Official RBSE Solutions for Class 12 Hindi: रचना निबन्ध
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Chapter-wise Solutions for Hindi: रचना निबन्ध
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RBSE Class 12 Hindi रचना निबन्ध
परिभाषा
Answer: निबन्ध गद्य साहित्य का एक महत्वपूर्ण रूप है। इसे गद्य की कसौटी माना जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, यदि कविता कवियों की कसौटी है, तो निबन्ध गद्य की कसौटी है, क्योंकि भाषा की पूरी शक्ति का विकास निबन्ध में ही सबसे अधिक संभव होता है। निबन्ध हमें किसी विषय को गहराई से समझने और समझाने में मदद करता है। रामचन्द्र वर्मा ने गद्य में लिखित प्रबन्ध 'साहित्यिक रोचक गुंफन' को भी निबन्ध कहा है।
In simple words: निबन्ध गद्य की एक खास शैली है, जहाँ किसी विषय पर विचार विस्तार से लिखे जाते हैं। इसे गद्य का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
🎯 Exam Tip: निबन्ध की परिभाषा लिखते समय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मत ज़रूर शामिल करें, क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ है।
निबन्ध शब्द का अर्थ है
Answer: निबन्ध शब्द का अर्थ है 'विचारों को बांधना या गूंथना'। यह 'नि' और 'बंध' शब्दों से मिलकर बना है। इसका मतलब विचारों को आकर्षक और क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करना है। निबन्ध फ्रांसीसी भाषा के 'ऐसाई' और अंग्रेजी भाषा के 'ऐसे' शब्द का समानार्थक है। यह हमें किसी भी विषय पर अपने विचारों को संगठित रूप से प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता देता है। अंग्रेजी साहित्य के प्रसिद्ध निबन्धकार जानसन ने कहा है, "निबन्ध मन का आकस्मिक और उच्छृंखल आवेग, असम्बद्ध और चिन्तनहीन बुद्धि विलास मात्र है।"
In simple words: निबन्ध का मतलब है विचारों को अच्छे से जोड़कर लिखना। यह किसी भी विषय पर अपने विचारों को ठीक से बताने का तरीका है।
🎯 Exam Tip: निबन्ध शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उसके संस्कृत मूल (नि + बंध) और विदेशी समकक्षों (ऐसाई, ऐसे) का उल्लेख करें।
निबन्ध में भावतत्त्वे का होना अनिवार्य है
Answer: बाबू गुलाबराय के अनुसार, निबन्ध उस गद्य रचना को कहते हैं जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छन्दता, सौष्ठव और सजीवता तथा आवश्यक संगति और सम्बद्धता के साथ किया गया हो। इसका अर्थ है कि निबन्ध में लेखक के अपने भाव और विचार साफ दिखाई देने चाहिए। निबन्ध केवल जानकारी देने वाला नहीं होता, बल्कि उसमें लेखक की भावनाएं भी होती हैं।
In simple words: निबन्ध में लेखक की अपनी भावनाएँ और सोच होनी चाहिए। यह सिर्फ जानकारी का संग्रह नहीं होता, बल्कि लेखक के दिल की बात भी होती है।
🎯 Exam Tip: निबन्ध में भावतत्त्व के महत्व को समझाने के लिए बाबू गुलाबराय की परिभाषा को उद्धृत करना प्रभावकारी होता है।
विषय तथा आवश्यक तत्त्व
Answer: निबन्ध का विषय कुछ भी हो सकता है। यह किसी भी छोटी-से-छोटी वस्तु के बारे में लिखा जा सकता है। एक अच्छे निबन्ध के लिए तीन मुख्य बातें आवश्यक हैं, जो इस प्रकार हैं:
1. विषय से संबंधित किसी कवि या विद्वान की कविता या सूक्ति का प्रयोग।
2. विषय की सही परिभाषा देना।
3. उसकी आवश्यकता या महत्व को दिखाना या उसकी वर्तमान स्थिति का वर्णन करना।
ये बातें निबन्ध को प्रभावी और रुचिकर बनाती हैं, जिससे पाठक को विषय की गहरी समझ मिलती है।
In simple words: निबन्ध किसी भी चीज के बारे में लिखा जा सकता है। इसे अच्छा बनाने के लिए, हमें कविता, परिभाषा और विषय के महत्व को शामिल करना चाहिए।
🎯 Exam Tip: निबन्ध के विषय और आवश्यक तत्वों को बताते हुए यह स्पष्ट करें कि ये तत्व निबन्ध को कितना प्रभावी बनाते हैं।
निबन्ध की विशेषताएँ
Answer: निबन्ध की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
1. निबन्ध एक ऐसी गद्य-रचना है जिसका आकार सीमित होता है।
2. निबन्ध में लेखक का व्यक्तिगत स्वभाव और व्यक्तित्व साफ झलकता है, जबकि साहित्य के अन्य रूपों में यह छिपा रह सकता है।
3. यह अधूरा होते हुए भी अपने आप में एक पूरी रचना होती है।
4. निबन्ध सामान्य गद्य से अधिक मनोरंजक होता है, क्योंकि लेखक अपनी शैली को बेहतर बनाने के लिए ध्वनि, हास्य, व्यंग्य, लाक्षणिकता और अलंकारों का उपयोग करता है।
5. इसमें लेखक अपने विचारों को खुलकर प्रस्तुत करता है और अपना निजी दृष्टिकोण दिखाता है। यही निबन्ध का सबसे खास गुण है।
6. निबन्ध में भावनाओं और विचारों का सुंदर तरीके से जुड़ा होना ज़रूरी है। भावनाओं के बिना निबन्ध केवल बुद्धि का खेल बन जाता है। एक अच्छा निबन्ध पाठक को सोचने पर मजबूर करता है।
In simple words: निबन्ध छोटा होता है, इसमें लेखक की अपनी सोच दिखती है, यह मजेदार होता है और इसमें विचारों को अच्छे से जोड़ा जाता है।
🎯 Exam Tip: निबन्ध की विशेषताओं को सूचीबद्ध करते हुए, लेखक की व्यक्तिगत छाप और विचारों के महत्व पर जोर दें।
लेखन-शैली की दृष्टि से निबंध के भेद
Answer: निबन्धकार अपनी बात कहने के लिए जिस तरीके का इस्तेमाल करते हैं, उसे शैली कहते हैं। हर निबन्ध की अपनी एक खास शैली होती है। निबन्ध की शैलियाँ मुख्य रूप से चार प्रकार की होती हैं:
1. समास शैली: इस शैली में कम-से-कम शब्दों में ज़्यादा-से-ज़्यादा बात कही जाती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने विचारात्मक निबन्धों के लिए इसी शैली को अपनाया था। यह शैली हमें विचारों को संक्षेप में प्रस्तुत करने में मदद करती है।
2. व्यास शैली: किसी बात को विस्तार से समझाने के लिए व्यास शैली का उपयोग किया जाता है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और श्यामसुंदर दास ने इसी शैली को अपनाया है।
3. धारा शैली: भावात्मक निबन्ध इस शैली में लिखे जाते हैं। इसमें विचारों और भावनाओं को तेज गति से व्यक्त किया जाता है। अध्यापक पूर्ण सिंह के निबन्ध इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं।
4. तरंग, प्रलाप तथा व्यंग्य शैलियाँ: ये शैलियाँ भी निबन्धों में उपयोग की जाती हैं। हरिशंकर परसाई के व्यंग्य निबन्ध इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। ये शैलियाँ निबन्धों को और अधिक रोचक और प्रभावशाली बनाती हैं।
In simple words: निबन्ध लिखने के चार मुख्य तरीके होते हैं: समास (कम शब्दों में ज़्यादा बात), व्यास (बात को विस्तार से कहना), धारा (भावनात्मक), और तरंग/व्यंग्य (मज़ेदार या कटाक्ष भरा)।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक शैली के साथ एक प्रसिद्ध निबन्धकार का उदाहरण देना आपके उत्तर को अधिक प्रभावी बनाएगा।
रचना की दृष्टि से निबन्ध के भेद
Answer: रचना के आधार पर निबन्ध के निम्नलिखित भेद हैं:
1. वर्णनात्मक निबन्ध (किसी वस्तु या स्थान का वर्णन)
2. विवरणात्मक निबन्ध (किसी घटना या यात्रा का विवरण)
3. भावात्मक निबन्ध (भावनाओं पर आधारित)
4. विचारात्मक निबन्ध (किसी विषय पर विचार और तर्क)
5. संस्मरणात्मक निबन्ध (यादों पर आधारित)
6. ललित निबन्ध (सुंदर भाषा और कल्पना से युक्त)
भारतेन्दु युग से लेकर आज तक हिन्दी निबन्ध का पूरा विकास हो चुका है और यह साहित्य की एक समृद्ध विधा बन गई है।
In simple words: निबन्ध छह तरह के होते हैं: वर्णन करने वाले, घटना बताने वाले, भावना वाले, सोच-विचार वाले, यादों वाले और सुंदर भाषा वाले।
🎯 Exam Tip: निबन्ध के प्रकारों को याद रखने के लिए प्रत्येक प्रकार के नाम के साथ उसकी मुख्य विशेषता को संक्षेप में याद करें।
मध्य
Answer: निबन्ध का मध्य भाग सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण होता है। इसमें लेखक की योग्यता, कल्पना-शक्ति, गहन अध्ययन, अनुभव और विचारों की शक्ति का पता चलता है। इसलिए, रूपरेखा के अनुसार इसे छोटे-छोटे वाक्यों और अनुच्छेदों में बांटकर रोचक तरीके से प्रस्तुत करना चाहिए। यह हिस्सा निबन्ध को गहराई और विश्वसनीयता देता है।
In simple words: निबन्ध का बीच का हिस्सा बहुत खास होता है। इसमें लेखक की सारी जानकारी और कल्पना दिखती है। इसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर मजेदार तरीके से लिखना चाहिए।
🎯 Exam Tip: निबन्ध के मध्य भाग में अपनी रचनात्मकता और विषय-ज्ञान का पूरा प्रदर्शन करें, क्योंकि यही भाग पाठक को सबसे अधिक प्रभावित करता है।
अन्त
Answer: निबन्ध के अंतिम भाग को उपसंहार भी कहते हैं। इसमें पूरे निबन्ध का निष्कर्ष या निचोड़ आ जाना चाहिए। इसमें संबंधित विषय की उपलब्धियों और भविष्य की संभावनाओं पर भी ध्यान दिया जा सकता है। निबन्ध का आकार न बहुत बड़ा और न बहुत छोटा होना चाहिए। यदि शब्द संख्या के लिए कोई निर्देश हो, तो उसी के अनुसार निबन्ध लिखना चाहिए। यह भाग निबन्ध को एक पूर्णता प्रदान करता है।
In simple words: निबन्ध के आखिर में पूरी बात का निचोड़ लिखना चाहिए। इसमें यह भी बताएँ कि क्या अच्छा हुआ और आगे क्या हो सकता है। निबन्ध सही आकार का होना चाहिए।
🎯 Exam Tip: उपसंहार में निबन्ध के मुख्य बिंदुओं को दोहराते हुए एक सकारात्मक और भविष्योन्मुखी संदेश दें।
निबन्ध की भाषा
Answer: निबन्ध की भाषा शुद्ध, भावानुकूल, प्रसंग से जुड़ी हुई होनी चाहिए, और इसमें कहावतें तथा मुहावरे भी शामिल होने चाहिए। वाक्य प्रसंग के अनुसार छोटे या बड़े, सुगठित, समझने में आसान और सरल होने चाहिए। जटिल वाक्य बनाने से हमेशा बचना चाहिए। सरल और स्पष्ट भाषा पाठक को विषय से आसानी से जोड़ती है।
In simple words: निबन्ध की भाषा साफ, आसान और विषय के हिसाब से होनी चाहिए। इसमें मुहावरे इस्तेमाल करें और मुश्किल वाक्य न लिखें।
🎯 Exam Tip: निबन्ध की भाषा को सरल और प्रवाहमयी बनाएँ ताकि पाठक बिना किसी रुकावट के उसे पढ़ सके।
Question 1. स्वच्छ भारत:
Answer:
संकेत बिन्दु-
- स्वच्छता क्या है?
