UP Board Solutions Class 10 Hindi Chapter 4 Jai Subhash

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Detailed Chapter 4 जय सुभाष UP Board Solutions for Class 10 Hindi

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Class 10 Hindi Chapter 4 जय सुभाष UP Board Solutions PDF

 

Question 1. 'जय सुभाष' खण्डकाव्य की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। [2012, 15 16]
या
'जय सुभाष' खण्डकाव्य का सारांश लिखिए । [2009, 10, 11, 12, 14, 15]
या
'जय सुभाष' खण्डकाव्य की कथा संक्षेप में लिखिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 18]
या
“जय सुभाष' का कथानक राष्ट्रभक्ति से पूर्ण है।” सोदाहरण समझाइए । “जय सुभाष' खण्डकाव्य का कथानक स्पष्ट कीजिए। [2011]
या
'जय सुभाष' खण्डकाव्य हमें राष्ट्रीयता की प्रेरणा देता है। कथन की पुष्टि कीजिए। [2014]
या
'जय सुभाष' खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का उल्लेख कीजिए ।
Answer: यह खण्डकाव्य नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जीवन और उनके महान गुणों के बारे में एक सुंदर रचना है। इस काव्य में नेताजी के देशभक्ति, साहस और बलिदान को प्रमुखता से दर्शाया गया है। यह पूरा काव्य सात हिस्सों (सर्गों) में बंटा हुआ है। हर सर्ग में नेताजी के जीवन की एक अलग घटना का वर्णन है। इस काव्य के माध्यम से हमें नेताजी के संघर्षपूर्ण जीवन की झलक मिलती है। इसका सर्गों के अनुसार सार इस प्रकार है:
सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक (ओडिशा) में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था। बड़े होकर सुभाष ने अपनी तेज बुद्धि का परिचय दिया। उन्होंने अपनी पढ़ाई में हमेशा अच्छे अंक प्राप्त किए। प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़ते समय, एक अंग्रेज प्रोफेसर ने भारतीयों की निंदा की, जिस पर सुभाष ने उन्हें थप्पड़ मारा। यह उनके स्वाभिमान और देशभक्ति का एक बड़ा उदाहरण था। उन्होंने बी.ए. की परीक्षा पास की और विदेश जाकर आई.सी.एस. परीक्षा भी पास की। महात्मा गांधी और देशबंधु चितरंजनदास से प्रभावित होकर, उन्होंने सरकार की मिली हुई आई.सी.एस. की उच्च नौकरी छोड़ दी और देश की आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।
दूसरे सर्ग में सुभाष के भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का वर्णन है। 1921 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन जोर पकड़ रहा था। देशबंधु ने एक नेशनल कॉलेज की स्थापना की और सुभाष को उसका प्रधानाचार्य नियुक्त किया। सुभाष ने छात्रों में देशप्रेम और स्वतंत्रता की भावना जगाई और देशभक्त स्वयंसेवकों की एक सेना तैयार की। वे मोतीलाल नेहरू की 'स्वराज्य पार्टी' के मजबूत समर्थक थे। उन्होंने पार्टी के कई प्रतिनिधियों को काउंसिल में भेजा और कोलकाता नगर निगम का विकास किया। सरकार ने उन्हें बिना किसी कारण अलीपुर जेल में डाल दिया। उनका अधिकतर जीवन जेल में ही बीता।
तीसरे सर्ग की कहानी 1928 से शुरू होती है। 1928 में कोलकाता में कांग्रेस के 46वें अधिवेशन में पं. मोतीलाल नेहरू अध्यक्ष बने। इसी समय सुभाष की संगठन क्षमता सबके सामने आई। इसके बाद सुभाष कोलकाता के मेयर चुने गए। उन्होंने सभाओं में जोशीले भाषण दिए, जिसके कारण उन्हें सिवनी, भुवाली, अलीपुर और मांडले जेल में कई यातनाएं झेलनी पड़ीं, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। स्वास्थ्य-लाभ के लिए उन्हें पश्चिमी देशों में भेजा गया। वहां उन्होंने 'द इंडियन स्ट्रगल' नामक पुस्तक लिखी। भारत लौटने पर अगले साल हीरापुर के कांग्रेस अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया।
चौथे सर्ग में हीरापुर अधिवेशन से लेकर 'फॉरवर्ड ब्लॉक' की स्थापना तक का वर्णन है। ताप्ती नदी के किनारे बिठ्ठल नगर में कांग्रेस का इक्यावनवां अधिवेशन हुआ। उन्हें अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया गया। इससे आजादी का आंदोलन और तेज हो गया। इसके बाद त्रिपुरा में कांग्रेस का अगला अधिवेशन हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में दो नेताओं में मतभेद हो गया। कांग्रेस को टूटने से बचाने के लिए सुभाष ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर 'फॉरवर्ड ब्लॉक' (एक नई पार्टी) बनाई। अब सुभाष सबकी श्रद्धा और आशा के केंद्र बन गए और 'नेताजी' कहलाने लगे। हम कह सकते हैं कि अपनी मातृभूमि को आजाद कराने के लिए सुभाषचन्द्र बोस ने अंग्रेजी सरकार की यातनाएं लगातार सहन कीं।
पांचवें सर्ग में सुभाष के घर से गुप्त रूप से भागने की कहानी है। जब सुभाष घर में नजरबंद थे, तब सरकार ने उनकी सभी गतिविधियों पर कड़ी रोक लगा रखी थी। 15 जनवरी, 1941 की आधी रात में, दाढ़ी बढ़ाए हुए, वे एक मौलवी के वेश में पुलिस की आंखों में धूल झोंककर भाग गए और फ्रंटियर मेल से पेशावर पहुंचे, और वहां से बर्लिन। बर्लिन में उन्होंने 'आजाद हिन्द फौज' की स्थापना की। दूर रहकर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करना मुश्किल था, इसलिए वे पनडुब्बी से टोक्यो पहुंचे। जापानियों ने उन्हें पूरा सहयोग दिया। सहगल, शाहनवाज, ढिल्लन और लक्ष्मीबाई ने बहादुरी से इस सेना का नेतृत्व किया। सुभाष ने 'दिल्ली चलो' का नारा हर जगह फैलाया। 'आजाद हिन्द फौज' का हर सैनिक स्वतंत्रता संग्राम में जाने को उत्सुक था।
छठे सर्ग में 'आजाद हिन्द फौज' के भारत पर आक्रमण और मिली जीत का वर्णन है। सुभाष ने 'आजाद हिन्द फौज' के वीरों को 'दिल्ली चलो' और 'जय हिन्द' के नारे दिए। उन्होंने "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" कहकर युवाओं को बुलाया। आजाद हिन्द सेना ने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी और उनके शिविरों पर हमला करके कई मोर्चों पर उन्हें कभी न भूलने वाली हार दी।
सातवें सर्ग में दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी और जापान की हार की चर्चा है। संसार में सुख-दुःख और हार-जीत का चक्र चलता रहता है। अंग्रेजों की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। आजाद हिन्द फौज की जीत के बाद भी हार होने लगी। अगस्त, 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका ने अणुबम गिराए। जापान ने मानवता की रक्षा के लिए जनहित में आत्मसमर्पण कर दिया। 18 अगस्त, 1945 को ताइहोक में उनका विमान आग लगने से दुर्घटनाग्रस्त हो गया और सुभाष भी नहीं बच सके। जब तक सूरज, चांद और तारे रहेंगे, भारत के घर-घर में सुभाष अपने यश के रूप में अमर रहेंगे। उनकी यशोगाथा नवयुवकों को त्याग, देशप्रेम और बलिदान की प्रेरणा देती रहेगी।
In simple words: 'जय सुभाष' खण्डकाव्य नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के पूरे जीवन, उनके देशभक्ति के संघर्ष, साहस और बलिदान की कहानी को सात भागों में बताता है। यह खण्डकाव्य दिखाता है कि कैसे उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपनी बुद्धि, शक्ति और जीवन को समर्पित कर दिया।

