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Detailed व्याकरणम् समास प्रकरणम् RBSE Solutions for Class 11 Sanskrit
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Class 11 Sanskrit व्याकरणम् समास प्रकरणम् RBSE Solutions PDF
पाठ्यपुस्तक के प्रजोत्तर
अभ्यास 1
Question. अधोलिखितेषु पदेषु समास-विग्रहं कृत्वा नामोल्लेखं कुरुत (निम्नलिखित पदों में समास-विग्रह करके समास का नाम बताइए।)।
(i) नखभिन्नः, (ii) घनश्याम, (iii) त्रिभुवनम्, (iv) अनश्वः, (v) चिगुः, (vi) विषकण्ठः, (vii) इन्द्राग्नी, (viii) दम्पती, (ix) उपकृष्णम्, (x) यथाशक्ति, (xi) अतिहिमम्, (xii) निर्जनम्।
Answer:
(i) नखैः भिन्नः (तृतीया तत्पुरुषः)
(ii) घन इव श्यामः (कर्मधारय)
(iii) त्रयाणां भुवनानां समाहारः (द्विगु)
(iv) न अश्वः (नञ् तत्पुरुष)
(v) चित्राः गावः यस्य सः (बहुव्रीहि)
(vi) विषं कण्ठे यस्य सः (शिवः) (बहुव्रीहि)
(vii) इन्द्रश्च अग्निश्च (द्वन्द्व)
(viii) पतिश्च जाया च (द्वन्द्व)
(ix) कृष्णस्य समीपम् (अव्ययीभाव)
(x) शक्तिम् अनतिक्रम्य (अव्ययीभाव)
(xi) हिमस्य अत्ययः (अव्ययीभाव)
(xii) जनानाम् अभावः (अव्ययीभाव)।
In simple words: हर पद का समास विग्रह किया गया है और उसके बाद उस समास का नाम भी बताया गया है, जैसे 'नखभिन्नः' का मतलब है 'नखों से अलग' और यह तृतीया तत्पुरुष समास है।
🎯 Exam Tip: समास विग्रह करते समय विभक्ति और वचन का ध्यान रखें, और उसी के अनुसार समास का नाम सही लिखें।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
अभ्यास 3
Question. अधोलिखितपदेषु समास-विग्रहं कुरुत- (निम्नलिखित पदों में समास विग्रह कीजिए-)
(i) जरामरणम् (ii) मृगमीनसज्जनानाम् (iii) सुकृतिनः (iv) तृणजलसन्तोषविहितवृत्तीनाम् (v) यशःसुखकरी (vi) चन्द्रोज्ज्वला (vii) पर्वतदुर्गेषु (viii) मानोन्नतिम् (ix) उपगंगम् (x) निर्विघ्नम् (xi) निर्जनम् (xii) प्रतिदिनम् (xiii) यथाविधिम् (xiv) प्रत्येकम् (xv) लब्धप्रतिष्ठः (xvi) चौरभयम् (xvii) यथाशक्तिम् (xviii) ग्रामगतः (xix) भीमार्जुनौ (xx) जनजागरणाय।।
Answer:
समास-विग्रहम्।
(i) जरा च मरणं च।
(ii) मृगाणां, मीनानां सज्जनानां च।
(iii) शोभनानि कृत्यानि येषां ते।
(iv) तृणैः, जलेन सन्तोषेन च विहिताः वृत्तिः येषां ते।
(v) यशः च सुखं च या करोति सा।
(vi) चन्द्र इव उज्ज्वला या सा.
(vii) पर्वतानां दुर्गेषु।
(viii) मानं च उन्नतिं च ।।
(ix) गंगायाः समीपम्।
(x) विघ्नानाम् अभावः।
(xi) जनानाम् अभावः।
(xii) दिने दिने प्रति।
(xiii) विधिम् अनतिक्रम्य।
(xiv) एकम् एकं प्रति।
(xv) लब्धा प्रतिष्ठा येन सः।
(xvi) चौराद् भयम्।
(xvii) शक्तिम् अनतिक्रम्य।
(xviii) ग्रामं गतः।
(xix) भीमश्च अर्जुनश्च।
(xx) जनानां जागरणाय।
In simple words: यहाँ दिए गए सभी शब्दों का समास विग्रह किया गया है, यानी उन्हें उनके मूल पदों में तोड़कर उनका अर्थ स्पष्ट किया गया है।
🎯 Exam Tip: समास विग्रह करते समय, प्रत्येक पद के अर्थ और उसके संबंधों को समझना महत्वपूर्ण है ताकि सही विग्रह बन सके।
अभ्यास 4
Question. अधोलिखित पदेषु सामासिक-पदं कृत्वा समासनामोल्लेखं कुरुत- (निम्नलिखित पदों में समास करके समास का नाम लिखिए)
(i) शान्तिः प्रिया यस्य सः (ii) निर्गतं धनं यस्मात् सः (iii) यशः एव धनं यस्य सः (iv) मन्दा मतिः यस्य सः (v) निर्गता लज्जा यस्मात् सः (vi) भ्राता च स्वसा च (vii) अर्थश्च धर्मश्च (viii) धर्मश्च अधर्मश्च (ix) सुख च दुःखं च (x) हरिश्च हरश्च (xi) चतुर्णाम् युगानां समाहारः (xii) पञ्चानां गंगानां समाहारः (xiii) कृष्णाश्चासौ सर्पः (xiv) महांश्चासौ ऋषिः (xv) महती चासौ दैवी। (xvi) वाचः पतिः (xvii) न उचितम् (xviii) कविषु श्रेष्ठः (xix) देशस्य भक्तः (xx) पित्रा सदृशः।
Answer:
(i) शान्तिः प्रिया यस्य सः \( \implies \) शान्तिप्रियः (बहुव्रीहि)
(ii) निर्गतं धनं यस्मात् सः \( \implies \) निर्धनः (बहुव्रीहि)
(iii) यशः एव धनं यस्य सः \( \implies \) यशोधनः (कर्मधारय)
(iv) मन्दा मतिः यस्य सः \( \implies \) मन्दमतिः (बहुव्रीहि)
(v) निर्गता लज्जा यस्मात् सः \( \implies \) निर्लज्जः (बहुव्रीहि)
