क्षेत्र में न तो गन्दगी के निकास की समुचित व्यवस्था पर कोई विशेष ध्यान दिया जाता है और न ही पेयजल की शुद्धता बनाए रखने के आवश्यक उपाय किए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के साधन निम्नलिखित हैं – (1) नदियाँ, (2) तालाब, (3) कुएँ, (4) नलकूप ।

जल-प्राप्ति के इन स्रोतों का जल अशुद्ध होने तथा उसे अशुद्धि से बचाने के उपायों का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है (1) नदी का जलः
तीव्र प्रवाह वाली नदियों को जल प्रायः शुद्ध होता है, परन्तु मानवीय क्रियाएँ इसे अशुद्ध कर देती हैं।

जल की अशुद्धि के कारणः

1. नदी के किनारे बसे नगरों एवं गाँवों की गन्दगी नदी में बहा दिए जाने के कारण इसका जल पीने योग्य नहीं रहता।
2. नदी के किनारे की जाने वाली खेती से रासायनिक पदार्थ; खाद तथा कीटनाशक ओषधियाँ; नदी के पानी में मिलकर उसे दूषित करते रहते हैं।
3. नदी के किनारों पर स्नान करने तथा वस्त्रादि धोने से भी इसका जल अशुद्ध होता रहता है।
4. पशुओं को नदी में घुसाकर स्नान कराने से जल में गन्दगी की वृद्धि होती है।
5. नदियों के किनारे पर शवदाह करने तथा अस्थियाँ एवं राख सीधे जल में विसर्जित करने से भी यह जल पीने योग्य नहीं रह जाता।
6. विभिन्न औद्योगिक संस्थानों द्वारा औद्योगिक अवशेषों तथा व्यर्थ पदार्थों को भी निकटवर्ती नदियों के जल में सीधे प्रवाहित कर दिया जाता है। इससे भी नदियों का जल अशुद्ध एवं दूषित हो जाता है।

बचाव के उपाय: नदियों के जल को कुछ सामान्य उपाय अपनाकर दूषित होने से बचाया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं
1. नदियों के जल में मल-मूत्र व अन्य प्रकार की गन्दगी प्रवाहित नहीं करनी चाहिए।
2. औद्योगिक अवशेषों एवं व्यर्थ पदार्थों से नदियों के जल का बचाव किया जाना चाहिए।
3. नदी के किनारे पर स्नान नहीं करना चाहिए तथा नदी के जल में वस्त्रादि धोकर उसकी गन्दगी में वृद्धि नहीं करनी चाहिए ।
4. पशुओं को नदी में नहीं घुसने देना चाहिए।
5. नदियों में अस्थियों की राख विसर्जित नहीं करनी चाहिए।
6. नदी के किसी साफ तट को छाँटकर वहीं से पेयजल प्राप्त करना चाहिए। नदी के जल को उबालकर पीना स्वास्थ्य के लिए हितकर रहता है।

(2) तालाब का जल:
अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब उपलब्ध होते हैं। तालाबों में मूल रूप से वर्षा का ही जल एकत्र होता है, परन्तु विभिन्न आन्तरिक एवं बाहरी कारणों से तालाबों का जल दूषित हो जाता है; अतः सामान्य रूप से पीने योग्य नहीं रह जाता।

जल की अशुद्धि के कारणः

1. ग्रामीण इनमें स्नान करते हैं तथा वस्त्रादि धोते हैं।
2. पशुओं को नहाने व पानी पीने के लिए सीधे ही तालाब में उतार दिया जाता है।
3. गाँव की नालियों के गन्दे पानी का निकास भी प्रायः तालाब में ही होता है।
4. पेड़ों की टहनियाँ और पशु-पक्षियों के मल-मूत्र भी तालाब में सड़ते रहते हैं।
5. स्थिर अवस्था में रहने के कारण तालाब के जल में मच्छर एवं कुछ कीड़े भी पनपते रहते हैं।

