UP Board Solutions Class 10 Hindi Chapter 5 Ishrya Tu Na Gayi Mere Man Se

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Detailed Chapter 5 Ishrya Tu Na Gayi Mere Man Se UP Board Solutions for Class 10 Hindi

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Class 10 Hindi Chapter 5 Ishrya Tu Na Gayi Mere Man Se UP Board Solutions PDF

जीवन-परिचय एवं कृतियाँ

 

Question 1. रामधारी सिंह 'दिनकर' के जीवन-परिचय एवं साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालिए। या रामधारी सिंह 'दिनकर' का जीवन-परिचय दीजिए एवं उनकी एक रचना का नामोल्लेख कीजिए।
Answer: रामधारी सिंह 'दिनकर' हिंदी के एक बहुत मशहूर कवि और क्रांतिकारी गीतकार हैं। उन्होंने अपनी अद्भुत प्रतिभा से हिंदी साहित्य को रोशन किया है। वे एक बड़े विचारक, निबंधकार, आलोचक और भावुक कवि भी थे। उन्होंने कई ऐसी किताबें लिखी हैं जो हिंदी साहित्य के लिए बहुत अनमोल हैं। उनकी रचनाएँ आज भी युवाओं को प्रेरित करती हैं।

जीवन-परिचय: दिनकर जी का जन्म 1908 में बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव में एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री रवि सिंह और माता श्रीमती मनरूप देवी थीं। कम उम्र में ही उनके पिता का निधन हो गया। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से बी.ए. की पढ़ाई पूरी की, लेकिन घर की जिम्मेदारियों के कारण आगे नहीं पढ़ पाए और नौकरी करने लगे। उन्होंने कुछ समय तक मोकामाघाट के माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाचार्य के रूप में काम किया। फिर 1934 में बिहार सरकार के सब-रजिस्ट्रार बन गए। आजादी के बाद वे प्रचार विभाग में उपनिदेशक के पद पर रहे। 1950 में उन्हें मुजफ्फरपुर के स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग का अध्यक्ष बनाया गया। 1952 में वे राज्यसभा के सदस्य भी बने। बाद में उन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के गृह विभाग में हिंदी सलाहकार और आकाशवाणी के निदेशक के रूप में भी काम किया। 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट्. की मानद उपाधि दी। 1972 में उनकी कविता 'उर्वशी' के लिए उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। 24 अप्रैल 1974 को यह महान साहित्यकार दुनिया से विदा हो गए।

रचनाएँ-साहित्य: दिनकर जी ने सबसे पहले कविता लिखना शुरू किया था। बाद में उन्होंने गद्य रचनाएँ भी कीं। उनकी मुख्य रचनाएँ इस प्रकार हैं:
1. दर्शन एवं संस्कृति: 'धर्म', 'भारतीय संस्कृति की एकता', 'संस्कृति के चार अध्याय' - ये किताबें दर्शन और संस्कृति पर आधारित हैं। 'संस्कृति के चार अध्याय' को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।
2. निबंध-संग्रह: 'अर्द्धनारीश्वर', 'वट-पीपल', 'उजली आग', 'मिट्टी की ओर', 'रेती के फूल' - ये सभी उनके निबंध संग्रह हैं। उन्होंने कई अखबारों और पत्रिकाओं में भी निबंध लिखे।
3. आलोचना-ग्रंथ: 'शुद्ध कविता की खोज' - इस किताब में उन्होंने कविता के बारे में अपने विचार खुलकर बताए हैं।
4. यात्रा-साहित्य: 'देश-विदेश'
In simple words: रामधारी सिंह 'दिनकर' हिंदी साहित्य के एक बहुत महत्वपूर्ण कवि थे। उनका जन्म 1908 में हुआ था और वे 1974 में हमें छोड़ गए। उन्होंने कविताएँ, निबंध और आलोचनाएँ लिखीं। उनकी रचना 'उर्वशी' के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था।

🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय लिखते समय जन्म, शिक्षा, प्रमुख कार्य और प्रमुख रचनाओं को क्रमबद्ध तरीके से लिखें। साहित्यिक योगदान में उनकी लेखन शैली और विषय-वस्तु को स्पष्ट करें।

गद्यांश पर आधारित प्रश्न

ईष्र्या का यह अनोखा वरदान है जिस मनुष्य के हृदय में ईष्या घर बना लेती है, वह उन चीजों से आनन्द नहीं उठाता जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तुओं से दुःख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं। वह अपनी तुलना दूसरों के साथ करता है और इस तुलना में अपने पक्ष के सभी अभाव उसके हृदय पर दंश मारते रहते हैं। दंश के इस दाह को भोगना कोई अच्छी बात नहीं है। मगर, ईष्यालु मनुष्य करे भी तो क्या? आदत से लाचार होकर उसे यह वेदना भोगनी पड़ती है।

 

Question 1. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखे गए 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध से लिया गया है। इस निबंध में लेखक ने ईर्ष्यालु व्यक्ति के गुणों और उसके बुरे प्रभावों के बारे में बताया है। यह पाठ हमें ईर्ष्या से बचने की सीख देता है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम हमेशा सही और स्पष्ट रूप से लिखें। गद्यांश के मुख्य संदेश को संक्षिप्त रूप में भी बता सकते हैं।

 

Question 1. (ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
Answer: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या से बचने का सबसे अच्छा तरीका अपने मन को नियंत्रित करना है। मन स्वाभाविक रूप से चंचल होता है, और इसे काबू में रखकर ही ईर्ष्या से बचा जा सकता है। हमारे पास जो चीजें नहीं हैं, उनके बारे में सोचना बेकार है। जिस व्यक्ति के मन में ईर्ष्या पैदा हो जाती है, उसे यह पता लगाना चाहिए कि उसे किस कमी के कारण ईर्ष्या हुई है। फिर उसे उन कमियों को दूर करने के लिए सकारात्मक प्रयास करने चाहिए। उसे ऐसे तरीके ढूंढने चाहिए जिससे वह अपनी उन कमियों को पूरा कर सके। अपनी कमियों को रचनात्मक रूप से दूर करना ही ईर्ष्या से मुक्ति का मार्ग है। आत्म-बोध और आत्म-सुधार ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने की कुंजी है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या से बचने के लिए मन को काबू करना ज़रूरी है। जो चीजें नहीं हैं, उनके बारे में सोचने के बजाय, यह पता लगाओ कि किस कमी से ईर्ष्या हुई है और उसे कैसे ठीक किया जाए।

🎯 Exam Tip: रेखांकित अंश की व्याख्या करते समय, मूल भाव को सरल शब्दों में विस्तार से समझाएं और उसे वास्तविक जीवन से जोड़ने का प्रयास करें।

 

Question 1. (स) 1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने ईर्ष्या से उत्पन्न पीड़ा का वर्णन किया है और कहा है कि ईष्यालु व्यक्ति सदा दुःखी रहता है।
Answer: यह बात सही है कि लेखक ने इस गद्यांश में बताया है कि ईर्ष्या के कारण व्यक्ति को बहुत दर्द होता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति हमेशा दुखी रहता है क्योंकि वह दूसरों की खुशी से परेशान होता है। यह पीड़ा उसे भीतर ही भीतर जलाती रहती है, जिससे वह कभी संतुष्ट नहीं रह पाता। ईर्ष्या की पीड़ा को समझाने के लिए व्यक्ति के मानसिक कष्ट और असंतोष को उजागर करें।
In simple words: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या से व्यक्ति को दुख और पीड़ा मिलती है, और ईर्ष्यालु लोग हमेशा दुखी रहते हैं।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या की पीड़ा को समझाने के लिए व्यक्ति के मानसिक कष्ट और असंतोष को उजागर करें।

 

Question 1. (स) 2. ईष्यालु व्यक्ति अपनी तुलना ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों से करता है जो उससे किन्हीं बातों में श्रेष्ठ हैं। जब वह देखता है कि अमुक वस्तु दूसरे के पास तो है, लेकिन उसके पास नहीं है, तब वह स्वयं को हीन समझने लगता है। अपने अभाव उसे खटकने लगते हैं और वह अपने पास मौजूद वस्तुओं अथवा साधनों का भी आनन्द नहीं ले पाता ।
Answer: यह सच है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी तुलना ऐसे लोगों से करता है जो उससे कुछ मामलों में बेहतर होते हैं। जब वह देखता है कि कोई खास चीज़ दूसरों के पास तो है, लेकिन उसके पास नहीं, तो वह खुद को बहुत नीचा और बेकार समझने लगता है। उसकी अपनी कमियाँ उसे परेशान करती रहती हैं, और वह अपने पास मौजूद चीज़ों का भी आनंद नहीं ले पाता। यह सोच उसे लगातार दुखी रखती है।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति खुद को दूसरों से कम समझता है और अपनी कमियों के कारण अपनी चीज़ों का भी आनंद नहीं ले पाता।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु व्यक्ति की तुलनात्मक प्रवृत्ति और उसके कारण होने वाले असंतोष को स्पष्ट करें।

 

Question 1. (स) 3. ईर्ष्यालु व्यक्ति रात-दिन इसी वेदना में जला करता है कि अमुक वस्तु दूसरों के पास तो है लेकिन उसके पास नहीं है। ईष्या की इस दाह में जलना बहुत बुरा है, लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति को यह वेदना भोगनी ही पड़ती है।
Answer: यह बात सही है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति दिन-रात इसी दर्द में जलता रहता है कि कोई खास चीज़ दूसरों के पास है, पर उसके पास नहीं। ईर्ष्या की इस जलन में जलना बहुत बुरा है, लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति को यह दर्द सहना ही पड़ता है क्योंकि यह उसकी आदत बन जाती है। इस आंतरिक पीड़ा से वह कभी मुक्त नहीं हो पाता जब तक कि वह अपनी सोच नहीं बदलता।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति हमेशा इस दर्द में रहता है कि दूसरों के पास जो है, वह उसके पास क्यों नहीं है, और उसे यह दर्द सहना पड़ता है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या को एक आंतरिक आग के रूप में प्रस्तुत करें जो व्यक्ति को लगातार जलाती रहती है।

 

