Step-by-Step Textbook Solutions for Class 10 Hindi Chapter 07 मुक्ति दूत
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खण्डकाव्य
Question 1. डॉ० राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित 'मुक्ति-दूत' खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए।
Answer: 'मुक्ति-दूत' नामक खण्डकाव्य डॉ० राजेन्द्र मिश्र ने लिखा है। यह गाँधीजी के जीवन और विचारों का एक हिस्सा बताता है। इस कहानी की घटनाएँ सच्ची और इतिहास पर आधारित हैं। कवि ने इस कहानी को पाँच हिस्सों में बाँटा है।
पहले हिस्से में कवि ने महात्मा गाँधी को एक महान और दयालु इंसान के रूप में दिखाया है। उस समय भारत अंग्रेजों के अधीन था और उसकी हालत बहुत खराब थी। भारत को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हर तरह से लूटा जा रहा था। कवि कहते हैं कि जब धरती पर बहुत पाप और अन्याय बढ़ जाता है, तो भगवान किसी महान व्यक्ति के रूप में जन्म लेते हैं। जैसे बुरे रावण से बचाने के लिए राम और अत्याचारी कंस को खत्म करने के लिए श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। इसी तरह भारत को बचाने के लिए गुजरात के पोरबंदर में करमचंद के घर मोहनदास नाम के एक महान व्यक्ति ने जन्म लिया।
गाँधीजी का शरीर कमजोर था, पर उनकी आत्मा बहुत मजबूत थी। उन्होंने भारत को आज़ाद कराने के लिए लगभग तीस साल तक देश की अगुवाई की। उनका यह काम भारतीय इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। उनकी कड़ी मेहनत से ही भारत को आज़ादी मिली।
दूसरे हिस्से में गाँधीजी के मन की हालत बताई गई है। वे अपने देश के लोगों की बुरी हालत देखकर बहुत दुखी थे और उन्हें बचाना चाहते थे। एक दिन गाँधीजी ने सपने में अपनी माँ को देखा। माँ ने उनसे कहा कि जो तुम्हारी थोड़ी भी भलाई करे, तुम उसकी और ज्यादा मदद करो। जो गिर जाए उसे सहारा दो। सिर्फ अपना पेट नहीं, दूसरों का पेट भी भरो। माँ की बात याद करके गाँधीजी का मन भर आया। उन्होंने सोचा, "माँ ने सही कहा है, मैं अपनी मातृभूमि को गुलामी से मुक्त कराऊँगा। मैं करोड़ों गरीब भाइयों की रक्षा करूंगा।"
एक बार गाँधीजी ने सपने में श्री गोखले (गोपाल कृष्ण) को देखा। गोखले जी ने गाँधीजी को हमेशा आज़ादी के रास्ते पर चलते रहने की हिम्मत दी और कहा कि गाँधीजी ही भारत को आज़ादी दिलाने वाले बनेंगे।
तीसरे हिस्से में गाँधीजी ने अंग्रेजों की क्रूर नीतियों का विरोध किया है। देश में अंग्रेजों का राज था और उनका अत्याचार बहुत बढ़ गया था। भारतीय लोग बेबस और अपमान भरी जिंदगी जी रहे थे। सिर्फ वे ही खुश थे जो अंग्रेजों की चापलूसी करते थे। जब अंग्रेजों का दिल उनकी नीतियों से नहीं बदला, तब गाँधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' शुरू कर दिया।
पहले विश्वयुद्ध के समय गाँधीजी ने देशवासियों से अंग्रेजों की मदद करने को कहा। पर युद्ध जीतने के बाद अंग्रेजों ने 'रॉलेट ऐक्ट' कानून पास कर दिया, जिससे उनका अत्याचार और भी बढ़ गया। गाँधीजी ने इस काले कानून का बहुत विरोध किया। उनके साथ जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, पटेल जैसे नेता भी इस लड़ाई में शामिल हो गए। इसी समय जलियाँवाला बाग में बहुत दुखद घटना हुई। इस घटना को देखकर गाँधीजी का मन बहुत दुख से भर गया और उनकी आँखों में गुस्सा आ गया। इस महान नेता ने गुस्से को सहन करके सभी को उम्मीद दी और तय कर लिया कि अब अंग्रेज भारत में ज्यादा दिन नहीं रह पाएंगे।
