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Detailed Chapter 6 कर्ण UP Board Solutions for Class 10 Hindi
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Class 10 Hindi Chapter 6 कर्ण UP Board Solutions PDF
Question 1. 'कर्ण' खण्डकाव्य में कितने सर्ग हैं ? उनके नाम बताइए।
Answer: 'कर्ण' खण्डकाव्य में सात सर्ग हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं:
1. रंगशाला में कर्ण,
2. द्यूतसभा में द्रौपदी,
3. कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान,
4. श्रीकृष्ण और कर्ण,
5. माँ-बेटा,
6. कर्ण-वध,
7. जलांजलि ।।
कर्ण के जीवन की घटनाओं को इन सर्गों में क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया गया है।
In simple words: 'कर्ण' खण्डकाव्य में सात भाग हैं। इन भागों के नाम हैं रंगशाला में कर्ण, द्यूतसभा में द्रौपदी, कर्ण का कवच-कुण्डल दान, श्रीकृष्ण और कर्ण, माँ-बेटा, कर्ण का वध और जलांजलि।
🎯 Exam Tip: जब सर्गों या अध्यायों के नाम पूछे जाएँ, तो उन्हें क्रम से और सही-सही लिखना महत्वपूर्ण है।
Question 2. 'कर्ण खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 15, 16, 17]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। [2012, 13, 15]
या
'कर्ण खण्डकाव्य के कथानक पर प्रकाश डालिए। [2012, 13, 14]
Answer: श्री केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' द्वारा लिखा गया 'कर्ण' खण्डकाव्य सात भागों में बंटा हुआ है। इसकी कहानी महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा कर्ण के जीवन से जुड़ी है।
**प्रथम सर्ग (रंगशाला में कर्ण):** इसमें कर्ण के जन्म से लेकर द्रौपदी के स्वयंवर तक की कहानी है। कुंती जब कुंवारी थी, तब सूर्य की पूजा से उन्हें एक तेजस्वी पुत्र मिला। लोक-लाज के डर से उन्होंने बच्चे को नदी में बहा दिया। सारथी अधिरथ ने उसे पाला और इस तरह वह 'सूत-पुत्र' कहलाया। एक दिन रंगशाला में उसकी वीरता का मजाक उड़ाया गया क्योंकि वह सूत-पुत्र था। दुर्योधन ने पांडवों से जलन के कारण उसे सम्मान दिया, जिससे कर्ण को कुछ राहत मिली। द्रौपदी के स्वयंवर में जब कर्ण ने लक्ष्य भेदा, तो द्रौपदी ने उसे नीची जाति का कहकर अपमानित किया। इस अपमान के बाद भी वह शांत रहा, पर उसकी आँखों में क्रोध था।
**द्वितीय सर्ग (द्यूतसभा में द्रौपदी):** इस भाग में अर्जुन के लक्ष्य भेदने से लेकर द्रौपदी के चीर-हरण तक की घटना है। ब्राह्मण के भेष में अर्जुन ने लक्ष्य भेदकर द्रौपदी से विवाह किया। द्रौपदी पाँचों पांडवों की पत्नी बनी। विदुर के समझाने पर युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का आधा राज्य मिला। युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया, जहाँ दुर्योधन को जल और स्थल का भ्रम हुआ। द्रौपदी ने उस पर हँसा, जिससे दुर्योधन बहुत गुस्सा हो गया। बदला लेने के लिए उसने शकुनि की सलाह पर जुआ खेलने की योजना बनाई और पांडवों को बुलाया। इस जुए में युधिष्ठिर अपना सारा राजपाट, भाइयों और आखिर में द्रौपदी को भी हार गए। कर्ण और दुर्योधन ने इसे बदला लेने का मौका समझा और दुःशासन को द्रौपदी को निर्वस्त्र करने को कहा। कर्ण ने दुःशासन को उकसाया, लेकिन बाद में उसे इस बुरे काम के लिए जीवन भर पछतावा हुआ।
**तृतीय सर्ग (कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान):** इसमें दुर्योधन के वैष्णव-यज्ञ करने से लेकर कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान करने तक की कहानी है। दुर्योधन ने चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए वैष्णव-यज्ञ किया। कर्ण ने कसम खाई थी कि जब तक वह अर्जुन को नहीं मारेगा, तब तक वह किसी भी याचक को कुछ भी माँगेगा, तो दे देगा, मांस-मदिरा नहीं खाएगा और अपने पैर नहीं धुलवाएगा। इंद्र, जो अर्जुन के पिता थे, ब्राह्मण के वेश में कर्ण के पास आए और उसके जन्म से प्राप्त कवच-कुण्डल दान में माँगे। कर्ण ने खुशी-खुशी अपने शरीर से कवच-कुण्डल काटकर दे दिए, जो उसकी जीवन-रक्षा का मजबूत आधार थे।
**चतुर्थ सर्ग (श्रीकृष्ण और कर्ण):** इसमें श्रीकृष्ण द्वारा कौरवों-पांडवों के बीच समझौता कराने और असफल होने पर कर्ण को कौरव पक्ष से युद्ध न करने के लिए समझाने का वर्णन है। श्रीकृष्ण पांडवों की ओर से कौरवों की सभा में न्याय माँगने गए, पर दुर्योधन ने कहा कि युद्ध के अलावा कोई रास्ता नहीं। श्रीकृष्ण ने निराश होकर कर्ण को समझाया कि वह पांडवों का भाई है, इसलिए उन्हें अपने भाइयों का साथ देना चाहिए। कर्ण की आँखों में दुख के आँसू भर आए। उसने कहा कि उसे हमेशा नफरत, अनादर और अपमान ही मिला है। उसने अधिरथ और राधा को अपने माता-पिता के रूप में स्वीकार किया और कुंती को अपनी माँ नहीं माना। उसने कहा कि वह अपने मित्र दुर्योधन के प्रति एहसानफरामोश नहीं हो सकता। उसने श्रीकृष्ण से कहा कि वह युधिष्ठिर को यह न बताएं कि वह उनका बड़ा भाई है, नहीं तो वे राजपाट छोड़ देंगे। कर्ण को इस बात का भी दुख था कि उसने द्रौपदी का भरी सभा में अपमान करवाया था, इसलिए उसने इस शरीर का त्याग करके प्रायश्चित्त करने की बात कही।
**पञ्चम सर्ग (माँ-बेटा):** इस भाग में कुंती द्वारा कर्ण से मिलने जाने का वर्णन है। पांडवों को लेकर चिंतित कुंती कर्ण के आश्रम पहुँचती है। कुंती के कुछ कहने से पहले ही कर्ण ने अपने पूरे जीवन के दुख को माँ के सामने रख दिया। उसने कुंती से कहा कि माँ होकर भी तुमने उसके साथ धोखा किया। उसने यह भी कहा कि वह दुर्योधन का आभारी है और उसे धोखा नहीं दे सकता। कर्ण ने अर्जुन के अलावा किसी भी पांडव को न मारने का वचन दिया।
