RBSE Solutions Class 12 History Chapter 6 आधुनिक भारत का स्वाधीनता आन्दोलन

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Class 12 History Chapter 6 आधुनिक भारत का स्वाधीनता आन्दोलन RBSE Solutions PDF

RBSE Class 12 History Chapter 6 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 History Chapter 6 बहुचयनात्मक प्रश्न

 

Question 1. ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की?
(क) स्वामी दयानन्द सरस्वती
(ख) स्वामी विवेकानन्द
(ग) राजा राममोहन राय
(घ) आत्मारंग पांडुरंग।
Answer: (ग) राजा राममोहन राय
In simple words: राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की शुरुआत की थी। यह एक खास संस्था थी जिसने समाज में अच्छी बातों को बढ़ावा दिया।

🎯 Exam Tip: ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत माने जाते हैं, यह महत्वपूर्ण है.

 

Question 2. रामकृष्ण मिशन की स्थापना किसने की?
Answer: रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानन्द ने 5 मई, 1897 को अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम पर वेलूर में की थी। इस मिशन का उद्देश्य वेदान्त दर्शन के सिद्धांतों का प्रचार करना और समाज सेवा के माध्यम से लोगों की मदद करना था। यह मिशन शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी काम करता है।
In simple words: रामकृष्ण मिशन की शुरुआत स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम पर की थी। इसका मुख्य काम धर्म का प्रचार करना और समाज की सेवा करना था।

🎯 Exam Tip: स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु की शिक्षाओं को फैलाने और मानवता की सेवा के लिए यह मिशन स्थापित किया था, जो आज भी कई कल्याणकारी कार्य करता है.

 

Question 3. 1893 ई. में विश्वधर्म सम्मेलन में विवेकानन्द ने कहाँ भाग लिया था?
(क) सेन फ्रांसिस्को
(ख) न्यूयार्क
(ग) शिकागो
(घ) ब्रिस्टल।
Answer: (ग) शिकागो
In simple words: स्वामी विवेकानन्द ने 1893 में शिकागो शहर में हुए विश्वधर्म सम्मेलन में हिस्सा लिया था। वहाँ उन्होंने अपने ज्ञान और विचारों से सबको बहुत प्रभावित किया।

🎯 Exam Tip: शिकागो विश्वधर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द के भाषण ने हिन्दू धर्म को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई, यह एक ऐतिहासिक घटना थी.

 

Question 4. राजा राममोहन राय की मृत्यु कहाँ हुई थी?
(क) लंदन
(ख) ब्रिस्टल
(ग) शिकागो
(घ) कलकत्ता।
Answer: (ख) ब्रिस्टल
In simple words: राजा राममोहन राय की मृत्यु ब्रिस्टल शहर में हुई थी। यह शहर इंग्लैंड में है।

🎯 Exam Tip: राजा राममोहन राय ने अपने जीवनकाल में भारत और इंग्लैंड दोनों जगह समाज सुधार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए थे.

 

Question 5. राजा राममोहन राय के प्रयासों से किस गवर्नर जनरल के समय सती - प्रथा को रोकने के लिए कानून बना?
(क) वारेन हेस्टिंग्स
(ख) लॉर्ड विलियम बैंटिक
(ग) लार्ड डलहौजी
(घ) लार्ड रिपन।
Answer: (ख) लॉर्ड विलियम बैंटिक
In simple words: राजा राममोहन राय ने बहुत कोशिश की, जिसके कारण लॉर्ड विलियम बैंटिक के राज में सती-प्रथा को रोकने के लिए एक कानून बनाया गया। यह कानून एक बहुत बड़ा समाज सुधार था।

🎯 Exam Tip: सती-प्रथा का उन्मूलन भारतीय समाज सुधार आंदोलन में एक मील का पत्थर था, जिसमें राजा राममोहन राय और लॉर्ड विलियम बैंटिक का विशेष योगदान रहा.

 

Question 6. 'वेदों की ओर लौट चलो' का नारा किसने दिया?
(क) राजा राममोहन राय
(ख) स्वामी विवेकानन्द
(ग) स्वामी दयानन्द सरस्वती
(घ) केशवचन्द्र सेन।
Answer: (ग) स्वामी दयानन्द सरस्वती
In simple words: यह प्रसिद्ध नारा स्वामी दयानन्द सरस्वती ने दिया था। इसका मतलब था कि हमें अपने पुराने, सच्चे वैदिक ज्ञान की ओर वापस जाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की और वैदिक शिक्षाओं पर जोर दिया, उनका यह नारा उनके सुधारवादी आंदोलन का प्रतीक था.

 

Question 7. फारवर्ड ब्लॉक' की स्थापना किसने की?
(क) भगत सिंह
(ख) वीर सावरकर
(ग) सुभाषचन्द्र बोस
(घ) चन्द्रशेखर आजाद।
Answer: (ग) सुभाषचन्द्र बोस
In simple words: फारवर्ड ब्लॉक की शुरुआत सुभाषचन्द्र बोस ने की थी। यह एक राजनैतिक दल था जिसका मकसद देश को आजादी दिलाना था।

🎯 Exam Tip: फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना सुभाषचन्द्र बोस द्वारा कांग्रेस से अलग होने के बाद की गई थी, यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

 

Question 8. भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को फाँसी कब दी गयी?
(क) 31 दिसम्बर, 1929
(ख) 26 जनवरी, 1930
(ग) 23 मार्च, 1931
(घ) इसमें से कोई नहीं।
Answer: (ग) 23 मार्च, 1931
In simple words: भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च, 1931 को फाँसी दी गई थी। यह दिन भारतीय इतिहास में एक दुखद और महत्वपूर्ण घटना थी।

🎯 Exam Tip: 23 मार्च, 1931 का दिन भारत के लिए शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, जब तीन महान क्रांतिकारियों ने देश के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया.

 

Question 9. कांग्रेस का प्रथम अध्यक्ष कौन था?
(क) ए. ओ. ह्यूम
(ख) व्योमेश चन्द्र बनर्जी
(ग) सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
(घ) दादा भाई नौरोजी।
Answer: (ख) व्योमेश चन्द्र बनर्जी
In simple words: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बनर्जी थे। उन्होंने कांग्रेस के शुरुआती समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

🎯 Exam Tip: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई थी और व्योमेश चन्द्र बनर्जी इसके पहले सत्र के अध्यक्ष बने थे, यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की नींव थी.

 

Question 10. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सूरत अधिवेशन (1907) का अध्यक्ष कौन था?
(क) दादा भाई नौरोजी
(ख) रास बिहारी घोष
(ग) सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
(घ) गोपाल कृष्ण गोखले।
Answer: (ख) रास बिहारी घोष
In simple words: 1907 में सूरत में हुए कांग्रेस के बड़े सम्मेलन के अध्यक्ष रास बिहारी घोष थे। इस सम्मेलन में कांग्रेस दो हिस्सों में बंट गई थी।

🎯 Exam Tip: सूरत अधिवेशन 1907 में कांग्रेस का नरम दल और गरम दल में विभाजन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी.

 

Question 11. प्रान्तों में द्वैध शासन किस अधिनियम द्वारा लागू किया गया?
(क) 1909 के अधिनियम द्वारा
(ख) 1919 के अधिनियम द्वारा
(ग) 1935 के अधिनियम द्वारा
(घ) इसमें से कोई नहीं।
Answer: (ख) 1919 के अधिनियम द्वारा
In simple words: 1919 के अधिनियम के तहत प्रान्तों में द्वैध शासन की शुरुआत हुई। इसका मतलब था कि कुछ विषय भारतीयों को दिए गए और कुछ अंग्रेजों के पास रहे।

🎯 Exam Tip: 1919 का भारत सरकार अधिनियम, जिसे मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से भी जाना जाता है, ने प्रांतीय स्वायत्तता की दिशा में पहला कदम उठाया था.

 

Question 12. साम्प्रदायिक आधार पर पृथक निर्वाचन प्रणाली को अपनाते हुए किस अधिनियम के द्वारा मुस्लिमों के लिए पृथक् निर्वाचक मण्डल की स्थापना की गयी?
(क) 1909 के अधिनियम द्वारा
(ख) 1919 के अधिनियम द्वारा
(ग) 1935 के अधिनियम द्वारा
(घ) इसमें से कोई नहीं।
Answer: (क) 1909 के अधिनियम द्वारा
In simple words: 1909 के अधिनियम में मुसलमानों के लिए अलग से चुनाव का तरीका शुरू किया गया था। इसका मतलब था कि मुस्लिम लोग केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को ही वोट दे सकते थे।

🎯 Exam Tip: 1909 का अधिनियम, जिसे मॉर्ले-मिंटो सुधार के रूप में भी जाना जाता है, ने भारत में सांप्रदायिक राजनीति की नींव रखी, जिसका गहरा प्रभाव पड़ा.

 

Question 13. कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गाँधी जी ने किस गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था?
(क) प्रथम गोलमेज सम्मेलन में
(ख) द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में
(ग) तृतीय गोलमेज सम्मेलन में
(घ) तीनों गोलमेज सम्मेलन में।
Answer: (ख) द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में
In simple words: गांधी जी ने कांग्रेस के अकेले प्रतिनिधि के तौर पर दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था। यह सम्मेलन लंदन में हुआ था।

🎯 Exam Tip: द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) गांधी-इरविन समझौते के परिणामस्वरूप हुआ था, जिसमें गांधीजी ने भारतीय मांगों को ब्रिटिश सरकार के सामने रखा.

RBSE Class 12 History Chapter 6 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. 1893 ई. में विश्वधर्म सम्मेलन में विवेकानन्द ने कहाँ भाग लिया था?
Answer: 1893 में विश्वधर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में भाग लिया था। यहाँ उन्होंने अपने विचारों से पश्चिमी देशों को भारतीय दर्शन से परिचित कराया, जिससे विश्व में भारत की एक नई पहचान बनी।
In simple words: स्वामी विवेकानन्द 1893 में शिकागो के धर्म सम्मेलन में गए थे।

🎯 Exam Tip: स्वामी विवेकानन्द का शिकागो भाषण भारतीय संस्कृति और अध्यात्म को विश्व मंच पर स्थापित करने में मील का पत्थर साबित हुआ.