(vi) भ्राता च स्वसा च \( \implies \) भ्रातरौ (द्वन्द्व)
(vii) अर्थश्च धर्मश्च \( \implies \) अर्थधर्मो (द्वन्द्व)
(viii) धर्मश्च अधर्मश्च \( \implies \) धर्माधर्मो (द्वन्द्व)
(ix) सुख च दुःखं च \( \implies \) सुखदुःखे (द्वन्द्व)
(x) हरिश्च हरश्च \( \implies \) हरिहरौ (द्वन्द्व)
(xi) चतुर्णाम् युगानां समाहारः \( \implies \) चतुर्युगम् (द्विगु)
(xii) पञ्चानां गंगानां समाहारः \( \implies \) पञ्चगंगम् (द्विगु)
(xiii) कृष्णाश्चासौ सर्पः \( \implies \) कृष्णसर्पः (कर्मधारय)
(xiv) महांश्चासौ ऋषिः \( \implies \) महर्षिः (कर्मधारय)
(xv) महती चासौ दैवी \( \implies \) महादेवी (कर्मधारय)
(xvi) वाचः पतिः \( \implies \) वाक्पतिः (षष्ठी तत्पुरुष)
(xvii) न उचितम् \( \implies \) अनुचितम् (नञ् तत्पुरुष)
(xviii) कविषु श्रेष्ठः \( \implies \) कविश्रेष्ठः (सप्तमी तत्पुरुष)
(xix) देशस्य भक्तः \( \implies \) देशभक्तः (षष्ठी तत्पुरुष)
(xx) पित्रा सदृशः \( \implies \) पितृसदृशः (तृतीया तत्पुरुष)
In simple words: यहाँ दिए गए विग्रहों को मिलाकर सामासिक पद बनाया गया है और फिर बताया गया है कि वह किस प्रकार का समास है। जैसे, 'निर्धनः' बहुव्रीहि समास है क्योंकि इसमें किसी तीसरे व्यक्ति की बात हो रही है, 'चतुर्युगम्' द्विगु समास है क्योंकि यह संख्याओं से शुरू होता है।
🎯 Exam Tip: समास विग्रह से सामासिक पद बनाते समय, मूल पदों के अर्थ और उनके बीच के संबंध को समझकर सही समास का प्रकार पहचानें।
पठितपाठ्यांशेषु समस्त सरल पदानां विग्रहाः
Question. अधोलिखितसामासिकपदानां समास-विग्रहं कृत्वा समासस्य नाम लिखत-(निम्न समस्त पदों का समास-विग्रह करके नाम लिखिए-)
Answer:
| समस्त पद | समास-विग्रह | समास-नाम |
|---|---|---|
| 1. नाकम् | न + अकम् (दुःखम्) | नञ् तत्पुरुष |
| 2. अदितिम् | न दितिम् | नञ् तत्पुरुष |
| 3. अभयम् | न भयम् | नञ् तत्पुरुष |
| 4. वृद्धश्रवाः | वृद्धाः श्रवाः (यशः) यस्य सः | बहुव्रीहि तत्पुरुष |
| 5. विश्ववेदाः | विश्वे वेदाः | कर्मधारय |
| 6. अरिष्टनेमिः | अरिष्टा (अक्षता) नेमिः यस्य सः | बहुव्रीहि |
| 7. सहृदयम् | हृदयेन सहितम् | अव्ययीभाव |
| 8. अविद्वेषम् | न विद्वेषम् | नञ् तत्पुरुष |
| 9. अघ्न्या | न घ्नाः | नञ् तत्पुरुष |
| 10. दिवारात्रं | दिवा च रात्रं च | द्वन्द्व |
| 11. सेवाव्रतं | सेवायाः व्रतम् | तत्पुरुष (षष्ठी) |
| 12. स्नेहधारां | स्नेहस्य धारां | तत्पुरुष (षष्ठी) |
| 13. अमृतपुत्राः | अमृतस्य पुत्राः | तत्पुरुष (षष्ठी) |
| 19. जरामरणजम् | जरा च मरण च तस्मात् जातम् | द्वन्द्व |
| 20. पार्वतीपरमेश्वरौ | पार्वती च परमेश्वरः च | द्वन्द्व |
| 21. वागर्थाविव | वाक् च अर्थ च इव | द्वन्द्व |
| 22. मितभाषिणाम् | मितम् (अल्पं) भाषते यः सः | बहुव्रीहि |
| 23. ग्रहमेधिनाम् | गृहे मेधा तेषां च | सप्तमी तत्पुरुष |
| 24. सप्रसवाः | प्रसवेन सहितम् | अव्ययीभाव |
| 25. पारदृश्वनः | पारं दृश्वा यः सः तस्य च | बहुव्रीहि |
| 26. कृष्णसंर्पः | कृष्णः च असौ सर्पः | कर्मधारयः |
| 27. दुष्टात्मा | दुष्टः च असौ आत्मा | कर्मधारयः |
| 28. जलचर: | जले चरति इति | उपपद तत्पुरुष |
| 29. अनावृष्टिः | न आवृष्टिः | नञ् तत्पुरुष |
| 30. प्राणत्राणम् | प्राणानां त्राणम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| 31. राजपुरुषाः | राज्ञः पुरुषः | षष्ठी तत्पुरुष |
| 32. पुत्रशोकार्तः | पुत्रशोकेन आर्तः | तृतीया तत्पुरुषः |
| 33. कामविवर्धिनी | कामं विवर्धते या सा | बहुव्रीहि |
| 34. वनौकसः | वने ओकसः | सप्तमी तत्पुरुष |
| 35. तपोधनः | तपः एव धनं यस्य सः | बहुव्रीहि |
| 36. महात्मनः | महान् च असौ आत्मा | कर्मधारयः |
| 37. पुत्रशोकेन | पुत्रस्य शोकेन | षष्ठी तत्पुरुष |
| 38. पुत्रव्यसनजम् | पुत्रस्य व्यसनजम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| 39. जीवितान्तम् | जीवितस्य अन्तम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| 40. पितृप्रियः | पितुः प्रियः | षष्ठी तत्पुरुष |
| 41. योगविहितम् | योगेन विहितम् | तृतीया तत्पुरुषः |
