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Detailed Chapter 19 सेव और देव (कहानी) RBSE Solutions for Class 12 Hindi
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Class 12 Hindi Chapter 19 सेव और देव (कहानी) RBSE Solutions PDF
RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 19 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Question 1. लेखक के अनुसार कौन लोग अविनयी हो सकते हैं?
(क) क्षुद्र व्यक्ति
(ख) दुष्ट व्यक्ति
(ग) शिक्षित व्यक्ति
(घ) अशिक्षित व्यक्ति
Answer: (क) क्षुद्र व्यक्ति
In simple words: लेखक के अनुसार छोटे और नीच स्वभाव के लोग ही अक्सर घमंडी या अशिष्ट हो सकते हैं।
🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में लेखक के विचारों को समझना महत्वपूर्ण होता है। 'क्षुद्र' शब्द का अर्थ छोटे या नीच स्वभाव का व्यक्ति होता है।
Question 2. प्रोफेसर गजानन किस विषय के प्रोफेसर हैं?
(क) इतिहास
Answer: (क) इतिहास
In simple words: प्रोफेसर गजानन इतिहास विषय के विशेषज्ञ हैं।
🎯 Exam Tip: कहानी के मुख्य पात्रों और उनके व्यवसायों को याद रखना कहानी की समझ के लिए आवश्यक है।
Question 3. अज्ञेय ने कितने तार सप्तकों का सम्पादन किया?
(क) एक
(ख) दो
(ग) चार
(घ) तीन
Answer: (ग) चार
In simple words: प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय ने कुल चार तार सप्तकों का संपादन किया था।
🎯 Exam Tip: साहित्यकारों के महत्वपूर्ण कार्यों और उपाधियों को याद रखना साहित्यिक परिचय के प्रश्नों में सहायक होता है।
Question 4. लेखक किसकी उपेक्षा पर दुःख व्यक्त करता है?
(क) मानवत्व
(ख) देवत्व
(ग) दानवत्व
(घ) राक्षसत्वे
Answer: (ख) देवत्व
In simple words: लेखक इस बात पर दुख जताते हैं कि पवित्र और देवत्व जैसी भावनाओं को लोग अनदेखा कर रहे हैं।
🎯 Exam Tip: कहानी के मुख्य संदेश और लेखक के भावनात्मक जुड़ाव को समझना ऐसे प्रश्नों का सही उत्तर देने में मदद करता है।
RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 19 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. प्रोफेसर साहब कहाँ घूमने जाते हैं और क्यों?
Answer: प्रोफेसर साहब कुल्लू पहाड़ पर घूमने आए थे। वे यहाँ पर पुरानी चीजों की खोज के लिए आए थे। वे भारत की सबसे पुरानी सभ्यता के बचे हुए हिस्सों और हिंदू काल की कला के नमूने देखना चाहते थे।
In simple words: प्रोफेसर कुल्लू के पहाड़ों में घूमने आए थे, ताकि वे पुरानी सभ्यताओं के अवशेष और हिंदू काल की कला देख सकें।
🎯 Exam Tip: मुख्य पात्र के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से लिखें, जिसमें उसका गंतव्य और कारण दोनों शामिल हों।
Question 2. मन्दिर में उपेक्षित देवी की मूर्ति को देखकर वे क्या सोचते हैं?
Answer: प्रोफेसर सोचने लगे कि यह मूर्ति पाँच सौ साल से कम पुरानी नहीं होगी। यह तीन-चार हजार रुपये में बिक सकती थी। अगर कोई समझदार इसे खरीदता तो यह दस हजार में बिकती। इस पर कितनी बकरियों की बलि दी गई होगी। अब इस पर कीड़े चल रहे हैं। “ईमान क्यों बिगाड़ता है?” प्रोफेसर सोचने लगे, वह लड़का खड़ा देख रहा होगा कि चोरी भी की पर फल नहीं मिला। बहुत अच्छा हुआ। सेवों का सड़ जाना अच्छा है, चोर को मिलना अच्छा नहीं। चोर को क्या हक है?
In simple words: प्रोफेसर ने सोचा कि देवी की पुरानी मूर्ति की कीमत बहुत ज्यादा होगी और यह बेकार पड़ी है, जबकि इस पर कीड़े चल रहे हैं।
🎯 Exam Tip: पात्र के विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करें, खासकर जब वे किसी वस्तु के मूल्य और उसकी वर्तमान स्थिति के बीच के अंतर को दर्शाते हों।
Question 4. अज्ञेय का पूरा नाम बताते हुए उनके प्रसिद्ध उपन्यासों का नाम बताइए।
Answer: अज्ञेय का पूरा नाम सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं- शेखर एक जीवनी, नदी के द्वीप और अपने-अपने अजनबी।
In simple words: अज्ञेय का पूरा नाम सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन है, और उनके कुछ मशहूर उपन्यास हैं शेखर एक जीवनी, नदी के द्वीप और अपने-अपने अजनबी।
🎯 Exam Tip: साहित्यकारों के पूरे नाम और उनकी प्रमुख रचनाओं को सही-सही याद रखें।
RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 19 लघूत्तरात्मक प्रश्न
Question 1. प्रोफेसर गजानन देवी मूर्ति उठाकर ओवरकोट में रखकर चलते समय क्या सोचते हैं?
Answer: उनका मन बहुत खुश था, वे सोचने लगे कि उनका पहला दिन कितना सफल रहा है। उन्होंने कितनी सुंदरता देखी थी और कितनी अनमोल, बहुमूल्य सुंदरता उन्हें मिली थी। कुल्लू का अतुलनीय सौंदर्य! यह सच में देवताओं का घर जैसा है।
In simple words: देवी की मूर्ति को ओवरकोट में रखते हुए प्रोफेसर बहुत खुश थे, उन्हें लगा कि उनका पहला दिन बहुत सफल रहा है और उन्हें कुल्लू में अतुलनीय सुंदरता मिली है।
🎯 Exam Tip: पात्र की आंतरिक भावनाओं और विचारों को स्पष्ट करें, खासकर जब वे किसी महत्वपूर्ण घटना के बाद बदल जाते हैं।
Question 2. सेव तोड़ने वाले लड़के को पीटने के बाद उनके मन में क्या विचार आते हैं? अपने शब्दों में लिखिए।
Answer: प्रोफेसर साहब लड़के को पीटने के बाद आगे बढ़ते हुए सोच रहे थे कि वह लड़का खड़ा होकर देख रहा होगा कि उसे चोरी का कोई फल नहीं मिला। यह अच्छा हुआ कि सेब सड़ गए, चोर को नहीं मिले। चोर को कोई हक नहीं है।
In simple words: लड़के को पीटने के बाद प्रोफेसर सोचने लगे कि चोरी करने पर लड़के को कुछ नहीं मिला और चोरों को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है।
🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में पात्र के बदलते विचारों और उनके पीछे के तर्क को स्पष्ट रूप से दर्शाना महत्वपूर्ण है।
Question 3. राजपूती बाला को देखकर अज्ञेय के मन में पहाड़ी ग्रामवासियों के विषय में क्या विचार उत्पन्न हुए?
