UP Board Solutions Class 10 Hindi Chapter 1 Mitrata

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Detailed Chapter 1 मित्रता UP Board Solutions for Class 10 Hindi

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Class 10 Hindi Chapter 1 मित्रता UP Board Solutions PDF

जीवन – परिचय एवं कृतियाँ

 

प्रश्न 1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 16]
या
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालिए। [2009]
या
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जीवन-परिचय दीजिए तथा उनकी एक रचना का नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 17, 18]

Answer: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य के ऐसे चमकते सितारे हैं जो पाठकों को अज्ञान के अंधेरे से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में ले जाते हैं. जहाँ बुद्धि और विवेक का सुखद राज्य होता है. शुक्ल जी एक बहुत अच्छे निबंधकार थे, साथ ही वे समीक्षा और इतिहास-लेखन में भी आगे थे. उन्होंने अपने समय के साथ-साथ आज के लेखकों और पाठकों का भी सही मार्गदर्शन किया है.
जीवन-परिचय – हिन्दी के बहुत ही प्रतिभाशाली समीक्षक और युग बदलने वाले साहित्यकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 1884 ई. में बस्ती जिले के अगोना गाँव के एक अच्छे परिवार में हुआ था. उनके पिता चंद्रबली शुक्ल मिर्जापुर में कानूनगो थे. उनकी माँ बहुत बुद्धिमान और धार्मिक थीं. उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई पिता के पास राठ तहसील में हुई और उन्होंने मिशन स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की. गणित में कमजोर होने के कारण वे आगे नहीं पढ़ पाए. उन्होंने एफ.ए. (इंटरमीडिएट) की शिक्षा इलाहाबाद से ली, पर परीक्षा से पहले ही स्कूल छोड़ दिया. इसके बाद उन्होंने मिर्जापुर के न्यायालय में नौकरी शुरू की. यह नौकरी उनके स्वभाव को पसंद नहीं आई, इसलिए वे मिर्जापुर के मिशन स्कूल में चित्रकला के शिक्षक बन गए. पढ़ाने के साथ उन्होंने बहुत सी कहानियाँ, कविताएँ, निबंध, नाटक आदि लिखे. उनकी बुद्धिमत्ता देखकर उन्हें 'हिन्दी शब्द-सागर' के संपादन में सहयोग के लिए श्यामसुंदर दास जी द्वारा काशी नागरी प्रचारिणी सभा में बुलाया गया. उन्होंने 19 साल तक 'काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का संपादन भी किया. कुछ समय बाद वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर बन गए और श्यामसुंदर दास जी के रिटायर होने के बाद वे हिन्दी विभाग के अध्यक्ष भी बने. यह स्वाभिमानी और गंभीर स्वभाव के महान साहित्यकार 1941 ई. में इस दुनिया से चले गए. शुक्ल जी का साहित्य के प्रति समर्पण और विद्वत्ता आज भी प्रेरणा देती है.
रचनाएँ - शुक्ल जी एक प्रसिद्ध निबंधकार, निष्पक्ष आलोचक, महान इतिहासकार और सफल संपादक थे. उनकी रचनाओं का विवरण इस प्रकार है:
(1) निबंध – उनके निबंधों का संग्रह 'चिंतामणि' (दो भाग) और 'विचारवीथी' नाम से प्रकाशित हुआ.
(2) आलोचना – शुक्ल जी आलोचना के सम्राट हैं. इस क्षेत्र में उनके तीन ग्रंथ प्रकाशित हुए – (क) रस मीमांसा – इसमें सैद्धांतिक आलोचना से संबंधित निबंध हैं, (ख) त्रिवेणी – इस ग्रंथ में सूर, तुलसी और जायसी पर आलोचनाएँ लिखी गई हैं, और (ग) सूरदास.
(3) इतिहास – युग के बदलाव के आधार पर लिखा गया उनका 'हिन्दी-साहित्य का इतिहास' हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ इतिहासों में से एक है.
(4) संपादन – उन्होंने 'जायसी ग्रंथावली', 'तुलसी ग्रंथावली', 'भ्रमरगीत सार', 'हिन्दी शब्द-सागर', 'काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका' और 'आनंद कादम्बिनी' का कुशलता से संपादन किया. इसके अलावा शुक्ल जी ने कहानी (ग्यारह वर्ष का समय), काव्य-रचना (अभिमन्यु-वध) की रचना की और कुछ दूसरी भाषाओं से हिन्दी में अनुवाद भी किए. इनमें 'मेगस्थनीज का भारतवर्षीय विवरण', 'आदर्श जीवन', 'कल्याण का आनंद', 'विश्व प्रबंध', 'बुद्धचरित' (काव्य) आदि खास हैं.
साहित्य में स्थान – हिन्दी निबंध को एक नई दिशा देकर उसे मजबूत बनाने वाले शुक्ल जी हिन्दी-साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण आलोचक, श्रेष्ठ निबंधकार, निष्पक्ष इतिहासकार, महान शैलीकार और युग-परिवर्तक साहित्यकार थे. वे दिल से कवि, दिमाग से आलोचक और जीवन से शिक्षक थे. हिन्दी-साहित्य में उनका बहुत ऊँचा स्थान है. उनकी अनोखी प्रतिभा के कारण उनके समय के हिन्दी गद्य काल को 'शुक्ल युग' कहा जाता है.
शुक्ल जी के बारे में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि आचार्य शुक्ल उन महान लेखकों में से हैं जिनकी हर पंक्ति सम्मान से पढ़ी जाती है और भविष्य को प्रभावित करती रहती है. 'आचार्य' शब्द ऐसे ही काबिल साहित्यकारों के लिए सही है.
In simple words: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य के एक बड़े लेखक और आलोचक थे. उनका जन्म 1884 में हुआ और मृत्यु 1941 में हुई. उन्होंने 'चिंतामणि' और 'हिन्दी-साहित्य का इतिहास' जैसे कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे.

🎯 Exam Tip: जीवनी संबंधी प्रश्नों में लेखक का नाम, जन्म-मृत्यु वर्ष, माता-पिता का नाम, प्रमुख रचनाएँ और साहित्य में स्थान जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं को क्रमबद्ध तरीके से लिखना चाहिए।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्न

 