| 42. शिलाहारी | शिलम् आहरति यः सः | बहुव्रीहि |
| 43. सुभाषिता | सुष्ठु भाषिता | कर्मधारयः |
| 44. धर्मार्थो | धर्मः च अर्थः च | द्वन्द्वः |
| 50. महात्मनाम् | महान् प जसा जारमापा प | कर्मधारय |
| 51. राज्यलक्ष्मीः | राज्यस्य लक्ष्मी | षष्ठी तत्पुरुषः |
| 52. अनार्या | न आर्या | नञ् तत्पुरुषः |
| 53. इन्दुशकलात् | इन्दोः शकलात् | षष्ठी तत्पुरुषः |
| 54. क्षीरसागरः | क्षीरस्य सागरः | षष्ठी तत्पुरुषः |
| 55. अधीतसर्वशास्त्रस्य | अधीतानि सर्वाणि शास्त्राणि येन सः | बहुव्रीहिः |
| 56. अनर्थपरम्परा | अनर्थानां परम्परा | षष्ठी तत्पुरुष |
| 57. भारतभुवि | भारतस्य भुवि | षष्ठी तत्पुरुषः |
| 58. धीरगभीरो | धीरः च गभीरः च | द्वन्द्वः |
| 59. तरङ्गपृषद्भिः | तरङ्गैः च पृषद्भिः च | द्वन्द्वः |
| 60. गङ्गाशिशिरतरङ्गा | गङ्गायाः शिशिरैः तरङ्गैः युता या सा | बहुव्रीहि |
| 61. विविधतरङ्गाकुलतायाम् | विविधैः तरङ्गैः आकुलितायाम् | कर्मधारय, तृ. तत्पुरुषः |
| 62. प्रत्यब्दम् | अब्दम् अब्दम् | अव्ययीभाव |
| 63. संशप्तकार्जुनः | संशप्तकाः च अर्जुनः च | द्वन्द्व |
| 64. द्रोणकृता | द्रोणेन कृता | तृतीया तत्पुरुष |
| 65. अशक्ताः | न शक्ताः | नञ् तत्पुरुष |
| 66. हृदयदौर्बल्यम् | हृदयस्य दौर्बल्यम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| 67. पाण्डवपराक्रमम् | पाण्डवानां पराक्रमम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| 68. पाण्डववधः | पाण्डवानां वधः | षष्ठी तत्पुरुष |
| 69. अनुभवरहितो | अनुभवेन रहितः | तृतीया तत्पुरुषः |
| 70. उदरपीड़ा | उदरस्य पीड़ा | षष्ठी तत्पुरुष |
| 71. व्याघ्रीदुग्धम् | व्याघ्रयाः दुग्धम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| 72. गुहामुखात् | गुहायाः मुखात् | पञ्चमी तत्पुरुष |
| 73. शिष्यपरीक्षार्थम् | शिष्याणाम् परीक्षणार्थम् | षष्ठी तत्पुरुषः |
| 74. लज्जावनतमुखाः | लज्जया अवनतः मुखः येषां ते | बहुव्रीहि |
| 75. गुहामुखे | गुहायाः मुखे | षष्ठी तत्पुरुषः |
In simple words: इस तालिका में कई सामासिक पद दिए गए हैं। उनका समास-विग्रह करके यह भी बताया गया है कि वे किस प्रकार के समास हैं, जिससे उनके अर्थ और रचना को समझा जा सके।
🎯 Exam Tip: समास के विभिन्न भेदों को उनके उदाहरणों के साथ याद रखें, खासकर तत्पुरुष, बहुव्रीहि, द्वन्द्व और द्विगु के मुख्य अंतरों को।
समसनं समासः संक्षेप करना समास है। अनेक पदों को संक्षेप के द्वारा एकपद किया जाना समास कहा जाता है। समास में पदों का अथवा शब्दों का मेल होता है। समास को पृथक्करण (अलग करना) सामासिक विग्रह कहा जाता है। समास में पहले सुना जाने वाला पद पूर्वपद तथा बाद में सुना जाने वाला शब्द उत्तर पद माना जाता है। समास चार प्रकार के हैं-
- 1. तत्पुरुष,
- 2. बहुव्रीहि,
- 3. द्वन्द्व और
यहां कुछ और समास के उदाहरण दिए गए हैं, जिनके सामासिक पद, समास विग्रह और समास के नाम को समझाया गया है:
| सामासिक-पदम् | समास-विग्रहः | समास-नाम |
|---|---|---|
| गृहगतः | गृहं गतः | द्वितीया तत्पुरुषः |
| नखभिन्नः | नखैः भिन्नः | तृतीया तत्पुरुषः |
| गोहितम् | गोभ्यः हितम् | चतुर्थी तत्पुरुषः |
| चौरभयम् | चौरात् भयम् | पंचमी तत्पुरुषः |
| वृक्षमूलम् | वृक्षस्य मूलम् | षष्ठी तत्पुरुषः |
| कार्यकुशलः | कार्ये कुशलः | सप्तमी तत्पुरुषः |
अन्य उदाहरण
(i) द्वितीया तत्पुरुष-जिसमें प्रथम पद द्वितीया विभक्ति का एवं द्वितीय पद प्रथमा विभक्ति का हो। जैसे-
| समस्तपद | संस्कृत-विग्रह | हिन्दी-विग्रह |
|---|---|---|
| दुःखप्राप्तः | दुःखम् प्राप्तः | दुःख को प्राप्त |
| सुखप्राप्तः | सुखं प्राप्तः | सुख को प्राप्त |
| कष्टातीतः | कष्टम् अतीतः | कष्ट से निकला |
| दुःखातीतः | दुःखम् अतीतः | दुःख से निकला |
| कृष्णाश्रितः | कृष्णम् आश्रितः | कृष्ण के आश्रित |
| ग्रामगतः | ग्रामं गतः | गाँव को गया हुआ |
| शरणापन्नः | शरणम् आपन्नः | शरण को प्राप्त |
| कष्टापन्नः | कष्टम् आपन्नः | कष्ट को प्राप्त |
| कूपपतितः | कूपे पतितः | कुएँ में गिरा हुआ |
| नरकपतितः | नरकं पतितः | नरक में गिरा हुआ |