🎯 Exam Tip: खण्डकाव्य का सारांश लिखते समय सभी सर्गों का संक्षिप्त वर्णन क्रम से करें, प्रमुख घटनाओं और उनके महत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाएं।

 

Question 2. 'जय सुभाष' खण्डकाव्य के आधार पर सुभाषचन्द्र बोस के प्रारम्भिक जीवन (विद्यार्थी जीवन व बाल जीवन) पर प्रकाश डालिए। [2011]
या
'जय सुभाष' खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश लिखिए। [2010, 11, 14, 18]
Answer: सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक (उड़ीसा) में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था। उनकी माता बहुत पढ़ी-लिखी और धार्मिक महिला थीं। सुभाष ने बचपन में अपनी माताजी से राम, कृष्ण, अर्जुन, बुद्ध, महावीर, शिवाजी, प्रताप जैसे महान लोगों की कहानियां सुनी थीं। इन कहानियों से बालक सुभाष के स्वभाव और बहादुरी पर गहरा असर पड़ा।
बड़े होने पर सुभाष ने अपनी तेज बुद्धि का परिचय दिया। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से सभी पढ़ाई की परीक्षाओं में सबसे अच्छे अंक प्राप्त किए। स्कूल में अपने गुरु बेनीमाधव जी के प्रभाव से, उनके अंदर गरीब और दुखियों के प्रति प्यार, दया और सेवा की भावना जागी। उन्होंने कम उम्र में ही जाजपुर गांव में फैली एक भयानक बीमारी में रोगियों की सेवा की। उन्होंने दसवीं की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में पास किया और कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। उन्होंने सुरेशचन्द्र बनर्जी से आजीवन अविवाहित रहने की प्रेरणा ली। कलकत्ता में महर्षि विवेकानंद के प्रभावशाली भाषण सुनकर वे सत्य की खोज में मथुरा, हरिद्वार, वृन्दावन, काशी जैसे तीर्थों और हिमालय की गुफाओं में घूमे, पर उन्हें कहीं शांति नहीं मिली। बाद में उन्होंने फिर से पढ़ाई शुरू की। प्रेसीडेंसी कॉलेज में ऑटेन नाम के एक अंग्रेज प्रोफेसर ने भारतीयों की निंदा की। यह सुनकर सुभाष ने अपमान सहन नहीं किया और उस प्रोफेसर के गाल पर थप्पड़ मारा। यह उनके स्वाभिमान, देशभक्ति और साहस का अद्भुत उदाहरण था। इस गलती के लिए उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। दूसरे कॉलेज में दाखिला लेकर उन्होंने बी.ए. की परीक्षा पास की और विदेश जाकर आई.सी.एस. की परीक्षा भी पास कर ली। भारत लौटने पर उन्होंने अपने देश की दुखद हालत देखी। महात्मा गांधी और देशबंधु चितरंजनदास से प्रभावित होकर उन्होंने सरकार की मिली हुई आई.सी.एस. की बड़ी नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए। इस तरह उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
In simple words: नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का बचपन और छात्र जीवन बहुत प्रभावशाली रहा। उन्होंने अपनी शिक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ खड़े हुए। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर देश की आजादी की लड़ाई में शामिल होने का बड़ा फैसला लिया।