Question 1. (स) 4. लेखक ने ईष्या को अनोखा वरदान इसलिए कहा है क्योंकि ईष्यालु मनुष्य उन वस्तुओं से आनन्द नहीं प्राप्त करता जो उसके पास हैं, वरन् उन वस्तुओं से दुःख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं।
Answer: लेखक ने ईर्ष्या को 'अनोखा वरदान' इसलिए कहा है क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने पास मौजूद चीज़ों से खुशी नहीं पाता। बल्कि वह उन चीज़ों को देखकर दुखी होता है जो दूसरों के पास होती हैं। यह एक व्यंग्य है क्योंकि 'वरदान' आमतौर पर अच्छी चीज़ होती है, लेकिन यहाँ ईर्ष्या एक ऐसी 'वरदान' है जो दुख देती है।
In simple words: लेखक ने ईर्ष्या को अनोखा वरदान कहा है क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी चीज़ों से खुश नहीं होता, बल्कि दूसरों की चीज़ों से दुखी होता है।

🎯 Exam Tip: 'अनोखा वरदान' के व्यंग्यात्मक अर्थ को स्पष्ट करें और बताएं कि यह ईर्ष्या के नकारात्मक प्रभाव को कैसे दर्शाता है।

 

Question 1. (स) 5. ईर्ष्या का अनोखा वरदान यह है कि ईष्यालु व्यक्ति उन वस्तुओं से आनन्द नहीं उठाता जो उसके पास हैं, वरन् वह उन वस्तुओं से दुःख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं।
Answer: ईर्ष्या का 'अनोखा वरदान' यही है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने पास की चीज़ों से खुशी नहीं पाता। इसके बजाय, वह दूसरों के पास मौजूद चीज़ों को देखकर दुखी होता है। यह उसे लगातार असंतुष्ट और परेशान रखता है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ सुख के स्रोत उपलब्ध होने पर भी व्यक्ति दुख का अनुभव करता है।
In simple words: ईर्ष्या का अनोखा वरदान यह है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी चीज़ों से खुश नहीं होता, बल्कि दूसरों की चीज़ों से दुखी होता है।

🎯 Exam Tip: इस 'वरदान' की नकारात्मक प्रकृति को स्पष्ट करें कि यह कैसे व्यक्ति की खुशी को नष्ट कर देती है।

 

Question 1. (स) 6. ईष्यालु व्यक्ति को ईर्ष्या के कारण उन वस्तुओं से आनन्द नहीं मिलता जो उसके पास हैं वरन् वह उन वस्तुओं से दुःख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं।
Answer: ईर्ष्या के कारण ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने पास की चीज़ों से खुशी महसूस नहीं कर पाता। इसके बजाय, वह दूसरों के पास मौजूद चीज़ों को देखकर दुखी होता है। यह भावना उसे लगातार अंदर से खोखला करती रहती है और उसे अपने जीवन में संतुष्ट नहीं होने देती, जिससे वह कभी वास्तविक सुख नहीं पाता।
In simple words: ईर्ष्या के कारण ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी चीज़ों से खुश नहीं होता, बल्कि दूसरों की चीज़ों से दुखी होता है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या के कारण उत्पन्न होने वाले असंतोष और खुशी की कमी को प्रमुखता से उजागर करें।

एक उपवन को पाकर भगवान को धन्यवाद देते हुए उसका आनन्द नहीं लेना और बराबर इस चिन्ता में निमग्न रहना कि इससे भी बड़ा उपवन क्यों नहीं मिला, एक ऐसा दोष है, जिससे ईष्यालु व्यक्ति का चरित्र भी भयंकर हो उठता है। अपने अभाव पर दिन-रात सोचते-सोचते वह सृष्टि की प्रक्रिया को भूलकर विनाश में लग जाता है और अपनी उन्नति के लिए उद्यम करना छोड़कर वह दूसरों को हानि पहुँचाने को ही अपना श्रेष्ठ कर्त्तव्य समझने लगता है।

 

Question 2. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' के निबंध 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इस पाठ में लेखक ने ईर्ष्या के बुरे प्रभावों और उससे बचने के तरीकों के बारे में बताया है। यह हमें सिखाता है कि संतोष ही सुख की कुंजी है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम हमेशा सही और स्पष्ट रूप से लिखें। गद्यांश के मुख्य संदेश को संक्षिप्त रूप में भी बता सकते हैं।

 

Question 2. (ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
Answer: लेखक बताते हैं कि जीवन के उतार-चढ़ाव, जन्म और मृत्यु - ये सब भगवान के हाथों में हैं। हमें अपना काम करते रहना चाहिए और इन बातों की चिंता में अपने जीवन को दुखी नहीं बनाना चाहिए। मनुष्य सृष्टि के नियमों को भूलकर दूसरों से ईर्ष्या करने में अपना समय बर्बाद करता है। वह अपनी मेहनत छोड़ देता है और केवल यह सोचता रहता है कि दूसरों को कैसे नुकसान पहुँचाए। इस तरह की सोच बहुत छोटी होती है। हमें दूसरों को नुकसान पहुँचाने के बजाय सबके भले के बारे में सोचना चाहिए और अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाना चाहिए। दूसरों की भलाई चाहना और अपने काम पर ध्यान देना ही सच्ची प्रगति का मार्ग है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि जीवन में सब कुछ भगवान की मर्ज़ी से होता है। हमें दूसरों से ईर्ष्या करने में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। हमें अपना काम करना चाहिए और सबकी भलाई के बारे में सोचना चाहिए। दूसरों को नुकसान पहुँचाना सही नहीं है।

🎯 Exam Tip: व्याख्या करते समय, पैसेज के केंद्रीय विचार को स्पष्ट करें और उसे अपने शब्दों में विस्तार दें। सकारात्मक दृष्टिकोण पर जोर दें।

 

Question 2. (स) 1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
Answer: लेखक इस गद्यांश में यह बताना चाहते हैं कि भगवान ने हमें जो भी चीजें दी हैं, हमें उन्हीं का उपयोग करना चाहिए और अपने जीवन का आनंद लेना चाहिए। हमें अनावश्यक रूप से दूसरों की चीजों की इच्छा नहीं करनी चाहिए।
In simple words: लेखक का कहना है कि हमें भगवान की दी हुई चीजों से ही खुश रहना चाहिए और अपने जीवन का आनंद लेना चाहिए।

🎯 Exam Tip: लेखक के मुख्य संदेश को स्पष्टता से प्रस्तुत करें, जिसमें संतुष्टि और कृतज्ञता का महत्व हो।

 

Question 2. (स) 2. ईष्यालु व्यक्ति का चरित्र क्यों भयंकर हो जाता है ?
Answer: ईर्ष्यालु व्यक्ति का स्वभाव इसलिए खराब हो जाता है क्योंकि वह हमेशा इस बात की चिंता करता रहता है कि उसे दूसरों से बेहतर चीजें क्यों नहीं मिलीं। इस सोच के कारण वह उन चीजों का भी आनंद नहीं ले पाता जो उसके पास हैं, जिससे उसका मन हमेशा अशांत रहता है।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति का स्वभाव इसलिए खराब हो जाता है क्योंकि वह हमेशा यह सोचता है कि दूसरों के पास अच्छी चीजें क्यों हैं, जिससे वह अपनी चीजों का भी आनंद नहीं ले पाता।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या के कारण व्यक्ति के आंतरिक असंतोष और नकारात्मक सोच के प्रभावों पर ध्यान केंद्रित करें।

 

Question 2. (स) 3. ईर्ष्यालु व्यक्ति किस बात को अपना श्रेष्ठ कर्त्तव्य समझता है ?
Answer: ईर्ष्यालु व्यक्ति यह नहीं समझता कि पूरी दुनिया भगवान की बनाई हुई है। वह अपनी कमियों के बारे में सोच-सोचकर खुद को ही नुकसान पहुँचाता है। वह अपनी भलाई के लिए बिल्कुल कोशिश नहीं करता, बल्कि दूसरों को कैसे नुकसान पहुँचाया जाए, इसे ही अपना सबसे महत्वपूर्ण काम मानता है। यह उसकी संकीर्ण सोच दिखाता है।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों को नुकसान पहुँचाने को ही अपना सबसे बड़ा काम समझता है, जबकि उसे अपनी तरक्की पर ध्यान देना चाहिए।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु व्यक्ति की नकारात्मक प्राथमिकता और दूसरों को हानि पहुँचाने की उसकी प्रवृत्ति को स्पष्ट करें।

ईष्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है। जो व्यक्ति ईष्यालु होता है, वही बुरे किस्म का निन्दक भी होता है। दूसरों को निन्दा वह इसलिए करता है कि इस प्रकार, दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आँखों से गिर जाएँगे और जो स्थान रिक्त होगा, उस पर मैं अनायास ही बैठा दिया जाऊँगा।

 

Question 3. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध से लिया गया है। इसमें लेखक ने ईर्ष्या और निंदा के गहरे संबंध को समझाया है, बताते हुए कि ईर्ष्यालु व्यक्ति अक्सर दूसरों की निंदा में क्यों लगा रहता है। इस पाठ का उद्देश्य ईर्ष्या और निंदा जैसे नकारात्मक गुणों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। निबंध के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 3. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: दिनकर जी कहते हैं कि जब हमारे मन में ईर्ष्या पैदा होती है, तो उसके साथ-साथ निंदा करने की भावना भी आ जाती है। इसलिए निंदा को ईर्ष्या की सबसे बड़ी संतान कहा गया है। जो व्यक्ति किसी से ईर्ष्या करता है, वह उसकी बहुत ज़्यादा बुराई करता है। उसे दूसरों की बुराई करने में खुशी मिलती है। वह चाहता है कि दूसरे लोग भी उस व्यक्ति को बुरा कहें। निंदा करने का उसका मकसद यह होता है कि जिस व्यक्ति की वह निंदा कर रहा है, वह लोगों की नज़रों में गिर जाए। जब वह व्यक्ति दोस्तों या समाज में अपनी इज़्ज़त खो देगा, तो निंदा करने वाला व्यक्ति बिना किसी मेहनत के उसकी खाली की हुई जगह पर खुद बैठ जाएगा। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि ईर्ष्या और निंदा अक्सर शक्ति प्राप्त करने या दूसरों को नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले नकारात्मक उपकरण हैं।
In simple words: दिनकर जी कहते हैं कि ईर्ष्या से ही निंदा पैदा होती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की बुराई इसलिए करता है ताकि वे लोगों की नज़रों में गिर जाएँ और उसे बिना मेहनत के उनका स्थान मिल जाए।