Answer: प्रोफेसर साहब सोचने लगे कि यहाँ के लोग कितने सीधे-सादे और सरल स्वभाव के होते हैं। प्रकृति की सुंदर गोद में खेलते हुए उन्हें न किसी बात की चिंता है और न लालच है। वे अपना खाने-पीने, पशु चराने और गाने-बजाने में दिन बिता देते हैं। इन भोले लोगों को बाहर वालों से कोई मतलब नहीं होता।
In simple words: राजपूती बाला को देखकर प्रोफेसर ने सोचा कि पहाड़ी गाँव के लोग बहुत सीधे, सरल और प्रकृति के करीब रहते हैं, जिन्हें दुनिया के लालच से कोई फर्क नहीं पड़ता।
🎯 Exam Tip: पात्र के अवलोकन से उत्पन्न हुए विचारों को कहानी के संदर्भ में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।
Question 4. लोभ-लालच कुछ समय के लिए मन को विचलित कर सकते हैं परन्तु अन्त में नैतिक भाव ही विजयी होते हैं। संकलित कहानी के सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए।
Answer: देवी की मूर्ति को देखकर प्रोफेसर के मन में लालच आ गया। मूर्ति लगभग पाँच सौ साल पुरानी थी। इसे किसी अच्छी जगह पर होना चाहिए जहाँ इसकी पूजा हो सके। अगर इसे बेचा जाता तो यह दस हजार से कम में नहीं बिकती। यही सोचकर प्रोफेसर मूर्ति को ओवरकोट में उठा लेते हैं। लेकिन बाद में, लड़के को पीटने और अपनी चोरी के बीच तुलना करने पर उनका नैतिक मन जाग जाता है और वे मूर्ति को वापस मंदिर में रख देते हैं। यह दिखाता है कि लालच भले ही कुछ समय के लिए हावी हो जाए, लेकिन अंत में अच्छे विचार ही जीतते हैं।
In simple words: कहानी में प्रोफेसर पहले मूर्ति चुराने का लालच करते हैं, लेकिन बाद में अपनी गलती समझकर उसे वापस रख देते हैं, जिससे पता चलता है कि नैतिक मूल्य हमेशा लालच पर भारी पड़ते हैं।
🎯 Exam Tip: कहानी के मुख्य विचार को पात्र के उदाहरण से स्पष्ट करें, जिसमें लालच और नैतिक जीत दोनों को दिखाया गया हो।
RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 19 निबंधात्मक प्रश्न
Question 1. अज्ञेय कहानी कला की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
Answer: सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' हिन्दी की नई कहानी के बहुत खास लेखक हैं। वे कहानी लिखने में बहुत माहिर थे। उनकी कहानियों में क्रांति, दुख, मन के अंदर की बातें, मनोविज्ञान और समाज की बातें नए तरीकों से मिलती हैं। उनकी कहानियों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है: पहला, राजनीतिक विद्रोह को दिखाने वाली, और दूसरा, भारतीय समाज और जीवन के रंग भरने वाली। इनमें मन की गहराई को बहुत अच्छे से दिखाने की क्षमता है। 'विपथगा', 'कोठरी की बात', 'परम्परा' और 'जयदोल' उनके कहानी संग्रह हैं।
अज्ञेय की कहानियाँ बहुत असरदार होती हैं। 'रोज' कहानी इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें लेखक ने रोजमर्रा के जीवन के अनगिनत उदाहरणों में से एक सुंदर, असरदार और महत्वपूर्ण नमूना दिखाया है कि कैसे आम लोगों का जीवन बोझिल और ऊबाऊ होता है। इस कहानी में लेखक ने ऐसे बोझिल जीवन के प्रति कठोरता न दिखाकर सहानुभूति दिखाई है। 'सेव और देव' कहानी मनोवैज्ञानिक कहानी है। इसमें प्रोफेसर के मन में चल रहे दुविधा को देखना बहुत अच्छा लगता है। मूर्ति उठाने से पहले उनके मन में कई विचार आते हैं और जब वे मूर्ति रखने जाते हैं, तब भी उनके मन में दुविधा बनी रहती है। लेखक ने प्रोफेसर के मन का बहुत ध्यान से चित्रण किया है। उनकी मनोवैज्ञानिक कहानियों में इसी तरह की आंतरिक दुविधा दिखाई देती है।
In simple words: अज्ञेय की कहानियों में क्रांति, मनोविज्ञान और सामाजिक चेतना के नए विचार होते हैं। उनकी कहानियाँ पात्रों के मन की दुविधाओं को बहुत गहराई से दिखाती हैं, जैसे 'सेव और देव' कहानी में प्रोफेसर का मन।
🎯 Exam Tip: कहानीकार की विशेषताओं को बताने के लिए उनकी प्रमुख रचनाओं और कहानी कला के तत्वों का उल्लेख करें।
Question 2. 'सेव और देव' कहानी की मूल संवेदना अपने शब्दों में लिखिए।
Answer: 'सेव और देव' कहानी के जरिए अज्ञेय यह बताते हैं कि अच्छे नैतिक मूल्य अपने आप बनते हैं, उन्हें जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता। साथ ही, वे यह भी दिखाते हैं कि इंसान का विश्वास उसे अधिक नैतिक शक्ति देता है। प्रोफेसर, जिन्हें देव मूर्तियों में खास रुचि और आस्था है, वे अपने व्यवहार से यह साबित कर देते हैं कि विश्वास में बहुत बड़ी ताकत होती है। प्रोफेसर एक बच्चे को सेब चुराकर तोड़ने के लिए डांटते हैं और खुद मंदिर में पड़ी सुंदर मूर्ति को चुराने चले जाते हैं। लेकिन उनके मन के नैतिक मूल्यों ने उन्हें मजबूर कर दिया कि वे मूर्ति को मंदिर में ही वापस रख दें। मंदिर एक पवित्र जगह है जहाँ देवता रहते हैं, इसलिए प्रोफेसर जूते उतारकर अंदर जाते हैं। यह उनके विश्वास का ही नतीजा है कि वे जूते खोलकर ही मंदिर में प्रवेश करते हैं।
In simple words: 'सेव और देव' कहानी बताती है कि नैतिक मूल्य अंदर से आते हैं और इंसान का विश्वास उसे मजबूत करता है। प्रोफेसर का उदाहरण दिखाता है कि कैसे लालच के बावजूद आस्था और नैतिक मूल्य अंत में जीतते हैं।
🎯 Exam Tip: कहानी की मुख्य भावना या संदेश को स्पष्ट और सरल शब्दों में लिखें, और इसे कहानी के मुख्य प्रसंगों से जोड़कर समझाएं।
Question 3. प्रोफेसर गजानने की चारित्रिक विशेषताओं को रेखांकित कीजिए।
Answer: प्रोफेसर गजानन 'सेव और देव' कहानी के एक मुख्य पात्र हैं। उनके चरित्र की कुछ खास बातें नीचे दी गई हैं:
जिज्ञासु प्रवृत्ति: प्रोफेसर गजानन की आदत जानने की थी। इसी वजह से उन्हें मनु के पुराने मंदिर को देखने की इच्छा हुई, जो दुनिया का एकमात्र मनु मंदिर था और बहुत खास था। उन्होंने दूसरे मंदिरों के बारे में जानकारी ली। पुजारी ने बताया कि पहाड़ की चोटी पर जंगल में एक देवी का स्थान है। यह जानकर उनकी जिज्ञासा बढ़ गई और वे रास्ता पूछकर उस मंदिर की ओर चल दिए।
भ्रमणशील: प्रोफेसर गजानन को घूमना और पुरानी मूर्तियों व मंदिरों को देखना बहुत पसंद था। उन्होंने कुल्लू की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लिया। गिरते हुए झरनों पर पड़ने वाली सूरज की किरणों को देखकर उनके मन में कवि जैसी कल्पनाएं जगने लगीं। वे उस प्राकृतिक सुंदरता को देखकर बहुत खुश हुए थे।