चौथे हिस्से में भारत को आज़ाद कराने के लिए गाँधीजी ने जो आन्दोलन चलाए उनका वर्णन है। जलियाँवाला बाग की भयानक घटना के बाद गाँधीजी ने अगस्त 1920 में देश के लोगों से 'असहयोग आन्दोलन' करने को कहा। लोगों ने सरकार से मिली उपाधियाँ लौटा दीं, विदेशी चीजों का बहिष्कार किया। छात्रों ने स्कूल, वकीलों ने कोर्ट और सरकारी कर्मचारियों ने अपनी नौकरियाँ छोड़ दीं। इस आन्दोलन से सरकार बहुत मुश्किल में पड़ गई और परेशान हो गई।
असहयोग आन्दोलन को देखकर अंग्रेज निराश हो गए। उन्होंने भारतीयों पर 'साइमन कमीशन' थोप दिया। 'साइमन कमीशन' के आने पर गाँधीजी के नेतृत्व में पूरे भारत में इसका विरोध हुआ। इसके कारण सरकार ने हिंसा का सहारा लिया। पंजाब के शेर लाला लाजपत राय पर लाठियों से हमला किया गया, जिससे पूरे देश में हिंसक क्रांति फैल गई। गाँधीजी ने देशवासियों को समझाकर मुश्किल से अहिंसा के रास्ते पर वापस लाया।
गाँधीजी ने 79 लोगों के साथ नमक कानून तोड़ने के लिए डांडी तक पैदल यात्रा की। अंग्रेजों ने गाँधीजी को जेल में डाल दिया, तो पूरे देश में सत्याग्रह शुरू हो गया। गाँधीजी की एक पुकार पर पूरे देश में 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आन्दोलन फैल गया। हर जगह एक ही आवाज सुनाई देती थी – 'अंग्रेजों भारत छोड़ो'। जगह-जगह सभाएँ हुईं, विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई, पुल तोड़े गए, रेलवे लाइनें उखाड़ दी गईं, थानों में आग लगा दी गई, बैंक लूटे गए, जिससे अंग्रेजों का राज करना मुश्किल हो गया।
पांचवे हिस्से में आज़ादी मिलने तक की खास घटनाओं का वर्णन है। जेल में गाँधीजी की तबीयत खराब होने पर सरकार ने उन्हें छोड़ दिया। इंग्लैंड के चुनावों में मजदूर दल की सरकार बनी। फरवरी 1947 में प्रधानमंत्री एटली ने घोषणा की कि अंग्रेज जून 1947 से पहले भारत छोड़ देंगे। भारत में बहुत खुशी फैल गई। मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनाने की अपनी मांग पर अड़े रहे। 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हो गया और देश का राज जवाहरलाल नेहरू को मिल गया। गाँधीजी को लगा कि उनका आज़ादी का लक्ष्य पूरा हो गया, इसलिए वे संघर्षपूर्ण राजनीति से दूर हो गए। खण्डकाव्य के अंत में गाँधीजी भारत के सुनहरे भविष्य की कामना करते हैं और यहीं पर कहानी खत्म हो जाती है।
In simple words: 'मुक्ति-दूत' खण्डकाव्य महात्मा गाँधी के जीवन और विचारों को पाँच हिस्सों में बताता है। यह दिखाता है कि कैसे उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, दलितों की मदद की और भारत को आज़ादी दिलाई।
🎯 Exam Tip: खण्डकाव्य के कथानक को लिखते समय हर सर्ग (भाग) की मुख्य घटनाओं को क्रम से और संक्षेप में बताएं, साथ ही मुख्य संदेश को स्पष्ट करें।
Question 2. 'मुक्ति-दूत' खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए।
