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Detailed व्याकरणम् सन्धि प्रकरणम् RBSE Solutions for Class 11 Sanskrit
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Class 11 Sanskrit व्याकरणम् सन्धि प्रकरणम् RBSE Solutions PDF
Rajasthan Board RBSE Class 11 Sanskrit व्याकरणम् सन्धि प्रकरणम्
आपने पिछली कक्षाओं में सन्धि प्रकरण के अन्तर्गत स्वर सन्धि के 'दीर्घ', 'अयादि', 'गुण' 'वृद्धि' तथा 'यण्' आदि भेदों का तथा व्यञ्जन व विसर्ग सन्धियों के भेदों का अध्ययन किया है। अब आप ग्यारहवीं कक्षा में स्वर सन्धि के अन्तर्गत दीर्घ, अयादि वृद्धि, यण् तथा गुण भेदों का अध्ययन एवं अभ्यास करेंगे। आपसे उपर्युक्त सन्धियों के भेदों के अन्तर्गत सन्धि-विच्छेद करने और सन्धियुक्त पद बनाने का ज्ञान अपेक्षित है। यहाँ केवल कक्षा 11 के पाठ्यक्रम में दी हुई सन्धियों के भेदों पर ही प्रकाश डाला जा रहा है। सन्धि शब्द की व्युत्पत्ति-सम् उपसर्गपूर्वक \( (\text{धा}) \) धातु से \( (\text{उपसर्गे धोः किः}) \) सूत्र से 'कि' प्रत्यय करने पर सन्धि शब्द की व्युत्पत्ति होती है।
सन्धि शब्द की परिभाषा-'वर्ण संधानं सन्धिः' अर्थात् दो वर्णों का परस्पर मेल या संधान सन्धि कही जाती है।
पाणिनीय परिभाषा-'परः सन्निकर्षः सहिंता' वर्णों की अत्यन्त निकटता संहिता कही जाती है। वर्णों का परस्पर मेल सन्धि कहा जाता है। संस्कृत भाषा में एक पद में, धातु-उपसर्ग के बीच में तथा समास के बीच में सन्धि कार्य नित्य होता है। वाक्य में तो सन्धि वक्ता की विविक्षा पर होती है।
संहितैकपदे नित्या नित्या धातूपर्सगयोः।
नित्या समासे वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते।
सन्धि का अर्थ-सामान्यतया 'सन्धि' शब्द का अर्थ मेल, समझौता या जोड़ है, किन्तु सन्धि प्रकरण में इसका अर्थ थोड़ा भिन्न होते हुए यह है कि जब एक से अधिक स्वर अथवा व्यञ्जन वर्ण अत्यधिक निकट होने के कारण, मिलकर एक रूप धारण करते हैं, तो वह सन्धि का
इसी प्रकार \( \text{'सद् + जनः'} \) में सद् के \( \text{'द्'} \) व्यञ्जन वर्ण तथा इसके समीप में सामने जनः के \( \text{'ज्'} \) व्यञ्जन वर्गों में परस्पर मेल होने पर \( \text{'द्'} \) को \( \text{'ज्'} \) में बदलने पर \( \text{'सज्जनः'} \) सन्धियुक्त पद बन जाता है। यह व्यञ्जन सन्धि के अन्तर्गत \( \text{'श्चत्व'} \) भेद का उदाहरण है।
इसी प्रकार \( \text{'नमः + ते'} \) में नमः के \( \text{'म्'} \) के आगे विद्यमान विसर्ग \( (:) \) को \( \text{'त्'} \) सामने होने के कारण \( \text{'स्'} \) होने से \( \text{'नमस्ते'} \) सन्धियुक्त पद बन गया। यह विसर्ग सन्धि के अन्तर्गत \( \text{'सत्व'} \) भेद का उदाहरण है।
इस प्रकार सन्धियाँ तीन प्रकार की होती हैं और ये ही इनके भेद कहे जाते हैं। सन्धि के भेद-सामान्य रूप से सन्धि के तीन प्रमुख भेद माने गये हैं
- स्वर यो अच् सन्धि,
- व्यञ्जन या हल् सन्धि,
- विसर्ग सन्धि ।
1. \( \text{अच् (स्वर) सन्धि-} \) जहाँ स्वरों का परस्पर मेल होता है वहाँ स्वर सन्धि होती है। स्वर सन्धि के दीर्घ, गुण, यण, वृद्धि अयादि, पूर्वरूप और पररूप भेद हैं।
2. \( \text{हल् (व्यञ्जन) सन्धि-} \) जहाँ व्यञ्जन वर्णों का परस्पर मेल होता है वहाँ व्यञ्जन सन्धि होती है। व्यञ्जन सन्धि के श्चत्व, ष्टुत्व, णत्व, षत्व और छत्व आदि भेद हैं।
3. \( \text{विसर्ग सन्धि-} \) जहाँ विसर्ग के स्थान पर परिवर्तन होता है, वहाँ विसर्ग सन्धि होती है। विसर्ग के स्थान पर सकार, रुत्व, उत्व होता है और विसर्ग का लोप होता है।
(i) स्वर या अच् सन्धि
(1) दीर्घ सन्धि
अंकः सवर्णे दीर्घः- जब \( \text{(अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ)} \) स्वरों के पश्चात् (आगे) ह्रस्व या दीर्घ \( \text{'अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ'} \) स्वर आयें तो दोनों सवर्ण (एक जैसे) स्वरों को मिलाकर एक दीर्घ वर्ण \( \text{'आ', 'ई', 'ऊ', 'ॠ'} \) हो जाता है। जैसे-रत्न \( + \) आकरः \( = \) रत्नाकरः।
यहाँ पर रत्न के \( \text{'न'} \) में ह्रस्व अकार है, उसके बाद \( \text{'आकर:'} \) का दीर्घ \( \text{'आ'} \) आता है, अतः ऊपर के नियम के अनुसार दोनों (ह्रस्व \( \text{'अ'} \) और दीर्घ \( \text{'आ'} \)) के स्थान में दीर्घ \( \text{'आ'} \) हो गया। इसी प्रकार
- \( \text{अ/आ + अ/आ = आ} \)
- \( \text{इ/ई + इ/ई = ई} \)
- \( \text{उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ} \)
- \( \text{ऋ/ॠ + ऋ/ॠ = ॠ} \)
\( \text{कवाश्वरः - काव + इश्वरः - इ + इ = इ} \)
\( \text{श्रीशः - श्री + ईश - ई + ई = ई} \)
\( \text{अतीव - अति + इव - इ + इ = ई} \)
\( \text{राज्ञीह - राज्ञी + इह - ई + ई = ई} \)