बचाव के उपाय: तालाब के जल को कुछ सामान्य उपाय अपनाकर दूषित होने से बचाया जा सकता है। ये महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं
1. तालाब का निर्माण ऐसे स्थान पर होना चाहिए कि जहाँ पर सार्वजनिक गन्दगियों का निष्कासन क्षेत्र न हो।
2. तालाब की चहारदीवारी ऊँची होनी चाहिए। इससे आस-पास का गन्दा पानी तालाब में नहीं जा पाता है।
3. तालाब के चारों ओर काँटेदार बाड़ लगा देनी चाहिए जिससे कि इसमें जानवर न घुस सकें ।
4. नहाने व कपड़े धोने की व्यवस्था तालाब के बाहर इस प्रकार होनी चाहिए कि गन्दा पानी : तालाब में न गिरे ।
5. तालाब से जल प्राप्त करते समय स्वच्छ बर्तनों का प्रयोग करना चाहिए।
6. तालाब के जल को शुद्ध बनाये रखने के लिए इसमें छोटी-छोटी मछलियाँ छोड़ देनी चाहिए। ये कई प्रकार के हानिकारक कीट-पतंगों को खाकर नष्ट कर देती हैं।
7. समय-समय पर तालाब की गन्दगी; जैसे-पेड़-पौधों की पत्तियों व टहनियों आदिः को साफ करते रहना चाहिए। इन सभी उपायों को अपनाकर तालाब के पानी को और अधिक अशुद्ध होने से बचाया जा सकता है। वैसे स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह आवश्यक माना जाता है कि तालाब के पानी को किसी घरेलू विधि द्वारा शुद्ध करके ही पीने एवं खाना पकाने के काम में लाना चाहिए।

(3) कुओं का जलः
गहरे कुएँ पेयजल के श्रेष्ठ साधन हैं।

जल की अशुद्धि के कारणः

1. कुओं के कम गहरे व कच्चे बने होने पर इसके जल के अशुद्ध होने की अधिक सम्भावनाएँ रहती हैं।
2. ऊपर से ढका न होने के कारण आस-पास के पेड़-पौधों की पत्तियाँ एवं पक्षियों के मल-मूत्र इसके अन्दर सीधे गिरकर सड़ते रहते हैं।
3. कुएँ की मेंढ़ पर बैठकर स्नान करने व वस्त्रादि धोने से इनमें गन्दा पानी गिरता रहता है और जल को दूषित करता है।
4. गन्दे नाले आदि के पास स्थित होने पर कुएँ के पानी में कीड़े व कीटाणु आसानी से पनप जाते हैं।
5. गन्दे बर्तन व गन्दी रस्सी द्वारा कुएँ से पानी प्राप्त करने से कुएँ के जल की अशुद्धियों में वृद्धि होती है।

बचाव के उपाय: आदर्श कुएँ का निर्माण कुएँ के जल को पीने योग्य बनाये रखने का एकमात्र उपाय है। आदर्श कुएँ की विशेषताओं का उल्लेख विगत प्रश्न के अन्तर्गत किया जा चुका है।

(4) नलकूप का जलः नलकूप कुओं का आधुनिकतम एवं सुरक्षित रूप है। नलकूप के जल के अशुद्ध होने के मूल कारण कुएँ से मिलते-जुलते हैं। अतः नलकूप के जल को पीने योग्य बनाए रखने के उपाय भी लगभग उसी प्रकार के हैं; जैसे कि
1. नलकूप एक स्वच्छ स्थान (गन्दे नाले व तालाब आदि से दूर) पर निर्मित किए जाने चाहिए।
2. अधिकाधिक गहराई तक खुदाई करके नलकूप लगाने चाहिए।
3. नलकूप ऊपर से ढके रहने चाहिए।
In simple words: गाँवों में पेयजल के मुख्य साधन नदियाँ, तालाब, कुएँ और नलकूप हैं। नदियों का जल मानव गतिविधियों (कचरा, रसायन) और उद्योगों से, तालाबों का जल स्नान, पशुओं और गन्दगी से, तथा कुओं का जल खुलेपन, गन्दे बर्तनों व नालों से दूषित होता है। इन स्रोतों को साफ रखने के लिए गन्दगी न बहाना, औद्योगिक अपशिष्ट रोकना, सफाई के उपाय और ढककर रखना आवश्यक है।