🎯 Exam Tip: निंदा और ईर्ष्या के आपसी संबंध को स्पष्ट करें, और निंदक के छिपे हुए स्वार्थ को उजागर करें।

 

Question 3. (स) 1. ईष्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा क्या सोचकर करता है ?
Answer: ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निंदा इस उम्मीद से करता है कि जब वह व्यक्ति समाज की नज़रों में अपनी इज़्ज़त खो देगा, तो उसकी जगह खुद बिना किसी मेहनत के ले लेगा। वह अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की छवि खराब करता है।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निंदा इसलिए करता है ताकि वह उनकी जगह खुद ले सके।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु व्यक्ति के स्वार्थी मकसद और दूसरों को नीचा दिखाने की इच्छा को स्पष्ट करें।

 

Question 3. (स) 2. ईष्या के साथ और कौन-से अवगुण पनपते हैं ?
Answer: ईर्ष्या से निंदा जैसे कई बुरे गुण जन्म लेते हैं। जब मन में ईर्ष्या की भावना आती है, तो निंदा का अवगुण अपने आप ही बढ़ने लगता है। यह एक चेन रिएक्शन की तरह काम करता है, जहाँ एक बुराई दूसरी को जन्म देती है।
In simple words: ईर्ष्या के साथ-साथ निंदा और ऐसे ही कई बुरे गुण अपने आप पैदा हो जाते हैं।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या को अन्य नकारात्मक गुणों की जननी के रूप में प्रस्तुत करें और उनके बीच के संबंध को समझाएँ।

 

Question 3. (स) 3. ईष्यालु और निन्दक का क्या सम्बन्ध है?
Answer: ईर्ष्यालु और निंदक के बीच 'जन्म देने वाले' और 'जन्म लेने वाले' का संबंध है। इसका मतलब है कि ईर्ष्या ही निंदा को जन्म देती है। जब मन में ईर्ष्या की भावना पैदा होती है, तो निंदा का बुरा गुण अपने आप ही आ जाता है। यह एक स्वाभाविक परिणाम है।
In simple words: ईर्ष्यालु और निंदक ऐसे जुड़े हैं जैसे पिता और बच्चा, क्योंकि ईर्ष्या ही निंदा को पैदा करती है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या और निंदा के बीच के कारण-कार्य संबंध को स्पष्ट करें, उन्हें एक-दूसरे से उत्पन्न होने वाले गुणों के रूप में समझाएँ।

मगर ऐसा न आज तक हुआ है और न होगा। दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने को बढ़ाने की कोशिश नहीं कही जा सकती। एक बात और है कि संसार में कोई भी मनुष्य निन्दा से नहीं गिरता। उसके पतन का कारण सद्गुणों का ह्रास होता है। इसी प्रकार कोई भी मनुष्य दूसरों की निन्दा करने से अपनी उन्नति नहीं कर सकता। उन्नति तो उसकी तभी होगी, जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाये तथा अपने गुणों का विकास करे ।

 

Question 4. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध का एक अंश है। इसमें लेखक ने बताया है कि दूसरों को नीचा दिखाकर अपनी उन्नति करना संभव नहीं है, बल्कि अपने चरित्र को सुधारना ही सच्ची तरक्की है। लेखक का मुख्य संदेश आत्म-सुधार और सद्गुणों के विकास पर केंद्रित है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। निबंध के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 4. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: लेखक कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति जीवन में ऊपर उठना चाहता है, तो उसे अपने अच्छे कामों से ही आगे बढ़ना चाहिए। दूसरों की बुराई करके या उन्हें नीचा दिखाकर कोई भी व्यक्ति तरक्की नहीं कर सकता। अगर कोई व्यक्ति नीचे गिरता है, तो इसका कारण दूसरों की निंदा नहीं होती, बल्कि उसके अपने अच्छे गुणों का खत्म हो जाना होता है। इसलिए, सच्ची तरक्की के लिए यह ज़रूरी है कि हम दूसरों की निंदा करना छोड़ दें। हमें अपने स्वभाव को साफ-सुथरा बनाना चाहिए और अपने अंदर इंसानियत के गुणों को विकसित करना चाहिए। आत्म-सुधार और नैतिक मूल्यों का पालन ही व्यक्ति को स्थायी और सच्ची सफलता दिलाता है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि अपनी तरक्की के लिए हमें अपने अच्छे कामों पर ध्यान देना चाहिए और दूसरों की निंदा नहीं करनी चाहिए। अगर कोई गिरता है, तो वह अपने बुरे गुणों के कारण गिरता है। हमें अपना चरित्र अच्छा बनाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: व्याख्या करते समय आत्म-सुधार और सद्गुणों के महत्व को उजागर करें, और बताएं कि दूसरों को नीचा दिखाना क्यों गलत है।

 

Question 4. (स) 1. किसी व्यक्ति की उन्नति कैसे हो सकती है ?
Answer: लेखक के अनुसार, कोई भी व्यक्ति अपनी अंदरूनी अच्छाइयों और गुणों को विकसित करके ही आगे बढ़ सकता है। दूसरों की निंदा करके या उन्हें नीचे गिराकर वह कभी सच्ची तरक्की नहीं कर सकता है। सच्ची उन्नति आत्म-सुधार से आती है।
In simple words: व्यक्ति अपने अंदर के अच्छे गुणों को बढ़ाकर ही तरक्की कर सकता है, दूसरों को नीचा दिखाकर नहीं।

🎯 Exam Tip: उन्नति के लिए आंतरिक गुणों के विकास पर जोर दें, न कि बाहरी प्रतिस्पर्धा पर।

 

Question 4. (स) 2. कौन-सी बात है जो आज तक न हुई है और न होगी ?
Answer: लेखक बताते हैं कि दूसरों को नीचा दिखाकर खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश कभी कामयाब नहीं हुई है और न ही कभी होगी। यह एक असफल तरीका है जो किसी को सच्चा सम्मान नहीं दिलाता।
In simple words: दूसरों को नीचा दिखाकर खुद को ऊपर उठाने की कोशिश कभी कामयाब नहीं हुई है और न ही होगी।

🎯 Exam Tip: इस सार्वभौमिक सत्य को स्पष्ट करें कि नकारात्मकता से स्थायी सफलता नहीं मिलती।

 

Question 4. (स) 3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
Answer: लेखक यह बताना चाहते हैं कि व्यक्ति तभी सच्ची उन्नति कर सकता है जब वह अपने चरित्र को साफ़-सुथरा रखे और अपने अंदर अच्छे गुणों को विकसित करे। आंतरिक सुधार ही वास्तविक प्रगति का आधार है।
In simple words: लेखक चाहते हैं कि व्यक्ति अपने चरित्र को अच्छा बनाए और अपने अंदर सद्गुणों का विकास करे तभी वह तरक्की करेगा।

🎯 Exam Tip: लेखक के मुख्य संदेश को स्पष्टता से प्रस्तुत करें, जिसमें आत्म-शुद्धि और सद्गुणों के विकास पर जोर हो।

ईर्ष्या का काम जलाना है, मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है, जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। आप भी ऐसे बहुत-से लोगों को जानते होंगे, जो ईष्या और द्वेष की साकार मूर्ति हैं और जो बराबर । इस फिक्र में लगे रहते हैं कि कहाँ सुनने वाला मिले और अपने दिल का गुबार निकालने का मौका मिले । श्रोता मिलते ही उनका ग्रामोफोन बजने लगता है, और वे बड़ी ही होशियारी के साथ एक-एक काण्ड इस ढंग से सुनाते हैं, मानो विश्व-कल्याण को छोड़कर उनका और कोई ध्येय नहीं हो। अगर जरा उनके अपने इतिहास को देखिए और समझने की कोशिश कीजिए कि जब से उन्होंने इस सुकर्म का आरम्भ किया है, तब से वे अपने क्षेत्र में आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। यह भी कि वे निन्दा करने में समय वे शक्ति का अपव्यय नहीं करते तो आज इनका स्थान कहाँ होता ?

 

Question 5. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' के प्रसिद्ध निबंध 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' का एक अंश है। इसमें लेखक ने ईर्ष्यालु व्यक्ति के स्वभाव और उसके नकारात्मक परिणामों का विस्तार से वर्णन किया है, खासकर यह बताया है कि ईर्ष्या सबसे पहले उसी व्यक्ति को नुकसान पहुँचाती है जो उसे पालता है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। निबंध के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 5. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: लेखक का कहना है कि जो लोग जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं, वे केवल अपने अच्छे कामों से ही ऊपर उठ सकते हैं। दूसरों की निंदा करने या उन्हें नीचा दिखाने से कोई ऊपर नहीं उठ पाता। अगर कोई व्यक्ति नीचे गिरता है, तो वह दूसरों की बुराई के कारण नहीं, बल्कि अपने अच्छे गुणों के खत्म होने के कारण गिरता है। इसलिए, आगे बढ़ने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति दूसरों की निंदा करना छोड़ दे। उसे अपने स्वभाव को शुद्ध रखना चाहिए और अपने अंदर अच्छे मानवीय गुणों को विकसित करना चाहिए। यह आत्म-चिंतन और सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्ति को ईर्ष्या के नकारात्मक प्रभावों से बचाता है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि तरक्की के लिए अपने अच्छे काम करो, दूसरों की निंदा मत करो। कोई तभी गिरता है जब उसके अच्छे गुण खत्म हो जाते हैं। हमें अपना चरित्र अच्छा बनाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: व्याख्या करते समय आत्म-सुधार और सद्गुणों के महत्व को उजागर करें, और बताएं कि दूसरों को नीचा दिखाना क्यों गलत है।

 