🎯 Exam Tip: प्रारंभिक जीवन पर प्रकाश डालते समय, जन्म, माता-पिता, शिक्षा, महत्वपूर्ण घटनाएं और उनके जीवन पर पड़े प्रभावों को क्रमबद्ध तरीके से लिखें।

 

Question 3. 'जय सुभाष के द्वितीय सर्ग का सारांश (कथानक, कथावस्तु, कथासार) अपने शब्दों में लिखिए। [2010, 13, 14, 15, 17, 18]
या
'जय सुभाष' खण्डकाव्य के आधार पर भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में सुभाष के योगदान का वर्णन कीजिए ।
Answer: इस खण्डकाव्य के दूसरे भाग में सुभाष के भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का वर्णन किया गया है। भारत में अंग्रेजों के अत्याचार और अन्याय को देखकर, भारतमाता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए सुभाष ने अपना जीवन देश को समर्पित करने का निश्चय किया। 1921 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन तेजी से चल रहा था। छात्रों ने स्कूल-कॉलेज और वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार करके आंदोलन को और मजबूत बनाया। बंगाल में देशबंधु चितरंजनदास इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। उन्हीं दिनों देशबंधु जी ने एक नेशनल कॉलेज बनाया, जिसका प्रधानाचार्य उन्होंने सुभाष को नियुक्त किया। सुभाष ने छात्रों में देशप्रेम और स्वतंत्रता की भावना जगाई और देशभक्त स्वयंसेवकों की एक सेना तैयार की। इस सेना ने बंगाल के हर घर में स्वतंत्रता का संदेश फैलाया। इस सेना के डर से अंग्रेजी सरकार हिल गई, जिसके कारण सरकार ने देशबंधु और सुभाष को जेल में डाल दिया। जेल में जाकर भी उनका साहस और शक्ति और बढ़ गई। जब वे जेल से छूटे, तब बंगाल में भयानक बाढ़ आई थी। सुभाष ने बाढ़-पीड़ितों की तन-मन-धन से सहायता की। वे पं. मोतीलाल नेहरू द्वारा बनाई गई 'स्वराज्य पार्टी' के मजबूत समर्थक थे। उन्होंने पार्टी के कई प्रतिनिधियों को काउंसिल में भेजा। कलकत्ता नगर निगम के चुनाव में सुभाष बहुमत से जीते। सुभाष को कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया। उन्होंने 3,000 रुपये निर्धारित वेतन के बजाय केवल आधा वेतन लेकर नगर निगम का बहुत विकास किया। सरकार ने उनकी बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़कर उन्हें बिना किसी कारण ही अलीपुर जेल में डाल दिया। वहां से उन्हें बरहामपुर और मांडले जेल में भेजकर बहुत यातनाएं दी गईं। इस कारण उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। जनता की मजबूत मांग पर उन्हें जेल से छोड़ दिया गया। जेल से छूटते ही उन्होंने फिर से संघर्ष शुरू कर दिया। उनका अधिकतर जीवन जेल में ही बीता। सुभाषचन्द्र बोस का जीवन भारत की आज़ादी के लिए एक प्रेरणादायक संघर्ष था।
In simple words: खण्डकाव्य के दूसरे सर्ग में सुभाष ने आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया, एक नेशनल कॉलेज के प्रधानाचार्य बने, और देशभक्तों की सेना तैयार की। उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन वे हमेशा देश के लिए लड़ते रहे।

🎯 Exam Tip: स्वतंत्रता आंदोलन में सुभाष के योगदान पर लिखते समय, उनकी प्रमुख भूमिकाओं, आंदोलनों में भागीदारी और उनके द्वारा झेली गई कठिनाइयों को स्पष्ट रूप से उजागर करें।

 