सरल स्वभाव: प्रोफेसर गजानन सरल और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। भले ही उन्हें सेब चुराने वाले लड़के पर गुस्सा आया था, क्योंकि उन्हें लगा कि वह पुरानी आर्य संस्कृति को खराब कर रहा है। पुराने मंदिर पर पहुँचकर वे गाँव वालों और पुजारी से दूसरे मंदिरों और मूर्तियों के बारे में शांति से पूछते हैं और खुशी-खुशी आगे बढ़ जाते हैं।
अन्तर्द्वन्द्व की भावना: प्रोफेसर गजानन के मन में देवी की मूर्ति देखकर दुविधा होती है। वे कभी मूर्ति उठाते हैं और कभी रखते हैं। कभी मंदिर के बाहर आते हैं और कभी अंदर जाते हैं। इसी दुविधा में वे उलझे रहते हैं। वे मूर्ति को ओवरकोट में छिपाकर ले जाते हैं। लेकिन लड़के को डांटने के बाद वे मूर्ति को वापस रखने जाते हैं, उस समय उनके मन में फिर दुविधा होती है। लौटते समय उनके मन में विचार आया कि वे एक अमूल्य चीज़ को नष्ट कर रहे हैं, दूसरी ओर उन्हें यह संतोष भी था कि मंदिर की मूर्ति मंदिर में ही पहुँचा दी थी।
भीरु व्यक्तित्व: प्रोफेसर गजानन डरपोक स्वभाव के व्यक्ति थे। मूर्ति उठाते समय वे बार-बार बाहर आकर देखते कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा है। उन्हें डर लग रहा था कि कोई मूर्ति उठाते समय उन्हें देख न ले। इस तरह जब वे मूर्ति लेकर जाते हैं तो हाथ में लेकर तेजी से भागते हुए ऊपर से उतरते हैं और उस रास्ते से जाते हैं जहाँ गाँव न पड़े। गाँव वाले जब उन्हें देखते हैं तो उन्हें लगता है कि वे शायद उनके ओवरकोट को ही देख रहे हैं। 'मुझे भूतों से डर नहीं लगता' ऐसा कहकर वे अपनी निडरता दिखाते हैं। पर मूर्ति को ले जाते समय उनका दिल काँप जाता है। यह इंसान के स्वभाव की खासियत है जब वह दूसरे की चीज़ उठाता है तो मन में थोड़ा डर तो होता ही है।
In simple words: प्रोफेसर गजानन जिज्ञासु, घूमने के शौकीन, सरल स्वभाव के थे, पर उनके मन में अक्सर दुविधा रहती थी। वे थोड़े डरपोक भी थे, खासकर जब वे कोई गलत काम करते थे।
🎯 Exam Tip: किसी भी पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करने के लिए, कहानी के प्रसंगों से उदाहरण दें और प्रत्येक विशेषता को अलग-अलग बिंदुओं में समझाएं।
Question 4. 'इसने तो सेव ही चुराया है, तुम देवस्थान लूट लाये।' इस कथन में लेखक की मनः स्थिति पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
Answer: प्रोफेसर साहब को आत्मग्लानि होती है। जैसे ही उनका हाथ ओवरकोट के कॉलर में गया, उन्हें लगा मानो बिजली गिर गई हो। वे सोचने लगे होंगे कि इस लड़के ने तो एक साधारण सी चीज चुराई है, पर तुम तो एक बहुत कीमती चीज चुराकर ले जा रहे हो। लड़के ने तो अपने ही घर में अपनी चीज चुराई है, तुम तो दूसरे के घर में दूसरों की चीज चुराकर ले जा रहे हो। तुम ज्यादा दोषी हो। जो काम लड़के ने किया वही तुम कर रहे हो। फिर तुम्हें लड़के को डांटने और मारने का क्या अधिकार है? वह तो बच्चा है, नासमझ है, तुम तो समझदार हो, तुम चोरी क्यों कर रहे हो? सेब जैसी साधारण चीज चुराने वाले को तुम चोर कह रहे हो, उसके सेब छीनकर फेंक रहे हो और खुश हो रहे हो।
In simple words: प्रोफेसर को यह कथन सुनकर बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। उन्हें लगा कि उन्होंने एक बच्चे की छोटी चोरी से भी बड़ी गलती की है, क्योंकि वे मंदिर से एक अनमोल मूर्ति चुरा रहे थे, जबकि बच्चे ने सिर्फ सेब चुराए थे।
🎯 Exam Tip: दिए गए कथन के माध्यम से लेखक की मनःस्थिति को गहराई से विश्लेषण करें, जिसमें आत्म-चिंतन और नैतिकता के पहलुओं पर ध्यान दें।
RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 19 निबंधात्मक प्रश्न
Question 5. देवी की मूर्ति को देखने के पश्चात् प्रोफेसर के मन में जो विचार आए, उन्हें व्यक्त कीजिए।
Answer: प्रोफेसर के मन में विचार आया कि यह मूर्ति पाँच सौ साल से यहाँ पड़ी होगी। न जाने कितनी पूजा इसने पाई होगी, कितनी बलियों के ताजे, गरम, पवित्र खून से स्नान करके अपनी दैवी सुंदरता निखारी होगी और अब कितने सालों से इन रेंगते हुए कीड़ों की लंबी-लंबी जिज्ञासा भरी मूंछों की गंदगी भरी गुदगुदाहट सह रही होगी। यह देवत्व की कितनी उपेक्षा है। देवता पत्थर के बने हैं लेकिन मूर्ति तो देवता की ही है। देवत्व की अमरता की निशानी है। यह एक भावना है, पर भावना पवित्र और आदरणीय है। यह मूर्ति ऐसी बुरी हालत में इन कीड़ों के बीच में पड़े रहने के लायक नहीं है जिनके पास श्रद्धा से भरा दिल नहीं, पूजा करने को हाथ नहीं, देखने को आँख नहीं, छूने को त्वचा नहीं, टटोलने के लिए सिर्फ गंदी मूंछें हैं। यह मूर्ति यहाँ रहने के काबिल नहीं है। इसे यहाँ नहीं पड़े रहना चाहिए। इसलिए उनके मन में मूर्ति को ले जाने का विचार आया।
In simple words: प्रोफेसर ने देवी की मूर्ति को देखकर सोचा कि इतनी पवित्र और पुरानी मूर्ति को इस तरह कीड़ों के बीच उपेक्षित नहीं रहना चाहिए। उन्हें लगा कि इसे किसी बेहतर जगह पर होना चाहिए, जहाँ इसकी सही पूजा हो सके।
🎯 Exam Tip: पात्र के आंतरिक विचारों और भावनाओं को स्पष्ट रूप से लिखें, खासकर जब वे किसी वस्तु के महत्व और उसकी उपेक्षा के बीच के विरोधाभास को दर्शाते हों।
Question 6. 'सेव और देव' कहानी के आधार पर अज्ञेय जी की भाषा-शैली पर विचार कीजिए।
Answer: अज्ञेय जी ने इस कहानी में शुद्ध साहित्यिक भाषा का इस्तेमाल किया है। उन्होंने 'अनिर्वचनीय', 'दर्पोन्नत', 'निभृत', 'उपेक्षित' जैसे संस्कृत के कठिन शब्दों का प्रयोग किया है। साथ ही, 'घूम-घाम', 'जल्दी-जल्दी', 'सीधे-सादे' जैसे आम बोलचाल के शब्दों का भी इस्तेमाल किया है। कहीं-कहीं 'खुदा-न-खास्ता' जैसे उर्दू शब्द भी आए हैं। एक-आध मुहावरा भी इस्तेमाल हुआ है। उनकी शैली वर्णनात्मक है। उन्होंने कुल्लू के पहाड़ों, प्रकृति और देवी के मंदिर का विस्तार से वर्णन किया है। एक जगह बातचीत वाली शैली का भी इस्तेमाल हुआ है, जहाँ प्रोफेसर और ग्रामीण आपस में बात करते हैं। प्रोफेसर दूसरे मंदिरों के बारे में पूछते हैं- "आस-पास और भी कोई मन्दिर है?"