\( \text{भानूदयः - भानु + उदयः - उ + उ = ऊ} \)
\( \text{साधूचुः - साधु + ऊचुः - उ + ऊ = ऊ} \)
\( \text{चमूर्जः - चमू + ऊर्जाः - ऊ + ऊ = ऊ} \)
\( \text{वधूपरि - वधू + उपरि - ऊ + उ = ऊ} \)
\( \text{कृकारः - कृ + ऋकारः - ऋ + ऋ = ॠ} \)
\( \text{होतृकार: - होतृ + ऋकार - ऋ + ऋ = ॠ} \)
अन्य उदाहरण
(1) \( \text{अ + अ = आ} \)
\( \text{मुर + अरिः = मुरारिः, अद्य + अहम् = अद्याहम्} \)
\( \text{दैत्य + अरिः = दैत्यारिः, दुःख + अन्तः = दुःखान्तः} \)
\( \text{शश + अंकः = शशांकः, क्व + अपि = क्वापि ।} \)
(2) \( \text{अ + आ = आ} \)
\( \text{हिम + आलयः = हिमालयः, रत्न + आकरः = रत्नाकरः} \)
\( \text{देव + आलयः = देवालयः, परम + आनन्दः = परमानन्दः ।} \)
(3) \( \text{आ + अ = आ} \)
\( \text{तथा + अपि = तथापि, विद्या + अर्थी = विद्यार्थी} \)
\( \text{महा + असुरः = महासुरः, यदा + अहम् = यदाहम् ।} \)
(4) \( \text{आ + आ = आ} \)
\( \text{महा + आशयः = महाशयः, सुधा + आकरः = सुधाकरः ।} \)
(5) \( \text{इ + इ = ई} \)
\( \text{रवि + इन्द्रः = रवीन्द्रः, अभि + इष्टः = अभीष्टः} \)
\( \text{कवि + इन्द्रः = कवीन्द्रः, क्षिति + इन्द्रः = क्षितीन्द्रः} \)
\( \text{मुनि + इन्द्रः = मुनीन्द्रः, गिरि + इन्द्रः = गिरीन्द्रः।} \)
\( \text{मही + इन्द्रः = महीन्द्रः मही + इन्दुः = महीन्दुः,} \)
\( \text{लक्ष्मी + इन्दुः = लक्ष्मीन्दुः, महती + इच्छा = महतीच्छा,} \)
\( \text{देवी + इयम् = देवीयम् नारी + इव = नारीव।} \)
(8) \( \text{ई + ई = ई} \)
\( \text{श्री + ईशः = श्रीशः, नारी + ईश्वरः = नारीश्वरः,} \)
\( \text{मही + ईशः = महीशः, गौरी + ईशः = गौरीशः,} \)
\( \text{रजनी + ईशः = रजनीशः, लक्ष्मी + ईशः = लक्ष्मीशः।} \)
(9) \( \text{उ + उ = ऊ} \)
\( \text{लघु + उपायः = लघूपायः, गुरु + उपदेशः = गुरुपदेशः,} \)
\( \text{लघु + उपदेशः = लघूपदेशः, विष्णु + उदयः = विष्णूदयः,} \)
\( \text{सु + उक्तिः = सूक्तिः, भानु + उदयः = भानूदयः} \)
(10) \( \text{उ + ऊ = ऊ} \)
\( \text{सिन्धु + ऊर्मि: = सिन्धूर्मिः, विधु + ऊर्ध्वम् = विधूर्ध्वम्,} \)
\( \text{लघु + ऊर्मि: = लघूर्मिः, लघु + ऊर्णः = लघूर्णः ।} \)
(11) \( \text{ऊ + उ = ऊ} \)
\( \text{वधू + उवाच = वधूवाच} \)
\( \text{वधू + उक्तिः = वधूक्तिः ।} \)
(12) \( \text{ऊ + ऊ = ऊ} \)
\( \text{भू + ऊर्ध्वम् = भूर्ध्वम्; वधू + ऊचे = वधूचे।} \)
(13) \( \text{ऋ + ऋ = ॠ} \)
\( \text{पितृ + ऋणम् = पितृणम् । मातृ + ऋणम् = मातृणम् ।} \)
(2) गुण सन्धि
आद् गुणः-
1. जब \( \text{अ} \) अथवा \( \text{आ} \) के बाद \( \text{इ} \) अथवा \( \text{ई} \) आये तो दोनों के स्थान में \( \text{'ए'} \) हो जाता है।
2. जब \( \text{अ} \) अथवा \( \text{आ} \) के बाद \( \text{उ} \) अथवा \( \text{ऊ} \) आये तो दोनों के स्थान में \( \text{'ओ'} \) हो जाता है।
3. जब \( \text{अ} \) अथवा \( \text{आ} \) के बाद \( \text{ऋ} \) आये तो \( \text{'अर्'} \) हो जाता है।
4. जब \( \text{अ} \) अथवा \( \text{आ} \) के बाद \( \text{लृ} \) आये तो \( \text{'अल्'} \) हो जाता है।
जैसे-देव \( + \) इन्द्रः \( = \) देवेन्द्रः। यहाँ पर देव के \( \text{'व'} \) में \( \text{'अ'} \) है, उसके बाद इन्द्रः की \( \text{'इ'} \) है, इसलिए ऊपर के नियम के अनुसार दोनों (देव के \( \text{'अ'} \) और इन्द्र की \( \text{'इ'} \)) के स्थान में \( \text{'ए'} \) हो गया। इसी प्रकार
यथा-
\( \text{उपेन्द्रः - उप + इन्द्रः - अ + इ = ए} \)
\( \text{गणेशः - गण + ईशः - अ + ई = ए} \)
\( \text{रमेशः - रमा + ईशः - आ + ई = ए} \)
\( \text{गंगेश्वरः - गंगा + ईश्वरः - आ + ई = ए} \)
\( \text{परोपकारः - पर + उपकारः - अ + उ = ओ} \)
\( \text{सूर्योदयः - सूर्य + उदयः - अ + उ = ओ} \)
\( \text{गंगोदकम् - गंगा + उदकम् - आ + उ = ओ} \)
\( \text{गगनोर्ध्वम् - गगन + ऊर्ध्वम् - अ + ऊ = ओ} \)
\( \text{महर्षिः - महा + ऋषिः - आ + ऋ = अर्} \)
\( \text{देवर्षिः - देव + ऋषिः - अ + ऋ = अर्} \)
\( \text{ग्रीष्मर्तुः - ग्रीष्म + ऋतुः - अ + ऋ = अर्} \)
\( \text{कृष्णर्द्धिः - कृष्ण + ऋद्धि - अ + ऋ = अर्} \)
\( \text{तवल्कारः - तव + लृकारः - अ + लृ = अल्} \)
\( \text{देव + इन्द्रः = देवेन्द्रः, मम + इदम् = ममेदम्;} \)
\( \text{पुष्प + इन्द्रः = पुष्पेन्द्रः । नर + इन्द्रः = नरेन्द्रः,} \)
(2) \( \text{अ + ई = ए} \)
\( \text{गण + ईशः = गणेशः, तव + ईक्षा = तवेक्षा} \)
\( \text{सुर + ईशः = सुरेशः, तव + ईप्सितम् = तवेप्सितम्,} \)
\( \text{नर + ईशः = नरेशः, उप + ईक्षा = उपेक्षा} \)
\( \text{परम + ईश्वरः = परमेश्वरः, कृष्ण + ईश्वरः = कृष्णेश्वरः ।} \)