 

Question 2. स्वामी दयानन्द सरस्वती की मृत्यु कहाँ हुई?
Answer: स्वामी दयानन्द सरस्वती की मृत्यु 30 अक्टूबर, 1883 को अजमेर में हुई थी। उन्होंने आर्य समाज की स्थापना कर भारत में सामाजिक और धार्मिक सुधारों के लिए बहुत काम किया था।
In simple words: स्वामी दयानन्द सरस्वती की मृत्यु 30 अक्टूबर, 1883 को अजमेर में हुई थी।

🎯 Exam Tip: स्वामी दयानन्द सरस्वती को भारत के महान समाज सुधारकों में गिना जाता है, जिन्होंने 'वेदों की ओर लौट चलो' का नारा दिया.

 

Question 3. 'सत्यार्थ प्रकाश' नामक पुस्तक किसने लिखी?
Answer: 'सत्यार्थ प्रकाश' नामक पुस्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने लिखी थी। इस किताब में उन्होंने अपने विचार हिंदी भाषा में लिखे थे, जो आर्य समाज के सिद्धांतों का आधार बने। यह पुस्तक वैदिक धर्म और समाज सुधार पर महत्वपूर्ण जानकारी देती है।
In simple words: 'सत्यार्थ प्रकाश' किताब स्वामी दयानन्द सरस्वती ने लिखी थी। इसमें उन्होंने अपने विचारों को हिंदी में बताया।

🎯 Exam Tip: 'सत्यार्थ प्रकाश' आर्य समाज का एक प्रमुख ग्रंथ है, जो सामाजिक और धार्मिक सुधारों के लिए स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचारों को दर्शाता है.

 

Question 4. भारतीय राष्ट्रवाद एवं भारतीय पुनर्जागरण का जनक किसे माना जाता है?
Answer: उन्नीसवीं शताब्दी के आखिर में भारत में राष्ट्रवाद की शुरुआत हुई। राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का जनक माना जाता है। उन्होंने भारतीय समाज में कई कुरीतियों को दूर करने और आधुनिक विचारों को लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
In simple words: राजा राममोहन राय को भारतीय राष्ट्रवाद और पुनर्जागरण का जनक कहा जाता है।

🎯 Exam Tip: राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना की और सती-प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया, जिससे भारतीय समाज में एक नई चेतना आई.

 

Question 5. 'शुद्धि आन्दोलन' किसने चलाया?
Answer: 'शुद्धि आन्दोलन' स्वामी दयानन्द सरस्वती ने चलाया था। उनका मुख्य काम उन लोगों को वापस हिन्दू धर्म में लाना था जो किसी वजह से दूसरा धर्म अपना चुके थे। यह आन्दोलन भारत में धार्मिक एकता को मजबूत करने के लिए चलाया गया था।
In simple words: 'शुद्धि आन्दोलन' स्वामी दयानन्द सरस्वती ने चलाया था।

🎯 Exam Tip: शुद्धि आंदोलन का उद्देश्य उन लोगों को वापस हिंदू धर्म में लाना था जिन्होंने अन्य धर्म अपना लिए थे, यह आर्य समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था.

 

Question 6. 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' यह प्रसिद्ध नारा किसने दिया?
Answer: यह प्रसिद्ध नारा सुभाष चन्द्र बोस ने दिया था। इस नारे के द्वारा उन्होंने भारतीय युवाओं को देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने के लिए प्रेरित किया। यह नारा भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जोश भरने वाला था।
In simple words: 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' का नारा सुभाष चन्द्र बोस ने दिया था।

🎯 Exam Tip: सुभाष चन्द्र बोस के इस नारे ने भारतीय युवाओं में देशभक्ति की भावना को जगाया और स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा दी.

 

Question 7. 'भारतीय स्वतन्त्रता लीग' की स्थापना किसने एवं कब की?
Answer: 'भारतीय स्वतन्त्रता लीग' की स्थापना 23 जून, 1942 को बैंकाक में रास बिहारी बोस की अध्यक्षता में की गई थी। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन से आजादी दिलाना था। यह विदेशों में भारतीय राष्ट्रवादियों को संगठित करने का प्रयास था।
In simple words: 'भारतीय स्वतन्त्रता लीग' की स्थापना 23 जून, 1942 को बैंकाक में रास बिहारी बोस ने की थी।

🎯 Exam Tip: रास बिहारी बोस ने विदेशों में भारतीय स्वतंत्रता के लिए कई संगठनों का नेतृत्व किया, जिसमें 'भारतीय स्वतंत्रता लीग' भी शामिल थी.

 

Question 8. बिरसा मुण्डा कौन था?
Answer: बिरसा मुण्डा एक आदिवासी नेता थे, जिनके नेतृत्व में मुण्डा विद्रोह हुआ था। मुण्डा जनजाति के लोग उन्हें भगवान मानते थे। उन्होंने अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया था।
In simple words: बिरसा मुण्डा एक आदिवासी नेता थे, जिन्होंने मुण्डा विद्रोह का नेतृत्व किया था।

🎯 Exam Tip: बिरसा मुण्डा ने अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्ष किया और उन्हें 'धरती आबा' (जगत पिता) के नाम से भी जाना जाता है.

 

Question 9. कांग्रेस की स्थापना कब और किसने की?
Answer: कांग्रेस की स्थापना दिसम्बर, 1885 में एलेन अक्टावियन ह्यूम नामक अवकाश प्राप्त अंग्रेज अधिकारी ने की थी। इसका उद्देश्य भारतीयों को एक मंच पर लाकर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा करना था।
In simple words: कांग्रेस की स्थापना एलेन अक्टावियन ह्यूम ने दिसम्बर, 1885 में की थी।

🎯 Exam Tip: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने भारत में एक संगठित राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत की, जो आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य आधार बना.

 

Question 10. बंगाल का विभाजन कब और किस गवर्नर जनरल के समय हुआ?
Answer: बंगाल का विभाजन 1905 ई. में वायसराय लॉर्ड कर्जन के समय हुआ था। इसका उद्देश्य बंगाल की एकता को तोड़ना और राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करना था, लेकिन इससे राष्ट्रवाद की भावना और मजबूत हुई।
In simple words: बंगाल का विभाजन 1905 में लॉर्ड कर्जन ने किया था।

🎯 Exam Tip: बंगाल विभाजन ब्रिटिश सरकार की 'फूट डालो और राज करो' नीति का एक प्रमुख उदाहरण था, जिसने भारतीय राष्ट्रवाद को और तेज किया.

 

Question 11. कांग्रेस के किस अधिवेशन में कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गयी?
Answer: कांग्रेस 1907 ई. के सूरत अधिवेशन में नरम दल और गरम दल में विभाजित हो गयी थी। इस विभाजन का मुख्य कारण कांग्रेस के भीतर विभिन्न नेताओं के विचारों में मतभेद था। यह विभाजन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी।
In simple words: कांग्रेस 1907 में सूरत अधिवेशन में नरम दल और गरम दल में बंट गई थी।

🎯 Exam Tip: सूरत विभाजन ने कांग्रेस के भीतर की वैचारिक मतभेदों को उजागर किया, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन की रणनीति को प्रभावित किया.

 

Question 12. जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड कब हुआ?
Answer: जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड 13 अप्रैल, 1919 को वैशाखी के दिन अमृतसर में हुआ था। इस घटना में जनरल डायर के आदेश पर निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाई गईं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे। यह घटना भारतीय इतिहास में एक काला अध्याय है।
In simple words: जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में हुआ था।

🎯 Exam Tip: जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा दी और अंग्रेजों के खिलाफ जन आक्रोश को बढ़ाया.

 

Question 13. महात्मा गाँधी ने किस घटना के कारण असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया?
Answer: महात्मा गाँधी ने 5 फरवरी, 1922 को देवरिया जिले (उत्तर प्रदेश) में हुई चौरी-चौरा नामक घटना के कारण असहयोग आन्दोलन को रोक दिया था। इस घटना में गुस्साए लोगों ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी थी, जिससे कई पुलिसकर्मी मारे गए थे। गाँधीजी हिंसा के खिलाफ थे, इसलिए उन्होंने आंदोलन को तुरंत बंद करने का फैसला किया।
In simple words: महात्मा गाँधी ने चौरी-चौरा घटना के बाद असहयोग आन्दोलन को रोक दिया था।

🎯 Exam Tip: चौरी-चौरा घटना ने गांधीजी की अहिंसा के सिद्धांत को मजबूत किया और दिखाया कि वह हिंसा बर्दाश्त नहीं करेंगे, भले ही इसका मतलब एक बड़े आंदोलन को रोकना हो.

 

Question 14. महात्मा गाँधी ने दाण्डी मार्च कब एवं कितने सदस्यों के साथ प्रारम्भ किया?
Answer: महात्मा गाँधी ने 12 मार्च, 1930 को दाण्डी मार्च अपने चुने हुए 78 समर्थकों के साथ शुरू किया था। यह मार्च नमक कानून तोड़ने के लिए किया गया था, जो सविनय अवज्ञा आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। इस मार्च ने ब्रिटिश सरकार को चुनौती दी।
In simple words: गाँधीजी ने 12 मार्च, 1930 को 78 लोगों के साथ दाण्डी मार्च शुरू किया था।

🎯 Exam Tip: दाण्डी मार्च ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में जनता की भागीदारी को बढ़ावा दिया और नमक को स्वतंत्रता का प्रतीक बना दिया.

 

Question 15. किस अधिनियम द्वारा प्रान्तों को स्वायत्तता प्रदान की गयी?
Answer: 1935 के अधिनियम द्वारा प्रान्तों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की गयी थी। इस अधिनियम से प्रान्तों में द्वैध शासन को समाप्त कर दिया गया, जिससे प्रांतीय सरकारों को अधिक अधिकार मिले। यह भारत में संवैधानिक विकास की दिशा में एक बड़ा कदम था।
In simple words: 1935 के अधिनियम के द्वारा प्रान्तों को अपने काम खुद करने की आजादी मिली थी।

🎯 Exam Tip: 1935 का भारत सरकार अधिनियम भारतीय संविधान के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बना, जिसने प्रांतीय स्वायत्तता और संघ व्यवस्था की नींव रखी.