Answer: 'मुक्ति-दूत' खण्डकाव्य के पहले हिस्से में कवि ने महात्मा गाँधी को एक असाधारण और दयालु व्यक्ति के रूप में दिखाया है। उस समय भारत गुलाम था और उसकी हालत बहुत खराब थी। देश में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से बहुत शोषण हो रहा था। कवि अवतारवाद की बात से प्रभावित होकर कहते हैं कि जब दुनिया में पाप और अन्याय बहुत बढ़ जाता है, तो ईश्वर किसी महान पुरुष के रूप में जन्म लेते हैं। जैसे राम ने बुरे रावण को और श्रीकृष्ण ने अत्याचारी कंस को खत्म करके मानवता को बचाया था। वही ईश्वर कभी गौतम बुद्ध, कभी महावीर, कभी ईसा मसीह, कभी हजरत मुहम्मद, कभी गुरु गोविंद सिंह जैसे महापुरुषों के रूप में अत्याचार खत्म करने के लिए आते रहते हैं। उनके कई रूप और नाम होते हैं। लोग उन्हें पहचान नहीं पाते क्योंकि वे इंसानों की तरह ही व्यवहार करते हैं। उनके कामों से लोगों के दुख दूर होते हैं। उनके त्याग और बलिदान से लोग अच्छे रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित होते हैं। अमेरिका में लिंकन और फ्रांस में नेपोलियन के रूप में भी वही दैवीय शक्ति थी। इसी क्रम में, भारत की रक्षा के लिए गुजरात के पोरबंदर में करमचंद के घर मोहनदास (गाँधीजी) नाम के एक महान व्यक्ति का जन्म हुआ।
महात्मा गाँधी का शरीर भले ही कमजोर था, पर उनमें बहुत आत्मिक शक्ति थी। उन्होंने अफ्रीका में बीस साल तक रहकर वहाँ के भारतीय लोगों पर होने वाले अत्याचारों का विरोध किया था। भारत लौटकर उन्होंने यहाँ के शोषित, दलित और गरीब हरिजनों की हालत देखी तो वे बहुत दुखी हो गए। गाँधीजी को हरिजनों और पूरे हिंदुस्तान से बहुत गहरा प्रेम था। हरिजनों को ऊपर उठाने और भारत को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने तीस साल तक भारत की अगुवाई की। उनका यह काम भारतीय इतिहास में हमेशा याद रहेगा। उनके लगातार प्रयासों से ही भारत को आज़ादी मिली।
In simple words: पहले सर्ग में गाँधीजी को एक महान आत्मा बताया गया है जो भारत को अंग्रेजों के अत्याचार से बचाने के लिए जन्मे थे। उन्होंने हरिजनों और गरीबों के लिए बहुत काम किया और भारत को आज़ाद कराया।
🎯 Exam Tip: प्रथम सर्ग की कथा को संक्षेप में बताते हुए गाँधीजी के दिव्य गुणों और देश की तत्कालीन स्थिति पर ध्यान दें।
Question 3. 'मुक्ति-दूत' खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का सारांश लिखिए।
Answer: 'मुक्ति-दूत' खण्डकाव्य के दूसरे हिस्से में गाँधीजी के मन की हालत को दिखाया गया है। उनका दिल यहाँ के लोगों की दुखद हालत देखकर परेशान था और वे उनके उद्धार के लिए चिंतित थे।
एक दिन गाँधीजी ने सपने में अपनी माँ को देखा। माँ ने उन्हें समझाया कि जो तुम्हारा थोड़ा भी भला करे, तुम उसकी अधिक से अधिक मदद करो। गिरे हुए लोगों को सहारा दो। सिर्फ अपना नहीं, दूसरों का भी पेट भरो। अपनी माँ की याद करके गाँधीजी का दिल भर आया। उन्होंने सोचा—माँ ने सही कहा है, मैं अपनी मातृभूमि को गुलामी के बंधन से मुक्त कराऊँगा। मैं करोड़ों गरीब भाइयों की रक्षा करूंगा। जब तक मेरे देश का एक भी बच्चा नंगा और भूखा रहेगा, मैं चैन से नहीं सोऊंगा। मेरे देश के लोग अपमान भरा जीवन जी रहे हैं। अमीर और गरीब के बीच यह नफरत