(3) \( \text{आ + इ = ए} \)
\( \text{महा + इन्द्रः = महेन्द्रः, तथा + इति = तथेति,} \)
\( \text{लता + इव = लतेव; पिता + इव = पितैवेव ।} \)
(4) \( \text{आ + ई = ए} \)
\( \text{महा + ईश्वरः = महेश्वरः, महा + ईशः = महेशः,} \)
\( \text{उमा + ईशः = उमेशः, राका + ईशः = राकेशः,} \)
\( \text{यथा + ईप्सितम् = यथेप्सितम् । रमा + ईशः = रमेशः ।} \)
(5) \( \text{अ + उ = ओ} \)
\( \text{परम + उदारः = परमोदारः, नर + उत्तमः = नरोत्तमः,} \)
\( \text{पुरुष + उत्तमः = पुरुषोत्तमः, सर्व + उदयः = सर्वोदयः} \)
\( \text{आत्म + उन्नतिः = आत्मोन्नतिः, चन्द्र + उदयः = चन्द्रोदयः,} \)
\( \text{वसन्त + उत्सवः = वसन्तोत्सवः, व्रत + उत्सवः = व्रतोत्सवः,} \)
\( \text{हित + उपदेशः = हितोपदेशः, परम + उत्कर्षः = परमोत्कर्षः,} \)
\( \text{सुख + उपविष्टः = सुखोपविष्टः । सर्व + उन्नतिः = सर्वोन्नतिः ।} \)
\( \text{महा + उत्सवः = महोत्सवः, आ + उष्णम् = ओष्णम्,} \)
\( \text{महा + उदयः = महोदयः। महा + उन्नतिः = महोन्नति ।} \)
(8) \( \text{आ + ऊ = ओ} \)
\( \text{यमुना + ऊर्मि: = यमुनोर्मिः, महा + ऊर्जस्वलः = महोर्जस्वलः,} \)
\( \text{गंगा + ऊर्मि: = गंगोर्मि: महा + ऊर्जितम् = महोर्जितम् ।} \)
(9) \( \text{अ + ऋ = अर्} \)
\( \text{परम + ऋतः = परमर्तः, सप्त + ऋषिः = सप्तर्षिः,} \)
\( \text{सुर + ऋषिः = सुरर्षिः, वसन्त + ऋतुः = वसन्तर्तुः ।} \)
(10) \( \text{आ + ऋ = अर्} \)
\( \text{वर्षा + ऋतुः = वर्षर्तुः राजा + ऋषिः = राजर्षिः,} \)
\( \text{महा + ऋद्धिः = महर्द्धिः। महा + ऋषिः = महर्षिः ।} \)
(11) \( \text{अ + लृ = अल्} \)
\( \text{तव + लृकारः = तवल्कारः, उप + लृकारः = उपलृकारयति ।} \)
(3) वृद्धि सन्धि
वृद्धिरेचि- यदि \( \text{'अ'} \) या \( \text{'आ'} \) के बाद \( \text{'ए'} \) या \( \text{'ऐ'} \) आये तो दोनों के स्थान में \( \text{'ऐ'} \) और यदि \( \text{'ओ'} \) या \( \text{'औ'} \) आवे तो दोनों के स्थान में \( \text{'औ'} \) वृद्धि हो जाती है। जैसे-अद्य \( + \) एव \( = \) अद्यैव। यहाँ अद्य के \( \text{'द्य'} \) में स्थित \( \text{'अ'} \) तथा उसके बाद \( \text{'एव'} \) का प्रथम वर्ण \( \text{'ए'} \) मौजूद है। अतः \( \text{(अ + ए = ऐ)} \) अ तथा \( \text{ए} \) के स्थान में \( \text{'ऐ'} \) वृद्धि हो जायेगी। अतः अद्य \( + \) एव मिलाने पर अद्यैव रूप बना। इसी प्रकार
- \( \text{अ/आ + ए/ऐ = ऐ} \)
- \( \text{अ/आ + ओ/औ = औ} \)
यथा-
\( \text{कृष्णैकत्वम् - कृष्ण + एकत्वम् - अ + ए = ऐ} \)
\( \text{गंगैषा - गंगा + एषा - आ + ए = ऐ} \)
\( \text{सदैव - सदा + एव - आ + ए = ऐ} \)
\( \text{मतैक्यम् - मत + ऐक्यम् - अ + ऐ = ऐ} \)
\( \text{जलौघः - जल + ओघः - अ + ओ = औ} \)
\( \text{गंगौघः - गंगा + ओघः - आ + ओ = औ} \)
\( \text{दिव्यौषधिः - दिव्य + औषधिः - अ + औ = औ} \)
\( \text{महौषधिः - महा + औषधि - आ + औ = औ} \)
\( \text{अथ + एवम् = अथैवम् । सह + एव = सहैव} \)
(2) \( \text{आ + ए = ऐ} \)
\( \text{तथा + एव = तथैव, त्वया + एव = त्वयैव,} \)
\( \text{तदा + एव = तदैव, मया + एव = मयैव,} \)
\( \text{यदा + एव = यदैव । सा + एव = सैव} \)
(3) \( \text{अ + ऐ = ऐ} \)
\( \text{देव + ऐश्वर्यम् = देवैश्वर्यम्, परम + ऐश्वर्यम् = परमैश्वर्यम्} \)
\( \text{जन + ऐक्यम् = जनैक्यम् । तव + ऐश्वर्यम् = तवैश्वर्यम्} \)
(4) \( \text{आ + ऐ = ऐ} \)
\( \text{महा + ऐश्वर्यम् = महैश्वर्यम्, धारा + ऐक्यम् = धारैक्यम्} \)
\( \text{जनता + ऐक्यम् = जनतैक्यम् सदा + ऐक्यम् = सदैव ।} \)
(5) \( \text{अ + ओ = औ} \)
\( \text{पाप + ओघः = पापौघः, तण्डुल + ओदनः = तण्डुलौदनः} \)
(6) \( \text{अ + औ = औ} \)
\( \text{कृष्ण + औत्कण्ठ्यम् = कृष्णौत्कण्ठ्यम् धर्म + औत्सुक्यम् = धर्मौत्सुक्यम्} \)
\( \text{परम + औदार्यम् = परमौदार्यम् ईश्वर + औदार्यम् = ईश्वरौदार्यम् ।} \)
(4) यण् सन्धि
इको यणचि- \( \text{इ} \) अथवा \( \text{ई} \) के बाद असमान स्वर आने पर \( \text{इ, ई} \) का \( \text{य्;} \) \( \text{उ} \) अथवा \( \text{ऊ} \) के बाद असमान स्वर आने पर \( \text{उ, ऊ} \) का \( \text{व्;} \) \( \text{ऋ} \) के बाद असमान स्वर आने पर \( \text{ऋ} \) को \( \text{र्} \) तथा \( \text{लृ} \) के बाद असमान स्वर आने पर \( \text{लृ} \) के स्थान में \( \text{ल्} \) हो जाता है।
अर्थात् -
1. जब \( \text{इ} \) या \( \text{ई} \) के बाद \( \text{इ, ई} \) को छोड़कर कोई दूसरा स्वर आये तब \( \text{इ, ई} \) के स्थान में \( \text{'य'} \) हो जाता है।