🎯 Exam Tip: ग्रामीण पेयजल स्रोतों की सूची बनाना, प्रत्येक स्रोत के दूषित होने के कारणों को अलग-अलग समझाना और फिर प्रत्येक के बचाव के उपाय स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है। विशिष्ट उदाहरणों का प्रयोग करें और व्यावहारिक समाधानों पर जोर दें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. हमें प्रतिदिन कितने जल की आवश्यकता होती है?
Answer: हमें विभिन्न दैनिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए जले की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होती है। यद्यपि 1-2 लीटर जल जीवित रहने के लिए पर्याप्त है फिर भी प्रति सामान्य व्यक्ति 120-130 लीटर जल प्रतिदिन की निम्नलिखित दैनिक कार्यों के अनुसार आवश्यकता पड़ती है

क्र० सं०आवश्यक दैनिक कार्यजल की मात्रा
1.पीने के लिए2 लीटर
2.शौच आदि के लिए20 लीटर
3.दाँत साफ करने व हाथ-मुँह धोने के लिए3 लीटर
4.स्नान करने में30 लीटर
5.गृहकार्यों में20 लीटर
6.वस्त्रादि साफ करने के लिए20 लीटर
7.रसोईघर में15 लीटर
8.सार्वजनिक कार्यों; जैसे नालियों की सफाई व छिड़काव; आदि के लिए20 लीटर
130 लीटर

In simple words: एक सामान्य व्यक्ति को प्रतिदिन विभिन्न दैनिक कार्यों जैसे पीने, शौच, सफाई, स्नान, गृहकार्य, कपड़े धोने और सार्वजनिक कार्यों के लिए लगभग 120-130 लीटर जल की आवश्यकता होती है।

🎯 Exam Tip: जल की दैनिक आवश्यकता को तालिकाबद्ध तरीके से प्रस्तुत करना और प्रत्येक कार्य के लिए अनुमानित मात्रा को दर्शाना उत्तर को अधिक व्यवस्थित और स्कोरिंग बनाएगा।

 

Question 2. वर्षा के जल की क्या विशेषताएँ हैं?
Answer: वर्षा को जल नदियों, झीलों तथा कुओं के लिए जल उपलब्धि का महत्त्वपूर्ण स्रोत होता है। कृषि के लिए वर्षा का जल अति महत्त्वपूर्ण स्रोत है। वर्षा का जल आसुत जल के समान होता है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. वर्षा के जनक बादल हैं जो कि समुद्र, नदियों, तालाबों आदि के जल के वाष्प में परिवर्तित होने से बनते हैं। इस प्रकार वर्षा का जल आसुत जल के समान होता है।
2. वर्षा का जल रंगहीन, स्वादहीन व शुद्ध होता है।
3. वर्षा का जल जब वायुमण्डल से गुजर कर पृथ्वी तक पहुँचता है, तो मार्ग में इसमें कार्बन डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स, अमोनिया इत्यादि गैसों, बीजाणुओं तथा अनेक रोगाणुओं के मिल जाने के कारण यह दुषित व हानिकारक हो जाता है। इसका विकल्प यह है कि एक या होने के पश्चात् इसे पेय जल के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है।
4. वर्षा का जल कोमल होता है; अतः खाना पकाने, स्नान करने तथा वस्त्रादि धोने के लिए उपयुक्त रहता है।
In simple words: वर्षा का जल मूल रूप से आसुत जल के समान रंगहीन, स्वादहीन और शुद्ध होता है। यह कृषि और अन्य जल स्रोतों के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, वायुमंडल से गुजरते समय यह गैसों और रोगाणुओं से दूषित हो सकता है, जिससे इसे पीने से पहले शुद्धिकरण की आवश्यकता होती है।