RBSE Class 12 History Chapter 6 लघु उत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. राष्ट्रवाद के उदय के कारण बताइए।
Answer: उन्नीसवीं शताब्दी के आखिर में, भारत में राष्ट्रवाद की भावना बढ़ने लगी, जिससे राजनीतिक आंदोलन शुरू हुए। इस भावना के कई कारण थे: अंग्रेजों की शोषणकारी आर्थिक नीतियाँ, प्रशासनिक एकता, यातायात और संचार के साधनों का विकास, प्रेस और साहित्य का प्रभाव, जातीय भेदभाव, पश्चिमी शिक्षा, लॉर्ड लिटन की खराब नीतियां, इल्बर्ट बिल विवाद, और कई संस्थाओं का बनना। इन्हीं कारणों से भारतीयों ने ब्रिटिश शासन से मुक्ति पाने के लिए एक लंबा संघर्ष किया। भारत के लोगों ने इन सभी कारकों के कारण एक साझा पहचान और एकजुटता महसूस करना शुरू कर दिया, जो राष्ट्रवाद की जड़ थी।
In simple words: अंग्रेजों की खराब नीतियों, पश्चिमी शिक्षा और संचार के साधनों के विकास से भारत में राष्ट्रवाद बढ़ा। लोग एकजुट होकर आजादी के लिए लड़ने लगे।

🎯 Exam Tip: राष्ट्रवाद के उदय के कारणों में ब्रिटिश शोषण, पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव, और भारतीय संस्कृति व इतिहास का ज्ञान प्रमुख हैं.

 

Question 2. आर्य समाज की शिक्षाओं को समझाइए।
Answer: आर्य समाज की मुख्य शिक्षाएँ इस प्रकार हैं:
1. सत्य ही ईश्वर का ज्ञान और हर अच्छी बात का मुख्य कारण है।
2. ईश्वर का कोई आकार नहीं है और वह हमेशा खुश रहने वाला है।
3. वेद सभी सच्चे ज्ञान और विद्या के भंडार हैं।
4. हमें हर काम अपनी बुद्धि से सोच-समझकर करना चाहिए, कि क्या सही है और क्या गलत। इससे व्यक्ति सही निर्णय लेने में सक्षम होता है।
5. आर्य समाज का लक्ष्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सुधारों से दुनिया का भला करना है।
6. अज्ञान को खत्म करना और ज्ञान को फैलाना चाहिए।
7. हर व्यक्ति को समाज के सभी लोगों की उन्नति में रुचि लेनी चाहिए।
8. व्यक्तिगत आजादी होनी चाहिए, लेकिन इससे समाज को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए।
In simple words: आर्य समाज सिखाता है कि सत्य ही ईश्वर है, वेद ज्ञान का स्रोत हैं, हमें अपनी बुद्धि से काम लेना चाहिए, और सभी का भला करना चाहिए।

🎯 Exam Tip: आर्य समाज ने 'वेदों की ओर लौट चलो' का नारा दिया और समाज में फैले अंधविश्वासों, मूर्ति पूजा, और जातिवाद का विरोध किया.

 

Question 3. चन्द्रशेखर आजाद के सम्बन्ध में संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भाबंरा गाँव में हुआ था। उनके पिता सीताराम तिवारी और माता जगरानी देवी थीं। वह घर छोड़कर काशी आ गए और संस्कृत विद्यालय में पढ़ने लगे। बनारस में रहते हुए उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया। जब वे पकड़े गए और मजिस्ट्रेट ने उनसे जानकारी माँगी, तो उन्होंने अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'स्वतन्त्रता' और निवास स्थान 'जेल' बताया। उन्हें 4 बेंत की सजा सुनाई गई। बेंत पड़ते समय उन्होंने 'वन्देमातरम्' के नारे लगाए। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें बहुत सराहा गया। आजाद ने काकोरी ट्रेन लूट और साण्डर्स हत्याकाण्ड में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनका जीवन देश के लिए समर्पित था।
In simple words: चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 1906 में हुआ था। वह एक बहादुर क्रांतिकारी थे जिन्होंने असहयोग आंदोलन, काकोरी लूट और साण्डर्स हत्याकाण्ड में भाग लिया। उन्होंने अपना नाम 'आजाद' बताया और देश के लिए जान दी।

🎯 Exam Tip: चन्द्रशेखर आजाद ने 'आजाद' नाम अपनाकर ब्रिटिश राज के खिलाफ अपनी अटूट भावना और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा व्यक्त की, वे एक महान क्रांतिकारी थे.

 

Question 4. संथाल विद्रोह क्या था? समझाइए।
Answer: 1850 ई. के बाद अंग्रेजों के खिलाफ हुए विद्रोहों में संथाल जनजाति का विद्रोह सबसे तेज और महत्वपूर्ण था। भागलपुर से राजमहल तक का इलाका संथालों का था। यह विद्रोह वीरभूम, बांकुरा, सिंहभूम, हजारीबाग, भागलपुर और मुंगेर तक फैल गया। इस विद्रोह का मुख्य कारण अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियाँ थीं। बहुत ज्यादा लगान वसूलना, अंग्रेजी अदालतों में न्याय न मिलना, पुलिस का अत्याचार और महाजनों द्वारा शोषण, तथा कर्ज की समस्या आदि कारणों से संथालों में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा भर गया था। इस विद्रोह में संथालों ने अपनी जमीन और अधिकारों के लिए जमकर लड़ाई लड़ी।
In simple words: संथाल विद्रोह 1850 के बाद अंग्रेजों के खिलाफ संथाल जनजाति का एक बड़ा आंदोलन था। यह अधिक लगान और शोषण के कारण हुआ था।

🎯 Exam Tip: संथाल विद्रोह ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ आदिवासी समुदायों का एक मजबूत प्रतिरोध था, जो उनके अधिकारों और पारंपरिक जीवनशैली की रक्षा के लिए लड़ा गया.

 

Question 5. गदर दल के बारे में आप क्या जानते हैं?
Answer: अमेरिका का पोर्टलैंड शहर भारतीय क्रांतिकारियों की गतिविधियों का मुख्य केंद्र था। सोहन सिंह भखना के नेतृत्व में पोर्टलैंड में 'हिन्दुस्तान एसोसिएशन ऑफ द पैसिफिक कोस्ट' नामक संस्था की स्थापना हुई। इसका मकसद भारत के लोगों के अधिकारों की रक्षा करना और भारत की आजादी के लिए भारतीयों में राजनीतिक चेतना जगाना था। यह संस्था आगे चलकर 'गदर दल' के रूप में सामने आई। गदर आंदोलन चलाने के लिए 1 नवम्बर 1913 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में लाला हरदयाल ने 'गदर दल' का गठन किया। इसके अध्यक्ष सोहन सिंह भखना और मंत्री लाला हरदयाल थे। प्रथम विश्वयुद्ध के समय गदर दल ने इंग्लैंड के दुश्मनों से मिलकर भारत में 21 फरवरी, 1915 को सशस्त्र क्रांति की योजना बनाई। इस दल ने विदेशों में रहते हुए भारत की आजादी के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए।
In simple words: गदर दल की स्थापना सोहन सिंह भखना और लाला हरदयाल ने 1913 में अमेरिका में की थी। इसका मकसद भारत के लोगों के अधिकारों की रक्षा करना और आजादी के लिए जागरूक करना था।

🎯 Exam Tip: गदर दल ने विदेशों में रहते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, खासकर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में.

 

Question 6. अभिनव भारत के बारे में बताइए।
Answer: नासिक में 1899 में गणपति उत्सव मनाने के लिए 'मित्र मेला' संगठन की स्थापना की गई थी। 1904 में इसी 'मित्र मेला' से वीर सावरकर के नेतृत्व में 'अभिनव भारत' नामक एक गुप्त क्रांतिकारी संस्था का जन्म हुआ। इसका उद्देश्य भारत को विदेशी शासन से आजाद कराना था। इस संस्था ने तिलक द्वारा शुरू किए गए गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव के जरिए क्रांतिकारी विचारों को लोगों तक पहुँचाया। अभिनव भारत ने सभाओं और किताबों के जरिए अपने विचारों को फैलाया। यह संस्था नौजवानों को लाठी चलाने, तलवार चलाने, पहाड़ पर चढ़ने, घुड़सवारी करने, दौड़ने आदि की शिक्षा देकर अंग्रेजों से लड़ने के लिए तैयार करने लगी। अभिनव भारत ने बंगाल और भारत की कई अन्य गुप्त क्रांतिकारी संस्थाओं से संबंध स्थापित किए। यह संगठन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण गुप्त संगठन था।
In simple words: अभिनव भारत की स्थापना 1904 में वीर सावरकर ने नासिक में की थी। यह एक गुप्त क्रांतिकारी संस्था थी जिसका मकसद भारत को अंग्रेजों से आजाद कराना था।

🎯 Exam Tip: अभिनव भारत ने युवाओं में देशभक्ति और क्रांति की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष मजबूत हुआ.

 

Question 8. बंगाल - विभाजन पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए। बंगाल-विभाजन क्यों किया गया?
Answer: वायसराय लॉर्ड कर्जन ने राष्ट्रीय आंदोलन के बढ़ने और भारतीयों की एकता से चिंतित होकर 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपनाई। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों में फूट डालने की कोशिश की। इसलिए, लॉर्ड कर्जन ने राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया। लॉर्ड कर्जन ने बंगाल को एक बड़ा प्रांत बताकर प्रशासनिक सुविधा के लिए इसे दो भागों में बांटने की बात कही। बंगाल पूरे देश के राजनीतिक आंदोलन का केंद्र बन रहा था। 16 अक्टूबर, 1905 को यह योजना लागू की गई। बंगाल विभाजन के खिलाफ बढ़ते विरोध के कारण 1911 में यह विभाजन रद्द कर दिया गया। यह विभाजन ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक बड़ी भूल साबित हुआ।
In simple words: लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल को बांट दिया था। इसका मकसद हिंदुओं और मुसलमानों में फूट डालकर राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करना था। विरोध के कारण 1911 में इसे रद्द कर दिया गया।

🎯 Exam Tip: बंगाल विभाजन ब्रिटिश सरकार की 'फूट डालो और राज करो' नीति का प्रमुख उदाहरण था, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को और तेज किया और हिंदू-मुस्लिम एकता को चुनौती दी.