2. जब \( \text{उ} \) या \( \text{ऊ} \) के बाद \( \text{उ, ऊ} \) को छोड़कर कोई दूसरा स्वर आये तब \( \text{'उ, ऊ'} \) के स्थान में \( \text{'व्'} \) हो जाता है।
3. जब \( \text{ऋ} \) या \( \text{ॠ} \) के बाद \( \text{ऋ, ॠ} \) को छोड़कर कोई दूसरा स्वर आये तब \( \text{'ऋ, ॠ'} \) के स्थान में \( \text{'र'} \) हो जाता है।
जैसे – यदि \( + \) अपि \( = \) यद्यपि। यहाँ \( \text{'यदि'} \) के \( \text{'दि'} \) में \( \text{'इ'} \) है। इसके बाद \( \text{'अपि'} \) के आदि में \( \text{'अ'} \) स्वर है जो कि असमान है। अतः \( \text{'इ'} \) के स्थान में \( \text{'यू'} \) होने पर \( \text{'य + द् + य् + अपि'} \) रूप बना। इनको मिलाने पर \( \text{'यद्यपि'} \) रूप बना। इसी प्रकार
- \( \text{इ/ई + असमान स्वर = य्} \)
- \( \text{उ/ऊ + असमान स्वर = व्} \)
- \( \text{ऋ/ॠ + असमान स्वर = र्} \)
\( \text{दध्यत्र - दधि + अत्र - इ + अ = य् + अ} \)
\( \text{कल्यागमः - कलि + आगमः - इ + आ = य् + आ} \)
\( \text{मध्वरिः - मधु + अरिः - उ + अ = व् + अ} \)
\( \text{गुर्वादेशः - गुरु + आदेश - उ + आ = व् + आ} \)
\( \text{साध्विति - साधु + इति - उ + इ = व् + इ} \)
\( \text{विष्ण्वैक्यम् - विष्णु + ऐक्यम् - उ + ऐ = व् + ऐ} \)
\( \text{धात्रंशः - धातु + अंशः - ऋ + अं = र् + अं} \)
\( \text{पित्राकृतिः - पितृ + आकृतिः - ऋ + आ = र् + आ} \)
\( \text{सवित्रुदयः - सवितृ + उदयः - ऋ + उ = र् + उ} \)
\( \text{लाकृतिः - लृ + आकृतिः - लृ + आ = ल् + आ} \)
\( \text{प्रात + एकम् = प्रत्यकम्, वारि + आनय = वायानय,} \)
\( \text{दधि + अत्र = दध्यत्र, सति + अपि = सत्यपि ।} \)
(2) \( \text{ई + असमान स्वर = य् + असमान स्वर} \)
\( \text{महती + आकाङ्क्षा = महत्याकङ्क्षा, देवी + औदार्यम् = देव्यौदार्यम्,} \)
\( \text{सुधी + उपास्यः = सुध्युपास्यः, गौरी + औ = गौयौं,} \)
\( \text{महती + उत्कण्ठा = महत्युत्कण्ठा, पार्वती + उवाच = पार्वत्युवाच,} \)
\( \text{पृथिवी + उवाच = पृथिव्युवाच, नदी + अत्र = नद्यत्र ।} \)
(3) \( \text{उ + असमान स्वर = व् + असमान स्वर} \)
\( \text{मधु + अत्र = मध्वत्र, मधु + अरिः = मध्वरिः,} \)
\( \text{अनु + अयः = अन्वयः, अस्तु + इति = अस्त्विति,} \)
\( \text{सु + आगतम् = स्वागतम्, साधु + इति = साध्विति,} \)
\( \text{गुरु + आदेशः = गुर्वादेशः, गुरु + औदार्यम् = गुर्वौदार्यम्,} \)
\( \text{मधु + आनयः = मध्वानयः गुरु + आज्ञा = गुर्ज्ञा ।} \)
(4) \( \text{ऊ + असमान स्वर = व् + असमान स्वर} \)
\( \text{वधू + आदेशः = वध्वादेशः, चमू + आनयनम् = चम्वानयनम्,} \)
\( \text{वधू + आगमनम् = वध्वागमनम्, चमू + आगमनम् = चम्वागमनम् ।} \)
(5) \( \text{ऋ + असमान स्वर = र् + असमान स्वर} \)
\( \text{धातृ + अंशः = धात्रंशः, पितृ + आदेशः = पित्रादेशः,} \)
\( \text{मातृ + आज्ञा = मात्राज्ञा, मातृ + उपदेशः = मात्रुपदेशः ।} \)
(6) \( \text{लृ + असमान स्वर = ल् + असमान स्वर} \)
\( \text{लाकृतिः} \)
(5) अयादि सन्धि
एचोऽयवायावः- \( \text{ए, ऐ, ओ, औ} \) के बाद जब कोई असमान स्वर आता है, तब \( \text{'ए'} \) के स्थान पर \( \text{'अय्'}, \text{'ओ'} \) के स्थान पर \( \text{'अव्'}, \text{'ऐ'} \) के स्थान पर \( \text{'आय्'} \) तथा \( \text{'औ'} \) के स्थान पर \( \text{'आव्'} \) हो जाता है। जैसे- भो \( + \) अति \( = \) भवति। यहाँ \( \text{'भो'} \) में \( \text{'ओ'} \) है तथा उसके बाद \( \text{'अति'} \) का प्रथम वर्ण \( \text{'अ'} \) है, जो कि असमान स्वर है; ऊपर के नियम के अनुसार \( \text{'ओ'} \) के स्थान में \( \text{'अव्'} \) हुआ, तब \( \text{'भव् + अति'} \) रूप बना, इन सबको मिलाने पर \( \text{'भवति'} \) रूप बना। इसी प्रकार
- \( \text{ए + असमान स्वर = अय्} \)
- \( \text{ओ + असमान स्वर = अव्} \)
- \( \text{ऐ + असमान स्वर = आय्} \)
- \( \text{औ + असमान स्वर = आव्} \)
\( \text{भवांत - भो + अति - ओ + अ = अव्} \)
\( \text{श्रवणम् - श्रो + अणम् - ओ + अ = अव्} \)
\( \text{गुरवे - गुरो + ए - ओ + ए = अव्} \)
\( \text{गायक: - गै + अकः - ऐ + अ = आय्} \)
\( \text{नाविक : - नौ + इक: - औ + इ = आव्} \)
\( \text{पावकः - पौ + अकः - औ + अ = आव्} \)
अन्य उदाहरण
(1) \( \text{हरे + ए = हरये, शे + अनम् = शयनम्,} \)
\( \text{चे + अनम् = चयनम्, जे + अति = जयति,} \)
\( \text{ने + अति = नयति ।} \)
(2) \( \text{विष्णो + ए = विष्णवे, भानो + ए = भानवे} \)
\( \text{विष्णो + इति = विष्णविति, भो + अनम् = भवनम् ।} \)
(3) \( \text{नै + अकः = नायकः, सखै + औ = सखायौ,} \)
\( \text{ध्यै + अति = ध्यायति ।} \)
(4) \( \text{भौ + उकः = भावुकः, भौ + अकः = धावकः ।} \)
