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Detailed Chapter 4 बिहारी UP Board Solutions for Class 10 Hindi
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Class 10 Hindi Chapter 4 बिहारी UP Board Solutions PDF
कवि-परिचय
Question 1. कविवर बिहारी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए। [2009, 10] या बिहारी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी किसी एक रचना का नामोल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
Answer: कविवर बिहारी रीतिकाल के प्रसिद्ध श्रृंगारी कवि हैं। वे दोहे जैसे छोटे छंदों में बहुत गहरी बातें कहने के लिए जाने जाते हैं। एक प्रसिद्ध आलोचक श्री पद्मसिंह शर्मा ने बिहारी के दोहों की तुलना गंगा नदी की विशाल धारा से की है। उन्होंने कहा कि बिहारी के दोहों का अर्थ इतना गहरा और व्यापक है कि उन्हें किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता। बिहारी के दोहे रस से भरे हुए हैं, कल्पना के इंद्रधनुष के समान हैं, और उनकी भाषा में सुंदरता के मोहक चित्र मिलते हैं।
जीवन-परिचय: बिहारी का जन्म सन् 1603 ई० (संवत् 1660 वि०) में ग्वालियर के पास बसुवा गोविन्दपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम केशवराय था। उन्हें मथुरा का चौबे ब्राह्मण माना जाता है। उन्होंने स्वामी नरहरिदास से संस्कृत और प्राकृत भाषाएँ सीखीं। उन्होंने अपनी युवावस्था मथुरा में बिताई। मुगल बादशाह शाहजहाँ के बुलावे पर वे आगरा गए और फिर जयपुर के राजा जयसिंह के दरबार में कवि बन गए। जब राजा जयसिंह अपनी नई पत्नी के प्रेम में फंसे थे और राजकाज ठीक से नहीं कर पा रहे थे, तब बिहारी ने एक दोहा लिखकर उन्हें भेजा: "नहिं पराग नहि मधुर मधु, नहि बिकासु इहि काल ।। अली कली ही सौं बँध्यो, आगै कौन हवाल ॥" इस दोहे से राजा जयसिंह की आंखें खुलीं और वे फिर से अपने कर्तव्यों पर ध्यान देने लगे। राजा जयसिंह की प्रेरणा से बिहारी ने सुंदर दोहे रचे, और उन्हें हर दोहे पर एक सोने का सिक्का मिलता था। बाद में, अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद, उनका मन भक्ति और वैराग्य की ओर मुड़ गया। उनकी सतसई 723 दोहों वाली है, जिसे सन् 1662 ई० में पूरा माना जाता है। सन् 1663 ई० (संवत् 1720 वि०) में उनकी मृत्यु हो गई।
रचनाएँ: बिहारी की एक ही रचना है, जिसका नाम 'बिहारी सतसई' है। यह श्रृंगार रस से भरा एक मुक्तक काव्य-ग्रन्थ है। बिहारी ने अपने छोटे दोहों में प्रेम-लीला के गहरे से गहरे प्रसंगों को दर्शाया है। उनके दोहों के बारे में कहा जाता है कि वे नाविक के तीर जैसे होते हैं – "सतसैया के दोहरे, ज्यौं नाविक के तीर। देखने में छोटे लगें, घाव करै गम्भीर॥" रीतिकाल के कवियों में बिहारी का स्थान बहुत खास है। उनकी अद्भुत रचनात्मकता के कारण काव्य-संसार ने उन्हें महाकवि का दर्जा दिया है। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने कहा है कि उन्होंने प्रेम के सभी पहलुओं का वर्णन सिर्फ इन सात सौ दोहों में कर दिया है।
In simple words: बिहारी रीतिकाल के महान कवि थे जिन्होंने छोटे दोहों में गहरी बातें कहीं। उनकी एकमात्र रचना 'बिहारी सतसई' है। राजा जयसिंह को उनके दोहे से प्रेरणा मिली थी।
🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय लिखते समय कवि का जन्म, मृत्यु, माता-पिता, गुरु, शिक्षा, प्रमुख रचनाएँ और भाषा-शैली जैसे मुख्य बिन्दुओं को शामिल करना महत्वपूर्ण है।
पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या भक्ति
Question 1. मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ । जा तन की झाई परै, स्यामु हरित-दुति होइ ॥ [2014]
Answer: कवि ने इस दोहे में राधा जी की वंदना की है। वे कहते हैं कि चतुर राधिका जी मेरे सांसारिक कष्टों को दूर करें। जिनके पीले (गोरे) शरीर की हल्की परछाई पड़ने से साँवले (नीले) रंग के श्रीकृष्ण हरे रंग के हो जाते हैं। इससे श्रीकृष्ण प्रसन्न दिखते हैं या उनके पाप नष्ट हो जाते हैं। राधा के ज्ञानमय शरीर की चमक से मन की सारी बुराई या श्यामलता मिट जाती है। राधा जी का गौरवर्ण शरीर इतना तेजस्वी है कि उसकी चमक से श्रीकृष्ण की कांति भी फीकी पड़ जाती है। कवि ने यहाँ रंगों के अद्भुत मेल से राधा के प्रभाव का वर्णन किया है। इस दोहे में अनुप्रास और श्लेष अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है, जिससे इसकी शोभा बढ़ गई है।
In simple words: कवि राधा रानी से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे उनके जीवन की सारी परेशानियाँ दूर कर दें। राधा की गोरी काया की एक झलक पड़ते ही साँवले कृष्ण का रंग हरा हो जाता है, जिसका मतलब है कि वे बहुत खुश हो जाते हैं और उनके दुख मिट जाते हैं।
🎯 Exam Tip: दोहे की व्याख्या करते समय हर पंक्ति के शब्दों के अर्थ स्पष्ट करें और फिर पूरे दोहे का भावार्थ सरल शब्दों में समझाएँ।
Question 2. मोर-मुकुट की चंद्रिकनु, यौं राजत नंदनंद ।। मनु संसि सेखर की अकस, किय सेखर सत चंद ॥
Answer: इस दोहे में कवि ने श्रीकृष्ण के मोर-मुकुट की सुंदरता का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण के सिर पर मोर पंखों का मुकुट बहुत सुंदर लग रहा है। उन मोर पंखों के बीच में बनी सुनहरी चंद्रिकाओं को देखकर ऐसा लगता है, मानो भगवान शंकर से मुकाबला करने के लिए श्रीकृष्ण ने अपने सिर पर सैकड़ों चंद्रमा धारण कर लिए हों। यहाँ कवि ने भगवान शंकर के सिर पर चंद्रमा और श्रीकृष्ण के मोर-मुकुट की चंद्रिकाओं की तुलना करके अपनी अद्भुत कल्पना दिखाई है। यह वर्णन श्रीकृष्ण के सौंदर्य को बहुत आकर्षक बनाता है। दोहे में अनुप्रास और उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग है।
In simple words: श्रीकृष्ण के मोर-पंख वाले मुकुट में लगी चंद्रिकाएँ इतनी सुंदर लग रही हैं, मानो भगवान शंकर के चंद्रमा से मुकाबला करने के लिए उन्होंने अपने सिर पर बहुत सारे चंद्रमा लगा लिए हों।
🎯 Exam Tip: सौंदर्य वर्णन वाले दोहों में कवि की कल्पना और उपमाओं को ध्यान से समझें, क्योंकि वे ही मूल भाव को प्रकट करते हैं।
Question 3. सोहत ओढ़ पीतु पटु, स्याम सलौने गात । मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात ॥ [2012, 14]
