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Detailed Chapter 5 अग्रपूजा UP Board Solutions for Class 10 Hindi
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Class 10 Hindi Chapter 5 अग्रपूजा UP Board Solutions PDF
Question 1. 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य का सारांश, कथासार, या कथावस्तु संक्षेप में लिखिए अथवा इसकी प्रमुख घटना का उल्लेख कीजिए।
Answer: श्री रामबहोरी शुक्ल ने 'अग्रपूजा' नामक खण्डकाव्य लिखा है। यह श्रीमद्भागवत और महाभारत की कहानियों पर आधारित है। इसमें महापुरुष श्रीकृष्ण के पवित्र जीवन के अलग-अलग पहलुओं को दिखाया गया है। युधिष्ठिर ने अपने राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण की सबसे पहले पूजा की थी, जिससे इस काव्य का नाम 'अग्रपूजा' पड़ा। इस पूरे काव्य में छह मुख्य भाग (सर्ग) हैं, जिनका सारांश नीचे दिया गया है:
**प्रथम सर्ग - पूर्वाभास:** दुर्योधन ने पाण्डवों को मारने के लिए लाक्षागृह (लाख का घर) में आग लगवा दी थी, पर पाण्डव वहाँ से सुरक्षित निकल गए। वे वेश बदलकर द्रौपदी के स्वयंवर में पहुँचे, जहाँ अर्जुन ने मछली की आँख में निशाना लगाकर द्रौपदी से विवाह किया। कुन्ती की इच्छा और व्यास जी की सलाह से द्रौपदी का विवाह पाँचों भाइयों से हुआ। दुर्योधन पाण्डवों को जीवित देखकर बहुत गुस्सा हुआ। धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण और विदुर ने सलाह दी कि पाण्डवों को उनका आधा राज्य दे दिया जाए। पर दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन और शकुनि ने पाण्डवों को हमेशा के लिए खत्म करने की योजना बनाई। इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, सच्चाई और धर्म हमेशा जीतते हैं।
**द्वितीय सर्ग - सभारम्भ:** श्रीकृष्ण के साथ पाण्डव खाण्डव वन पहुँचे। श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा से उस जंगल में इंद्रपुरी जैसा एक सुंदर नगर बनवाया, जिसका नाम इंद्रप्रस्थ रखा गया। हस्तिनापुर से कई लोग और व्यापारी भी वहाँ आकर बस गए। व्यास और कृष्ण, युधिष्ठिर को अच्छी तरह से स्थापित करने के बाद इंद्रप्रस्थ से वापस चले गए। युधिष्ठिर का राज्य खूब तरक्की करने लगा और उनकी प्रसिद्धि स्वर्गलोक तक फैल गई। इंद्रप्रस्थ का निर्माण यह दिखाता है कि मेहनत और सही योजना से किसी भी मुश्किल काम को पूरा किया जा सकता है।
**तृतीय सर्ग - आयोजन:** पाण्डवों ने यह नियम बनाया कि द्रौपदी हर एक भाई के साथ एक साल रहेगी। यदि कोई दूसरा भाई उस दौरान द्रौपदी को किसी पति के साथ देखेगा, तो उसे बारह साल के लिए वनवास जाना होगा। इस नियम के टूटने पर अर्जुन बारह साल के लिए वनवास चले गए। नारद मुनि ने युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ करने की सलाह दी। श्रीकृष्ण ने सलाह दी कि यज्ञ से पहले जरासन्ध को मारना ज़रूरी है। भीम ने जरासन्ध से मल्लयुद्ध किया और श्रीकृष्ण के इशारे पर उसे बीच से चीरकर मार डाला। जरासंध का वध केवल एक राजा की हत्या नहीं थी, बल्कि यह धर्म की स्थापना और कमजोर राजाओं को मुक्ति दिलाने का प्रतीक था।
**चतुर्थ सर्ग - प्रस्थान:** राजसूय यज्ञ की तैयारियों का वर्णन किया गया है। यज्ञ के लिए दूर-दूर से राजा आए। अर्जुन श्रीकृष्ण को बुलाने के लिए द्वारका गए। श्रीकृष्ण अपनी बड़ी सेना लेकर इंद्रप्रस्थ पहुँचे, क्योंकि उन्हें कुछ राजाओं से गड़बड़ी होने का डर था। युधिष्ठिर ने नगर के बाहर ही उनका भव्य स्वागत किया। श्रीकृष्ण के आगमन से रुक्मी और शिशुपाल ईर्ष्या से भर उठे। यह सर्ग दिखाता है कि महान कार्यों के लिए सहयोग और सही योजना कितनी ज़रूरी होती है।