“यहाँ मन्दिर नहीं।” “यहाँ तो सैकड़ों मन्दिर होने चाहिए।' “कौन - सा मन्दिर देखिएगा बाबू।” ऐसे छोटे-छोटे संवाद भी हैं। कहीं-कहीं अलंकारिक शैली का भी प्रयोग किया है। जैसे झरने के वर्णन में 'प्रकृति-नायिका की कजरारी आँखों से स्नेह गद्गद आँसुओं की झड़ी।' कल्पना की अच्छी उड़ान है। बालिका के पाँवों के पास बहते झरने की आवाज सुनकर वे उसकी तुलना हंसिनी और सरस्वती से करते हैं। इस तरह कहानी की भाषा और शैली बहुत सुंदर है।
In simple words: अज्ञेय जी ने कहानी में साहित्यिक और आम बोलचाल की भाषा दोनों का इस्तेमाल किया है। उनकी शैली वर्णनात्मक है, जो प्रकृति और दृश्यों का सुंदर वर्णन करती है, साथ ही इसमें संवाद और अलंकारिक भाषा का भी प्रयोग हुआ है।
🎯 Exam Tip: भाषा-शैली का विश्लेषण करते समय, शब्दों के चुनाव, वाक्य संरचना, अलंकारिक प्रयोग और संवादों के उदाहरणों का उल्लेख करें।
साहित्यिक परिचय
Question. 'अज्ञेय' आधुनिक साहित्य के बहुआयामी तथा विलक्षण व्यक्तित्व के धनी हैं। आप सैनिक, प्रतीक, नया प्रतीक, बिजली, विशाल भारत, वाक (अंग्रेजी त्रैमासिक) और दिनमान के सम्पादक रहे। कुछ वर्ष आकाशवाणी में भी नौकरी की। यायावरी स्वभाव के होने के कारण आपने यूरोप तथा एशिया का भ्रमण किया। कितनी नावों में कितनी बार' पर 'अज्ञेय' को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 4 अप्रैल 1987 को आपका स्वर्गवास हो गया। हिन्दी साहित्य में 'अज्ञेय' की प्रतिष्ठा नई परम्परा का सूत्रपात करने वाले कवि के रूप में हुई।
Answer: अज्ञेय आधुनिक साहित्य के बहुत ही खास और बहुमुखी व्यक्तित्व वाले कवि थे। उन्होंने सैनिक, प्रतीक, नया प्रतीक, बिजली, विशाल भारत, वाक (अंग्रेजी त्रैमासिक) और दिनमान जैसे कई अखबारों और पत्रिकाओं का संपादन किया। उन्होंने कुछ साल आकाशवाणी में भी काम किया। घुमक्कड़ स्वभाव के कारण उन्होंने यूरोप और एशिया की यात्राएं कीं। उनकी किताब 'कितनी नावों में कितनी बार' के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। 4 अप्रैल 1987 को उनका निधन हो गया। हिन्दी साहित्य में अज्ञेय को एक नई परंपरा शुरू करने वाले कवि के रूप में जाना जाता है।
In simple words: अज्ञेय एक प्रसिद्ध आधुनिक कवि और संपादक थे, जिन्हें 'कितनी नावों में कितनी बार' के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। वे एक नई साहित्यिक परंपरा के जनक थे और उन्होंने कई देशों की यात्राएं भी कीं।
🎯 Exam Tip: साहित्यकारों के साहित्यिक योगदान, प्रमुख पुरस्कार और उनकी जीवन यात्रा के महत्वपूर्ण बिंदुओं को संक्षेप में प्रस्तुत करें।
पाठ-सार
मोटर से उतरकर प्रोफेसर गजानन पंडित ने अपना चश्मा पोंछकर आँखों पर लगाया। उन्होंने सामान डाक बंगले पर भिजवाया और पहाड़ी सौन्दर्य देखने के लिए चल दिए। रूमाल से मुँह पोंछा, चश्मा साफ किया और वे पहाड़ी सौन्दर्य देखने चल दिए। चीड़ के पेड़ समाप्त हो गए थे और पहाड़ी रास्ता आगे खुल गया था। रास्ते में एक झरना बह रहा था। उसका जितना भाग समतल भूमि पर था, उस पर छाया थी, जहाँ वह नीचे गिर रहा था, वहाँ उसके झाग पर सूर्य की किरणें पड़ रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो अँधेरे की कोख में चाँदी का प्रवाह फूट पड़ा हो या प्रकृति रूपी नायिका की सुंदर आँखों से स्नेह भरे आँसुओं की धारा बह रही हो।
चट्टान के सहारे एक पहाड़ी राजपूत बाला खड़ी थी। उसकी हैरान और सीधी-सादी शक्ल से ऐसा लग रहा था कि उसे प्रोफेसर का आना अच्छा नहीं लगा। प्रोफेसर साहब दिल्ली के एक कॉलेज में प्राचीन इतिहास और पुरातत्व के अध्यापक हैं। उनका मनोरंजन पुरातत्व की खोज में ही होता है। कुल्लू पहाड़ की सुंदर घाटियों में वे प्राचीन सभ्यता के अवशेष देखने आए थे। उन्हें हिन्दू-कला के नमूने और धातु या पत्थर की मूर्तियाँ भी मिलेंगी, यह उम्मीद थी। पर वे वहाँ के सौन्दर्य को भी देखने लगे और उससे बहुत प्रभावित हुए। वहाँ खड़ी बालिका से उन्होंने पूछा 'तुम कहाँ रहती हो?' बाला ने उत्तर नहीं दिया और हैरानी से उनकी ओर देखती हुई पहाड़ पर चढ़ने लगी। प्रोफेसर उसके भोलेपन पर मुस्कराकर आगे चल दिए। वे सोचने लगे कि ये लोग कितने भोले हैं। ये अपने आप में लीन रहते हैं। अगर ये यूरोपीय सभ्यता सीखे होते तो एक दूसरे को नोंचकर खा जाते। ये तो अपने काम से काम रखते हैं। दूसरे के काम में दखल नहीं देते। कभी चोरी नहीं करते, शिकायत नहीं करते। खेती खड़ी है पर कोई पहरेदार नहीं है। अगर चवन्नी फेंक दें तो कोई उठायेगा भी नहीं।
आगे रास्ता सेव के छोटे-छोटे लचीले डाल वाले पेड़ों से घिर गया था। वे फलों से लदे थे और झुके हुए थे। पेड़ों पर सेवों को देखकर प्रोफेसर साहब प्रसन्न हुए। सबसे अधिक प्रसन्नता इस बात से हुई कि उनका कोई रखवाला नहीं था। पहाड़ी सभ्यता के प्रति उनका आदर-भाव बढ़ गया। उन्होंने शहरी सभ्यता से तुलना की। प्रोफेसर ने तभी 'धम्म' की आवाज सुनी। एक लड़का पेड़ से कूदा और हाथ के सेव छिपाने लगा। प्रोफेसर को लगा, यह लड़का प्राचीन आर्य सभ्यता को जो फाहियान के समय से चली आ रही है, उसे नष्ट-भ्रष्ट कर रहा है। उन्होंने लड़के को पकड़ लिया और एक तमाचा उसके लगा दिया। उसे गर्दन से पकड़कर रास्ते पर ले आए और बोले 'चोरी करता है। तुम जैसों के कारण पहाड़ी सभ्यता बदनाम होती है।' उन्होंने लड़कों को वहीं छोड़ दिया। वे लड़के के सम्बन्ध में सोचते हुए आगे बढ़े।