प्रश्न 1. निम्नलिखित अवतरणों के आधार पर उनके साथ दिये गये प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
(1) हम लोग ऐसे समय में समाज में प्रवेश करके अपना कार्य आरम्भ करते हैं, जब कि हमारा चित्त कोमल और हर तरह का संस्कार ग्रहण करने योग्य रहता है, हमारे भाव अपरिमार्जित और हमारी प्रवृत्ति अपरिपक्व रहती है। हम लोग कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान रहते हैं, जिसे जो जिस रूप का चाहे, उस रूप का करें-चाहे राक्षस बनावें, चाहे देवता । ऐसे लोगों का साथ करना हमारे लिए बुरा है, जो हमसे अधिक दृढ़ संकल्प के हैं; क्योंकि हमें उनकी हर एक बात बिना विरोध के मान लेनी पड़ती है। पर ऐसे लोगों को साथ करना और बुरा है, जो हमारी ही बात को ऊपर रखते हैं; क्योंकि ऐसी दशा में न तो हमारे ऊपर कोई दबाव रहता है और न हमारे लिए कोई सहारा रहता है। [2014, 18]
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए अथवा गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. यह पाठ जीवन में सही मित्र के चुनाव के महत्व पर जोर देता है.
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
       प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या - लेखक कहते हैं कि जब हम घर से बाहर निकलकर समाज में कोई काम शुरू करते हैं, तब हम अक्सर अनुभवहीन होते हैं. उस समय हमारा मन बहुत कोमल होता है. हम जैसे लोगों के संपर्क में आते हैं, उनका हमारे मन पर असर जरूर पड़ता है. हम इस अवस्था में अच्छे-बुरे का फर्क नहीं समझ पाते, हमारे विचार पूरी तरह से साफ नहीं होते और हमारा स्वभाव भी पूरी तरह विकसित नहीं होता है.
       द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या - लेखक कहते हैं कि जब व्यक्ति घर से निकलकर समाज में आता है, तो उसका स्वभाव कच्ची मिट्टी जैसा होता है. जैसे कच्ची मिट्टी की मूर्ति को जब तक आग में नहीं तपाया जाता, उसे अपनी पसंद का कोई भी रूप दिया जा सकता है, वैसे ही जब तक हमारे विचारों में मजबूती नहीं आती, तब तक हमारे व्यवहार को मनचाहा रूप दिया जा सकता है. इस समय दोस्तों का व्यवहार हम पर बहुत गहरा असर डालता है. यदि हम पर अच्छी बातों का असर हो, तो हम देवताओं की तरह सम्माननीय बन सकते हैं, और यदि बुरी बातों का असर हो, तो हमारा व्यवहार राक्षसों की तरह घृणित और नीच भी हो सकता है. यह अवस्था व्यक्ति के भविष्य की नींव होती है.
       तृतीय रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक का मानना है कि हमें ऐसे लोगों के साथ दोस्ती नहीं करनी चाहिए जिनकी इच्छा-शक्ति हमसे ज्यादा मजबूत हो या जो हमसे ज्यादा दृढ़-निश्चयी हों. इसका कारण यह है कि वे अपनी बात, चाहे वह अच्छी हो या बुरी, हमें बिना विरोध के मनवा लेंगे, जिससे हम कमजोर होते चले जाएंगे. ऐसे लोगों के साथ रहना और भी बुरा है जो हमेशा हमारी ही बात को सबसे ऊपर रखते हैं. ऐसी स्थिति में सही विरोध और मदद के अभाव में हमारे अपने स्वभाव बिगड़ सकते हैं. इसका मतलब है कि सिर्फ हाँ में हाँ मिलाने वाले या अच्छी-बुरी बातों का समर्थन करने वाले लोग सच्चे दोस्त नहीं हो सकते हैं.
(स) 1. लेखक के अनुसार व्यक्तियों को किन लोगों का साथ नहीं करना चाहिए ?
       लेखक के अनुसार हमें ऐसे दो तरह के लोगों का साथ नहीं करना चाहिए: (i) ऐसे लोग जिनकी हर बात हमें बिना विरोध के माननी पड़ती है. (ii) ऐसे लोग जो हमेशा हमारी ही बात को सबसे ज़्यादा महत्व देते हैं या ऊपर रखते हैं. ऐसे लोग हमें सही निर्णय लेने से रोकते हैं.
(स) 2. सामाजिक जीवन में प्रवेश के समय चित्त, भाव और प्रवृत्ति की स्थिति को स्पष्ट कीजिए।
       सामाजिक जीवन में प्रवेश के समय हमारे भाव पूरी तरह शुद्ध नहीं होते, हमारा मन कोमल होता है और हमारा स्वभाव पूरी तरह से परिपक्व नहीं होता है. इस अवस्था में व्यक्ति को सही-गलत का ज्ञान कम होता है.
(स) 3. प्रस्तुत अवतरण में लेखक क्या कहना चाहता है ?
       इस अवतरण में लेखक कहना चाहते हैं कि किशोरावस्था सबसे ज़्यादा संवेदनशील और सक्रिय अवस्था होती है. इस समय सही-गलत का विवेक नहीं होता. इसलिए दोस्तों का चुनाव करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए. सही दोस्त ही हमें सही राह दिखा सकते हैं.
(स) 4. सामाजिक जीवन के प्रारम्भिक समय में हमारी क्या स्थिति होती है ?
       सामाजिक जीवन के शुरुआती समय में हमारी स्थिति कच्ची मिट्टी की मूर्ति जैसी होती है, जिसे अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी रूप दिया जा सकता है. यह दर्शाता है कि हम आसानी से प्रभावित हो सकते हैं.
In simple words: जब हम छोटे होते हैं और समाज में कदम रखते हैं, तब हमारा मन बहुत कोमल होता है और हमें सही-गलत का पता नहीं होता. हमें ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए जो हमें अपनी बात मनवाते हैं या हमेशा हमारी ही बात को सबसे ऊपर रखते हैं, क्योंकि ऐसे दोस्त हमें कमजोर बना सकते हैं.

🎯 Exam Tip: गद्यांश आधारित प्रश्नों में, सबसे पहले गद्यांश को ध्यान से पढ़ें और उसका मुख्य विचार समझें। फिर रेखांकित अंशों और प्रश्नों के उत्तर गद्यांश के संदर्भ में ही, सरल भाषा में लिखें।

 

प्रश्न 2. हँसमुख चेहरा, बातचीत का ढंग, थोड़ी चतुराई या साहस-ये ही दो-चार बातें किसी में देखकर लोग चटपट उसे अपना बना लेते हैं। हम लोग यह नहीं सोचते कि मैत्री का उद्देश्य क्या है तथा जीवन के व्यवहार में उसका कुछ मूल्य भी है। यह बात हमें नहीं सूझती कि यह एक ऐसा साधन है, जिससे आत्मशिक्षा का कार्य बहुत सुगम हो जाता है। एक प्राचीन विद्वान् का वचन है-'विश्वासपात्र मित्र से बड़ी भारी रक्षा होती है। जिसे ऐसा मित्र मिल जाए, उसे समझना चाहिए कि खजाना मिल गया ।' [2009]
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. इसमें सच्चे मित्र की पहचान और उसके महत्व को बताया गया है.
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
       शुक्ल जी कहते हैं कि दोस्त बनाते समय हमें यह सोचना चाहिए कि क्या जिस व्यक्ति को हम दोस्त बना रहे हैं, वह हमारे जीवन के लक्ष्यों को पाने में मदद कर सकता है. क्या उस व्यक्ति में वे सभी गुण हैं जिनकी हमें अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जरूरत है? अगर हमें विश्वास करने योग्य दोस्त मिल जाता है, तो वह आत्म-सुधार के काम को बहुत आसान बना देता है. एक पुराने विद्वान ने कहा है कि एक भरोसेमंद दोस्त हर कदम पर हमें सावधान करता है. एक भरोसेमंद दोस्त भाग्यशाली लोगों को ही मिलता है, क्योंकि ऐसा दोस्त जीवन के हर क्षेत्र में हमारी रक्षा करता है. जिस व्यक्ति को ऐसा दोस्त मिल जाए, उसे समझना चाहिए कि उसे बहुत बड़ा धन मिल गया है. मित्रता जीवन में सही राह दिखाने का एक अमूल्य साधन है.
(स) 1. प्रस्तुत अवतरण में लेखक क्या कहना चाहता है ?
       इस अवतरण में लेखक कहना चाहते हैं कि लोग अक्सर किसी के बाहरी व्यक्तित्व जैसे हँसमुख चेहरा या बात करने का तरीका देखकर दोस्त बना लेते हैं, जबकि दोस्ती का आधार व्यक्ति का अंदरूनी स्वभाव होना चाहिए. बाहरी दिखावा अक्सर धोखे भरा हो सकता है, इसलिए व्यक्ति के वास्तविक गुणों को परखना महत्वपूर्ण है.
(स) 2. सामान्यतया लोग व्यक्ति में क्या देखकर उससे मित्रता कर लेते हैं ?
       आम तौर पर लोग किसी व्यक्ति का हँसमुख चेहरा, उसके बात करने का तरीका, उसकी चालाकी और उसकी निडरता जैसे गुण देखकर उससे दोस्ती कर लेते हैं.
(स) 3. सामान्य रूप में व्यक्ति मैत्री के समय क्या नहीं देखता है?
       आम तौर पर लोग दोस्ती करते समय यह नहीं देखते कि दोस्ती का असली मकसद क्या है और जीवन में उसका क्या मूल्य है. वे अक्सर तात्कालिक आकर्षण से प्रभावित हो जाते हैं.
In simple words: लोग अक्सर किसी की मुस्कान या बातों से प्रभावित होकर दोस्त बना लेते हैं, लेकिन हमें यह सोचना चाहिए कि दोस्ती का असली मतलब क्या है. एक भरोसेमंद दोस्त हमें बहुत मदद करता है और जीवन में हमें सही रास्ता दिखाता है.

🎯 Exam Tip: इस तरह के गद्यांशों में मित्रता के गहरे अर्थ और महत्व पर ध्यान दें। लेखक का मुख्य संदेश यह है कि दोस्ती बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि आंतरिक गुणों और भरोसे पर आधारित होनी चाहिए।

 

