NCERT Solutions for Class 10 Hindi: Chapter 01 सूरदास
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Practice Class 10 Hindi Solutions: Chapter 01 सूरदास
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कवि-परिचय
Question 1. सूरदास के जीवन-परिचय और रचनाओं पर प्रकाश डालिए। [2009, 10] या कवि सूरदास का जीवन-परिचय एवं उनकी रचनाओं के नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
Answer: सूरदास हिन्दी साहित्य के चमकते हुए सितारे और भक्ति काल की सगुण कृष्ण-भक्ति धारा के मुख्य कवि हैं। उन्होंने अपनी सुरीली आवाज़ में भगवान कृष्ण की भक्ति और बाल लीलाओं का ऐसा सुन्दर सागर बहाया है, जिसे सुनकर भक्तजन भक्ति का मीठा अमृत और खुशी के मोती पाते हैं। उनका काव्य भगवान के प्रति गहरी आस्था और प्रेम दर्शाता है।
जीवन-परिचय: सूरदास जी का जन्म 1478 ई० (वैशाख शुक्ल पंचमी, सं० 1535 वि०) में आगरा-मथुरा मार्ग पर स्थित रुनकता नाम के गाँव में हुआ था। कुछ विद्वान मानते हैं कि उनका जन्म दिल्ली के पास सीही गाँव में हुआ था। सूरदास जी जन्म से ही अंधे थे, लेकिन इस बात पर भी विद्वानों में अलग-अलग राय है। उन्होंने कृष्ण की बाल लीलाओं, मानव स्वभाव और प्रकृति का इतना जीवंत वर्णन किया है, जो बिना आँखों से देखे संभव नहीं लगता। उन्होंने खुद को जन्म से अंधा कहा है। यह शायद उन्होंने अपनी आत्मग्लानि के कारण, लाक्षणिक रूप से, या ज्ञान की कमी के लिए कहा हो सकता है। सूरदास जी की रुचि बचपन से ही भगवान की भक्ति के गीत गाने में थी। एक बार उन्होंने भक्ति का एक पद सुनाया, तो पुष्टिमार्ग के संस्थापक महाप्रभु वल्लभाचार्य ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया और श्रीनाथजी के मंदिर में कीर्तन करने की जिम्मेदारी सौंप दी। श्री वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने 'अष्टछाप' नाम से आठ कृष्ण भक्त कवियों का एक समूह बनाया था, जिसमें सूरदास जी सबसे खास कवि थे। वे जीवनभर गऊघाट पर रहकर कृष्ण की लीलाओं के गीत गाते रहे। सूरदास जी का निधन (मृत्यु) 1583 ई० (सं० 1640 वि०) में गोसाईं विट्ठलनाथ के सामने गोवर्धन की तलहटी में पारसोली नाम के गाँव में हुआ। उन्होंने 'खंजन नैन रूप रस माते' पद का गान करते हुए अपने भौतिक शरीर को छोड़ा।
कृतियाँ (रचनाएँ): महाकवि सूरदास की मुख्य रूप से तीन रचनाएँ ही मिलती हैं-
(1) सूरसागर: यह श्रीमद्भागवत पर आधारित है। 'सूरसागर' के सवा लाख पदों में से अब करीब दस हज़ार पद ही मिलते हैं। इनमें कृष्ण की बाल लीलाओं, गोपियों के प्रेम, गोपियों के विरह, और उद्धव-गोपी संवाद का बहुत ही मनोवैज्ञानिक और सुंदर वर्णन है। 'सूरसागर' एक गीतात्मक काव्य है। इसके पद बहुत ही तन्मयता से गाए जाते हैं, और यही ग्रंथ सूरदास की प्रसिद्धि का आधार है।
(2) सूर-सारावली: इसमें 1,107 पद हैं। यह 'सूरसागर' का एक संक्षिप्त रूप है।
(3) साहित्य-लहरी: इसमें 118 दृष्टकूट पदों का संग्रह है। इस ग्रंथ में किसी एक विषय की गहराई से चर्चा नहीं की गई है, बल्कि मुख्य रूप से नायिकाओं और अलंकारों का वर्णन किया गया है। इसमें कहीं-कहीं कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन मिलता है, और कुछ जगहों पर महाभारत की कहानियों के अंश भी दिखाई देते हैं।
साहित्य में स्थान: भक्त कवि सूरदास का हिन्दी साहित्य में स्थान सूरज जैसा है। इसीलिए कहा गया है- "सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास। अब के कवि खद्योत सम, जहँ तहँ करत प्रकास।।"
In simple words: सूरदास भक्ति काल के कृष्ण भक्त कवि थे। उनका जन्म 1478 ई० में हुआ था और वे बचपन से ही अंधे माने जाते हैं। उन्होंने कृष्ण की बाल लीलाओं और भक्ति पर कई सुंदर पद लिखे। उनकी मुख्य रचनाएँ 'सूरसागर', 'सूर-सारावली', और 'साहित्य-लहरी' हैं। वे हिन्दी साहित्य के महान कवियों में गिने जाते हैं।
🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय लिखते समय जन्म-मृत्यु, गुरु, प्रमुख रचनाएँ और साहित्य में स्थान जैसे मुख्य बिंदुओं को क्रम से लिखना चाहिए। यह सुनिश्चित करें कि आप उनकी मुख्य रचनाओं के नाम सही लिखें।
पद्यांशों की सुन्दर व्याख्या
Question 1. चरन-कमल बंद हरि राई ।। जाकी कृपा पंगु गिरि लंधै, अंधे कौ सब कुछ दरसाई ॥ बहिरौ सुनै, गैंग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई । सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंद तिहिं पाई ॥ [2012, 15, 17]
Answer: भक्त शिरोमणि सूरदास जी भगवान श्रीकृष्ण के कमल जैसे चरणों की वंदना करते हुए कहते हैं कि इन चरणों का प्रभाव बहुत गहरा है। उनकी कृपा होने पर लंगड़ा व्यक्ति भी बड़े-बड़े पहाड़ पार कर लेता है। अंधे व्यक्ति को सब कुछ साफ-साफ दिखने लगता है। इन अद्भुत चरणों के प्रभाव से बहरा व्यक्ति सुनने लगता है और गूंगा व्यक्ति फिर से बोलने लगता है। यदि किसी गरीब व्यक्ति पर श्रीकृष्ण के चरणों की कृपा हो जाए, तो वह राजा बनकर अपने सिर पर राजसी छत्र धारण कर लेता है। सूरदास जी कहते हैं कि ऐसे दयालु प्रभु श्रीकृष्ण के चरणों की मैं बार-बार पूजा करता हूँ। ये चरण सभी दुखों को दूर करने और असंभव को संभव बनाने की शक्ति रखते हैं।
In simple words: सूरदास जी कहते हैं कि वे भगवान कृष्ण के कमल रूपी चरणों की वंदना करते हैं। उनकी कृपा से लंगड़ा पहाड़ पार कर सकता है, अंधा देख सकता है, बहरा सुन सकता है, गूंगा बोल सकता है, और गरीब राजा बन सकता है। वे ऐसे दयालु भगवान के चरणों को बार-बार प्रणाम करते हैं।
🎯 Exam Tip: पद्यांश की व्याख्या करते समय, कठिन शब्दों का अर्थ स्पष्ट करें और यह दिखाएं कि कवि भगवान की महिमा को कैसे व्यक्त कर रहा है। अलंकार और रस का उल्लेख करने से उत्तर प्रभावशाली बनता है।
Question 2. अबिगत-गति कछु कहत न आवै । ज्यौं गूंगे मीठे फल को रस, अंतरगत ही भावै ॥ परम स्वाद सबही सु निरंतर, अमित तोष उपजावै । मन-बानी कौं अगम-अगोचर, सो जानैं जो पावै ॥ रूप-रेख-गुन जाति-जुगति-बिनु, निरालंब कित धावै । सब बिधि अगम बिचारहिं तातें, सूर सगुन-पद गावै ॥ [2012, 14]
Answer: सूरदास जी कहते हैं कि निराकार ब्रह्म का वर्णन करना बहुत मुश्किल है। उसकी स्थिति के बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता। निराकार ब्रह्म की भक्ति का आनंद किसी भक्त के लिए वैसा ही अवर्णनीय है, जैसे गूंगे व्यक्ति के लिए मीठे फल का स्वाद होता है। जिस प्रकार गूंगा व्यक्ति मीठे फल का स्वाद बता नहीं पाता, वह मन ही मन उसका आनंद लेता है, वैसे ही निराकार ब्रह्म की भक्ति का आनंद केवल महसूस किया जा सकता है, उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। हालांकि निराकार ब्रह्म की प्राप्ति से लगातार बहुत आनंद मिलता है और भक्त को असीम संतोष भी होता है, लेकिन यह हर किसी के बस की बात नहीं है। उसे हमारी इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता। निराकार ब्रह्म का न कोई रूप है, न कोई आकार, न उसकी कोई निश्चित विशेषता है, न कोई जाति है और न ही उसे किसी युक्ति से प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में भक्त का मन बिना किसी सहारे के कहाँ भटकेगा? क्योंकि निराकार ब्रह्म सभी तरह से पहुँच से बाहर है। इसी कारण सभी बातों पर विचार करके ही सूरदास जी ने सगुण श्रीकृष्ण की लीला के पद गाना सही समझा है। सगुण ईश्वर का गुणगान करना भक्ति को एक साकार आधार देता है।