 

Question 9. खिलाफत आन्दोलन क्या था?
Answer: खिलाफत आंदोलन का मुख्य उद्देश्य तुर्की साम्राज्य के बँटवारे का विरोध करना और खलीफा के पद को बचाए रखना था। यह आंदोलन मुख्य रूप से प्रतिक्रियावादी था। तुर्की के सुल्तान को मुस्लिम खलीफा यानी धार्मिक मामलों में प्रमुख मानते थे। प्रधानमंत्री जॉर्ज लॉयड ने भारतीय मुसलमानों को विश्वास दिलाया था कि तुर्की की अखंडता बनी रहेगी, लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध में जीत के बाद ब्रिटेन का तुर्की के प्रति व्यवहार बदल गया। मुस्लिम धार्मिक स्थलों की रक्षा को लेकर चिंतित थे। तुर्की की हार के बाद ब्रिटेन ने विजयी शक्तियों के साथ मिलकर तुर्की साम्राज्य का बँटवारा कर दिया। तुर्की और खलीफा के साथ हुए व्यवहार से भारतीय मुसलमानों में गुस्सा फैल गया। इस आंदोलन ने भारत में मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक रूप से सक्रिय किया।
In simple words: खिलाफत आंदोलन तुर्की के खलीफा के पद को बचाने और तुर्की साम्राज्य के बँटवारे का विरोध करने के लिए था। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजों के बदलते व्यवहार से भारतीय मुसलमान नाराज हो गए थे।

🎯 Exam Tip: खिलाफत आंदोलन ने भारतीय मुसलमानों को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एकजुट किया और इसे असहयोग आंदोलन के साथ जोड़कर राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूत किया गया.

 

Question 10. 1919 के अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
Answer: 1919 के अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
3. केन्द्र और प्रान्तों के बीच शक्तियों को बाँटा गया था। केन्द्र के पास रक्षा, विदेश नीति, रेलवे संचार, सार्वजनिक ऋण जैसे विषय थे। प्रान्तों के पास स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस आदि विषय थे।
4. इस अधिनियम द्वारा पहली बार दो सदनों वाली विधायिका की व्यवस्था की गई थी।
5. प्रांतीय विधान सभाओं में सांप्रदायिक आधार पर अलग से चुनाव प्रणाली का विस्तार किया गया था। यह अधिनियम भारत में संवैधानिक सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
In simple words: 1919 के अधिनियम ने केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियां बांटीं, पहली बार दो सदन बनाए, और प्रांतीय विधानसभाओं में अलग चुनाव का तरीका बढ़ाया।

🎯 Exam Tip: 1919 का अधिनियम (मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) ने प्रांतीय प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी को बढ़ाया और भारत के संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

 

Question 11. स्वराज्य पार्टी के बारे में आप क्या जानते हैं?
Answer: असहयोग आंदोलन के रुकने के बाद कांग्रेस में आगे के कार्यक्रम को लेकर मतभेद हो गया था। 1919 के अधिनियम के तहत विधान मंडलों के चुनाव में भाग लेने के सवाल पर भी अलग-अलग राय थी। सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू जैसे नेताओं का मानना था कि बदलती हुई राजनीतिक स्थिति में कांग्रेस को कौंसिल के चुनावों में हिस्सा लेना चाहिए। उनका विचार था कि कौंसिल में प्रवेश कर सरकार का विरोध करने की नीति अपनानी चाहिए। इन नेताओं को परिवर्तनवादी कहा गया। परिवर्तनवादियों ने मार्च, 1923 में इलाहाबाद में अपने समर्थकों का एक बड़ा सम्मेलन बुलाया और 'स्वराज्य दल' की स्थापना की। इसके अध्यक्ष चितरंजनदास और सचिव मोतीलाल नेहरू थे। यह तय किया गया कि केंद्रीय विधान सभा और प्रांतीय विधान परिषदों में प्रवेश कर ब्रिटिश सरकार पर राष्ट्रीय मांगों को पूरा करने के लिए दबाव डाला जाएगा। यह पार्टी भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
In simple words: असहयोग आंदोलन के बाद सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने 1923 में स्वराज्य पार्टी बनाई। वे चुनाव लड़कर कौंसिल में शामिल होना चाहते थे ताकि अंदर रहकर सरकार का विरोध कर सकें।

🎯 Exam Tip: स्वराज्य पार्टी का गठन कांग्रेस के भीतर राजनीतिक भागीदारी और विधायिका के माध्यम से संघर्ष करने की रणनीति का एक उदाहरण था, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में एक नया आयाम जोड़ा.

 

Question 12. गाँधी - इरविन समझौता का उल्लेख कीजिए।
Answer: लंबी बातचीत के बाद 5 मार्च, 1931 को गाँधी-इरविन समझौता हुआ था। पहली बार कांग्रेस और सरकार को एक बराबर स्तर पर रखा गया। इस समझौते को 'दिल्ली पैक्ट' भी कहते हैं। इस समझौते के तहत ब्रिटिश सरकार ने हिंसात्मक गतिविधियों में शामिल बंदियों के अलावा सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने और उनकी जब्त की गई संपत्ति को वापस करने की बात मान ली। सरकार ने तटीय इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों को घरेलू इस्तेमाल के लिए नमक बनाने का अधिकार भी दिया। जिन सरकारी कर्मचारियों ने इस्तीफा दिया था, उनके साथ नरमी बरतने की बात सरकार ने मानी। भारतीयों को शांतिपूर्ण धरना देने का अधिकार भी दिया गया। इन आश्वासनों के बदले कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को समाप्त करने की शर्त मान ली। यह समझौता भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
In simple words: गाँधी-इरविन समझौता 5 मार्च, 1931 को हुआ। इसमें सरकार ने राजनीतिक बंदियों को रिहा करने और नमक बनाने की छूट दी। बदले में कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन रोक दिया।

🎯 Exam Tip: गाँधी-इरविन समझौता सविनय अवज्ञा आंदोलन की समाप्ति और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया, जो एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विकास था.

 

Question 13. माउण्टबेटन योजना की विशेषताएँ बताइए।
Answer: माउण्टबेटन योजना की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
3. भारत के विभाजन से पहले पंजाब और बंगाल के सीमांकन का फैसला होगा। बंगाल और पंजाब के हिंदू और मुस्लिम बहुसंख्यक जिलों के प्रांतीय विधान सभा के सदस्यों की अलग-अलग बैठक बुलाई जाएगी।
4. उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह द्वारा यह तय किया जाएगा कि वे किसके साथ रहना चाहते हैं।
5. देशी रियासतों को यह तय करने का अधिकार होगा कि वे किसके साथ शामिल हों। इस योजना ने भारत को आजादी दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया लेकिन विभाजन की दुखद सच्चाई भी साथ लाई।
In simple words: माउण्टबेटन योजना ने भारत के विभाजन, पंजाब और बंगाल के सीमांकन, जनमत संग्रह और देशी रियासतों के भविष्य का फैसला किया था।

🎯 Exam Tip: माउण्टबेटन योजना ने भारत और पाकिस्तान के विभाजन की रूपरेखा तैयार की, जिसने भारत की स्वतंत्रता के साथ-साथ उपमहाद्वीप के इतिहास को भी बदल दिया.

 

Question 14. 1935 के अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
Answer: 1935 के अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ ये थीं:
1. 1919 के अधिनियम द्वारा प्रान्तों में स्थापित द्वैध शासन को खत्म कर दिया गया।
2. प्रान्तों में दो सदनों वाली विधायिका बनाई गई थी, जिसमें एक ऊपरी सदन विधान परिषद् और एक निचला सदन विधान सभा था।
3. एक 'अखिल भारतीय संघ' बनाने का प्रावधान भी किया गया था।
4. केन्द्र में भी द्वैध शासन की व्यवस्था की गई।
5. इस अधिनियम द्वारा सभी विषयों को तीन सूचियों में बांटा गया - संघ सूची, प्रान्त सूची और समवर्ती सूची।
6. एक संघीय न्यायालय की स्थापना की गई थी।
7. इस अधिनियम द्वारा 1858 के अधिनियम द्वारा स्थापित इण्डिया कौंसिल को समाप्त कर दिया गया।
8. सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार किया गया।
9. एक केंद्रीय बैंक का प्रावधान किया गया था, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक कहा गया। यह अधिनियम भारतीय संविधान के लिए एक महत्वपूर्ण आधार साबित हुआ।
In simple words: 1935 के अधिनियम ने प्रांतों से द्वैध शासन हटाकर केंद्र में लगाया, अखिल भारतीय संघ बनाया, विषयों को तीन सूचियों में बांटा, एक संघीय न्यायालय और रिजर्व बैंक स्थापित किया।

🎯 Exam Tip: 1935 का अधिनियम भारतीय संविधान के कई प्रावधानों का आधार बना, जैसे संघीय ढाँचा और शक्तियों का विभाजन, जो स्वतंत्रता के बाद भारत के शासन के लिए महत्वपूर्ण थे.