खत्म होनी चाहिए। हरिजनों की बुरी हालत देखकर उनका दिल दुख से जलने लगता है। हम सब भगवान की संतान हैं, तो फिर हमारे बीच भेदभाव क्यों? गुरु वशिष्ठ ने निषाद को गले लगाया था, राम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे। गौतम बुद्ध ने सत्यकाम हरिजन को शिक्षा दी थी। मेरा मानना है कि हरिजनों के छूने से किसी मंदिर की पवित्रता खत्म नहीं होती। वे भी हमारे भाई हैं, हमें उन्हें दिल से प्यार करना चाहिए।
गाँधीजी ने हरिजनों को अपने आश्रम में रहने के लिए बुलाया। इस पर कुछ लोग नाराज हो गए और आश्रम के लिए चंदा देने से मना कर दिया। जब आश्रम के प्रबंधक मगनलाल ने गाँधीजी को बताया कि हरिजनों को आश्रम में रखना ठीक नहीं है, तब गाँधीजी ने कड़े शब्दों में कहा- "असवर्णों की बस्ती में भी मैं उनके साथ रह लूँगा। मजदूरी करके खा लूँगा, वृक्ष के नीचे सुख से रह लूँगा। पर मगनलाल! मेरे रहते हुए, कोई अस्पृश्य नहीं हो सकता। समानता की उपजाऊ धरती में, मैं कड़वाहट के बीज नहीं बो सकता।" पहले देश आज़ाद हो जाए, फिर मैं इस छुआछूत से ही लड़ूंगा। गाँधीजी के इस जवाब से आश्रमवासियों ने महसूस किया कि गाँधीजी एक असाधारण व्यक्ति हैं।
एक बार गाँधीजी ने सपने में श्री गोखले (गोपाल कृष्ण) को देखा। उन्होंने गाँधीजी को हमेशा आज़ादी के रास्ते पर चलते रहने की प्रेरणा दी और यह उम्मीद जताई कि गाँधीजी ही भारत को आज़ादी दिलाएंगे।
जो बिगुल तुमने बजाया है, दक्षिण अफ्रीका में प्यारे! देखो उसकी ताकत कम न हो, भारतमाता के प्रिय पुत्र!
In simple words: दूसरे सर्ग में गाँधीजी की मनोदशा बताई गई है। वे देश की गरीबी और छुआछूत से दुखी थे। माँ के सपने से प्रेरणा लेकर उन्होंने देश और हरिजनों को आज़ाद कराने का संकल्प लिया।
🎯 Exam Tip: द्वितीय सर्ग में गाँधीजी की मनोदशा, माँ के सपने से मिली प्रेरणा, और हरिजन उद्धार के लिए उनके दृढ़ संकल्प को प्रमुखता से लिखें।
Question 4. 'मुक्ति-दूत' काव्य के तृतीय सर्ग की कथा का सार लिखिए।
Answer: तीसरे सर्ग में अंग्रेजों की दमनकारी नीति के खिलाफ गाँधीजी के विरोध को दिखाया गया है। देश में अंग्रेजों का राज था और उनके अत्याचार बहुत बढ़ गए थे। भारतीय लोग बेबस और अपमानित जीवन जी रहे थे। केवल वे लोग सुखी थे जो अंग्रेजों की चापलूसी करते थे। गाँधीजी भारत की बुरी हालत का कारण अच्छी तरह समझते थे। इसके बावजूद उन्होंने पहले अंग्रेजों के प्रति नरमी का तरीका अपनाया। वे जनता के दुख-दर्द बताकर उन्हें विनम्र बनाना चाहते थे। लेकिन जब अंग्रेजों का दिल उनकी नीति से नहीं बदला, तब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' शुरू कर दिया।
पहले विश्वयुद्ध के समय गाँधीजी ने देशवासियों से अंग्रेजों की मदद करने को कहा, ताकि अंग्रेजों का दिल भारतीयों के प्रति नरम हो जाए। लेकिन युद्ध में जीतने के बाद अंग्रेजों ने 'रॉलेट ऐक्ट' कानून पास करके अपना अत्याचारी शिकंजा और कस दिया। गाँधीजी ने अंग्रेजों के इस काले कानून का कड़ा विरोध किया। उनके साथ तेज बहादुर सप्रू, जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, जिन्ना, पटेल जैसे नेता भी संघर्ष में शामिल हो गए। इसी दौरान जलियाँवाला बाग की अमानवीय घटना हुई। बैसाखी के अवसर पर अमृतसर के इस बाग में अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रस्ताव पास करने के लिए लोग जमा हुए थे। तब जनरल डायर नाम के अंग्रेज सेनानायक ने निहत्थी भारतीय जनता पर अंधाधुंध साढ़े सोलह सौ चक्र गोलियाँ बरसाकर उन्हें भून डाला। डायर की इस क्रूरता का शिकार माताएं, विधवाएं, बिलखते बच्चे भी बने।