In simple words: सूरदास कहते हैं कि निराकार भगवान को समझाना मुश्किल है, क्योंकि उसे देखा या महसूस नहीं किया जा सकता, जैसे गूंगा व्यक्ति मीठे फल का स्वाद शब्दों में नहीं बता सकता। निराकार भगवान का न कोई रूप है, न पहचान। इसलिए सूरदास जी ने सगुण (रूप वाले) भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के पद गाना बेहतर समझा।
🎯 Exam Tip: निर्गुण ब्रह्म की उपासना की कठिनाइयों और सगुण ब्रह्म की सरलता की तुलना करते समय, गूंगे और मीठे फल के दृष्टांत का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है। यह तर्क को स्पष्ट करता है।
Question 3. किलक कान्ह घुटुरुवनि आवत ।। मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिम्ब पकरिबैं धावत ॥ कबहुँ निरखि हरि आपु छाँह कौं, कर सौं पकरने चाहत । किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत ॥ कनक-भूमि पर कर-पग छाया, यह उपमा इक राजति । करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति ।। बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति । अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु को दूध पियावति ॥
Answer: सूरदास जी भगवान श्रीकृष्ण की सुंदरता और बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए कहते हैं कि बालक कृष्ण अब घुटनों के बल चल रहे हैं। राजा नंद का आँगन सोने और मणियों से जड़ा हुआ है। उस आँगन में श्रीकृष्ण घुटनों के बल चलते हुए किलकारी मारते हैं और अपनी परछाई को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। जब वे किलकारी मारकर हंसते हैं, तो उनके मुख में दो छोटे-छोटे दाँत बहुत सुंदर लगते हैं। वे उन दाँतों की परछाई को भी पकड़ने की कोशिश करते हैं। उनके हाथ-पैरों की छाया उस सोने के फर्श पर ऐसी लगती है, मानो पृथ्वी ने हर मणि पर उनके बैठने के लिए कमल का आसन सजा दिया हो। यह दृश्य अत्यंत मनोहर है। श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को देखकर माता यशोदा बहुत खुश होती हैं और बाबा नंद को भी बार-बार वहाँ बुलाती हैं। इसके बाद माता यशोदा सूरदास के प्रभु बालक कृष्ण को अपने आँचल से ढककर दूध पिलाने लगती हैं।
In simple words: सूरदास जी ने बाल कृष्ण के घुटनों के बल चलने का सुंदर वर्णन किया है। नंद बाबा के मणि और सोने से जड़े आँगन में कृष्ण अपनी परछाई पकड़ने दौड़ते हैं और किलकारी मारकर हंसते हैं। उनके हाथ-पैरों की परछाई ऐसी लगती है, जैसे कमल का आसन हो। यशोदा यह देखकर खुश होती हैं और बाद में उन्हें दूध पिलाती हैं।
🎯 Exam Tip: बाल कृष्ण के सौंदर्य, उनकी चेष्टाओं और माता-पिता के वात्सल्य भाव को स्पष्ट रूप से दर्शाएं। "कनक-भूमि पर कर-पग छाया" जैसी उपमाओं का उल्लेख करें।
Question 4. मैं अपनी सब गाई चरैहौं । प्रात होत बल कैं संग जैहौं, तेरे कहैं न रैहौं ॥ ग्वाल बाल गाइनि के भीतर, नैकहुँ डर नहिं लागत । आजु न सोव नंद-दुहाई, रैनि रहौंगौ जागत ॥ और ग्वाल सब गाई चरैहैं, मैं घर बैठो रैहौं । सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब, प्रात जान मैं दैहौं ।
Answer: श्रीकृष्ण अपनी माता यशोदा से जिद करते हुए कहते हैं कि हे माता! मैं अपनी सभी गायों को चराने के लिए जंगल जाऊँगा। सुबह होते ही मैं अपने बड़े भाई बलराम के साथ गायें चराने चला जाऊँगा और तुम्हारे रोकने पर भी नहीं रुकूंगा। मुझे ग्वाल-बालों और गायों के बीच रहने में जरा भी डर नहीं लगता। मैं नंद बाबा की कसम खाकर कहता हूँ कि आज रात में सोऊंगा नहीं, रात भर जागता ही रहूंगा। ऐसा न हो कि सुबह मेरी आंखें ही न खुलें और मैं गायें चराने न जा सकूं। हे माता! ऐसा कैसे हो सकता है कि सभी ग्वाले गायें चराने चले जाएं और मैं अकेला घर पर बैठा रहूं? भगवान कृष्ण की बाल-हठ और प्रेम दर्शाती है। सूरदास जी कहते हैं कि बालक श्रीकृष्ण की बात सुनकर माता यशोदा उनसे कहती हैं कि मेरे लाल! अब तुम निश्चिंत होकर सो जाओ। सुबह मैं तुम्हें गायें चराने के लिए अवश्य जाने दूंगी।