Question 5. (स) 1. ईर्ष्या का काम क्या है ? वह सबसे पहले किसे जलाती है ?
Answer: ईर्ष्या का मुख्य काम जलाना है, और यह सबसे पहले उसी व्यक्ति को जलाती है जिसके मन में यह पैदा होती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति को जब कोई सुनने वाला मिलता है, तो वह तुरंत उस व्यक्ति की हर अच्छी बात को भी बुराई के रूप में बढ़ा-चढ़ाकर बताने लगता है, जिससे वह ईर्ष्या करता है। यह आंतरिक जलन व्यक्ति को अशांत और नकारात्मक बनाए रखती है, जिससे वह कभी संतुष्ट नहीं हो पाता।
In simple words: ईर्ष्या का काम जलाना है, और यह सबसे पहले उसे जलाती है जिसके मन में वह पैदा होती है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या के विनाशकारी स्वभाव को बताएं, खासकर यह कि यह सबसे पहले व्यक्ति को स्वयं को नुकसान पहुँचाती है।

 

Question 5. (स) 2. ईष्यालु व्यक्ति के चरित्र का अध्ययन करने पर क्या निष्कर्ष निकलता है ?
Answer: ईर्ष्यालु व्यक्ति के स्वभाव का बारीकी से अध्ययन करने पर यह बात सामने आती है कि जब से उसने ईर्ष्या करना शुरू किया है, तब से उसकी सारी तरक्की रुक गई है। ईर्ष्या उसके विकास में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है, जिससे वह आगे नहीं बढ़ पाता। ईर्ष्या व्यक्ति की ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों से हटाकर विनाशकारी सोच में लगा देती है।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति के स्वभाव को देखने पर पता चलता है कि ईर्ष्या के कारण उसकी तरक्की रुक गई है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या को व्यक्तिगत प्रगति में बाधा के रूप में प्रस्तुत करें, जिससे व्यक्ति के विकास में रुकावट आती है।

 

Question 5. (स) 3. उपर्युक्त गद्यांश में ईष्यालु व्यक्ति की मनोदशा कैसी बताई गयी है ?
Answer: इस गद्यांश में ईर्ष्यालु व्यक्ति की मानसिक स्थिति ऐसी बताई गई है कि वह हमेशा ऐसा मौका ढूंढता रहता है कि जैसे ही उसे कोई सुनने वाला मिले, वह तुरंत उस व्यक्ति की बुराई करना शुरू कर दे जिससे वह ईर्ष्या करता है। उसकी पूरी सोच दूसरों को नीचा दिखाने पर केंद्रित रहती है। यह दर्शाता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की आलोचना करके अपनी आंतरिक असुरक्षा को छिपाने की कोशिश करता है।
In simple words: गद्यांश में बताया गया है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति हमेशा मौका ढूंढता है कि किसी की बुराई करे, जिससे वह ईर्ष्या करता है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु व्यक्ति की दूसरों को बदनाम करने की उत्सुकता और उसके पीछे के मानसिक कारणों को समझाएँ।

चिन्ता को लोग चिता कहते हैं। किसी व्यक्ति को प्रचण्ड चिन्ता ने पकड़ लिया है, उन बेचारे की जिन्दगी ही खराब हो जाती है, किन्तु ईष्या शायद चिन्ता से भी बदतर चीज है, क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुंठित बना डालती है।

 

Question 6. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध का एक अंश है। इसमें लेखक ने चिंता और ईर्ष्या के बीच तुलना करते हुए बताया है कि ईर्ष्या किस प्रकार व्यक्ति के मूल गुणों को नष्ट कर देती है, जिससे वह चिंता से भी अधिक हानिकारक हो जाती है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। गद्यांश के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 6. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: लेखक इस हिस्से में समझाते हैं कि चिंता भले ही इंसान के जीवन को जला देती है, लेकिन वह सिर्फ जीते-जागते व्यक्ति को ही नुकसान पहुँचाती है। चिंता से जीवन बहुत कड़वा हो जाता है। लेकिन ईर्ष्या चिंता से भी ज़्यादा खतरनाक है। ऐसा इसलिए क्योंकि ईर्ष्या इंसान के अंदर की दया, प्यार और उदारता जैसे अच्छे गुणों को खत्म कर देती है। इन अच्छे गुणों के बिना इंसान का जीवन बेकार हो जाता है, जिसका कोई मतलब नहीं रहता। सकारात्मक मानवीय गुण ही व्यक्ति को जीवन का सही अर्थ और खुशी प्रदान करते हैं।
In simple words: लेखक कहते हैं कि चिंता से जीवन जलता है, पर ईर्ष्या उससे भी बुरी है। ईर्ष्या इंसान के अच्छे गुणों जैसे दया और प्रेम को खत्म कर देती है, जिससे जीवन बेकार हो जाता है।

🎯 Exam Tip: चिंता और ईर्ष्या के बीच के अंतर और ईर्ष्या के अधिक विनाशकारी स्वभाव को स्पष्ट करें।

 

Question 6. (स) 1. चिन्ताग्रस्त व्यक्ति का जीवन खराब हो जाता है लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति उससे भी अधिक बुरा है; क्योंकि ईष्या तो व्यक्ति के मौलिक गुणों को ही समाप्त कर देती है।
Answer: यह बात बिलकुल सच है कि चिंता में डूबे व्यक्ति का जीवन बहुत मुश्किल हो जाता है, लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति की हालत उससे भी ज़्यादा खराब होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि चिंता केवल परेशान करती है, जबकि ईर्ष्या इंसान के दया, प्रेम और उदारता जैसे खास अच्छे गुणों को पूरी तरह से खत्म कर देती है, जिससे वह अंदर से खोखला हो जाता है। मनुष्य की सच्ची पहचान उसके मौलिक गुणों से होती है, जिनका ईर्ष्या नाश कर देती है।
In simple words: चिंता में जीवन खराब होता है, पर ईर्ष्यालु व्यक्ति उससे भी बुरा है। ईर्ष्या इंसान के अच्छे गुणों को खत्म कर देती है।

🎯 Exam Tip: चिंता और ईर्ष्या के बीच के गहरे अंतर को समझाएं, विशेष रूप से ईर्ष्या के मौलिक गुणों पर पड़ने वाले प्रभाव पर जोर दें।

 

Question 6. (स) 2. चिन्ता को लोग चिता इसलिए कहते हैं क्योंकि चिन्ता भी व्यक्ति को चिता के समान ही जला डालती है ।
Answer: यह सही कहा गया है कि लोग चिंता को 'चिता' कहते हैं, क्योंकि जिस तरह चिता (अंतिम संस्कार की आग) शरीर को जला देती है, उसी तरह चिंता भी व्यक्ति को अंदर ही अंदर पूरी तरह से जलाकर खत्म कर देती है। यह मानसिक रूप से व्यक्ति को खोखला बना देती है, जिससे वह शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से कमजोर हो जाता है। निरंतर चिंता व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डालती है।
In simple words: लोग चिंता को चिता कहते हैं क्योंकि चिंता भी इंसान को अंदर से वैसे ही जलाती है जैसे चिता शरीर को जलाती है।

🎯 Exam Tip: चिंता के विनाशकारी प्रभाव को चिता से तुलना करके स्पष्ट करें, और मानसिक पीड़ा पर जोर दें।

मृत्यु शायद फिर भी श्रेष्ठ है, बनिस्बत इसके कि हमें अपने गुणों को कुंठित बनाकर जीना पड़े। चिन्तादग्ध व्यक्ति समाज की दया का पात्र है, किन्तु ईष्या से जला-भुना आदमी जहर की चलती-फिरती गठरी के समान है, जो हर जगह वायु को दूषित करती फिरती है।

 

Question 7. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध का एक अंश है। इसमें लेखक ने ईर्ष्या को चिंता से भी अधिक खतरनाक बताया है, क्योंकि यह मानवीय गुणों को नष्ट कर देती है और समाज में नकारात्मकता फैलाती है। यह पाठ हमें ईर्ष्या के विनाशकारी स्वभाव के बारे में जागरूक करता है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। गद्यांश के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 7. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Answer: लेखक कहते हैं कि इंसान की पहचान उसके अच्छे नैतिक गुणों से होती है। जिस व्यक्ति में प्यार, दया, सहानुभूति, दूसरों की मदद करने की भावना और त्याग जैसे गुण नहीं होते, वह सच्चा इंसान नहीं कहलाता। ईर्ष्या एक ऐसा ज़हर है जो इंसान के इन अच्छे गुणों को खत्म कर देता है और उसके जीवन को बेकार बना देता है। लेखक के अनुसार, ऐसे ईर्ष्यालु जीवन से तो मर जाना बेहतर है। चिंता में डूबा हुआ व्यक्ति किसी और को नुकसान नहीं पहुँचाता, इसलिए समाज के लोग उस पर दया दिखाते हैं। लेकिन ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति दूसरों को दुख पहुँचाने वाला होता है। वह खुद एक ज़हर की पोटली जैसा है, जो जहाँ भी जाता है, वहाँ के माहौल को खराब करता है और दूसरों की निंदा करके समाज में गंदगी फैलाता रहता है। मानवीय सद्गुणों का पोषण ही समाज और व्यक्ति दोनों के लिए सुख और शांति का मार्ग है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि इंसान के अच्छे गुण उसकी पहचान हैं, और ईर्ष्या इन गुणों को खत्म कर देती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति ज़हर की पोटली जैसा होता है जो समाज को खराब करता रहता है, जबकि चिंतित व्यक्ति दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाता।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या के नकारात्मक प्रभावों और मानवीय गुणों के विनाश पर जोर दें। ईर्ष्यालु व्यक्ति की तुलना जहर की गठरी से करने के पीछे का कारण स्पष्ट करें।

 

Question 7. (स) ईष्यालु और चिन्ताग्रस्त व्यक्ति में क्या अन्तर है ?
Answer: चिंतित व्यक्ति खुद को ही कष्ट देता है और वह किसी दूसरे को हानि नहीं पहुँचाता है। लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों को कष्ट पहुँचाने वाला होता है। वह एक ज़हर की चलती-फिरती गठरी जैसा होता है, जो जहाँ भी मौजूद होता है, वहाँ के माहौल को दूषित करता रहता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति की नकारात्मकता दूसरों पर भी असर डालती है। इस प्रकार, चिंता एक आंतरिक समस्या है, जबकि ईर्ष्या एक सामाजिक समस्या बन जाती है।
In simple words: चिंतित व्यक्ति खुद को दुख देता है, दूसरों को नहीं। लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों को दुख देता है और वह जहां भी जाता है, माहौल खराब करता है।