| जीवनप्रातः | जीवनं प्राप्तः | जीवन को पाया |
| अग्निपतितः | अग्निं पतितः | अग्नि में गिरा हुआ |
| जलपतितः | जलं पतितः | जल में गिरा हुआ |
| शोकातीतः | शोकम् अतीतः | शोक से मुक्त |
| सुखापन्नः | सुखम् आपन्नः | सुख को प्राप्त |
| प्रलयगतः | प्रलयं गत | विनाश को प्राप्त |
(ii) तृतीया तत्पुरुष-जिसमें प्रथम पद तृतीया विभक्ति का एवं द्वितीय पद प्रथमा विभक्ति का हो। जैसे-
| समस्त पद | संस्कृत-विग्रह | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|---|
| देवदत्तः | देवैः दत्तः | देवों के द्वारा दिया गया |
| आचारनिपुणः | आचारेण निपुणः | आचरण में निपुण |
| मदशून्यः | मदेन शून्यः | मद से रहित |
| बाणहतः | बाणेन हतः | बाण से मारा गया |
| सुखयुक्तः | सुखेन युक्तः | सुख से युक्त |
| पितृसदृशः | पित्रा सदृशः | पिता के समान |
| मातृसदृशः | मात्रा सदृशः | माता के समान |
| गुडमिश्रः | गुडेन मिश्रः | गुड़ से मिला हुआ |
| विष्णुदत्तः | विष्णुना दत्तः | विष्णु के द्वारा दिया हुआ |
| प्रभुदत्तः | प्रभुणा दत्तः | प्रभु के द्वारा दिया हुआ |
(iii) चतुर्थी तत्पुरुष-जिसमें प्रथम पद चतुर्थी विभक्ति का तथा द्वितीय पद प्रथमा विभक्ति का हो। जैसे-
| समस्तपद | संस्कृत-विग्रह | हिन्दी-विग्रह |
|---|---|---|
| यूपदारु | यूपाय दारु | यज्ञस्तम्भ के लिए लकड़ी |
| भूतबलिः | भूतेभ्यः बलिः | भूतों के लिए बलि |
| पुत्ररक्षितम् | पुत्राय रक्षितम् | पुत्र के लिए सुरक्षित |
| गोसुखम् | गवे सुखम् | गाय के लिए सुख |
| काकबलिः | काकेभ्यः बलिः | कौओं के लिए बलि |
(iv) पञ्चमी तत्पुरुष-जिसमें प्रथम पद पञ्चमी विभक्ति का तथा द्वितीय पद प्रथमा विभक्ति का हो। जैसे-
| समस्तपद | संस्कृत-विग्रह | हिन्दी-विग्रह |
|---|---|---|
| पदच्युतः | पदात् च्युतः | पद से च्युत |
| दुष्टभयम् | दुष्टाद् भयम् | दुष्ट से भय |
| मार्गभ्रष्टः | मार्गात् भ्रष्टः | मार्ग से भटका हुआ |
| व्याघ्रभीतिः | व्याघ्रात् भीतिः | व्याघ्र से भय |
| दुःखमुक्तः | दुःखात् मुक्तः | दुःख से मुक्त |
| स्वर्गपतितः | स्वर्गात् पतितः | स्वर्ग से गिरा हुआ |
| अश्वपतितः | अश्वात् पतितः | घोड़े से गिरा हुआ |
| गजपतितः | गजात् पतितः | हाथी से गिरा हुआ। |
| आकाशपतितः | आकाशात् पतितः | आकाश से गिरा हुआ |
| सुखापेतः | सुखात् अपेतः | सुख से वञ्चित |
| वृकभीतिः | वृकाद् भीतिः | भेड़िया से भय |
(vi) सप्तमी तत्पुरुष-जिसमें प्रथम पद सप्तमी विभक्ति का एवं द्वितीय पद प्रथमा विभक्ति का हो। जैसे-
| समस्तपद | संस्कृत-विग्रह | हिन्दी-विग्रह |
|---|---|---|
| अक्षशौण्डः | अक्षेषु शौण्डः | जुए में चतुर |
| वाक्चतुरः | वाचि चतुरः | वाणी में चतुर |
| आतपशुष्कः | आतपे शुष्कः | धूप में सूखा हुआ |
| चक्रबन्धः | चक्रे बन्धः | पद्य में चतुर |
| सभापटुः | सभायां पटुः | सभा में चतुर |
| सभापण्डितः | सभायां पण्डितः | सभा में पण्डित |
| व्यवहारचपलः | व्यवहारे चपलः | व्यवहार में चपल |
| ग्रामसिद्धः | ग्रामे सिद्धः | गाँव में सिद्ध |
| कर्मप्रवीणः | कर्मणि प्रवीणः | कर्म में प्रवीण |
| कविश्रेष्ठः | कविषु श्रेष्ठः | कवियों में श्रेष्ठ |
| धर्मदक्षः | धर्मे दक्षः | धर्म में निपुण |
| श्रेष्ठकुलप्रसूतः | श्रेष्ठकुले प्रसूतः | श्रेष्ठकुल में उत्पन्न |
(ii) कर्मधारय-तत्पुरुष समानाधिकरण कर्मधारय-जहाँ पूर्व पद और उत्तर पद दोनों को विशेषण-विशेष्य यो उपमान-उपमेय सम्बन्ध होता है, वहाँ कर्मधारय समास होता है। उदाहरण-
| सामासिक-पदम् | समास-विग्रहः | सामासिक-पदम् | समास-विग्रहः |
|---|---|---|---|
| नीलमेघः | नीलो मेघः | शीतोष्णम् | शीतम् उष्णम् |
| घनश्यामः | घन इव श्यामः | नरव्याघ्रः | नरः व्याघ्रः इव |
| विद्याधनम् | विद्या एव धनम् | कृष्णसर्पः | कृष्णः सर्पः |
| नीलकमलम् | नीलम् कमलम् | पीताम्बरम् | पीतं च तत् अम्बरम् |
| कमलमुखम् | कमलम् इव मुखम् | चन्द्रमुखः | चन्द्रः इव मुखम् |
| पुरुषव्याघ्रः | पुरुषः व्याघ्रः इव (शूरः) | महादेवी | महती चासौ देवी |
| महामुनिः | महांश्चासौ मुनिः | ज्येष्ठपुत्र | ज्येष्ठः च यः पुत्रः |