प्रश्न 3. विश्वासपात्र मित्र जीवन की एक औषध है। हमें अपने मित्रों से यह आशा रखनी चाहिए कि वे उत्तम संकल्पों से हमें दृढ़ करेंगे, दोषों और त्रुटियों से हमें बचाएँगे, हमारे सत्य, पवित्रता और मर्यादा के प्रेम को पुष्ट करेंगे, जब हम कुमार्ग पर पैर रखेंगे, तब वे हमें सचेत करेंगे, जब हम हतोत्साहित होंगे, तब वे हमें उत्साहित करेंगे। सारांश यह है कि वे हमें उत्तमतापूर्वक जीवन-निर्वाह करने में हर तरह से सहायता देंगे। सच्ची मित्रता में उत्तम-से-उत्तम वैद्य की-सी निपुणता और परख होती है, अच्छी-से-अच्छी माता का-सा । धैर्य और कोमलता होती है। ऐसी ही मित्रता करने का प्रयत्न प्रत्येक पुरुष को करना चाहिए। [2009, 11, 13, 16, 18]
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. यह सच्चे मित्र के गुणों और उसकी तुलना विभिन्न महत्वपूर्ण चीजों से करता है.
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
       प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या – आचार्य शुक्ल जी कहते हैं कि जिस प्रकार अच्छी दवा आपके शरीर को कई बीमारियों से बचाकर स्वस्थ रखती है, उसी तरह एक भरोसेमंद दोस्त भी हमें कई बुराइयों से बचाकर हमारे जीवन को बेहतर और सुंदर बनाता है. हमारा दोस्त ऐसा होना चाहिए जिस पर हमें यह भरोसा हो कि वह हमेशा हमें अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करेगा, हमारे मन में अच्छे विचार पैदा करेगा, हमें बुराइयों और गलतियों से बचाता रहेगा. वह हमारे अंदर सच्चाई, पवित्रता और सम्मान के प्रति प्यार बढ़ाएगा और उनमें कोई कमी नहीं आने देगा. अगर हम गलत रास्ते पर चलेंगे तो वह हमें रोककर सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देगा. जब कभी हमें अपने लक्ष्यों को लेकर निराशा होगी, तो वह हमें उम्मीद जगाएगा और अच्छे काम करने के लिए उत्साहित करेगा. अंत में, कहा जा सकता है कि एक भरोसेमंद दोस्त हमें सम्मान और सुविधा के साथ जीवन जीने में हर संभव मदद देगा, जिससे हम आराम से और सम्मान से रह सकें. सच्चा मित्र जीवन की हर कठिनाई में ढाल बनकर खड़ा रहता है.
       द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी का कहना है कि जिस तरह एक कुशल डॉक्टर नाड़ी देखकर तुरंत बीमारी का पता लगा लेता है, वैसे ही सच्चा दोस्त हमारे गुणों और कमजोरियों को पहचान लेता है. जिस तरह एक अच्छी माँ धैर्य के साथ सभी मुश्किलों को सहकर प्यार भरा व्यवहार करती है, उसी तरह सच्चा दोस्त भी अपने दोस्त को बड़े धैर्य से गलत रास्ते से हटाकर प्यार से सही रास्ते पर ले आता है. इसलिए हमें ऐसा दोस्त चुनना चाहिए जिस पर हमें यह भरोसा हो कि वह हमें गलत रास्ते से हटाकर सही रास्ते पर ले जाएगा.
(स) 1. प्रस्तुत अवतरण में शुक्ल जी क्या कहना चाहते हैं?
       इस अवतरण में शुक्ल जी अच्छे और भरोसेमंद दोस्त के महत्व को समझाते हैं. वे कहते हैं कि ऐसे दोस्त में गुण और दोष को पहचानने की क्षमता होती है, उसमें धैर्य और प्यार होता है, और ऐसा दोस्त ही जीवन को सफल बनाने में मदद करता है. लेखक ने हमें भरोसेमंद दोस्तों से ही दोस्ती करने को कहा है.
(स) 2. व्यक्ति को अपने मित्रों से कैसी उम्मीद रखनी चाहिए?
       व्यक्ति को अपने दोस्तों से यह उम्मीद रखनी चाहिए कि वे उन्हें अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करेंगे, मन में अच्छे विचार पैदा करेंगे, उन्हें बुराइयों और गलतियों से बचाएँगे, सच्चाई, पवित्रता और सम्मान के प्रति प्रेम बढ़ाएँगे, सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करेंगे और निराश होने पर उनका हौसला बढ़ाएँगे. एक सच्चा मित्र जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है.
(स) 3. लेखक ने सच्ची मित्रता के लिए कौन-कौन-सी उपमाएँ दी हैं ?
       लेखक ने सच्ची मित्रता की तुलना तीन चीजों से की है: (i) जीवन के लिए एक दवा के समान. (ii) कुशलता और परख में उत्तम डॉक्टर के समान. (iii) प्यार और धैर्य में एक अच्छी माँ के समान.
(स) 4. एक सच्ची मित्र किसे कह सकते हैं।
       हम ऐसे दोस्त को सच्चा मित्र कह सकते हैं जो हमें अच्छे काम करने के लिए मजबूत करेगा, हमें बुराइयों और गलतियों से बचाएगा, हममें सच्चाई, पवित्रता और सम्मान जैसे मानवीय मूल्यों को बढ़ाएगा, हमें गलत रास्ते पर चलने से रोकेगा और हमेशा उत्साहित करेगा. सच्चा मित्र ही जीवन का सच्चा साथी होता है.
In simple words: एक सच्चा दोस्त दवा जैसा होता है, जो हमें बुरी चीज़ों से बचाता है. वह एक अच्छे डॉक्टर और माँ की तरह होता है. वह हमें अच्छे काम करने, गलतियों से बचने और हमेशा खुश रहने में मदद करता है.

🎯 Exam Tip: मित्रता संबंधी प्रश्नों के उत्तर में उपमाओं का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है, जैसे 'जीवन की औषध', 'उत्तम वैद्य' और 'अच्छी माता' की तरह, जो मित्र के गुणों को प्रभावी ढंग से दर्शाते हैं।

 

प्रश्न 4. बाल-मैत्री में जो मग्न करने वाला आनन्द होता है, जो हृदय को बेधने वाली ईष्या और खिन्नता होती है, वह और कहाँ ? कैसी मधुरता और कैसी अनुरक्ति होती है, कैसा अपार विश्वास होता है! हृदय के कैसे-कैसे उद्‌गार निकलते हैं। वर्तमान कैसा आनन्दमय दिखाई पड़ता है और भविष्य के सम्बन्ध में कैसी लुभाने वाली कल्पनाएँ मन में रहती हैं। कितनी जल्दी बातें लगती हैं और कितनी जल्दी मानना-मनाना होता है। 'सहपाठी की मित्रता' इस उक्ति में हृदय के कितने भारी उथल-पुथल का भाव भरा हुआ है। [2009]
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. यह बचपन की दोस्ती और उसके साथ जुड़े गहरे भावों का वर्णन करता है.
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
       लेखक कहते हैं कि बच्चों की दोस्ती में जहाँ बहुत खुशी मिलती है, वहीं कभी-कभी जल्दी ही जलन और नाराजगी भी आ जाती है. बच्चों का स्वभाव होता है कि अगर कोई उनकी बात मान ले, तो वे उससे बहुत प्यार करते हैं, और अगर कोई उनके मन के खिलाफ काम कर दे, तो वे छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाते हैं. लेकिन यह नाराजगी थोड़ी देर की ही होती है. बच्चों की दोस्ती में जैसी मिठास और प्यार होता है, वैसा कहीं और नहीं मिलता. बच्चों में एक-दूसरे के प्रति जो विश्वास होता है, वह भी बहुत सुख देने वाला होता है. वे अपने भविष्य के बारे में जो कल्पनाएँ करते हैं, उनके कारण उन्हें अपना वर्तमान बहुत सुखमय लगता है. बचपन की दोस्ती की भावनाएँ गहरी और सच्ची होती हैं.
(स) 1. प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक क्या कहना चाहता है ?
       इन पंक्तियों में लेखक बच्चों की दोस्ती और उनके स्वभाव पर प्रकाश डालते हुए दोस्ती का बहुत स्वाभाविक चित्रण किया है और स्पष्ट किया है कि बचपन बहुत आनंददायक होता है. यह अवस्था जीवन की सबसे यादगार होती है.
(स) 2. बचपन की मित्रता कैसी होती है? इसमें बातों की क्या भूमिका है ?
       बचपन की दोस्ती बहुत अनोखी होती है. इसमें मन को खुश करने वाला आनंद होता है, जलन और नाराजगी भी होती है, मिठास और प्यार होता है, एक-दूसरे पर बहुत विश्वास होता है और भविष्य को लेकर मन में कई कल्पनाएँ होती हैं. बचपन में बातें बहुत जल्दी लगती हैं और बच्चे छोटी सी बात पर नाराज हो जाते हैं, और थोड़ी ही देर में मान भी जाते हैं. यह रूठना और मान जाना बहुत जल्दी होता है, जो बचपन की दोस्ती की एक खासियत है.
(स) 3. 'सहपाठी की मित्रता' से क्या आशय स्पष्ट होता है?
       'सहपाठी की मित्रता' का मतलब एक निश्छल, सीधा-साधा और चंचल, शरारत भरा प्यार भरा संबंध होता है. यह बात बहुत सामान्य लगती है, पर इस बात में मन में हलचल मचा देने वाले कई भाव छिपे होते हैं, जो बचपन के मासूम रिश्ते को दर्शाते हैं.
In simple words: बचपन की दोस्ती में बहुत खुशी और कभी-कभी थोड़ी जलन भी होती है. यह दोस्ती बहुत प्यारी होती है, जिसमें एक-दूसरे पर बहुत विश्वास होता है. बच्चे जल्दी रूठते और मान जाते हैं, जिससे यह दोस्ती और खास बन जाती है.