Answer: इस दोहे में श्रीकृष्ण के पीले वस्त्र पहनने के सौंदर्य का वर्णन किया गया है। कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण का साँवला (श्याम) शरीर बहुत सुंदर है। जब वे उस पर पीले वस्त्र पहनते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी नीलमणि के पहाड़ पर सुबह की सुनहरी धूप पड़ रही हो। यहाँ श्रीकृष्ण के साँवले शरीर की तुलना नीलमणि पर्वत से और उनके पीले वस्त्रों की तुलना सुबह की धूप से की गई है। यह वर्णन श्रीकृष्ण के मनमोहक रूप को बहुत सुंदर तरीके से प्रस्तुत करता है। दोहे में अनुप्रास और उत्प्रेक्षा अलंकार की सुंदर छटा है।
In simple words: श्रीकृष्ण अपने साँवले शरीर पर पीले कपड़े पहनकर ऐसे सुंदर लग रहे हैं, जैसे नीलमणि पर्वत पर सुबह की सुनहरी धूप चमक रही हो।
🎯 Exam Tip: उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकारों को पहचानकर व्याख्या करने से अर्थ और भाव स्पष्ट हो जाते हैं, जिससे उत्तर अधिक प्रभावशाली बनता है।
Question 4. अधर धरत हरि कै परत, ओठ-डीठि-पट जोति ।। हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष-हँग होति ॥ [2012, 14]
Answer: इस दोहे में कवि ने श्रीकृष्ण की हरे रंग की बाँसुरी के इंद्रधनुषी रूप का वर्णन किया है जब वे उसे बजाते हैं। कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपने लाल होंठों पर हरे रंग की बाँसुरी रखकर बजा रहे हैं। उस समय उनकी आँखों की सफेदी, वस्त्रों की पीली चमक और शरीर की साँवली कांति, जब लाल होंठों पर रखी हरे रंग की बाँसुरी पर पड़ती है, तो बाँसुरी इंद्रधनुष के समान कई रंगों वाली बहुत सुंदर दिखने लगती है। यह दोहा बिहारी के रंगों को मिलाकर अद्भुत चित्र बनाने के ज्ञान को दिखाता है। यहाँ श्रीकृष्ण के होंठ, दृष्टि और वस्त्रों के रंगों के मेल से बाँसुरी में इंद्रधनुष जैसा प्रभाव उत्पन्न होता है, जो बहुत आकर्षक लगता है।
In simple words: जब श्रीकृष्ण अपने लाल होंठों पर हरे रंग की बाँसुरी रखते हैं, तो उनकी आँखों, कपड़ों और शरीर के रंगों के कारण वह बाँसुरी इंद्रधनुष जैसी रंग-बिरंगी और सुंदर लगने लगती है।
🎯 Exam Tip: रंगों के मिश्रण से उत्पन्न सौंदर्य और उसके प्रतीकात्मक अर्थ को समझना काव्य की गहराई को बढ़ाता है।
Question 5. या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई ।। ज्यों-ज्य बूडे स्याम रंग, त्यों-त्यौं उज्जलु होई ॥ [2009, 18]
Answer: इस दोहे में कवि ने श्रीकृष्ण के प्रेम से मन की अशुद्धियों के दूर होने का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि प्रेम में डूबे हुए मन की दशा बहुत अजीब है, इसे कोई समझ नहीं सकता। आमतौर पर, कोई भी वस्तु काले रंग में डूबने पर काली हो जाती है। श्रीकृष्ण भी साँवले रंग के हैं, लेकिन जब मेरा मन उनके प्रेम में जितना अधिक डूबता जाता है, उतना ही वह पवित्र और निर्मल (सफेद) होता जाता है। यह कृष्ण की भक्ति की शक्ति को दर्शाता है कि वह मन को शुद्ध और पवित्र कर देती है। यहाँ श्लेष, पुनरुक्तिप्रकाश और विरोधाभास अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
In simple words: कवि कहते हैं कि मेरे कृष्ण भक्ति में लीन मन की दशा अनोखी है। जैसे-जैसे यह मन कृष्ण के साँवले रंग में डूबता है, वैसे-वैसे यह और भी पवित्र और शुद्ध होता जाता है, जबकि सामान्यतः काला रंग किसी को भी काला ही करता है।
🎯 Exam Tip: विरोधाभास अलंकार वाले दोहों में छिपे गहरे अर्थ को समझने का प्रयास करें, जहाँ विपरीत बातें एक साथ सही लगती हैं।
Question 6. तौ लगु या मन-सदन मैं, हरि आर्दै किहिं बाट । विकट जटे जौ लगु निपट, खुटै न कपट-कपाट ॥ [2009]