दस मिनट तक लगातार गोलियाँ चलीं, साढ़े सोलह सौ चक्र गोलियाँ। हजारों लोग मरे, लाशों से गलियाँ भर गईं। चंगेज़, हलाकू, अब्दाली, नादिर, तैमूर सभी हार गए थे। जनरल डायर की क्रूरता से, क्रूरता भी रो पड़ी थी।
यह दृश्य देखकर गाँधीजी का मन बहुत दुख से भर गया और उनकी आँखों में गुस्सा आ गया। इस महान पुरुष ने क्रोध को पीकर सभी को अमृतमय आशा दी और यह निश्चय कर लिया कि अब अंग्रेज भारत में ज्यादा दिन नहीं रहेंगे।
In simple words: तीसरे सर्ग में गाँधीजी ने अंग्रेजों की बुरी नीतियों का विरोध किया। रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग की घटना ने उन्हें बहुत दुखी और गुस्से में कर दिया, जिसके बाद उन्होंने अंग्रेजों को भारत से निकालने का दृढ़ निश्चय किया।
🎯 Exam Tip: तृतीय सर्ग के सार में अंग्रेजों की दमन नीति, रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसी मुख्य घटनाओं और गाँधीजी की प्रतिक्रिया को स्पष्ट रूप से लिखें।
Question 5. 'मुक्ति-दूत' काव्य के चतुर्थ सर्ग की घटनाओं का सार अपने शब्दों में लिखिए।
Answer: चौथे सर्ग में भारत की आज़ादी के लिए गाँधीजी द्वारा चलाए गए आन्दोलनों का वर्णन है। जलियाँवाला बाग की दुखद घटना के बाद गाँधीजी ने अगस्त 1920 में देश की जनता से 'असहयोग आन्दोलन' करने को कहा। लोगों ने सरकारी उपाधियाँ लौटा दीं, विदेशी सामान का बहिष्कार किया। छात्रों ने स्कूल, वकीलों ने कोर्ट और सरकारी कर्मचारियों ने नौकरियाँ छोड़ दीं। इस आन्दोलन से सरकार बहुत मुश्किल में पड़ गई और निराश हो गई।
असहयोग आन्दोलन को देखकर अंग्रेज निराश हो गए। उन्होंने भारतीयों पर 'साइमन कमीशन' थोप दिया। 'साइमन कमीशन' के आने पर गाँधीजी के नेतृत्व में पूरे भारत में इसका विरोध हुआ। लाला लाजपत राय, सुभाषचंद्र बोस, डॉ० राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, खान अब्दुल गफ्फार खान ने गाँधीजी के साथ मिलकर साइमन कमीशन का विरोध किया। इसके परिणामस्वरूप सरकार ने हिंसा का रास्ता अपनाया। पंजाब केसरी लाला लाजपत राय पर बेरहमी से लाठीचार्ज हुआ, जिसके बाद पूरे देश में हिंसक क्रांति फैल गई। गाँधीजी ने देशवासियों को समझाकर मुश्किल से अहिंसा के रास्ते पर वापस लाया।
गाँधीजी ने 79 व्यक्तियों के साथ नमक कानून तोड़ने के लिए डांडी की पैदल यात्रा की। अंग्रेजों ने गाँधीजी को बंदी बना लिया तो पूरे देश में सत्याग्रह फैल गया। दूसरे विश्व युद्ध के शुरू में अंग्रेजों ने समझौता करना चाहा, लेकिन गाँधीजी की आज़ादी की मांग न मानने के कारण समझौता टूट गया। नमक कानून तोड़ने, डांडी यात्रा, सविनय अवज्ञा आन्दोलन और साइमन कमीशन के विरोध में गाँधीजी के अटूट साहस और नेतृत्व को देखकर अंग्रेजी सरकार हैरान रह गई। वह खुद के अत्याचारों के प्रति चिंतित थी।