🎯 Exam Tip: वर्षा के जल की प्रारंभिक शुद्धता और वायुमंडलीय अशुद्धियों के कारण उसके दूषित होने, दोनों पहलुओं को उजागर करें। कृषि और दैनिक उपयोग में इसकी कोमलता को स्पष्ट करना अतिरिक्त अंक दिलाएगा।

 

Question 3. आदर्श कुएँ से क्या तात्पर्य है?
Answer: गहरे कुएँ से लिया गया जल सभी कार्यों के लिए उपयुक्त होता है और यदि ऐसा उपयुक्त कुआँ हो तो उसे आदर्श कुएँ में बदलने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है
1. कुआँ अच्छी भूमि में खुदवाना चाहिए ।
2. कुआँ पक्का होना चाहिए ताकि पानी निकालते समय उसमें मिट्टी न गिरे ।
3. प्रत्येक माह कुएँ के पानी में लाल दवा डालकर सफाई करवानी चाहिए, ताकि कुएँ का जल . दूषित होने से बच सके ।
4. ऐसे कुएँ के ऊपर छतरीनुमा एक छत होनी आवश्यक है, जिससे धूल, मिट्टी, पक्षियों की बीट इत्यादि कुएँ में न गिर सके ।
5. कुएँ के आस-पास का भाग पक्का होना चाहिए जिससे आस-पास का जल कुएँ में गिरकर जल को अशुद्ध न कर सके ।
In simple words: आदर्श कुआँ वह कुआँ है जो गहरे पानी तक पहुँचता है और जिसे निर्माण के दौरान साफ-सफाई और सुरक्षा के सभी मानदंडों का पालन करके बनाया जाता है, जैसे कि पक्की दीवारें, छत, आसपास का पक्का क्षेत्र और नियमित जल शुद्धिकरण।

🎯 Exam Tip: आदर्श कुएँ की परिभाषा को स्पष्ट करें और उसके निर्माण और रखरखाव के लिए आवश्यक सुरक्षात्मक उपायों (जैसे पक्की दीवारें, छत, सफाई) की सूची दें, जो सीधे जल की शुद्धता से संबंधित हैं।

 

Question 4. जल-संभरण से क्या तात्पर्य है? स्वास्थ्य की दृष्टि से इसकी क्या व्यवस्था होनी चाहिए?
Answer: नगरों तथा महानगरों में जल-आपूर्ति की व्यवस्था को जल-संभरण कहते हैं। यहाँ यह व्यवस्था जल निगम द्वारा की जाती है। ये जल निगम स्वायत्त विभाग के रूप में अथवा नगरपालिकाओं के विभाग के अन्तर्गत कार्य करते हैं। छोटे गाँवों और कस्बों में, जहाँ सार्वजनिक जल-वितरण की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जल आपूर्ति का मुख्य स्रोत कुएँ, तालाब, झील, पोखर और नदियाँ हैं। जल निगम सार्वजनिक उपक्रम होते हैं। ये नागरिकों को उनके घरों तक शुद्ध जल की आपूर्ति की सुचारु व्यवस्था करते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से ये निम्नलिखित व्यवस्थाएँ बनाए रखते हैं
1. जल का आवश्यक संग्रह,
2. जेल की अघुलित अशुद्धियों को दूर करना,
3. कीटाणुनाशकों; जैसे - क्लोरीन व ओजोन गैस, पोटैशियम परमैंगनेट तथा पराबैंगनी किरणों आदि; का प्रयोग कर जल को रोगाणुओं से मुक्त रखना। दूसरी ओर प्राकृतिक साधनों से प्राप्त जल में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ होती हैं तथा उसमें रोगजनक कीटाणुओं के होने की भी पूरी सम्भावना रहती है। ऐसे जल को उपयुक्त विधि द्वारा शुद्ध करके उसका प्रयोग करना चाहिए तथा पेय जल को ढककर रखना चाहिए।
In simple words: जल-संभरण का अर्थ है नगरों और महानगरों में जल-आपूर्ति की व्यवस्थित प्रणाली, जो जल निगम जैसे संस्थानों द्वारा प्रबंधित होती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से इसमें जल का संग्रह, अघुलित अशुद्धियों को हटाना और कीटाणुनाशकों का उपयोग करके रोगाणुओं से मुक्त करना शामिल है, साथ ही जल को शुद्ध करके ढक कर रखना भी महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: जल-संभरण की परिभाषा को जल निगम की भूमिका से जोड़ें। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से इसकी व्यवस्था में जल संग्रह, शुद्धिकरण (अशुद्धियाँ हटाना, कीटाणुनाशकों का प्रयोग) और सुरक्षित भंडारण के चरणों को विस्तार से बताना आवश्यक है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. मनुष्य के लिए जल मुख्य रूप से किस रूप में आवश्यक है।
Answer: मनुष्य की प्यास शान्त करने के साधन के रूप में जल मुख्य रूप से आवश्यक है।
In simple words: मनुष्य के लिए जल मुख्य रूप से प्यास बुझाने और शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के लिए आवश्यक है।