Answer: इस दोहे में कवि ने ईश्वर को हृदय में बसाने के लिए कपट त्यागने की आवश्यकता बताई है। कविवर बिहारी कहते हैं कि इस मनरूपी घर में ईश्वर किस रास्ते से प्रवेश करेंगे? तब तक नहीं, जब तक मनरूपी घर में मजबूती से लगे कपट के किवाड़ पूरी तरह से खुल नहीं जाते। इसका मतलब है कि जब तक हृदय से सारी चालाकी और धोखेबाजी निकल नहीं जाती, तब तक ईश्वर का प्रवेश और निवास संभव नहीं है। ईश्वर को पाने के लिए मन का साफ और सच्चा होना बहुत ज़रूरी है। यह दोहा रूपक और अनुप्रास अलंकारों के साथ प्रस्तुत हुआ है।
In simple words: कवि कहते हैं कि भगवान हमारे मन में तब तक नहीं आ सकते, जब तक हम अपने हृदय से कपट और धोखेबाजी को पूरी तरह से हटा नहीं देते। मन को साफ करके ही ईश्वर को पाया जा सकता है।
🎯 Exam Tip: ईश्वर भक्ति के लिए आंतरिक शुद्धता का महत्व बताने वाले दोहे में मन की पवित्रता पर जोर दें।
Question 7. जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौ नाँहि । ज्यौं आँखिनु सबु देखिये, आँखि न देखी जाँहि ॥ [2011]
Answer: इस दोहे में कवि बिहारी ने ईश्वर भक्ति की प्रेरणा दी है। कवि का कहना है कि जिस ईश्वर ने तुम्हें पूरे संसार का ज्ञान कराया है, उसी ईश्वर को तुम नहीं पहचान पाए। यह ऐसा ही है जैसे आँखें सब कुछ देख सकती हैं, लेकिन वे खुद को नहीं देख सकतीं। कवि यहाँ मनुष्य की अज्ञानता को दर्शाते हैं कि वह जिसने उसे सब कुछ दिखाया, उसे ही भूल गया। यह दोहा दृष्टांत अलंकार का सुंदर उदाहरण है। ईश्वर की शक्ति को समझने के लिए हमें अपनी आंतरिक दृष्टि का उपयोग करना चाहिए।
In simple words: जिसने हमें पूरे संसार का ज्ञान दिया है, उस भगवान को हम नहीं जान पाए हैं। यह वैसे ही है जैसे हमारी आँखें सब कुछ देखती हैं, पर खुद को नहीं देख पातीं।
🎯 Exam Tip: दृष्टांत अलंकार वाले दोहे में उपमा और उदाहरण के माध्यम से कही गई बात को स्पष्ट करना चाहिए।
Question 8. जप, माला, छापा, तिलक, सरै न एकौ कामु । मन-काँचै नाचे वृथा, साँचे राँचे रामु ॥ [2011]
Answer: इस दोहे में कविवर बिहारी ने बाहरी दिखावों को बेकार बताकर भगवान की सच्ची भक्ति पर जोर दिया है। कवि कहते हैं कि केवल मंत्र जपने से, माला फेरने से, चंदन का छापा लगाने से या तिलक लगाने जैसे बाहरी क्रियाओं से कोई काम पूरा नहीं होता। सच्ची भक्ति इन बाहरी आडंबरों से नहीं मिलती। जिसका मन ईश्वर की भक्ति करने में कच्चा है, वह बेकार में ही इधर-उधर की क्रियाओं में भटकता रहता है। ईश्वर तो केवल सच्चे और निर्मल मन की भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं। कबीरदास का भी यही विचार है कि बाहरी दिखावा महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि आंतरिक शुद्धता और सच्ची श्रद्धा ही मायने रखती है।
In simple words: कवि कहते हैं कि माला जपने, तिलक लगाने जैसे बाहरी काम से भगवान खुश नहीं होते। भगवान तो केवल सच्चे और साफ मन से भक्ति करने वाले पर ही प्रसन्न होते हैं।
🎯 Exam Tip: भक्ति संबंधी दोहों में बाहरी आडंबरों के बजाय आंतरिक श्रद्धा और सच्चे मन के महत्व को उजागर करें।
नीति
Question 1. दुसह दुराज प्रजानु कौं, क्यौं न बढ़े दुख-दंदु ।। अधिक अँधेरी जग करते, मिलि मावस रबि-चंद् ॥ [2016]