RBSE Class 12 History Chapter 6 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. स्वामी विवेकानन्द के विचारों का वर्णन कीजिए। राष्ट्रीय जागृति में उनके योगदान को बताइए।
Answer:
1. जीवन-परिचय:
रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त और माता भुवनेश्वरी देवी थीं। स्वामी विवेकानन्द कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातक थे। स्वामी विवेकानन्द अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक जिज्ञासा के कारण रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए। रामकृष्ण परमहंस कलकत्ता में दक्षिणेश्वर मंदिर के पुजारी थे। रामकृष्ण की हिन्दू धर्म में गहरी आस्था थी। वे ईश्वर की प्राप्ति के लिए नि:स्वार्थ भक्ति भावना पर जोर देते थे। वे सभी धर्मों की मौलिक एकता में विश्वास करते थे। रामकृष्ण परमहंस के विचारों से विवेकानन्द बहुत प्रभावित हुए। 1886 में रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानन्द ने संन्यास ग्रहण कर लिया। उन्होंने अपने भाषणों से भारत की बौद्धिक, आध्यात्मिक और धार्मिक समृद्धि को पूरी दुनिया के सामने रखा। उनके संबंध में न्यूयार्क हैरल्ड ने लिखा कि शिकागो धर्म सम्मेलन में विवेकानन्द सबसे अच्छे व्यक्ति थे। उनके भाषण सुनकर लगता है कि भारत जैसे विकसित राष्ट्र में ईसाई प्रचारकों को भेजना मूर्खता है। विवेकानन्द ने इसके बाद अमेरिका और इंग्लैंड का दौरा कर हिन्दू धर्म और संस्कृति का प्रचार किया। 1896 में न्यूयार्क में 'वेदान्त सोसाइटी' की स्थापना की।

3. रामकृष्ण मिशन की स्थापना:
5 मई, 1897 में स्वामी विवेकानन्द ने वेलूर में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम पर की। इसकी शाखाएँ भारत के कई हिस्सों और विदेशों में खोली गईं। स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन के माध्यम से अपने विचारों का प्रचार किया। रामकृष्ण मिशन की शिक्षाएँ मुख्य रूप से वेदान्त - दर्शन पर आधारित हैं। इस मिशन ने समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया।

विवेकानन्द के सामाजिक विचार एवं कार्य:
विवेकानन्द ने तत्कालीन भारतीय समाज में फैली संकीर्णताओं और बुराइयों का विरोध किया। उन्होंने जातीय भेदभावों का विरोध किया और समानता की बात कही। उनका मानना था कि सामाजिक-धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं को तभी स्वीकार करना चाहिए जब वे सही लगें। उन्होंने स्त्री उत्थान की बात कही। वे गरीबी और अज्ञानता को खत्म करना चाहते थे। उन्होंने कहा, "जब तक करोड़ों लोग भूखे और अज्ञानी हैं तब तक मैं हर उस व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूँ जो उन्हीं के खर्चे पर शिक्षा पाता है लेकिन उनकी परवाह नहीं करता।" विवेकानन्द के विचारों को सफल बनाने के लिए रामकृष्ण मिशन ने समाज सेवा और परोपकार के कामों को बहुत महत्व दिया। अपने कामों में मानवतावादी सोच के कारण रामकृष्ण मिशन बहुत लोकप्रिय हुआ। रामकृष्ण मिशन ने कई विद्यालय, अनाथालय, चिकित्सालय आदि स्थापित किए और इनके माध्यम से समाज सेवा के कार्य किए। अकाल, बाढ़ जैसी आपदाओं के समय रामकृष्ण मिशन ने सहायता करके लोगों को समाज सेवा की प्रेरणा दी।

1. विवेकानन्द के धार्मिक विचार:
स्वामी विवेकानन्द हिन्दू धर्म और दर्शन में गहरी आस्था रखते थे। उन्होंने हिन्दू धर्म और संस्कृति की मौलिकता और इसकी विशेषताओं को लोगों के सामने रखा। उन्होंने मनुष्य की आत्मा को ईश्वर का अंश बताया। उनका मानना था कि ईश्वर की पूजा का एक रूप गरीब और दुखी लोगों की सेवा भी है। रामकृष्ण मिशन ने मानव सेवा को ईश्वर की सेवा माना है। 'नर सेवा नारायण सेवा' उनका मुख्य वाक्य है। इस विचार ने लोगों को कर्मयोगी बनने की प्रेरणा दी।

2. स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्रीय दृष्टिकोण:
स्वामी विवेकानन्द ने राष्ट्रीयता की भावना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विवेकानन्द और रामकृष्ण मिशन ने भारतीयों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बढ़ाया। इसी भावना ने युवाओं को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ओर प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य का साहस और वीरता उसे गलत रास्ते से दूर रखेगी। विवेकानन्द ने खेतड़ी के महाराजा को लिखा "हर काम को तीन अवस्थाओं से गुजरना होता है: उपहास, विरोध और स्वीकृति। जो व्यक्ति अपने समय से आगे सोचता है, लोग उसे गलत समझते हैं। इसलिए विरोध और अत्याचार को हमें खुशी से स्वीकार करना चाहिए, लेकिन मुझे दृढ़ और पवित्र रहना चाहिए और भगवान में असीमित विश्वास रखना चाहिए, तभी ये सब खत्म हो जाएँगे।"

स्वामी विवेकानन्द का मूल्यांकन:
स्वामी विवेकानन्द एक महान दार्शनिक और धर्मोपदेशक थे। उन्होंने सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में हिन्दू धर्म का महत्व बताया और हिन्दू धर्म तथा संस्कृति के गौरव को चरम सीमा पर पहुँचाया। उन्होंने पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों को जोड़ने की कोशिश की। इस संबंध में रवीन्द्रनाथ टैगोर का कहना है कि अगर कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकानन्द को पढ़ना चाहिए। एस.एन. नटराजन के अनुसार, "विवेकानन्द ने अपना जीवन भारत के करोड़ों पीड़ित लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। वह राष्ट्र का पुनर्निर्माण करना चाहते थे।" श्री रामधारी सिंह दिनकर का कथन है कि "स्वामी विवेकानन्द ने अपनी वाणी और कर्म से भारतीयों में यह अभिमान जगाया कि हम बहुत पुरानी सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं। हमारे धार्मिक ग्रंथ सबसे उन्नत और इतिहास सबसे पुराना और महान है। हमारा धर्म ऐसा है जो विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है और विश्व के सभी धर्मों का सार होते हुए भी उन सबसे कुछ और अधिक है। स्वामी जी के प्रचार से हिंदुओं में यह विश्वास पैदा हुआ कि उन्हें किसी के सामने सिर झुकाने की जरूरत नहीं है। भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रीयता पहले आई, राजनीतिक राष्ट्रीयता बाद में जन्मी है और इस सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के पिता विवेकानन्द थे।" विवेकानन्द ने भारतीय युवाओं में आत्मविश्वास और राष्ट्रप्रेम की भावना जगाई, जिससे स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई ऊर्जा मिली।
In simple words: स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म को विश्व में फैलाया। उन्होंने समाज सुधार, शिक्षा और मानवता की सेवा पर जोर दिया, जिससे राष्ट्रीय जागृति आई। उन्होंने युवाओं को आजादी के लिए प्रेरित किया।

🎯 Exam Tip: स्वामी विवेकानन्द का योगदान सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना जगाने में भी महत्वपूर्ण था, उनके विचार आज भी युवाओं को प्रेरित करते हैं.

 

Question 2. राजा राममोहन राय के सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र में किए गए कार्यों का वर्णन कीजिए।
Answer:
भूमिकः
उन्नीसवीं सदी में सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन बंगाल में राजा राममोहन राय के नेतृत्व में शुरू हुआ। राजा राममोहन राय को बंगाल में नई चेतना और क्रांति का अग्रदूत, भारत में नवजागरण का अग्रदूत, सुधार आंदोलनों का प्रवर्तक और आधुनिक भारत का पहला नेता कहा गया। उनकी हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों और दर्शन में गहरी आस्था थी। वे समय के साथ हिन्दू धर्म और समाज में आए आडंबरों को खत्म करना चाहते थे। वैज्ञानिक सोच, मानव सम्मान, सामाजिक समानता आदि विचारों को अपनाकर वे भारत का सामाजिक - सांस्कृतिक, राजनीतिक और धार्मिक पुनरुत्थान करना चाहते थे। राजा राममोहन राय का जन्म बंगाल के राधा नगर में एक ब्राह्मण जमींदार परिवार में हुआ। उन्होंने हिन्दू, इस्लाम, ईसाई आदि धर्मों और उनके महत्वपूर्ण ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। वे अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, लैटिन, हिब्रू आदि कई भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने कलकत्ता में 'ब्रह्म सभा' की स्थापना कर अपने विचारों का प्रचार किया। यही 'ब्रह्म सभा' आगे चलकर 'ब्रह्म समाज' कहलाई।

राजा राममोहन राय के सामाजिक सुधार:
राजा राममोहन राय और उनके ब्रह्म समाज ने भारतीय समाज में फैली कई कुरीतियों का विरोध किया। राजा राममोहन राय ने पुराने धार्मिक ग्रंथों के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की कि कई सामाजिक रूढ़ियाँ मूल हिन्दू धर्म के खिलाफ हैं। उन्होंने जाति-प्रथा, अस्पृश्यता, सती - प्रथा, बहु - विवाह, बाल विवाह, परदा - प्रथा आदि का विरोध किया। उन्होंने सती - प्रथा को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों के आधार पर प्रमाणित किया कि सती-प्रथा को धार्मिक मान्यता नहीं थी और यह कभी भी हिन्दू समाज में एक प्रथा के रूप में नहीं रही। उन्होंने कहा कि मानव की बुद्धि भी इस प्रथा का समर्थन नहीं कर सकती। राजा राममोहन राय ने पत्र - पत्रिकाओं के जरिए सती - प्रथा के खिलाफ जनमत तैयार किया। राजा राममोहन राय के प्रयासों से ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिंक के समय 1829 में कानून बनाकर सती - प्रथा पर रोक लगा दी गई। न्यायालयों को आदेश दिए गए कि ऐसे मामलों में मानव हत्या के अनुसार मुकदमा चले और दंड दिया जाए। शुरू में यह नियम केवल बंगाल के लिए था। 1830 में इसे बम्बई और मद्रास में भी लागू किया गया। राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज ने सामाजिक कुरीतियों का विरोध करते हुए स्त्रियों की स्थिति में सुधार के लिए विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। उन्होंने स्त्रियों को आर्थिक अधिकार देने की बात की। स्त्री शिक्षा के प्रयास किए। ब्रह्म समाज ने बालिका विद्यालय की नींव डाली। इन सुधारों ने भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने में मदद की।

राजा राममोहन राय के धार्मिक सुधार:
उन्होंने ईसाई धर्म में फैले अंधविश्वासों की भी आलोचना की। राजा राममोहन राय विश्व के मत - पंथों की मौलिक एकता में विश्वास करते थे। ब्रह्म समाज ने राजा राममोहन राय के एकेश्वरवाद और मूर्ति पूजा में अंधविश्वास की मान्यताओं का प्रचार किया। इस प्रकार उन्होंने एक ऐसे धर्म की वकालत की जो तर्क और मानवता पर आधारित था।
In simple words: राजा राममोहन राय ने बंगाल में समाज सुधार आंदोलन शुरू किया। उन्होंने सती-प्रथा, जातिवाद और बाल विवाह जैसी कुरीतियों का विरोध किया। उन्होंने ब्रह्म समाज बनाया और धार्मिक एकता और आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिया।

🎯 Exam Tip: राजा राममोहन राय को 'आधुनिक भारत का जनक' कहा जाता है क्योंकि उन्होंने सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक सुधारों के माध्यम से भारतीय समाज में एक नई दिशा प्रदान की.