| वीरपुरुषः | वीरः च यः पुरुष | नालकण्ठः | नीलः कण्ठः यस्य सः (शिवः) |
| निर्धनः | निर्गतं धनं यस्मात् सः | नीलाम्बरः | नीलम् अम्बरं यस्य सः |
| यशोधनः | यशः एव धनं यस्य सः | शुद्धमतिः | शुद्धा मतिः यस्य सः |
| निर्लज्जः | निर्गता लज्जा यस्मात् सः | मन्दमतिः | मन्दा मतिः यस्य सः |
| भक्तप्रियः | भक्ताः प्रियाः यस्य सः | शान्तिप्रियः | शान्तिः प्रिया यस्य सः |
| दृष्टदोषः | दृष्टाः दोषाः येन सः | दशाननः | दश आननानि यस्य सः |
(iii) द्विगु-संख्यापूर्वी द्विगु-जहाँ पूर्वपद संख्यावाची शब्द होता है वहाँ, द्विगु समास होता है। इस समास से समाहार, अर्थात् समूह का बोध होता है और समस्त पद नपुंसकलिंग एकवचन होता है। उदाहरण-
| सामासिक-पदम् | समास-विग्रहः | सामासिक-पदम् | समास-विग्रहः |
|---|---|---|---|
| त्रिलोकी | त्रयाणां लोकानां समाहारः | त्रिरात्रम् | त्रिसृणां रात्रीणां समाहारः |
| त्रिभुवनम् | त्रयाणां भुवनानां समाहारः | पंचवटी | पंचाना वटानां समाहारः |
| पंचरात्रम् | पंचाना रात्रीणां समाहारः | नवरात्रम् | नवानां रात्रीणां समाहारः |
| द्वयह्नः | द्वयोः अह्नोः समाहारः | पंचगवम् | पंचानां गवां समाहारः |
| षाण्मातुरः | षण्णां मातृणाम् अपत्यम् | द्वैमातुरः | द्वयोः मात्रोः अपत्यम् |
| पंचगवधनः | पंच गावः धनं यस्य सः | दशगवधनः | दश गावः धनं यस्य सः |
अन्य उदाहरण-
| समस्तपद | संस्कृत-विग्रह | हिन्दी-विग्रह |
|---|---|---|
| पञ्चपात्रम् | पञ्चानां पात्राणां समाहारः | पाँच पात्रों का समूह |
| चतुर्युगम् | चतुर्णां युगानां समाहारः | चार युगों का समूह |
| पञ्चतन्त्रम् | पञ्चानां तन्त्राणां समाहारः | पाँच तन्त्रों का समूह |
| शताब्दी | शतानाम् अब्दानां समाहारः | सौ वर्षों का समूह |
| द्वियमुनम् | द्वयोः यमुनयोः समाहारः | दो यमुनाओं का समूह |
| पञ्चगंगम् | पञ्चानां गंगानां समाहारः | पाँच गंगाओं का समूह |
| अष्टाध्यायी | अष्टानाम् अध्यानानां समाहारः | आठ अध्यायों का समूह |
(iv) नञ् तत्पुरुष-नञ् तत्पुरुष समास निषेधात्मक अर्थ में प्रयुक्त होता है। नञ् के स्थान पर 'अ' अथवा 'अन्' होता है। उदाहरण-
| समस्तपद | संस्कृत-विग्रह | हिन्दी-विग्रह |
|---|---|---|
| असुरः | न सुरः | जो सुर न हो |
| अनुचितम् | न उचितम् | जो उचित न हो |
| अब्राह्मणः | न ब्राह्मणः | जो ब्राह्मण न हो |
| असज्जनः | न सज्जनः | जो सज्जन न हो |
| अविद्यमानम् | न विद्यमानम् | जो विद्यमान न हो |
| अपरिचितम् | न परिचितम् | जो परिचित न हो |
| अनभिभूतम् | न अभिभूतम् | जो अभिभूत न हो |
(2) बहुव्रीहि-अन्यपदार्थ-प्रधानः बहुव्रीहिः। जहाँ प्रस्तुत दोनों पद मिलकर अन्य पदार्थ का बोध कराते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है। बहुव्रीहि समास के समानाधिकरण और व्यधिकरण दो भेद हैं। यथा-
| सामासिक-पदम् | समास-विग्रहः |
|---|---|
| पीताम्बरः | पीतम् अम्बरम् यस्य सः (हरिः) |
| प्राप्तोदकः | प्राप्तम् उदकं यं सः (ग्रामः) |
| दत्तपशुः | दत्तः पशुः यस्मै सः (रुद्र) |
| चक्रपाणिः | चक्रं पाणौ यस्य सः (हरिः) |
| चित्रगुः | चित्राः गावः यस्य सः (चित्रगुः) |
| रूपवद्भार्यः | रूपवती भार्या यस्य सः (रूपवती) |
| ऊढरथः. | ऊढः रथः येन सः (अनड्वान) |
| सुकेशीभार्यः | सुकेशी भार्या यस्य सः (सुकेशी) |
| भालचन्द्रः | भाले चन्द्रः यस्य सः (शिवः) |
| विषकण्ठः | विषं कण्ठे यस्यः सः (शिवः) |
| विशालाक्षी | विशाले अक्षिणी यस्याः सा (स्त्री) |
| वीरपुरुषः | वीराः पुरुषाः यस्मिन् सः (ग्रामः) |
| उपदशाः | दशानां समीपे ये सन्ति ते |
| सपुत्रः/सहपुत्रः | पुत्रेण सह वर्तते इति |
| केशाकेशि | केशेषु केशेषु गृहीत्वा इत्थं युद्धे प्रवृत्तम् |
| अपुत्रः | अविद्यमान पुत्रः यस्य सः |
| निर्दयः | निर्गता दया यस्मात् सः |
| सुमेधाः | शोभना मेधा यस्य सः |
| गजाननः | गज इव आननं यस्य सः |
(3) द्वन्द्व समास-उभयपदार्थ-प्रधानः द्वन्द्वः। जहाँ पूर्व पदार्थ और उत्तर पदार्थ दोनों पदार्थों की प्रधानता होती है वहाँ द्वन्द्व समास होता है। द्वन्द्व समास तीन प्रकार का होता है-
- 1. इतरेतर द्वन्द्व,
- 2. समाहार द्वन्द्व और