- स्वच्छता के प्रकार
- स्वच्छता के लाभ
- स्वच्छता: हमारा योगदान
- उपसंहार।
स्वच्छता क्या है?
निरंतर इस्तेमाल से या वातावरण के असर से कोई भी चीज या जगह गंदी हो जाती है। धूल, पानी, धूप, कचरे की परत को साफ करना, धोना, मैल और गंदगी को हटाना ही स्वच्छता कहलाती है। अपने शरीर, कपड़े, घर, गलियां, नालियां और अपने मोहल्ले तथा शहरों को साफ रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। स्वच्छता हमें बीमारियों से बचाती है और हमारा मन भी खुश रखती है।
स्वच्छता के लाभ
कहते हैं कि स्वच्छता भगवान को भी प्यारी है। यह न केवल भगवान का आशीर्वाद पाने के लिए, बल्कि हमारे जीवन को सुखी, सुरक्षित और चिंता-मुक्त बनाने के लिए भी बहुत ज़रूरी है। गंदगी या मैल आँखों को बुरा तो लगता ही है, साथ ही यह हमारे स्वास्थ्य से भी सीधा जुड़ा होता है। गंदगी कई बीमारियों को जन्म देती है, प्रदूषण का कारण बनती है और हमारी असभ्यता की निशानी है। इसलिए, व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वच्छता बनाए रखना हर नागरिक का कर्तव्य है। स्वच्छता से हमारा वातावरण शुद्ध रहता है।
स्वच्छता के प्रत्यक्ष लाभों के अलावा, इसके कुछ अप्रत्यक्ष और लंबे समय तक रहने वाले फायदे भी हैं। सार्वजनिक स्वच्छता से व्यक्ति और सरकार दोनों को फायदा होता है। बीमारियों पर होने वाला खर्च कम होता है और स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला सरकारी खर्च भी कम होता है। इस बचत का उपयोग अन्य सेवाओं में किया जा सकता है।
स्वच्छता : हमारा योगदान
स्वच्छता सिर्फ सरकारी उपायों से पूरी नहीं हो सकती। इसमें हर नागरिक की सक्रिय भागीदारी बहुत ज़रूरी है। हम कई तरह से स्वच्छता में योगदान दे सकते हैं, जैसे:
- घर का कूड़ा-करकट गली या सड़क पर न फेंकें। उसे सफाईकर्मी के आने पर उनकी ठेले या वाहन में ही डालें।
- कूड़े-कचरे को नालियों में न बहाएँ, इससे नालियां जाम हो जाती हैं और गंदा पानी सड़कों पर बहने लगता है।
- पॉलिथीन का बिल्कुल इस्तेमाल न करें। यह गंदगी बढ़ाता है और जानवरों के लिए भी बहुत खतरनाक है।
- घरों के शौचालयों की गंदगी नालियों में न बहाएँ। खुले में शौच न करें और बच्चों को भी नालियों या गलियों में शौच न कराएँ।
- नगर पालिका के सफाईकर्मियों का सहयोग करें। सफाई व्यवस्था को बेहतर बनाने में हर किसी की भागीदारी आवश्यक है।
उपसंहार
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 'स्वच्छ भारत अभियान' शुरू किया है। इसका प्रचार-प्रसार मीडिया के ज़रिए लगातार किया जा रहा है। कई नेता, अधिकारी, कर्मचारी और प्रसिद्ध लोग इसमें हिस्सा ले रहे हैं। जनता को अपने स्तर पर पूरा सहयोग देना चाहिए। इसके साथ ही गांवों में खुले में शौच की प्रथा खत्म करने के लिए लोगों को घरों में शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इसके लिए आर्थिक सहायता भी दी जा रही है। इन अभियानों में समाज के हर वर्ग को पूरा सहयोग करना चाहिए।
In simple words: स्वच्छता का मतलब है गंदगी हटाना। यह हमारे स्वास्थ्य और समाज के लिए बहुत ज़रूरी है। हमें कूड़ा सही जगह फेंकना चाहिए, पॉलिथीन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और शौचालय का उपयोग करना चाहिए। सरकार ने 'स्वच्छ भारत अभियान' चलाया है, जिसमें हम सबको मिलकर काम करना चाहिए।
🎯 Exam Tip: स्वच्छ भारत अभियान के उद्देश्य, लाभ और हर नागरिक की भूमिका को स्पष्ट रूप से लिखें। स्वच्छता को एक सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में दर्शाएँ।
Question 2. डिजिटल इंडिया:
Answer:
रूपरेखा -
- परिचय
- डिजिटल होने का अर्थ
- डिजिटल अभियान के लाभ
- चुनौतियाँ
- आगे बढ़ें
- उपसंहार।
परिचय
'डिजिटल इंडिया' भारतीय समाज को अंतरराष्ट्रीय तरीकों से कदम मिलाकर चलने की प्रेरणा देने वाला एक सराहनीय और साहसिक प्रयास है। यह भारत सरकार की एक नई पहल है। इसे भारत के भविष्य को ध्यान में रखकर बनाई गई एक दूरगामी योजना कहा जा सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को डिजिटल रूप से सशक्त बनाना है। 'डिजिटल इंडिया' के तीन मुख्य लक्ष्य हैं:
1. हर भारतीय नागरिक को डिजिटल सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
2. जनता की मांग पर आधारित डिजिटल सेवाओं को चलाना और उन्हें लोगों तक पहुंचाना।
3. लोगों को डिजिटल उपकरणों का उपयोग करने में कुशल बनाना।
यह योजना देश के हर नागरिक को तकनीक से जोड़ना चाहती है।
डिजिटल होने का अर्थ
आम आदमी के लिए डिजिटल बनने का मतलब है नकद लेन-देन से बचकर ऑनलाइन (मोबाइल, पेटीएम, डेबिट कार्ड आदि) लेन-देन का उपयोग करना, कागजी काम को कम-से-कम करना। सरकारी और बैंकिंग कामों तथा व्यापारिक गतिविधियों में पारदर्शिता लाना। इसका उद्देश्य धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी से बचाव करना भी है।
डिजिटल अभियान के लाभ
यह अभियान समाज के सभी वर्गों को फायदा पहुंचाएगा। इसके मुख्य लाभ इस प्रकार हैं:
- यह व्यवस्था घर चलाने वाली महिलाओं को परिवारिक आय-व्यय, खरीदारी और मासिक व वार्षिक प्रबंधन में मदद करेगी।
- छात्रों को सही स्कूल चुनने, पढ़ाई की सामग्री आसानी से मिलने और छात्रवृत्ति आदि के लिए ऑनलाइन आवेदन भेजने में मदद मिलेगी। इससे किताबों का बोझ भी कम होगा।
- बेरोजगार युवाओं को अच्छी नौकरियां ढूंढने में आसानी होगी। डिजिटल आवेदन पत्रों से पारदर्शी चयन प्रक्रिया का लाभ मिलेगा। वे ऑनलाइन प्रमाण पत्र जमा कर सकेंगे।
- व्यापारियों और उद्योगों को भी इससे फायदा होगा, नकद लेन-देन के झंझट से मुक्ति मिलेगी। ग्राहक खुश रहेंगे। सरकारी कामों, आयकर, ट्रांसपोर्ट और व्यापार के विस्तार में पारदर्शिता आएगी।
- अभिलेखों की सुरक्षा, ई-हस्ताक्षर, मोबाइल बैंकिंग, सरकारी कामों में दलालों से मुक्ति, जमीन-जायदाद की खरीद-बिक्री में पारदर्शिता और ई-पंजीकरण आदि 'डिजिटल इंडिया' के कई लाभ हैं।
चुनौतियाँ
डिजिटल प्रणाली को लागू करने में कई चुनौतियाँ हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जनता को इस पर विश्वास दिलाकर इसमें भागीदार बनाया जाए। शहरों के लोगों को भले ही डिजिटल उपकरण इस्तेमाल करना आसान लगता हो, लेकिन करोड़ों ग्रामीण और अशिक्षित लोगों को इसका उपयोग करने में सक्षम बनाना एक लंबी और धैर्य वाली प्रक्रिया है। इसके अलावा, कर चोरी करने वाले लोगों को यह प्रणाली पसंद नहीं आएगी। इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा के प्रति लोगों में भरोसा जगाना होगा। साइबर अपराधों, हैकिंग और धोखाधड़ी से जनता को सुरक्षा प्रदान करनी होगी।
आगे बढ़ें
चुनौतियाँ, शंकाएँ और बाधाएँ हर नए और अच्छे काम में आती रहती हैं। सरकारी ईमानदारी और जनता के सहयोग से, इस प्रणाली को स्वीकार्य और सफल बनाना देश के हित के लिए बहुत ज़रूरी है। उम्मीद है कि हम सफल होंगे और भारत एक डिजिटल रूप से सशक्त राष्ट्र बनेगा।
In simple words: डिजिटल इंडिया का मतलब है भारत को तकनीक से जोड़ना। इससे कागजी काम कम होगा, पैसा ऑनलाइन भेजा जाएगा और सरकारी काम साफ-सुथरे होंगे। यह सभी को फायदा पहुँचाएगा, लेकिन इसे लागू करने में लोगों को समझाना और सुरक्षा देना बड़ी चुनौती है।
🎯 Exam Tip: डिजिटल इंडिया के लक्ष्यों और लाभों को स्पष्ट रूप से बताते हुए, इसकी चुनौतियों और उनके समाधानों पर भी ध्यान दें।
Question 3. खुला शौच मुक्त गाँव:
Answer:
संकेत बिन्दु -
- खुला शौच मुक्त से आशय
- सरकारी प्रयास
- जन जागरण
- हमारा योगदान
- उपसंहार।
जिस गाँव में लोग बाहर खेतों या जंगलों में शौच के लिए नहीं जाते, बल्कि घरों में ही शौचालय होते हैं, उसे 'खुला शौच मुक्त गाँव' कहा जाता है। गांवों में खुले में शौच जाने की प्रथा सदियों पुरानी है। जनसंख्या कम होने और सामाजिक मर्यादाओं के कारण इस परंपरा के कुछ फायदे थे। जैसे, गांव से दूर शौच करने से 'मैला ढोने' के काम से मुक्ति मिलती थी और स्वच्छता बनी रहती थी। मल अपने आप खेतों में खाद का काम करता था। लेकिन आज के समय में खुले में शौच बीमारियों को न्यौता देता है और महिलाओं की असुरक्षा का कारण बनता है। इसलिए इस प्रथा को जल्दी खत्म करना स्वच्छता, स्वास्थ्य और महिला सुरक्षा के लिए बहुत ज़रूरी है। यह प्रथा समाज में बड़े बदलाव की मांग करती है।