प्रोफेसर मनाली गाँव के पास पहुँच गए। लोगों से पूछकर वे मनु के प्राचीन मन्दिर के पास पहुँच गए। मन्दिर छोटा था, सुन्दर भी नहीं था पर संसार में मनु का एकमात्र मन्दिर होने के कारण वह महत्त्वपूर्ण था। प्रोफेसर साहब बहुत देर तक एकटक उधर को देखते रहे। उन्होंने एक आदमी से पूछा कि वहाँ और भी मन्दिर हैं क्या? उसने केवल उसी मन्दिर के बारे में बताया। पुजारी ने पहाड़ी की चोटी पर किले में देवी का थान बताया जहाँ अब कोई नहीं जाता, केवल पत्थर पड़े हैं। वहाँ अब भूत रहते हैं। भूत की बात सुनकर प्रोफेसर मुस्कराए और बोले 'कैसे भूत। उनसे तो मेरी दोस्ती है।' पुजारी से रास्ता पूछकर प्रोफेसर उधर ही चढ़ने लगे।
पड़ी थी। सफेद रंग का चिकना शिवलिंग भी था। दो-एक मिनट प्रोफेसर खड़े रहे, फिर ओवरकोट रखा, जूते उतारे, मन्दिर में अन्दर गए और देवी की मूर्ति उठाकर देखने लगे। मूर्ति सुन्दर थी और लगभग पाँच सौ वर्ष पुरानी थी। प्रोफेसर उसका मूल्य आँकने लगे। उन्होंने मूर्ति ठीक स्थान पर रखी और देहरी पर आकर उसका सौन्दर्य देखने लगे।
मूर्ति को देखकर प्रोफेसर सोचने लगे। 'पाँच सौ वर्ष से यह मूर्तियाँ ही पड़ी हैं। इस पर कितनी बलियाँ चढ़ी होंगी। आज इस पर कीड़े चल रहे हैं। देवता की मूर्ति का ऐसा अनादर, अगर यह मूर्ति ठिकाने से होती तो इसकी कितनी पूजा होती। प्रोफेसर ने चारों ओर देखा फिर अन्दर गए। गणेश की मूर्ति पीतल की थी पर वह इतनी सुन्दर नहीं थी। उन्होंने मूर्ति उठा ली। प्रोफेसर का हृदय धड़कने लगा। उन्होंने स्वयं को समझाया कि क्या मैं प्रेतों से डर रहा हूँ? मैं अन्धविश्वासी नहीं हूँ। उन्होंने मूर्ति को रख दिया और बाहर आकर देखने लगे। फिर उन्हें इजिप्ट के पिरामिडों की याद आई जिनके प्रति भी लोगों की धारणा अच्छी नहीं थी। प्रोफेसर अन्दर गए, मूर्ति उठाई, फिर रख दी और बाहर आ गए। ठण्ड के कारण ओवरकोट पहना फिर अन्दर गए, मूर्ति उठाई, ओवरकोट में छिपाया। जूते हाथ में लेकर भागते हुए से लौटने लगे। थोड़ी दूर जाकर बूट पहने और ऐसे स्थान से जाने लगे जहाँ गाँव न पड़े। सूरज छिप रहा था। प्रोफेसर पहले दिन की सफलता पर प्रसन्न थे। थोड़ी दूर चलने पर सेव के बाग आ गए। वहाँ फिर धमाका हुआ, वही लड़का पेड़ से कूदा और एक डाल भी टूट गई। प्रोफेसर ने उसके कोट का कॉलर पकड़ा और दो तमाचे जड़ दिए। खाया हुआ आधा सेव गिर गया। उन्होंने लड़के को डाँटा। लड़के को धक्का दिया। कोट का कॉलर पकड़कर चीख मार कर रोने लगा। प्रोफेसर का हाथ ओवरकोट में गया और सोचा इसने तो सेव चुराए हैं तुम तो देवालये लूट लाए हो। वे लौटने लगे। गाँव के पास से निकलते हुए उन्हें ऐसा लगा मानो प्रत्येक व्यक्ति उनके ओवरकोट की ओर देख रहा है। अँधेरा हो गया था। वे मन्दिर पर पहुँचे। किवाड़ हटाकर मूर्ति अन्दर रख रखी। तर्क कहता था तुम गलती कर रहे हो, सुनसान ने सुझाया कि तुम एक निधि को नष्ट कर रहे हो। पर उन्हें शान्ति मिल रही थी।
कठिन शब्दों के अर्थ :
(पृष्ठ 112) प्रपात = झरना। कोख = गोद। कजरारी = श्यामल। अकस्मात = अचानक । सुरम्य = रमणीय । उपत्यकाओं = घाटियों । अवशेष = बचा हुआ। यथासम्भव = जहाँ तक हो सके। सम्भ्रम = आश्चर्य ।
(पृष्ठ 113) अविनयी = उदंड। किंचित् = तनिक, थोड़ी। अक्षुण्ण = अनवरत, जो नष्ट न हो।
(पृष्ठ 114) दर्शनीय = सुन्दर, देखने योग्य। आकृष्ट = खिंच गया।
(पृष्ठ 115) उपयुक्त = उचित । निरवशेष = नष्टप्रायः। स्तूपाकार = मिट्टी, ईंट आदि से बना दूह के समान। धूम्रवत = धुएँ के समान। निर्जन = एकान्त। उपेक्षित = तिरस्कृत।
(पृष्ठ 116) पूत रक्त-पवित्र खून। देवत्व = ईश्वरत्व। नश्वर = नाशवान । चिरन्तनता = शाश्वतता । काबिल = योग्य । निर्मित = बनी हुई । स्पन्दन गति = धड़कन । दीप्ति = प्रकाश। एकटक = टकटकी लगाकर, ध्यान से। अंधविश्वासी = विवेकशून्य धारणा वाला। कन्दराओं = गुफाओं । उपास्य = उपासना करने योग्य । अखण्ड नीरवता = पूर्ण शान्त वातावरण।
(पृष्ठ 117) पुरातत्वविद = प्राचीन काल की बातों को जानने वाले। उपयुक्त = उचित अनुकूल। आह्लाद = प्रसन्नता। अनिर्वचनीय = अवर्णनीय। (पृष्ठ-118) शाखा = डाल। आलोक = प्रकाश । स्तम्भित = जड़वत । विस्मय = आश्चर्य।
संदर्भ एवं प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश अज्ञेय लिखित कहानी 'सेव और देव' से उधृत है।
प्रोफेसर कुल्लू पहाड़ पर चढ़ते हैं तब रास्ते में एक झरना दिखता है। जिसके कुछ भाग पर छाया है और शेष भाग पर सूर्य किरणें पड़ रही हैं, जिससे झरना चमकने लगता है। उसी का वर्णन यहाँ किया गया है।
व्याख्या – मार्ग में नीचे गिरते हुए प्रपात के फेन पर सूर्य की किरणें पड़ रही थीं, उस समय लेखक को ऐसा अनुभव हुआ मानो अंधकार की गोदी में चाँदी का प्रवाह फूट पड़ा हो।
संध्या के समय झरने के एक अंश पर अंधकार था किन्तु नीचे गिरने वाले अंश पर सूर्य की किरणें पड़ रही थीं जिन्हें देखकर प्रोफेसर को लगा मानो अन्धकार में चाँदी का प्रवाह फूट पड़ा है अथवा प्रकृतिरूपी नायिका की काली आँखों से स्नेह गद्गद् आँसुओं की झड़ी लग गई हो। आँखों के आँसू बूंद के रूप में गिरते हैं और श्वेत होते हैं, उसी प्रकार झरने का झरना श्वेत दिखने के कारण आँसुओं सा दिख रहा था। उस झरने के पार पर एक चट्टान के सहारे एक पहाड़ी राजपूत बाला खड़ी थी, उसकी शक्ल भोली थी। उसकी आँखों से लेखक को अनुभव हुआ कि उसे प्रोफेसर का वहाँ आना अच्छा नहीं लगा। ऐसा प्रतीत हुआ कि हम पहाड़ी लोगों के बीच में यह अजनबी यहाँ क्यों आ गया है। इसका यहाँ क्या काम है, क्या अधिकार है?