Question 4. 'जय सुभाष' खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का सारांश (कथानक, कथावस्तु, कथासार) लिखिए। [2011, 13, 18]
या
'जय सुभाष' के आधार पर कलकत्ता में आयोजित 1928 ई० के कांग्रेस अधिवेशन का वर्णन कीजिए और बताइए कि इस अवसर पर सुभाष की क्या भूमिका रही ?
Answer: 1928 में कलकत्ता में कांग्रेस का 46वां अधिवेशन हुआ, जिसमें पं. मोतीलाल नेहरू अध्यक्ष बनाए गए। उनके सम्मान में अड़तालीस घोड़ों के रथ पर एक भव्य शोभा-यात्रा निकाली गई, जिसका नेतृत्व सुभाष खुद कर रहे थे। इसी समय लोगों ने सुभाष की संगठन क्षमता को देखा। पं. मोतीलाल नेहरू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में उनके उत्साह, काम करने की क्षमता, देशप्रेम और कर्मठता की बहुत प्रशंसा की। इस अधिवेशन ने सुभाष के नेतृत्व गुणों को और भी निखारा।
इसके बाद सुभाष को कलकत्ता शहर का मेयर चुना गया। उनके कार्यकाल में स्वतंत्रता सेनानियों का एक जुलूस निकला, जिसका नेतृत्व भी सुभाष ने किया। इस जुलूस पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और सुभाष को लाठियों से बहुत पीटा। उन्हें नौ महीने के लिए अलीपुर जेल में डाल दिया गया। जेल से छूटने के बाद उन्होंने फिर से जोशीले भाषण दिए, जिससे देशभक्त युवाओं में जोश भर गया। फिर उन्हें सिवनी जेल में डाल दिया गया। वहां से भुवाली, अलीपुर और मांडले जेल भेजकर बहुत यातनाएं दी गईं, जिससे उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। स्वास्थ्य लाभ के लिए उन्हें पश्चिमी देशों में भेजा गया। वहां जाकर उन्होंने यूरोप की समृद्धि देखी और भारत से उसकी तुलना की। उन्होंने अपने देश की हालत और जनता के आंदोलन का सच्चा चित्र पश्चिमी देशों के सामने रखा।
वहां से उन्हें पिता की बीमारी का समाचार मिला और वे भारत आए, लेकिन पिता के अंतिम दर्शन नहीं कर पाए। गहरे दुख के कारण, स्वास्थ्य लाभ के लिए उन्हें फिर से यूरोप जाना पड़ा। वहां उन्होंने 'द इंडियन स्ट्रगल' नामक पुस्तक लिखी, जिसमें देशप्रेम की भावना और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का जीवंत वर्णन था। वे विदेशों में रहकर भी अपने देश का सम्मान बढ़ाते रहे। 1936 में स्वदेश वापस आने पर उन्हें फिर जेल भेज दिया गया। जेल में स्वास्थ्य खराब होने के कारण उन्हें एक बार फिर यूरोप भेजा गया। कुछ समय बाद पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लखनऊ में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में सभी नेताओं और जनता ने सुभाष के त्याग और बलिदान की खूब प्रशंसा की। भारत लौटने पर अगले साल हीरापुर के कांग्रेस अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया। सुभाष ने अपने जीवन के हर पल को देश की आज़ादी के लिए इस्तेमाल किया।
In simple words: खण्डकाव्य के तीसरे सर्ग में सुभाष को 1928 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में अपनी नेतृत्व क्षमता दिखाने का मौका मिला। उन्हें मेयर भी चुना गया, पर अंग्रेजों ने उन्हें कई बार जेल भेजा और यातनाएं दीं। उन्होंने विदेश में रहकर भी देश की आजादी के लिए काम किया और 'द इंडियन स्ट्रगल' किताब लिखी।

🎯 Exam Tip: अधिवेशन का वर्णन करते समय सुभाष की भूमिका, उनके द्वारा दिए गए भाषणों के प्रभाव और उन्हें मिली यातनाओं को विस्तार से बताएं।

 

Question 5. 'जय सुभाष' खण्डकाव्य के आधार पर इसके चतुर्थ सर्ग का सारांश (कथानक, कथावस्तु) लिखिए। [2017]
Answer: इस सर्ग में हीरापुर अधिवेशन से लेकर 'फॉरवर्ड ब्लॉक' की स्थापना तक का वर्णन किया गया है। ताप्ती नदी के किनारे बिठ्ठल नगर में कांग्रेस का इक्यावनवां अधिवेशन हुआ। इक्यावन पताकाओं (झंडों) और इक्यावन द्वारों से सजे हुए, इक्यावन बैलों के रथ में बैठाकर सुभाष का भव्य स्वागत किया गया। उन्हें अधिवेशन का अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया। अध्यक्ष पद से उनके जोशीले भाषणों को सुनकर नवयुवकों में देशप्रेम, एकता और बलिदान की भावना जाग उठी। इससे आजादी का आंदोलन और भी तेज हो गया। सुभाषचन्द्र बोस ने अपने विचारों से युवाओं में नई ऊर्जा भर दी।
इसके बाद त्रिपुरा में कांग्रेस का अगला अधिवेशन हुआ। इसमें कांग्रेस के दो नेताओं, पट्टाभि सीतारमैया और सुभाष के बीच चुनाव हुआ, जिसमें सुभाष विजयी हुए। गांधीजी ने पट्टाभि सीतारमैया का समर्थन किया था, इसलिए उन्होंने पट्टाभि सीतारमैया की हार को अपनी हार समझा। उस समय कांग्रेस को टूटने से बचाने के लिए सुभाष ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर 'फॉरवर्ड ब्लॉक' (एक नई पार्टी) बनाई और पूरे देश में घूम-घूमकर स्वतंत्रता की ज्योति जगाई। अब सुभाष सबकी श्रद्धा और आशा के केंद्र बन गए और 'नेताजी' कहलाने लगे। कलकत्ता में 'ब्लैक हॉल' स्मारक, जिसके बारे में कहा जाता है कि 1857 में भारतीयों ने कई अंग्रेजों को जिंदा जला दिया था, उसे हटाने के लिए आंदोलन करते समय सरकार ने उन्हें फिर जेल में डाल दिया। उन्होंने जेल में भूख हड़ताल की। सरकार को उनके जेल में रहते हुए ही स्मारक हटाना पड़ा। जनता के मजबूत आग्रह पर उन्हें जेल से छोड़कर घर में नजरबंद कर दिया गया। आखिर में यह कहा जा सकता है कि अपनी मातृभूमि को आजाद कराने के लिए सुभाषचन्द्र बोस ने अंग्रेजी सरकार की यातनाएं लगातार सहन कीं।
In simple words: चौथे सर्ग में सुभाष को कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने 'फॉरवर्ड ब्लॉक' की स्थापना की और पूरे देश में स्वतंत्रता की अलख जगाई। इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा और अंग्रेजों की यातनाएं भी सहनी पड़ीं।