🎯 Exam Tip: बचपन की दोस्ती की विशेषताओं को बताते समय, खुशी, ईर्ष्या, विश्वास और जल्दी मानने-मनाने जैसे भावनात्मक पहलुओं पर जोर दें, क्योंकि ये बचपन के रिश्तों के मुख्य गुण होते हैं।

 

प्रश्न 5. 'सहपाठी की मित्रता' इस उक्ति में हृदय के कितने भारी उथल-पुथल का भाव भरा हुआ है। किन्तु जिस प्रकार युवा पुरुष की मित्रता स्कूल के बालक की मित्रता से दृढ़, शान्त और गम्भीर होती है, उसी प्रकार हमारी युवावस्था के मित्र बाल्यावस्था के मित्रों से कई बातों में भिन्न होते हैं। मैं समझता हूँ कि मित्र चाहते हुए बहुत-से लोग मित्र के आदर्श की कल्पना मन में करते होंगे, पर इस कल्पित आदर्श से तो हमारा काम जीवन की झंझटों में चलता नहीं।
Answer:
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. यह युवाओं और बच्चों की दोस्ती के बीच के अंतर को समझाता है.
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
       प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या – आचार्य शुक्ल का कहना है कि बचपन में जब बच्चे स्कूल में एक साथ पढ़ते हैं और दोस्त बनते हैं, तो उस दोस्ती का रूप बदल जाता है जब वे युवावस्था में पहुँचते हैं. अब उनकी दोस्ती में ज्यादा मजबूती, शांति और गंभीरता आती है. छोटी-छोटी बातों पर रूठने और मनाने का माहौल नहीं रहता. युवावस्था में उम्र और अनुभव के अनुसार जो सोच-समझ विकसित होती है, उससे दोस्ती में भी मजबूती आती है. युवावस्था में व्यक्ति ज्यादा गंभीर और समझदार हो जाता है, जिससे दोस्ती भी अधिक स्थायी बनती है.
       द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या - लेखक कहते हैं कि इंसान का जीवन कई मुश्किलों से भरा होता है. इसमें सिर्फ सपनों के आधार पर दोस्ती नहीं होती, बल्कि सच्चाई के आधार पर दोस्त बनाए जाते हैं और बहुत सोच-समझकर बनाए जाते हैं. क्योंकि सिर्फ सपनों पर आधारित दोस्त स्थायी नहीं हो सकते और जीवन की मुश्किल परिस्थितियों में वे हमारी मदद भी नहीं करते, जिससे दोस्ती की मीठी कल्पनाएँ बेकार साबित होती हैं. असल में, दोस्ती को व्यावहारिकता और भरोसे पर टिका होना चाहिए, न कि सिर्फ कोरी कल्पना पर.
(स) 1. प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक क्या कहना चाहता है ?
       इन पंक्तियों में लेखक ने बचपन और युवावस्था की दोस्ती और उस समय के दोस्तों के बीच तुलना की है. वे स्पष्ट करते हैं कि दोस्ती में केवल मीठी कल्पनाएँ ही नहीं, बल्कि व्यावहारिकता से काम लेना चाहिए. सच्ची दोस्ती वास्तविक जीवन में उपयोगी होती है.
(स) 2. युवा पुरुष और बालक की मित्रता में क्या अन्तर होता है ?
       युवा पुरुषों की दोस्ती स्थायी, शांतिपूर्ण और गंभीर होती है, जबकि बच्चों की दोस्ती इन गुणों से मुक्त होती है. बच्चों की दोस्ती अक्सर चंचल और कम स्थिर होती है, जबकि युवाओं में यह ज्यादा परिपक्व होती है.
(स) 3. क्या मित्रता में कल्पित आदर्श सहायक होते हैं ?
       दोस्ती में कल्पित आदर्श सामान्य स्थितियों में तो मदद कर सकते हैं, लेकिन मुश्किल परिस्थितियों में वे बिल्कुल भी सहायक नहीं होते. वास्तविक जीवन में केवल वास्तविक गुणों वाले मित्र ही काम आते हैं.
In simple words: लेखक कहते हैं कि बचपन की दोस्ती से युवावस्था की दोस्ती अलग होती है. युवावस्था की दोस्ती ज्यादा मजबूत और शांत होती है. वे समझाते हैं कि दोस्ती सिर्फ कल्पनाओं पर नहीं, बल्कि सच्चाई और व्यावहारिकता पर आधारित होनी चाहिए.

🎯 Exam Tip: बच्चों और युवाओं की दोस्ती के अंतर को बताते समय उनकी स्थिरता, गंभीरता और व्यावहारिकता के पहलुओं को स्पष्ट रूप से उजागर करें। कल्पित आदर्शों की सीमाओं पर भी प्रकाश डालें।

 

प्रश्न 6. सुन्दर प्रतिमा, मनभावनी चाल और स्वच्छन्द प्रकृति ये ही दो-चार बातें देखकर मित्रता की जाती है; पर जीवन-संग्राम में साथ देने वाले मित्रों में इनमें से कुछ अधिक बातें चाहिए । मित्र केवल उसे नहीं कहते, जिसके गुणों की तो हम प्रशंसा करें, पर जिससे हम स्नेह न कर सकें। जिससे अपने छोटे-छोटे काम तो हम निकालते जाएँ, पर भीतर-ही-भीतर घृणा करते रहें? मित्र सच्चे पथ-प्रदर्शक के समान होना चाहिए, जिस पर हमें पूरा विश्वास कर सकें, भाई के समान होना चाहिए, जिसे हम अपना प्रीति-पात्र बना सकें। हमारे और हमारे मित्र के बीच सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए-ऐसी सहानुभूति, जिससे एक के हानि-लाभ को दूसरा अपना हानि-लाभ समझे। [2011, 17]
Answer:
(अ) प्रस्तुत अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. इसमें सच्चे मित्र की विशेषताओं और उसकी वास्तविक पहचान को समझाया गया है.
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
       प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या - शुक्ल जी कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को दोस्त नहीं मानना चाहिए, जो हमारे गुणों की सिर्फ तारीफ करता हो लेकिन मन में हमसे प्यार न रखता हो. ऐसे व्यक्ति को भी दोस्त नहीं मानना चाहिए जो समय-समय पर अपने छोटे-बड़े काम निकालकर अपना स्वार्थ तो पूरा कर लेता है लेकिन अंदर ही अंदर हमसे नफरत करता हो. कुल मिलाकर, दोस्ती का आधार प्यार और स्नेह होना चाहिए, न कि सिर्फ दिखावा या स्वार्थ. सच्चा दोस्त हमेशा निस्वार्थ भाव से साथ निभाता है.
       द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या – शुक्ल जी का कहना है कि दोस्त के प्रति मन में प्यार होना चाहिए. सच्चा दोस्त भरोसेमंद, सही रास्ता दिखाने वाला और भाई की तरह सीधा-सादा प्यार करने वाला होता है. हमारी और हमारे दोस्त के बीच सच्ची हमदर्दी होनी चाहिए ताकि वह हमारे फायदे-नुकसान को अपना फायदा-नुकसान समझे और हम उसके फायदे-नुकसान को अपना समझें. इसका मतलब है कि सच्ची दोस्ती में सच्चा प्यार होना चाहिए. जिनके मन में एक-दूसरे के प्रति नफरत भरी हो, वे दोस्त नहीं हो सकते. सच्चा मित्र हमेशा एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ देता है.
(स) 1. प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक क्या कहना चाहता है ?
       शुक्ल जी का कहना है कि लोग अक्सर किसी के बाहरी व्यक्तित्व को देखकर दोस्त बना लेते हैं, जबकि दोस्ती का आधार व्यक्ति का आंतरिक व्यक्तित्व होना चाहिए, जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. सच्चा मित्र वह है जो मन से जुड़ा हो.
(स) 2. मित्र कैसा होना चाहिए ?
       मित्र सही रास्ता दिखाने वाला, पूरी तरह से भरोसेमंद, प्यार के काबिल और भाई जैसा होना चाहिए. उसे संकट के समय में हमारा सहारा बनना चाहिए और हमें हमेशा सही सलाह देनी चाहिए.
(स) 3. किसे मित्र नहीं कहा जा सकता ?
       ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता जो ऊपर से हमारे गुणों की तारीफ तो करता है लेकिन अंदर से हमसे प्यार नहीं रखता. जो सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए दोस्ती करता हो, वह सच्चा मित्र नहीं हो सकता.
(स) 4. मित्रों के बीच परस्पर क्या होना चाहिए ?
       मित्रों के बीच सच्ची हमदर्दी होनी चाहिए, और ऐसी हमदर्दी होनी चाहिए जिससे हर व्यक्ति एक-दूसरे के फायदे-नुकसान को अपना फायदा-नुकसान समझे. यह एक मजबूत और स्थायी दोस्ती का आधार है.
(स) 5. सामान्यतया क्या देखकर मित्रता की जाती है ?
       आम तौर पर लोग किसी का सुंदर चेहरा, उसका रंग-रूप, मन को लुभाने वाली चाल, और खुले स्वभाव आदि को देखकर दोस्ती कर लेते हैं, लेकिन ऐसे दोस्त अक्सर जीवन में काम नहीं आते. सच्ची दोस्ती इन सतही चीजों पर आधारित नहीं होती है.
In simple words: दोस्ती सिर्फ बाहरी सुंदरता या बातों पर नहीं होनी चाहिए. सच्चा दोस्त वो है जो हमें सही रास्ता दिखाए, जिस पर हम भरोसा कर सकें, और जो भाई जैसा प्यार करे. वह हमारे सुख-दुःख में हमारे साथ खड़ा रहे.