सरकारी प्रयास
कुछ साल पहले तक इस दिशा में सरकारी प्रयास बहुत कम थे। गांवों में कुछ अमीर और साफ-सुथरे परिवारों में ही घरों में शौचालय होते थे, वह भी केवल महिलाओं के लिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ग्रामीण महिलाओं और खासकर किशोरियों के साथ होने वाली शर्मनाक घटनाओं पर ध्यान दिया और 'स्वच्छता अभियान' के साथ 'खुला शौच मुक्त गाँव अभियान' को भी जोड़ा। इस दिशा में सरकारी प्रयास लगातार चल रहे हैं।
घरों में शौचालय बनवाने वालों को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता दी जा रही है। अखबारों और टीवी विज्ञापनों में प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा बड़े मनोवैज्ञानिक तरीके से घरों में शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इन प्रयासों से गाँवों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।
जन जागरण
किसी पुरानी गलत प्रथा को छोड़ने में भारतीय ग्रामीण समाज को बहुत झिझक होती है। उन पर सरकारी प्रयासों से ज़्यादा, अपने बीच के प्रभावशाली लोगों, धर्मगुरुओं और मनोवैज्ञानिक प्रेरणाओं का असर होता है। इसलिए 'खुले में शौच' खत्म करने के लिए जन जागरण बहुत ज़रूरी है। इसके लिए कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं भी काम कर रही हैं। धार्मिक आयोजनों में प्रवक्ताओं द्वारा इस प्रथा के बुरे परिणामों के बारे में बताना चाहिए। शिक्षक, छात्र-छात्राओं को प्रदर्शन का सहारा लेना चाहिए। गांव के पढ़े-लिखे युवाओं को इस काम में हाथ बंटाना चाहिए। मीडिया और गांव के सक्रिय किशोरों और युवाओं द्वारा भी ऐसे जन जागरण के प्रयास किए जा रहे हैं। खुले में शौच करते व्यक्ति को देखकर सीटी बजाना भी एक मजेदार तरीका है।
हमारा योगदान
'हमारा' में छात्र-छात्राएं, शिक्षक, राजनेता, व्यवसायी, जागरूक नागरिक सभी शामिल हैं। सभी के सामूहिक प्रयास से बुराई को खत्म किया जा सकता है। ग्रामीण जनता को खुले में शौच से होने वाले नुकसानों के बारे में समझाना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि इससे रोग फैलते हैं और धन तथा समय की बर्बादी होती है। साथ ही यह एक अशोभनीय आदत है। यह महिलाओं के लिए कई समस्याएँ और संकट पैदा करता है। घरों में छात्र-छात्राएं अपने माता-पिता आदि को इससे छुटकारा पाने के लिए प्रेरित करें। हर व्यक्ति की थोड़ी सी कोशिश बड़ा फर्क ला सकती है।
उपसंहार
खुले में शौच मुक्त गांवों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकारी प्रयासों के अलावा, ग्राम प्रधानों तथा स्थानीय समझदार और प्रभावशाली लोगों को इस अभियान में रुचि लेनी चाहिए। इससे न केवल ग्रामीण भारत को रोगों, बीमारियों पर होने वाले खर्च से मुक्ति मिलेगी बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि भी सुधरेगी। यह एक ऐसा कदम है जिससे पूरे समाज का जीवन बेहतर होगा।
In simple words: 'खुला शौच मुक्त गाँव' वह है जहाँ लोग शौच के लिए बाहर नहीं जाते। यह स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्वच्छता के लिए बहुत ज़रूरी है। सरकार प्रयास कर रही है और लोगों को भी मिलकर काम करना चाहिए ताकि सभी गाँव खुले में शौच मुक्त हो सकें।
🎯 Exam Tip: इस निबन्ध में स्वच्छता के सामाजिक, स्वास्थ्य और नैतिक पहलुओं को शामिल करें। सरकारी योजनाओं और व्यक्तिगत भागीदारी दोनों का उल्लेख करें।
Question 4. मेक इन इंडिया:
Answer:
संकेत बिंदु -
- भूमिका
- सम्पन्नता क्यों?
- धनोपार्जन और उद्योग
- मेक इन इंडिया
- विदेशी पूँजी की जरूरत
- पूँजी के साथ तकनीक का आगमन
- उपसंहार।
भूमिका
जब हम वस्तुओं पर "मेड इन इंडिया" का निशान देखते हैं, तो हमारा मन गर्व से भर जाता है। यह देश में अपने उद्योगों के लगातार विकास का संकेत तो है ही, साथ ही हर भारतीय में आत्मविश्वास भी जगाता है। हमारे प्रधानमंत्री जी ने इसके साथ 'मेक इन इंडिया' का नारा दिया है, जिसका मतलब है विदेशी निवेशकों को भारत में उद्योग लगाने के लिए बुलाना। औद्योगिक तरक्की और समृद्धि के नज़रिए से यह एक नई सोच है, जो भारत को वैश्विक स्तर पर एक मजबूत पहचान दिलाएगी।
सम्पन्नता क्यों?
सवाल उठता है कि इंसान सम्पन्न क्यों होना चाहता है? हमारे जीवन में कई ज़रूरतें होती हैं। इन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए साधन चाहिए। ये साधन हमें सम्पन्न होने पर ही मिलेंगे। केवल सुख से जीने के लिए धन कमाना और सम्पन्न होना बहुत ज़रूरी है। धन हमें बेहतर जीवन जीने का मौका देता है।
धनोपार्जन और उद्योग
धन कमाने के लिए हमें कुछ न कुछ पैदा करना होगा। कृषि और उद्योग उत्पादन के मुख्य तरीके हैं। व्यापार भी इसका एक ज़रिया है। हमें कुछ बनाना चाहिए, कुछ चीज़ें बनानी चाहिए, यह बहुत ज़रूरी है। देश को आगे बढ़ाने और समृद्ध बनाने के लिए हमें अपनी ज़रूरतों की ही नहीं, दूसरों की ज़रूरतों की चीज़ें भी बनानी होंगी। यह हमारे आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
मेक इन इंडिया
आजकल छोटे-छोटे देश भी अपने यहाँ बनी चीज़ों को विदेशों में बेचकर अमीर बन रहे हैं। दूसरे विश्वयुद्ध में बर्बाद हुआ जापान भी सिर्फ अपने देश की ताकत से ही दोबारा खड़ा हो पाया था। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने 'मेक इन इंडिया' का नारा दिया है। इसका लक्ष्य है कि विदेशी पैसा भारत में आए और यहाँ उद्योग लगाए जाएं। इन उद्योगों में बनी चीज़ें भारत में ही बनेंगी। उन्हें दुनिया के दूसरे देशों के बाज़ारों में बेचा जाएगा। इससे भारत में पैसा आएगा और वह एक अमीर देश बन पाएगा। यह पहल देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएगी।
विदेशी पूँजी की जरूरत
उद्योगों को लगाने और बढ़ाने के लिए पैसे की ज़रूरत तो होगी ही। अभी भारत के पास इतना पैसा नहीं है कि वह अपने साधनों से बड़े-बड़े उद्योग लगा सके और उन्हें चला सके। हमारे प्रधानमंत्री चाहते हैं कि विदेशों में रहने वाले अमीर भारतीय और दूसरे उद्योगपति भारत आएं और यहाँ अपना पैसा लगाकर उद्योग लगाएँ। उन्हें भारत का बाज़ार तो मिलेगा ही, वे विदेशी बाज़ारों में भी अपना सामान बेचकर मुनाफा कमा सकेंगे। इससे भारत और उन्हें दोनों को लाभ होगा, जिससे देश में रोज़गार भी बढ़ेगा।
पूँजी के साथ तकनीक का आगमन
प्रधानमंत्री जानते हैं कि भारत को सिर्फ पैसा ही नहीं, नई तकनीक की भी ज़रूरत है। वह विदेशी उद्योगपतियों को भारत में उत्पादन के लिए बुलाकर पैसे के साथ-साथ नई तकनीक हासिल करने के रास्ते भी खोलना चाहते हैं। सड़क, बिजली, परिवहन जैसे क्षेत्रों में सुधार करना होगा। उद्योग लगाने में कानूनी अड़चनें दूर हों और सरकारी अनुमतियाँ आसानी से मिलें, ऐसा इंतज़ाम करना होगा। भारत सरकार इस दिशा में लगातार सही कदम उठा रही है। यह तकनीक देश के विकास को गति प्रदान करेगी।
In simple words: 'मेक इन इंडिया' का मतलब है कि भारत में ज़्यादा चीज़ें बनाई जाएँ। इससे देश आत्मनिर्भर बनेगा, विदेशी पैसा आएगा और नई तकनीक भी आएगी। यह देश को अमीर और मजबूत बनाने में मदद करेगा।
🎯 Exam Tip: 'मेक इन इंडिया' के उद्देश्यों, विदेशी पूंजी और तकनीक के महत्व पर विशेष ध्यान दें, साथ ही आधारभूत संरचना में सुधार की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालें।
Question 5. बाल श्रम से जूझता बचपन:
Answer:
संकेत बिंदु -
- बाल श्रमिक कौन
- बाल श्रमिक की दिनचर्या
- गृहस्वामियों व उद्यमियों द्वारा शोषण
- सुधार हेतु सामाजिक एवं कानूनी प्रयास।
बाल श्रमिक कौन
14 साल से कम उम्र के जो बच्चे मज़दूरी या उद्योगों में काम करते हैं, उन्हें बाल श्रमिक कहते हैं। खेलने, कूदने और पढ़ने की उम्र में मेहनत-मज़दूरी की चक्की में पिसना, हमारे समाज पर एक कलंक है। ढाबों, कारखानों और घरों में बहुत खराब हालात में काम करने वाले ये बाल श्रमिक देश की झूठी तरक्की पर एक तमाचा हैं। इनकी संख्या लाखों में है। बाल श्रम बच्चों के भविष्य को छीन लेता है।