नोट- यदि \( \text{ओ} \) अथवा \( \text{औ} \) के बाद यकारादि वर्ण वाला प्रत्यय हो तो \( \text{ओ} \) का \( \text{अव्} \) तथा \( \text{औ} \) को \( \text{आव्} \) होता है। जैसे -
\( \text{गो + यम् = गव्यम् नौ + यम् = नाव्यम्} \)
\( \text{लौ + यम् = लाव्यम् भौ + यम् = भाव्यम्} \)
अन्य उदाहरण
(1) \( \text{यो + अनम् = यवनम्, गो + आम् = गवाम्, पो + इत्रः = पवित्रः ।} \)
(2) \( \text{रमे + आ = रमया, कपे + ए = कपये, शे + इतः = शयितः ।} \)
(3) \( \text{रै + आम् = रायाम्, वै + इति = वायिति ।} \)
(4) \( \text{नौ + औ = नावौ, अभौ + इ = अभावि ।} \)
(6) पूर्वरूपं सन्धि
एङः पदान्तादति- यदि पद के अन्त में \( \text{'ए'} \) अथवा \( \text{'ओ'} \) हों तथा इनके बाद ह्रस्व \( \text{'अ'} \) हो तो \( \text{'अ'} \) का पूर्वरूप \( \text{(S)} \) हो जाता है। जैसे – हरे \( + \) अव \( = \) हरेऽव, विष्णो \( + \) अव \( = \) विष्णोऽव ।
\( \text{(ए + अ = S)} \)
\( \text{(ओ + अ = S)} \)
\( \text{यज्ञे + अग्नि = यज्ञेऽग्नि} \)
\( \text{गृहे + अत्र = गृहेऽत्र} \)
\( \text{रामो + अत्र = रामोऽत्र} \)
\( \text{पुरुषो + अयम् = पुरुषोऽयम्} \)
(7) परसवर्ण सन्धि
अनुस्वारस्य ययि परसवर्ण:- यदि पद के मध्य अनुस्वार के आगे किसी वर्ग का कोई वर्ण हो तो अनुस्वार के स्थान पर उसी वर्ग का पंचम वर्ण हो जाता है। जैसे-
\( \text{शाम् / शां + तः = शान्तः} \)
\( \text{कुम् / कुं + ठितः = कुण्ठितः} \)
\( \text{सम् / सं + चयः = सञ्चयः} \)
\( \text{गुम / गुं + फितः = गुम्फितः} \)
(ii) व्यञ्जन सन्धि
परिभाषा-व्यञ्जन का किसी व्यञ्जन के साथ या स्वर के साथ मेल होने पर व्यञ्जन में जो परिवर्तन होता है, उसे व्यञ्जन सन्धि कहते हैं। इसे हल् सन्धि भी कहते हैं। जैसे- \( \text{'वागीशः = वाक् + ईशः'} \) यहाँ स्वर \( \text{ई} \) के साथ मेल होने पर \( \text{'क'} \) में परिवर्तन होकर \( \text{'वागीशः'} \) शब्द बना।
नोट-व्यञ्जन सन्धि के अनेक भेद हैं। उनमें से श्चत्व, ष्टुत्व, जश्त्व, चव एवं अनुस्वार भेदों का यहाँ निरूपण किया जा रहा है।
(1) श्रुत्व सन्धि
स्तोः श्श्रुना श्चुः- यदि \( \text{स्} \) या \( \text{त वर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्)} \) के आगे या सामने \( \text{श्} \) (वर्ण) अथवा \( \text{च वर्ग (च्, छ्, ज्, झ्, ञ्)} \) हो तो \( \text{स्} \) (वर्ण) को \( \text{श्} \) (वर्ण) और \( \text{त वर्ग} \) को क्रमशः \( \text{च्, छ्, ज्, झ्, ञ्} \) (च वर्ग) हो जाता है। अर्थात् \( \text{स्} \) के आगे \( \text{श्} \) या \( \text{च वर्ग (च्, छ, ज, झ, ञ)} \) का कोई वर्ण होगा तो \( \text{स्} \) के स्थान पर \( \text{श्} \) हो जाता है। इसी तरह \( \text{'त्'} \) के स्थान पर \( \text{'च्'} \), \( \text{'थ्'} \) के स्थान पर \( \text{'छ्'} \), \( \text{'द्'} \) के स्थान पर \( \text{'ज्'} \), \( \text{'ध्'} \) के स्थान पर \( \text{'झ्'} \) तथा \( \text{'न्'} \) के स्थान पर \( \text{'ञ्'} \) हो जाता है। इसी को श्चत्व सन्धि कहा जाता है। जैसे-
\( \text{हरिस् + शेते = हरिश्शेते (स् को श् होने पर)} \)
\( \text{रामस् + चिनोति = रामश्चिनोति (स् को श् होने पर)} \)
\( \text{सत् + छात्रः = सच्छात्रः (त् को च् होने पर)} \)
\( \text{सत् + चित् = सच्चित् (त् को च् होने पर)} \)
\( \text{कथ् + झटति = कछ्झटति (थ् को छ् होने पर)} \)
\( \text{उद् + ज्वलः = उज्ज्वलः (द् को ज् होने पर)} \)
\( \text{सद् + जनः = सज्जनः (द् को ज् होने पर)} \)
\( \text{बध् + झटति = बझ्झटति (ध् को झ् होने पर)} \)
\( \text{बुध् + झटति = बुझ्झटति (ध् को झ् होने पर)} \)
\( \text{शाङ्गिन् + जयः = शाङ्गिञ्जयः (न् को ञ् होने पर)} \)
\( \text{शत्रून् + जयति = शत्रूञ्जयति (न् को ञ् होने पर)} \)
\( \text{तत् + टीका = तट्टीका (त् को ट् होने पर)} \)
\( \text{मत् + टीका = मट्टीका (त् को ट् होने पर)} \)
\( \text{कथ् + ठक्कुरः = कठक्कुरः (थ् को ठ् होने पर)} \)
\( \text{उद् + डयनम् = उड्डयनम् (द् को ड् होने पर)} \)
\( \text{एतद् + ढक्का = एतड्ढक्का (द् को ढ् होने पर)} \)
\( \text{बध् + ढौकसे = बढौकसे (ध् को ढ् होने पर)} \)
\( \text{बुध् + डीन = बुद्धीनः (ध् को ढ् होने पर)} \)
\( \text{महान् + डामरः = महाण्डामरः (न् को ण् होने पर)} \)
\( \text{चक्रिन् + ढौकसे = चक्रिण्ढौकसे (न् को ण् होने पर)} \)
\( \text{इष + तः = इष्टः (त् को ट् होने पर)} \)
\( \text{पेष् + ता = पेष्टा (त् को ट् होने पर)} \)
(3) णत्वविधानम्।
रषाभ्यां नो णः समानपदे। अकुप्वाङ नुम्व्यायेऽपि ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम्। (अर्थात् यदि \( \text{र्, ष, ऋ} \) तथा \( \text{ॠ} \) के बाद \( \text{'न्'} \) आये तो उसका \( \text{'ण्'} \) हो जाता है।) जैसे-