**पञ्चम सर्ग - राजसूय यज्ञ:** राजसूय यज्ञ शुरू हुआ। युधिष्ठिर ने यज्ञ की व्यवस्था के लिए सभी काम बाँट दिए थे। श्रीकृष्ण ने खुशी-खुशी ब्राह्मणों के पैर धोए। भीष्म ने सभासदों से पूछा कि अग्रपूजा का अधिकारी कौन है, तो सहदेव ने श्रीकृष्ण को परम पूज्य बताया। सभी ने इसका समर्थन किया, सिवाय शिशुपाल के, जिसने श्रीकृष्ण की निंदा की। शिशुपाल ने श्रीकृष्ण पर हमला किया, पर श्रीकृष्ण मुस्कराते रहे। उन्होंने शिशुपाल को अपनी बुआ को दिए वचन के कारण कई बार चेतावनी दी, लेकिन जब वह नहीं माना, तो श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया। शिशुपाल के पुत्र को बाद में चेदि राज्य का राजा बनाया गया। यह घटना दिखाती है कि भले ही कोई कितना भी धैर्यवान क्यों न हो, जब धर्म और मर्यादा का उल्लंघन होता है, तो दंड आवश्यक हो जाता है।
**षष्ठ सर्ग - उपसंहार:** शिशुपाल और कृष्ण के झगड़े का यज्ञ पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा। यज्ञ बिना किसी रुकावट के चलता रहा। व्यास, धौम्य और अन्य ऋषियों ने यज्ञ पूरा किया। युधिष्ठिर ने उन्हें दान-दक्षिणा देकर सम्मान किया। सभी राजा युधिष्ठिर के सौम्य स्वभाव से संतुष्ट हुए और उन्हें अपना राजा मान लिया। इस उपसंहार से हमें सीखने को मिलता है कि धर्म और न्याय के रास्ते पर चलने वाले को हमेशा सफलता और सबका सम्मान मिलता है।
In simple words: यह खण्डकाव्य श्रीकृष्ण के जीवन के बारे में बताता है। इसमें युधिष्ठिर ने सबसे पहले कृष्ण की पूजा की थी, इसलिए इसका नाम 'अग्रपूजा' है। इसमें बताया गया है कि पाण्डवों ने कैसे अपने राज्य को बड़ा किया और राजसूय यज्ञ को पूरा किया, जिसमें शिशुपाल का वध भी हुआ। इस खण्डकाव्य में तत्कालीन समाज और संस्कृति की भी झलक मिलती है, जिससे पाठकों को उस समय के रीति-रिवाजों की जानकारी होती है।
🎯 Exam Tip: खण्डकाव्य का सारांश लिखते समय सभी मुख्य सर्गों के प्रमुख बिन्दुओं को क्रम से लिखना ज़रूरी है, ताकि पूरी कथा स्पष्ट हो सके।
Question 2. 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग 'पूर्वाभास' का सारांश लिखिए।
Answer: 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के पहले सर्ग 'पूर्वाभास' की कहानी दुर्योधन द्वारा पाण्डवों के विनाश के प्रयास से शुरू होती है। दुर्योधन ने पाण्डवों को लाक्षागृह (लाख के घर) में जलाकर मारने की कोशिश की, पर पाण्डव बच निकले और वेश बदलकर द्रौपदी के स्वयंवर में पहुँचे। वहाँ अर्जुन ने मछली की आँख में निशाना लगाकर स्वयंवर की शर्त पूरी की और द्रौपदी से विवाह किया। कुन्ती की इच्छा और व्यास जी की स्वीकृति से द्रौपदी का विवाह पाँचों पाण्डवों से हुआ।
दुर्योधन पाण्डवों को जीवित देखकर ईर्ष्या की आग में जलने लगा। उसने कर्ण, दुःशासन और शकुनि के साथ मिलकर पाण्डवों को हमेशा के लिए हटाने की साजिश रची। इस पर धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण और विदुर ने सलाह दी कि सत्य और न्याय के लिए पाण्डवों को आधा राज्य दे देना चाहिए। इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, सच्चाई और धर्म हमेशा जीतते हैं।
In simple words: इस पहले भाग में दुर्योधन ने पाण्डवों को मारने की कोशिश की, पर वे बच गए। अर्जुन ने द्रौपदी से शादी की, जिससे दुर्योधन और गुस्सा हो गया। फिर भी, बड़े लोगों की सलाह पर पाण्डवों को उनका आधा राज्य मिल गया।