बाल श्रमिक की दिनचर्या
इन बाल श्रमिकों की दिनचर्या पूरी तरह उनके मालिकों या काम देने वालों पर निर्भर होती है। गर्मी हो, बारिश हो या सर्दी हो, इन्हें सुबह जल्दी उठकर काम पर जाना पड़ता है। इन्हें खाना साथ ले जाना पड़ता है या फिर मालिकों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है। इनके काम के घंटे तय नहीं होते। बारह से चौदह घंटे तक भी काम करना पड़ता है। कुछ बच्चे तो 24 घंटे के बंधुआ मजदूर होते हैं। बीमार होने या किसी और कारण से अनुपस्थित होने पर इनसे बुरा व्यवहार किया जाता है, यहाँ तक कि उन्हें बेरहमी से पीटा भी जाता है।
गृहस्वामियों व उद्यमियों द्वारा शोषण
घरों में या कारखानों में काम करने वाले इन बच्चों का कई तरह से शोषण होता है। इन्हें बहुत कम पैसे दिए जाते हैं। काम के घंटे तय नहीं होते। बीमार होने या किसी अन्य कारण से अनुपस्थित होने पर पैसे काट लिए जाते हैं। इनकी काम करने की जगह बहुत बुरी होती है। सोने और खाने का कोई इंतज़ाम नहीं होता। नंगी ज़मीन पर खुले आसमान में या किसी कोने में सोने को मजबूर होते हैं। रूखा-सूखा या जूठन खाने को दी जाती है। बात-बात पर डाँट-फटकार, पिटाई, काम से निकाल देना तो रोज़ की बात है। अगर दुर्भाग्य से कोई नुकसान हो गया तो पिटाई या पैसे काटना जैसी बातें आम हैं। बड़े मज़दूरों की तो यूनियनें होती हैं जो अन्याय और अत्याचार का विरोध कर पाती हैं, लेकिन इन बेचारों की सुनने वाला कोई नहीं। मालिक और दलाल उनका शारीरिक शोषण भी करते हैं।
सुधार हेतु सामाजिक एवं कानूनी प्रयास
स्थिति में सुधार लाने के लिए सामाजिक और कानूनी प्रयासों की आवश्यकता है। बाल श्रम को रोकने के लिए सख्त कानून बनाए गए हैं और उन्हें सख्ती से लागू करना चाहिए। समाज को भी जागरूक होना चाहिए कि बच्चों को काम पर लगाना अपराध है। शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से इस समस्या को समाप्त किया जा सकता है।
In simple words: बाल श्रमिक 14 साल से कम उम्र के बच्चे होते हैं जो मज़दूरी करते हैं। उनकी दिनचर्या बहुत मुश्किल होती है और उनका बहुत शोषण होता है। समाज और सरकार को मिलकर इस बाल श्रम को रोकना चाहिए ताकि बच्चों को उनका बचपन वापस मिल सके।
🎯 Exam Tip: बाल श्रम की परिभाषा, बच्चों के शोषण के प्रकार और इसे रोकने के लिए सामाजिक व कानूनी उपायों पर स्पष्ट रूप से लिखें।
Question 6. बेटी बचाओ : बेटी पढ़ाओ:
Answer:
संकेत बिन्दु -
- घोर पाप
- कन्या-भ्रूण हत्या के कारण
- कन्या-भ्रूण हत्या के दुष्परिणाम
- कन्या-भ्रूण हत्या रोकने के उपाय।
घोर पाप
हमारी भारतीय संस्कृति में कन्या को देवी के रूप में माना जाता है। नवरात्रि और देवी जागरण के समय कन्या-पूजन की परंपरा से सभी परिचित हैं। हमारे धर्मग्रंथ भी नारी की महानता का गुणगान करते हैं। आज उसी भारत में कन्या को माँ के गर्भ में ही खत्म कर देने की शर्मनाक परंपरा चल रही है। यह घोर पाप सभ्य समाज के सामने हमारे सिर को झुका देता है। बेटी को बचाना और पढ़ाना समाज के लिए बहुत ज़रूरी है।
कन्या-भ्रूण हत्या के कारण
कन्या भ्रूण को खत्म करने के पीछे कई कारण हैं। कुछ शाही और सामंत परिवारों में विवाह के समय वर-पक्ष के सामने न झुकने के झूठे अहंकार ने कन्याओं की बलि ली। बेटी की तुलना में बेटे को अधिक महत्व देना, दहेज का लालच, दहेज प्रथा और बेटी के पालन-पोषण तथा सुरक्षा में आ रही समस्याओं ने भी इस गलत काम को बढ़ावा दिया है। दहेज के लालचियों ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है। झूठी शान दिखाने के कारण कन्या का विवाह सामान्य परिवारों के लिए बोझ बन गया है।
कन्या-भ्रूण हत्या के दुष्परिणाम
चिकित्सा विज्ञान की तरक्की के कारण आज गर्भ में ही संतान के लिंग का पता लगाना संभव हो गया है। अल्ट्रासाउंड मशीन से पता लग जाता है कि गर्भ में लड़की है या लड़का। अगर गर्भ में लड़की है, तो कुछ गलत सोच वाले लोग डॉक्टरों की मदद से उसे नष्ट करा देते हैं। इस गलत व्यवहार के बुरे परिणाम सामने आ रहे हैं। देश के कई राज्यों में लड़कियों और लड़कों के अनुपात में चिंताजनक कमी आई है। लड़कियों की कमी होने से कई युवक कुंवारे घूम रहे हैं। अगर सभी लोग सिर्फ बेटा चाहेंगे तो बेटियां कहां से आएंगी? शादी कहां से होगी? वंश कैसे चलेगा? इस बड़े पाप में महिलाओं का भी सहमत होना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।
कन्या-भ्रूण हत्या रोकने के उपाय
कन्या-भ्रूण हत्या को रोकने के लिए जनता और सरकार ने लिंग परीक्षण को अपराध घोषित करके कठोर दंड का प्रावधान किया है, फिर भी चोरी-छिपे यह काम चल रहा है। इसमें डॉक्टरों और परिवार के लोग दोनों का सहयोग रहता है। इस समस्या का हल तभी संभव है जब लोगों में लड़कियों के प्रति हीन भावना खत्म हो। बेटे और बेटी में कोई फर्क नहीं किया जाना चाहिए। शिक्षा और जागरूकता से ही यह बदलाव संभव है।
In simple words: कन्या-भ्रूण हत्या एक बड़ा पाप है जो लड़कियों को गर्भ में ही मार देता है। यह बेटे की चाहत, दहेज और झूठी शान के कारण होता है। इससे लड़कियों की संख्या कम हो रही है, जिससे समाज में कई समस्याएँ आ रही हैं। इसे रोकने के लिए सख्त कानून और लोगों की सोच में बदलाव ज़रूरी है।
🎯 Exam Tip: कन्या-भ्रूण हत्या के कारणों और परिणामों को स्पष्ट करें, और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान के महत्व पर जोर दें।
Question 7. राष्ट्रीय एकता की सुरक्षा- हमारा कर्तव्य:
Answer:
संकेत बिंदु -
- राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय
- राष्ट्रीय एकता-अखण्डता की आवश्यकता
- राष्ट्रीय एकता, अखण्डता की सांस्कृतिक विरासत
- राष्ट्रीय एकता की वर्तमान स्वरूप
- राष्ट्रीय एकता और हमारा कर्तव्य
- उपसंहार।
राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय
राष्ट्रीय एकता का मतलब है- हमारी एक राष्ट्र के रूप में पहचान। हम सबसे पहले भारतीय हैं, उसके बाद हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, सिख आदि हैं। कई तरह की विभिन्नताओं और भेदों के बावजूद, देश के सभी धर्मों, परंपराओं, आचार-विचारों, भाषाओं और उप-संस्कृतियों का सम्मान करना, भारतभूमि और सभी भारतवासियों से दिल से जुड़ाव रखना ही राष्ट्रीय एकता का रूप है। भारत एक विशाल समुद्र की तरह है, जैसे कई नदियां बहकर समुद्र में मिल जाती हैं और अपनी पहचान खो देती हैं, वैसे ही अलग-अलग वर्गों, धर्मों, जातियों, विचारधाराओं के लोग भारतीयता की भावना से बंधकर एक हो जाते हैं। जैसे कई पेड़-पौधे मिलकर एक जंगल बनाते हैं, वैसे ही अलग-अलग विचारों वाले लोगों की एकता से ही भारत का निर्माण हुआ है। राष्ट्रीय एकता देश को मजबूत बनाती है।
राष्ट्रीय एकता-अखण्डता आवश्यकता
भारत कई विविधताओं का देश है। यह एक संघ-राज्य है। कई राज्यों या प्रदेशों का एक समान रूप है। यहाँ हर राज्य में अलग-अलग रूप, रंग, आचार, विचार, भाषा और धर्म के लोग रहते हैं। इन प्रदेशों की स्थानीय संस्कृतियाँ और परंपराएं हैं। इन सभी से मिलकर हमारी राष्ट्रीय या भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है। हम सब भारतीय हैं, यही भावना सारी विभिन्नताओं को जोड़ने वाला धागा है। यही हमारी राष्ट्रीय एकता का अर्थ और आधार है। विविधता में एकता भारत राष्ट्र की मुख्य विशेषता है। इसमें कई धर्मों और सांस्कृतिक विचारधाराओं का मेल है। भारतीयता के धागे में बंधकर ही हम मजबूत एकता पा सकते हैं। राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के बिना भारत का भविष्य अंधेरा है।
राष्ट्रीय एकता-अखण्डता सांस्कृतिक विरासत
राष्ट्रीय एकता और अखण्डता भारतीय संस्कृति की देन है। भारत कई धर्मों, विचारों और मतों को मानने वालों का निवास रहा है। भारतीय संस्कृति इन विभिन्नताओं का मिला-जुला रूप है। भारत की भौगोलिक स्थिति ने भी इस सामाजिक संस्कृति को बनाने में मदद की है। कई मुश्किलों का सामना करने के बाद भी भारतीय एकता सुरक्षित रही है, इसका कारण उसकी सामाजिक संस्कृति से जन्मा होना ही है। यह हमारी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