 

Question 3. आजाद हिन्द फौज का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान बताइए।
Answer: द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान दिसंबर 1941 में जापान ने उत्तरी मलाया में ब्रिटिश सेना को हरा दिया। इसके बाद, कैप्टन मोहन सिंह ने आजाद हिन्द फौज बनाने का विचार किया। जापानी मेजर फूजीहारा ने भारतीय युद्ध बंदियों को कैप्टन मोहन सिंह को सौंप दिया, जिनकी संख्या लगभग चालीस हजार थी। 1 सितंबर 1942 को भारतीय युद्ध बंदियों और पूर्व एशिया के नागरिकों को मिलाकर 'आजाद हिन्द फौज' की स्थापना की गई। यह संगठन भारत की आज़ादी के लिए लड़ने वाले भारतीयों का एक बड़ा प्रयास था।
रास बिहारी बोस के बुलावे पर सुभाष चंद्र बोस जर्मनी से पनडुब्बी द्वारा जापान पहुंचे। जून 1943 में सुभाष चंद्र बोस टोक्यो पहुंचे और वहां के रेडियो पर ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की घोषणा की। बाद में रास बिहारी बोस ने पूर्व एशिया में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया।
सुभाष चंद्र बोस 'भारतीय स्वतंत्रता लीग' के अध्यक्ष बने। 21 अक्टूबर 1943 को उन्होंने सिंगापुर में 'अस्थायी भारतीय सरकार' बनाने की घोषणा की। जापान, जर्मनी, इटली और बर्मा सहित कई देशों ने इस सरकार को मान्यता दी। सुभाष चंद्र बोस ने जापानी सेनाध्यक्ष को भारत-बर्मा सीमा पर ब्रिटिश सेना के खिलाफ आजाद हिन्द फौज के साथ मिलकर लड़ने के लिए राजी किया।
सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के सैनिकों को 'दिल्ली चलो' का नारा दिया। उन्होंने 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' भी कहा। उन्होंने महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता' कहा और रेडियो पर उनसे भारत की आजादी के आखिरी युद्ध के लिए आशीर्वाद मांगा। आजाद हिन्द फौज के मुख्य कार्यालय रंगून और सिंगापुर में थे। गांधी, सुभाष और नेहरू ब्रिगेड बनाई गईं। 'झांसी रानी रेजिमेंट' के नाम से महिलाओं का एक दल भी बनाया गया।
अंडमान और निकोबार द्वीपों पर कब्जा करने के बाद, आजाद हिन्द की अस्थायी सरकार ने अंडमान का नाम 'शहीद द्वीप' और निकोबार का नाम 'स्वराज द्वीप' रखा। वहां भारतीय झंडा फहराया गया।
जापान के हारने के बाद आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों और सैनिकों को युद्ध बंदी बनाकर भारत लाया गया। शाहनवाज खान, गुरुदयाल सिंह ढिल्लों और कर्नल सहगल पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चलाया गया। देश भर में इन अधिकारियों और सैनिकों की रिहाई के लिए आंदोलन हुआ।
भूलाभाई देसाई, तेज बहादुर सप्रू, कैलाश नाथ काटजू, आसफ अली और जवाहरलाल नेहरू जैसे वकीलों ने उनका बचाव किया। सैन्य अदालत ने इन अधिकारियों को मौत की सजा सुनाई, लेकिन पूरे देश में जन आंदोलन के कारण, तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवल ने अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करके उनकी सजा माफ कर दी।
आजाद हिन्द फौज के त्याग और बलिदान ने भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की भावना को बहुत मजबूत किया। अब लोग जल्द आजादी पाना चाहते थे। आजाद हिन्द फौज के सैनिकों को बचाने के लिए चलाए गए आंदोलन में समाज के कई वर्ग शामिल हुए। राजनीतिक दलों के साथ व्यवसायी, भारतीय ब्रिटिश सैनिक और युवा भी बड़ी संख्या में उनके बचाव के पक्ष में आ गए। छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार करना शुरू कर दिया।
व्यवसायियों ने अपनी दुकानें बंद कर दीं। इसका प्रभाव ब्रिटिश नौ-सेना और थल सेना पर भी पड़ा। फरवरी 1946 में बंबई की नौ-सेना के विद्रोहियों ने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों को छोड़ने की मांग की। खुफिया ब्यूरो के निदेशक ने आजाद हिन्द फौज के सैनिकों की रिहाई के लिए चल रहे आंदोलन के बारे में कहा, "शायद ही कोई और मुद्दा हो जिसमें भारतीय जनता ने इतनी दिलचस्पी दिखाई हो और यह कहना गलत नहीं होगा कि जिसे इतनी व्यापक सहानुभूति मिली हो।"
In simple words: आजाद हिन्द फौज ने जापानियों की मदद से ब्रिटिश शासन के खिलाफ युद्ध लड़ा। सुभाष चंद्र बोस ने इसका नेतृत्व किया और 'दिल्ली चलो' तथा 'तुम मुझे खून दो' जैसे नारे दिए। इस फौज के बलिदान से भारतीयों में आजादी की भावना बहुत बढ़ गई।

🎯 Exam Tip: आजाद हिन्द फौज के गठन, सुभाष चंद्र बोस की भूमिका, और उनके 'दिल्ली चलो' जैसे नारों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. असहयोग आन्दोलन के उदय के कारण, इसके प्रमुख कार्यक्रम एवं महत्व को समझाइए।
Answer: असहयोग आंदोलन (1920-1922 ई.) भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
असहयोग आंदोलन के उदय के कारण निम्नलिखित थे:
1. प्रथम विश्वयुद्ध का प्रभाव: प्रथम विश्वयुद्ध के बाद देश में आर्थिक संकट बढ़ गया था। कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति में कमी से लोगों में गुस्सा था।
2. 1917 की रूसी क्रांति: 1917 की रूसी क्रांति ने भारतीयों को दिखाया कि आम जनता अपनी शक्ति और साहस के दम पर अपने अधिकार प्राप्त कर सकती है। इस क्रांति ने भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरणा दी।
3. 1919 का अधिनियम: मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के तहत 1919 के अधिनियम द्वारा भारत में द्वैध शासन प्रणाली लागू की गई। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इसे अपर्याप्त और निराशाजनक बताया, जिससे कांग्रेस नेताओं में फूट पड़ गई और गांधीजी को छोड़कर बाकी उदारवादी नेता कांग्रेस से अलग हो गए।
4. रौलट एक्ट: सर सिडनी रौलट एक्ट के तहत सरकार को बिना मुकदमा चलाए किसी को भी गिरफ्तार करने और जमानत से इनकार करने का अधिकार मिल गया। इस कानून ने अपील, वकील या दलील का अधिकार समाप्त कर दिया।
5. जलियांवाला बाग हत्याकांड: 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर में जलियांवाला बाग में एक सभा के दौरान जनरल डायर ने निहत्थे भारतीयों पर गोली चलाने का आदेश दिया। इस हत्याकांड में 379 लोग मारे गए, और इसने भारतीयों के दिलों में गुस्से की आग और तेज कर दी।
6. खिलाफत आंदोलन: प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों ने वादा किया था कि वे तुर्की साम्राज्य और उसके पवित्र स्थलों की रक्षा करेंगे। लेकिन युद्ध के बाद तुर्की को अपमानजनक शर्तें मानने पर मजबूर किया गया, जिससे तुर्की साम्राज्य बिखर गया। अंग्रेजों ने भारतीय मुसलमानों के साथ विश्वासघात किया, जिससे खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ और कांग्रेस ने गांधीजी के नेतृत्व में इसका समर्थन किया।

गांधीजी ने कांग्रेस और खिलाफत समिति की मांगों को एक साथ मिला दिया। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह जलियांवाला बाग हत्याकांड पर खेद व्यक्त करे, तुर्की के प्रति नम्र व्यवहार करे और भारतीयों को संतुष्ट करने के लिए नई योजनाएं प्रस्तुत करे। सरकार को चेतावनी दी गई कि यदि मांगें स्वीकार नहीं की गईं, तो असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया जाएगा। सरकार ने इन मांगों पर ध्यान नहीं दिया, और गांधीजी ने 1 अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया।

**असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम:**
1. सरकारी उपाधियों और अवैतनिक पदों का त्याग करना।
2. सरकारी और अर्ध-सरकारी उत्सवों का बहिष्कार करना।
3. सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार करना।
4. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना।
5. सरकारी नौकरी से त्याग-पत्र देना और करों का भुगतान करने से इनकार करना।

**रचनात्मक कार्य:**
राष्ट्रीय स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना की गई। झगड़ों को सुलझाने के लिए पंचायतें बनाई गईं। चरखों द्वारा निर्मित स्वदेशी कपड़ों को बढ़ावा दिया गया। हाथ से कताई और बुनाई को प्रोत्साहित किया गया। शराबबंदी लागू की गई और हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया गया। अस्पृश्यता को खत्म करने का प्रयास किया गया।

**असहयोग आंदोलन की प्रगति:**
गांधीजी का मानना था कि यदि इन सभी कार्यक्रमों को पूरी तरह से लागू किया जाए तो एक साल में स्वराज मिल जाएगा। महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार से मिली 'केसर-ए-हिंद' की उपाधि छोड़ दी। जमनालाल बजाज ने 'रायबहादुर' की उपाधि त्याग दी। गांधीजी से प्रेरणा पाकर कई लोगों ने अपनी पदवियां और उपाधियां छोड़ दीं। मोतीलाल नेहरू, चितरंजन दास, राजेंद्र प्रसाद जैसे कई नेताओं ने वकालत छोड़ दी। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गईं।
काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय जैसे कई राष्ट्रीय स्कूल और कॉलेज खोले गए। 17 नवंबर 1921 को ब्रिटिश युवराज प्रिंस ऑफ वेल्स मुंबई पहुंचे। उनके स्वागत के लिए तैयारियां की गई थीं, लेकिन मुंबई की जनता ने इसका विरोध किया और जुलूस निकाला। मजदूरों ने कारखाने बंद कर हड़ताल की। प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें कई लोग मारे गए। 1921 में 396 हड़तालें हुईं, जिनमें छह लाख श्रमिक शामिल हुए।
मोतीलाल नेहरू, चितरंजन दास, लाला लाजपत राय और मुहम्मद अली जैसे कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। गांधीजी तब तक गिरफ्तार नहीं हुए थे। ब्रिटिश सरकार ने मदनमोहन मालवीय और मुहम्मद अली जिन्ना के माध्यम से बातचीत करने का प्रयास किया, लेकिन समझौता नहीं हो पाया।