**षष्ठ सर्ग (कर्ण-वध):** इसमें महाभारत युद्ध की शुरुआत से लेकर कर्ण की मृत्यु तक की कहानी है। युद्ध शुरू होने के पाँच दिन बाद भीष्म पितामह को कौरवों का सेनापति बनाया गया, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि वे कर्ण का सहयोग नहीं लेंगे। भीष्म के घायल होकर शर-शय्या पर गिरने के बाद कर्ण उनसे मिलने गए, जहाँ भीष्म ने उसे दानवीर, धर्मवीर और महावीर बताया। भीष्म ने उसे पांडवों से मिलने को कहा, पर कर्ण ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वह अर्जुन को मारने का पूरा प्रयास करेगा। द्रोणाचार्य के बाद कर्ण कौरव सेना के सेनापति बने। सोलहवें दिन युद्ध में कर्ण ने घटोत्कच को अपनी अमोघ शक्ति से मारा। अर्जुन पर प्रयोग करने के लिए रखी यह शक्ति व्यर्थ हो गई। अचानक कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया। जब वह पहिया निकाल रहा था, तभी श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने निहत्थे कर्ण का वध कर दिया।
**सप्तम सर्ग (जलांजलि):** युद्ध खत्म होने के बाद युधिष्ठिर द्वारा कर्ण को जलांजलि देने की कहानी है। कर्ण की मृत्यु से कौरव सेना शक्तिहीन हो गई और अस्त-व्यस्त हो गई। कर्ण के बाद शल्य और दुर्योधन भी मारे गए। युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को जलदान दिया। तब कुंती ने ममता से भरकर युधिष्ठिर से कर्ण को बड़ा भाई मानकर जलदान करने का आग्रह किया। युधिष्ठिर के पूछने पर कुंती ने कर्ण के जन्म का रहस्य बताया। यह जानकर कि कर्ण उनके बड़े भाई थे, युधिष्ठिर दुखी हुए और उन्होंने कुंती को इस रहस्य को छिपाने के लिए दोषी ठहराया, जिसके कारण कर्ण को जीवन भर अपमान सहना पड़ा। युधिष्ठिर के इस दुखद भाव के साथ ही खण्डकाव्य समाप्त हो जाता है। यह कथा जीवन के कई महत्वपूर्ण सीख देती है।
In simple words: 'कर्ण' खण्डकाव्य कर्ण के पूरे जीवन की कहानी बताता है। यह सात भागों में बंटा है। इसमें कर्ण के जन्म से लेकर द्रौपदी के स्वयंवर तक, फिर द्यूतसभा में द्रौपदी के अपमान और कर्ण के कवच-कुण्डल दान की बात है। इसके बाद श्रीकृष्ण और कर्ण की बातचीत, कुंती और कर्ण की मुलाकात, कर्ण का वध और आखिर में युधिष्ठिर द्वारा कर्ण को जलांजलि देने की कहानी है। यह दिखाता है कि कर्ण को जीवन भर कई दुख और अपमान सहने पड़े।
🎯 Exam Tip: खण्डकाव्य की कथावस्तु लिखते समय हर सर्ग (भाग) की मुख्य घटनाओं को संक्षेप में क्रमवार बताना चाहिए, जिससे पूरी कहानी समझ में आ जाए।
Question 3. 'कर्ण' काव्य के प्रथम सर्ग (रंगशाला में कर्ण) की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश लिखिए।
Answer: श्री केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' द्वारा लिखा गया 'कर्ण' खण्डकाव्य सात भागों में बंटा है। इन भागों का नाम कहानी के आधार पर रखा गया है। यह महाभारत के वीर कर्ण के जीवन पर आधारित है।
प्रथम सर्ग का नाम 'रंगशाला में कर्ण' है। इस भाग में कर्ण के जन्म से लेकर द्रौपदी के स्वयंवर तक की कहानी संक्षेप में बताई गई है। कुंती जब कुंवारी थी, तब सूर्य की पूजा के कारण उन्हें एक बहुत तेजस्वी पुत्र मिला। लोक-लाज और परिवार की मर्यादा के डर से उन्होंने उस बच्चे को नदी में बहा दिया। निसंतान सारथी अधिरथ उस बच्चे को अपने घर ले आए और अपना पुत्र मानकर पाला। उन्हें यह नहीं पता था कि यह बालक साक्षात् सूर्य का तेज लिए हुए है और महाभारत का अजेय वीर, कर्मवीर और दानवीर कर्ण बनेगा। अधिरथ द्वारा पाले जाने के कारण वह 'सूत-पुत्र' कहलाया और अपनी पत्नी राधा के पुत्र के रूप में 'राधेय' भी कहलाया।
एक दिन वह बालक राजभवन की रंगशाला में पहुँचा। वहाँ सूत-पुत्र होने के कारण उसकी बहादुरी का मजाक उड़ाया गया। भले ही वह सुंदर और प्यारा बालक था, पर अर्जुन ने उसे 'सूत-पुत्र' कहकर अपमानित किया। कौरव-पांडव राजकुमारों के गुरु कृपाचार्य भी उससे नफरत करते थे। दुर्योधन कर्ण के वीर रूप और तेज से बहुत प्रभावित हुआ। पांडवों से जलन रखने वाले दुर्योधन ने सोचा कि कर्ण को अपनी तरफ मिलाने से भविष्य में पांडवों को कमजोर किया जा सकेगा। इसलिए स्वार्थवश दुर्योधन ने उसे प्यार और सम्मान दिया। इससे कर्ण के दुखी मन को कुछ सहारा और ताकत मिली।
द्रौपदी के स्वयंवर में बहुत से वीर धनुर्धर आए थे और स्वयंवर की शर्त के अनुसार मछली की आँख को भेदना था। जब कर्ण मछली की आँख भेदने के लिए उठा, तब द्रौपदी ने उसे नीची जाति का कहकर अपमानित किया और कहा:
सूत-पुत्र के साथ मेरा गठबंधन हो सकता। क्षत्राणी का प्रेम न अपने गौरव को खो सकता॥
इस प्रकार दूसरी बार एक नारी द्वारा अपमानित होकर भी वह चुप रहा, पर उसकी आँखों से क्रोध की चिंगारी निकलने लगी। उसने सूर्य की ओर गुस्से से देखकर मन-ही-मन अपने अपमान का बदला लेने की कसम खाई। यह घटना कर्ण के जीवन में एक बड़ा मोड़ थी।
In simple words: प्रथम सर्ग में कर्ण के जन्म और बचपन की कहानी है। कुंती ने उसे नदी में बहा दिया और सारथी अधिरथ ने उसे पाला, जिससे वह सूत-पुत्र कहलाया। रंगशाला में अर्जुन ने उसका अपमान किया। दुर्योधन ने उसे अपना दोस्त बनाया। द्रौपदी के स्वयंवर में द्रौपदी ने भी उसे नीची जाति का कहकर अपमानित किया, जिससे कर्ण बहुत दुखी हुआ और उसने बदला लेने की ठान ली।
🎯 Exam Tip: प्रथम सर्ग के सारांश में कर्ण के जन्म, पालन-पोषण, शुरुआती अपमान और दुर्योधन से उसकी दोस्ती के मुख्य बिंदुओं पर ध्यान दें।
Question 4. 'कर्ण' खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग (द्युतसभा में द्रौपदी) का सारांश लिखिए। [2010, 13, 14]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथा अपनी भाषा में लिखिए।
Answer: द्वितीय सर्ग में अर्जुन द्वारा मछली की आँख भेदने से लेकर द्रौपदी के चीर-हरण तक की कहानी बताई गई है। द्रौपदी के स्वयंवर में ब्राह्मण के भेष में आए अर्जुन ने मछली की आँख भेदकर द्रौपदी से विवाह कर लिया। जब यह रहस्य खुला, तो दूसरे राजा जलने लगे, पर द्रौपदी अर्जुन को पाकर खुश थी। द्रौपदी पाँचों पांडवों की पत्नी बनकर हस्तिनापुर आ गई। विदुर ने युधिष्ठिर को समझाया, जिससे उन्हें हस्तिनापुर का आधा राज्य मिला।
युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। यज्ञ में दुर्योधन को बुलाया गया, जो पांडवों के यश और उनके राज्य की व्यवस्था देखकर ईर्ष्या से जल रहा था। दुर्योधन जैसे ही सभाभवन में आया, उसे वहाँ जहाँ जल था, वहाँ जमीन का और जहाँ जमीन थी, वहाँ जल का भ्रम हुआ। इस पर द्रौपदी ने उसका मजाक उड़ाया, जिससे दुर्योधन बहुत क्रोधित हुआ।
वापस आकर दुर्योधन ने बदला लेने के लिए शकुनि की सलाह से जुआ खेलने की योजना बनाई और पांडवों को जुआ खेलने के लिए बुलाया। इस जुए में युधिष्ठिर अपना सारा राजपाट, अपने भाइयों और अंत में द्रौपदी को भी हार गए। दुर्योधन के कहने पर दुःशासन द्रौपदी को भरी सभा में बाल पकड़कर घसीटता हुआ लाया। द्रौपदी ने बहुत विनती की, पर भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, पांडव और सभी सभासद चुप रहे। कर्ण और दुर्योधन की खुशी का ठिकाना न था। कर्ण ने बदला लेने का यह सही मौका समझा और दुःशासन को उकसाया तथा द्रौपदी को निर्वस्त्र करने को कहा। विकर्ण को यह अन्याय सहन नहीं हुआ और उसने इसका विरोध किया, पर कर्ण को अपना बदला लेना था। उसने विकर्ण से कहा, "यह कुलवधू नहीं, दासी है। पाँच पतियों वाली कुलवधू कैसी?" उसने दुःशासन को आदेश दिया:
दुःशासन मत ठहर, वस्त्र हर ले कृष्णा के सारे । वह पुकार ले रो-रोकर, चाहे वह जिसे पुकारे ॥
कर्ण ने दुःशासन को इस तरह उकसाया, लेकिन बाद में उसे इस बुरे काम के लिए जीवन भर पछतावा होता रहा। यह घटना महाभारत के युद्ध का एक बड़ा कारण बनी।
In simple words: दूसरे भाग में द्रौपदी के स्वयंवर के बाद जुए की कहानी है। दुर्योधन को द्रौपदी पर गुस्सा आया था, इसलिए उसने पांडवों को जुए में हराकर द्रौपदी का अपमान करवाया। कर्ण ने भी दुःशासन को द्रौपदी को निर्वस्त्र करने के लिए उकसाया, पर बाद में उसे इस बात का बहुत पछतावा हुआ।
🎯 Exam Tip: द्वितीय सर्ग की कहानी में द्रौपदी के स्वयंवर, दुर्योधन का अपमान, जुआ और द्रौपदी के चीर-हरण की घटनाओं को विस्तार से और क्रम से बताएं।
Question 5. 'कर्ण' खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग (कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान) की कथा का सारांश लिखिए। [2009, 10, 12, 14, 15, 17, 18]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान के प्रसंग को लिखिए। [2013, 15]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की दानशीलता का वर्णन कीजिए। [2011, 12, 13, 14, 17]
Answer: तृतीय सर्ग में दुर्योधन द्वारा वैष्णव-यज्ञ करने से लेकर कर्ण द्वारा अर्जुन-वध की प्रतिज्ञा और कवच-कुण्डल दान करने तक की कहानी है। दुर्योधन ने चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए वैष्णव-यज्ञ किया। कर्ण ने प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक वह अर्जुन को नहीं मारेगा, तब तक किसी भी याचक को कुछ भी माँगेगा, वह उसे दान में दे देगा, मांस-मदिरा का सेवन नहीं करेगा, अपने पैर नहीं धुलवाएगा और न ही शांति से बैठेगा। युधिष्ठिर को इस प्रतिज्ञा से चिंता हुई, जबकि दुर्योधन बहुत खुश था। कर्ण के पास जन्म से मिले कवच-कुण्डल थे, जिनके रहते कोई उसे नुकसान नहीं पहुँचा सकता था। अर्जुन इंद्र के पुत्र थे, इसलिए इंद्र को अपने पुत्र के प्राणों की चिंता हुई। इंद्र ब्राह्मण का रूप बनाकर कर्ण के पास गए और कवच-कुण्डल दान में माँगे।
सूर्य ने अपने पुत्र कर्ण को सपने में इंद्र की इस चाल के प्रति सावधान किया था, फिर भी दानवीर कर्ण ने उनसे साफ-साफ कहा:
ब्राह्मण माँगे दान, कर्ण ले निज हाथों को मोड़ ।
कोई भी याचक बनकर यदि मुझसे मेरे प्राण भी माँगे तो वह भी मेरे लिए अदेय नहीं। कर्ण ने इंद्र की माँग पर जन्म से प्राप्त अपने चमत्कारी कवच-कुण्डल खुशी-खुशी अपने शरीर से काटकर दे दिए। यही कवच-कुण्डल कर्ण की जीवन-रक्षा के मजबूत आधार थे। कर्ण ने अपनी दानवीरता के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया, जिससे उसकी ख्याति और भी बढ़ गई।
In simple words: इस भाग में कर्ण की दानवीरता दिखाई गई है। इंद्र ने ब्राह्मण बनकर कर्ण से उसके कवच-कुण्डल दान में माँगे। सूर्य ने कर्ण को चेतावनी दी थी, फिर भी कर्ण ने अपनी दान देने की प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए अपने जीवन-रक्षक कवच-कुण्डल खुशी-खुशी इंद्र को दे दिए।
🎯 Exam Tip: कर्ण की दानशीलता का वर्णन करते समय कवच-कुण्डल दान की घटना को विस्तार से समझाएँ और कर्ण की प्रतिज्ञा को भी बताएं।
Question 6. 'कर्ण' खण्डकाव्य के 'श्रीकृष्ण और कर्ण' नामक चतुर्थ सर्ग की कथा (कथावस्तु या कथानक) का सारांश लिखिए। [2012, 13, 14, 15, 18]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग की कथा लिखिए। [2018]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण और कर्ण के बीच हुए वार्तालाप का उद्धरण देते हुए चतुर्थ सर्ग की कथा का संक्षेप में वर्णन कीजिए । [2011, 12, 17]
Answer: चतुर्थ सर्ग में श्रीकृष्ण द्वारा कौरव-पांडवों के बीच समझौता कराने और असफल होने पर कर्ण को कौरव पक्ष से युद्ध न करने के लिए समझाने के प्रयासों का वर्णन है। श्रीकृष्ण पांडवों की ओर से कौरवों की सभा में न्याय माँगने गए, पर दुर्योधन ने बार-बार कहा कि युद्ध के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। श्रीकृष्ण निराश होकर कर्ण को कुछ दूर तक रथ में अपने साथ लाते हैं और उसे समझाते हैं कि तुम पांडवों के भाई हो, इसलिए तुम्हें अपने भाइयों का साथ देना चाहिए। उन्होंने कहा, "तुम धर्मप्रिय, बुद्धिमान और धनुर्धर हो। तुम पापी और दुराचारी का साथ मत दो। तुम मेरे साथ पांडवों के पक्ष में चलो और सम्राट का पद प्राप्त करो।"
कर्ण की आँखों में दुख के आँसू उमड़ आए। वह बोला कि उसे आज तक नफरत, अनादर और अपमान ही मिला है। उसने कहा, "मैं कुंती का पुत्र हूँ।" यह बात कहने के लिए कुंती को कई मौके मिले, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