\( \text{पितृ + नाम् = पितृणाम् तिसृ + नाम् = तिसृणाम्} \)
\( \text{जीर् + नम् = जीर्णम् पूर + नः = पूर्णः} \)
\( \text{कन् + णः = कण्णः पूष् + ना = पूष्णा} \)
\( \text{तृष् + ना = तृष्णा गीर् + नः = गीर्ण:} \)
\( \text{मुष् + नाति = मुष्णाति कृष् + नः = कृष्णः} \)
नोट – यदि \( \text{र्, ष, ऋ, ॠ} \) तथा \( \text{'न्'} \) के बीच में कोई स्वर, कवर्ग, पवर्ग, य, व, र, ह, तथा अनुस्वार आ जाये तो भी \( \text{'न्'} \) का \( \text{'ण्'} \) हो जाता है जैसे – रामे \( + \) न \( = \) रामेण। किन्तु पदान्त \( \text{'न'} \) का \( \text{'ण्'} \) नहीं होता यथा – रामा \( + \) न् \( = \) रामान्।
(4) षत्वविधानम्।
अपदान्तस्य मूर्धन्यः। इण्कोः। आदेशप्रत्यययोः। (अर्थात् \( \text{'अ'} \) तथा \( \text{'आ'} \) को छोड़कर यदि कोई स्वर, ह, य, व, र, लृ तथा विसर्ग \( (:) \) के बाद \( \text{'स्'} \) आये और वह \( \text{'स्'} \) पदान्त का न हो, तो उसका \( \text{'ष्'} \) हो जाता है।) जैसे-
\( \text{दिक् + सु = दिक्षु, दिक्षु सर्पिः + सु = सर्पिषु} \)
\( \text{मातृ + सु = मातृषु नटे + सु = नटेषु} \)
\( \text{हरि + सु = हरिषु यजु + सु = यजुषु} \)
\( \text{भानु + सु = भानुषु धनून् + सि = धनूंषि} \)
\( \text{रामे + सु = रामेषु चतुर् + सु = चतुर्षु} \)
विसर्जनीयस्य सः- यदि विसर्ग के परे (सामने) \( \text{क्, ख्, च्, छ्, ट्, ठ्, त्, थ्, श्, ष्} \) अथवा \( \text{स्} \) वर्णों में से कोई एक वर्ण होता है, तो विसर्ग \( (:) \) का (त्, थ् आने पर) \( \text{स्} \), (च्, छ् आने पर) \( \text{श्} \) तथा (ट्, ठ् आने पर) \( \text{ष्} \) हो जाता है। इसी को सत्व सन्धि कहते हैं। जैसे –
\( \text{विष्णुः + त्राताः = विष्णुस्त्राता (विसर्ग को स् होने पर)} \)
\( \text{रामः + च = रामश्च (विसर्ग को श् होने पर)} \)
\( \text{धनुः + टंकारः = धनुष्टंकारः (विसर्ग को ष् होने पर)} \)
\( \text{निः + छलः = निश्छलः (विसर्ग को श् होने पर)} \)
\( \text{नमः + ते = नमस्ते (विसर्ग को स् होने पर)} \)
\( \text{बालः + स्वपिति = बालस्स्वपिति (विसर्ग को स् होने पर)} \)
\( \text{नमः + ते = नमस्ते (विसर्ग को स् होने पर)} \)
\( \text{निः + फलम् = निष्फलम् (विसर्ग को ष् होने पर)} \)
\( \text{दुः + कर्म = दुष्कर्म (विसर्ग को ष् होने पर)} \)
(2) उत्वसन्धि
(1) अतो रोरप्लुतादप्लुते- जब विसर्ग \( (:) \) के पहले ह्रस्व \( \text{'अ'} \) हो तथा विसर्ग \( (:) \) के परे (बाद में) भी ह्रस्व \( \text{'अ'} \) स्वर हो तो विसर्ग \( (:) \) के स्थान पर \( \text{'ओ'} \) तथा बाद में आने वाले ह्रस्व \( \text{'अ'} \) के स्थान पर अवग्रह चिह्न \( \text{(S)} \) लगा दिया जाता है। जैसे-
\( \text{बालकः + अयम् = बालकोऽयम्। (विसर्ग को ओ होने से तथा पर 'अ' को 'S' अवग्रह होने पर)} \)
\( \text{कः + अपि = कोऽपि। (विसर्ग को ओ होने से तथा पर 'अ' को 'S' अवग्रह होने पर)} \)
\( \text{लक्ष्मणः + अस्ति = लक्ष्मणोऽस्ति। (विसर्ग को ओ होने से तथा पर 'अ' को 'S' अवग्रह होने पर)} \)
\( \text{रामः + अगच्छत् = रामोऽगच्छत्। (विसर्ग को ओ होने से तथा पर 'अ' को 'S' अवग्रह होने पर)} \)
\( \text{रामः + अवदत् = रामोऽवदत्। (विसर्ग को ओ होने से तथा पर 'अ' को 'S' अवग्रह होने पर)} \)
(II) हशि च- यदि विसर्ग \( (:) \) के पूर्व (पहले) ह्रस्व \( \text{'अ'} \) हो और विसर्ग \( (:) \) के आगे किसी भी वर्ग का तीसरा \( \text{(ग्, ज्, ड्, द्, ब्)} \), चौथा \( \text{(घ्, झ्, ढ्, ध्, भ्)} \), पाँचवां \( \text{(ङ्, ञ्, ण्, न्, म्)} \) अथवा \( \text{य, र, ल, व, ह-} \) इन बीस वर्णों में से कोई भी एक वर्ण हो तो विसर्ग \( (:) \) के पूर्व वाले \( \text{'अ'} \) तथा
अभ्यास : 1
प्रश्नः अधोलिखितेषु पदेषु सन्धिविच्छेदं कुरुत-(निम्नलिखित पदों में सन्धि-विच्छेद कीजिए-)
(i) पाण्डवाग्रजः
(ii) गत्वैकं
(iii) प्रत्येकः
(iv) भवनम्:
(v) पावकः
(vi) प्रेजते
(vii) कीटोऽपि
(viii) वध्वागमः
(ix) सर्वेऽस्मिन्
(x) गंगैषा
(xi) लाकृति
(xii) हरिश्शेतेः
(xiii) तट्टीका
(xiv) विष्णुस्त्राता
(xv) देवो वन्द्यः।
Answer:
(i) पाण्डव + अग्रजः
(ii) गत्वा + एकं
(iii) प्रति + एकं
(iv) भो + अनम्
(v) पौ + अकः
(vi) प्र + एजते
(vii) कीटः + अपि
(viii) वधू + आगमः
(ix) सर्वे + अस्मिन्
(x) गंगा + एषा
(xi) लृ + आकृति
(xii) हरिः + शेते
(xiii) तत् + टीका
(xiv) विष्णुः + त्राता
(xv) देवो + वन्द्यः।
In simple words: सन्धि-विच्छेद का मतलब है दो जुड़े हुए शब्दों को उनके मूल हिस्सों में अलग करना. यह हमें शब्दों का सही अर्थ समझने में मदद करता है.