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर देते समय सच्चे मित्र के नैतिक गुणों जैसे विश्वास, सहानुभूति, ईमानदारी और सही मार्गदर्शन देने की क्षमता पर जोर दें, और दिखावटी दोस्ती के खतरों से बचने की सलाह दें।

 

प्रश्न 7. मित्रता के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दो मित्र एक ही प्रकार का कार्य करते हों या एक ही रुचि के हों। इसी प्रकार प्रकृति और आचरण की समानता भी आवश्यक या वांछनीय नहीं है। दो भिन्न प्रकृति के मनुष्यों में बराबर प्रीति और मित्रता रही है। राम धीर और शान्त प्रकृति के थे, लक्ष्मण उग्र और उद्धत स्वभाव के थे, पर दोनों भाइयों में अत्यन्त प्रगाढ़ स्नेह था। उदार तथा उच्चाशय कर्ण और लोभी दुर्योधन के स्वभावों में कुछ विशेष समानता न थी, पर उन दोनों की मित्रता खूब निभी । [2017]
Answer:
(अ) प्रस्तुत अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. यह बताता है कि दोस्ती के लिए समान स्वभाव या रुचि होना जरूरी नहीं है.
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
       शुक्ल जी कहते हैं कि सच्ची दोस्ती के लिए 'दो व्यक्तियों के स्वभाव का एक जैसा होना' ज़रूरी नहीं है. अगर ज़रूरी है तो बस यह कि दोनों व्यक्ति एक-दूसरे से कितनी हमदर्दी रखते हैं. अगर वे ऐसा मानते हैं तो अलग स्वभाव के होने पर भी उनकी दोस्ती सच्ची साबित होती है और अगर वे ऐसा नहीं मानते तो एक समान स्वभाव होने पर भी दोस्ती नहीं टिक सकती. राम-लक्ष्मण और कर्ण-दुर्योधन का उदाहरण इस बात को साफ दिखाता है. दोस्ती में आपसी समझ और सहानुभूति ही सबसे महत्वपूर्ण होती है, न कि सिर्फ स्वभाव की समानता.
(स) 1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
       इस गद्यांश में लेखक कहना चाहते हैं कि दोस्ती के लिए समान स्वभाव और रुचि का होना ज़रूरी नहीं है. उन्होंने उदाहरण देकर यह साबित किया है कि अलग स्वभाव वाले लोग भी अच्छे दोस्त हो सकते हैं. सच्ची दोस्ती का आधार आपसी समझ और सम्मान है.
(स) 2. राम-लक्ष्मण और कर्ण-दुर्योधन के स्नेह और मित्रता के कारणों पर प्रकाश डालिए ।
       राम शांत और धीर स्वभाव के थे, जबकि लक्ष्मण उग्र और उत्तेजित स्वभाव के थे, लेकिन स्वभाव अलग होने पर भी उनमें बहुत गहरा प्यार था. इसी तरह कर्ण महान विचारों वाले और दानी थे, जबकि दुर्योधन स्वार्थी और लालची था, फिर भी उन दोनों की दोस्ती बहुत मजबूत थी. उनके इन अटूट प्यार भरे संबंधों का एकमात्र कारण उनके बीच पैदा हुई गहरी सहानुभूति ही थी, जिसने उनके विपरीत स्वभाव या प्रकृति के अंतर को मिटा दिया था. यह दर्शाता है कि दोस्ती में व्यक्तित्व से ज्यादा आपसी जुड़ाव महत्वपूर्ण है.
In simple words: लेखक कहते हैं कि दोस्ती के लिए एक जैसा स्वभाव या रुचि होना ज़रूरी नहीं है. राम और लक्ष्मण, या कर्ण और दुर्योधन जैसे अलग स्वभाव वाले लोग भी गहरे दोस्त हो सकते हैं. असल में, दोस्ती आपसी प्यार और सहानुभूति पर टिकी होती है.

🎯 Exam Tip: विपरीत स्वभाव वाले मित्रों के उदाहरण (जैसे राम-लक्ष्मण, कर्ण-दुर्योधन) देकर अपनी बात को प्रमाणित करें और दोस्ती में सहानुभूति व आपसी समझ के महत्व पर बल दें।

 

प्रश्न 8. यंह कोई बात नहीं कि एक ही स्वभाव और रुचि के लोगों में ही मित्रता हो सकती है। समाज में विभिन्नता देखकर लोग एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। जो गुण हममें नहीं हैं, हम चाहते हैं कि कोई ऐसा मित्र मिले, जिसमें वे गुण हों। चिन्ताशील मनुष्य प्रफुल्लित चित्त का साथ हूँढ़ता है, निर्बल बली को, धीर उत्साही का। उच्च आकांक्षा वाला चन्द्रगुप्त युक्ति और उपाय के लिए चाणक्य का मुँह ताकता था। नीति-विशारद अकबर मन बहलाने के लिए बीरबल की ओर देखता था। [2012]
Answer:
(अ) प्रस्तुत अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. इसमें बताया गया है कि लोग अलग-अलग स्वभाव के लोगों की ओर क्यों आकर्षित होते हैं.
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
       शुक्ल जी कहते हैं कि दो लोगों की दोस्ती के लिए यह जरूरी नहीं कि उनके स्वभाव और पसंद एक जैसी हों. बल्कि, अलग-अलग स्वभाव वाले लोग भी दोस्त बन सकते हैं. समाज में मौजूद विभिन्नता को देखकर गरीब धनी की ओर, कमजोर ताकतवर की ओर, और विनम्र, शांत व गंभीर व्यक्ति उत्साही व्यक्ति की ओर आकर्षित होते हैं ताकि उन्हें मुश्किल समय में सही प्रेरणा मिल सके. इसका मुख्य कारण यह है कि व्यक्ति चाहता है कि जो गुण उसमें नहीं हैं, वह ऐसे व्यक्ति को दोस्त बनाए जिसमें वे गुण हों. चिंतित व्यक्ति खुशमिजाज व्यक्ति की तलाश में रहता है, ताकि वह भी कुछ समय के लिए चिंतामुक्त हो सके. यह एक स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है.
(स) 1. क्या देखकर व्यक्ति एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं ? सोदाहरण समझाइए ।
       व्यक्ति यह देखकर एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं कि उनमें वे गुण मौजूद हों जो उनके पास नहीं हैं. इसका मतलब है कि व्यक्ति में जो गुण नहीं होते, उन्हें जब वह दूसरे व्यक्ति में देखता है तो उसकी ओर आकर्षित होता है. उदाहरण के लिए – चंद्रगुप्त अपने विद्वान मंत्री चाणक्य की ओर देखता था, और अकबर मनोरंजन के लिए बीरबल की ओर देखता था. ये उदाहरण दर्शाते हैं कि लोग अपनी कमियों को पूरा करने के लिए दूसरों की ओर देखते हैं.
(स) 2. समाज में विभिन्नता देखकर लोग एक-दूसरे की ओर क्यों आकर्षित होते हैं ?
       समाज में विभिन्नता देखकर ही लोग एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं क्योंकि व्यक्ति में होने वाले कुछ गुणों की कमी उसे उस गुण से भरे हुए व्यक्ति की ओर खींचती है. यह एक प्राकृतिक नियम है कि विपरीत गुण एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं.
In simple words: लेखक कहते हैं कि दोस्ती के लिए एक जैसा होना ज़रूरी नहीं है. लोग अक्सर उन लोगों की ओर खिंचते हैं जिनमें वे गुण होते हैं जो उनके पास नहीं होते. जैसे परेशान आदमी खुश इंसान को ढूंढता है.