🎯 Exam Tip: दोनों के बीच का मुख्य अंतर स्पष्ट करें: चिंता स्व-केंद्रित है जबकि ईर्ष्या दूसरों को नुकसान पहुँचाती है।

ईष्या मनुष्य का चारित्रिक दोष नहीं है, प्रत्युत इससे मनुष्य के आनन्द में भी बाधा पड़ती है। जब भी मनुष्य के हृदय में ईष्या का उदय होता है, सामने का सुख उसे मद्धिम-सा दिखने लगता है। पक्षियों के गीत में जादू नहीं रह जाता और फूल तो ऐसे हो जाते हैं, मानो वे देखने के योग्य ही न हों।

 

Question 8. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध का एक अंश है। इसमें लेखक ने ईर्ष्या को केवल चारित्रिक दोष ही नहीं, बल्कि मनुष्य के आनंद में बाधा डालने वाला बताया है, और यह भी दर्शाया है कि कैसे ईर्ष्या व्यक्ति की प्राकृतिक सुंदरता और खुशियों को भी महसूस करने की क्षमता छीन लेती है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। गद्यांश के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 8. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या केवल इंसान का एक बड़ा दोष नहीं है, बल्कि यह उसकी खुशी में भी रुकावट डालती है। जिस व्यक्ति के मन में ईर्ष्या आ जाती है, उसे अपनी ही खुशियाँ कम लगने लगती हैं। वह एक अच्छी स्थिति में होने पर भी सुख का अनुभव नहीं कर पाता। जब वह पक्षियों की मीठी आवाज़ सुनता है या सुंदर खिले हुए फूल देखता है, तो उसे उनमें कोई जादू या सुंदरता नहीं दिखती। उसे उन चीज़ों से भी ईर्ष्या होने लगती है जो असल में खूबसूरत होती हैं। ईर्ष्या व्यक्ति की आंतरिक दृष्टि को धुंधला कर देती है, जिससे वह जीवन के सकारात्मक पहलुओं को देख नहीं पाता।
In simple words: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या इंसान के सुख को छीन लेती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति को अपनी खुशी और प्रकृति की सुंदरता भी अच्छी नहीं लगती।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या के कारण व्यक्ति के आनंद की कमी और प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति उसकी उदासीनता को स्पष्ट करें।

 

Question 8. (स) 1. ईष्यालु व्यक्ति किन सुखों से वंचित हो जाता है ?
Answer: ईर्ष्यालु व्यक्ति के सामने सुख के सभी साधन होने पर भी वह उनका आनंद नहीं ले पाता। वह अपने अंदर की शांति और खुशी से वंचित रहता है। इसके साथ ही, वह प्रकृति की सुंदरता, जैसे पक्षियों का मधुर गायन या खिले हुए फूलों का भी आनंद नहीं उठा पाता। उसकी आंतरिक अशांति बाहरी सुंदरता को भी फीका कर देती है। ईर्ष्या व्यक्ति को बाहरी दुनिया से काट देती है और उसे एकाकी बना देती है।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति सुख के सारे साधन होने पर भी खुश नहीं रह पाता। उसे अंदर की शांति और प्रकृति की सुंदरता का भी आनंद नहीं मिलता।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु व्यक्ति की आंतरिक अशांति और प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति उसकी उदासीनता पर ध्यान केंद्रित करें।

 

Question 8. (स) 2. ईष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार क्या है ?
Answer: ईर्ष्यालु व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा इनाम यह है कि वह दूसरों की बुराई करके और अपने विरोधियों को मानसिक रूप से चोट पहुँचाकर हंसता है। यह दूसरों को नीचा दिखाकर मिलने वाला क्षणिक आनंद उसके लिए सबसे बड़ी खुशी होता है। वह इस 'जीत' को अपना सबसे बड़ा पुरस्कार मानता है। यह नकारात्मक 'पुरस्कार' उसे आत्म-विनाश की ओर ले जाता है, क्योंकि सच्ची खुशी दूसरों को खुश देखने में होती है।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा इनाम यह है कि वह अपने विरोधियों की बुराई करके और उन्हें नीचा दिखाकर हंसता है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु व्यक्ति के 'पुरस्कार' के नकारात्मक और विनाशकारी अर्थ को समझाएं।

आप कहेंगे कि निन्दा के बाण से अपने प्रतिद्वन्द्रियों को बेधकर हँसने में एक आनन्द है और यह आनन्द ईर्ष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है। मगर, यह हँसी मनुष्य की नहीं, राक्षस की हँसी होती है। और यह आनन्द भी दैत्यों का आनन्द होता है।

 

Question 9. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध का एक अंश है। इसमें लेखक ने निंदा और ईर्ष्या से मिलने वाले क्षणिक आनंद की प्रकृति को समझाया है और बताया है कि यह खुशी अमानवीय होती है। यह पाठ नकारात्मक प्रवृत्तियों के विनाशकारी स्वभाव पर प्रकाश डालता है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। गद्यांश के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 9. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: इस गद्यांश में लेखक बताते हैं कि अक्सर निंदा करने वाला व्यक्ति अपने कड़वे शब्दों से दूसरों को चोट पहुँचाकर खुश होता है। वह सोचता है कि उसने निंदा करके अपने विरोधी को दूसरों की नज़रों में गिरा दिया है और खुद उनकी जगह ऊपर आ गया है। इसलिए वह खुश होता है, और यह खुशी पाना ही उसका मुख्य लक्ष्य बन जाता है। लेकिन असल में, ईर्ष्यालु व्यक्ति की यह हँसी और यह क्रूर खुशी राक्षसी और शैतानी खुशी होती है। यह इंसानियत या मानवता वाली खुशी नहीं है, बल्कि एक बुराई है। सच्ची खुशी दूसरों की भलाई में होती है, न कि उन्हें नीचा दिखाने में।
In simple words: लेखक कहते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों की निंदा करके खुश होता है, वह सोचता है कि उसने विरोधी को नीचा दिखा दिया है। लेकिन ऐसी हँसी इंसानियत की नहीं, बल्कि राक्षस की हँसी होती है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु व्यक्ति की हँसी के अमानवीय स्वरूप को स्पष्ट करें, और इसे राक्षसी आनंद से तुलना करके समझाएँ।

 

Question 9. (स) 1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
Answer: इस गद्यांश में लेखक यह बताना चाहते हैं कि ईर्ष्यालु व्यक्ति का स्वभाव राक्षसी होता है। उसकी खुशियाँ और हँसी आम इंसानों जैसी नहीं होती, बल्कि दूसरों को नुकसान पहुँचाने की भावना से भरी होती हैं। यह उसकी अमानवीय प्रवृत्ति को दर्शाता है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्यालु व्यक्ति राक्षस के जैसा होता है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु व्यक्ति के नकारात्मक और अमानवीय स्वभाव को स्पष्ट करें।

 

Question 9. (स) 2. ईष्यालु व्यक्ति की हँसी और आनन्द कैसा होता है ?
Answer: ईर्ष्यालु व्यक्ति की हँसी और खुशी आम लोगों की हँसी और खुशी से बिल्कुल अलग होती है। उसकी हँसी राक्षसों जैसी और उसका आनंद शैतानों जैसा होता है। यह दूसरों को दुख पहुँचाने और नीचा दिखाने से मिलता है, जो कि अमानवीय है। ऐसी नकारात्मक खुशी व्यक्ति को अंदर से खोखला कर देती है और उसे वास्तविक संतोष से दूर रखती है।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति की हँसी और खुशी राक्षसों और दैत्यों जैसी होती है, सामान्य इंसानों जैसी नहीं।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु व्यक्ति की हँसी के क्रूर और नकारात्मक स्वरूप को उदाहरण के साथ समझाएँ।

ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वन्द्विता से होता है, क्योंकि भिखमंगा करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता। यह एक ऐसी बात है, जो ईर्ष्या के पक्ष में भी पड़ सकती है; क्योंकि प्रतिद्वन्द्विता से मनुष्य का विकास होता है, किन्तु अगर आप संसारव्यापी सुयश चाहते हैं तो आप रसेल के मतानुसार, शायद नेपोलियन से स्पर्धा करेंगे। मगर याद रखिए कि नेपोलियन भी सीज़र से स्पर्धा करता था और सीज़र सिकन्दर से तथा सिकन्दर हरकुलिस से ।

 

Question 10. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' के निबंध 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' का एक अंश है। इसमें लेखक ने समझाया है कि ईर्ष्या का संबंध अक्सर प्रतिद्वंद्विता से होता है, लेकिन सकारात्मक प्रतिद्वंद्विता ही व्यक्ति को विकास की ओर ले जाती है। यह पाठ हमें बताता है कि हमें किससे और क्यों स्पर्धा करनी चाहिए।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। गद्यांश के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 10. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या इंसान का एक दोष है क्योंकि यह खुशी में रुकावट डालती है। लेकिन एक तरह से यह फायदेमंद भी हो सकती है। ईर्ष्या के अंदर मुकाबला करने की भावना छुपी होती है। ईर्ष्या के कारण इंसान दूसरों से मुकाबला करता है और इससे उसका जीवन बेहतर होता है। यहाँ एक बात ध्यान देने वाली है कि यह मुकाबला बराबर के लोगों से नहीं, बल्कि उन लोगों से करना चाहिए जो हमसे थोड़े ज़्यादा आगे हों। इसी वजह से एक गरीब आदमी किसी करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता। यही मुकाबला करने की भावना ईर्ष्या को सही ठहरा सकती है, क्योंकि मुकाबला करने से ही कोई भी इंसान तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ता है। सकारात्मक प्रतिद्वंद्विता व्यक्ति को आत्म-सुधार और उत्कृष्टता की ओर प्रेरित करती है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या एक दोष है, पर इसमें मुकाबला करने की भावना भी होती है। जब लोग दूसरों से मुकाबला करते हैं तो वे तरक्की करते हैं। यह मुकाबला हमेशा अपने से बेहतर लोगों से करना चाहिए।