गाँधीजी की एक पुकार पर पूरे देश में 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आन्दोलन फैल गया। हर जगह एक ही आवाज सुनाई पड़ती थी-'अंग्रेजों भारत छोड़ो'। जगह-जगह सभाएँ हुईं, विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई, पुल तोड़े गए, रेलवे लाइनें उखाड़ दी गईं, थानों में आग लगा दी गई, बैंक लूटे गए, जिससे अंग्रेजों का शासन करना बहुत मुश्किल हो गया। उन्होंने दमन चक्र चलाया तो गाँधीजी ने 21 दिन का उपवास रखा। इन्हीं दिनों जेल में गाँधीजी की पत्नी की मृत्यु हो गई। जीवनभर साथ देने वाली पत्नी के बिछड़ने से गाँधीजी बहुत दुखी हुए। वे इस अचानक दुख से व्याकुल अवश्य हुए, लेकिन पत्नी के स्वर्गवास ने अंग्रेजों के खिलाफ उनके मनोबल को और मजबूत कर दिया। कवि इस दृश्य का वर्णन करते हुए कहते हैं-
बूढ़े बापू की आहों से, कारा की गूंजी दीवारें। बन अबाबील चीत्कार उठीं, थर्राई ऊँची मीनारें।
In simple words: चौथे सर्ग में गाँधीजी के असहयोग, साइमन कमीशन का विरोध, डांडी मार्च और भारत छोड़ो आन्दोलन जैसे बड़े संघर्षों का वर्णन है। इन संघर्षों के दौरान उनकी पत्नी की मृत्यु से भी उनका मनोबल और बढ़ गया।
🎯 Exam Tip: चतुर्थ सर्ग में गाँधीजी के विभिन्न आंदोलनों (असहयोग, साइमन कमीशन विरोध, डांडी मार्च, भारत छोड़ो) को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करें, उनकी दृढ़ता और पत्नी की मृत्यु के प्रभाव को भी उजागर करें।
Question 6. 'मुक्ति-दूत' खण्डकाव्य के पञ्चम सर्ग या अन्तिम सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए।
Answer: 'मुक्ति-दूत' के पांचवें और आखिरी हिस्से में आज़ादी मिलने तक की मुख्य घटनाओं का वर्णन है। जेल में गाँधीजी की तबीयत खराब होने पर सरकार ने उन्हें छोड़ दिया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया की राजनीति बदलने लगी। इंग्लैंड के चुनावों में मजदूर दल की सरकार बनी। फरवरी 1947 में प्रधानमंत्री एटली ने घोषणा की कि अंग्रेज जून 1947 से पहले भारत छोड़ देंगे। भारत में बहुत खुशी फैल गई। तब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के नाम से अपना अलग देश बनाने की मांग की। गाँधीजी को भारत के विभाजन से बहुत दुःख हुआ। मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनाने की अपनी मांग पर अड़े रहे। नोआखाली और बिहार में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे। गाँधीजी ने लोगों को समझाकर शांत किया। 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हो गया और देश का राज जवाहरलाल नेहरू को मिल गया। गाँधीजी को लगा कि उनका आज़ादी का लक्ष्य पूरा हो गया, इसलिए वे संघर्षपूर्ण राजनीति से दूर हो गए। उन्होंने कहा-
लड़ाई मेरी हुई समाप्त, विदा ओ जीवन के जंजाल। नया गाँधी बन तुम्हें स्वदेश करेगा प्यार जवाहरलाल॥
खण्डकाव्य के अंत में गाँधीजी भारत के सुनहरे भविष्य की कामना करते हैं और यहीं पर खण्डकाव्य की कथा समाप्त हो जाती है।
In simple words: पांचवें सर्ग में आज़ादी की घटनाओं, जैसे गाँधीजी का जेल से छूटना, एटली की घोषणा और भारत का विभाजन शामिल हैं। आखिर में 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ और गाँधीजी ने राजनीति छोड़ दी।