यों न उपेक्षित होता मैं, यों भाग्य न मेरा सोता । स्नेहमयी जननी ने यदि रंचक भी चाहा होता ॥ घृणा, अनादर, तिरस्कृत, यह मेरी करुण कहानी । देखो, सुनो कृष्ण ! क्या कहता इन आँखों का पानी ।।।
कर्ण आगे कहता है कि आज अधिरथ उसके पिता और राधा उसकी माँ हैं। वह कुंती को अपनी माँ कैसे मान ले? वह अपने मित्र दुर्योधन के प्रति एहसानफरामोश नहीं हो सकता, जिसने उस पर बहुत उपकार किया है। उसने श्रीकृष्ण से कहा, "आप अर्जुन को महावीर, अदम्य और अजेय कहते हैं, लेकिन अर्जुन की वीरता आपके बल से ही है, नहीं तो वह कुछ भी नहीं। मैं जानता हूँ, जिस तरफ आप हैं, जीत उसी तरफ होगी। अर्जुन से जाकर कह देना कि अब मेरे पास कवच और कुण्डल नहीं हैं, पर मेरा पुरुषार्थ और आत्मबल ही मुझे यह बलिदान देने के लिए प्रेरित कर रहा है। आप यह बात कभी युधिष्ठिर से मत कहिएगा कि मैं उनका बड़ा भाई हूँ, नहीं तो वे राजपाट छोड़ देंगे। दुर्योधन का आभारी होने के कारण मैं सब कुछ उसके चरणों पर अर्पित कर दूंगा।"
कर्ण ने यह भी कहा कि उसे बहुत दिनों से आत्मग्लानि रही है कि द्रौपदी का भरी सभा में अपमान हुआ था और उसने ही यह बुरा काम करवाया था। इसलिए वह इस शरीर का त्याग करके अपने इस बुरे काम का प्रायश्चित्त करेगा। यह बातचीत युद्ध के पहले की गंभीर स्थितियों को दर्शाती है।
In simple words: चौथे भाग में श्रीकृष्ण ने कर्ण को पांडवों का पक्ष लेने के लिए समझाया, पर कर्ण ने दुर्योधन के प्रति अपनी दोस्ती और आभार के कारण मना कर दिया। कर्ण ने अपने जीवन के अपमानों का जिक्र किया और बताया कि कैसे वह कुंती को अपनी माँ नहीं मान सकता। उसने अपनी प्रतिज्ञा दोहराई कि वह अर्जुन के अलावा किसी पांडव को नहीं मारेगा, और कहा कि उसे द्रौपदी के अपमान का पछतावा है।
🎯 Exam Tip: श्रीकृष्ण और कर्ण के संवाद में कर्ण के आत्मसम्मान, मित्रता के प्रति निष्ठा और अपने अपमानों की वेदना को स्पष्ट रूप से दर्शाना चाहिए।
Question 7. 'कर्ण' खण्डकाव्य के माँ-बेटा' नामक पञ्चम सर्ग की कथा का सारांश अथवा कथानक लिखिए। [2010, 12, 15, 18]
या
'कर्ण खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण तथा कुन्ती के वार्तालाप का वर्णन कीजिए। [2013]
Answer: पाँचवें सर्ग में कुंती द्वारा कर्ण से मिलने जाने का वर्णन है। महाभारत का युद्ध शुरू होने में केवल पाँच दिन बचे थे। पांडवों के लिए चिंतित कुंती बहुत सोच-विचारकर कर्ण के आश्रम पहुँचती है। कुंती के कुछ कहने से पहले ही कर्ण ने अपने पूरे जीवन की पीड़ा को सामने रखते हुए 'सूत-पुत्र राधेय' कहकर उन्हें प्रणाम किया। कुंती की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कहा कि तुम कुंती-पुत्र और पांडवों के बड़े भाई हो। आज अपने भाइयों के साथ मिलकर दुर्योधन के छल-कपट को तोड़ दो। कर्ण ने अपने हृदय की ज्वाला माँ के सामने स्पष्ट कर दी:
क्यों तुमने उस दिन न कही, सबके सम्मुख ललकार। कर्ण नहीं है सूत-पुत्र, वह भी है राजकुमार ॥
कुंती के सामने ही कर्ण के राजभवन में हुए अपमान, स्वयंवर-सभा में हुए अपमान और हर जगह सूत-पुत्र कहलाने की उसकी पीड़ा खुलकर सामने आ गई। वह बोला कि जब मेरा अपमान हो रहा था, तब तुम्हारा पुत्र-प्रेम कहाँ गया था? मैं अपने मित्र दुर्योधन का आभारी हूँ और उसे धोखा नहीं दे सकता। कर्ण की बातें सुनकर कुंती की आँखों से आँसू बहने लगे। वह चुप खड़ी थी। कर्ण ने कहा कि भले ही भाग्य मेरे साथ बहुत बुरा कर रहा है, फिर भी यह बहुत अजीब होगा कि एक माँ अपने बेटे के द्वार से खाली हाथ लौट जाए। उसने कहा कि मैंने केवल अर्जुन को ही मारने की प्रतिज्ञा की है। उसने कुंती को वचन दिया कि वह अर्जुन के अलावा किसी अन्य पांडव को नहीं मारेगा। उसने कहा कि अगर अर्जुन उसके हाथों मारा गया, तो कुंती अपनी इच्छा से उसकी जगह किसी और को भर सकती है; और अगर वह खुद मारा गया, तो भी कुंती पाँच पांडवों की माँ बनी रहेगी। यह इच्छित वरदान पाकर कुंती लौट गई, पर कर्ण के मन में विचारों का तूफान उमड़ पड़ा। यह मुलाकात माँ और बेटे के बीच के गहरे रिश्तों और मजबूरियों को दिखाती है।
In simple words: इस भाग में कुंती कर्ण से मिलने जाती है ताकि वह पांडवों के साथ हो जाए। कर्ण अपने बचपन के अपमानों का जिक्र करता है और कुंती से कहता है कि उसने उसे समय पर क्यों नहीं अपनाया। कर्ण दुर्योधन के प्रति अपनी दोस्ती नहीं तोड़ना चाहता, पर कुंती को वचन देता है कि वह अर्जुन के अलावा किसी और पांडव को नहीं मारेगा।
🎯 Exam Tip: कुंती और कर्ण के संवाद में उनके भावनात्मक द्वंद्व, कर्ण के आत्मसम्मान और कुंती की पीड़ा को दर्शाते हुए मुख्य बातों को बताएं।
Question 8. 'कर्ण' खण्डकाव्य के ‘कर्ण-वध' नामक षष्ठ सर्ग की कथा को संक्षेप में लिखिए। [2011, 14, 15]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए । [2016]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य की सबसे प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए। [2010, 12]
या
“कर्ण अपने प्रण व धुन का पक्का था" खण्डकाव्य के आधार पर इसकी पृष्टि कीजिए। [2014]
Answer: इस सर्ग में महाभारत के युद्ध की शुरुआत से लेकर कर्ण की मृत्यु तक की कहानी है। पाँच दिन बाद महाभारत का युद्ध शुरू हुआ। भीष्म पितामह को कौरवों का सेनापति बनाया गया। उन्होंने यह शर्त रखी थी कि वे कर्ण का सहयोग नहीं लेंगे, क्योंकि वे उसे कपटी, अत्याचारी, अभिमानी और अधिरथी का पुत्र मानते थे। कर्ण ने उनकी प्रतिज्ञा सुनकर प्रण लिया कि जब तक भीष्म पितामह जीवित रहेंगे, वह शस्त्र ग्रहण नहीं करेगा, नहीं तो 'सूर्य-पुत्र' नहीं कहलाएगा। भीष्म प्रतिदिन अकेले दस हजार वीरों को मारते थे, पर दसवें दिन बाणों से घायल होकर शर-शय्या पर गिर पड़े। कर्ण के भीष्म पितामह के पास पहुँचने पर उन्होंने कर्ण को जी भर कर देखा और उसे जल के भंवर में नाव चलाने वाला, दानवीर, धर्मवीर और महावीर बताया।