🎯 Exam Tip: प्रतिद्वंद्विता के सकारात्मक पहलू को समझाएँ और स्पष्ट करें कि यह कैसे व्यक्तिगत विकास को बढ़ावा देती है।

 

Question 10. (स) 1. यश की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को क्या करना चाहिए ?
Answer: जो व्यक्ति प्रसिद्धि पाना चाहता है, उसे ऐसे लोगों से मुकाबला करना चाहिए जो उससे थोड़े ज़्यादा सफल हों। ऐसा इसलिए है क्योंकि सही तरह का मुकाबला ही व्यक्ति को आगे बढ़ने में मदद करता है। यह मुकाबला हमें खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करता है। सही मार्गदर्शन में की गई प्रतिस्पर्धा व्यक्ति के कौशल और क्षमताओं को निखारती है।
In simple words: यश चाहने वाले को अपने से ज़्यादा सफल लोगों से मुकाबला करना चाहिए, क्योंकि इससे तरक्की मिलती है।

🎯 Exam Tip: सकारात्मक प्रतिद्वंद्विता के महत्व को समझाएं और बताएं कि यह कैसे व्यक्तिगत उन्नति में सहायक है।

 

Question 10. (स) 2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने ईष्या के सम्बन्ध में कौन-सी सकारात्मक बात कही है?
Answer: इस गद्यांश में लेखक ने ईर्ष्या के बारे में एक अच्छी बात बताई है। वह यह है कि ईर्ष्या के अंदर मुकाबला करने की भावना छुपी होती है, और यही भावना इंसान को तरक्की की राह पर ले जाती है। यह हमें बेहतर बनने के लिए प्रेरित करती है। यह प्रतिद्वंद्विता व्यक्ति को अपनी सीमाओं से परे जाने के लिए प्रोत्साहित करती है।
In simple words: लेखक ने कहा है कि ईर्ष्या में छिपी मुकाबला करने की भावना इंसान को तरक्की दिला सकती है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या के उस पहलू को उजागर करें जो रचनात्मक प्रतिद्वंद्विता और व्यक्तिगत विकास को बढ़ावा देता है।

 

Question 10. (स) 3. विश्वव्यापी प्रसिद्धि के इच्छुक व्यक्ति किससे स्पर्धा करेंगे और उन्हें क्या याद रखना | चाहिए?
Answer: अगर कोई व्यक्ति पूरी दुनिया में मशहूर होना चाहता है, तो उसे नेपोलियन जैसे बड़े और महत्वाकांक्षी शासकों से मुकाबला करना होगा, जैसा कि विद्वान रसेल ने कहा है। साथ ही, उसे यह भी याद रखना चाहिए कि नेपोलियन ने जूलियस सीज़र से, सीज़र ने सिकंदर से और सिकंदर ने हरक्यूलिस से मुकाबला किया था। इन महान सम्राटों को उनकी विश्वव्यापी पहचान इसी मुकाबला करने की भावना से मिली थी। यह उन्हें बेहतर बनने के लिए प्रेरित करती रही। इतिहास बताता है कि महान व्यक्ति हमेशा अपने से महान हस्तियों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते हैं।
In simple words: पूरी दुनिया में मशहूर होने के लिए नेपोलियन जैसे महान लोगों से मुकाबला करना चाहिए, और याद रखना चाहिए कि महान लोगों ने भी एक-दूसरे से मुकाबला किया था।

🎯 Exam Tip: विश्वव्यापी प्रसिद्धि के लिए महत्वाकांक्षी लोगों से प्रेरणा लेने और उनके संघर्षों को याद रखने के महत्व पर जोर दें।

 

Question 10. (स) 4. प्रतिद्वन्द्विता से क्या लाभ होता है ?
Answer: मुकाबला करने से इंसान का विकास होता है। यह उसे अपनी क्षमताओं को बढ़ाने और नए लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। एक स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता व्यक्ति को आत्म-सुधार की ओर ले जाती है। प्रतिद्वंद्विता हमें अपने आराम क्षेत्र से बाहर निकलने और अपनी पूरी क्षमता का एहसास करने में मदद करती है।
In simple words: मुकाबला करने से इंसान आगे बढ़ता है और खुद को बेहतर बनाता है।

🎯 Exam Tip: प्रतिद्वंद्विता को व्यक्तिगत विकास और आत्म-सुधार के एक प्रेरक के रूप में प्रस्तुत करें।

ईष्या का एक पक्ष, सचमुच ही लाभदायक हो सकता है, जिसके अधीन हर आदमी, हर जाति और हर दल अपने को अपने प्रतिद्वन्द्वी का समकक्ष बनाना चाहता है, किन्तु यह तभी सम्भव है, जब कि ईर्ष्या से जो प्रेरणा आती हो, वह रचनात्मक हो । अक्सर तो ऐसा ही होता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति यह महसूस करता है कि कोई चीज है, जो उसके भीतर नहीं है, कोई वस्तु है, जो दूसरों के पास है, किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि इस वस्तु को प्राप्त कैसे करना चाहिए और गुस्से में आकर वह अपने किसी पड़ोसी मित्र या समकालीन व्यक्ति को अपने से श्रेष्ठ मानकर उससे जलने लगता है, जबकि ये लोग भी अपने आपसे शायद वैसे ही असन्तुष्ट हों ।

 

Question 11. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध का एक अंश है। इसमें लेखक ने ईर्ष्या के एक सकारात्मक पहलू की चर्चा की है, जहाँ यह रचनात्मक प्रेरणा का स्रोत बन सकती है, लेकिन अक्सर ईर्ष्यालु व्यक्ति इस प्रेरणा का सही उपयोग नहीं कर पाता और दूसरों से जलने लगता है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। गद्यांश के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 11. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या की भावना कई तरीकों से बुरी है, लेकिन इसका एक अच्छा पहलू भी है। यह अच्छा पहलू यह है कि जब कोई व्यक्ति, जाति या समूह अपने विरोधी को देखता है, तो उसके मन में यह विचार आता है कि उसे भी अपने विरोधी के बराबर बनना है। इसके लिए वह ज़रूरी कोशिशें करने लगता है। लेकिन यह तभी मुमकिन हो सकता है, जब ईर्ष्या से मिलने वाली प्रेरणा विनाशकारी न होकर कुछ बनाने वाली हो। यानी, ईर्ष्या हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे, न कि दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए। रचनात्मक ईर्ष्या व्यक्ति को अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने और अपनी क्षमताओं को बढ़ाने में मदद करती है।

लेखक दिनकर जी कहते हैं कि ज़्यादातर ऐसा ही होता है कि कोई व्यक्ति अपने विरोधी को देखकर अपनी काबिलियत, गुण, कौशल या साधनों को बढ़ाने के बजाय, दूसरों की चीज़ों की कमी महसूस करने लगता है। उसे ईर्ष्या के कारण दूसरों की ताकत और अपनी कमजोरी ही दिखाई देती रहती है। उसे यह समझ ही नहीं आता कि दूसरों की तरक्की से ईर्ष्या करने के बजाय वह अपनी कमियों को कैसे पूरा करे। वह अपनी कमी की हालत पर दुखी और गुस्सा होकर, किसी ऐसे व्यक्ति से ईर्ष्या करने लगता है जिसे वह खुद से बेहतर मानता है। जबकि यह भी हो सकता है कि जिस व्यक्ति से वह ईर्ष्या कर रहा है, वह भी अपनी किसी कमी के कारण खुद से खुश न हो। यह मानवीय स्वभाव का एक जटिल पहलू है जहाँ ईर्ष्या रचनात्मकता को रोककर नकारात्मकता को बढ़ावा देती है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या के दो पहलू हैं। एक अच्छा, जहाँ यह हमें मुकाबला करके आगे बढ़ने को प्रेरित करती है। दूसरा, जो ज़्यादातर दिखता है, जहाँ ईर्ष्या के कारण व्यक्ति दूसरों की चीज़ें देखकर दुखी होता है और अपनी कमियों को पूरा करने के बजाय उनसे जलने लगता है। वह यह भूल जाता है कि सच्ची तरक्की खुद को बेहतर बनाने से आती है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या के दोनों पहलुओं - रचनात्मक और विध्वंसात्मक - को स्पष्ट करें। समझाएं कि कैसे रचनात्मक ईर्ष्या व्यक्ति को प्रेरित कर सकती है, जबकि विध्वंसात्मक ईर्ष्या उसे नुकसान पहुँचाती है।

 

Question 11. (स) 1. ईष्यालु व्यक्ति लोगों से क्यों ईष्या करने लगता है ?
Answer: ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों से इसलिए ईर्ष्या करने लगता है क्योंकि वह यह समझ नहीं पाता कि जो चीजें दूसरों के पास हैं और उसके पास नहीं हैं, उन्हें पाने का सही तरीका क्या है। वह रचनात्मक समाधान खोजने के बजाय केवल जलने में समय बर्बाद करता है। ज्ञान और आत्म-चिंतन की कमी अक्सर ईर्ष्या को जन्म देती है।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों से ईर्ष्या इसलिए करता है क्योंकि उसे पता नहीं होता कि दूसरों की चीजें कैसे पाई जाएँ।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु व्यक्ति की रचनात्मक सोच की कमी और समस्या-समाधान के प्रति उसकी अक्षमता पर जोर दें।

 

Question 11. (स) 2. ईष्या का लाभदायक पक्ष क्या है और यह कैसे सम्भव है ?
Answer: ईर्ष्या का एक अच्छा पहलू यह है कि जब हर इंसान, हर जाति या हर समूह अपने विरोधी को देखता है, तो उनके मन में यह विचार आता है कि उन्हें भी अपने विरोधी के बराबर बनना है। इसके लिए वे ज़रूरी कोशिशें करने लगते हैं। यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है। यह रचनात्मक प्रेरणा व्यक्ति को अपनी क्षमताओं से बढ़कर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करती है।
In simple words: ईर्ष्या का अच्छा पहलू यह है कि यह लोगों को अपने विरोधियों जैसा बनने के लिए प्रेरित करती है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या के रचनात्मक पहलू को समझाएं, जिसमें यह व्यक्तिगत और सामूहिक विकास के लिए प्रेरक बन सकती है।