- 3. एकशेष द्वन्द्व ।
उदाहरण-
| समस्तपद | समास-विग्रहः | समस्तपद | समास-विग्रहः |
|---|---|---|---|
| रामकृष्णौ | रामश्च कृष्णश्च | हरिहरौ | हरिश्च हरश्च |
| ईशकृष्णौ | ईशश्च कृष्णश्च | इन्द्राग्नी | इन्द्रश्च अग्निश्च |
| शिवकेशवौ | शिवश्च केशवश्च | ग्रीष्मवसन्तौ | ग्रीष्मश्च वसन्तश्च |
| युधिष्ठिरार्जुनौ | युधिष्ठिरश्च अर्जुनश्च | पाणिपादम् | पाणी च पादौ च |
| रथिकाश्वारोहम् | रथिकाश्च अश्वारोहाश्च | अहिनकुलम् | अहिश्च नकुलश्च |
| पुत्रपौत्रम् | पुत्रश्च पौत्रश्च | पितरौ | माता च पिता च |
| दम्पती | पतिश्च जाया च | रामाः | रामश्च रामश्च रामश्च |
| ब्राह्मणौ | ब्राह्मणश्च ब्राह्मणी च | शूद्रौ | शूद्रश्च शूद्री च |
| धर्माथौ | धर्मश्च अर्थश्च | मातापितरौ | माता च पिता च |
| सूर्यचन्द्रौ | सूर्यश्च चन्द्रश्च | भ्रातरौ | भ्राता च स्वसा च |
| पुत्रौ | पुत्रश्च पुत्री च | सुखदुःखम् | सुखं च दुःखं च |
| गोव्याघ्रम् | गौश्च व्याघ्रश्च | लाभालाभौ | लाभश्च अलाभश्च |
| जयाजयौ | जयश्च अजयश्च | धर्माधर्मो | धर्मश्च अधर्मश्च |
| अर्थधर्मो | अर्थश्च धर्मश्च | रामश्यार्मों | रामश्च श्यामश्च |
| अहोरात्रः | अहश्च रात्रिश्च | देवदत्तयज्ञदत्तौ | देवदत्तश्च यज्ञदत्तश्च |
| लक्ष्मणशत्रुघ्नौ | लक्ष्मणश्च शत्रुघ्नश्च | मानापमानौ | मानं च अपमानं च |
(4) अव्ययीभाव-पूर्वपदार्थ-प्रधानः अव्ययीभावः-जहाँ प्रायः पूर्वपदार्थ की प्रधानता होती है, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। अव्ययीभाव समास समीप, अभाव, योग्यता, चीप्सा, समृद्धि, वृद्धि, अर्थाभाव और अत्यय (अधिकता) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। उदाहरण-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | समस्त-पद | समास-विग्रह |
|---|---|---|---|
| अधिहरिधः | हरौ इति | उपकृष्णम् | कृष्णस्य समीपम् |
| सुमद्रम् | मद्राणां समृद्धि | दुर्यवनम् | यवानानां वृद्धिः |
| निर्मक्षिकम् | मक्षिकाणां अभावः | अतिनिद्रम् | निद्रा सम्प्रति न युज्यते |
| इतिहरि | हरिशब्दस्य प्रकाशः | अनुविष्णुम् | विष्णोः पश्चात् |
| अनुरूपम् | रूपस्य योग्यम् | प्रत्यर्थम् | अर्थम् अर्थम् प्रति |
| यथाशक्ति | शक्तिम् अनतिक्रम्य | सहरिः | हरेः सदृशः |
| अनुज्येष्ठम् | ज्येष्ठस्य आनुपूर्येण | सचक्रम् | चक्रेण युगपत् |
| ससखि | सख्याः सदृशः | सतृणम् | तृणमपि अपरित्यज्य |
| साग्नि | अग्निग्रन्थपर्यन्तम् अधीते | अतिहिमम् | हिमस्य अत्ययः |
| पारेगंगम् | गंगाया पारम् | मध्येसमुद्रम् | समुद्रस्य मध्ये |
| निर्जनम् | जनानां अभावः | प्रतिदिनम् | दिनम् दिनम् प्रति |
| यथारूपम् | रूपस्य योग्यम् | अनुकृष्णम् | कृष्णस्य पश्चात् |
| अनुपुत्रम् | पुत्रस्य पश्चात् | अनुगंगम् | गंगायाः पश्चात् |
| उपवनम् | वनस्य समीपम् | उपग्रामम् | ग्रामस्य समीपम् |
| उपगंगम् | गंगायाः समीपम् | उपनदि | नद्याः समीपम् |
| आमुक्तिः | आ मुक्तेः | आसमुद्रम् | आ समुद्रात् |
| उपगुरुम् | गुरोः समीपम् | उपवधू | वध्वाः समीपम् |
| आबालम् | आबालेभ्यः इति | अध्यात्मम् | आत्मनि इति |
| समस्तपद | समास-विग्रह | समास-नाम |
|---|---|---|
| मदथ | मम अथ | षष्ठा तत्पुरुष |
| दिवानिशम् | दिवा च निशा च | द्वन्द्व समास |
| वर्षातपयोः | वर्षा च आतपः च | द्वन्द्व समास |
| पांसुरभूमिम् | पांसुरा च असौ भूमिः तम् च | कर्मधारय समास |
| जलार्द्रः | जलेन आर्द्रः | तृतीया तत्पुरुष |
| कार्यक्षेत्रे | कार्यस्य क्षेत्रे | षष्ठी तत्पुरुष |
| पिहितद्वारम् | पिहितम् च तत् द्वारम् | कर्मधारय समास |
| मत्तगजाः | मत्ताः च ते गजाः | कर्मधारय समास |
| यवनराजः | यवनानां राजा | षष्ठी तत्पुरुष |
| प्रकुपितम् | प्रकृष्टं कुपितम् | कर्मधारय समास |
| प्राणग्राहकम् | प्राणानां ग्राहकम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| सामर्षः | अमर्षेण सहितम् | अव्ययीभावः |
| प्राणरक्षा | प्राणानां रक्षा | षष्ठी तत्पुरुष |
| सपरिवारः | परिवारेण सह | अव्ययीभावः |
| जीवितार्थम् | जीविताय अर्थम् | चतुर्थी तत्पुरुष |
| दयावीरः | दयायां वीरः | सप्तमी तत्पुरुष |