Answer: इस दोहे में कवि ने दो राजाओं के शासन से जनता को होने वाले कष्टों का वर्णन किया है। कवि का कहना है कि एक ही देश में दो राजाओं का शासन होने से प्रजा के दुख और संघर्ष बहुत बढ़ जाते हैं। दोहरे शासन में प्रजा उतनी ही दुखी हो जाती है, जितना अमावस्या की रात में सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में मिलकर पूरे संसार को बहुत गहरे अँधेरे से भर देते हैं। इससे जनता को यह समझने में मुश्किल होती है कि किसकी आज्ञा माननी चाहिए, और वे दुविधा में पड़ जाते हैं। यह कवि के ज्योतिष ज्ञान का भी परिचायक है।
In simple words: कवि कहते हैं कि जब दो राजा एक साथ शासन करते हैं, तो जनता का दुख बहुत बढ़ जाता है। यह वैसा ही है जैसे अमावस्या की रात में सूर्य और चंद्रमा एक साथ आने से बहुत अधिक अँधेरा हो जाता है।
🎯 Exam Tip: दृष्टांत अलंकार का प्रयोग करते हुए दिए गए उदाहरण (अमावस्या) को व्याख्या में शामिल करके अर्थ को स्पष्ट करें।
Question 2. बसै बुराई जासु तन, ताही कौ सनमानु । भली-भलौ कहि छोड़िये, खोटें ग्रह जपु दानु ॥ [2016, 18]
Answer: इस दोहे में कवि ने संसार की एक कड़वी सच्चाई बताई है कि दुष्ट व्यक्ति का बहुत आदर होता है। कवि का मानना है कि जिसके पास दूसरों को नुकसान पहुँचाने की शक्ति होती है, संसार में उसका बहुत सम्मान होता है। अच्छे लोगों को तो यह कहकर छोड़ दिया जाता है कि ये भले हैं, इनकी उपेक्षा की जाती है, लेकिन अनिष्टकारी ग्रहों (जैसे शनि) के आने पर लोग जप-दान आदि करके उन्हें शांत करने की कोशिश करते हैं। इसका मतलब है कि लोग बुराई या दुष्टता वाले व्यक्तियों का सम्मान डर के कारण करते हैं, ताकि वे उन्हें नुकसान न पहुँचाएँ। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने भी ऐसे ही विचार अपने काव्य में व्यक्त किए हैं।
In simple words: कवि कहते हैं कि इस संसार में जिस व्यक्ति के अंदर बुराई होती है, लोग उसी का सम्मान करते हैं। अच्छे लोगों को तो छोड़ दिया जाता है, पर बुरे ग्रहों को शांत करने के लिए पूजा-पाठ करते हैं।
🎯 Exam Tip: समाज की सच्चाई बताने वाले दोहों में कवि के व्यंग्य और उदाहरण को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question 3. नर की अरु नल-नीर की, गति एकै करि जोड़ । जेतौ नीचो है चले, तेतौ ऊँचौ होइ ॥ [2012, 16]
Answer: इस दोहे में कवि ने मनुष्य और नल के पानी की गति को एक समान बताया है। कवि कहते हैं कि मनुष्य और नल के पानी की स्थिति एक जैसी होती है। जिस प्रकार नल का पानी जितना नीचे होकर बहता है, उतना ही ऊपर चढ़ता है, उसी प्रकार मनुष्य जितना अधिक नम्रता का व्यवहार करता है, उतनी ही अधिक उन्नति करता है। यहाँ विनम्रता के महत्व को समझाया गया है कि झुकने वाला ही ऊपर उठता है। यह दोहा श्लेष अलंकार का एक सुंदर उदाहरण है, जहाँ 'नीचो' और 'ऊँचो' शब्दों के दो-दो अर्थ हैं।
In simple words: कवि कहते हैं कि इंसान और नल के पानी की आदत एक जैसी होती है। जितना पानी नीचे होकर चलता है, उतना ही ऊपर चढ़ता है। उसी तरह, इंसान जितना नम्र होता है, उतना ही जीवन में आगे बढ़ता है।
🎯 Exam Tip: श्लेष अलंकार वाले दोहे में एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थों को स्पष्ट करना चाहिए, जिससे उसकी विशेषता समझ में आए।