राष्ट्रीय एकता और हमारा कर्तव्य
राष्ट्रीय एकता पर हो रहे इन हमलों ने राष्ट्र के रूप में भारत के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस संकट का समाधान किसी कानून से संभव नहीं है। आज हर देशप्रेमी नागरिक को भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। आपसी सद्भाव और सम्मान के साथ प्रेम को बढ़ावा देना चाहिए। समाज के नेतृत्व और संगठन की जिम्मेदारी राजनेताओं से छीनकर निःस्वार्थ समाजसेवियों के हाथों में सौंपनी चाहिए। इस महान कार्य में समाज का हर वर्ग अपनी भूमिका निभा सकता है। राष्ट्रीय एकता को बचाए रखना हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है। यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ज़रूरी है।
उपसंहार
भारत विश्व का एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक देश है। लंबी गुलामी के बाद वह विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। भारत की तरक्की के लिए उसकी एकता-अखंडता का बने रहना बहुत ज़रूरी है। हर भारतीय का कर्तव्य है कि भारत की अखंडता को सुनिश्चित करे। यह हमारी पहचान और भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।
In simple words: राष्ट्रीय एकता का मतलब है कि हम सब भारतीय एक होकर रहें, भले ही हमारे धर्म या भाषा अलग हों। यह हमारे देश को मजबूत बनाता है और तरक्की के लिए बहुत ज़रूरी है। हमें मिलकर देश की एकता को बचाना चाहिए।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय एकता के अभिप्राय को स्पष्ट करें और उसकी आवश्यकता को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़कर समझाएँ।
Question 8. भारत के उन्नति की ओर बढ़ते कदम:
Answer:
संकेत बिंदु -
- उज्ज्वल भविष्य के संकेत
- प्रगति के आधार
- विविध क्षेत्रों में प्रगति
- बाधाएँ और निराकरण
- भारतीयों की भूमिका।
उज्ज्वल भविष्य के संकेत
यह इक्कीसवीं सदी भारत की होगी, भारत विश्व की महाशक्ति बनेगा। ऐसी घोषणाएं भारत के राजनेताओं, अर्थशास्त्रियों और वैज्ञानिकों ने की हैं। कई विदेशी विद्वानों ने भी भारत के उज्ज्वल भविष्य की भविष्यवाणी की है। क्या यह सपना सच होगा? क्या सचमुच हम महाशक्ति और विकसित राष्ट्र बनने की राह पर आगे बढ़ रहे हैं? इन सवालों पर सोचना ज़रूरी है। भारत का भविष्य हमें उज्ज्वल दिख रहा है।
प्रगति के आधार
भारत की चौतरफा तरक्की के इन दावों और भविष्यवाणियों के पीछे कुछ ठोस आधार दिखते हैं। पिछले कुछ सालों में भारत ने सभी क्षेत्रों में अपनी योग्यता साबित की है। हमने खुद को विश्व का सबसे बड़ा और स्थिर लोकतंत्र साबित किया है। हमारी अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है। पिछली वैश्विक मंदी को हमने अपनी समझदारी से पार किया है। हमारी कई कंपनियों ने विदेशी कंपनियों को खरीदकर भारत की औद्योगिक क्षमता का प्रमाण दिया है। हमारे शिक्षक, वैज्ञानिक और उद्योगपति विदेशों में भी अपनी प्रतिभा का डंका बजा रहे हैं। विज्ञान, चिकित्सा, व्यवसाय, कला, सैन्य-शक्ति, शिक्षा और संस्कृति, हर क्षेत्र में हमने नए-नए रिकॉर्ड बनाए हैं। शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में भी हमने अच्छी प्रगति की है। ये सभी बातें भारत के उज्ज्वल भविष्य में हमारा विश्वास मज़बूत करती हैं।
In simple words: भारत एक उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रहा है, जहाँ वह एक महाशक्ति बनेगा। हमारी आर्थिक तरक्की, विज्ञान, शिक्षा और सेना में प्रगति इसके मजबूत आधार हैं।
🎯 Exam Tip: भारत की प्रगति के संकेत और आधारों को स्पष्ट करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में हुई उपलब्धियों का उल्लेख करें।
Question 9. राष्ट्रीय विकास के लिए परिवार नियोजन की आवश्यकता:
Answer:
रूपरेखा -
- प्रस्तावना
- बढ़ती हुई जनसंख्या का संकट
- जनसंख्या का दबाव
- जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण
- निवारण
- उपसंहार।
प्रस्तावना
आजादी मिलने के बाद भारत विकास के रास्ते पर तेज़ी से बढ़ रहा है। कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, संचार, सुरक्षा जैसे सभी क्षेत्रों में लगातार नई प्रगति हो रही है। इन सबके साथ देश की जनसंख्या भी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। अब हम एक अरब पच्चीस करोड़ से ज़्यादा मानव-शक्ति वाला राष्ट्र बन चुके हैं। जनसंख्या वृद्धि हमारे विकास को प्रभावित करती है।
बढ़ती हुई जनसंख्या का संकट
देश की तेज़ी से बढ़ती हुई जनसंख्या हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। जनसंख्या की वृद्धि दो गुणा दो के गुणात्मक सिद्धांत पर होती है, जबकि उत्पादन के साधनों की वृद्धि 'एक धन एक' के योग के सिद्धांत से होती है। इसका मतलब है कि जब ज़रूरत की चीज़ें एक से दो होती हैं, तब तक खाने वालों की संख्या दो से चार हो जाती है। इस तरह विकास के सभी उपाय तेज़ी से बढ़ती हुई जनसंख्या के सामने छोटे पड़ जाते हैं और समाज में चीज़ों की कमी बनी रहती है। भोजन, कपड़े और घरों की कमी बढ़ती ही जाती है। यही बढ़ती हुई जनसंख्या का बड़ा संकट है।
जनसंख्या का दबाव
भारत में हर क्षेत्र में विकास हुआ है, लेकिन उस पर जनसंख्या वृद्धि का भारी दबाव है। हरित क्रांति हुई है, खाने-पीने की चीज़ें बहुत ज़्यादा उपलब्ध हैं, फिर भी भूख की समस्या हल नहीं हो रही है। बहुत सारे लोगों को आधा पेट या भूखा रहना पड़ता है। इतने बड़े देश में जगह की कमी है। स्कूलों में दाखिला नहीं मिलता, बीमार होने पर अस्पतालों में बिस्तर नहीं मिलते, ट्रेनों और बसों में सीट नहीं मिलती। हर क्षेत्र में कमी है। मांग बढ़ती ही जा रही है, लेकिन आपूर्ति नहीं बढ़ रही है। इतनी बड़ी दुनिया है, फिर भी इसमें जगह नहीं है। रहने को घर नहीं है, सारी दुनिया हमारी है।
जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण
जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। दूसरे देशों ने इस काम में सफलता पाई है। जापान का प्रयास सराहनीय है। चीन ने भी अपनी जनसंख्या वृद्धि को सख्ती से नियंत्रित किया है। लेकिन हम इस दिशा में कोई ठोस नीति तय नहीं कर पाए हैं। हम लोगों को कुछ लालच देकर बढ़ती हुई जनसंख्या को रोकने का भ्रम पाले बैठे हैं। यह दर्शाता है कि हमें इस गंभीर समस्या पर अभी और ध्यान देने की ज़रूरत है।
निवारण
परिवार नियोजन पर खुलकर सोचना बहुत ज़रूरी है। कवि, लेखक, धार्मिक नेता, राजनेता और मीडिया के लोगों को इस पर खुलकर अभियान चलाना चाहिए। धर्म-जाति का भेदभाव छोड़कर जनसंख्या वृद्धि पर रोक के लिए एक समान कानून बनाना चाहिए। इसके साथ ही सब्सिडी जैसी सरकारी सहायता भी उन्हीं लोगों को मिलनी चाहिए जो परिवार नियोजन अपनाएं। यह एक सामूहिक प्रयास होना चाहिए।
उपसंहार
परिवार नियोजन की अनदेखी करना खतरनाक होगा। देश में भूखे-नंगों की बढ़ती हुई संख्या विकास को खत्म कर देगी। भयंकर अशांति और हिंसा भी होगी। महामारी और युद्ध से भी गंभीर संकट आएगा। सब कुछ उलट-पुलट हो जाएगा, सरकारी योजनाएं धरी की धरी रह जाएंगी। इसलिए इस विषय पर बात करना ही नहीं, बल्कि कुछ करना भी ज़रूरी है।
नहीं तो
इद वंश वृक्ष ऐसा बढ़ेगा
कि वन हो जायेगा
और कठिन ही नहीं,
असम्भव उसमें जीवन हो जायेगा।
In simple words: भारत में जनसंख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है, जिससे विकास के सारे काम मुश्किल हो रहे हैं। खाना, घर और नौकरी जैसी चीज़ों की कमी हो रही है। हमें जनसंख्या नियंत्रण के लिए कड़ी नीतियाँ बनानी चाहिए और लोगों को जागरूक करना चाहिए।
🎯 Exam Tip: जनसंख्या वृद्धि के कारणों, प्रभावों और नियंत्रण के उपायों को विस्तार से समझाएँ, साथ ही सरकार और समाज की भूमिका पर भी प्रकाश डालें।
Question 10. आजादी के 70 वर्ष : क्या खोया क्या पाया:
Answer:
रूपरेखा -
- प्रस्तावना
- आजादी की प्राप्ति
- जनतंत्र की स्थापना
- विगत वर्षों की उपलब्धियाँ-आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक, सुरक्षातंत्र
- क्या खोया?