घूण्य काल-जल में बस तू ही नौका खेने वाला । दानवीर तू, धर्मवीर तू, तू सम्बल आरत का। जो न कभी बुझ सकता, वह दीप महाभारत का।
भीष्म पितामह ने कर्ण से कहा कि मैंने तुम्हें सूत-पुत्र कहकर तिरस्कार किया, सिर्फ इसलिए ताकि तुम इस युद्ध से दूर रहो और दुर्योधन अपने इस बुरे काम में सफल न हो सके। उन्होंने फिर कहा कि यह शक छोड़ दो कि तुम सूत-पुत्र हो। तुम भी अर्जुन की तरह कुंती के ही पुत्र हो। हमारी इच्छा है कि तुम पांडवों से मिल जाओ। कर्ण ने अपनी प्रतिज्ञा का हवाला देते हुए ऐसा करने से मना कर दिया। उसने भीष्म पितामह से कहा कि विधि का लिखा कौन बदल सकता है? मेरा मन कहता है कि मैं अपनी मृत्यु की कहानी खुद लिख रहा हूँ, पर मैं अपना साहस नहीं छोडूंगा। भले ही कृष्ण उस तरफ हों, मैं अर्जुन को मारने का हर संभव प्रयास करूंगा। यह सुनकर भीष्म पितामह ने कर्ण की जय-जयकार की और उसके रास्ते से सभी बुराइयों को दूर करने की कामना की। उन्होंने उसे शस्त्र उठाकर दुर्योधन के सपने को पूरा करने के लिए कहा।
भीष्म के बाद द्रोणाचार्य को सेनापति बनाया गया। पंद्रहवें दिन वे भी वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध के सोलहवें दिन कर्ण कौरव दल के सेनापति बने। उनकी भयानक बाण-वर्षा से पांडव विचलित होने लगे। तभी भीम के पुत्र घटोत्कच ने अपनी मायावी शक्तियों से आकाश में युद्ध करते हुए कौरव सेना पर हमला किया। घटोत्कच के भीषण प्रहार से कौरव सेना में हाहाकार मच गया। उन्होंने रक्षा के लिए कर्ण को पुकारा। कर्ण ने अपनी अमोघ शक्ति का प्रयोग करके घटोत्कच को मार डाला। वह इस शक्ति का प्रयोग केवल अर्जुन पर करना चाहता था, पर परिस्थितियों के कारण उसे घटोत्कच पर प्रयोग करना पड़ा। कर्ण को लगा कि यह सब कृष्ण की माया है और अब अर्जुन की जीत निश्चित है। कुछ ही दिन शेष थे। अचानक कर्ण के रथ का पहिया पृथ्वी में धंस गया। सारथी के बहुत प्रयास के बाद भी पहिया नहीं निकला, तब कर्ण रथ से उतरकर खुद पहिया निकालने लगा। तभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रहार करने का आदेश दिया, क्योंकि युद्ध में धर्म-अधर्म का विचार किए बिना शत्रु को हराना चाहिए। आदेश मिलते ही अर्जुन ने निहत्थे कर्ण पर बाण-प्रहार करके उसका वध कर दिया। कर्ण की मृत्यु पर श्रीकृष्ण भी आँसुओं से रथ से उतरकर "कर्ण! हाय वसुसेन वीर" कहकर दौड़ पड़े। यह सर्ग कर्ण की वीरता, प्रतिज्ञा और अंततः उसकी दुखद मृत्यु को दर्शाता है।
In simple words: छठे भाग में महाभारत युद्ध में कर्ण के वध की कहानी है। भीष्म पितामह के घायल होने के बाद कर्ण सेनापति बने। उन्होंने घटोत्कच को मारा, पर उनका रथ जमीन में धंस गया। निहत्थे कर्ण पर श्रीकृष्ण के आदेश पर अर्जुन ने हमला किया और कर्ण का वध हो गया। यह भाग कर्ण की प्रतिज्ञाओं और उसके दुखद अंत को दर्शाता है।
🎯 Exam Tip: कर्ण-वध सर्ग में भीष्म की प्रतिज्ञा, कर्ण की अपनी प्रतिज्ञा, घटोत्कच का वध, रथ का पहिया धंसना और निहत्थे कर्ण के वध के क्रमबद्ध विवरण पर ध्यान दें।
Question 9. 'कर्ण खण्डकाव्य के जलांजलि' नामक सप्तम सर्ग की कथा का सार लिखिए। [2009, 14]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के सम्बन्ध में युधिष्ठिर और कुन्ती के मध्य हुए वार्तालाप को अपने शब्दों में लिखिए। [2010]
या
ऐसा कीर्तिवान भाई पा होता कौन न धन्य । किन्तु आज इस पृथ्वी पर, हतभाग्य न मुझ-सा अन्य ।। उक्त पंक्तियों में व्यक्त वेदना का भाव पठित खण्डकाव्य के आधार पर स्पष्ट कीजिए। [2009, 10]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर सप्तम सर्ग का मार्मिक चित्रांकन कीजिए। [2011]
Answer: सप्तम सर्ग में युद्ध खत्म होने के बाद युधिष्ठिर द्वारा कर्ण को जलांजलि देने की कहानी है। कर्ण की वीरगति प्राप्त करते ही कौरव सेना का मनोबल टूट गया। वे शक्तिहीन हो गए और सेना अस्त-व्यस्त हो गई। कर्ण के बाद शल्य सेनापति बने, पर उन्हें भी युधिष्ठिर ने मार दिया। अंत में गदा युद्ध में भीम द्वारा दुर्योधन को भी मार दिया गया। युद्ध खत्म होने के बाद युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को जलदान दिया, तभी कुंती की ममता उमड़ पड़ी और उसने युधिष्ठिर से कर्ण को सबसे बड़े भाई के रूप में जलदान करने का आग्रह किया। युधिष्ठिर उसके इस आग्रह पर हैरान रह गए।
युधिष्ठिर के पूछने पर कुंती ने कर्ण के जन्म और उसे नदी में बहाए जाने का रहस्य बताया। उसने यह भी बताया कि वह कर्ण से मिलकर पहले ही यह रहस्य स्पष्ट कर चुकी है। यह जानकर कि कर्ण उनके बड़े भाई थे, युधिष्ठिर का मन भर आया और वे बोले, "माँ! वे हमारे बड़े भाई थे। कर्ण जैसा महान, दानवीर, दृढ़ प्रतिज्ञ, दृढ़-चरित्र, युद्धवीर और अद्वितीय तेजस्वी भाई पाकर कौन धन्य नहीं होता। पर आज हमारे जैसा दुर्भाग्यशाली और कौन है?" उन्होंने कठोर शब्दों में कुंती को इस बात के लिए दोषी ठहराया और कहा कि तुम्हारे द्वारा इस रहस्य को छिपाने के कारण ही कर्ण जीवन भर अपमान का घूँट पीते रहे। उन्होंने बड़े आदर से कर्ण को याद करते हुए जलदान किया और अपने मन की पीड़ा इस प्रकार व्यक्त की:
मानव को मानव न मिला, धरती को धृति धीर । भूलेगा इतिहास भला, कैसे यह गहरी पी ॥
युधिष्ठिर के हृदय की इस करुण वेदना के साथ ही खण्डकाव्य समाप्त हो जाता है। यह सर्ग रिश्तों की जटिलता और युद्ध के बाद के पश्चाताप को दर्शाता है।
In simple words: सातवें भाग में युद्ध के बाद युधिष्ठिर द्वारा कर्ण को जल चढ़ाने की कहानी है। कुंती युधिष्ठिर से कहती है कि कर्ण उसका बड़ा भाई है। यह जानकर युधिष्ठिर बहुत दुखी होते हैं और कुंती को दोष देते हैं कि उसने यह रहस्य क्यों छिपाया। वह कर्ण को एक महान योद्धा मानते हैं और दुख के साथ उसे याद करते हुए खण्डकाव्य खत्म हो जाता है।
🎯 Exam Tip: सप्तम सर्ग में कुंती द्वारा रहस्य खोलने, युधिष्ठिर की प्रतिक्रिया और कर्ण के प्रति उनकी वेदना को भावनात्मक ढंग से प्रस्तुत करें।