विशेष –
- आलंकारिक शैली का प्रयोग किया गया है।
- पहाड़ी बालिका के भोलेपन का वर्णन अनुपम है।
- प्रकृति की सुषमा का यथार्थ वर्णन एवं आलंकारिक वर्णन दृष्टव्य है।
2. वे उन थोड़े से लोगों में से हैं, जिनका पेशा और मनोरंजन एक ही है- मनोरंजन के लिए भी वे पुरातत्त्व की ओर ही जाते हैं। यहाँ कुल्लू पहाड़ की सुरम्य उपत्यकाओं में भी वे सोचते हुए आए हैं कि यहाँ भारत की प्राचीनतम सभ्यता के अवशेष उन्हें मिलेंगे और हिन्दू-काल की शिल्प कला के नमूने और धातु या प्रस्तर या सुधा की मूर्तियाँ और न जाने क्या-क्या लेकिन इतना सब होते हुए भी सौन्दर्य के प्रति-जीते-जागते स्पन्दन युक्त क्षणभंगुर, सौन्दर्य के प्रति उनकी आँखें अँधी नहीं हैं। (पृष्ठ 112)
सन्दर्भ एवं प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कहानी 'सेव और देव' से उधृत है।
इस कहानी के लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय हैं। प्रोफेसर साहब प्राचीन इतिहास और पुरातत्व के अध्यापक हैं। उन्हें प्राचीन वस्तुओं और प्राचीन मन्दिरों को देखने का शौक है और आनन्द भी आता है। कुल्लू के पहाड़ पर प्राचीन मन्दिर देखने ही आए थे। उसी का उल्लेख यहाँ किया गया है।
व्याख्या – प्रोफेसर गजानन पुरातत्त्व और इतिहास के अध्यापक थे।
उनका पेशा प्राचीन वस्तुओं और मन्दिरों को देखने का था और उन्हें देखने में भी उन्हें आनन्द आता था। उनकी रुचि उनके पेशे के अनुकूल ही थी। वे अपना मनोरंजन करने के लिए भी पुरातत्त्व की ओर ही जाते थे। अर्थात् प्राचीन वस्तुओं और इमारतों को देखने में उन्हें आनन्द आता था। कुल्लू की सुन्दर घाटियों में वे इसी आशा से आए थे कि यहाँ भारत की प्राचीनतम सभ्यता के अवशेष मिलेंगे जिन्हें देखकर उन्हें आनन्दानुभूति होगी। साथ ही हिन्दू-काल की शिल्प कला के नमूने मिलेंगे, धातु, प्रस्तर और सुधा की मूर्तियाँ मिलेंगी और भी नई-नई चीजें मिलेंगी, जिन्हें देखकर वे आनन्द का अनुभव करेंगे।
- प्रोफेसर के पेशे को वर्णन है।
- प्रोफेसर की रुचि एवं मनोरंजन का वर्णन है।
- कुल्लू के पहाड़ों पर मिलने वाले पदार्थों का उल्लेख है।
- प्रकृति के सौन्दर्य से प्रोफेसर के स्पन्दित होने का वर्णन है।
3. “ऐसे भले लोग न होते तो प्राचीन सभ्यता के जो अवशेष बचे हैं, ये भी क्या रह जाते। खुदा-न-खास्ता ये लोग यूरोपियन सभ्यता को सीखे हुए होते तो एक-दूसरे को नोचकर खा जाते हैं, उसकी राख भी न बची रहने देते। लेकिन यहाँ तो फाहियान के जमाने का ही आदर्श है, सबको अपने काम से मतलब है। दूसरे के काम में दखल देना, दूसरे के मुनाफे की ओर दृष्टि डालना यहाँ महापाप है।” (पृष्ठ संख्या 112-113)
संदर्भ एवं प्रसंग – प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कहानी 'सेव और देव' से उधृत है।
इस कहानी के लेखक अज्ञेय जी हैं। यहाँ प्रोफेसर पहाड़ी लोगों के सम्बन्ध में सोचते हैं जो अपनी मस्ती में मस्त रहते हैं। गाने-बजाने में मस्त रहते हैं। ये सीधे-सादे लोग हैं। इसी भावना को यहाँ वर्णन किया गया है।
व्याख्या – ये पहाड़ी लोग अपने आप में लीन रहते हैं, इन्हें बाहर वालों से कोई मतलब नहीं।
ये भोले और भले लोग हैं। अगर पहाड़ी जैसे भले लोग नहीं होते तो प्राचीन संस्कृति के दर्शन नहीं होते। प्राचीन सभ्यता के अवशेष इन्हीं के कारण बचे हुए हैं। इन पर यूरोपियन सभ्यता का प्रभाव नहीं पड़ा है। अगर ये उस सभ्यता में पले होते तो एक दूसरे को नोचकर खा जाते । एक दूसरे की आलोचना करते, आपस में लड़ते-झगड़ते और एक-दूसरे का नामोनिशान तक मिटा देते पर यहाँ तो फाहियान के समय की सीधी-सादी सभ्यता के दर्शन होते हैं। यहँ प्राचीन सभ्यता के आदर्श के दर्शन होते हैं। सभी अपने ही काम में मस्त रहते हैं, व्यस्त रहते हैं। दूसरे से, दूसरे के काम से कोई मतलब नहीं रखते। अपने अतिरिक्त दूसरे के लाभ-हानि पर विचार करना पाप समझते हैं। कोई क्या करता है। कितना कमाता है या खर्च करता है, इन्हें उससे कोई मतलब नहीं है।
विशेष –
- तुलनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।
- फहियान के समय की सभ्यता का स्मरण किया गया है।
- खुदा-न-खास्ता जैसे उर्दू शब्दों का प्रयोग हुआ है।
- वर्णनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।
4. साधारणतया ऐसी दशा में प्रोफेसर साहब किंचित ग्लानि से उसकी ओर देखते और आगे चल देते, लेकिन इस समय वैसा नहीं कर सके। उन्हें जान पड़ा कि यह लड़का उस सारी प्राचीन आर्य सभ्यता को एक साथ ही नष्ट-भ्रष्ट किए दे रहा है जो फाहियान के समय से सदियों पहले से अक्षुण्ण बनी चली आई है।” (पृष्ठ 113)
व्याख्या – लड़का सेव तोड़कर पेड़ से कूदा।