🎯 Exam Tip: प्रथम सर्ग के सारांश में कहानी की शुरुआत, लाक्षागृह की घटना, द्रौपदी स्वयंवर, और दुर्योधन की ईर्ष्या जैसे मुख्य बिन्दुओं को शामिल करें।
Question 3. 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के सभारम्भ सर्ग (द्वितीय सर्ग) का सारांश लिखिए।
Answer: 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य का दूसरा सर्ग 'सभारम्भ' पाण्डवों के खाण्डव वन पहुँचने से शुरू होता है। श्रीकृष्ण भी उनके साथ थे। वह वन बहुत भयानक था। श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा की मदद से उस वन-प्रदेश में पाण्डवों के लिए इन्द्रपुरी जैसा एक भव्य नगर बनवाया, जिसका नाम इंद्रप्रस्थ रखा गया। हस्तिनापुर से आकर कई नागरिक और व्यापारी वहाँ बस गए। युधिष्ठिर को अच्छी तरह से स्थापित करने के बाद व्यास और कृष्ण इंद्रप्रस्थ से वापस चले गए।
युधिष्ठिर का राज्य बहुत तरक्की करने लगा और उनके शासन की प्रसिद्धि चारों ओर (देवलोक और पितृलोक तक) फैल गई। युधिष्ठिर ने सत्य, न्याय और प्रेम के आधार पर एक आदर्श शासन किया, जैसे रामराज्य में होता था। इंद्रप्रस्थ का निर्माण यह दिखाता है कि मेहनत और सही योजना से किसी भी मुश्किल काम को पूरा किया जा सकता है।
In simple words: इस दूसरे भाग में पाण्डवों ने श्रीकृष्ण के साथ खाण्डव वन में गए। कृष्ण ने वहाँ विश्वकर्मा की मदद से इंद्रप्रस्थ नाम का एक सुंदर शहर बनवाया। बाद में, व्यास और कृष्ण इंद्रप्रस्थ से चले गए और युधिष्ठिर ने अच्छे से राज करना शुरू किया।
🎯 Exam Tip: द्वितीय सर्ग के सारांश में इंद्रप्रस्थ के निर्माण, पाण्डवों के आगमन और युधिष्ठिर के आदर्श शासन जैसे पहलुओं पर ध्यान दें।
Question 4. 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के आयोजन सर्ग (तृतीय सर्ग) का कथासार अपने शब्दों में लिखिए अथवा जरासन्ध वध का वर्णन कीजिए।
Answer: 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य का तीसरा सर्ग 'आयोजन' इस बात से शुरू होता है कि पाण्डवों ने द्रौपदी के लिए नियम बनाए। द्रौपदी हर भाई के साथ एक साल रहेगी और यदि कोई दूसरा भाई उस दौरान द्रौपदी को किसी पति के साथ देखेगा, तो उसे बारह साल के लिए वनवास जाना होगा। एक बार चोरों से ब्राह्मण की गायें बचाने के लिए अर्जुन शस्त्रागार में गए, जहाँ उन्होंने द्रौपदी को युधिष्ठिर के साथ देख लिया। नियम टूटने के कारण अर्जुन बारह साल के लिए वनवास चले गए।
वनवास के दौरान अर्जुन द्वारका पहुँचे और श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह करके इंद्रप्रस्थ लौटे। नारद मुनि ने युधिष्ठिर को बताया कि राजसूय यज्ञ करने से उन्हें इंद्रलोक में स्थान मिलेगा। युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को बुलाकर राजसूय यज्ञ की बात बताई। श्रीकृष्ण ने सलाह दी कि राजसूय यज्ञ से पहले मगध के राजा जरासन्ध को मारना ज़रूरी है, क्योंकि वह बहुत शक्तिशाली था। जरासन्ध ने भीम से मल्लयुद्ध करना स्वीकार किया। तेरह दिनों के युद्ध के बाद, श्रीकृष्ण के संकेत पर भीम ने जरासन्ध को बीच से चीरकर मार डाला। जरासन्ध का वध केवल एक राजा की हत्या नहीं थी, बल्कि यह धर्म की स्थापना और कमजोर राजाओं को मुक्ति दिलाने का प्रतीक था।
फिर जरासन्ध के पुत्र सहदेव को राजा बनाया गया और युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को दिग्विजय के लिए चारों दिशाओं में भेजा, जिससे पूरा भारत उनके अधीन आ गया। युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ की तैयारी शुरू कर दी और एक भव्य यज्ञशाला बनवाई गई।