In simple words: श्रीकृष्ण अपनी मां यशोदा से कहते हैं कि वे गाय चराने जंगल जाएंगे और बलराम के साथ जाएंगे। उन्हें ग्वालों और गायों के बीच कोई डर नहीं लगता। वे कहते हैं कि वे रात भर जागेंगे ताकि सुबह उठकर गाय चराने जा सकें। यशोदा मां उन्हें दिलासा देती हैं और कहती हैं कि सुबह उन्हें जाने देंगी।
🎯 Exam Tip: श्रीकृष्ण के बाल-हठ और उनके आत्मविश्वास को व्यक्त करें। माता यशोदा के वात्सल्य भाव और श्रीकृष्ण के तर्क को भी उजागर करें।
Question 5. मैया हौं न चरैहौं गाइ । सिगरे ग्वाल घिरावत मोसों, मेरे पाईं पिराइ ॥ जौं न पत्याहि पूछि बलदाउहिं, अपनी सौंहँ दिवाइ । यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ ॥ मैं पठेवति अपने लरिका कौं, आवै मन बहराइ । सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ ॥ [2009]
Answer: बाल स्वभाव के अनुसार श्रीकृष्ण माता यशोदा से कहते हैं कि हे माता! मैं अब गाय चराने नहीं जाऊंगा। सभी ग्वाले मुझसे ही अपनी गायों को घेरने के लिए कहते हैं। इधर-उधर दौड़ते-दौड़ते मेरे पैरों में दर्द होने लगा है। यदि तुम्हें मेरी बात पर विश्वास न हो, तो बलराम को अपनी कसम दिलाकर पूछ लो। यह सुनकर माता यशोदा ग्वाल-बालों पर गुस्सा करती हैं और उन्हें डांटती हैं। सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा कह रही हैं कि मैं तो अपने बेटे को केवल मन बहलाने के लिए जंगल भेजती हूँ, और ये ग्वाल-बाल उसे इधर-उधर दौड़ाकर परेशान करते रहते हैं। यह घटना कृष्ण के प्रति यशोदा के गहरे प्रेम को दर्शाती है।
In simple words: कृष्ण अपनी मां से शिकायत करते हैं कि वे गाय चराने नहीं जाएंगे क्योंकि ग्वाले उन्हें बहुत दौड़ाते हैं और उनके पैर दुखने लगते हैं। यशोदा मां यह सुनकर गुस्सा हो जाती हैं और ग्वालों को डांटती हैं। वह कहती हैं कि वे अपने छोटे बच्चे को केवल मन बहलाने के लिए भेजती हैं, पर ग्वाले उसे परेशान करते हैं।
🎯 Exam Tip: श्रीकृष्ण की शिकायत में उनकी मासूमियत और यशोदा मां के क्रोध में उनके वात्सल्य को स्पष्ट करें। ग्वालों की भूमिका और मां की प्रतिक्रिया दोनों को शामिल करें।
Question 6. सखी री, मुरली लीजै चोरि । जिनि गुपाल कीन्हें अपनें बस, प्रीति सबनि की तोरि ॥ छिन इक घर-भीतर, निसि-बासर, धरतन कबहूँ छोरि । कबहूँ कर, कबहूँ अधरनि, कटि कबहूँ खोंसत जोरि ॥ ना जानौं कछु मेलि मोहिनी, राखे अँग-सँग भोरि । सूरदास प्रभु को मन सजनी, बँध्यौ राग की डोरि ॥
Answer: गोपियाँ श्रीकृष्ण की बांसुरी को अपनी दुश्मन सौतन मानती हैं। एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखी! हमें श्रीकृष्ण की यह बांसुरी चुरा लेनी चाहिए; क्योंकि इस बांसुरी ने गोपाल को अपने वश में कर लिया है और श्रीकृष्ण ने भी बांसुरी के वशीभूत होकर हम सभी से अपना प्रेम तोड़ दिया है। कृष्ण घर के अंदर हों या बाहर, कभी क्षण भर के लिए भी बांसुरी नहीं छोड़ते। वे कभी हाथ में रखते हैं, तो कभी होठों पर, और कभी कमर में खोंस लेते हैं। इस तरह से श्रीकृष्ण उसे कभी भी अपने से दूर नहीं होने देते। यह हमारी समझ में नहीं आ रहा है कि बांसुरी ने कौन सा जादू श्रीकृष्ण पर कर दिया है, जिससे श्रीकृष्ण पूरी तरह से उसके वश में हो गए हैं। सूरदास जी कहते हैं कि गोपी कह रही है कि हे सजनी! इस बांसुरी ने श्रीकृष्ण के मन को प्रेम की डोरी से बांधकर कैद कर लिया है। बांसुरी पर कृष्ण की निर्भरता गोपियों के प्रेम में बाधा बन गई है।
In simple words: गोपियाँ आपस में बात करती हैं कि उन्हें कृष्ण की बांसुरी चुरा लेनी चाहिए। वे कहती हैं कि बांसुरी ने कृष्ण को अपने वश में कर लिया है और उन्होंने गोपियों से प्रेम तोड़ दिया है। कृष्ण कभी बांसुरी को अपने से दूर नहीं रखते, चाहे वह हाथ में हो, होंठों पर या कमर में। गोपियाँ समझ नहीं पा रही हैं कि बांसुरी ने कृष्ण पर कौन सा जादू कर दिया है।