 

Question 11. (स) 3. जब कोई वस्तु किसी के पास नहीं होती और वह यह नहीं समझ पाता कि इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है तो वह उस व्यक्ति को अपने से श्रेष्ठ समझकर उससे ईष्या करने लगता है।
Answer: यह सच है कि जब किसी व्यक्ति के पास कोई चीज़ नहीं होती और उसे यह समझ नहीं आता कि उसे कैसे हासिल किया जाए, तो वह उस चीज़ को रखने वाले व्यक्ति को खुद से बेहतर समझने लगता है और उससे ईर्ष्या करने लगता है। यह नकारात्मक भावना उसे समाधान खोजने से रोकती है। अज्ञानता और असफलता को स्वीकार न कर पाना अक्सर ईर्ष्या की जड़ होते हैं।
In simple words: जब व्यक्ति किसी चीज को पाने का तरीका नहीं समझ पाता, तो वह उसे रखने वाले से ईर्ष्या करने लगता है।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या के मूल कारण को समझाएं, जो अक्सर ज्ञान की कमी और आत्म-बोध से जुड़ा होता है।

तो ईष्यालु लोगों से बचने का क्या उपाय है? नीत्से कहता है कि “बाजार की मक्खियों को छोड़कर एकान्त की ओर भागो । जो कुछ भी अमर तथा महान् है, उसकी रचना और निर्माण बाजार तथा सुयश से दूर रहकर किया जाता है। जो लोग नये मूल्यों का निर्माण करने वाले होते हैं, वे बाजारों में नहीं बसते, वे शोहरत के पास भी नहीं रहते।” जहाँ बाजार की मक्खियाँ नहीं भिनकतीं, वहाँ एकान्त है। यह तो हुआ ईष्यालु लोगों से बचने का उपाय, किन्तु ईष्या से आदमी कैसे बच सकता है?

 

Question 12. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध का एक अंश है। इसमें लेखक ने ईर्ष्यालु लोगों से दूर रहने और एकांत में रहकर रचनात्मक कार्य करने का महत्व बताया है, साथ ही यह भी विचार किया है कि व्यक्ति ईर्ष्या से कैसे मुक्त हो सकता है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। गद्यांश के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 12. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: लेखक हमें ईर्ष्यालु लोगों से दूर रहने की सलाह देते हैं। मशहूर दार्शनिक नीत्से ने ईर्ष्यालु लोगों को 'बाज़ार की मक्खियाँ' कहा है। जिस तरह मक्खियाँ गंदगी पर बैठकर बीमारियाँ फैलाती हैं, वैसे ही ईर्ष्यालु लोग दूसरों की बुराई करके समाज के माहौल में ज़हर घोलते हैं और उसे खराब करते हैं। अगर कोई इंसान अपने जीवन में कोई बड़ा और अच्छा काम करना चाहता है, तो उसे शांत और अकेले स्थान पर जाना चाहिए, जहाँ ये ईर्ष्यालु लोग उसे परेशान न कर सकें। एकांत में ही सच्ची रचनात्मकता पनपती है। शांत और रचनात्मक माहौल व्यक्ति को आंतरिक शांति और उच्च विचारों की ओर ले जाता है।

लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' कहते हैं कि ईर्ष्यालु लोगों के साथ रहकर कोई भी अच्छा या नया काम नहीं किया जा सकता है। बड़े और रचनात्मक काम भीड़ से दूर रहकर ही किए जाते हैं। महान काम करने के लिए प्रसिद्धि की लालच छोड़नी पड़ती है। जो लोग समाज के लिए नए विचार और मूल्य बनाते हैं, वे ऐसे प्रतिस्पर्धी माहौल से दूर रहते हैं जहाँ 'बाज़ार की मक्खियाँ' (ईर्ष्यालु लोग) मौजूद होते हैं। नीत्से के अनुसार, एकांत वही जगह है जहाँ ऐसे ईर्ष्यालु लोग नहीं मिलते। इसलिए, सच्चा विकास और महानता अकेले में ही प्राप्त की जा सकती है। एकांत चिंतन और आत्म-अनुशासन ही व्यक्ति को बाहरी दुनिया के शोर और नकारात्मकता से बचाता है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्यालु लोगों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि वे समाज में बुराई फैलाते हैं। नीत्से के अनुसार, बड़े और महान काम अकेले शांत जगह पर ही होते हैं, जहाँ ईर्ष्यालु लोग नहीं होते। इसलिए, प्रसिद्धि की लालच छोड़कर अकेले में रचनात्मक कार्य करना चाहिए।

🎯 Exam Tip: नीत्से के विचारों का उल्लेख करते हुए एकांत और रचनात्मकता के महत्व पर जोर दें, और ईर्ष्यालु लोगों को 'बाज़ार की मक्खियों' के रूप में समझाएँ।

 

Question 12. (स) 1. ईष्यालु व्यक्तियों से बचने का एकमात्र उपाय उनसे दूर रहना है; अर्थात् व्यक्तियों को ऐसे स्थान में रहना चाहिए जहाँ ईर्ष्यालु लोग न पहुँच सकें ।
Answer: यह बात सही है कि ईर्ष्यालु लोगों से बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उनसे दूर रहा जाए। इसका मतलब है कि हमें ऐसी जगहों पर रहना चाहिए जहाँ ईर्ष्यालु लोग न आ सकें। ऐसे शांत और सुरक्षित स्थान व्यक्ति को उनकी नकारात्मकता से बचाते हैं। यह एक प्रकार का आत्म-सुरक्षा उपाय है। सही वातावरण का चुनाव व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य और उत्पादकता के लिए महत्वपूर्ण है।
In simple words: ईर्ष्यालु लोगों से बचने का सबसे अच्छा तरीका उनसे दूर रहना है, ऐसी जगह रहना जहाँ वे न पहुँच सकें।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्यालु लोगों से दूरी बनाए रखने के महत्व को स्पष्ट करें, इसे मानसिक शांति और आत्म-विकास के लिए आवश्यक बताएं।

 

Question 12. (स) 2. प्रस्तुत गद्यांश में प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्से के मत का उल्लेख करते हुए लेखक ने ईष्यालु व्यक्ति से दूर रहने की सलाह दी है और कहा है कि विश्व में जो भी महान् कार्य हुए हैं, वे सभी एकान्तसेवियों ने ही किये हैं।
Answer: यह सच है कि इस गद्यांश में लेखक ने मशहूर दार्शनिक नीत्से की राय बताते हुए ईर्ष्यालु व्यक्ति से दूर रहने की सलाह दी है। लेखक कहते हैं कि दुनिया में जितने भी बड़े और महान काम हुए हैं, वे सभी अकेले रहकर काम करने वाले लोगों ने ही किए हैं। एकांत में रहकर ही व्यक्ति सच्चे अर्थों में रचनात्मक और महान बन पाता है। नीत्से का यह विचार रचनात्मकता के लिए आंतरिक शांति और स्वतंत्रता के महत्व पर ज़ोर देता है।
In simple words: लेखक ने नीत्से के मत से कहा है कि ईर्ष्यालु लोगों से दूर रहना चाहिए क्योंकि दुनिया के सभी महान काम अकेले रहने वाले लोगों ने किए हैं।

🎯 Exam Tip: नीत्से के दर्शन को समझाएं, जिसमें एकांत को महान कार्यों और रचनात्मकता के लिए एक शर्त माना गया है।

 

Question 12. (स) 3. नीत्से के अनुसार बाजार की मक्खियों से आशय ईष्यालु व्यक्तियों से है। जिस प्रकार मक्खियाँ मिठाई के आस-पास भिनभिनाती रहती हैं, उसी प्रकार ईष्यालु व्यक्ति यश रूपी मिठाई अर्थात् यशस्वी लोगों के आस-पास भिनभिनाते रहते हैं और मौका मिलते ही उनकी निन्दा करते हैं और समाज के वातावरण में जहर घोलकर उसे प्रदूषित करते हैं।
Answer: यह बात सही है कि नीत्से के अनुसार, 'बाज़ार की मक्खियाँ' का मतलब ईर्ष्यालु लोग हैं। जैसे मक्खियाँ मिठाई के आसपास भिनभिनाती रहती हैं, वैसे ही ईर्ष्यालु लोग भी प्रसिद्ध और सफल लोगों के आसपास मंडराते रहते हैं। उन्हें मौका मिलते ही वे उनकी बुराई करना शुरू कर देते हैं और समाज के माहौल में ज़हर घोलकर उसे खराब करते हैं। वे हमेशा दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। यह उपमा ईर्ष्यालु लोगों की नकारात्मक और परेशान करने वाली प्रकृति को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
In simple words: नीत्से के अनुसार, 'बाज़ार की मक्खियाँ' ईर्ष्यालु लोग हैं। जैसे मक्खियाँ मिठाई पर मंडराती हैं, वैसे ही ये लोग सफल लोगों पर मंडराते हैं और उनकी निंदा करके समाज को खराब करते हैं।

🎯 Exam Tip: 'बाज़ार की मक्खियों' के रूपक को स्पष्ट करें, और ईर्ष्यालु लोगों के नकारात्मक प्रभाव को समझाएँ।

 

Question 12. (स) 4. नये मूल्यों का निर्माण करने वाले लोग बाजार जैसे प्रतिस्पर्धा के स्थानों से और शोहरत से दूर रहते
Answer: यह बात सही है कि जो लोग नए विचार और मूल्य बनाते हैं, वे बाज़ार जैसी प्रतिस्पर्धा वाली जगहों और प्रसिद्धि की चकाचौंध से दूर रहते हैं। वे शांत और एकांत में रहकर अपने काम पर ध्यान केंद्रित करते हैं, क्योंकि सच्चा सृजन और महानता दिखावे से दूर होती है। उन्हें बाहरी पहचान से ज़्यादा अपने आंतरिक कार्य की संतुष्टि महत्वपूर्ण लगती है। सच्चे नवप्रवर्तक आंतरिक प्रेरणा से काम करते हैं, न कि बाहरी पहचान या प्रशंसा की चाहत से।
In simple words: नए मूल्य बनाने वाले लोग दिखावे और मुकाबले से दूर रहते हैं, वे शांति से अपना काम करते हैं।