🎯 Exam Tip: पंचम सर्ग में आज़ादी की अंतिम घटनाओं, विभाजन की पीड़ा और गाँधीजी के राजनीति से संन्यास लेने का वर्णन करें।
Question 7. 'मुक्ति-दूत' खण्डकाव्य के आधार पर काव्य के नायक (प्रमुख पात्र) महात्मा गाँधी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Answer: डॉ० राजेन्द्र मिश्र द्वारा लिखे 'मुक्ति-दूत' खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी के पवित्र चरित्र का वर्णन किया गया है। गाँधीजी इस खण्डकाव्य के मुख्य पात्र हैं। इस काव्य के आधार पर महात्मा गाँधी के चरित्र की कुछ मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
(1) अलौकिक दिव्य पुरुष: कवि ने गाँधीजी को भगवान का अवतार बताया है जो पृथ्वी पर दुख दूर करने के लिए कभी-कभी आते हैं। जैसे राम, कृष्ण, ईसा मसीह, पैगम्बर, बुद्ध, महावीर आदि की श्रेणी में कवि ने गाँधीजी को भी रखा है। भारत में अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ने पर देश को आज़ाद कराने के लिए मानो खुद भगवान ने महात्मा गाँधी के रूप में जन्म लिया था। इस तरह 'मुक्ति-दूत' के नायक महात्मा गाँधी एक साधारण पुरुष नहीं, बल्कि एक दिव्य पुरुष थे।
(2) महान देशभक्त: गाँधीजी बहुत बड़े देशभक्त थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश को आज़ाद कराने और लोगों की सेवा में लगा दिया। उनका दिल देशवासियों की बुरी हालत देखकर दुख से भर जाता था। उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक देश-सेवा करने का जो वादा किया था, उसे अच्छी तरह निभाया। उन्होंने सारा सुख और धन त्यागकर अपना जीवन भारत को आज़ाद कराने में लगा दिया। आखिर में वे अपने देश के अच्छे भविष्य की कामना करते हुए कहते हैं:
रहो खुश मेरे हिन्दुस्तान, तुम्हारा पथ हो मंगल-मूल। सदा महके वन चन्दन चारु, तुम्हारी अँगनाई की धूल ।
(3) हरिजनोद्धारक: गाँधीजी असहाय और दलितों के मददगार थे। उनकी बुरी हालत देखकर उनका दिल दर्द से भर जाता था। वे संसार में सभी को ईश्वर की संतान मानते थे। उनका कहना था:
जिन हाथों ने संसार गढ़ा, क्या उसने हरिजन नहीं गढ़े। तब फिर यह कैसा छुआछूत, किस गीता में पाठ पढ़े॥
गाँधीजी अपने साबरमती आश्रम में हरिजनों को भी रखते थे। जब आश्रम के प्रबंधक और दानदाताओं ने इसका विरोध किया, तो गाँधीजी ने साफ शब्दों में कहा:
"असवर्णों की बस्ती में भी, मैं उनके साथ रह लूँगा। मजदूरी करके खा लूँगा, वृक्ष के नीचे सुख से रह लूँगा। मैं घृणा द्वेष की यह आँधी, न चलने दूंगा, न चलाऊँगा। या तो खुद ही मर जाऊँगा, या इसको मार भगाऊँगा॥" गाँधीजी के जीवन का मुख्य उद्देश्य हरिजनों का उद्धार करना ही था। कवि ने साफ शब्दों में कहा है:
दलितों के उद्धार हेतु ही, तुमने झण्डा किया बुलन्द। तीस बरस तक रहे जूझते, अंग्रेजों से अथक अमन्द।
(4) हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक: गाँधीजी भेदभाव के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में हिन्दू-मुस्लिम दोनों को साथ लिया था। उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम एकता के लिए बहुत मेहनत की। नोआखाली में हिन्दू-मुस्लिम दंगों के समय उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर शांति लाने की कोशिश की थी। वे हिन्दू-मुस्लिम को एक ही डाली पर खिले फूल समझते थे।