🎯 Exam Tip: इस छोटे प्रश्न का उत्तर सीधा और सटीक होना चाहिए - मनुष्य के लिए जल का सबसे मूलभूत उपयोग प्यास बुझाना है।

 

Question 2. जल के दो महत्त्वपूर्ण शारीरिक उपयोग बताइए।
Answer: विभिन्न आन्तरिक शारीरिक क्रियाओं (पाचन, उत्सर्जन, रक्त-संचालन आदि) तथा शरीर की बाहरी स्वच्छता के साधन के रूप में जल उपयोगी है।
In simple words: जल पाचन, उत्सर्जन और रक्त-संचालन जैसी आंतरिक शारीरिक क्रियाओं के लिए और शरीर की बाहरी स्वच्छता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: आंतरिक शारीरिक क्रियाओं (जैसे पाचन, उत्सर्जन) और बाहरी स्वच्छता को दो अलग-अलग उपयोगों के रूप में स्पष्ट करें।

 

Question 3. जल का संगठन क्या है?
Answer: जल एक यौगिक है। इसमें दो भाग हाइड्रोजन तथा एक भाग ऑक्सीजन विद्यमान है।
In simple words: जल एक रासायनिक यौगिक है जो दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन से मिलकर बना होता है, जिसका रासायनिक सूत्र \(H_2O\) है।

🎯 Exam Tip: जल के रासायनिक संघटन को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के अनुपात के साथ बताना सटीक उत्तर होगा।

 

Question 4. \(H_2O\) किसका रासायनिक सूत्र है?
Answer: \(H_2O\) जल का रासायनिक सूत्र है।
In simple words: \(H_2O\) रासायनिक रूप से पानी का सूत्र है।

🎯 Exam Tip: यह एक सीधा प्रश्न है; उत्तर में स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि \(H_2O\) जल का रासायनिक सूत्र है।

 

Question 5. जल की विभिन्न अवस्थाएँ कौन-कौन सी हैं?
Answer: जल की तीन अवस्थाएँ होती हैं – ठोस, द्रव तथा गैस ।
In simple words: जल की तीन मुख्य भौतिक अवस्थाएँ हैं: ठोस (बर्फ), द्रव (पानी) और गैस (जलवाष्प)।

🎯 Exam Tip: जल की तीनों अवस्थाओं (ठोस, द्रव, गैस) का सटीक उल्लेख करें।

 

Question 6. जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं?
या
प्राकृतिक जल के विभिन्न स्रोत लिखिए।