🎯 Exam Tip: सन्धि-विच्छेद करते समय, हर शब्द के मूल और सही अर्थ को ध्यान में रखें. वर्णों के मेल के नियमों को समझना बहुत ज़रूरी है.
अभ्यास : 2
प्रश्नः अधोलिखितेषु पदेषु संधि कृत्वा संधिनामोल्लेखं कुरुत (निम्नलिखित पदों में सन्धि करके सन्धि का नाम बताइए-)
(i) श्री + ईशः
(ii) साधु + ऊचुः
(iii) देव + ऋषिः
(iv) रमा + ईशः
(v) सदा + एव
(vi) महा + ओषधिः
(vii) दधि + अत्र
(viii) नै + अकः
(ix) जे + अः
(x) प्र + एजते
(xi) सत् + चि
(xii) पेष् + ताः
(xiii) रामे + सु
(xiv) राम + स्
(xv) शिवस + अर्घ्य।
Answer:
(i) श्रीशः (दीर्घ सन्धिः)
(ii) साधूचुः (दीर्घ सन्धि)
(iii) देवर्षिः (गुण सन्धि)
(iv) रमेशः (गुण सन्धि)
(v) सदैव (वृद्धि सन्धि)
(vi) महौषधिः (वृद्धि सन्धि)
(vii) दध्यत्र (यण् सन्धि)
(viii) नायकः (अयादि सन्धिः)
(ix) जयः (अयादि सन्धिः)
(x) प्रेजते (पररूप सन्धिः)
(xi) सच्चित् (श्चुत्व सन्धिः)
(xii) पेष्टारष्टुत्व सन्धि:)
(xiii) रमेसु (षत्वविधानम्)
(xiv) रामः (विसर्ग सन्धि)
(xv) शिवोऽर्थ्य (उत्व सन्धिः)।
In simple words: यहाँ हमें दो शब्दों को जोड़कर नया शब्द बनाना है और यह भी बताना है कि कौन सी सन्धि का नियम लगा है. सन्धि शब्दों को छोटा और बोलने में आसान बनाती है.
🎯 Exam Tip: सन्धि करते समय, वर्णों के सही मेल को पहचानना और उचित सन्धि का नाम बताना महत्वपूर्ण है. हर सन्धि का अपना नियम होता है.
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तराणि
अभ्यास : 3
प्रश्नः अधोलिखितेषु वाक्येषु स्थूलपदेषु सन्धिनियमान् आधारीकृत्य सन्धिविच्छेदं कुरुत (निम्नलिखित वाक्यों में स्थूल पदों में सन्धि-नियमों को आधार बनाकर सन्धि-विच्छेद कीजिए-)
1. अद्याहम् आपणं गमिष्यामि।
2. पर्वतानां नृपः हिमालयः अस्ति।
3. अद्य राधा विद्यालयं न गमिष्यति।
9. प्रतिजनस्य हृदये परमेश्वरः वसति।
10. राकेशः कुत्र निवसति ?
11. देवर्षिः नारदः महान् अस्ति।
12. रमेशः स्वगृहस्य नायकः अस्ति।
13. राजर्षिः प्रतापवान् आसीत्।
14. रमनः श्रेष्ठः गायकः अस्ति।
15. स्वामी दयानन्दः महर्षिः आसीत्।
16. प्रतिगृहे पावकः भवति।
17. श्यामः कुशलः नाविकः अस्ति।
18. राहुलः धावकः अस्ति।
19. अयम् आश्रमः पवित्रः अस्ति।
20. तव गृहे परमैश्वर्यम् अस्ति।
Answer:
1. अद्य + अहम्
2. हिम + आलयः
3. विद्या + आलयम्
4. रवि + इन्द्रः
5. सूर्य + उदयः
6. सुर + इन्द्रः
7. मृग + इन्द्रः
8. चन्द्र + उदयः
9. परम + ईश्वरः
10. राका + ईशः
11. देव + ऋषिः
12. नै + अकः
13. राजा + ऋषिः
14. गै + अकः
15. महा + ऋषिः
16. पौ + अक:
17. नौ + इकः
18. धौ + अक:
19. पो + इत्र:
20. परम + ऐश्वर्यम्।
In simple words: हमें इन वाक्यों में दिए गए मोटे शब्दों को तोड़कर उनके मूल रूप में लिखना है. हर विच्छेद सन्धि के किसी एक नियम पर आधारित होता है.
🎯 Exam Tip: सन्धि-विच्छेद करते समय, वाक्यों के संदर्भ को समझें और हर शब्द के सही मूल रूप को पहचानने का प्रयास करें. नियम का ज्ञान बहुत ज़रूरी है.