**1. अहमदाबाद कांग्रेस सम्मेलन:**
दिसंबर 1921 में अहमदाबाद में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ। इसमें देशबंधु चितरंजन दास को अध्यक्ष चुना गया, लेकिन उनके जेल में होने के कारण हकीम अजमल खां ने यह पद संभाला। सरोजिनी नायडू ने चितरंजन दास का भाषण पढ़ा। इस सम्मेलन में आंदोलन को जारी रखने का निर्णय लिया गया।
5 फरवरी 1922 को शांतिपूर्ण जुलूस को पुलिस ने दबाना चाहा, जिससे भीड़ उत्तेजित हो गई और पुलिस चौकी को घेर कर आग लगा दी। इसमें एक थानेदार और इक्कीस सिपाही मारे गए। गांधीजी ने इस घटना के कारण असहयोग आंदोलन को बंद करने का निर्णय लिया। 12 फरवरी 1922 को बारदोली में कांग्रेस कमेटी की बैठक में गांधीजी ने आंदोलन को स्थगित करने की घोषणा की।
जेल में बंद लाला लाजपत राय, चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने गांधीजी के इस निर्णय का विरोध करते हुए पत्र लिखे। सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू भी गांधीजी के इस निर्णय से दुखी हुए। आंदोलन समाप्त होने पर भी अंग्रेजों का दमन कम नहीं हुआ। 10 मार्च 1922 को महात्मा गांधी को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। गांधीजी को छह साल की जेल की सजा दी गई, लेकिन उन्हें फरवरी 1924 में जेल से रिहा कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान खादी को बढ़ावा देने और छुआछूत को समाप्त करने आदि में लगाया।

**3. असहयोग आंदोलन का महत्व:**
भारत के स्वाधीनता संग्राम में असहयोग आंदोलन का विशेष महत्व है। इस आंदोलन की आलोचना इस आधार पर की जाती है कि यह स्वराज प्राप्त करने में सफल नहीं हो सका, गांधीजी का एक वर्ष में स्वराज का वादा पूरा नहीं हुआ, खिलाफत का प्रश्न भी खत्म नहीं हुआ, और हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने में भी यह आंदोलन सफल नहीं हुआ। इसके विपरीत, सांप्रदायिक भावना को बढ़ावा मिला। पंजाब में हुए अत्याचारों का भी निवारण नहीं हुआ।
इस आंदोलन के रचनात्मक कार्यों को सफलता मिली। राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना हुई, चरखा चलाना और खादी तैयार करना, तथा स्वदेशी वस्तुओं को अपनाना जैसे महत्वपूर्ण कार्य हुए। इस आंदोलन ने कांग्रेस को नई दिशा दी और इसे एक जन-आंदोलन का रूप दिया। इसने भारतीयों में स्वराज की प्राप्ति की प्रबल इच्छा जगाई और ब्रिटिश सरकार को चुनौती देने के लिए जनता को संगठित किया।
In simple words: असहयोग आंदोलन प्रथम विश्व युद्ध के बाद की समस्याओं, रौलट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड के कारण शुरू हुआ। इसके कार्यक्रमों में सरकारी उपाधियों और संस्थानों का बहिष्कार तथा रचनात्मक कार्य शामिल थे। इसने राष्ट्रीय चेतना बढ़ाई, लोगों को एकजुट किया, और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया।

🎯 Exam Tip: असहयोग आंदोलन के कारणों (रौलट एक्ट, जलियांवाला बाग), कार्यक्रमों (बहिष्कार, स्वदेशी) और चौरी-चौरा घटना के बाद इसके स्थगन को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 5. सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कार्यक्रम एवं महत्व को बताइए।
Answer: 1930 ई. में शुरू हुआ सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक बहुत महत्वपूर्ण आंदोलन था। 1828 ई. की नेहरू रिपोर्ट को ब्रिटिश सरकार ने अस्वीकार कर दिया था और औपनिवेशिक स्वराज नहीं दिया था, जिससे भारतीय नेताओं में असंतोष बढ़ गया था। कांग्रेस के दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' के लक्ष्य की घोषणा के बाद भारतीयों में आशा और उत्साह भर गया। महात्मा गांधी ने अपने पत्र 'यंग इंडिया' के माध्यम से वायसराय लॉर्ड इरविन के सामने ग्यारह सूत्री मांगें रखीं।
इन मांगों को ब्रिटिश सरकार ने नहीं माना, जिसके बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का फैसला किया गया। इन मांगों में लगान में कमी, सैन्य खर्च में कमी, नमक कर खत्म करना, रुपये की विनिमय दर घटाना, विदेशी कपड़ों के आयात पर नियंत्रण, नशीली वस्तुओं की बिक्री बंद करना और राजनीतिक कैदियों को रिहा करना शामिल था।

**सविनय अवज्ञा आंदोलन का कार्यक्रम:**
महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को अपने चुने हुए 78 समर्थकों के साथ 24 दिनों की दांडी यात्रा शुरू की और 6 अप्रैल 1930 को समुद्र तट पर मुट्ठी भर नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा। नमक कानून तोड़ना इस बात का प्रतीक था कि भारतीय अब ब्रिटिश कानूनों को मानने को तैयार नहीं थे। देश के कई हिस्सों में नमक कानून तोड़ा गया। सुभाष चंद्र बोस ने गांधीजी की इस पदयात्रा की तुलना नेपोलियन की एल्बा से पेरिस मार्च से की थी।
इस आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रमों में नमक कानून का उल्लंघन करना और खुद नमक बनाना, महिलाओं द्वारा शराब, अफीम और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना देना, सूत कातना, विदेशी वाहनों की होली जलाना, छात्रों द्वारा सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़ना, सरकारी सेवाओं से इस्तीफा देना और छुआछूत त्यागना आदि शामिल थे।
इस आंदोलन में प्रदर्शन, हड़ताल, बहिष्कार और धरने आदि में युवाओं, महिलाओं, किसानों और मजदूरों ने बड़ी संख्या में सक्रिय भागीदारी निभाई। महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू सहित हजारों सत्याग्रही गिरफ्तार हुए। महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य भारत में वन नियमों का उल्लंघन किया गया। बिहार में लोगों ने चौकीदारी कर देने से मना कर दिया। उत्तर प्रदेश में लगान देने का आंदोलन चलाया गया। चंद्र सिंह गढ़वाली की अपील पर सैनिकों ने पेशावर के आंदोलनकारियों पर गोली चलाने से मना कर देश-प्रेम दिखाया।
शोलापुर में आंदोलनकारियों ने कई अंग्रेजी संस्थानों को जलाकर राष्ट्रीय ध्वज फहराया। यहां आंदोलनकारियों ने ब्रिटिश राज समाप्त कर प्रशासन की बागडोर अपने हाथ में लेकर एक प्रकार से समानांतर सरकार स्थापित कर ली। शोलापुर शहर लगभग एक सप्ताह तक आंदोलनकारियों के हाथों में रहा। पूर्वोत्तर सीमांत क्षेत्र में नागाओं ने यदुनांग के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन किया। यदुनांग को फांसी दी गई। उसके बाद नागरानी गैडनल्यु (गिडालू) के नेतृत्व में विद्रोह हुआ। उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई। मुस्लिमों की भागीदारी 1920 के असहयोग आंदोलन की तुलना में कम थी, फिर भी पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के अब्दुल गफ्फार खान के संगठन 'खुदाई खिदमतगार' ने इस आंदोलन में प्रमुख भागीदारी निभाई।
ब्रिटिश सरकार के भारी दमन के बाद भी यह जन-आंदोलन फैलता चला गया। इसी बीच भारतीय संवैधानिक सुधारों पर विचार करने के लिए लंदन में नवंबर 1930 में प्रथम गोलमेज सम्मेलन शुरू हुआ। कांग्रेस ने इस सम्मेलन में भाग नहीं लिया। ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस से बात करने के उद्देश्य से गांधीजी सहित कांग्रेस के नेताओं को 26 जनवरी 1931 को रिहा कर दिया।

**1. गांधी-इरविन समझौता (मार्च, 1931 ई.):**
लंबी बातचीत के बाद 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता हुआ। पहली बार कांग्रेस और सरकार को समानता के स्तर पर बातचीत करने का मौका मिला। इसे 'दिल्ली पैक्ट' भी कहा जाता है। गांधी-इरविन समझौते के तहत ब्रिटिश सरकार ने हिंसक कार्यों में शामिल कैदियों के अलावा सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने और उनकी जब्त की गई संपत्ति को वापस करने की बात मान ली। सरकार ने समुद्रतटीय इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों को घरेलू उपयोग के लिए नमक बनाने का अधिकार दिया। जिन सरकारी कर्मचारियों ने इस्तीफा दिया था, उनके साथ नरमी बरतने की बात सरकार ने मानी। भारतीयों को शांतिपूर्ण धरना देने का अधिकार दिया गया। इन आश्वासनों के बदले कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को समाप्त करने की शर्त मान ली।

**2. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन:**
गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए। इस सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार ने कोई भी प्रस्ताव स्वीकार करने लायक नहीं माना। इस कारण महात्मा गांधी दिसंबर 1931 में भारत वापस आ गए। लंदन के द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के समय सरकार ने गांधी-इरविन समझौते के विपरीत भारत में दमन जारी रखा।