Answer: समुद्र, वर्षा, नदियाँ, तालाब, झीलें, कुएँ तथा झरने जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत हैं।
In simple words: जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत समुद्र, वर्षा, नदियाँ, तालाब, झीलें, कुएँ और झरने हैं।

🎯 Exam Tip: जल के सभी प्रमुख प्राकृतिक स्रोतों को सूचीबद्ध करें, जैसे समुद्र, वर्षा और विभिन्न प्रकार के सतही व भूमिगत जल स्रोत।

 

Question 7. जल का विशालतम स्रोत क्या है?
Answer: समुद्र भूमण्डले पर जल का विशालतम स्रोत है।
In simple words: पृथ्वी पर जल का सबसे विशालतम स्रोत समुद्र है।

🎯 Exam Tip: जल के विशालतम स्रोत के रूप में समुद्र का उल्लेख करना सही उत्तर है।

 

Question 8. गन्धकयुक्त जल किसके लिए लाभकारी होता है?
Answer: गन्धकयुक्त जल त्वचा के लिए लाभकारी होता है।
In simple words: गन्धकयुक्त जल त्वचा संबंधी रोगों के उपचार में लाभकारी होता है।

🎯 Exam Tip: गन्धकयुक्त जल का लाभ त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए बताना सटीक होगा।

 

Question 9. कुएँ कितने प्रकार के होते हैं?
Answer: कुएँ के मुख्य प्रकार हैं-उथले कुएँ, गहरे कुएँ, आदर्श कुएँ तथा आर्टीजन कुएँ।
In simple words: कुएँ मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं: उथले कुएँ, गहरे कुएँ, आदर्श कुएँ और आर्टीजन कुएँ।

🎯 Exam Tip: कुओं के विभिन्न प्रकारों को सही ढंग से सूचीबद्ध करें।

 

Question 10. एक आदर्श कुआँ खोदने के लिए किस स्थान का चुनाव उपयुक्त होगा?
Answer: सामान्य रूप से साफ, ऊँचे एवं गन्दे तथा खत्ते आदि से दूर स्थित स्थान पर ही आदर्श कुआँ खोदा जा सकता है।
In simple words: आदर्श कुआँ खोदने के लिए साफ, ऊँचा और गन्दगी या कूड़े के ढेरों से दूर स्थान चुनना चाहिए ताकि पानी शुद्ध रहे।

🎯 Exam Tip: आदर्श कुएं के लिए स्थान का चयन करते समय स्वच्छता और प्रदूषण से दूरी के मानदंडों पर जोर दें।

 

Question 11. नदियों के जल की क्या विशेषताएँ होती हैं?
Answer: अपने उद्गम स्थल पर नदियों का जल शुद्ध होता है परन्तु बस्तियों एवं औद्योगिक क्षेत्रों से गुजरने पर यह जल प्रदूषित हो जाता है। अतः नदियों के जल को शुद्ध करके ही पीने के काम में लाना चाहिए।
In simple words: नदियों का जल उद्गम पर शुद्ध होता है, लेकिन बस्तियों और औद्योगिक क्षेत्रों से गुजरने पर यह प्रदूषित हो जाता है, इसलिए पीने से पहले इसे शुद्ध करना आवश्यक है।

🎯 Exam Tip: नदियों के जल की दोहरी प्रकृति (उद्गम पर शुद्ध, बाद में प्रदूषित) को स्पष्ट करें और शुद्धिकरण की आवश्यकता पर बल दें।

 

Question 12. पाताल-तोड़ कुआँ किसे कहते हैं?
Answer: पाताल-तोड़ कुएँ आर्टीजन कुएँ ही कहलाते हैं। इन कुओं का जल बहुत गहरे में जाकर होता है। इन कुओं का जल पृथ्वी के नीचे से दबाव के कारण स्वतः ही निकला करता है।
In simple words: पाताल-तोड़ कुएँ आर्टीजन कुएँ होते हैं, जो पृथ्वी के अंदरूनी दबाव के कारण स्वतः ही सतह पर पानी निकालते हैं।