| शरणागतम् | शरणम् आगतम् | द्वितीया तत्पुरुष |
| निःशंकः | निर्गता शङ्का यस्मात् सः | बहुव्रीहि |
| अवध्यः | न वध्यः यः सः | बहुव्रीहि |
| युद्धसमुद्धरो | युद्धाय समुद्धरः | चतुर्थी तत्पुरुष |
| भग्नोद्यमम् | भग्नम् उद्यमम् यस्य सः तम् च | बहुव्रीहि |
| प्रवृद्धबलेन | प्रवृद्धं बलं यस्य सः तेन च | बहुव्रीहि |
| तुरगारूढः | तुरगम् आरूढः | द्वितीया तत्पुरुष |
| सत्वरम् | त्वरेण सहितम् | अव्ययीभाव |
| निर्भयस्थानम् | निर्भयम् च तत् स्थानम् | कर्मधारय |
| खड्गप्रहार : | खड्गस्य प्रहारः | षष्ठी तत्पुरुष |
| त्यक्तप्राणः | त्यक्ताः प्राणाः येन सः | बहुव्रीहि |
| तुरगपृष्ठे | तुरगस्य पृष्ठे | षष्ठी तत्पुरुषं |
| विशुद्धवीर्यः | विशुद्धः वीर्यः येषां ते | बहुव्रीहि |
| भीमतपोभिः | भीमं च तत् तपः तैः च | कर्मधारय |
| शतघ्नी | शतं हन्ति या सा | बहुव्रीहि |
| समस्तपद | समास-विग्रह | समास-नाम |
|---|---|---|
| चन्द्रमुखः | चन्द्र इव मुखः | कर्मधारय |
| परसम्पत्या | परस्य सम्पत्या | षष्ठी तत्पुरुष |
| जलबिन्दुसदृशैः | जलस्य बिन्दोः सदृशम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| दीर्घदर्शिनी | दीर्घ पश्यति या सा | बहुव्रीहि |
| श्रुतवाक्या | श्रुतं वाक्यं येन सा | बहुव्रीहि |
| बहुश्रुता | बहुभिः श्रुता या सा | बहुव्रीहि |
| धर्मज्ञम् | धर्मं जानाति | उपपद तत्पुरुष |
| शोकदः | शोकं ददाति | उपपद तत्पुरुष |
| हर्षवर्धनम् | हर्षं वर्धयति | उपपद तत्पुरुष |
| कापुरुषः | कुत्सितः पुरुषः | कर्मधारय |
| निर्मानः | निर्गतं मानं यस्य सः | बहुव्रीहि |
| प्रियसुखं | प्रियं च तत् सुखम् | कर्मधारय |
| सर्वभूतानि | सर्वाणि च ते भूतानि | कर्मधारय |
| महात्मनः | महान् च असौ आत्मा तस्य च | कर्मधारय |
| पुण्योपचयात् | पुण्येन उपचयात् | तृतीया तत्पुरुष |
| तोयपरिपूर्णाः | तोयेन परिपूर्णाः | तृतीया तत्पुरुष |
| गम्भीरमधुरनिर्घोष | गम्भीरः च मधुरः च निर्घोषः | कर्मधारय |
| पक्षिगणे | पक्षिणां गणः | षष्ठी तत्पुरुष |
| सलिलप्रवाहै | सलिलस्य प्रवाहैः | षष्ठी तत्पुरुष |
| मत्स्येन्द्रः | मत्स्यानाम् इन्द्रः | षष्ठी तत्पुरुष |
| प्रियवचनैः | प्रियं च तत् वचनम् तैः च | कर्मधारय |
| शीलविशुद्धौ | शीलं च विशुद्धं च | द्वन्द्व समास |
| पयोदा | पयः ददाति इति | उपपद |
| जलदागमः | जलं ददाति जलदः तस्य आगमः | उपपद तत्पुरुष |
| प्राप्तकालम् | प्राप्तः कालः यस्य तत् | बहुव्रीहि |
| पठण परपुरुष | पठने परपुरुष | कर्मधारय |
| महासत्त्वः | महान् च असौ सत्वः | कर्मधारय |
| ज्वालानुगतेन | ज्वालाम् अनुगतेन | द्वितीया तत्पुरुष |
| वायसगणाः | वायसानां गणाः | षष्ठी तत्पुरुष |
| अकाला: | न कालः येषां ते | बहुव्रीहि |
| प्रस्तरखण्डान् | प्रस्तरस्य खण्डान् | षष्ठी तत्पुरुष |
| सघनवसतौ | सघना च असौ वसतिः तस्मिन् च | कर्मधारय |
| रत्नानेत्रे | रत्नायाः नेत्रे | षष्ठी तत्पुरुष |
| आनन्दाश्रुपूरिते | आनन्दस्य अश्रुभिः पूरिते | षष्ठी, तृतीया तत्पुरुष |
| तारस्वरेण | तारः च असौ स्वरः तेन च | कर्मधारय |
| सप्रणयम् | प्रणयेन सहितम् | अव्ययीभाव |
| सिन्धुदृष्टिः | सिन्धोः दृष्टिः | षष्ठी तत्पुरुष |
| सस्नेहम् | स्नेहेन सहितम् | अव्ययीभाव |
| अनाहतः | न आहतः | नञ् तत्पुरुष |
| प्रभुकृपया | प्रभोः कृपया | तृतीया तत्पुरुष |
| मित्रगृहात् | मित्रस्य गृहात् | षष्ठी तत्पुरुष |
| अल्पाहारम् | अल्पः च असौ आहार: त च | कर्मधारय |
| शाकशकट्याः | शाकाय शकट्याः च | चतुर्थी तत्पुरुष |
| द्विचक्रिका | द्वौ चक्रौ यस्यां सा | बहुव्रीहि |
| प्रतिमासम् | मासम् मासम् प्रति | अव्ययीभाव |
| सगर्वम् | गर्वेण सहितम् | अव्ययीभाव |
| विज्ञाननौका | विज्ञानस्य नौका | षष्ठी तत्पुरुष |
| ज्ञानगङ्गा | ज्ञानस्य गङ्गा | षष्ठी तत्पुरुष |
| उद्यानदूर्वा | उद्यानस्य दूर्वा | षष्ठी तत्पुरुष |
| वर्तमानस्थितिः | वर्तमाना स्थितिः | कर्मधारय |
| विध्वंसवीजम् | विध्वंसस्य वीजम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| जीवरक्षा | जीवानाम् रक्षा | षष्ठी तत्पुरुष |