Question 4. बढ़त-बढ़त संपति-सलिलु, मन-सरोजु बढ़ि जाई । घटत-घटत सु न फिरि घटै, बरु समूल कुम्हिलाई ॥ [2012, 14, 17]
Answer: इस दोहे में कवि ने धन के बढ़ने पर मन पर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि धनरूपी जल के बढ़ने के साथ-साथ मनरूपी कमल भी बढ़ता चला जाता है। लेकिन जब धनरूपी जल घटता है, तो मनरूपी कमल घटता नहीं है, बल्कि जड़ सहित मुरझा जाता है। इसका मतलब है कि धन बढ़ने पर मनुष्य की इच्छाएँ भी बढ़ती जाती हैं, परंतु धन घट जाने पर ये इच्छाएँ कम नहीं होतीं। तब मनुष्य इस दुख को सह नहीं पाता और मृत व्यक्ति के समान हो जाता है। कमल के उदाहरण से कवि ने यह स्पष्ट किया है कि धन आने पर मन को नियंत्रित रखना चाहिए, वरना धन न रहने पर बहुत कष्ट होता है।
In simple words: कवि कहते हैं कि जैसे-जैसे धन बढ़ता है, वैसे-वैसे मन की इच्छाएँ भी बढ़ती हैं। लेकिन जब धन कम हो जाता है, तो इच्छाएँ कम नहीं होतीं, बल्कि पूरी तरह से टूट जाती हैं।
🎯 Exam Tip: रूपक अलंकार के माध्यम से बताई गई बात को समझते हुए धन और इच्छाओं के संबंध को सरल शब्दों में समझाएँ।
Question 5. जौ चाहत, चटकन घटे, मैलौ होइ न मित्त । रज राजसु न छुवाइ तौ, नेह-चीकन चित्त ॥ [2014, 17]
Answer: इस दोहे में कवि ने मित्रता में धन और वैभव को दूर रखने का सुझाव दिया है। कवि कहते हैं कि यदि आप चाहते हैं कि मित्रता की चमक कम न हो और मित्रता स्थायी बनी रहे, उसमें कोई दोष न आए, तो धन-दौलत को इससे दूर रखें। धन या किसी भी चीज़ का लोभ मित्रता को खराब कर देता है। जिस प्रकार तेल से चिकनी चीज़ पर धूल पड़ने से वह मैली हो जाती है और उसकी चमक कम हो जाती है, उसी प्रकार प्रेम से भरा मन भी धनरूपी धूल के संपर्क से दोषपूर्ण हो जाता है और मित्रता में कमी आ जाती है। इसलिए कवि सलाह देते हैं कि दोस्ती में पैसे का लेन-देन कम करना चाहिए।
In simple words: कवि कहते हैं कि अगर आप अपनी दोस्ती की चमक को बनाए रखना चाहते हैं और उसे खराब नहीं करना चाहते, तो उसमें धन-दौलत की मिलावट न करें। दोस्ती में पैसे का लोभ आने से संबंध खराब हो जाते हैं।
🎯 Exam Tip: मित्रता जैसे मानवीय संबंधों पर आधारित दोहों में नैतिक शिक्षा और उपमाओं को स्पष्ट करें।
Question 6. बुरी बुराई जौ तजे, तौ चितु खरौ डरातु । ज्यौं निकलंकु मयंकु लखि, गनैं लोग उतपातु ॥
Answer: इस दोहे में कवि ने बताया है कि यदि कोई दुष्ट व्यक्ति अचानक अपनी दुष्टता छोड़ दे, तो लोगों का मन और भी डरने लगता है। कविवर बिहारी कहते हैं कि यदि दुष्ट व्यक्ति अचानक अच्छा व्यवहार करने लगे, तो मन को और अधिक डर लगता है। यह ऐसा ही है जैसे चंद्रमा को कलंक रहित (बिना दाग का) देखकर लोग इसे कोई अनिष्ट या अमंगल का संकेत मानने लगते हैं। इसका अर्थ यह है कि दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव बदलना असंभव सा लगता है, और जब ऐसा होता है, तो लोग उस पर आसानी से विश्वास नहीं कर पाते, बल्कि किसी अनहोनी की आशंका करने लगते हैं। यह दोहा कवि के ज्योतिष ज्ञान को भी दर्शाता है।
In simple words: कवि कहते हैं कि अगर कोई बुरा इंसान अचानक अपनी बुराई छोड़ दे, तो लोग और डर जाते हैं। जैसे, बिना दाग वाले चंद्रमा को देखकर लोग कुछ बुरा होने का संकेत मानते हैं।