Question 10. 'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर नायक कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्र उदघाटित कीजिए।
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए और बताइए कि उन्हें जीवनभर अपने किस कृत्य के प्रति ग्लानि रही ? [2014]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की वीरता पर सोदाहरण प्रकाश डालिए। [2015]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के उत्कृष्ट व्यक्तित्व की तीन या चार चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की दानशीलता पर प्रकाश डालते हुए उसके अन्य गुणों पर प्रकाश डालिए।
या
कर्ण सच्चे दानवीर, युद्धवीर तथा प्राणवीर थे।” इस कथन की पुष्टि कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कीजिए। [2011]
Answer: श्री केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' द्वारा रचित 'कर्ण' खण्डकाव्य का नायक महाभारत का अजेय योद्धा कर्ण है। इस काव्य में कर्ण के जन्म से लेकर मृत्यु तक की मुख्य घटनाओं का वर्णन है। कवि का उद्देश्य कर्ण की वीरता और उसके जीवन के दुखद पक्ष को बताना है। उसके चरित्र की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
(1) जन्म से परित्यक्त-कुंवारी कुंती ने सूर्य की पूजा के बाद सूर्य के तेजस्वी अंश को पुत्र के रूप में प्राप्त किया था। कुंती द्वारा त्यागे जाने के कारण वह माँ के प्यार से वंचित रहा और 'सूत-पुत्र' कहलाने के कारण जीवन भर अपमान सहता रहा। यह जानकर कि वह कुंती-पुत्र है, जिसे कुंती ने लोक-समाज के लिए अपने दिल पर पत्थर रखकर त्याग दिया था, उसकी पीड़ा और भी बढ़ गई।
(2) पग-पग पर अपमानित-वीर कर्ण समाज में 'सूत-पुत्र' के रूप में जाना गया। राजभवन में राजकुमार अर्जुन ने उसे 'राधेय', 'सूत-पुत्र' कहकर अपमानित किया। स्वयंवर-सभा में द्रौपदी ने मछली की आँख भेदने से रोककर उसे अपमानित किया। माता कुंती ने भी इस अपमान के समय उसे नहीं अपनाया। ऐसे अपमानों से उसका हृदय बदला लेने की आग से भर गया। वह श्रीकृष्ण से अपने हृदय की पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहता है:
घृणा, अनादर, तिरस्कार, यह मेरी करुण कहानी। देखो, सुनो कृष्ण क्या कहता, इन आँखों का पानी ॥
(3) अद्वितीय तेजवान-कर्ण सूर्य-पुत्र था, इसलिए स्वभाव से बहुत तेजस्वी था। उसका कमल जैसा मुख राजकुमारों की शोभा को हरण करने वाला था। युधिष्ठिर 'जलांजलि' सर्ग में कहते हैं:
अद्वितीय था तेज, और अनुपम था उनका ओज ।। हाय कहाँ मैं पाऊँ उनका पावन चरण-सरोज ।
कुंती उसके तेजस्वी व्यक्तित्व को देखकर हैरान और भावुक हो गई थी। वह अपने पुत्र की सुंदरता को देखती रह जाती थी। कवि ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है:
एक सूर्य था उगा गगन में ज्योतिर्मय छविमान । और दूसरा खड़ा सामने पहले का उपमान।।
(4) स्नेह और ममता का भूखा-कर्ण जीवन भर अपनी माता, भाई और गुरुजनों का प्यार नहीं पा सका। उसे केवल तिरस्कार और अपमान ही मिला। उसका हृदय हमेशा माँ की ममता पाने के लिए तरसता रहा। वह कुंती से कहता है:
यों न उपेक्षित होता मैं, यों भाग्य न मेरा सोता। स्नेहमयी जननी ने यदि रंचक भी चाहा होता ॥
(5) अद्वितीय दानी-कर्ण अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था। उसने प्रण किया था कि जब तक वह अर्जुन का वध नहीं करेगा, तब तक जो भी याचक उससे जो कुछ माँगेगा, वह उसे दे देगा। उसके पिता सूर्य ने उसे समझाया कि कपटी इंद्र को अपने कवच-कुण्डल देकर अपनी शक्ति कमजोर न करो, पर उसने खुशी-खुशी इंद्र को अपने कवच-कुण्डल दे दिए। वह कहता है कि भले ही धरती काँप उठे, आकाश फट जाए; पर कर्ण अपनी दानशीलता से कभी पीछे नहीं हट सकता।
चाहे पलट जाय पलभर में महाकाल की धारा । वीर कर्ण का किन्तु न झूठा हो सकता प्रण प्यारा॥
कवच-कुण्डल देकर उसने खुद अपनी मृत्यु को बुलाया, पर अपनी दानशीलता नहीं छोड़ी।
(6) दृढ़ प्रतिज्ञ-कर्ण ने जो भी प्रतिज्ञा ली, उसे पूरा किया। अर्जुन का वध होने तक उसने दान का व्रत लिया था, जिसे उसने अपने कवच-कुण्डल देकर भी पूरा किया। कुंती को चारों भाइयों की रक्षा का वचन दिया था, उसे भी उसने युद्ध के समय में निभाया।
किन्तु न अपना प्रण भूले थे, वीर कर्ण पलभर भी । भीम नकुल का धर्मराज का, किया नवध पाकर भी॥
(7) आत्मविश्वासी-कर्ण को अपने शौर्य और पराक्रम पर पूरा विश्वास था। वह कृष्ण, कुंती और भीष्म से बात करते हुए आत्मविश्वास के साथ अर्जुन का वध करने को कहता है। उसने कृष्ण को स्पष्ट कह दिया था कि भले ही अब उसके पास कवच-कुण्डल नहीं हैं, पर उसमें आत्मबल और आत्मविश्वास अब भी है।
(8) अजेय योद्धा-कर्ण बहुत पराक्रमी और अजेय योद्धा था। उसके युद्ध-कौशल से सभी परिचित थे। अर्जुन के वध की उसकी प्रतिज्ञा सुनकर दुर्योधन खुश हुआ और पांडवों को भय हुआ। इंद्र भी कर्ण के पराक्रम के कारण उसके द्वारा अर्जुन के वध की प्रतिज्ञा से चिंतित थे। कृष्ण भी कर्ण की युद्ध-कुशलता से परिचित थे; इसलिए अर्जुन को निहत्थे कर्ण पर धर्म-विरुद्ध प्रहार करने का आदेश देते हैं। कर्ण के पराक्रम और शौर्य की प्रशंसा शर-शय्या पर पड़े भीष्म पितामह भी करते हैं।
(9) प्रतिशोध की भावना से दग्ध-स्वाभिमानी और वीर कर्ण को कदम-कदम पर अपमान और तिरस्कार सहना पड़ा। उसने प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर द्रौपदी को निर्वस्त्र करने के लिए दुःशासन को उकसाया। राजभवन में हुए अपमान के कारण ही उसने अर्जुन का वध करने का निश्चय किया। पांडवों का भाई होने पर भी प्रतिशोध की भावना ने उसकी स्नेह-भावना को जागने नहीं दिया।
(10) विवेकी और कृतज्ञ-कृष्ण ने कर्ण को पांडवों का पक्ष लेने के लिए बहुत समझाया, पर उसने उपकारी मित्र दुर्योधन से छल करना सही नहीं समझा। वह दुर्योधन के उपकार को न भूलकर जीवन भर उसके साथ रहता है। वह कृष्ण से कहता है:
मैं कृतज्ञ हूँ दुर्योधन का, उपकारों से हारा। राजपाट उसके चरणों पर, चुप धर दूंगा सारा ॥