मुझे लगते हिन्दू-मुस्लिम, एक ही डाली के दो फूल। एक ही माटी के दो रूप, एक ही जननी के दो लाल॥
(5) आर्थिक समृद्धि के पोषक: गाँधीजी ने भारत की गरीब हालत सुधारने के लिए स्वदेशी कपड़े बनाने और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने, खादी और चरखे को बढ़ावा देने, सादा जीवन और अच्छे विचारों पर जोर देने, नशे से दूर रहने जैसे कई प्रयास किए। उनका कहना था:
छोटा बच्चा भी भारत का है, एक अगर नंगा भूखा। गाँधी को चैन कहाँ होगा, वह भी सो जाएगा भूखा॥
(6) मातृभक्त: गाँधीजी अपनी माँ के प्रति बहुत श्रद्धा और भक्ति रखते थे। माँ को सपने में देखने पर वे सोचते थे कि 'माँ जैसी ममता कहीं नहीं' और माँ की प्रेरणा से ही देश-सेवा में लग जाते हैं। गाँधीजी ने उदारता, दया, परोपकार, सच्चाई जैसे गुण अपनी माँ से सीखे थे।
(7) अहिंसा और करुणा की मूर्ति: गाँधीजी अहिंसा के पुजारी और करुणा की जीती-जागती मूर्ति थे। अंग्रेजों के बुरे समय में भी वे उन कठोर शासकों का फायदा उठाना सही नहीं मानते थे। भारत की बुरी हालत देखकर उनके दिल में करुणा का सागर उमड़ पड़ता था।
(8) भारत के मुक्ति-दूत: महात्मा गाँधी ने भारत को अंग्रेजों से आज़ाद कराने के लिए भारतीय आज़ादी की लड़ाई का अच्छा नेतृत्व किया। उनके तीस साल के लगातार प्रयासों से भारत की आज़ादी का सपना पूरा हुआ। उनके कुशल नेतृत्व में गुलामी की जंजीरें टूटकर बिखर गईं और भारत 15 अगस्त, 1947 को आज़ाद हो गया। इसलिए वे सही अर्थों में भारत के मुक्ति-दूत थे।
(9) सम्मान और पद के निर्लोभी: गाँधीजी का त्याग और बलिदान एक मिसाल है। उन्होंने भारत को अंग्रेजों से आज़ाद कराने के लिए जीवनभर कई मुश्किलें सहीं और संघर्ष करते रहे। भारत के आज़ाद होने पर जब उनका लक्ष्य पूरा हो गया, तब उन्होंने संघर्ष भरी राजनीति से संन्यास ले लिया।
(10) मानवीय गुणों से भरपूर: गाँधीजी का चरित्र कई गुणों का खजाना था। उनमें सच्चाई, दया, परोपकार, करुणा, अहिंसा और देशभक्ति के गुण भरे थे। वे विश्व-बंधुत्व और भाईचारे की भावना से भरे हुए थे और सभी धर्मों के प्रति आदर भाव रखते थे।
इस प्रकार गाँधीजी एक देवतुल्य इंसान, आज़ादी के अगुवा, हरिजनों के उद्धारक, भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने वाले, लालच रहित और अहिंसा को मानने वाले थे। वे सच्चाई, अहिंसा, करुणा, प्रेम, उदारता, सहानुभूति, समानता, देश-प्रेम जैसे मानवीय गुणों के साकार रूप थे। वास्तव में वे भारत में एक असाधारण पुरुष के रूप में अवतरित हुए थे।
In simple words: 'मुक्ति-दूत' में महात्मा गाँधी को एक महान नायक के रूप में दिखाया गया है। वे देशभक्त, हरिजन उद्धारक, हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक, आर्थिक समृद्धि के पोषक, मातृभक्त और अहिंसा की मूर्ति थे। उन्होंने भारत को आज़ादी दिलाई और पद-लोभ से दूर रहे।
🎯 Exam Tip: चरित्र-चित्रण करते समय गाँधीजी की हर विशेषता को एक अलग बिंदु में स्पष्ट करें और उसे काव्य के प्रसंगों से जोड़कर लिखें।
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