उसके कूदने पर प्रोफेसर का ध्यान उसकी ओर गया। पेड़ों से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। इसलिए वे उपेक्षा करके चल सकते थे। उसकी ओर ध्यान भी नहीं देते। किन्तु उन्हें अनुभव हुआ कि यह लड़का सेवों की चोरी करके प्राचीन आर्य सभ्यता को नष्ट कर रहा है। प्राचीन सभ्यता में चोरी का नाम नहीं था, सभी-सच्चे ईमानदार थे। यह लड़का चोरी करके पहाड़ी लोगों को कलंकित कर रहा है। जो सभ्यता फाहियान के समय से अनवरत चली आई है, उसे यह अपने कार्य से कलंकित कर रहा है। इस कारण प्रोफेसर गजानन लड़के की करनी की उपेक्षा नहीं कर सके और रुक गए। उन्हें कुछ दुःख हुआ कि यह लड़का यहाँ के लोगों को, यहाँ की सभ्यता को कलंकित कर रहा है।
विशेष –
- फाहियान ने समय की सभ्यता का स्मरण किया गया है।
- प्रोफेसर के स्वभाव का चित्रण हुआ है।
5. रास्ता अब फिर घिर गया था, लेकिन चीड़ के दीर्घकाय वृक्षों से नहीं, अब उसके दोनों ओर थे सेव के छोटे-छोटे लचीले गातवाले पेड़, डार-डार पर लदे हुए फलों के कारण मानो विनय से झुके हुए – जहाँ सार होता है, वहाँ विनय भी अवश्य होता है, क्षुद व्यक्ति ही अविनयी हो सकता है और कभी-कभी हवा से झूम से जाते हुए। (पृष्ठ 113)
सन्दर्भ एवं प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश अज्ञेय द्वारा लिखित कहानी 'सेव और देव' से लिया गया है।
यह कहानी हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित है। प्रोफेसर कुल्लू के पहाड़ पर चढ़ रहे हैं, रास्ते में सेव के लचीले वृक्षों से रास्ता घिर गया है। फलों से लदे होने के कारण पेड़ों की शाखाएँ झुक गई हैं। उसी प्राकृतिक सुषमा का वर्णन यहाँ किया गया है।
व्याख्या – प्रोफेसर बस से उतरकर और अपना सामान डाक बंगले पर पहुँचाने के बाद कुल्लू के पहाड़ पर चढ़ने लगे।
रास्ते में पहले चीड़ के वृक्ष मिले, किन्तु आगे बढ़ने पर चीड़ के वृक्षों के स्थान पर सेव के लचीले वृक्ष मिले। रास्ता सेव के वृक्ष से घिर गया था। वे वृक्ष छोटे और लचीले गातवाले थे। सेव के वृक्षों की डालों पर सेव के फल लटके हुए थे जिनके कारण शाखाएँ झुक गई थीं। लेखक सोचता है जहाँ सार होता है वहाँ विनय अवश्य होती है, अर्थात् जो सज्जन और गम्भीर व्यक्ति होते हैं, वे हमेशा विनयी होते हैं। जो दुष्ट एवं क्षुद्र व्यक्ति होते हैं वे उद्दण्ड और अविनयी होते हैं। सेव के वृक्ष हवा के कारण कभी-कभी झुक जाते थे।
विशेष –
- मार्ग की प्रकृति का वर्णन हुआ है।
- सज्जन और दुष्ट व्यक्तियों का अन्तर दृष्टव्य है।
- फलों से लदे वृक्षों को यथार्थ वर्णन हुआ है।
- सेव के वृक्षों के आकार और लचीलेपन का वर्णन सजीव है।
सन्दर्भ एवं प्रसंग – प्रस्तुत गद्य पंक्तियाँ अज्ञेय जी की सुपरिचित कहानी 'सेव और देव' से उधृत हैं।
यह कहानी हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित है। देवी की पुरानी मूर्ति को खण्डहर मन्दिर में सुनसान स्थान पर पड़ी देखकर प्रोफेसर गजानन सोचते हैं कि इस मूर्ति को यहाँ नहीं होना चाहिए। किसी उपयुक्त स्थान पर इसे होना चाहिए जहाँ इसकी पूजा हो सके। इसी प्रसंग में उपर्युक्त पंक्तियाँ लिखी गई हैं।
व्याख्या – प्रोफेसर गजानन निर्जन स्थान पर सूने मन्दिर में उपेक्षित पड़ी देवी की मूर्ति को देखकर सोचते हैं कि देवमूर्ति की इतनी उपेक्षा।
यहाँ इसकी पूजा करने वाला कोई नहीं है। मनुष्य नश्वर है, मरणशीला है। उसके मरने के बाद उसकी अस्थियों पर कीड़ों को चलना तो स्वाभाविक है, यह बात समझ में भी आती है। लेकिन देवता की मूर्ति चाहे वह पत्थर की है जड़ है क्या उसको महत्व नहीं है। पत्थर की मूर्ति है, इससे क्या तात्पर्य, पर उसके प्रति भावना तो आदर की है। पत्थर की मूर्ति होने पर भी वह दैवी शक्ति की शाश्वतता की निशानी तो है। उसके प्रति लोगों की भावना तो श्रेष्ठ है। ऐसी पवित्र एवं देवत्व की भावना से युक्त इस मूर्ति को यहाँ पड़े रहना क्या उचित है। यह मूर्ति यहाँ नहीं होनी चाहिए, इससे देवत्व की भावना का अनादर होता है।
यह मूर्ति इन कीड़ों के बीच में पड़ी हैं। उन कीड़ों के बीच जिनमें श्रद्धा नहीं है। पूजा करने के लिए हाथ नहीं हैं, आँखें नहीं हैं मूर्ति को स्पर्श करने के लिए कोई साधन नहीं है, केवल गन्दी मूंछों से कीड़े इस मूर्ति को टटोलते हैं, इस ऐसे गन्दे स्थान पर नहीं होना चाहिए। यदि यह अच्छे स्थान पर होती तो इसकी कितनी उपासना होती। यह इस तरह उपेक्षित नहीं पड़ी रहती। लोग श्रद्धा से इसकी पूजा करते।
विशेष –
- प्रोफेसर की भावना का सुन्दर चित्रण किया गया है।
- मूर्ति की उपेक्षा का वर्णन है।
- मन्दिर की खण्डहर स्थिति का चित्रण दृष्टव्य है।
- कीड़ों का मूर्ति पर रेंगने का वर्णन चित्रित है।
7."मैं भी क्या यहाँ के लोगों की तरह अंधविश्वासी हूँ जो प्रेतों को मानूंगा? कविता के लिहाज से भले ही मुझे सोचना अच्छा लगे कि यहाँ प्रेत बसते हैं और रात में जब अँधेरा हो जाता है तब इस मन्दिर में देवी के आसपास नाचते हुए......देवी है, शिव है, इसके गण भी तो होने ही चाहिए। रात को मूर्तियों को घेर-घेर कर नाचते होंगे।”
संदर्भ एवं प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश सेव और देव' कहानी से उधृत है।