🎯 Exam Tip: नए मूल्यों के सृजन के लिए एकांत और बाहरी प्रतिस्पर्धा से दूरी के महत्व पर जोर दें।

ईष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईष्यालु बन गया है, उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है। जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा आएगी, उस दिन से वह ईष्या करना कम कर देगा।

 

Question 13. (अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
Answer: यह गद्यांश रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध का एक अंश है। इसमें लेखक ने ईर्ष्या से मुक्ति पाने के लिए मानसिक अनुशासन और आत्म-चिंतन के महत्व को समझाया है। यह बताता है कि अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें रचनात्मक तरीके से दूर करना ही ईर्ष्या से बचने का सही तरीका है।
In simple words: यह गद्यांश 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से है, जिसे रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है।

🎯 Exam Tip: पाठ और लेखक का नाम सही से लिखें। गद्यांश के मुख्य विषय को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question 13. (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या से बचने का सबसे अच्छा तरीका अपने मन को नियंत्रित करना है। मन स्वाभाविक रूप से चंचल होता है, और इसे काबू में रखकर ही ईर्ष्या से बचा जा सकता है। हमारे पास जो चीजें नहीं हैं, उनके बारे में सोचना बेकार है। जिस व्यक्ति के मन में ईर्ष्या पैदा हो जाती है, उसे यह पता लगाना चाहिए कि उसे किस कमी के कारण ईर्ष्या हुई है। फिर उसे उन कमियों को दूर करने के लिए सकारात्मक प्रयास करने चाहिए। उसे ऐसे तरीके ढूंढने चाहिए जिससे वह अपनी उन कमियों को पूरा कर सके। अपनी कमियों को रचनात्मक रूप से दूर करना ही ईर्ष्या से मुक्ति का मार्ग है। आत्म-बोध और आत्म-सुधार ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने की कुंजी है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या से बचने के लिए मन को काबू करना ज़रूरी है। जो चीजें नहीं हैं, उनके बारे में सोचने के बजाय, यह पता लगाओ कि किस कमी से ईर्ष्या हुई है और उसे कैसे ठीक किया जाए।

🎯 Exam Tip: व्याख्या में मानसिक अनुशासन और आत्म-चिंतन के महत्व पर जोर दें, और बताएं कि अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करना क्यों जरूरी है।

 

Question 13. (स) 1. ईर्ष्या से बचने के लिए क्या उपाय करना चाहिए ?
Answer: ईर्ष्या से बचने के लिए व्यक्ति को अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए। उसे अपने विचारों को अनुशासित करना होगा और फालतू की बातों पर ध्यान देना छोड़ना होगा। मानसिक शांति और आत्म-नियंत्रण ही ईर्ष्या से मुक्ति दिला सकता है। नियमित ध्यान और सकारात्मक सोच मानसिक अनुशासन को बनाए रखने में सहायक होते हैं।
In simple words: ईर्ष्या से बचने के लिए हमें अपने मन पर काबू रखना चाहिए और मानसिक अनुशासन अपनाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: मानसिक अनुशासन और आत्म-नियंत्रण को ईर्ष्या से बचने के प्राथमिक उपाय के रूप में प्रस्तुत करें।

 

Question 13. (स) 2. ईष्यालु व्यक्ति कब से ईर्ष्या करना कम कर सकता है ?
Answer: ईर्ष्यालु व्यक्ति उसी दिन से ईर्ष्या करना कम कर सकता है जिस दिन उसे यह समझ आ जाएगा कि वह किस कमी के कारण ईर्ष्यालु बना है। साथ ही, उसे यह भी पता चल जाए कि उस कमी को पूरा करने का सही और सकारात्मक तरीका क्या है। अपनी समस्याओं को समझकर उनका समाधान खोजने से ईर्ष्या धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। आत्म-जागरूकता और रचनात्मक समस्या-समाधान ईर्ष्या को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: ईर्ष्यालु व्यक्ति तब से ईर्ष्या करना कम कर सकता है जब उसे अपनी कमी और उसे पूरा करने का तरीका पता चल जाए।

🎯 Exam Tip: आत्म-बोध और रचनात्मक समाधान खोजने के महत्व को बताएं, जो ईर्ष्या को कम करने में सहायक होते हैं।

 

Question 13. (स) 3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
Answer: इस गद्यांश में लेखक ने साफ किया है कि ईर्ष्या की जड़ अक्सर किसी न किसी कमी या अभाव में होती है। लेखक का मुख्य संदेश यह है कि ईर्ष्या से बचने का एकमात्र तरीका अपने मन को काबू में रखना है। मन पर नियंत्रण करके ही व्यक्ति इस नकारात्मक भावना से मुक्त हो सकता है। यह हमें सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियों से ज़्यादा आंतरिक नियंत्रण ज़रूरी है।
In simple words: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या कमी के कारण पैदा होती है, और इससे बचने का एक ही उपाय है - मन पर काबू रखना।

🎯 Exam Tip: ईर्ष्या के मूल कारण (अभाव) और उसके समाधान (मानसिक नियंत्रण) पर लेखक के मुख्य संदेश को स्पष्ट करें।

व्याकरण एवं रचना-बोध

 

Question 1. निम्नलिखित शब्दों से उपसर्गों को पृथक् कीजिए-अत्यन्त, दरअसल, निमग्न, निर्मल, साकार, अपव्यय, समकक्ष, दुर्भावना, अनुशासन।
Answer:

शब्दउपसर्गमूल शब्दशब्दउपसर्गमूल शब्द
अत्यन्तअतिअन्तअपव्ययअपव्यय
दरअसलदरअसलसमकक्षसमकक्ष
निमग्ननिमग्नदुर्भावनादुर्भावना
निर्मलनिरमलअनुशासनअनुशासन
साकारआकार
In simple words: उपसर्ग वे शब्दांश होते हैं जो किसी शब्द के शुरू में लगकर उसका अर्थ बदल देते हैं। यहाँ दिए गए शब्दों से उपसर्गों को अलग करके दिखाया गया है।

🎯 Exam Tip: उपसर्ग को पहचानते समय मूल शब्द का अर्थ समझना ज़रूरी है, क्योंकि उपसर्ग हमेशा मूल शब्द के पहले लगता है।

 

Question 2. निम्नलिखित शब्दों से प्रत्ययों को पृथक् करके लिखिए-ईष्यालु, लाभदायक, मौलिक, रचनात्मक, समकालीन, अहंकार।
Answer:

शब्दप्रकृति (मूल शब्द )प्रत्यय
ईष्यालुईर्ष्याआलु
लाभदायकलाभदायक
मौलिकमूलइक
रचनात्मकरचनाआत्मक
समकालीनसमकालईन
अहंकारअहम्कार
In simple words: प्रत्यय वे शब्दांश होते हैं जो किसी शब्द के आखिर में लगकर उसके अर्थ में बदलाव लाते हैं। यहाँ शब्दों से मूल शब्द और प्रत्यय को अलग-अलग करके दिखाया गया है।

🎯 Exam Tip: प्रत्यय को पहचानते समय मूल शब्द का सही अर्थ जानना महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रत्यय हमेशा मूल शब्द के बाद आता है।

 

Question 3. निम्नलिखित शब्दों का वाक्य-प्रयोग द्वारा अर्थ स्पष्ट कीजिए-प्रतिद्वन्द्वी-प्रतिद्वन्द्विता, मूर्ति-मूर्त, जिज्ञासा-जिज्ञासु, चरित्र-चारित्रिक।
Answer:
प्रतिद्वन्द्वी-प्रतिद्वन्द्विता: स्वस्थ मुकाबला तभी कहा जा सकता है, जब मुकाबला करने वाले लोग एक-दूसरे से ईर्ष्या न करें। उदाहरण: खेल में प्रतिद्वंद्विता अच्छी होती है, लेकिन उसमें कोई बुराई नहीं होनी चाहिए। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हमेशा दोनों पक्षों को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करती है।
मूर्ति-मूर्त: 'मूर्त' का अर्थ होता है साकार या ठोस रूप में दिखना। मूर्तिकार अपनी कल्पना को अपनी बनाई हुई मूर्ति में साकार रूप दे देता है। उदाहरण: उसने अपनी भावनाओं को इस पेंटिंग में मूर्त रूप दिया। कलाकार अपनी रचनात्मकता से अमूर्त विचारों को मूर्त रूप देते हैं।
जिज्ञासा-जिज्ञासु: 'जिज्ञासा' का अर्थ है जानने की इच्छा और 'जिज्ञासु' वह व्यक्ति है जिसमें यह इच्छा होती है। उदाहरण: अपनी जानने की इच्छा को शांत करने के लिए, जिज्ञासु व्यक्ति हर जगह घूमता रहता है। एक जिज्ञासु बच्चा हमेशा नए सवाल पूछता है। जिज्ञासा ही मनुष्य को ज्ञान के नए द्वार खोलने के लिए प्रेरित करती है।
चरित्र-चारित्रिक: 'चरित्र' का मतलब है व्यक्ति का स्वभाव या आचरण, और 'चारित्रिक' उससे संबंधित है। उदाहरण: समाज के नैतिक विकास के लिए हर व्यक्ति को अपना स्वभाव अच्छा और साफ रखना चाहिए। अच्छे चरित्र वाले लोग समाज की नींव होते हैं। उत्तम चरित्र ही व्यक्ति को समाज में सम्मान और विश्वास दिलाता है।
In simple words: इन शब्दों का वाक्य में प्रयोग करके उनके अर्थ को समझाया गया है, जैसे स्वस्थ मुकाबला बिना ईर्ष्या के होता है, मूर्तिकार कल्पना को ठोस रूप देता है, जिज्ञासु जानने की इच्छा रखता है, और अच्छा चरित्र समाज के लिए महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: वाक्य प्रयोग करते समय शब्द का सही अर्थ स्पष्ट हो, और वाक्य सरल व सटीक हो।

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