(11) पश्चात्ताप से युक्त-कर्ण को द्रौपदी का भरी सभा में किया गया अपमान हमेशा दुख देता रहा। वह कृष्ण से कहता है:
धिक् कृतज्ञता को जिसने, ऐसा दुष्कर्म कराया। प्रायश्चित्त करूंगा केशव, छोड़ नीच यह काया ॥
(12) करुणामय जीवन-कर्ण का पूरा जीवन करुणा से भरा था। जन्म लेते ही माँ ने उसे त्याग दिया। राजभवन में 'सूत-पुत्र' होने के कारण उसे अपमानित होना पड़ा। द्रौपदी द्वारा किए गए अपमान का घूँट पीना पड़ा। जीवन भर माँ, भाई और गुरुजनों के प्यार से वंचित रहना पड़ा। सगे भाइयों के खिलाफ हथियार उठाने पड़े। अजेय योद्धा होते हुए भी उसे अन्यायपूर्वक मारा गया। इस प्रकार पूरे काव्य में वीर कर्ण के जीवन का दुखद पक्ष ही दिखाया गया है।
ऊपर दिए गए विवरण से स्पष्ट होता है कि कर्ण महाभारत के वीरों में सबसे ऊपर था, फिर भी भाग्य के कारण उसे अपमान, तिरस्कार और छल-कपट का शिकार होना पड़ा। इस प्रकार कर्ण के जीवन का दुखद पक्ष बहुत ही मार्मिक है। यह दिखाता है कि एक व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, नियति के आगे उसे झुकना पड़ता है।
In simple words: कर्ण का चरित्र बहुत खास है। वह जन्म से त्यागा गया, हमेशा अपमानित हुआ, पर बहुत तेजस्वी और दानवीर था। वह अपनी प्रतिज्ञा का पक्का था और बहुत आत्मविश्वासी योद्धा था। उसे कदम-कदम पर अपमान मिला, जिससे उसके मन में बदला लेने की भावना आई। वह दुर्योधन का आभारी था और हमेशा उसके साथ रहा। उसे द्रौपदी के अपमान का पछतावा भी था। उसका पूरा जीवन दुख और संघर्ष से भरा रहा।
🎯 Exam Tip: कर्ण के चरित्र-चित्रण में उसकी मुख्य विशेषताओं को बिंदुओं में लिखें, जैसे उसकी दानवीरता, प्रतिज्ञा, आत्मसम्मान और अपमानों के कारण उसकी पीड़ा। हर बिंदु को उदाहरण से समझाएं।
Question 11. 'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर भीष्म पितामह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10]
Answer: भीष्म पितामह पांडवों और कौरवों दोनों के पूजनीय और बहुत सम्मानित दादा थे। कौरव और पांडव दोनों ही उन्हें श्रद्धा से 'पितामह' कहते थे। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
(1) वीर शिरोमणि-भीष्म पितामह बहुत वीर और पराक्रमी योद्धा थे। महाभारत के युद्ध में उन्होंने प्रतिदिन दस हजार सैनिकों को मारने की शपथ ली थी। कौरव और पांडव दोनों ही उनकी वीरता के सामने नतमस्तक थे।
(2) परम नीतिज्ञ-भीष्म पितामह अपने कर्तव्यों का पालन करने के साथ-साथ बहुत नीतिवान भी थे। वे पूरे मन से कौरवों का साथ नहीं दे पा रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि कौरव अन्याय के रास्ते पर चल रहे हैं। वे नहीं चाहते थे कि युद्ध में कौरवों की जीत हो। वे कर्ण को नीच, अर्धरथी और अभिमानी इसीलिए कहते थे ताकि कर्ण का तेज कम हो जाए, क्योंकि वे उसकी युद्ध-कुशलता और दुर्योधन के प्रति पूरी निष्ठा को अच्छी तरह जानते थे। उनकी इस नीति का यह प्रभाव भी हुआ कि कर्ण ने यह प्रतिज्ञा ली कि जब तक पितामह जीवित रहेंगे, वह युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएगा।
(3) न्याय एवं धर्म के समर्थक-भीष्म पितामह परिस्थितियों के कारण कौरवों की तरफ से युद्ध करते थे। वे नहीं चाहते थे कि युद्ध में दुर्योधन की जीत हो। वे पांडवों से बहुत खुश थे, क्योंकि पांडव सत्य, न्याय और धर्म के रास्ते पर चल रहे थे। वे अन्याय और अधर्म से नफरत करते थे।
(4) शौर्य तथा पराक्रम के प्रेमी-शर-शय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह कर्ण के शौर्य और वीरता की बहुत प्रशंसा करते हैं। वे कर्ण के प्रति कहे गए अपमानजनक शब्दों पर पछतावा करते हैं। वे वीर और पराक्रमी योद्धा का बहुत सम्मान करते हैं। कर्ण की प्रशंसा वे इन शब्दों में करते हैं:
तेरे लिए फूल आदर के, खिलते मेरे मन में। देखा तुझ सा महावीर, मैंने न कभी जीवन में ।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि भीष्म पितामह एक वीर, पराक्रमी और न्यायवादी, धर्म-प्रिय योद्धा थे। उनका चरित्र महान आदर्शों का प्रतीक है।
In simple words: भीष्म पितामह पांडवों और कौरवों दोनों के सम्मानित दादा थे। वे बहुत वीर और बुद्धिमान थे। वे न्याय और धर्म के समर्थक थे, भले ही उन्हें कौरवों की तरफ से लड़ना पड़ा। वे कर्ण की वीरता की सराहना करते थे और उसके प्रति अपने कठोर शब्दों पर पछताते थे।
🎯 Exam Tip: भीष्म पितामह के चरित्र-चित्रण में उनकी वीरता, बुद्धिमत्ता, न्यायप्रियता और कर्ण के प्रति उनके विचारों को स्पष्ट करें।
Question 12. 'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2015]
Answer: 'कर्ण' खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण एक महान और श्रेष्ठ चरित्र वाले महापुरुष हैं। उन्हें एक अवतारी पुरुष और भगवान के रूप में माना जाता है। उन्होंने अपने चमत्कारी चरित्र से भारतीय लोगों को प्रभावित किया है। उनके महान और अनुकरणीय चरित्र से लोग बहुत प्रभावित हुए हैं। उनके चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
(1) कूटनीतिज्ञ-कर्ण खण्डकाव्य की मुख्य घटनाओं में श्रीकृष्ण का विशेष हाथ है। वे पांडवों के परम शुभचिंतक हैं। कृष्ण हर पल उनका ध्यान रखते हैं और समय-समय पर उन्हें सावधान करते हैं। वे शत्रु को नीचा दिखाने के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति का अच्छी तरह उपयोग करना जानते हैं। कर्ण की शक्ति को जानकर वे जहाँ उसे साम नीति द्वारा पांडवों के पक्ष में करने का प्रयास करते हैं, वहीं दुर्योधन के अवगुणों को बताने में भेद-नीति अपनाते हैं। वे कर्ण से कहते हैं:
दुर्योधन का साथ न दो, वह रणोन्मत्त पागल है। द्वेष, दम्भ से भरा हुआ, अति कुटिल और चंचल है ॥
दाम नीति का प्रयोग करते हुए वे कर्ण को लालच देते हैं:
चलो तुम्हें सम्राट बनाऊँ, अखिल विश्व का क्षण में ।