- उपसंहार।
प्रस्तावना
मुगलों के शासन के बाद भारत अंग्रेजों के अधीन हो गया था। सन् 1857 की क्रांति के असफल होने के बाद गुलामी और ज़्यादा बढ़ गई थी। इस दौरान भारत बहुत गरीब था और अंधविश्वासों में जकड़ा हुआ था। अशिक्षा और पिछड़ेपन ने भी इसे घेर रखा था। यह एक कठिन समय था जिसने देश को बहुत पीछे धकेल दिया।
आजादी की प्राप्ति
नब्बे साल तक भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना पड़ा। स्वाधीनता के लिए होने वाले संघर्ष को सही दिशा देने के लिए ए. ओ. ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना की। जब महात्मा गांधी भारत आए और कांग्रेस में उनका प्रभाव बढ़ा तो भारतीय गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन की कूटनीति के कारण कश्मीर भारत के लिए आज भी समस्या बना हुआ है। राज्यों का पुनर्गठन भारत की बड़ी उपलब्धि रही। भारतीय संविधान का निर्माण हुआ और 26 जनवरी, 1950 को भारत एक लोकतांत्रिक देश बन गया। यह संघर्ष हमें सिखाता है कि एकता में ही शक्ति है।
विगत वर्षों की उपलब्धियाँ
आज भारत को आज़ाद हुए कई दशक बीत चुके हैं। इस दौरान देश ने कई आंतरिक और बाहरी संकटों का सफलतापूर्वक सामना किया है। इस समय में देश ने बहुत कुछ पाया है तो कुछ खोया भी है। हम यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में देश के खोने-पाने का संक्षिप्त विवरण देंगे।
(क) आर्थिक: सन् 1947 में देश में बहुत गरीबी थी। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। खाने-पीने की चीज़ों की भारी कमी थी। उद्योग-व्यापार ठप था। उसे सुधारने के लिए योजनाबद्ध कोशिशें ज़रूरी थीं। योजना आयोग (जो अब नीति आयोग है) के प्रयासों से देश की आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार हुआ है। देश में कृषि उत्पादन बढ़ा है और औद्योगिक प्रगति भी उल्लेखनीय हुई है।
(ख) सामाजिक: पिछले वर्षों में देश में अलग-अलग जातियों में ऊँच-नीच, छुआछूत जैसी कुरीतियों को दूर करने में सफलता मिली है। सभी धर्मों के लोगों को अपने-अपने धर्म के अनुसार पूजा करने की स्वतंत्रता मिली है। भारतीय समाज में कई जातियों और धर्मों के मानने वालों में समानता और राष्ट्रीयता की भावना बढ़ाने में सफलता मिली है।
(ग) राजनैतिक: देश में लोकतंत्र स्थापित हुआ है। कई राजनैतिक दल बने हैं। इन दलों ने संविधान के अनुसार राष्ट्र-निर्माण का काम किया है। जनता में लोकतंत्र के प्रति विश्वास बढ़ा है और भारत में लोकतंत्र मजबूत हुआ है। आज भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।
(घ) शैक्षिक: भारत में शिक्षा की खराब स्थिति में सुधार के प्रयास हुए हैं। नए-नए स्कूल स्थापित हुए हैं। स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या बढ़ी है। लड़कियों को भी स्कूलों में भेजा जा रहा है। शिक्षा के स्तर में व्यापक सुधार हुआ है। व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा का भी विस्तार हुआ है।
(ङ) वैज्ञानिक: आज विज्ञान का युग है। भारत में वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा को बहुत महत्व दिया गया है। विज्ञान के शिक्षण-प्रशिक्षण और शोध कार्य की व्यवस्था हुई है। हमारे वैज्ञानिक अपनी प्रतिभा से अलग-अलग क्षेत्रों में महान काम कर रहे हैं। अंतरमहाद्वीपीय अस्त्रों और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने अनोखी प्रगति की है।
(च) सुरक्षातंत्र: सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत मजबूत हुआ है। कई नए वैज्ञानिक उपकरण देश में बनाए जा रहे हैं, जिनका उपयोग देश की सुरक्षा के लिए हो रहा है। हालाँकि भारत ने अपने पड़ोसी देशों के कई हमलों का सामना किया है, लेकिन उनका सफलतापूर्वक सामना करते हुए देश की सुरक्षा प्रणाली को मजबूत किया है।
क्या खोया
पिछले वर्षों में भारत ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन उसने कुछ खोया भी है। आजादी से पहले देश में हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिकता नहीं थी। नियंत्रण के प्रयासों के बाद भी इसमें वृद्धि हुई है। हमारे स्वतंत्रता सेनानी एक जाति-मुक्त समाज बनाना चाहते थे, लेकिन पिछले कई वर्षों में वोट के लालची नेताओं ने जातिवाद को बढ़ावा दिया है। जाति-मुक्त समाज के निर्माण में आरक्षण भी बाधा डालता है। इससे सामाजिक एकता भी कमजोर हुई है। राजनीति में सिद्धांतों की कमी आ गई है। इसमें बाहुबली नेताओं को बढ़ावा मिला है। संप्रदाय और जाति राजनीति के लिए हानिकारक हैं। आर्थिक क्षेत्र में तरक्की तो हुई है, लेकिन अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब हुए हैं। पैसा कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित हो गया है, जिसके कारण देश का धन कुछ लोगों की मुट्ठी में बंद है। जो बाहरी चमक-दमक है, वह कर्ज पर आधारित व्यवस्था है। जीवन में सादगी और सरलता कम हुई है और भागदौड़ बढ़ी है।
In simple words: आजादी के 70 सालों में भारत ने आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक और सुरक्षा के क्षेत्रों में बहुत तरक्की की है। लोकतंत्र मजबूत हुआ है और नई तकनीकें आई हैं। लेकिन हमने जातिवाद, भ्रष्टाचार और गरीबी जैसी समस्याओं को भी देखा है, जिससे समाज में एकता कमजोर हुई है।
🎯 Exam Tip: आजादी के बाद की उपलब्धियों को विभिन्न क्षेत्रों में बांटकर लिखें और साथ ही उन कमियों का भी उल्लेख करें जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
Question 12. मेरा प्यारा भारत अथवा सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
संकेत बिंदु -
1. प्रस्तावना
2. भारत का भूगोल और प्रकृति
3. इतिहास, सभ्यता और संस्कृति
4. विभिन्नता में एकता
5. आधुनिक भारत
6. उपसंहार
Answer:
प्रस्तावना – हमारा भारत एक सुंदर गुलदस्ते जैसा है जिसमें कई रंगों और सुगंध वाले फूल जुड़े हुए हैं। जब ये फूल अलग होते हैं तो उनके रंग, खुशबू और नाम अलग-अलग होते हैं, लेकिन जब वे मिल जाते हैं तो एक खूबसूरत गुलदस्ता बन जाते हैं। भारत में अनेक धर्मों, जातियों, विचारों, संस्कृतियों और मान्यताओं में विविधता है, फिर भी इन सभी के मेल से एक सुंदर देश का जन्म हुआ है, जिसे हम भारत कहते हैं। भारत की ये विविधताएँ एकता में बदल गई हैं, जिससे यह देश विश्व का एक सुंदर और मजबूत राष्ट्र बन गया है। हमारा देश भारत विविधता में एकता का प्रतीक है.
भारत का भूगोल और प्रकृति - हमारा हिन्दोस्तां दुनिया के सभी देशों में सबसे अच्छा है। कम से कम हम भारतवासियों को तो ऐसा ही लगता है, और क्यों न लगे? हमारा देश नदियाँ, पर्वत और हरे-भरे मैदानों से सजा है, जो इसे अद्वितीय बनाते हैं। यह नदियों, पहाड़ों और मैदानों से घिरा है। गंगा, यमुना, सिंधु, सतलज, व्यास, घाघरा आदि नदियाँ उत्तर के मैदानों को बनाती हैं, जहाँ विभिन्न प्रकार के अनाज और खाद्य पदार्थ पैदा होते हैं। कवि सोम ठाकुर ने भारत की प्राकृतिक सुंदरता के संबंध में लिखा है –
सागर चरन पखारे, गंगा शीश चढ़ावे नीर।
मेरे भारत की माटी है चन्दन और अबीर ॥
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने भारत की प्राकृतिक सुंदरता को ईश्वर की साकार प्रतिमा बताया है-
नीलाम्बर परिधान हरित-पट पर सुन्दर है।
सूर्यचन्द्र युग-मुकुट मेखला रत्नाकर है।
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस देश की।
हे मातृभूमि तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की!