🎯 Exam Tip: गोपियों की बांसुरी के प्रति ईर्ष्या और कृष्ण के बांसुरी प्रेम को स्पष्ट करें। 'सौतन' और 'राग की डोरी' जैसे मुहावरों का उपयोग करने से व्याख्या में गहराई आती है।
Question 7. ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।। बृन्दावन गोकुल बने उपबन, सघन कुंज की छाँहीं ॥ प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत । माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत ॥ गोपी ग्वाले बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात । सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनस हित जदु-तात ॥ [2010, 11, 13, 17]
Answer: इस पद में उद्धव ने मथुरा पहुंचकर श्रीकृष्ण को वहां की सारी स्थिति बताई, जिसे सुनकर श्रीकृष्ण भावुक हो गए। इस पर वे उद्धव से अपनी मन की बात कहते हैं। श्रीकृष्ण ने उद्धव से ब्रजवासियों की दयनीय स्थिति सुनी और उनके ध्यान में खो गए। वे उद्धव से कहते हैं कि मैं ब्रज को भूल नहीं पाता हूँ। वृंदावन और गोकुल के वन-उपवन सभी मुझे याद आते रहते हैं। वहां के घने कुंजों की छाया को भी मैं भूल नहीं पाता। नंद बाबा और यशोदा मैया को देखकर मुझे जो सुख मिलता था, वह मुझे बार-बार याद आता है। वे मुझे मक्खन, रोटी और अच्छे से जमाया हुआ दही कितने प्रेम से खिलाते थे? ब्रज की गोपियों और ग्वाल-बालों के साथ खेलते हुए मेरे सभी दिन हंसते हुए बीतते थे। ये सभी बातें मुझे बहुत याद आती हैं। सूरदास जी ब्रजवासियों को धन्य मानते हैं और उनके भाग्य की प्रशंसा करते हैं; क्योंकि श्रीकृष्ण को उनके भले की चिंता है और श्रीकृष्ण इन ब्रजवासियों को हर पल याद करते हैं।
In simple words: श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं कि वे ब्रज को भूल नहीं पा रहे हैं। उन्हें वृंदावन, गोकुल, वहां के वन-उपवन और घने कुंजों की छाया याद आती है। उन्हें नंद बाबा और यशोदा मैया का प्रेम, मक्खन-रोटी खिलाना और ग्वाल-बालों के साथ खेलना याद आता है। वे ब्रजवासियों को धन्य मानते हैं क्योंकि कृष्ण हमेशा उनके बारे में सोचते हैं।
🎯 Exam Tip: श्रीकृष्ण के ब्रज प्रेम और विरह वेदना को व्यक्त करें। उद्धव से संवाद के माध्यम से कृष्ण के भावनात्मक पक्ष को उजागर करें।
Question 8. ऊधौ मन न भये दस बीस।। एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, कौ अवराधै ईस ॥ इंद्री सिंथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस । आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस ॥ तुम तौ सखा स्याम सुन्दर के, सकल जोग के इंस । सूर हमारें नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस ॥ [2011, 13, 17]
Answer: गोपियाँ उद्धव जी से कहती हैं कि हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं। हम सभी की तरह हमारे पास भी केवल एक ही मन था, और वह श्रीकृष्ण के साथ चला गया है; इसलिए हम मन के बिना तुम्हारे बताए निर्गुण ब्रह्म की पूजा कैसे करें? अर्थात, बिना मन के ब्रह्म की उपासना संभव नहीं है। श्रीकृष्ण के बिना हमारी सभी इंद्रियाँ कमजोर हो गई हैं और हमारी दशा बिना सिर वाले शरीर जैसी हो गई है। हम कृष्ण के बिना ऐसे हो गए हैं जैसे मृत हों। जीवन के लक्षण के रूप में हमारी साँसें केवल इस आशा में चल रही हैं कि श्रीकृष्ण मथुरा से अवश्य लौटेंगे और हमें उनके दर्शन मिलेंगे। श्रीकृष्ण के लौटने की आशा के सहारे तो हम करोड़ों वर्षों तक जीवित रह लेंगे। गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! तुम तो कृष्ण के खास मित्र हो और योग विद्या तथा मिलन के तरीकों के जानकार हो। यदि तुम चाहो तो हमारा मिलन अवश्य करा सकते हो। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं कि हम तुम्हें यह साफ-साफ बता देना चाहती हैं कि नंद जी के पुत्र श्रीकृष्ण को छोड़कर हमारा कोई पूज्य नहीं है। हम तो उन्हीं की परम भक्त हैं। उनके बिना कोई और हमारा ईश्वर नहीं है।