अभ्यास : 4
प्रश्नः अधोलिखितेषु वाक्येषु स्थूलपदेषु सन्धिनियमान् आधारीकृत्य सन्धिविच्छेदं कुरुत(निम्नलिखित वाक्यों में स्थूल पदों में सन्धि-नियमों को आधार बनाकर सन्धि-विच्छेद कीजिए-)
1. तव हृदये परमौदार्यम् अस्ति।
2. निम्बः महौषधम् भवति।
3. त्वं गच्छ, तदैव अहम् गमिष्यामि।
4. यथा माता करोति तथैव पुत्रः करोति।
5. एतस्मिन् पात्रे तण्डुलौदनम् अस्ति।
6. सः किं प्रत्युवाच।
7. इत्युक्त्वा सः अगच्छत्।
8. मम हृदये अत्यौत्सुक्यम् अस्ति।
9. त्वं गुर्वाज्ञा न जानासि।
10. मम गृहे तव स्वागतम्।
11. त्वं पठ, इति पित्रादेशः।
17. जनकस्य मनः, कुण्ठितः आसीत्।
18. भिक्षुकः शान्तः आसीत्।
19. माता नाविकं पश्यति।
20. बालानां हृदयः निश्छलः भवति।
Answer:
1. परम + औदार्यम्
2. महा + औषधम्
3. तदा + एव
4. तथा + एव
5. तण्डुल + ओदनम्
6. प्रति + उवाच
7. इति + उक्त्वा
8. अति + औत्सुक्यम्
9. गुरु + आज्ञा
10. सु + आगतम्
11. पितृ + आदेश:
12. समये + अस्मिन्
13. वृक्षे + अस्मिन्
14. सत् + छात्रः
15. उद् + ज्वलः
16. सत् + जनः
17. कुम् + ठितः
18. शाम् + तः
19. नौ + इकम्
20. निः + छलः।
In simple words: यहाँ भी हमें वाक्यों में दिए गए मोटे शब्दों को उनके मूल हिस्सों में बांटना है. सन्धि-विच्छेद से शब्दों की बनावट और उनके अर्थों को समझना आसान हो जाता है.
🎯 Exam Tip: सन्धि-विच्छेद करते समय ध्यान दें कि आप मूल शब्दों को सही ढंग से अलग कर रहे हैं ताकि उनका अर्थ न बदले. हर एक अक्षर के बदलाव को ध्यान में रखें.
अभ्यास : 5
प्रश्नः अधोलिखितेषु वाक्येषु स्थूलपदेषु सन्धिनियमान् आधारीकृत्य सन्धि कुरुत(निम्नलिखित वाक्यों में स्थूल पदों में सन्धि-नियमों को आधार बनाकर सन्धि कीजिए-)
1. पूर्णिमायाः दिवसे पूर्ण: रजनी + ईशः उदेति।
2. मम दुःख + अन्तः अवश्यमेव भविष्यति।
3. रमा प्रातः देव + आलयम् गच्छति।
4. उपवने पदम् + आकरः अस्ति।
5. सोहनः पुस्तक + आलयं गच्छति।
6. मम विद्या + आलयः निकटमस्ति।
7. मोहितः प्रवीणः विद्या + अर्थी अस्ति।
8. जलाय महती + इच्छा भवति।
9. सोहनस्य अभि + इष्टः देवः रामः अस्ति।
10. शंकर: गौरी + ईशः अस्ति।
11. विष्णुः लक्ष्मी + ईशः अस्ति।
12. चन्द्रः एव सुधा + आकरः भवति।
13. रवीन्द्रः कवि + इन्द्रः आसीत्।
14. मम गृहे विवाह + उत्सवः अस्ति।
15. हरि + ईशः प्रवीणः छात्रः अस्ति।
16. हिम + आलये विविधाः वृक्षाः सन्ति।
17. रत्न + आकरः गम्भीरः भवति।
18. तव जनकस्य नाम परम + आनन्दः अस्ति।
Answer:
1. रजनीशः
2. दुःखान्तः
3. देवालयम्
4. पदाकरः
5. पुस्तकालयं
6. विद्यालयः
7. विद्यार्थी
8. महतीच्छा
9. अभीष्टः
10. गौरीशः
11. लक्ष्मीशः
12. सुधाकरः
13. कवीन्द्रः
14. विवाहोत्सवः
15. हरीशः
16. हिमालये
17. रत्नाकरः
18. परमानन्दः
In simple words: यहाँ हमें अलग-अलग शब्दों को सन्धि के नियमों के अनुसार जोड़कर नए शब्द बनाने हैं. यह शब्दों को बोलने और लिखने में ज़्यादा प्रवाहपूर्ण बनाता है.
🎯 Exam Tip: सन्धि करते समय, स्वर सन्धि, व्यञ्जन सन्धि और विसर्ग सन्धि के नियमों को ध्यान से लागू करें ताकि सही शब्द बन सके.
अभ्यास : 6
प्रश्नः अधोलिखितेषु वाक्येषु स्थूलपदेषु सन्धिनियमान् आधारीकृत्य सन्धिं कुरुत (निम्नलिखित वाक्यों में स्थूल-पदों में सन्धि-नियमों को आधार बनाकर सन्धि कीजिए-)
1. पुष्प + इन्द्रः कुत्र गमिष्यति?।
2. शिवः एव महा + ईशः अस्ति।
3. पर + उपकारः महान् गुणः भवति।
4. हित + उपदेशः लाभकारी भवति।
5. रामः पुरुष + उत्तमः आसीत्।
6. अद्य विद्यालये महा + उत्सवः भविष्यति।
7. अद्यापि गगनमण्डले सप्त + ऋषयः दीप्यन्ति।
8. ग्रीष्मानन्तरे वर्षा + ऋतुः आगमिष्यति।
9. संदा सत्यस्य विजयः भो + अति।
10. सः देवं ध्यै + अति।
11. हरे + ए रोचते भक्तिः।
12. सदा + एव सत्यं वद।
13. मम उपरि तु ईश्वर + औदार्यम् अस्ति।
14. अद्य जनकस्य गृहे वधू + आगमनम् भविष्यति।
15. पुरुषो + अयम् बलवान् अस्ति।
16. शय्यां हरिस् + शेते।
17. रीना सत् + चरित्रा बालिका अस्ति।
18. मम मित्रं सद् + जनः अस्ति।
19. विद्यालये. अहम् + पठामि।
20. बालिका गृहम् + गच्छति।
Answer:
1. पुष्पेन्द्रः
2. महेशः
3. परोपकार:
4. हितोपदेशः
5. पुरुषोत्तमः
6. महोत्सवः
7. सप्तर्षयः
8. वर्षर्तुः
9. भवति
10. ध्यायति
11. हरये
12. सदैव
13. ईश्वरौदार्यम्
14. वध्वागमनम्
15. पुरुषोऽयम्
16. हरिश्शेते
17. सच्चरित्रा
18. सज्जनः
19. अहं पठामि
20. गृहं गच्छति।
In simple words: हमें इन वाक्यों में दिए गए शब्दों को सन्धि के नियमों के अनुसार जोड़ना है. सन्धि से शब्दों का उच्चारण सरल हो जाता है और भाषा अधिक सुंदर लगती है.
🎯 Exam Tip: सन्धि करते समय, यह सुनिश्चित करें कि आप हर शब्द के लिए सही सन्धि नियम का पालन कर रहे हैं. खासकर जब शब्दों के बीच में स्वर या व्यञ्जन बदलते हैं.
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