इतिहास, सभ्यता और संस्कृति – भारत का इतिहास बहुत पुराना और गौरवशाली है। ऋग्वेद विश्व का सबसे पुराना ग्रंथ है। जब आज का सभ्य यूरोप जंगली जातियों का घर था, तब भारत में सभ्यता विकसित हो चुकी थी। शतपथ ब्राह्मण तथा बाइबिल में जिस जल प्रलय का उल्लेख मिलता है, उसका घटना स्थल हिमालय के उत्तर-पश्चिम का क्षेत्र था। उस जल प्रलय में देवजाति नष्ट हो गई थी। केवल मनु बचे थे। उनकी नौका हिमालय पर रुक गई थी। जल उतरने पर मनु हिमालय से नीचे उतरे और उनकी संतान ही मनुज या मानव हैं। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने भारत को ही आर्यों का आदि देश माना है। इस मत के समर्थक नहीं हैं कि आर्य कहीं बाहर से आए थे, उनका मानना है हमारी जन्मभूमि यही है।
हजारों वर्षों में भारत ने सभ्यता के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। भारत की सभ्यता और संस्कृति बहुत पुरानी है और निरंतर बदलती व विकसित होती रही है। भारतीय संस्कृति, त्याग, प्रेम और शांति की संस्कृति है। बौद्ध, जैन, सिख आदि भारतीय मत तथा पारसी, यहूदी, ईसाई, इस्लाम आदि विदेशी मतों को भी यहाँ रहकर अपना विकास करने की स्वतंत्रता मिली है। सभी धर्मों के बीच समन्वय और सहनशीलता भारत की सभ्यता और संस्कृति की मजबूत मान्यताएँ हैं -
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।
विभिन्नता में एकता – भारत की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता है। यहाँ अनेक धर्म, मत, जाति के लोग रहते हैं। उनके खान-पान और पहनावे भी अलग-अलग हैं, पर वे सभी भारतीय हैं। भारत की यह विविधता उसके भूगोल और जलवायु में भी दिखती है। भारत के निवासियों के शारीरिक बनावट और रूप-रंग में भी भिन्नता है, पर उनकी भारतीयता में कोई अंतर नहीं है। भारत में अनेक प्रकार की वनस्पतियाँ उगती हैं, तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं, और कई तरह के पशु-पक्षी यहाँ पाए जाते हैं। ये सभी मिलकर भारत की पहचान बनाते हैं।
आधुनिक भारत – भारत विश्व का सबसे प्राचीन देश है। लंबी गुलामी से मुक्त होकर आज भारत नए निर्माण की राह पर तेजी से बढ़ रहा है। सुभद्रा कुमारी चौहान के शब्दों में कहें तो "बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी"। एक सौ बीस करोड़ की जनसंख्या वाला भारत आज संसार का सबसे बड़ा गणतंत्र है। भारतीयों ने हर क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़े हैं। आने वाले दशकों में हमारा भारत विश्व की आर्थिक और सामरिक महाशक्ति बनने को तैयार है। स्वतंत्रता और समानता का संदेश विश्व को देते हुए हम खुद भी इसी रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। यह एक गौरवपूर्ण यात्रा है जो भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जा रही है।
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
उपसंहार - हमारा अतीत गौरवशाली रहा है और भविष्य उज्ज्वल है। हमें अपने मतभेद भुलाकर देश को विश्व में उसका सही स्थान दिलाना है। देश की एकता ही हमें आगे बढ़ने में मदद करेगी।
जियें तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष।
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष।
In simple words: भारत एक विविधताओं वाला देश है जहाँ विभिन्न संस्कृतियाँ, धर्म और भाषाएँ मिलकर एक मजबूत पहचान बनाती हैं। इसका इतिहास गौरवपूर्ण है, और वर्तमान में यह विकास की राह पर है, लेकिन इसकी एकता बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है।
🎯 Exam Tip: निबंध लिखते समय भारत की भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशेषताओं का उल्लेख करना और विविधता में एकता के सिद्धांत को उजागर करना महत्वपूर्ण है। कविताओं और प्रसिद्ध उद्धरणों का उपयोग करके अपने विचारों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करें।
Question 13. विकास पथ पर भारत
रूपरेखा -
1. प्रस्तावना
2. विकास के विभिन्न सोपान
3. विकास में बाधक तत्त्व
4. उपसंहार
Answer:
प्रस्तावना – 15 अगस्त 1947 को सैकड़ों वर्षों की गुलामी, अत्याचार, शोषण और परतंत्रता के. गंदे दलदल से एक कमल खिला था - 'स्वतंत्र-भारत'; स्वतंत्र और स्वाभिमान से भरा भारत, विश्वभर के स्वतंत्रता संग्रामों की आशाओं का प्रकाश-दीप भारत। तब से आज तक हमारा भारत लगातार विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है। आज हमारे राजनेता भारत को जल्द ही महाशक्ति बनने का सपना देख रहे हैं। यह एक लंबी यात्रा है, लेकिन भारत लगातार आगे बढ़ रहा है।
विकास के विभिन्न सोपान – देश के विकास के विभिन्न चरणों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है -
भोजन, वस्त्र और आवास के क्षेत्र में – पहले देश को बाहर से अनाज मंगाना पड़ता था, आज हरित क्रांति के कारण हम अनाज निर्यात करने की स्थिति में आ गए हैं और वस्त्रों का निर्यात भी हो रहा है। भवन-निर्माण की सामग्री देश में उपलब्ध है और कॉलोनियों का विस्तार बिना रोक-टोक हो रहा है। इससे देश की आत्मनिर्भरता बढ़ती है।
शिक्षा के क्षेत्र में – शिक्षा जैसे आंदोलन भी चलते रहे हैं। शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने का कानून भी पास हो चुका है। इससे हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार मिलता है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में – हमारा भारत वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से भी विश्व के कई विकसित देशों की श्रेणी में आ गया है। साइकिल से लेकर अंतरिक्ष यान तक देश में बन रहे हैं। परमाणु विज्ञान, धातु विज्ञान, अंतरिक्ष अनुसंधान, सूचना प्रौद्योगिकी, संचार, फसल विज्ञान आदि पर लगातार अनुसंधान हो रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी में तो भारत ने पूरे विश्व में अपनी धाक जमा ली है। हमारी कई कंपनियाँ विदेशों में नामी कंपनियों का अधिग्रहण कर रही हैं। टाटा स्टील द्वारा कोरस का अधिग्रहण इस दिशा में उल्लेखनीय है। सॉफ्टवेयर व्यवसाय में तो भारत की धूम मची हुई है। निर्यात व्यापार में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार बढ़ता जा रहा है।
सुरक्षा के क्षेत्र में – सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत अब किसी से पीछे नहीं है। पारंपरिक और नए हथियार देश में बन रहे हैं। टैंक, रडार, मिसाइल, लड़ाकू विमान, 'पृथ्वी', 'त्रिशूल', 'अग्नि' जैसे प्रक्षेपास्त्रों का विकास देश को सुरक्षा के प्रति आश्वस्त बनाता है। हम विश्व की परमाणु शक्ति बन चुके हैं। अमेरिका से हुआ परमाणु-समझौता उल्लेखनीय है। अग्नि 5 मिसाइल का सफल परीक्षण भारत की बढ़ती सुरक्षा व्यवस्था का प्रमाण है।
आर्थिक क्षेत्र में – देश का शेयर बाजार आत्मविश्वास से भरा हुआ है। पिछले वर्षों में आर्थिक प्रगति 8 से 10 प्रतिशत रही है। विदेशी पूंजी का निवेश लगातार बढ़ रहा है। ये सभी मानदंड देश के विकास को प्रमाणित करते हैं। जब अमेरिका और यूरोपीय देशों में मंदी और बेरोजगारी बढ़ रही है, भारत में विकास दर ठीक बनी रहने की उम्मीद है।
विकास में बाधक तत्त्व – विकास की उपरोक्त तस्वीर बहुत आकर्षक है। लेकिन विकास का यह प्रकाश अभी देश के लाखों गाँवों तक पूरी तरह नहीं पहुँचा है। विकास के रास्ते में कई ऐसे बाधक तत्व हैं जो विकास की धारा को जन-जन तक नहीं पहुँचने देते। भ्रष्टाचार, जनसंख्या की वृद्धि, राष्ट्रीय भावना का क्षरण, जीवन-मूल्यों के प्रति अनादर, विदेशी षड्यंत्र, बेरोजगारी, जातिवाद, सांप्रदायिकता आदि कारक हैं, जो देश की प्रगति में बाधक बने हुए हैं।
उपसंहार – अंत में यही कहा जा सकता है कि देश ने हर दिशा में विकास किया है। विश्व में भारत की विश्वसनीयता बढ़ी है, लेकिन अभी मंजिल दूर है। अर्थशास्त्रियों ने देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए कुछ मूलमंत्र सुझाए हैं, लेकिन आज की कुटिल राजनीति, सत्ता-लोलुपता और जनता का दिग्भ्रमित रूप इसे साकार होने देंगे, इसमें संदेह है। भारत को इन चुनौतियों का सामना करना होगा ताकि विकास का लाभ सभी तक पहुँचे।
In simple words: भारत आजादी के बाद से ही विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से विकास कर रहा है, जैसे भोजन, शिक्षा, विज्ञान, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था। हालांकि, भ्रष्टाचार, जनसंख्या वृद्धि और सामाजिक विभाजन जैसी कई बाधाएँ अभी भी इस विकास को पूरी तरह से सभी तक पहुँचने से रोक रही हैं।
🎯 Exam Tip: निबंध लिखते समय भारत के विकास के विभिन्न क्षेत्रों (जैसे कृषि, शिक्षा, विज्ञान) का उल्लेख करें और साथ ही विकास में आने वाली बाधाओं और उनके समाधानों पर भी प्रकाश डालें। वास्तविक उदाहरणों का प्रयोग आपके उत्तर को विश्वसनीय बनाता है।
Question 14. जल है तो जीवन है। अथवा विश्व में गहराता जलसंकट
रूपरेखा -
1. प्रस्तावना
2. जल का महत्त्व
3. जलाभाव का परिणाम
4. जल की उपलब्धता
5. भावी जल संकट
6. उपसंहार
Answer:
प्रस्तावना – वेदों में कहा गया है - 'आप एव ससर्जादौ' यानी परमात्मा ने सबसे पहले जल को बनाया। पुराणों में विष्णु के पहले अवतार वराह द्वारा जलमग्न पृथ्वी को बचाने का वर्णन मिलता है। प्रलय के समय यानी सृष्टि के अंत होने पर पूरी धरती जलमग्न हो जाती है। ये बातें हम कहानियाँ मान सकते हैं, लेकिन विज्ञान के अनुसार जल जीवन या जीव-सृष्टि की पहली शर्त है। चंद्रमा या मंगल पर जीवन की खोज में लगे वैज्ञानिकों की आशा भी वहीं टिकी है जहाँ जल की मौजूदगी होती है। शब्दकोश भी जल और जीवन को एक ही अर्थ में बताता है। जल ही जीवन का आधार है।