🎯 Exam Tip: पाताल-तोड़ कुएँ को आर्टीजन कुएँ के रूप में पहचानें और उसके स्वतः जल निकालने के कारण को बताएं।

 

Question 13. घरेलू स्तर पर अधिक जल नष्ट होने से बचाने के दो उपाय लिखिए।
Answer: (1) नल की टोंटियों को अनावश्यक रूप से नहीं खोलना चाहिए। (2) कपड़े धोने के बाद बचे हुए जल को टॉयलेट में डालना चाहिए जिससे टॉयलेट की सफाई भी हो जाती है और जल की बचत भी हो जाती है।
In simple words: घरेलू स्तर पर जल बचाने के लिए अनावश्यक रूप से नल खुले न छोड़ें और कपड़े धोने के बाद बचे पानी का पुनर्चक्रण (जैसे टॉयलेट फ्लश) करें।

🎯 Exam Tip: जल बचाने के दो सरल और व्यावहारिक उपायों पर ध्यान केंद्रित करें जो दैनिक जीवन में आसानी से अपनाए जा सकें।

 

Question 14. विश्व जल दिवस कब मनाया जाता है?
Answer: विश्व जल दिवस प्रतिवर्ष 22 मार्च को मनाया जाता है।
In simple words: विश्व जल दिवस हर साल 22 मार्च को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य जल संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है।

🎯 Exam Tip: विश्व जल दिवस की सही तिथि (22 मार्च) को याद रखना महत्वपूर्ण है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न: निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

 

1. हमारे लिए जल उपयोगी है
(क) प्यास बुझाने के लिए।
(ख) भोजन पकाने के लिए
(ग) शारीरिक सफाई के लिए
(घ) इन सभी कार्यों के लिए
Answer: (घ) इन सभी कार्यों के लिए

 

2. जल अपने आप में क्या है?
(क) तत्त्व
(ख) मिश्रण
(ग) यौगिक
(घ) न मिश्रण न यौगिक
Answer: (ग) यौगिक

 

3. जल का रासायनिक सूत्र है
(क) HO
(ख) HO2
(ग) H2O
(घ) H2O2
Answer: (ग) H2O

 

4. समुद्र का जल होता है
(क) स्वादिष्ट
(ख) खारा
(ग) मीठा
(घ) खट्टा
Answer: (ख) खारा

 

5. सर्वोत्तम कुआँ माना जाता है
(क) कच्चा एवं उथला कुआँ
(ख) पक्का एवं गहरा कुआँ
(ग) नाले के निकट स्थित कुआँ
(घ) ये सभी
Answer: (ख) पक्का एवं गहरा कुआँ

 

6. कुएँ के जल को शुद्ध करने के लिए क्या डालते हैं?
(क) पोटैशियम परमैंगनेट
(ख) ब्लीचिंग पाउडर
(ग) गन्धक
(घ) डी० डी० टी०
Answer: (क) पोटैशियम परमैंगनेट

 

7. तालाब का जल नहीं माना जाता
(क) स्नान करने योग्य
(ख) पीने योग्य
(ग) कपड़े धोने योग्य
(घ) किसी अन्य कार्य को करने योग्य
Answer: (ख) पीने योग्य

 

8. झील का जल पीना चाहिए
(क) ठण्डा करके
(ख) छानकर
(ग) उबालकर
(घ) यूँ ही
Answer: (ग) उबालकर

 

9. जल रक्त को बनाए रखता है
(क) ठण्डा
(ख) गर्म
(ग) गाढ़ा
(घ) तरल
Answer: (घ) तरल

 

10. मानव शरीर में जल का प्रतिशत है
(क) 50-60%
(ख) 70-75%
(ग) 80-90%
(घ) 100%
Answer: (ख) 70-75%

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