इसके लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय हैं। यह कहानी हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित है। प्रोफेसर पहाड़ी की चोटी पर स्थित देवी के मन्दिर में पहुँचते हैं। घहाँ देवी गणेश और शिव की मूर्तियाँ हैं। वे देवी के सौन्दर्य को देखकर उसे उठाते हैं। तब किसी अज्ञात आशंका के कारण उनका हृदय धड़कने लगता है। तब वे स्वत: अपने आप से बात करते हैं कि दिल धड़क क्यों रहा है। इसी क्रम में यह बात कही गई है।
सकता है। मेरे कवि हृदय तो प्रेतों की कल्पना कर सकता है और देवी के मन्दिर में नाचने की कल्पना कर सकता है। पर वास्तविक जगत में ऐसा नहीं है। फिर मैं क्यों घबरा रहा हूँ? यहाँ देवी और शिव की प्रतिमाएँ हैं तो उनके गण तो होंगे ही और वे रात को मूर्तियों के पास आकर नाचते भी होंगे। पर मुझे उनसे क्या लेना-देना मैं क्यों उस अन्धविश्वास में पड़ रहा हूँ।
विशेष –
- प्रोफेसर का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है।
- भूत-प्रेतों की कल्पना को निराधार बताया है।
- प्रोफेसर की धड़कन का चित्रण हुआ है।
- पहाड़ी लोगों के अन्धविश्वास का उल्लेख किया गया है।
8. उस समय प्रोफेसर के भीतर जो कुल्लू-प्रेम का ही नहीं मानव-प्रेम का संसार भर की शुभेच्छा का रस उमड़ रहा था, उसकी बराबरी कुल्लू के रस-भरे सेव भी क्या करते। प्रोफेसर साहब की स्नेह उंडेलती हुई दृष्टि के नीचे वे मानो और पक कर रस से भर जाते थे, उनका रंग कुछ और लाल हो जाता था, कितने रस-गद्गद हो रहे थे प्रोफेसर साहब। (पृष्ठ 117)
सन्दर्भ एवं प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक कहानी 'सेव और देव' से से उधृत है।
इस कहानी के लेखक अज्ञेय जी हैं। प्रोफेसर साहब देवी के मन्दिर से मूर्ति लेकर आये हैं। मूर्ति देवी की है, सुन्दर है और बहुमूल्य है। उसे लेकर अनेक कारण प्रोफेसर साहब बहुत प्रसन्न हैं, उनका मन प्रसन्न है, इसलिए उन्हें बाह्य प्रकृति भी सुन्दर और रसमयी दिखाई देती है। उसी का वर्णन यहाँ किया गया है।
व्याख्या – प्रोफेसर साहब देवी के मन्दिर से मूर्ति उठाकर लाये हैं, वे अत्यधिक प्रसन्न हैं।
मन चंगा तो खटौती में गंगा की लोकोक्ति के अनुसार उन्हें बाहरी प्रकृति भी प्रसन्न और आनन्दमय दीखती है। वे कुल्लू के सौन्दर्य से ही अभिभूत नहीं थे, कुल्लू का प्रेम ही उन्हें। प्रसन्न नहीं कर रहा था। बल्कि मानव प्रेम का संसार भर की शुभेच्छा का रस उमड़ रहा था। उन्हें इस समय जो आनन्द, जो सुख प्राप्त हो रहा था वह उन रस भरे सेवों से भी प्राप्त नहीं होता। उन्हें इस समय अपार सुख और आनन्द प्राप्त हो रहा था। आज उन्हें व सेव जिनका स्वाद वे पहले भी ले चुके हैं, अधिक रस भरे मीठे और पके हुए दिखते थे। आज प्रोफेसर साहब अधिक रसयुक्त हो रहे थे। उनका मन प्रसन्नता के कारण बल्लियों उछल रहा था। अपनी खुशी के आगे उन्हें सब कुछ फीका दिखाई पड़ रहा था। सेवों के रस की अनुभूति भी उन्हें मूर्ति प्राप्त करने के रस की अनुभूति से फीकी जान पड़ती थी। वे अनुभव कर रहे थे कि इस मूर्ति के दर्शन करके संसारभर के लोग प्रसन्न होंगे। उनकी शुभभावनाएँ मुझे प्राप्त होंगी।
विशेष –
- प्रोफेसर की मन:स्थिति का चित्रण किया गया है।
- प्रोफेसर की अत्यधिक प्रसन्नता का वर्णन हुआ है।
- मानव स्वभाव का यथार्थ चित्रण हुआ है।
सन्दर्भ एवं प्रसंग – प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कहानी 'सेव और देव' से लिया गया है।
इस कहानी के लेखक अज्ञेय जी हैं। लड़के को चाँटा मारने के बाद लेखक पर गाज गिरी। वह सोचने लगा कि लड़के ने तो सेव ही चुराया है, जिसकी यहाँ कोई कीमत नहीं है, पर तुम तो देवस्थान लूट लाये हो। यह सोचकर वे मूर्ति मन्दिर में रखने लौट जाते हैं। तब उनके मन में जो विचार आता है, उसी का यहाँ वर्णन है।
व्याख्या – प्रोफेसर को यह अनुभव हुआ कि लड़के की चोरी इतनी बड़ी नहीं है जितनी बड़ी चोरी मैंने की है।
मैं तो देवस्थान ही लूट लाया हूँ। यह सोचकर वे मूर्ति मन्दिर में रखने के लिए लौट पड़े। उस समय बुद्धि ने तर्क दिया कि इस मूर्ति का सुनसान टूटे मन्दिर में रखना अनुचित है। यह मूर्ति बहुत पुरानी और बहुमूल्य है। इसे उपयुक्त स्थान पर ही रखना चाहिए। यह सोचना कि मैं मूर्ति चुराकर ले जा रहा हूँ अनुचित है। यहाँ की मूर्ति यहीं रहनी चाहिए, यह विचार निरर्थक है। लड़के की चोरी से अपनी चोरी की तुलना करना अनुचित है। सेव इतने कीमती नहीं हैं जितनी यह मूर्ति कीमती और महत्त्वपूर्ण है। पर प्रोफेसर साहब इतने भावुक हो गए थे कि उन्होंने अपनी बुद्धि के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और वे मूर्ति को यथास्थान रखने के लिए लौट गए। मन में जैसे-जैसे अन्तर्द्वन्द्व बढ़ने लगा और लोगों की हलचल बढ़ने लगी, उनकी गति भी तीव्र होती गई। वे लोगों की निगाह से बचकर शीघ्र ही मन्दिर तक पहुँच जाना चाहते थे ताकि वे मूर्ति को मन्दिर में रख सकें।
विशेष –
- प्रोफेसर के अन्तर्द्वन्द्व का अच्छा वर्णन है।
- तार्किक बुद्धि का चित्रण हुआ है।
- लड़के और प्रोफेसर की तुलना का वर्णन प्रासंगिक है।
- प्रोफेसर की भावुकता का चित्रण सजीव है।
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