जल का महत्त्व – पूरे सौरमंडल में अब तक ज्ञात ग्रहों में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ पानी का बहुत बड़ा भंडार है। पानी के बिना जीवन की कल्पना भी असंभव है। पानी ने ही पृथ्वी पर चलने वाले और न चलने वाले सभी जीव-जंतुओं को संभव बनाया है। जीवाणु से लेकर विशालकाय हाथियों तक और छोटे शैवाल से लेकर बड़े पेड़ों तक सभी का जीवन पानी पर निर्भर है। मानव शरीर में भी सबसे ज्यादा पानी ही होता है। पानी की कमी होने पर जीवन मुश्किल हो जाता है और शरीर में पानी की पूर्ति के लिए कृत्रिम उपाय करने पड़ते हैं। हमारे भोजन, कपड़े, घर, साफ-सफाई, स्वास्थ्य और पर्यावरण संतुलन सभी के लिए पानी का कोई विकल्प नहीं है। हमारी सुख-सुविधा, आनंद और मनोरंजन भी पानी से जुड़े हैं। घर में कपड़े धोने, भोजन बनाने, नहाने और गर्मी से बचने के लिए कूलर चलाने में पानी ही सहायक होता है। जलाशयों में तैरना और नौकाविहार करना हमें आनंदित करता है। हमारी गृह-वाटिकाओं में पानी चाहिए। पार्कों और वनांचलों की हरियाली भी पानी पर ही टिकी है। पानी के बिना खेती की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जीवन के अस्तित्व और पोषण से जुड़ी हर वस्तु को देख लीजिए, किसी न किसी स्तर पर उसे पानी के योगदान की आवश्यकता जरूर होती है।
जलाभाव का परिणाम – कल्पना कीजिए कि पृथ्वी कभी पानी रहित हो जाए तो कैसा दृश्य होगा? सारे जीव-जंतु तड़प-तड़प कर दम तोड़ देंगे। यह मनोरम हरियाली, ये इठलाती नदियाँ, झर-झर करते झरने, लहराते सागर, रिमझिम बरसते बादल, ये चहल-पहल, दौड़ते वाहन, नृत्य-संगीत के आयोजन, ये मारा-मारी, सब कुछ खत्म हो जाएँगे। पानी की कमी जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती है।
जल की उपलब्धता – प्रकृति ने जीवन का आधार पानी बड़ी मात्रा में मानव जाति को उपलब्ध कराया है। पृथ्वी का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा पानी से ढका है। इसमें मानव-उपयोगी पानी की मात्रा भी कम नहीं है। नदियाँ, सरोवर, झीलें आदि के रूप में पीने का पानी उपलब्ध है। यह प्राकृतिक उपहार जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
भावी जल संकट – आज प्रकृति के इस मुफ्त उपहार पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। शहरों और महानगरों के तेजी से विस्तार ने तथा औद्योगीकरण के जुनून ने भूगर्भीय जल का अंधाधुंध दोहन और दुरुपयोग बढ़ाया है। भारत के कई प्रदेशों, जिनमें राजस्थान भी शामिल है, में जल स्तर लगातार गिरने से संकटग्रस्त हैं। पानी की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है। इस संकट के लिए मनुष्य ही मुख्य रूप से जिम्मेदार है। अत्यधिक औद्योगीकरण से बढ़ रहे भूमंडलीय ताप (ग्लोबल वार्मिंग) से, ध्रुवीय बर्फ और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की आशंका व्यक्त की जा रही है। वैज्ञानिक घोषणा कर रहे हैं कि अगली तीन-चार दशकों में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र आदि का केवल नाम ही शेष रह जाएगा। बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ जाएगा तथा समुद्र तट पर बसे शहर खत्म हो जाएंगे।
उपसंहार – जल संकट एक गंभीर वैश्विक समस्या है जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें जल संरक्षण के प्रति जागरूक होना चाहिए और वर्षा जल संचयन तथा जल के विवेकपूर्ण उपयोग जैसे उपायों को अपनाना चाहिए। यह न केवल हमारे वर्तमान के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है।
In simple words: जल पृथ्वी पर जीवन का आधार है, लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग और प्रदूषण एक गंभीर जल संकट पैदा कर रहा है। यदि हमने इसे नहीं रोका, तो भविष्य में पानी की भारी कमी हो सकती है जिससे जीवन मुश्किल हो जाएगा।
🎯 Exam Tip: जल संकट पर निबंध लिखते समय जल के महत्व, इसके अभाव के परिणामों और वर्तमान में सामने आ रही चुनौतियों पर जोर दें। समाधानों जैसे जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन का उल्लेख करना आवश्यक है।
Question 15. भारतीय कृषक अथवा किसान-भारत की पहचान
रूपरेखा -
1. प्रस्तावना
2. सरल तथा प्राकृतिक जीवन
3. संसार का अन्नदाता
4. भारतीय किसान की दशा
5. समाज तथा शासन की उपेक्षा
6. पिछड़ेपन का कारण
7. किसान की दशा में सुधार
8. उपसंहार
Answer:
प्रस्तावना – कृषि कर्म करने वाला ही कृषक कहलाता है। खेती संसार का सबसे पुराना व्यवसाय है। यह मनुष्य के सभ्यता की ओर बढ़ने का पहला कदम है। भारत गाँवों में बसता है, कहने का यही अर्थ है कि भारत की अधिकांश जनता किसान है और किसान गाँवों में ही रहते हैं। कवि पंत ने 'भारतमाता ग्रामवासिनी' कहकर इसी तथ्य की ओर संकेत किया है। किसान भारत की पहचान है, वे देश की रीढ़ हैं।
सरल तथा प्राकृतिक जीवन – भारतीय किसान का जीवन दिखावे से दूर है। वह सरल और प्राकृतिक जीवन जीता है। वह मोटा खाता और मोटा पहनता है। उसकी आवश्यकताएँ सीमित हैं। वह वर्षा, धूप और सर्दी सहन करता है। सुबह जल्दी उठना, अपने खेतों तथा पशुओं की देखभाल करना और कठोर परिश्रमपूर्ण जीवन बिताना ही उसकी दिनचर्या है। यह जीवन प्रकृति के करीब होता है।
संसार का अन्नदाता – किसान पूरे संसार का अन्नदाता है। वह अपने खेतों में जो अन्न उगाता है, उसी से संसार का पेट भरता है। वह सिर्फ खाद्यान्न ही नहीं, बल्कि अन्य वस्तुएँ भी अपने खेतों में पैदा करता है। वह कपास उगाता है, जो लोगों के शरीर ढकने के लिए वस्त्र बनाने के काम आती है। वह गन्ना पैदा करता है जो गुड़ और शक्कर के रूप में लोगों को मीठापन देता है। वह तिल, सरसों, अलसी आदि तिलहन पैदा करता है जो मनुष्य की अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन है। किसान साग-सब्जी, फल आदि का उत्पादन करके लोगों की आवश्यकताएँ पूरी करता है। उसी के प्रयत्न से पशुओं को चारा भी मिलता है।
भारतीय किसान की दशा – समाज के लिए इतना सब करने वाले किसान की दशा अच्छी नहीं है। उसकी आर्थिक स्थिति दयनीय है। कृषि में जो पैदावार होती है, उसका पूरा मूल्य उसको नहीं मिल पाता। कृषि से इतनी आय नहीं होती कि वह अपने पारिवारिक खर्च भी पूरे नहीं कर पाता। जब ऋण नहीं चुका पाता तो महाजन तथा बैंकें उसकी संपत्ति नीलाम कर देते हैं। किसानों द्वारा लगातार आत्महत्याएँ करना इसी उपेक्षा का दुखद परिणाम है। भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र को विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोल दिया है। सरकार का कहना है कि वह किसान को उसकी उपज का अच्छा मूल्य दिलाना चाहती है। बड़े-बड़े देशी-विदेशी पूंजीपति खेती को एक उद्योग का रूप देकर किसान का शोषण करेंगे। वे अपने आर्थिक लाभ के लिए फसल उगाएंगे, इससे जनता के सामने खाद्यान्न का संकट भी पैदा होगा। उनको न किसान के हित की चिंता है और न जनता के हित की। यह एक चिंताजनक स्थिति है।
पिछड़ेपन के कारण – भारत का किसान पिछड़ा हुआ है। वह अशिक्षित है तथा असंगठित भी है। उसको उत्तम और नई कृषि प्रणाली का पर्याप्त ज्ञान नहीं है। संगठित न होने के कारण उसे सरकार तथा पूंजीपति वर्ग का शोषण सहन करना पड़ता है। वह सरकार को कृषक हितैषी नीति अपनाने को मजबूर नहीं कर पाता। भारतीय किसान अंधविश्वासी भी है और अपनी दुर्दशा को वह अपना दुर्भाग्य मानकर चुपचाप सहन कर लेता है। अपने शोषण के प्रतिकार की भावना ही उसके मन में नहीं उठती। यह एक बड़ी समस्या है।
किसान की दशा में सुधार - भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, लेकिन स्वतंत्र भारत की सरकारों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। वे उद्योगों के विकास द्वारा भारत को संपन्न बनाने की नीति पर चलती रही हैं, यह नीति उचित नहीं है। सरकार को अपनी नीति कृषि के विकास को आधार बनाकर बनानी चाहिए। किसानों को खेती की प्रगति तथा उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। उनको इसके लिए बजट में पर्याप्त धन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। किसानों के बच्चों की शिक्षा की उचित व्यवस्था होनी चाहिए और उनको कृषि की नवीनतम तकनीक का प्रशिक्षण तथा ज्ञान दिया जाना चाहिए। कृषि को उन्नत बनाकर तथा कृषकों का स्तर उठाकर ही भारत को समृद्ध तथा शक्तिशाली बनाया जा सकता है। लगता है जिम्मेदार सरकारों ने इस कठिन सत्य को स्वीकार किया है। किसानों को उनकी लागत का दोगुना बाजार-मूल्य दिलाने, प्राकृतिक आपदाओं के समय के लिए सही बीमा नीति बनाने, ऋण माफी आदि की घोषणाएँ भी हुई हैं। आशा है भारतीय किसान के दिन बहुरेंगे और उनकी स्थिति सुधरेगी।
उपसंहार – आज भारत स्वतंत्र है तथा जनतंत्र सत्ता से शासित है। भारत की अधिकांश जनता गाँवों में रहती है तथा कृषि और उससे संबंधित व्यवसायों से अपना जीवनयापन करती है। उसके आर्थिक उत्थान पर ध्यान देना आवश्यक है। अभी तक वह उपेक्षित और असंतुष्ट है। असंतोष का यह ज्वालामुखी फूटे और भीषण विनाश का दृश्य उपस्थित हो, उससे पहले ही हमें सजग हो जाना चाहिए। किसानों को सशक्त करना देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
In simple words: भारतीय किसान देश की रीढ़ हैं जो सरल जीवन जीते हैं और सभी के लिए अन्न उगाते हैं। हालांकि, वे गरीबी, अशिक्षा और शोषण से जूझ रहे हैं, जिससे उनकी स्थिति दयनीय बनी हुई है। किसानों की दशा सुधारने के लिए सरकार को बेहतर नीतियाँ और सहायता देनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: भारतीय किसान पर निबंध लिखते समय उनके सरल जीवन, अन्नदाता के रूप में उनके महत्व, उनकी वर्तमान दयनीय दशा के कारणों (जैसे अशिक्षा, शोषण) और उनकी स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक सरकारी प्रयासों का उल्लेख करें। किसानों के योगदान को सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करना जरूरी है।
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