In simple words: इस तीसरे भाग में, पाण्डवों ने द्रौपदी के लिए नियम बनाए कि वह हर भाई के साथ एक साल रहेगी। इसी नियम के टूटने पर अर्जुन बारह साल के लिए वनवास चले गए। वनवास के दौरान, नारद मुनि ने युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ करने की सलाह दी, जिसके लिए कृष्ण ने जरासंध को मारने को कहा। भीम ने जरासंध से युद्ध किया और कृष्ण के इशारे पर उसे मार डाला। इससे युधिष्ठिर के राज्य का विस्तार हुआ।
🎯 Exam Tip: तृतीय सर्ग में द्रौपदी के नियम, अर्जुन का वनवास और जरासन्ध के वध का विस्तार से वर्णन करना महत्वपूर्ण है।
Question 5. 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के प्रस्थान' सर्ग (चतुर्थ सर्ग) का सारांश लिखिए।
Answer: 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य का चौथा सर्ग 'प्रस्थान' राजसूय यज्ञ की तैयारियों का वर्णन करता है। राजसूय यज्ञ के लिए चारों ओर से कई राजा इंद्रप्रस्थ आए। अर्जुन श्रीकृष्ण को बुलाने के लिए द्वारका गए और उनसे प्रार्थना की कि वे यज्ञ को पूरा कराएँ और पाण्डवों के सम्मान की रक्षा करें। श्रीकृष्ण ने सोचा कि इंद्रप्रस्थ में कुछ ऐसे राजा भी हो सकते हैं जो मिलकर गड़बड़ी कर सकते हैं, इसलिए वे अपनी विशाल सेना के साथ इंद्रप्रस्थ पहुँचे। युधिष्ठिर ने नगर के बाहर ही बड़े सम्मान के साथ उनका स्वागत किया।
श्रीकृष्ण के इस भव्य स्वागत और प्रभाव को देखकर रुक्मी और शिशुपाल ईर्ष्या से तिलमिला उठे। वे पहले से ही श्रीकृष्ण से दुश्मनी रखते थे और रातभर उसी दुश्मनी और ईर्ष्या की आग में जलते रहे। यह सर्ग दिखाता है कि महान कार्यों के लिए सहयोग और सही योजना कितनी ज़रूरी होती है।
In simple words: इस चौथे भाग में, राजसूय यज्ञ की तैयारी शुरू हुई और बहुत सारे राजा इंद्रप्रस्थ आए। अर्जुन कृष्ण को बुलाने द्वारका गए। कृष्ण अपनी सेना के साथ आए, क्योंकि उन्हें डर था कि कुछ राजा यज्ञ में बाधा डाल सकते हैं। युधिष्ठिर ने उनका बहुत सम्मान से स्वागत किया। कृष्ण के आने से रुक्मी और शिशुपाल जैसे लोग उनसे जलने लगे।
🎯 Exam Tip: चतुर्थ सर्ग में राजसूय यज्ञ की तैयारियां, श्रीकृष्ण का आगमन और उनके स्वागत-समारोह के बाद उत्पन्न ईर्ष्या का उल्लेख करें।
Question 6. 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के आधार पर शिशुपाल वध का वर्णन संक्षेप में कीजिए अथवा 'राजसूय यज्ञ' सर्ग (पञ्चम सर्ग) का सारांश लिखिए।
Answer: 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य का पाँचवाँ सर्ग 'राजसूय यज्ञ' के शुरू होने से संबंधित है। राजसूय यज्ञ शुरू होने से पहले सभी राजाओं ने अपनी जगह ले ली। युधिष्ठिर ने यज्ञ की अच्छी व्यवस्था के लिए अपने लोगों को सभी काम बाँट दिए थे। श्रीकृष्ण ने अपनी इच्छा से ब्राह्मणों के पैर धोने का काम लिया। जब भीष्म ने सभासदों से पूछा कि अग्रपूजा (सबसे पहले पूजा) का अधिकारी कौन है, तो सहदेव ने तुरंत कहा कि श्रीकृष्ण ही सबसे पूजनीय हैं। भीष्म ने भी सहदेव का समर्थन किया और सभी लोगों ने भी इस पर सहमति जताई।
लेकिन शिशुपाल ने श्रीकृष्ण के चरित्र पर आरोप लगाते हुए इस बात का विरोध किया। भीष्म ने बहुत धैर्य और शांत भाव से शिशुपाल को समझाया कि स्वार्थ और ईर्ष्या के कारण व्यक्ति अंधा हो जाता है और उसे गुण भी दोष तथा यश भी दुर्गंध लगते हैं। भीष्म ने श्रीकृष्ण के गुणों का वर्णन करते हुए कहा कि वे मनुष्यता की महिमा हैं, दया, प्रेम, करुणा और शील के भंडार हैं। वे अनीति को मिटाते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं।