🎯 Exam Tip: 'फॉरवर्ड ब्लॉक' की स्थापना के कारणों और सुभाष की भूमिका पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

 

Question 6. 'जय सुभाष' खण्डकाव्य के आधार पर बताइए कि सुभाषचन्द्र बोस किन परिस्थितियों में वेश छोड़कर विदेश गये ? वहाँ जाकर उनके द्वारा भारत की स्वतन्त्रता के लिए किये गये प्रयत्नों का वर्णन कीजिए। [2009, 10]
या
'जय सुभाष' खण्डकाव्य के 'पाँचवें सर्ग' का सारांश (कथासार लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 16, 17]
[संकेत द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ सर्ग से परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए पाँचवें सर्ग का सारांश लिखिए ।]
Answer: इस सर्ग में सुभाष के गुप्त रूप से घर से भाग जाने की कहानी का वर्णन है। सुभाष जब अपने घर में नजरबंद थे, तब सरकार ने उनकी सभी गतिविधियों पर कड़ी रोक लगा रखी थी। गुप्तचरों की कड़ी नजर और पुलिस का पहरा लगातार बना हुआ था। इन कठिन परिस्थितियों में भी सुभाष 15 जनवरी, 1941 को आधी रात में, दाढ़ी बढ़ाए हुए, एक मौलवी के वेश में पुलिस की आंखों में धूल झोंककर निकल गए और फ्रंटियर मेल से पेशावर पहुंच गए। वहां से उत्तमचन्द नाम के व्यक्ति की मदद से वे बर्लिन पहुंच गए। पेशावर से काबुल तक की उनकी यात्रा बहुत भयानक थी। उन्हें कई कष्ट सहने पड़े और कई बार वेश बदलने पड़े।
बर्लिन में उन्होंने 'आजाद हिन्द फौज' की स्थापना की। दूर रहकर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करना मुश्किल था, इसलिए वे पनडुब्बी से टोक्यो पहुंचे। जापानियों ने उन्हें पूरा सहयोग दिया। वहां से रासबिहारी बोस के साथ वे सिंगापुर आए। उनकी सेना में विदेशों में रहने वाले कई भारतीय भी शामिल हो गए। उन्होंने तन-मन-धन से सुभाष को पूरा सहयोग दिया। उन्होंने गांधीजी, नेहरू, आजाद और बोस के नाम पर चार ब्रिगेड बनाए, जिनमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी शामिल थीं। सहगल, शाहनवाज, ढिल्लन और लक्ष्मीबाई ने बहादुरी से इस सेना का नेतृत्व किया। हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी धर्मों के लोग एकजुट होकर स्वतंत्रता संग्राम के लिए तैयार हो गए। सुभाष ने 'दिल्ली चलो' का नारा हर दिशा में फैलाया। 'आजाद हिन्द फौज' का हर सैनिक स्वतंत्रता संग्राम में जाने को उत्सुक था। इस तरह सुभाष ने देश की आजादी के लिए विदेश में भी अथक प्रयास किए।
In simple words: जब सुभाष को अंग्रेजों ने घर में नजरबंद कर दिया था और उन पर कड़ी नजर रखी थी, तब वे मौलवी के वेश में छिपकर विदेश गए। वहां उन्होंने 'आजाद हिन्द फौज' बनाई और भारत की आजादी के लिए विदेश से ही संघर्ष किया, लोगों को देश के लिए लड़ने को प्रेरित किया।