In simple words: गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि उनके पास केवल एक मन था जो कृष्ण के साथ चला गया है। कृष्ण के बिना उनकी इंद्रियाँ कमजोर हो गई हैं, और वे बिना सिर के शरीर जैसी हो गई हैं। वे सिर्फ इस उम्मीद में जी रही हैं कि कृष्ण वापस आएंगे। वे उद्धव से कहती हैं कि कृष्ण के बिना उनका कोई और भगवान नहीं है।
🎯 Exam Tip: गोपियों की विरह दशा, उनके एकनिष्ठ प्रेम और निर्गुण योग के प्रति उनकी अरुचि को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करें। 'ज्यौं देही बिनु सीस' जैसी उपमाओं का प्रयोग करें।
Question 9. ऊधौ जाहु तुमहिं हम जाने । स्याम तुमहिं स्याँ कौं नहिं पठयौ, तुम हौ बीच भुलाने ॥ ब्रज नारिनि सौं जोग कहत हौ, बात कहत न लजाने । बड़े लोग न बिबेक तुम्हारे, ऐसे भए अयाने ॥ हमसौं कही लई हम सहि कै, जिय गुनि लेह सयाने । कहँ अबला कहँ दसा दिगंबर, मष्ट करौ पहिचाने ॥ साँच कहाँ तुमक अपनी सौं, बूझति बात निदाने । सूर स्याम जब तुमहिं पठायौ, तब नैकहुँ मुसकाने ।
Answer: गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि तुम यहाँ से वापस चले जाओ। हम तुम्हें समझ गए हैं। कृष्ण ने तुम्हें यहाँ नहीं भेजा है। तुम खुद रास्ता भटक कर यहाँ आ गए हो। ब्रज की नारियों से योग की बात करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आ रही है। तुम बुद्धिमान और ज्ञानी होंगे, लेकिन हमें लगता है कि तुममें समझ नहीं है, नहीं तो तुम ऐसी अज्ञानता भरी बातें हमसे क्यों करते? तुम अच्छी तरह मन में सोच लो कि अगर हमसे यह बात कह दी तो कह दी, अब ब्रज में किसी और से ऐसी बात मत कहना। हमने तो सहन कर लिया, कोई दूसरी गोपी इसे सहन नहीं करेगी। कहाँ हम कमजोर स्त्रियाँ और कहाँ योग की नग्न अवस्था, अब तुम चुप हो जाओ और सोच समझकर बात करो। हम तुमसे आखिर में एक सवाल पूछती हैं, सच-सच बताना, तुम्हें अपनी कसम है, जो तुम सच न बोले। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ उद्धव से पूछ रही हैं कि जब श्रीकृष्ण ने उनको यहाँ भेजा था, उस समय वे थोड़ा सा मुस्कुराए थे या नहीं? वे अवश्य मुस्कुराए होंगे, तभी तो उन्होंने तुम्हारे साथ मज़ाक करने के लिए तुम्हें यहाँ भेजा है।
In simple words: गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि उन्हें पता है कि कृष्ण ने उन्हें नहीं भेजा, वे खुद रास्ता भटक गए हैं। उन्हें ब्रज की स्त्रियों से योग की बात करते हुए शर्म नहीं आती। गोपियाँ उद्धव को मूर्ख कहती हैं और पूछती हैं कि जब कृष्ण ने उन्हें भेजा था, तो क्या वे थोड़ा मुस्कुराए थे। गोपियाँ मानती हैं कि कृष्ण ने उद्धव को मज़ाक के लिए भेजा है।
🎯 Exam Tip: गोपियों के व्यंग्यपूर्ण वचनों, उनकी तर्क शक्ति और उद्धव की स्थिति को स्पष्ट करें। 'बड़े लोग न बिबेक तुम्हारे' और 'दसा दिगंबर' जैसे वाक्यांशों का सही उपयोग करें।
Question 10. निरगुन कौन देस कौ बासी ? मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै, बुझति साँच न हाँसी ॥ को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी ? कैसे बरन, भेष है कैसौ, किहिं रस मैं अभिलाषी ? पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जौ रे करैगौ गाँसी । सुनत मौन है रह्यौ बावरी, सूर सबै मति नासी ॥ [2009, 12, 14, 17]