इसके बावजूद शिशुपाल लगातार श्रीकृष्ण की निंदा करता रहा। अंत में सहदेव ने कहा कि मैं श्रीकृष्ण का सम्मान करने जा रहा हूँ, जिसमें भी ताकत हो वह मुझे रोक ले। शिशुपाल बहुत क्रोधित होकर श्रीकृष्ण पर हमला करने दौड़ा। श्रीकृष्ण मुस्कुराते रहे और उसे चेतावनी दी कि फूफी को वचन देने के कारण वे उसे क्षमा करते जा रहे हैं। जब शिशुपाल नहीं माना और लगातार कटु बातें कहता रहा, तो श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन-चक्र से उसका सिर काट दिया। उसके बाद युधिष्ठिर ने शिशुपाल के पुत्र को चेदि राज्य का राजा बना दिया। यह घटना दिखाती है कि भले ही कोई कितना भी धैर्यवान क्यों न हो, जब धर्म और मर्यादा का उल्लंघन होता है, तो दंड आवश्यक हो जाता है।
In simple words: इस पाँचवें भाग में राजसूय यज्ञ शुरू हुआ। युधिष्ठिर ने सभी काम बाँट दिए थे। श्रीकृष्ण ने खुशी से ब्राह्मणों के पैर धोए। भीष्म ने पूछा कि सबसे पहले किसकी पूजा होनी चाहिए, तो सहदेव ने श्रीकृष्ण का नाम लिया। सभी ने मान लिया, पर शिशुपाल ने कृष्ण की बुराई की। भीष्म ने शिशुपाल को बहुत समझाया और श्रीकृष्ण के गुणों के बारे में बताया, पर वह नहीं माना। तब श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का सिर काट दिया। बाद में शिशुपाल के बेटे को उसके राज्य का राजा बना दिया गया।
🎯 Exam Tip: शिशुपाल वध का वर्णन करते समय भीष्म के तर्क, शिशुपाल का अहंकार और श्रीकृष्ण की सहनशीलता के साथ-साथ वध के कारण और परिणाम का उल्लेख करें।
Question 7. 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के 'उपसंहार' सर्ग (षष्ठ सर्ग) का सारांश (कथासार) अपने शब्दों में लिखिए।
Answer: 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के छठे और अंतिम सर्ग 'उपसंहार' में बताया गया है कि शिशुपाल और कृष्ण के बीच हुए विवाद का राजसूय यज्ञ पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा। यज्ञ बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक चलता रहा। व्यास, धौम्य और अन्य सोलह ज्ञानी ऋषियों ने यज्ञ का कार्य पूरा किया।
युधिष्ठिर ने उन सभी ऋषियों को पर्याप्त दान-दक्षिणा देकर उनका उचित सत्कार किया। उन्होंने बलराम और श्रीकृष्ण के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। सभी राजा उनके शांत और सौम्य स्वभाव से संतुष्ट हुए और युधिष्ठिर को अपना अधिपति मानकर उनकी आज्ञा मानने का वचन दिया। ज्ञानी ऋषियों ने भी युधिष्ठिर को हार्दिक आशीर्वाद दिया, जिसे युधिष्ठिर ने विनम्रता से स्वीकार किया। इस उपसंहार से हमें सीखने को मिलता है कि धर्म और न्याय के रास्ते पर चलने वाले को हमेशा सफलता और सबका सम्मान मिलता है।
In simple words: इस छठे और आखिरी भाग में शिशुपाल और कृष्ण के झगड़े का यज्ञ पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा। यज्ञ अच्छे से पूरा हो गया। व्यास और दूसरे ऋषियों ने यज्ञ कराया। युधिष्ठिर ने सबको दान दिया और उनका सम्मान किया। सभी राजा उनके अच्छे स्वभाव से खुश हुए और उन्हें अपना राजा मान लिया।
🎯 Exam Tip: उपसंहार में यज्ञ की समाप्ति, युधिष्ठिर द्वारा ऋषियों का सत्कार और सभी राजाओं द्वारा युधिष्ठिर की स्वीकार्यता पर विशेष जोर दें।