🎯 Exam Tip: सुभाष के वेश बदलने की परिस्थितियों, उनके विदेश जाने के उद्देश्यों और 'आजाद हिन्द फौज' के गठन व उसकी गतिविधियों का विस्तृत वर्णन करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. 'जय सुभाष' खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग का सारांश लिखिए। [2009, 13, 17]
Answer: छठे सर्ग में 'आजाद हिन्द फौज' के भारत पर आक्रमण और मिली जीत का वर्णन किया गया है। सुभाष ने 'आजाद हिन्द फौज' के वीरों को 'दिल्ली चलो' और 'जय हिन्द' के नारे दिए। उन्होंने "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" कहकर युवकों को देश के लिए बलिदान देने के लिए बुलाया। इस प्रकार उन्होंने अपनी सेना के वीरों में देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने की गहरी भावना भर दी। सेना के वीर उनके जोशीले भाषणों को सुनकर शत्रु की विशाल सेना की परवाह किए बिना, विजय प्राप्त करते हुए 18 मार्च, 1944 को कोहिमा तक पहुंच गए।
भयंकर गोलाबारी करके उन्होंने इम्फाल शहर को घेर लिया और शत्रु को पीछे भगा दिया। अराकान पर्वत-शिखर पर भी भारतीय तिरंगा लहराने लगा। आजाद हिन्द सेना ने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी और उनके शिविरों पर हमला करके कई मोर्चों पर उन्हें कभी न भूलने वाली करारी हार दी। सुभाष का नेतृत्व और सेना का साहस अविस्मरणीय था।
In simple words: छठे सर्ग में 'आजाद हिन्द फौज' ने सुभाष के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। सुभाष ने 'दिल्ली चलो' और 'जय हिन्द' के नारे दिए, और "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" कहकर सैनिकों में जोश भरा। उन्होंने अंग्रेजों को कोहिमा और इम्फाल जैसे कई मोर्चों पर हराया।

🎯 Exam Tip: षष्ठ सर्ग के सारांश में 'आजाद हिन्द फौज' की प्रमुख जीतें, नारों का प्रभाव और युद्ध के परिणामों को विशेष रूप से बताएं।

 

Question 8. 'जय सुभाष' खण्डकाव्य के सप्तम (अन्तिम) सर्ग की कथा लिखिए। [2012, 14]
Answer: सातवें सर्ग में दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी और जापान की हार की चर्चा की गई है। संसार में सुख-दुःख और हार-जीत का चक्र चलता रहता है। अंग्रेजों की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। 'आजाद हिन्द फौज' की जीत के बाद भी हार होने लगी। अंग्रेजों ने बर्मा (अब म्यांमार) में आकर अपना राज फिर से जमा लिया। अगस्त 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर अमेरिका ने अणुबम गिराकर सब कुछ खत्म कर दिया। जापान ने मानवता की रक्षा के लिए जनहित में अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
सुभाष ने स्थिति को अनुकूल न जानकर 'आजाद हिन्द फौज' के आत्मसमर्पण करने का भी फैसला किया। उन्होंने सेना के वीरों को बधाई दी और आश्वासन दिया कि सही समय आने पर स्वतंत्रता के लिए फिर से लड़ाई लड़ेंगे। वे विमान से टोक्यो में जापान के प्रधानमंत्री हिरोहितो से मिलने जाना चाहते थे। 18 अगस्त, 1945 को ताइहोक में उनका विमान आग लगने से दुर्घटनाग्रस्त हो गया और सुभाष भी नहीं बच सके। इस दुखद खबर को सुनकर हर कोई रो पड़ा। भारत में अभी भी बहुत से लोगों को लगता है कि सुभाष आज भी जीवित हैं। जब तक सूरज, चांद और तारे रहेंगे, भारत के घर-घर में सुभाष अपने यश के रूप में अमर रहेंगे। उनकी यशोगाथा नवयुवकों को त्याग, देशप्रेम और बलिदान की प्रेरणा देती रहेगी। उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा।
In simple words: खण्डकाव्य के अंतिम सर्ग में दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार और हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम गिरने का वर्णन है। सुभाष ने 'आजाद हिन्द फौज' के आत्मसमर्पण का फैसला किया। 18 अगस्त, 1945 को विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन उनकी यादें और प्रेरणा हमेशा जीवित रहेंगी।

🎯 Exam Tip: अंतिम सर्ग का वर्णन करते समय द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों, सुभाष के निर्णय और उनकी मृत्यु से जुड़े दुखद घटनाक्रम को सही क्रम में प्रस्तुत करें।

 