🎯 Exam Tip: मानव स्वभाव और सामाजिक व्यवहार पर आधारित दोहों में छिपे व्यंग्य और लोकविश्वासों को व्याख्या में स्पष्ट करें।
Question 7. स्वारथु सुकृतु न श्रम वृथा, देखि बिहंग बिचारि । बाजि पराए पानि परि, हूँ पच्छीनु न मारि ॥
Answer: इस दोहे में कवि ने अन्योक्ति के माध्यम से अपने आश्रयदाता राजा जयसिंह को चेतावनी दी है। कवि कहते हैं, "हे बाज! तुम सोच-विचार करके देखो कि तुम शिकारी के हाथ में पड़कर अपनी ही जाति के पक्षियों को मार रहे हो। इसमें न तो तुम्हारा कोई स्वार्थ है, न कोई अच्छा काम है, और तुम्हारा परिश्रम भी बेकार जा रहा है।" इसका मतलब यह है कि राजा जयसिंह औरंगजेब के इशारों पर अपने ही हिंदू राजाओं पर आक्रमण कर रहे थे। इस काम से राजा जयसिंह को न कोई लाभ मिल रहा था, न ही कोई पुण्य मिल रहा था, और न ही उनका राज्य बढ़ रहा था। कवि बिहारी उन्हें समझा रहे हैं कि वे दूसरों के हाथों की कठपुतली बनकर अपने ही लोगों का विनाश न करें। यह दोहा एक ऐतिहासिक घटना पर आधारित है।
In simple words: कवि बाज (राजा जयसिंह) को समझाते हैं कि तुम दूसरों के हाथों में पड़कर अपने ही लोगों (हिंदू राजाओं) को क्यों मार रहे हो? इसमें तुम्हारा कोई फायदा नहीं है, न कोई पुण्य है, और तुम्हारा सारा काम बेकार जा रहा है।
🎯 Exam Tip: अन्योक्ति अलंकार वाले दोहे में प्रतीकों को पहचानकर उनका वास्तविक अर्थ (जैसे बाज = राजा जयसिंह, शिकारी = औरंगजेब) स्पष्ट करना चाहिए।
काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध
Question 1. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों को पहचानकर उनके नाम तथा स्पष्टीकरण : दीजिए-
(क) जा तन की झाईं परै, स्यामु हरित-दुति होइ ।।
(ख) ज्य-ज्य बूडे स्याम सँग, त्य-त्य उज्जलु होइ ।।
(ग) नर की अरु नल-नीर की, गति एकै करि जोइ ।। जेतौ नीच है चले, तेतौ ऊँचौ होइ ।।।
Answer:
(क) श्लेष अलंकार: "झाई परै, स्यामु हरित-दुति" के एक से अधिक और भिन्न अर्थ होने के कारण यहाँ श्लेष अलंकार है।
(ख) पुनरुक्तिप्रकाश, श्लेष और विरोधाभास अलंकार: 'ज्यौं' और 'त्यौं' शब्द की बार-बार आवृत्ति होने के कारण पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। 'स्याम रंग' और 'उज्जलु' के दो-दो अर्थ होने के कारण श्लेष अलंकार है, और काले रंग में डूबने के बाद सफेद होने का वर्णन विरोधाभास अलंकार है।
(ग) उपमा, विरोधाभास, दीपक तथा श्लेष अलंकार: "नर की अरु नल-नीर की, गति एकै करि जोइ" में 'नर' की समानता 'नल-नीर' से किए जाने के कारण उपमा अलंकार है। "जेतो नीचो है चले, तेतौ ऊँचौ होइ" में जितना नीचा होने पर उतना ऊँचा होने के कारण विरोधाभास अलंकार है। दो वस्तुओं (नलनीर और नर) का एक ही समान धर्म होने के कारण दीपक अलंकार है। 'नीचो' (नीचा तथा पतन) और 'ऊँचो' (ऊँचा तथा उत्थान) के दो-दो अर्थ होने के कारण श्लेष अलंकार है।
In simple words: (क) श्लेष अलंकार है क्योंकि एक शब्द के कई मतलब हैं। (ख) यहाँ शब्दों के बार-बार आने से पुनरुक्तिप्रकाश, और अर्थों के कई मतलब होने से श्लेष और उल्टी बात कहने से विरोधाभास है। (ग) यहाँ चीजों की तुलना करने से उपमा, उल्टी बात कहने से विरोधाभास, एक जैसा धर्म दिखाने से दीपक, और एक शब्द के कई मतलब होने से श्लेष अलंकार है।