Question 8. 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के आधार पर उसके नायक श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Answer: श्री रामबहोरी शुक्ल द्वारा रचित 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के मुख्य पात्र श्रीकृष्ण हैं। इस पूरे काव्य में श्रीकृष्ण ही सबसे प्रमुख व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सबसे पहले श्रीकृष्ण की ही पूजा होती है। वे सभी घटनाओं के पीछे की शक्ति भी हैं। उनके चरित्र की कुछ खास बातें नीचे दी गई हैं:
**(1) लीलाधारी दिव्य पुरुष:** कवि ने इस काव्य की शुरुआत में श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया है। विश्वकर्मा से भयानक खाण्डव वन में एक अद्भुत नगर बनवाना और शिशुपाल को कई रूपों में दिखना, उन्हें एक अनोखा और दिव्य पुरुष दिखाता है।
**(2) शिष्ट एवं विनयी:** श्रीकृष्ण हमेशा बड़ों का सम्मान करते हैं। वे कुन्ती और अन्य पूजनीय लोगों के सामने शिष्टाचार और नम्रता दिखाते हैं। इतनी शक्ति होने पर भी वे विनम्रता से युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में ब्राह्मणों के पैर धोने का काम खुद करते हैं।
**(3) पाण्डवों के परम हितैषी:** श्रीकृष्ण पाण्डवों के सबसे बड़े हितैषी हैं। वे उनके सभी कामों में पूरी मदद करते हैं। द्रौपदी के स्वयंवर में पाण्डवों को पहचानकर वे उनसे प्यार से मिलने जाते हैं। वे पाण्डवों के लिए इंद्रपुरी जैसा शहर बनवाते हैं और उनके राजसूय यज्ञ के लिए जरासन्ध को मारने की योजना बनाते हैं। यज्ञ में किसी विरोधी राजा की बाधा की आशंका होने पर वे सेना के साथ पहुँचते हैं।
**(4) अनुपम सौन्दर्यशाली:** श्रीकृष्ण बहुत सुंदर और अनोखे थे। इंद्रप्रस्थ जाते समय सभी शहरवासी उनकी सुंदरता देखने के लिए दौड़ पड़े थे। इंद्रप्रस्थ की महिलाएँ उनकी मधुर मुस्कान पर मोहित हो जाती थीं। एक लोकगीत में कहा गया है: "देखा सुना न पढ़ा कहीं भी, ऐसा अनुपम रूप अमन्द। ऐसी मधु मुस्कान न देखी, हैं गोविन्द सदृश गोविन्द।"
**(5) धैर्यवान् एवं शक्तिसम्पन्न:** श्रीकृष्ण बहुत वीर और शक्तिशाली थे। यही कारण है कि वे अकेले अर्जुन और भीम को साथ लेकर जरासन्ध का वध करने पहुँचे। शिशुपाल की अशिष्टता और बुरे शब्दों को भी उन्होंने बहुत देर तक सहन किया। भीष्म के समझाने पर भी जब शिशुपाल नहीं माना, तो उन्होंने उसे दंड देने के लिए सुदर्शन-चक्र से उसका वध कर दिया।
**(6) धर्म एवं मर्यादापालक:** श्रीकृष्ण राजसूय यज्ञ में ब्राह्मणों के पैर धोते हैं और यज्ञ में मर्यादा बनाए रखने के लिए शिशुपाल के निंदाजनक शब्दों को शांति से क्षमा करते हैं। वे एक आदर्श व्यक्ति हैं। भीष्म ने कहा है: "शील, सुजनता, विनय, प्रेम के केशव हैं प्रत्यक्ष शरीर। मिटा अनीति, धर्म मर्यादा स्थापन करते हैं यदुवीर ॥"
**(7) अनासक्त योगी:** श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व भोग और योग का एक सुंदर मिश्रण है। वे संसार में रहते हुए भी संसार से बंधे नहीं हैं। वे पानी में कमल के पत्ते की तरह सभी कार्यों को बिना किसी मोह के पूरा करते हैं। सब उनका सम्मान करते हैं, इसलिए उन्हें अग्रपूजा के लिए चुना गया।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण बहुत शांत और विनम्र हैं। वे पाण्डवों के परम हितैषी और बहुत सुंदर हैं। वे धर्म और मर्यादा का पालन करने वाले और अलौकिक शक्ति वाले हैं। भीष्म के अनुसार श्रीकृष्ण महामानव हैं, जो जीवन के हर क्षेत्र में आगे रहते हैं। उनका व्यक्तित्व सज्जनता, विनम्रता, प्रेम और उदारता का भंडार है। श्रीकृष्ण का चरित्र दिखाता है कि एक महापुरुष को बल, बुद्धि और नम्रता तीनों गुणों का अद्भुत संगम होना चाहिए।