Question 9. 'जय सुभाष' खण्डकाव्य के आधार पर नायक (प्रमुख पात्र) नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
'सुभाष में अनेक गुणों का समावेश था ।”जय सुभाष' के आधार पर खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14]
या
'जय सुभाष खण्डकाव्य के आधार पर सुभाषचन्द्र बोस की चार विशेषताओं पर प्रकाश डालिए, जो आपको अधिकाधिक प्रभावित करती हैं। [2009, 14]
या
'जय सुभाष' खण्डकाव्य के आधार पर सिद्ध कीजिए कि सुभाषचन्द्र त्याग, अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता के प्रतीक हैं। [2010]
या
'जय सुभाष' खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। [2015, 17, 18]
Answer: श्री विनोदचन्द्र पाण्डेय 'विनोद' द्वारा लिखा गया 'जय सुभाष' खण्डकाव्य स्वतंत्रता-संग्राम के महान सेनानी सुभाषचन्द्र बोस के त्याग, देशभक्ति और बलिदान भरे जीवन की कहानी को बताता है। यह काव्य सुभाषचन्द्र बोस के व्यक्तित्व और गुणों को उजागर करता है। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ही इस खण्डकाव्य के नायक हैं। उनके प्रमुख चारित्रिक गुण इस प्रकार हैं:
(1) कुशाग्र बुद्धि एवं प्रखर प्रतिभाशाली-सुभाष बचपन से ही बहुत बुद्धिमान और प्रतिभाशाली थे। उन्होंने मैट्रिक और इंटरमीडिएट की परीक्षाएँ प्रथम स्थान प्राप्त करके पास की थीं। विदेश जाकर उन्होंने आई.सी.एस. की परीक्षा भी पास की। उस समय किसी भारतीय के लिए यह परीक्षा पास करना बहुत गर्व की बात थी। आगे चलकर कलकत्ता अधिवेशन में उनकी प्रबंधन-क्षमता, आजाद हिन्द फौज और फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना, और पुलिस की आंखों में धूल झोंककर कड़ी निगरानी से निकल भागना उनकी असाधारण प्रतिभा को दिखाता है।
(2) समाजसेवी, अनुपम त्यागी एवं कष्ट-सहिष्णु-सुभाष सभी मनुष्यों के सेवक थे। बंगाल में बाढ़ आने पर उन्होंने बाढ़-पीड़ितों की बहुत मदद की। जाजपुर में महामारी फैलने पर उन्होंने रोगियों की सेवा की। देश की स्वतंत्रता के लिए बुलाए जाने पर उन्होंने आई.सी.एस. जैसे उच्च पद को छोड़कर महान त्याग का परिचय दिया। उन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए बहुत कठोर यातनाएं सहीं, जो बयान नहीं की जा सकतीं। उनकी मानव-सेवा की भावना के बारे में पाण्डेय जी ने लिखा है -
दुःखी जनों का कष्ट कभी वह, नहीं देख सकते थे। दोस्तों की सेवा करने में, वह न कभी थकते थे।
(3) स्वाभिमानी, साहसी और निर्भीक-सुभाष में स्वाभिमान और निडरता भरी हुई थी। वे किसी भी तरह अपने देश के अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। छात्र जीवन में प्रोफेसर ऑटेन द्वारा भारतीयों की निंदा सुनकर उन्होंने ऑटेन को थप्पड़ मारकर अपना स्वाभिमान दिखाया था। उन्होंने आई.सी.एस. का प्रतिष्ठित पद भी इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि अंग्रेजों की नौकरी करना उनके स्वाभिमान के अनुकूल नहीं था।
स्वाभिमान का परिचय सबको, हो निर्भीक दिया था। ले देशापमान का बदला, उत्तम कार्य किया था।
(4) महान देशभक्त और स्वतन्त्रता-प्रेमी-सुभाष देश की आजादी के अद्वितीय आराधक थे। उन्होंने गांधीजी और देशबंधु चितरंजनदास के बुलावे पर राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपनी युवावस्था समर्पित कर दी।
की सुभाष ने राष्ट्र-प्रेम हित अर्पित मस्त जवानी। मुक्ति युद्ध के बने शीघ्र ही वे महान् सेनानी ॥
उनके हृदय में आजादी की आग लगातार जलती रही। अनेक बार जेल-यातनाएं सहने पर भी उन्होंने देश-सेवा का व्रत नहीं छोड़ा। अनेक बार अपने प्राणों को खतरे में डाला, अत्याचारी अंग्रेजों से युद्ध किए और अंत में बलिदान हो गए। उन्होंने अपने जोशीले भाषणों और कार्यों से सभी देशवासियों के हृदय में स्वतंत्रता की आग जला दी।
(5) उत्साह की प्रतिमूर्ति-वीरता, उत्साह और साहस सुभाष के चरित्र के मुख्य गुण थे। उनके इन गुणों को देखकर जहां सामान्य लोग हैरान रह जाते थे, वहीं अंग्रेज डर जाते थे। अंग्रेजी शासन उन्हें अक्सर कैद कर लेता था, लेकिन वे इससे निराश नहीं होते थे। एक बार अंग्रेजों द्वारा घर में नजरबंद कर दिए जाने पर वे अपनी बुद्धि, चतुराई और योजनाबद्धता से अंग्रेज सैनिकों की आंखों में धूल झोंककर भाग निकले और वेश बदलकर काबुल, जर्मनी तथा जापान पहुंच गए। विदेश में रहकर उन्होंने भारतीय युवकों को प्रेरित किया और आजाद हिन्द फौज का गठन किया। उनके भाषण उत्साह से भरे होते थे। उनके उत्साह का ही परिणाम था कि आजाद हिन्द फौज को अंग्रेजी सेनाओं के खिलाफ युद्ध में कई स्थानों पर सफलता मिली थी।