🎯 Exam Tip: अलंकारों की पहचान के लिए उनके लक्षण (जैसे एक शब्द के कई अर्थ, विपरीत बातें, बार-बार दोहराना) और उदाहरणों को ध्यान से समझें।
Question 2. निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? सोदाहरण समझाइए-
तौ लगु या मन-सदन मैं, हरि आवै किहिं बाट ।
विकट जटे जौ लगु निपट, खुटै न कपट-कपाट ॥
Answer: इन पंक्तियों में दोहा छन्द है, क्योंकि इसके प्रथम और तृतीय चरणों में 13-13 मात्राएँ होती हैं, और द्वितीय और चतुर्थ चरणों में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इस दोहे में भी यही मात्रा-गणना पाई जाती है। दोहा एक अर्द्धसम मात्रिक छंद है, जिसमें विषम चरणों (पहले और तीसरे) में 13 मात्राएँ और सम चरणों (दूसरे और चौथे) में 11 मात्राएँ होती हैं।
In simple words: इन पंक्तियों में 'दोहा' छंद है। दोहा एक ऐसा छंद होता है जिसके पहले और तीसरे लाइन में 13-13 मात्राएँ और दूसरे और चौथे लाइन में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
🎯 Exam Tip: छंद की पहचान के लिए हर पंक्ति की मात्राएँ गिनना और छंद के नियमों से उनका मिलान करना सबसे प्रभावी तरीका है।
Question 3. कविजन कभी-कभी केवल अप्रस्तुत का वर्णन करते हैं और उसी के द्वारा प्रस्तुत की ओर संकेतमात्र कर देते हैं। इस प्रकार के क्मत्कार को ‘अन्योक्ति अलंकार' कहते हैं। जैसे-
स्वारथु सुकृतु न श्रम वृथा, देखि बिहंग बिचारि ।
बाजि पराए पानि परि, तूं पच्छीनु न मारि ॥
-बिहारी के दोहों से अन्योक्ति का एक अन्य उदाहरण लिखिए-
Answer: बिहारी के दोहों से अन्योक्ति का एक अन्य उदाहरण:
नहीं पराग नहिं मधुर मधु, नहीं विकास इहि काल ।
अली कली ही सो बँध्यो, आगै कौन हवाल ।।
इस दोहे में कवि ने अप्रस्तुत (भौंरा और कली) के माध्यम से प्रस्तुत (राजा जयसिंह और उनकी नई रानी) की ओर संकेत किया है। कवि राजा जयसिंह को समझा रहे थे कि वे अपनी नई रानी के प्रेम में इतने न खो जाएँ कि राजकाज भूल जाएँ।
In simple words: अन्योक्ति अलंकार वह होता है जहाँ हम किसी और चीज के बारे में बात करके असल बात को समझाते हैं। जैसे, भौंरे और कली की बात करके राजा जयसिंह को समझाया गया था कि वे अपने राजकाज पर ध्यान दें।
🎯 Exam Tip: अन्योक्ति अलंकार में, अप्रस्तुत (जिसका सीधे वर्णन किया जाता है) और प्रस्तुत (जिसे समझना होता है) दोनों के बीच का संबंध स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question 4. निम्नलिखित पदों में समास-विग्रह कीजिए तथा उनका नाम लिखिए-
पीतु पटु, नीलमनि, मन-सदन, दुपहर, रवि-चन्द, समूल ।।
Answer:
| समस्त पद | समास-विग्रह | समास-नाम |
|---|---|---|
| पीतु पटु | पीला वस्त्र | कर्मधारय |
| नीलमनि | नीली मणि | कर्मधारय |
| मन-सदन | मनरूपी सदन | कर्मधारय |
| दुपहर | दो पहरों का समूह | द्विगु |
| रवि-चन्द | रवि और चन्द्र | द्वन्द्व |
| समूल | मूल के साथ | अव्ययीभाव |
In simple words: यहाँ कुछ शब्दों का समास-विग्रह करके उनका प्रकार बताया गया है। जैसे 'पीला वस्त्र' 'पीतु पटु' का कर्मधारय समास है, और 'रवि और चन्द्र' 'रवि-चन्द' का द्वन्द्व समास है।
🎯 Exam Tip: समास-विग्रह करते समय शब्दों के बीच के संबंध (जैसे विशेषण-विशेष्य, उपमान-उपमेय, संख्या, या समुच्चयबोधक) को पहचानें ताकि सही समास का नाम बता सकें।
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