Answer: गोपियाँ 'भ्रमर' (यहाँ उद्धव के लिए प्रयोग किया गया है) को संबोधित करती हुई पूछती हैं कि हे उद्धव! तुम यह बताओ, तुम्हारा वह निराकार ब्रह्म किस देश का रहने वाला है? हम तुमको कसम दिलाकर सच-सच पूछ रही हैं, कोई मज़ाक नहीं कर रही हैं। तुम यह बताओ कि उस निर्गुण का पिता कौन है? उसकी माता का क्या नाम है? उसकी पत्नी और दासियां कौन-कौन हैं? उस निर्गुण ब्रह्म का रंग कैसा है, उसकी वेशभूषा कैसी है और वह किस रस में रुचि रखता है? गोपियाँ उद्धव को चेतावनी देती हुई कहती हैं कि हमें सभी बातों का ठीक-ठीक उत्तर देना। यदि सही बात बताने में जरा भी छल-कपट करोगे तो अपने किए का फल अवश्य पाओगे। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों के ऐसे प्रश्नों को सुनकर ज्ञानी उद्धव ठगे से रह गए और उनका सारा ज्ञान-गर्व अनपढ़ गोपियों के सामने नष्ट हो गया। निर्गुण ब्रह्म की कल्पना करना कठिन है क्योंकि उसका कोई निश्चित स्वरूप नहीं है।
In simple words: गोपियाँ उद्धव से पूछती हैं कि उनका निराकार भगवान किस देश का रहने वाला है। वे सच-सच जानना चाहती हैं कि उस निर्गुण के माता-पिता, पत्नी, दासियां, रंग, भेष और पसंद क्या हैं। गोपियाँ चेतावनी देती हैं कि अगर उद्धव झूठ बोले, तो उन्हें उसका फल मिलेगा। यह सुनकर उद्धव चुप रह गए और उनका सारा ज्ञान खत्म हो गया।
🎯 Exam Tip: निर्गुण ब्रह्म की उपासना का खंडन और सगुण कृष्ण की भक्ति का मंडन करने के लिए गोपियों के प्रश्नों की तर्कशीलता और व्यंग्य को उजागर करें। 'मधुकर' का अर्थ स्पष्ट करें।
Question 11. सँदेसौ देवकी सौं कहियौ । हौं तो धाइ तिहारे सुत की, दया करत ही रहियौ ॥ जदपि टेव तुम जानति उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै ।। प्रात होत मेरे लाल लडैडौ, माखन रोटी भावै ॥ तेल उबटनौ अरु तातो जल, ताहि देखि भजि जाते । जोइ-जोइ माँगत सोइ-सोइ देती, क्रम-क्रम करि कै न्हाते ॥ सूर पथिक सुन मोहिं रैनि दिन, बढयौ रहत उर सोच । मेरौ अलक लडैतो मोहन, हैहै करत सँकोच ॥ [2009]
Answer: यशोदा जी श्रीकृष्ण की माता देवकी को एक यात्री के द्वारा संदेश भेजती हैं कि कृष्ण तुम्हारा ही पुत्र है, मेरा पुत्र नहीं है। मैं तो उसकी पालन-पोषण करने वाली सिर्फ एक सेविका हूँ। लेकिन वह मुझे मैया कहता रहा है, इसलिए मेरा उसके प्रति वात्सल्य भाव स्वाभाविक है। हालाँकि तुम उसकी आदतों को जानती होगी, फिर भी मेरा मन तुमसे कुछ कहने के लिए उत्सुक हो रहा है। सुबह होते ही मेरे लाडले श्रीकृष्ण को माखन-रोटी बहुत पसंद है। वह तेल, उबटन और गर्म पानी को पसंद नहीं करता था, इसलिए इन चीजों को देखकर ही भाग जाता था। उस समय वह जो कुछ मांगता था, वही उसे देती थी, तब वह धीरे-धीरे नहाता था। सूरदास जी कहते हैं कि यशोदा यात्री से अपने मन की दशा व्यक्त करती हुई कहती हैं कि मुझे तो दिन-रात यही चिंता सताती रहती है कि मेरा लाडला श्रीकृष्ण अभी तुमसे कुछ मांगने में बहुत संकोच करता होगा। एक मां का प्रेम कभी कम नहीं होता, चाहे बेटा दूर ही क्यों न हो।
In simple words: यशोदा मां देवकी को संदेश भेजती हैं कि कृष्ण उन्हीं का बेटा है, वे तो सिर्फ पालन करने वाली मां हैं। वे कृष्ण की आदतों के बारे में बताती हैं, जैसे उन्हें माखन-रोटी पसंद है, और वे तेल-पानी से भागते थे। यशोदा मां को चिंता रहती है कि कृष्ण अभी भी देवकी से कुछ मांगने में संकोच करते होंगे।
🎯 Exam Tip: माता यशोदा के वात्सल्य, चिंता और कृष्ण की बाल-सुलभ आदतों का वर्णन करें। यह दिखाना महत्वपूर्ण है कि कैसे एक मां का प्रेम और चिंता दूरी के बावजूद बनी रहती है।
काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध
Question 1. निम्नलिखित पंक्तियों में अलंकार को पहचानकर लक्षणसहित उसका नाम लिखिए
(क) चरन-कमल बंद हरि राई ।
(ख) करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति ।