(6) जनता के प्रिय नेता-सुभाष सही अर्थों में जनता के प्रिय नेता थे। अपने महान गुणों और अनुपम देश-भक्ति के कारण वे करोड़ों देशवासियों के श्रद्धापात्र बन गए थे।
वह थे कोटि-कोटि हृदयों के, एक महान् विजेता। मातृभूमि के रत्न अलौकिक, जन-जन के प्रियनेता।
उनकी लोकप्रियता का प्रमाण यह है कि हीरापुर अधिवेशन में उन्होंने गांधीजी द्वारा समर्थित 'पट्टाभि सीतारमैया' को चुनाव में हरा दिया था। जिस लगन और निष्ठा से उन्होंने स्वतंत्रता-संग्राम का संचालन किया, उससे वे जनता के प्रिय नेता बन गए।
वह हो गये समस्त देश की, श्रद्धा के अधिकारी। लेने लगे प्रेरणा उनसे, बाल-वृद्ध-नर-नारी ॥
(7) ओजस्वी वक्ता-सुभाषचन्द्र बोस की वाणी बहुत प्रभावशाली थी। वे अपने जोशीले भाषणों द्वारा जनता में देशप्रेम, बलिदान और त्याग का मंत्र फूंक देते थे। “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" की पुकार पर हजारों देशभक्त उनकी सेना में तन-मन-धन से शामिल हो गए। उनकी जोशीली वाणी सुनकर, वीर पुरुष अपनी जान हथेली पर रखकर स्वतंत्रता-संग्राम में कूद पड़े थे।
लगी गूंजने बंगभूमि में, उनकी प्रेरक वाणी। मन्त्र मुग्ध होते थे सुनकर, उसको सारे प्राणी ॥
उन्होंने अनेक सभाओं में और आजाद हिन्द फौज के सामने जो भाषण दिए, वे बहुत जोशीले और प्रेरणादायक थे।
(8) महान सेनानी एवं योद्धा-सुभाष महान सेनानी और अद्भुत योद्धा थे। 'आजाद हिन्द फौज' का संगठन और कुशल नेतृत्व करके उन्होंने एक श्रेष्ठ सेनापति होने की अपनी क्षमता साबित कर दी थी। अंग्रेजों की विशाल सेना के खिलाफ युद्ध की घोषणा करके उन्होंने अपने अदम्य साहस और बुद्धिमत्ता से उन्हें कई स्थानों पर हराया और कई स्थानों पर भारतीय तिरंगा फहराकर अपने को महान विजेता साबित कर दिया।
सेनानी सुभाष ने भीषण, रण-दुन्दुभी बजाई ।। पाने हेतु स्वराज्य उन्होंने, छेड़ी विकट लड़ाई ॥
(9) युवा-आन्दोलन के प्रवर्तक-सुभाष युवा-आन्दोलन के प्रवर्तक और नवयुवकों के प्रेरणास्रोत थे। इन्होंने पूरे देश की युवा संस्थाओं को एक साथ जोड़कर संगठित युवा-आन्दोलन की शुरुआत का प्रशंसनीय कार्य किया था। इन्हीं के प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत में नवजवान सभा की स्थापना हो सकी थी।
नवयुवकों के भी प्रयाण की, आयी है शुभ बेला। हो सकती है नहीं कभी भी, तरुणों की अवहेला ॥
(10) महान साहित्य सेवी-श्री सुभाष ने बहुत विपरीत परिस्थितियों में 'द इंडियन स्ट्रगल' पुस्तक लिखकर अपनी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया था। उनके भाषण भी साहित्य की अनमोल निधि हैं।
लिख इण्डियन स्ट्रगल पुस्तक, ख्याति उन्होंने पायी। प्रकट किये इसमें सुभाष ने, भाव प्रेरणादायी।
(11) स्वतंत्रता के जन्मदाता-भारत को स्वतंत्र कराने में सुभाषचन्द्र बोस का योगदान बहुत सराहनीय है। अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड़कर उन्होंने उन्हें इतना डरा दिया था, जिसके परिणामस्वरूप वे भारत को स्वतंत्रता देने के लिए मजबूर हो गए थे।
मुक्त हुई उनके प्रयत्न से, अपनी भारतमाता। दिन पन्द्रह अगस्त का अब भी, उनकी याद दिलाता ॥
इनके अलावा नेताजी में और भी कई आदर्श गुण थे, जिनके आधार पर उनके महान व्यक्तित्व और चरित्र का परिचय मिलता है। उन्होंने जो उच्च आदर्श दिखाए हैं, वे युगों-युगों तक संसार के अनेक लोगों को प्रेरणा देते रहेंगे। उनके जीवन से मनुष्य कष्ट सहने की शक्ति, त्याग की भावना और राष्ट्रीयता की शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। उनके आदर्श जीवन से भारत के नवयुवकों को स्वतंत्रता-प्रेम और त्याग की प्रेरणा मिलती रहेगी। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जीवन हमें हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।
वीर सुभाष अनन्तकाल तक, शुभ आदर्श रहेंगे। युग-युग तक भारत के वासी, उनकी कथा कहेंगे।
In simple words: नेताजी सुभाषचन्द्र बोस 'जय सुभाष' खण्डकाव्य के नायक हैं। वे बहुत बुद्धिमान, स्वाभिमानी, साहसी, देशभक्त और महान वक्ता थे। उन्होंने देश की आजादी के लिए अपनी नौकरी छोड़ी, जेल गए, 'आजाद हिन्द फौज' बनाई और युवाओं को प्रेरित किया। उनका जीवन त्याग, साहस और बलिदान का अद्भुत उदाहरण है।

🎯 Exam Tip: चरित्र-चित्रण करते समय नेताजी के प्रत्येक गुण को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें और उनके जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को भी दर्शाएं।

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