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में दिए गए उदाहरणों (चंद्रगुप्त-चाणक्य, अकबर-बीरबल) का उपयोग अपने उत्तर को मजबूत बनाने के लिए करें। बताएं कि विपरीत गुण कैसे पूरक होकर दोस्ती को मजबूत बनाते हैं।

 

प्रश्न 9. मित्र का कर्तव्य इस प्रकार बताया गया है- 'उच्च और महान् कार्य में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना और साहस दिलाना कि तुम अपनी निज की सामर्थ्य से बाहर काम कर जाओ।' यह कर्तव्य उसी से पूरा होगा, जो दृढ़-चित्त और सत्य-संकल्प का हो। इससे हमें ऐसे ही मित्रों की खोज में रहना चाहिए, जिनमें हमसे अधिक आत्मबल हो । हमें उनका पल्ला उसी तरह पकड़ना चाहिए, जिस तरह सुग्रीव ने राम का पल्ला पकड़ा था। मित्र हों तो प्रतिष्ठित और शुद्ध हृदय के हों, मृदुल और पुरुषार्थी हों, शिष्ट और सत्यनिष्ठ हों, जिससे हम अपने को उनके भरोसे पर छोड़ सकें और यह विश्वास कर सकें कि उनसे किसी प्रकार का धोखा न होगा। [2012, 14, 18]
Answer:
(अ) उपर्युक्त अवतरण का सन्दर्भ लिखिए ।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. इसमें एक सच्चे मित्र के कर्तव्यों और गुणों पर प्रकाश डाला गया है.
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
       प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या - शुक्ल जी कहते हैं कि सच्चा दोस्त वही है जो ज़रूरत पड़ने पर अपनी शक्ति और क्षमता से भी बढ़कर अपने दोस्त की मदद करे. दोस्त का कर्तव्य है कि वह दोस्त के मुश्किल में होने पर उसकी इस तरह मदद करे कि उसका साहस और उत्साह बना रहे. वह खुद को बिल्कुल अकेला और निराश न समझे, बल्कि उसका मनोबल बना रहे. इस तरह की मदद मिलने पर वह अपनी क्षमता से कई गुना बड़े काम आसानी से कर लेगा. सच्चा मित्र हमें असंभव लगने वाले कामों को भी संभव बना देता है.
       द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या – शुक्ल जी कहते हैं कि दोस्त के बड़े और महान काम में मदद करने, उत्साहित करने जैसे कर्तव्य वही व्यक्ति निभा सकता है, जिसके विचार खुद मजबूत और संकल्प सच्चे हों. इसलिए दोस्त बनाते समय हमें ऐसे व्यक्ति को खोजना चाहिए, जिसमें हमसे कहीं ज्यादा साहस और आत्मविश्वास हो. ऐसा मित्र ही हमें जीवन में सही दिशा दे सकता है.
       तृतीय रेखांकित अंश की व्याख्या – शुक्ल जी का कहना है कि हमें ऐसे दोस्त बनाने चाहिए जो समाज में आदरणीय और सम्मानित हों, जिनका दिल साफ हो, जो मीठा बोलने वाले और सच्चे हों, तथा सभ्य और मेहनती हों. ऐसे गुणों वाले दोस्त पर ही खुद को छोड़ा जा सकता है, यानी उन पर पूरा भरोसा किया जा सकता है. ऐसे दोस्तों को ही असली दोस्त माना जा सकता है जिनसे कभी भी किसी तरह के धोखे या कपट की आशंका नहीं रहेगी. ऐसे दोस्त हमारी हर मुश्किल में साथ देते हैं.
(स) 1. मित्र के कौन-से कर्तव्य बताये गये हैं ?
       मित्र के कर्तव्य हैं- सही और अच्छे काम में मित्र की मदद करना, उसके उत्साह और साहस को इस तरह बढ़ाना कि वह अपनी क्षमता से ज्यादा काम कर सके. उसे हमेशा हमें प्रेरित करना चाहिए.
(स) 2. मित्र किस प्रकार के होने चाहिए ?
       हमारे मित्र ऐसे होने चाहिए जो समाज में सम्मानित हों, जिनका दिल शुद्ध हो, जो मीठे बोलने वाले हों, मेहनती हों, सभ्य हों और सच्चे हों. ऐसे ही दोस्तों को वास्तविक मित्र माना जा सकता है, जिन पर पूरा भरोसा किया जा सके.
(स) 3. गद्यांश में प्रयुक्त मुहावरों का अर्थ लिखकर वाक्य में प्रयोग कीजिए ।
       मन बढ़ाना (उत्साहित करना)- जाम्बवंत ने हनुमान का मन इस प्रकार बढ़ाया कि वे समुद्र लाँघकर लंका जाने के लिए तैयार हो गए.
       पल्ला पकड़ना (सहारा लेना)- सुग्रीव ने बालि से मुक्ति पाने के लिए ही राम का पल्ला पकड़ा था.
In simple words: एक दोस्त को हमें अच्छे और बड़े काम करने में मदद करनी चाहिए और हमारा हौसला बढ़ाना चाहिए. हमें ऐसे दोस्त ढूंढने चाहिए जो बहादुर, ईमानदार और मेहनती हों, जिन पर हम भरोसा कर सकें.

🎯 Exam Tip: मुहावरों और वाक्यांशों का उपयोग अपने उत्तर को और प्रभावी बनाता है। मित्र के गुणों को बताते समय, उनके कर्तव्यों पर भी विशेष ध्यान दें।

 

प्रश्न 10. उनके लिए फूल-पत्तियों में कोई सौन्दर्य नहीं, झरनों के कल-कल में मधुर संगीत नहीं, अनन्त सागर-तरंगों में गम्भीर रहस्यों का आभास नहीं, उनके भाग्य में सच्चे प्रयत्न और पुरुषार्थ का आनन्द नहीं, उनके भाग्य में सच्ची प्रीति का सुख और कोमल हृदय की शान्ति नहीं। जिनकी आत्मा अपने इन्द्रिय-विषयों में ही लिप्त है; जिनका हृदय नीचाशयों और कुत्सित विचारों से कलुषित है, ऐसे नाशोन्मुख प्राणियों को दिन-दिन अन्धकार में पतित होते देख कौन ऐसा होगा, जो तरस न खाएगा? उसे ऐसे प्राणियों का साथ न करना चाहिए।
Answer:
(अ) प्रस्तुत अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. इसमें उन लोगों के बारे में बताया गया है जो बाहरी सुंदरता और जीवन के गहरे अर्थों को समझ नहीं पाते.
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
       प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या - शुक्ल जी कहते हैं कि जो आचरणहीन और दिल से कठोर व्यक्ति प्रकृति की सुंदरता का आनंद नहीं ले सकते, जिनके लिए फूलों की सुंदरता और झरनों की मीठी आवाज का कोई मतलब नहीं, जिन्हें सागर में उठने वाली लहरों के गहरे रहस्य का ज्ञान नहीं, ऐसे लोग दोस्त बनाने लायक नहीं होते. जो लोग मेहनत करने में खुशी महसूस नहीं करते, जिनके दिल में प्यार नहीं होता, जिनका मन हमेशा अशांत रहता है, ऐसे लोग भी दोस्ती के योग्य नहीं होते. वे जीवन के सच्चे सुखों से वंचित रह जाते हैं.
       द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या - शुक्ल जी का कहना है कि जो लोग सिर्फ इंद्रियों के सुख की इच्छा करते हैं और उसी को पाने की कोशिश करते हैं, जिनका दिल गंदे और घृणित भावों से भरा हुआ है, ऐसे लोग गंदे और निम्न स्तर के विचारों के कारण लगातार विनाश की ओर बढ़ रहे होते हैं और अंततः अज्ञान के गहरे गड्ढे में गिरकर खत्म हो जाते हैं. ऐसे लोगों का दिन-प्रतिदिन पतन होता रहता है, जिसे देखकर सभी को दया आती है. ऐसे पतन की ओर बढ़ रहे लोगों से कभी दोस्ती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे खुद भी गिरते हैं और दूसरों को भी गिराते हैं.
(स) 1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने क्या प्रेरणा दी है ?
       लेखक ने बुरी संगति से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा है कि गलत विचारों वाले व्यक्तियों से कभी दोस्ती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसे लोग खुद भी गलत रास्ते पर होते हैं और दूसरों को भी गलत रास्ते पर ले जाते हैं. सच्चा मित्र हमें गलत राह पर जाने से बचाता है.
(स) 2. कौन-से लोग फूल-पत्तियों में सौन्दर्य को, झरनों में संगीत का, सागर-तरंगों में रहस्यों का आभास नहीं कर पाते ?
       जिन व्यक्तियों का मन और दिमाग भोग-विलास में डूबा रहता है, जिनका दिल निम्न स्तर के विचारों से भरा होता है, ऐसे ही व्यक्ति फूल-पत्तियों में सुंदरता को, झरनों में मधुर संगीत को और सागर-लहरों के रहस्यों को महसूस नहीं कर पाते. उनकी सोच संकीर्ण होती है.
(स) 3. कुत्सित विचारों वाले व्यक्तियों को क्या प्राप्त नहीं होता ?
       गलत विचारों वाले व्यक्तियों को सच्चे प्रयास और मेहनत में आनंद नहीं मिलता, सच्चे प्यार का सुख नहीं मिलता और कोमल दिल की शांति प्राप्त नहीं होती. वे हमेशा अशांत और असंतुष्ट रहते हैं.
In simple words: जो लोग फूलों की सुंदरता, झरनों के संगीत या सागर के रहस्यों को नहीं समझ पाते, और जिनका मन बुरे विचारों से भरा होता है, ऐसे लोगों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए. वे खुद भी पतन की ओर जाते हैं और दूसरों को भी ले जाते हैं.

🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में उन व्यक्तियों के नकारात्मक गुणों को स्पष्ट करें जिनसे दोस्ती नहीं करनी चाहिए, और उनके जीवन पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों का वर्णन करें।

 

प्रश्न 11. कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। यह केवल नीति और सदृत्ति का ही नाश नहीं करता, बल्कि बुद्धि का भी क्षय करता है। किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-दिन अवनति के गड्ढे में गिराती-जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहु के समान होगी, जो उसे निरन्तर उन्नति की ओर उठाती जाएगी। [2011, 13, 15, 17]
Answer:
(अ) प्रस्तुत अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. इसमें बुरी संगति के भयानक प्रभावों और अच्छी संगति के लाभों के बारे में बताया गया है.
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
       प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या - शुक्ल जी कहते हैं कि बुरी संगति घातक बुखार की तरह नुकसानदेह होती है. जिस तरह अगर कोई व्यक्ति भयानक बुखार से ग्रस्त हो जाए तो वह बुखार उसके शरीर और स्वास्थ्य को नष्ट कर देता है और कभी-कभी उसकी जान भी ले लेता है, उसी तरह बुरी संगति हमारी नैतिकता, अच्छे व्यवहार, मन और बुद्धि को भी नष्ट कर देती है. यह हमें गलत राह पर धकेल देती है.
       द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या – इंसान के जीवन में युवावस्था सबसे महत्वपूर्ण होती है. बुरी संगति किसी युवा व्यक्ति की सारी तरक्की को उसी तरह रोक देती है, जिस तरह पैरों में बंधा भारी पत्थर किसी व्यक्ति को आगे बढ़ने नहीं देता, बल्कि अक्सर उसे गिरा देता है. इसी तरह बुरी संगति में फँसा व्यक्ति भी पतन की ओर जाता रहता है और दिन-प्रतिदिन पतन के रास्ते पर आगे बढ़ता रहता है. इसके उलट, अच्छी संगति हमारे लिए एक मजबूत सहारे जैसी होती है जो हमें गिरने नहीं देती, बल्कि हमें लगातार तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ाती है और जीवन को शुद्ध, सात्विक और उन्नत बनाती है. अच्छी संगति हमें हमेशा सही दिशा में ले जाती है.
(स) 1. युवा पुरुष की संगति के बारे में क्या कहा गया है ?
       युवा पुरुष की बुरी संगति उसे हर दिन पतन के गड्ढे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी संगति होगी तो वह उसे लगातार तरक्की की ओर बढ़ाएगी. युवावस्था में संगति का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण होता है.
(स) 2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
       इस गद्यांश में लेखक कहना चाहते हैं कि बुरी संगति इंसान के पतन का और अच्छी संगति उसके उत्थान का कारण बनती है. इसलिए व्यक्ति को बुरी संगति से बचकर रहना चाहिए और हमेशा अच्छी संगति करनी चाहिए.
(स) 3. अच्छी संगति से होने वाले लाभों को उदाहरण देकर समझाइए ।
       अच्छी संगति सहारा देने वाली भुजा के समान होती है, जो व्यक्ति की जीवन-रक्षक होती है और उसे उन्नति की ओर ले जाती है. यह हमें सही निर्णय लेने में मदद करती है और हमारा मनोबल बढ़ाती है.
(स) 4. कुसंग का क्या प्रभाव होता है ?
       कुसंग का प्रभाव बहुत भयानक होता है. यह इंसान की नैतिकता और अच्छे व्यवहार को नष्ट कर देता है. इसके साथ-साथ यह उसकी बुद्धि को भी खत्म करता रहता है. यह हमें गलत रास्ते पर धकेलता है और जीवन को बर्बाद कर देता है.
In simple words: बुरी संगति एक भयानक बुखार की तरह है जो हमारी नैतिकता, व्यवहार और बुद्धि को खराब कर देती है. अच्छी संगति एक मजबूत सहारे की तरह है जो हमें हमेशा आगे बढ़ने में मदद करती है.

🎯 Exam Tip: बुरी संगति (कुसंग) और अच्छी संगति (सत्संगति) के प्रभावों की तुलना करते समय, रूपकों (जैसे 'पैरों में बंधी चक्की' और 'सहारा देने वाली बाहु') का प्रभावी ढंग से उपयोग करें और उनके नैतिक व बौद्धिक प्रभावों को बताएं।

 

प्रश्न 12. बहुत-से लोग ऐसे होते हैं, जिनके घड़ी-भर के साथ से भी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है; क्योंकि उतने ही बीच में ऐसी-ऐसी बातें कही जाती हैं, जो कानों में न पड़नी चाहिए, चित्त पर ऐसे प्रभाव पड़ते हैं, जिनसे उसकी पवित्रता का नाश होता है। बुराई अटल भाव धारण करके बैठती है। बुरी बातें हमारी धारणा में बहुत दिनों तक टिकती हैं। इस बात को प्रायः सभी लोग जानते हैं कि भद्दे व फूहड़ गीत जितनी जल्दी ध्यान पर चढ़ते हैं, उतनी जल्दी कोई गम्भीर या अच्छी बात नहीं। [2017]
Answer:
(अ) प्रस्तुत अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. इसमें बुरी संगति के क्षणिक और स्थायी प्रभावों का वर्णन किया गया है.
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
       प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या – इस गद्यांश में शुक्ल जी बुरी संगति को व्यक्ति की तरक्की में बाधक बताते हुए कहते हैं कि समाज में ऐसे कई लोग होते हैं जिनके साथ थोड़ी देर रहने से भी व्यक्ति की सोचने की शक्ति खराब हो जाती है. ऐसे लोग उस थोड़ी-सी देर में ही ऐसी-ऐसी बातें कह डालते हैं, जो सामान्य व्यक्ति के सुनने लायक भी नहीं होतीं. ऐसी बातों से व्यक्ति के मन-मस्तिष्क पर इतने बुरे प्रभाव पड़ते हैं कि उससे उसके दिल की पवित्रता; यानी मन के अच्छे भाव खत्म हो जाते हैं. बुरी संगति का असर मन पर बहुत गहरा और स्थायी होता है.
       द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या - शुक्ल जी का कहना है कि बुरी आदतें या भावनाएँ व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में स्थायी रूप से जम जाती हैं और बहुत समय तक वहीं टिकी रहती हैं. अपनी बात को और मजबूत करते हुए लेखक कहते हैं कि यह बात तो सामान्य लोगों ने भी अनुभव की होगी कि गंदे और अश्लील गाने जितनी जल्दी व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में बैठ जाते हैं, उतनी जल्दी कोई अच्छी या फायदे वाली बात नहीं. यह दर्शाता है कि नकारात्मक चीजें सकारात्मक चीजों से ज्यादा तेजी से असर करती हैं.
(स) 1. किस बात को प्रायः सभी लोग जानते-समझते हैं ?
       सभी लोग यह बात जानते-समझते हैं कि भद्दे और अश्लील गाने जितनी जल्दी याद हो जाते हैं, उतनी जल्दी कोई गंभीर या अच्छी बात याद नहीं होती. यह मानवीय मनोविज्ञान का एक महत्वपूर्ण पहलू है.
(स) 2. किन लोगों के क्षणमात्र के साथ से भी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और क्यों ?
       बुरे लोगों की थोड़ी देर की संगति से भी बुद्धि खराब हो जाती है; क्योंकि वे बहुत कम समय में ही इतनी बुरी बातें कह डालते हैं, जिनसे मन की पवित्रता खत्म हो जाती है. ऐसे लोगों की बातें सुनने से मन पर नकारात्मक असर पड़ता है.
In simple words: कुछ लोगों के साथ थोड़ी देर रहने से भी दिमाग खराब हो जाता है, क्योंकि वे ऐसी बातें करते हैं जो मन को गंदा करती हैं. बुरी बातें और गंदे गाने जल्दी याद होते हैं, जबकि अच्छी बातें नहीं.