**3. सविनय अवज्ञा आंदोलन को पुनः आरंभ:**
महात्मा गांधी ने भारत आकर इरविन की जगह नए वायसराय विलिंगटन से मिलने की कोशिश की, लेकिन उनका प्रयास विफल रहा। ऐसी स्थिति में 3 जनवरी 1932 को गांधीजी ने फिर से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू कर दिया।
कांग्रेस ने 1932 में लंदन में तीसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लिया। आंदोलन फिर से शुरू होने पर ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी को जेल में बंद कर दिया। गांधीजी ने जेल में अनशन शुरू कर दिया। गांधीजी की बिगड़ती हालत को देखते हुए सरकार ने 23 अगस्त 1933 को उन्हें जेल से रिहा कर दिया। जेल से रिहा होने के बाद गांधीजी राजनीति से अलग हो गए और अछूतोद्धार के कार्यक्रमों में लग गए। 18 मई 1934 को पटना में कांग्रेस की बैठक में बिना शर्त सविनय अवज्ञा आंदोलन समाप्त कर दिया गया।

**सविनय अवज्ञा आंदोलन का महत्व:**
इस आंदोलन ने समाज के एक बड़े वर्ग में राजनीतिक चेतना जगाई। महिलाओं, युवाओं, मजदूरों, किसानों और ग्रामीण लोगों ने भी इस आंदोलन में भाग लिया। इसे देखकर अंग्रेज भी हैरान रह गए। बंगाल के पुलिस विभाग के आई.जी. ने कहा, "मुझे इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि कांग्रेस को ऐसे अज्ञानी और साधारण लोगों का भी सहयोग मिलेगा।"
अवध के किसानों, महाराष्ट्र, मध्य भारत और कर्नाटक के जनजातीय समुदायों और महाराष्ट्र के मजदूरों ने इस आंदोलन में शानदार सक्रियता दिखाई। इस आंदोलन का आर्थिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण था। आंदोलन के दौरान ब्रिटेन से आयातित कपड़ों की मात्रा एक तिहाई कम हो गई। इस आंदोलन ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक मजबूत दिशा दी।
In simple words: सविनय अवज्ञा आंदोलन गांधीजी ने नमक कानून तोड़कर शुरू किया था। इसका उद्देश्य ब्रिटिश कानूनों का उल्लंघन करना और पूर्ण स्वराज प्राप्त करना था। इसमें दांडी मार्च, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और सरकारी नौकरियों का त्याग शामिल था। इसने भारतीयों में राजनीतिक चेतना बढ़ाई और ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव डाला।

🎯 Exam Tip: दांडी मार्च की घटना, नमक कानून के उल्लंघन, और गांधी-इरविन समझौते के प्रमुख बिंदुओं को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. भारत छोड़ो आन्दोलन किन परिस्थितियों में प्रारम्भ हुआ? इसके महत्व को बताइए।
Answer: भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक जन-आंदोलन था जिसने ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी। इस आंदोलन ने भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति में एक नई दिशा दी।

**भारत छोड़ो आंदोलन की परिस्थितियां और कारण:**
गांधीजी ने अंग्रेजों से भारत को ईश्वर के हाथों में या अराजकता में छोड़ने को कहा। गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अहिंसक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। अबुल कलाम आजाद और जवाहरलाल नेहरू इसके पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उन्हें यह योजना अव्यावहारिक लग रही थी। गांधीजी ने कहा, "भारत की मिट्टी से मैं एक ऐसा आंदोलन खड़ा करूंगा जो खुद कांग्रेस से भी बड़ा होगा।"

**3. वर्धा प्रस्ताव (14 जुलाई, 1942 ई.):**
कांग्रेस कार्य समिति ने 14 जुलाई 1942 को वर्धा में अपनी बैठक में महात्मा गांधी के अहिंसक संघर्ष के कार्यक्रम को मंजूरी दी। अगस्त में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में इस प्रस्ताव का अनुमोदन होना था।

**4. भारत छोड़ो प्रस्ताव:**
7 अगस्त 1942 को मुंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। 8 अगस्त 1942 को 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पास किया गया। इसी दिन, गांधीजी ने मुंबई के ग्वालिया टैंक में एक ऐतिहासिक सभा में 'करो या मरो' का नारा दिया। उन्होंने कहा, "मैं आपको एक छोटा सा मंत्र दे रहा हूं, इसे अपने दिलों में संजोकर रखें और हर सांस में इसका जाप करें।"
यह मंत्र था "करो या मरो" – हम या तो भारत को स्वतंत्र कराएंगे या इस प्रयास में मारे जाएंगे, लेकिन अपनी गुलामी को आगे बढ़ता देखने के लिए जिंदा नहीं रहेंगे। गांधीजी वायसराय से मिलकर कांग्रेस के प्रस्ताव को स्वीकार करवाना चाहते थे, उन्हें लगा कि इसमें दो-तीन सप्ताह लगेंगे।

**भारत छोड़ो आंदोलन का विस्तार:**
आंदोलन शुरू होने से पहले ही, 9 अगस्त 1942 को सुबह गांधीजी और दूसरे कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। कांग्रेस को एक बार फिर गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। महात्मा गांधी और सरोजिनी नायडू को पुणे के आगा खान पैलेस में, और कांग्रेस के अन्य नेताओं को अहमदनगर दुर्ग में नजरबंद कर दिया गया। राजेंद्र प्रसाद मुंबई नहीं आए थे, इसलिए उन्हें पटना में गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया गया। इस आंदोलन की कोई निश्चित योजना तैयार नहीं की गई थी, और कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी से जनता नेतृत्व विहीन हो गई।
राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी से जनाक्रोश फैल गया। देश में मुंबई, अहमदनगर, पुणे, दिल्ली, कानपुर, इलाहाबाद, पटना आदि प्रमुख शहरों में बड़े-बड़े जुलूस निकाले गए। स्कूल, कॉलेज और कारखानों में हड़तालें हुईं। कई जगहों पर स्वतः स्फूर्त आंदोलन होने लगे। ब्रिटिश दमन चक्र से क्रोधित जनता ने पुलिस थाने, डाकघर, न्यायालय, रेलवे स्टेशन आदि ब्रिटिश सत्ता के प्रतीकों पर हमला किया।
लोगों ने भूमिगत नेताओं जैसे सुमति मोरारजी, अच्युत पटवर्धन, राममनोहर लोहिया और अरुणा आसफ अली का समर्थन किया। अरुणा आसफ अली ने ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया।

**1. समानांतर सरकार की स्थापना:**
आंदोलनकारियों ने कई स्थानों पर समानांतर सरकारें स्थापित कीं। बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में पहली ऐसी सरकार बनी। मिदनापुर में दिसंबर 1942 से सितंबर 1944 तक जातीय सरकार रही। सतारा की समानांतर सरकार सबसे अधिक लंबे समय तक चली और 1945 तक कायम रही, जिसके प्रमुख नेता नाना पाटिल थे।
गांधीजी ने जेल में 10 फरवरी 1943 को उपवास शुरू किया। अंग्रेज सरकार गांधीजी पर हिंसात्मक गतिविधियों की निंदा करने का दबाव डाल रही थी। गांधीजी का मानना था कि आंदोलन के हिंसक रूप के लिए ब्रिटिश सरकार जिम्मेदार थी। गांधीजी की रिहाई की मांग उठने लगी।
वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के तीन सदस्यों (एम.एस. एनी, एन.आर. सरकार और एच.पी. मोदी) ने इस्तीफा दे दिया। ब्रिटिश सरकार गांधीजी के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रही थी, जबकि भारतीय जनता गांधीजी की रिहाई की मांग कर रही थी। गांधीजी को बीमारी के आधार पर 6 मई 1944 को रिहा कर दिया गया।

**2. आंदोलन का दमन:**
कांग्रेस के नेताओं ने आंदोलन के दौरान हुई हिंसात्मक गतिविधियों की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की। सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए बड़ी क्रूरता दिखाई। प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई गईं और बम बरसाए गए। आंदोलनकारियों को बहुत यातनाएं दी गईं। विद्रोही गांवों से भारी जुर्माना वसूला गया। 1942 के अंत तक 60 हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस और सेना की गोलीबारी में 10 हजार से भी अधिक लोग मारे गए।

**3. मुस्लिम लीग की निरपेक्षता की नीति:**
मुस्लिम लीग ने इस आंदोलन में तटस्थता की नीति अपनाई। मुहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों से अपील की कि वे इस आंदोलन से बिल्कुल अलग रहें। जब कांग्रेस के प्रमुख नेता जेल में थे, तब जिन्ना ने मुस्लिम लीग को 23 मार्च 1943 को 'पाकिस्तान दिवस' मनाने को कहा। साम्यवादियों ने कांग्रेस से भारत छोड़ो आंदोलन वापस लेने को कहा और ब्रिटिश सरकार का सहयोग किया।

**भारत छोड़ो आंदोलन का महत्व:**
अरुणा आसफ अली और सुचेता कृपलानी जैसी महिलाओं ने भूमिगत होकर काम किया। उषा मेहता कांग्रेस रेडियो चलाने वाले समूह की सदस्य थीं। मजदूर वर्ग की भूमिका इस आंदोलन में सक्रिय थी। अहमदाबाद, मुंबई और जमशेदपुर जैसे शहरों में कारखाने कई दिनों तक बंद रहे। अहमदाबाद में लगभग साढ़े तीन महीने तक कारखाने बंद रहे। विद्यार्थियों ने इस आंदोलन का संदेश गांवों में घूम-घूम कर फैलाया।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि इसके परिणामस्वरूप भारत की स्वतंत्रता की मांग राष्ट्रीय आंदोलन की पहली मांग बन गई। ब्रिटिश सरकार को अब सत्ता हस्तांतरण पर ही बात करनी थी। स्वतंत्रता के लिए जनता बड़े से बड़ा त्याग करने को तैयार हो गई।
In simple words: भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में गांधीजी के 'करो या मरो' नारे के साथ शुरू हुआ। ब्रिटिश दमन के बावजूद, इसने समानांतर सरकारें स्थापित कीं और भारतीयों में स्वतंत्रता की तीव्र इच्छा जगाई। यह आंदोलन भारत की आजादी की दिशा में एक बड़ा कदम था।

🎯 Exam Tip: 'करो या मरो' के नारे, प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी, समानांतर सरकारों की स्थापना, और आंदोलन के अंतिम महत्व को विस्तार से बताएं।

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