In simple words: श्रीकृष्ण इस कहानी के सबसे खास हीरो हैं। वे बहुत अच्छे और ताकतवर थे। उन्होंने पाण्डवों की बहुत मदद की, जैसे इंद्रप्रस्थ बनवाना और राजसूय यज्ञ कराना। वे हमेशा विनम्र रहते थे और बड़ों का सम्मान करते थे। वे बहुत सुंदर भी थे और धर्म का पालन करने वाले थे। वे हर काम करते थे, पर किसी चीज़ में अटकते नहीं थे। उनका जीवन सभी के लिए एक बड़ी सीख है।
🎯 Exam Tip: श्रीकृष्ण के चरित्र-चित्रण में उनके दिव्य गुणों, पाण्डवों के प्रति उनके प्रेम, धैर्य, शक्ति और धर्मनिष्ठा जैसे पहलुओं को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें।
Question 9. 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के आधार पर युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Answer: युधिष्ठिर पाण्डवों में सबसे बड़े थे। इंद्रप्रस्थ में उनका राज्याभिषेक हुआ था। सभी राजा उनकी आज्ञा मानते थे और वे ही राजसूय यज्ञ कराते हैं। इस प्रकार युधिष्ठिर 'अग्रपूजा' काव्य के मुख्य पात्रों में से एक हैं। उनके चरित्र की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
**(1) विनम्र स्वभाव:** युधिष्ठिर बहुत विनम्र स्वभाव के थे। इंद्रप्रस्थ में गुरु द्रोणाचार्य के आने पर वे विनय भाव से उनके चरणों में गिर पड़े। राजसूय यज्ञ के समय श्रीकृष्ण के आने पर वे उनका रथ स्वयं हाँककर उन्हें नगर में प्रवेश कराते हैं। यज्ञ समाप्त होने पर वे ज्ञानी ऋषियों को दान-दक्षिणा देते हैं और उनके आशीर्वाद को विनम्रता से स्वीकार करते हैं।
**(2) आदर्श शासक:** महाराज युधिष्ठिर एक आदर्श शासक के रूप में हमारे सामने आते हैं। वे राम-राज्य को आदर्श मानकर प्रजा को सुखी और समृद्ध बनाने की कोशिश करते हैं। उनका यह प्रयास हमेशा रहता था: "लायें भू पर स्वर्ग उतार।।" उन्होंने भारत के सभी राजाओं को जीतकर एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाया।
**(3) धार्मिक तथा सत्य-प्रेमी:** युधिष्ठिर धार्मिक और सत्य को पसंद करने वाले थे। वे हर काम धर्म और न्याय के अनुसार करते थे और हमेशा सच्चाई के रास्ते पर चलते थे। नारद जी ने उनके बारे में कहा था: "धर्मराज, जीवन तव धन्य। धरणी में सत्कर्म-निरत जन नहीं दीखता तुम-सा अन्य।" राजसूय यज्ञ करके उन्होंने अपने पिता की इच्छा को पूरा किया।
**(4) उदारहृदय:** युधिष्ठिर बहुत उदार थे। वे राज्य के लिए दुर्योधन से झगड़ा नहीं करते और खाण्डव वन के हिस्से को भी राज्य के रूप में खुशी से स्वीकार कर लेते हैं। वे किसी राजा के राज्य को अपने राज्य में नहीं मिलाते। उन्होंने शिशुपाल और जरासन्ध के वध के बाद भी उनके राज्यों को उनके पुत्रों को सौंप दिया। वे राजसूय यज्ञ में उदारतापूर्वक ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते हैं।
इस प्रकार, युधिष्ठिर परम विनयी, धर्मात्मा, सत्य-प्रेमी, उदारहृदय और सुयोग्य शासक थे। युधिष्ठिर का जीवन यह बताता है कि धैर्य, सच्चाई और न्याय से ही एक महान और सफल राज्य बनाया जा सकता है।
In simple words: युधिष्ठिर पाण्डवों में सबसे बड़े और इस कहानी के एक मुख्य पात्र हैं। वे बहुत शांत स्वभाव के थे और हमेशा बड़ों का आदर करते थे। उन्होंने एक बहुत अच्छा राजा बनकर प्रजा को खुश रखा। वे हमेशा धर्म और सच्चाई के रास्ते पर चलते थे। उनका दिल बहुत बड़ा था; उन्होंने किसी से झगड़ा नहीं किया और दूसरों को माफ भी कर देते थे। वे एक ऐसे शासक थे जो सबका भला चाहते थे।