🎯 Exam Tip: बुरी संगति के नकारात्मक प्रभाव को बताते समय, यह भी समझाएं कि अश्लील या नकारात्मक बातें कैसे आसानी से मन में बैठ जाती हैं, जबकि अच्छी बातें याद रखने में समय लगता है।

 

प्रश्न 13. जब एक बार मनुष्य अपना पैर कीचड़ में डाल देता है, तब फिर यह नहीं देखता कि वह कहाँ और कैसी जगह पैर रखता है। धीरे-धीरे उन बुरी बातों में अभ्यस्त होते-होते तुम्हारी घृणा कम हो जाएगी। पीछे तुम्हें उनसे चिढ़ न मालूम होगी; क्योंकि तुम यह सोचने लगोगे कि चिढ़ने की बात ही क्या है! तुम्हारा विवेक कुण्ठित हो जाएगा और तुम्हें भले-बुरे की पहचान न रह जाएगी। अंत में होते-होते तुम भी बुराई के भक्त बन जाओगे; अतः हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि बुरी संगत की छूत से बचो । [2012, 14, 16]
Answer:
(अ) प्रस्तुत अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
       यह अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबंध से लिया गया है, जो हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य-खंड में संकलित है. इसमें बुरी संगति के गंभीर परिणामों और उनसे बचने के उपाय बताए गए हैं.
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
       प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या - शुक्ल जी ने बुरी संगति को कीचड़ के समान बताया है और कहा है कि इस कीचड़ से हमेशा बचना चाहिए, नहीं तो यह हमारे व्यवहार को खराब कर देगा. अगर कोई व्यक्ति एक बार बुरी संगति में फँस जाए और बदनाम हो जाए, तो वह फिर बार-बार बदनाम होने से नहीं डरता और धीरे-धीरे बुरी आदतों का आदी हो जाता है. जब बुराई आदत बन जाती है, तब वह उससे नफरत भी नहीं करता और उसे बुरा कहने से भी नहीं चिढ़ता. यह पतन की एक खतरनाक सीढ़ी है.
       द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या – शुक्ल जी का कहना है कि बुरी संगति में पड़े व्यक्ति का विवेक नष्ट हो जाता है और उसे सही-गलत की पहचान नहीं रहती. उसे बुराई ही भलाई लगने लगती है और वह इतना गिर जाता है कि बुराई की पूजा भक्त की तरह करने लगता है. इसलिए यदि अपने दिल और आचरण को साफ और पवित्र बनाए रखना है तो बुरी संगति के प्रभाव से बचना चाहिए. बुरी संगति हमें अंदर से खोखला कर देती है और हमारी निर्णय लेने की क्षमता को खत्म कर देती है.
(स) 1. कुसंगति में पड़ा हुआ मनुष्य क्या नहीं देखता और क्यों ?
       कुसंगति में पड़ा हुआ मनुष्य यह नहीं देखता कि वह एक के बाद एक कितनी बुराइयों में फँसता चला जा रहा है; क्योंकि वह इन बुराइयों का इतना आदी हो जाता है कि उसकी इनसे घृणा खत्म हो जाती है. उसे यह सब सामान्य लगने लगता है.
(स) 2. कुसंगति में पड़े हुए मनुष्य के साथ क्या होता है ?
       कुसंगति में पड़े हुए मनुष्य का विवेक कमजोर हो जाता है और उसे अपने सही-गलत की पहचान नहीं रह जाती. अंत में वह बुराई में पूरी तरह डूब जाता है और उसका जीवन बर्बाद हो जाता है.
(स) 3. विवेक कुण्ठित हो जाने से मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
       विवेक कमजोर हो जाने से मनुष्य को सही-गलत की पहचान नहीं रह जाती और अंत में वह भी बुराई का भक्त बन जाता है. उसकी सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो जाती है.
(स) 4. लेखक ने हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने का क्या उपाय सुझाया है ?
       लेखक ने हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने के लिए स्वयं को बुरी संगति से दूर रखने का उपाय सुझाया है. बुरी संगति से दूर रहकर ही हम अपने मन को साफ रख सकते हैं.
(स) 5. सबसे अच्छा उपाय क्या है?
       सबसे अच्छा उपाय यह है कि व्यक्ति स्वयं को बुरी संगति के प्रभाव से बचाए तथा अपने हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखे. यह हमें एक अच्छा और सार्थक जीवन जीने में मदद करता है.
(स) 6. बुरी बातों का क्या प्रभाव पड़ता है?
       बुरी बातों का व्यक्ति के मन-मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. बुरी बातों का आदी हो जाने पर उनके प्रति उसकी घृणा कम हो जाती है और धीरे-धीरे व्यक्ति बुराई को ही पूरी तरह अपना लेता है. उसका नैतिक पतन हो जाता है.
In simple words: जब कोई बुराई में फंस जाता है, तो वह सही-गलत का फर्क भूल जाता है और बुराई को ही अच्छा मानने लगता है. अपने मन को साफ रखने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम बुरी संगति से दूर रहें.

🎯 Exam Tip: बुरी संगति के परिणामों को समझाते समय, यह बताएं कि कैसे यह विवेक को कमजोर करती है और व्यक्ति को बुराई की ओर धकेलती है। इससे बचने के उपाय के रूप में बुरी संगति से दूर रहने के महत्व पर जोर दें।

व्याकरण एवं रचना-बोध

 

प्रश्न 1. निम्नलिखित शब्दों से उपसर्ग और मूल-शब्दों को अलग करके लिखिए
प्रवृत्ति, संकल्प, कुमार्ग, सहानुभूति, उच्चाशय, कुसंग, निष्कलंक, उज्ज्वल ।

Answer:

सोपसर्ग शब्दउपसर्गमूल शब्द
प्रवृत्तिप्रवृत्ति
संकल्पसम्कल्प
कुमार्गकुमार्ग
सहानुभूतिसहअनुभूति
उच्चाशयउत् + चआशय
कुसंगकुसंग
निष्कलंंकनिस्कलंक
उज्ज्वलउत्ज्वल

In simple words: ये वो शब्द हैं जिनमें उपसर्ग (शब्द के आगे जुड़ने वाला हिस्सा) और मूल शब्द (शब्द का मुख्य हिस्सा) को अलग-अलग करके दिखाया गया है. इससे शब्दों की बनावट समझना आसान हो जाता है.

🎯 Exam Tip: उपसर्ग और मूल शब्द को अलग करते समय, सुनिश्चित करें कि दोनों हिस्सों का अपना अर्थ हो। उपसर्ग हमेशा शब्द के आरंभ में लगता है।

 

प्रश्न 2. निम्नलिखित शब्दों से प्रकृति (मूल शब्द) को अलग करके लिखिए-
उपयुक्तता, निपुणता, आनन्दमय, चिन्ताशील, सत्यनिष्ठ, बुद्धिमान्, दुर्भाग्यवश, ग्रन्थकार, सात्विक, कलुषित, लड़कपन

Answer:

शब्दप्रकृतिप्रत्यय
उपयुक्तताउपयुक्तता
निपुणतानिपुणता
आनन्दमयआनन्दमय
चिन्ताशीलचिन्ताशील
सत्यनिष्ठसत्यनिष्ठ
बुद्धिमान्बुद्धिमान
दुर्भाग्यवशदुर्भाग्यवश
ग्रन्थकारग्रन्थकार
सात्विकसत्वइक
कलुषितकलुषइत
लड़कपनलड़कापन

In simple words: यहाँ हर शब्द को उसके मूल शब्द (प्रकृति) और प्रत्यय (शब्द के अंत में जुड़ने वाला हिस्सा) में तोड़ा गया है. यह दिखाता है कि शब्दों को कैसे बनाया जाता है.

🎯 Exam Tip: प्रत्यय और मूल शब्द को अलग करते समय, यह सुनिश्चित करें कि मूल शब्द का अपना स्वतंत्र अर्थ हो और प्रत्यय उसे नया अर्थ दे रहा हो।

 

प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रत्ययों से पाँच-पाँच शब्दों की रचना कीजिए-
इक, इत, मय, ई, कार ।

Answer:
इक – श्रमिक, पारिवारिक, सामाजिक, नागरिक, राजनीतिक आदि.
इतं – लिखित, पठित, रचित, फलित, चलित आदि.
मय – आनन्दमय, कर्ममय, प्रेममय, भक्तिमय, संगीतमय आदि.
ई – देशी, विदेशी, परदेशी, नगरी, अंग्रेजी आदि.
कार – स्वर्णकार, लेखाकार, रचनाकार, निबन्धकार, कलाकार आदि.
In simple words: हमने अलग-अलग प्रत्ययों (जैसे 'इक', 'इत', 'मय', 'ई', 'कार') का इस्तेमाल करके नए शब्द बनाए हैं. प्रत्यय वे अक्षर समूह होते हैं जो शब्द के अंत में जुड़कर उसका अर्थ बदल देते हैं.

🎯 Exam Tip: प्रत्यय लगाकर शब्द बनाते समय, यह ध्यान रखें कि नया शब्द व्याकरणिक रूप से सही और अर्थपूर्ण होना चाहिए। प्रत्येक प्रत्यय के लिए विभिन्न प्रकार के शब्द सोचें।

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