जब कर्ण उनकी सभी बातों को ठुकरा देता है, तो कृष्ण उसे अहंकारी भी बताते हैं। निश्चित रूप से वे सभी प्रकार की नीतियों में माहिर हैं।
(2) परिस्थितियों के मर्मज्ञ-श्रीकृष्ण तो भगवान हैं। वे तीनों कालों को जानने वाले, भविष्य को देखने वाले और परिस्थितियों को अच्छी तरह समझने में सक्षम हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि धर्मयुद्ध में कर्ण को कोई नहीं मार सकता। तभी तो वे समय आने पर अर्जुन को कर्ण का वध करने का संकेत देते हैं। वे कहते हैं:
बाण चला दो, चूक गये तो लुटी सुकीर्ति सँजोयी ।
(3) पांडवों के रक्षक-श्रीकृष्ण पांडवों के परम हितैषी हैं। वे हर परिस्थिति में पांडवों की रक्षा करते हैं, क्योंकि पांडव सत्य, न्याय और धर्म के रास्ते पर चल रहे हैं, जिसकी स्थापना के लिए ही पृथ्वी पर उनका अवतार हुआ है। युद्ध में वे अर्जुन की रक्षा के लिए ही घटोत्कच को बुलाते हैं और कर्ण के हाथों उसका वध करवाकर अर्जुन का जीवन सुरक्षित करते हैं।
(4) पराक्रम-प्रेमी-कृष्ण पराक्रमी और शूरवीर पुरुषों की निष्पक्ष होकर प्रशंसा करते हैं। वे कर्ण को एक अपराजेय योद्धा समझते हैं और उसके शौर्य की प्रशंसा करते हुए कहते हैं:
धर्मप्रिय, धृति-धर्म धुरी को तुम धारण करते हो। वीर, धनुर्धर धर्मभाव तुम भू-भर में भरते हो ।
(5) मायावी-कृष्ण की माया से महाभारत के सभी योद्धा परिचित हैं। वे महाभारत युद्ध में केवल अर्जुन के रथ के सारथी ही बने हैं और उन्होंने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा भी ली है, फिर भी सभी वीर योद्धा उनसे भयभीत रहते हैं। जिन बातों को बड़े-बड़े वीर प्रयत्न करके भी नहीं जान पाते, उन बातों को कृष्ण आसानी से जान लेते हैं। कर्ण भी कहता है कि कृष्ण की माया अर्जुन को छाया की तरह घेरे रहती है:
घेरे रहती है अर्जुन को छाया सदा तुम्हारी ।।
इस प्रकार कृष्ण का चरित्र अलौकिक, दिव्य और अन्य सद्गुणों से युक्त है। उनकी नीतियां और दूरदर्शिता युद्ध के परिणाम को आकार देने में महत्वपूर्ण थीं।
In simple words: श्रीकृष्ण एक महान और बुद्धिमान व्यक्ति थे। वे कूटनीतिज्ञ थे, जो पांडवों की मदद के लिए हर संभव प्रयास करते थे। वे परिस्थितियों को अच्छी तरह समझते थे और युद्ध के परिणाम को प्रभावित करते थे। वे पांडवों के रक्षक और पराक्रमी वीरों के प्रशंसक भी थे। उनकी मायावी शक्तियां भी सबको पता थीं।
🎯 Exam Tip: श्रीकृष्ण के चरित्र-चित्रण में उनकी कूटनीतिज्ञता, दूरदर्शिता, पांडव-प्रेम, पराक्रम-प्रेम और उनकी मायावी छवि को मुख्य बिंदुओं के रूप में बताएं।
Question 13. 'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर प्रमुख नारी पात्र 'कुन्ती' का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012, 13, 15]
या
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती के चरित्र की किन्हीं तीन विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2009]
Answer: कविवर केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' द्वारा रचित 'कर्ण' खण्डकाव्य की कुंती एक मुख्य स्त्री-पात्र है। वह महाराज पांडु की पत्नी और पांडवों की माता हैं। खण्डकाव्य में उनके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं:
(1) अभिशप्त माता-खण्डकाव्य की शुरुआत में कुंती एक कुंवारी माँ के शापित हालात में दिखाई देती हैं, जो सामाजिक निंदा और डर से बहुत परेशान हैं। उनके नवजात पुत्र के प्रति उनके हृदय में बहुत प्यार उमड़ रहा है, पर लोक-लाज के डर से उन्हें मजबूर होकर अपने पुत्र को गंगा नदी की धारा में बहाना पड़ता है।
(2) एक दुःखिया माँ-खण्डकाव्य में कुंती को एक दुखी माँ के रूप में दिखाया गया है। उनके पुत्र पांडवों को उनका राज्यांश नहीं मिल रहा था और उन्हें कौरवों से युद्ध करना पड़ रहा था। कुंती इससे बहुत डरी हुई और दुखी थीं। वह कर्ण के पास जाती हैं और उस पर अपनी माँ होने का पूरा राज खोल देती हैं। कर्ण उसे ताना मारता है, दुर्योधन का साथ न छोड़ने को कहता है और अर्जुन का वध करने की अपनी प्रतिज्ञा को भी दोहराता है। अंततः उदास और दुखी होकर कुंती वापस लौट आती हैं।
(3) चिंतित माँ-कौरव और पांडवों में युद्ध होने वाला था। कर्ण अर्जुन को मारने की प्रतिज्ञा कर चुका था। कुंती इस चिंता में बहुत व्याकुल थीं कि युद्ध-भूमि में उनके ही पुत्र एक-दूसरे के खिलाफ लड़ेंगे और मारे जाएंगे।
(4) ममतामयी माँ-'कर्ण' खण्डकाव्य में कुंती के मातृत्व के कई पहलू देखने को मिलते हैं। वह एक कुंवारी माँ हैं, जो अपनी ममता का गला खुद ही घोटती हैं। महाभारत के युद्ध में जब वह देखती हैं कि भाई-भाई ही एक-दूसरे को मारने के लिए तैयार हैं, तब वह अपने पुत्र पांडवों की रक्षा के लिए कर्ण के पास जाती हैं और उससे तिरस्कृत भी होती हैं। फिर भी कर्ण के प्रति उनका वात्सल्य भाव रुकता नहीं है। वह कर्ण से कहती हैं:
माँ कहकर झंकृत कर दो मेरे प्राणों का तार ।।
जलदान के समय वह युधिष्ठिर से कर्ण का जलदान करने के लिए आग्रह करती हैं। निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि कुंती परिस्थितियों की मारी एक सच्ची माँ हैं, जो अपनी ममता को गहरा दबाकर भी दबा नहीं पातीं। उनका मातृ-रूप कई रूपों में हमारे सामने आता है, जो भारतीय नारी की सामाजिक और पारिवारिक मजबूरियों को मार्मिक तरीके से दिखाता है। कुंती का जीवन बलिदान और संघर्ष का प्रतीक है।
In simple words: कुंती खण्डकाव्य की एक मुख्य स्त्री-पात्र हैं। वह एक अभिशप्त और दुखी माँ थीं, जिन्हें लोक-लाज के डर से अपने पुत्र कर्ण को त्यागना पड़ा। वह अपने पुत्रों के भविष्य को लेकर चिंतित रहती थीं और कर्ण के प्रति उनके मन में हमेशा ममता भरी रहती थी, भले ही उसे कभी स्वीकार नहीं कर पाईं।
🎯 Exam Tip: कुंती के चरित्र-चित्रण में उनकी विवशता, मातृत्व, चिंता और आंतरिक द्वंद्व को दर्शाने वाले पहलुओं पर जोर दें, और उन्हें उदाहरणों से स्पष्ट करें।
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