(ग) जोइ-जोइ माँगत, सोइ-सोड़ देती, क्रम-क्रम करि के हाते ।
Answer:
(क) रूपक अलंकार
(ख) अनुप्रास एवं पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार
(ग) अनुप्रास एवं पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार
लक्षण: उपर्युक्त अलंकारों में से रूपक एवं अनुप्रास के लक्षण 'काव्य-सौन्दर्य के तत्वों के अन्तर्गत देखें। पुनरुक्तिप्रकाश - जब एक ही शब्द की लगातार पुनरावृत्ति होती है, तब वहां पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार होता है; जैसे उपर्युक्त पद 'ख' में करि-करि।
In simple words: हमें दी गई पंक्तियों में अलंकार पहचानने थे। (क) में 'चरन-कमल' में रूपक अलंकार है, जहाँ चरण को कमल जैसा बताया गया है। (ख) और (ग) में एक ही शब्द बार-बार आ रहा है, इसलिए वहां अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
🎯 Exam Tip: अलंकार की पहचान करते समय, शब्द और अर्थ के बारीक भेदों पर ध्यान दें। रूपक में उपमेय और उपमान को एक बताया जाता है, जबकि पुनरुक्तिप्रकाश में एक ही शब्द की आवृत्ति होती है।
Question 2. जहाँ सन्तान के प्रति माता-पिता का वात्सल्य उमड़ पड़ता है, उन स्थानों पर वात्सल्य रस होता है । पाठ के जिन-जिन पदों में वात्सल्य रस है, उनका उल्लेख कीजिए |
Answer: वात्सल्य रस वहाँ होता है जहाँ माता-पिता का अपनी संतान के प्रति गहरा प्रेम और स्नेह व्यक्त होता है। पाठ में निम्नलिखित पदों में वात्सल्य रस है: पद संख्या 3, 4, 5, और 11। इन पदों में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, उनकी हठ, और माता यशोदा की ममता का सुंदर वर्णन किया गया है।
In simple words: जब माँ-बाप का अपने बच्चों के लिए प्यार दिखाया जाता है, उसे वात्सल्य रस कहते हैं। इस पाठ में पद संख्या 3, 4, 5, और 11 में वात्सल्य रस है, जहाँ कृष्ण और यशोदा के प्रेम को दर्शाया गया है।
🎯 Exam Tip: वात्सल्य रस को पहचानते समय, संतान की मासूमियत, माता-पिता की ममता और दुलार भरे भावों पर ध्यान दें। पद संख्याओं का सही उल्लेख करें।
Question 3. निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा रस है ?
(क) अबिगत गति कछु कहत न आवै.
(ख) निरगुन कौन देस को बासी।।
Answer:
(क) भक्ति रस
(ख) वियोग शृंगार
In simple words: (क) पंक्ति में भगवान के प्रति समर्पण का भाव है, इसलिए वहां भक्ति रस है। (ख) पंक्ति में कृष्ण से बिछड़ने का दुख दिखाया गया है, इसलिए वहां वियोग शृंगार रस है।
🎯 Exam Tip: रस की पहचान करते समय, पंक्ति के मुख्य भाव पर ध्यान दें। भक्ति रस में ईश्वर प्रेम और वियोग शृंगार में नायक-नायिका के बिछड़ने का दुख होता है।
Question 4. निम्नलिखित शब्दों में से तत्सम, तदभव और देशज शब्द छाँटकर अलग-अलग लिखिए- चरन, पंगु, कान्ह, अँचरा, छोटा, गृह, करि, नैन, पानि, सखा, जोग, साँच, जननी, गाँसी, धाई, टेव, अलक-लईतो, ठाढ़े, ग्वाल, बिम्ब, यति, विधु, इंद्री ।
Answer: शब्दों को उनके मूल संस्कृत रूप, उससे विकसित रूप या स्थानीय बोलियों से आए रूप के आधार पर वर्गीकृत किया गया है।
तत्सम शब्द: पंगु, गृह, करि, जननी, ग्वाल, बिम्ब, यति, विधु
तद्भव शब्द: चरन, अँचरा, नैन, पानि, सखा, जोग, इंद्री
देशज शब्द: कान्ह, साँच, छोटा, गाँसी, धाइ, टेव, अलक-लड़तो, ठाढ़े
In simple words: तत्सम शब्द सीधे संस्कृत से आए हैं, तद्भव शब्द संस्कृत से बदले हुए रूप हैं, और देशज शब्द स्थानीय बोलियों से आए हैं। यहां दिए गए शब्दों को इन्हीं तीन भागों में बांटा गया है।
🎯 Exam Tip: तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों को पहचानते समय, शब्दों के मूल रूप और उनके समय के साथ हुए बदलावों पर ध्यान दें। संस्कृत मूल के शब्द तत्सम होते हैं।
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