🎯 Exam Tip: युधिष्ठिर के चरित्र-चित्रण में उनकी विनम्रता, आदर्श शासन, धार्मिक प्रवृत्ति और उदारता जैसे गुणों को उदाहरणों के साथ प्रस्तुत करें।
Question 10. 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के आधार पर शिशुपाल का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Answer: शिशुपाल 'अग्रपूजा' खण्डकाव्य का एक महत्वपूर्ण पात्र है, जो चेदि राज्य का स्वामी है। इस काव्य में उसे एक खलनायक के रूप में दिखाया गया है। वह ईर्ष्यालु, क्रोधी, अभिमानी और अशिष्ट व्यक्ति के रूप में नजर आता है। शिशुपाल का चरित्र-चित्रण इस प्रकार किया जा सकता है:
**(1) श्रीकृष्ण का शत्रु:** शिशुपाल और श्रीकृष्ण के बीच पुरानी दुश्मनी थी। शिशुपाल रुक्मी की बहन रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था, लेकिन रुक्मिणी श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में पसंद करती थी। इसलिए श्रीकृष्ण रुक्मिणी का हरण करके द्वारका ले आए और उनसे विवाह कर लिया। इस घटना के बाद शिशुपाल श्रीकृष्ण को अपना दुश्मन मानने लगा।
**(2) ईष्यालु व्यक्ति:** शिशुपाल स्वभाव से बहुत ईर्ष्यालु था। इंद्रप्रस्थ में श्रीकृष्ण को अधिक सम्मान मिलना उसे पसंद नहीं था। इसी ईर्ष्या के कारण वह बेवजह श्रीकृष्ण के प्रति जहर उगलता रहता था और अपशब्दों का प्रयोग करता था। जैसे: "आज यहाँ हैं ज्ञानी योगी, पण्डित, ऋषि, नृप, अनुपम वीर। फिर भी अग्र अर्चना होगी, उसकी जो गोपाल अहीर ॥" वह श्रीकृष्ण को नाचने-कूदने वाला, छलिया और अशिष्ट भी बताता था।
**(3) क्रोधी और अभिमानी:** शिशुपाल में क्रोध और अभिमान भरा था। वह भरी सभा में गुस्सा होकर श्रीकृष्ण की ओर हाथापाई करने बढ़ता था और उन्हें भला-बुरा कहकर ललकारता था। जैसे: "वह बोला मायावी, छलिया, इन्द्रजाल अब करके बन्द।। आ सम्मुख तू बच न सकेगा, करके ये सारे छल छन्द ॥" उसके इस घमंडी स्वभाव के कारण ही उस पर भीष्म के उपदेश और सहदेव की समझदारी का कोई असर नहीं हुआ।
**(4) अशिष्ट:** शिशुपाल की वाणी में दूसरों के प्रति सम्मान की कमी थी। वह जहाँ एक ओर अग्रपूजा के लिए श्रीकृष्ण का नाम प्रस्तावित करने को सहदेव का बचपना बताता था, वहीं दूसरी ओर भीष्म की बुद्धि को भी खराब कहता था। जैसे: "लगता सठिया गये भीष्म हैं, मारी गयी बुद्धि भरपूर।। तभी अनर्गल बातें करते, करो यहाँ से इनको दूर ॥"
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शिशुपाल का चरित्र एक खलनायक के रूप में कई दोषों से भरा था, जो उसकी ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार को दर्शाते हैं। शिशुपाल का चरित्र हमें सिखाता है कि ईर्ष्या और अहंकार व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाते हैं।
In simple words: शिशुपाल 'अग्रपूजा' कहानी का बुरा पात्र है। वह चेदि राज्य का राजा था। वह श्रीकृष्ण का दुश्मन था, क्योंकि कृष्ण ने रुक्मिणी से शादी कर ली थी, जबकि शिशुपाल उनसे शादी करना चाहता था। वह बहुत ईर्ष्यालु, गुस्सा करने वाला और घमंडी था। उसे श्रीकृष्ण का सम्मान करना पसंद नहीं था और वह भरी सभा में भी बुरा-भला कहता था। उसका व्यवहार किसी के प्रति अच्छा नहीं था, जिससे अंत में उसे अपने कर्मों का फल मिला।
🎯 Exam Tip: शिशुपाल का चरित्र-चित्रण करते समय उसकी श्रीकृष्ण के प्रति शत्रुता, ईर्ष्या, क्रोध और अशिष्ट व्यवहार को उदाहरणों के साथ उजागर करें।
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