| लोककल्याणशिक्षा | लोककल्याणाय शिक्षा | षष्ठी, चतुर्थी तत्पुरुष |
| काव्यसङ्कीर्तनम् | काव्यस्य सङ्कीर्तनम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| अहर्निशम् | अहन् च निशा च | द्वन्द्व |
| मन्दरकन्दरः | मन्दरस्य कन्दरा | षष्ठी तत्पुरुष |
In simple words: यह तालिका संस्कृत में विभिन्न सामासिक पदों को उनके विग्रह और समास के नाम के साथ दिखाती है, जिससे छात्रों को समास को पहचानने और समझने में मदद मिलती है।
🎯 Exam Tip: समास के विभिन्न भेदों और उनके नियमों को याद रखना महत्वपूर्ण है। प्रत्येक पद को ध्यान से देखें और पहचानें कि कौन सी विभक्ति या संबंध का प्रयोग किया गया है।
पठितपाठ्यांशेषु समस्त सरल पदानां विग्रहाः
| समस्तपदम् | समास-विग्रहः | समास-नाम |
|---|---|---|
| चन्द्रमुखः | चन्द्र इव मुखः | कर्मधारय |
| परसम्पत्या | परस्य सम्पत्या | षष्ठी तत्पुरुष |
| जलबिन्दुसदृशैः | जलस्य बिन्दोः सदृशम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| दीर्घदर्शिनी | दीर्घ पश्यति या सा | बहुव्रीहि |
| श्रुतवाक्या | श्रुतं वाक्यं येन सा | बहुव्रीहि |
| बहुश्रुता | बहुभिः श्रुता या सा | बहुव्रीहि |
| धर्मज्ञम् | धर्मं जानाति | उपपद तत्पुरुष |
| शोकदः | शोकं ददाति | उपपद तत्पुरुष |
| हर्षवर्धनम् | हर्षं वर्धयति | उपपद तत्पुरुष |
| कापुरुषः | कुत्सितः पुरुषः | कर्मधारय |
| निर्मानः | निर्गतं मानं यस्य सः | बहुव्रीहि |
| प्रियसुखं | प्रियं च तत् सुखम् | कर्मधारय |
| सर्वभूतानि | सर्वाणि च ते भूतानि | अव्ययीभाव |
| महात्मनः | महान् च असौ आत्मा तस्य च | कर्मधारय |
| पुण्योपचयात् | पुण्येन उपचयात् | तृतीया तत्पुरुष |
| तोयपरिपूर्णाः | तोयेन परिपूर्णाः | तृतीया तत्पुरुष |
| गम्भीरमधुरनिर्घोष | गम्भीरः च मधुरः च निर्घोषः | कर्मधारय |
| पक्षिगणे | पक्षिणां गणः | षष्ठी तत्पुरुष |
| सलिलप्रवाहै | सलिलस्य प्रवाहैः | षष्ठी तत्पुरुष |
| मत्स्येन्द्रः | मत्स्यम् इव इन्द्रः | कर्मधारय |
| प्रियवचनैः | प्रियं च तत् वचनम् तैः च | कर्मधारय |
| शुद्धी | शुचि च विशुद्धं च | द्वन्द्व समास |
| पयोदा | पयः ददाति इति | उपपद |
| जलदागमः | जलं ददाति जलदः तस्य आगमः | उपपद तत्पुरुष |
| प्राप्तकालम् | प्राप्तः कालः यस्य तत् | बहुव्रीहि |
| महासत्त्वः | महान् च असौ सत्वः | कर्मधारय |
| ज्वालानुगतेन | ज्वालाम् अनुगतेन | द्वितीया तत्पुरुष |
| वायसगणाः | वायसानां गणाः | षष्ठी तत्पुरुष |
| अकालाः | न कालः येषां ते | बहुव्रीहि |
| प्रस्तरखण्डान् | प्रस्तरस्य खण्डान् | षष्ठी तत्पुरुष |
| सघनवसतौ | सघना च असौ वसतिः तस्मिन् च | कर्मधारय |
| रत्नानेत्रे | रत्नायाः नेत्रे | षष्ठी तत्पुरुष |
| आनन्दाश्रुपूरिते | आनन्दस्य अश्रुभिः पूरिते | षष्ठी, तृतीया तत्पुरुष |
| तारस्वरेण | तारः च असौ स्वरः तेन च | कर्मधारय |
| सप्रणयम् | प्रणयेन सहितम् | अव्ययीभाव |
| सिन्धुदृष्टिः | सिन्धोः दृष्टिः | षष्ठी तत्पुरुष |
| सस्नेहम् | स्नेहेन सहितम् | अव्ययीभाव |
| अनाहतः | न आहतः | नञ् तत्पुरुष |
| प्रभुकृपया | प्रभोः कृपया | तृतीया तत्पुरुष |
| मित्रगृहात् | मित्रस्य गृहात् | षष्ठी तत्पुरुष |
| अल्पाहारम् | अल्पः च असौ आहारः त च | कर्मधारय |
| शाकशकट्याः | शाकाय शकट्याः च | चतुर्थी तत्पुरुष |
| द्विचक्रिका | द्वौ चक्रौ यस्यां सा | बहुव्रीहि |
| प्रतिमासम् | मासम् मासम् प्रति | अव्ययीभाव |
| सगर्वम् | गर्वेण सहितम् | अव्ययीभाव |
| विज्ञाननौका | विज्ञानस्य नौका | षष्ठी तत्पुरुष |
| ज्ञानगङ्गा | ज्ञानस्य गङ्गा | षष्ठी तत्पुरुष |
| उद्यानदूर्वा | उद्यानस्य दूर्वा | षष्ठी तत्पुरुष |
| वर्तमानस्थितिः | वर्तमाना स्थितिः | कर्मधारय |
| विध्वंसवीजम् | विध्वंसस्य वीजम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| जीवरक्षा | जीवानाम् रक्षा | षष्ठी तत्पुरुष |
| लोककल्याणशिक्षा | लोककल्याणाय शिक्षा | षष्ठी, चतुर्थी तत्पुरुष |
| काव्यसङ्कीर्तनम् | काव्यस्य सङ्कीर्तनम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| अहर्निशम् | अहन् च निशा च | द्वन्द्व |
| मन्दरकन्दरः | मन्दरस्य कन्दरा | षष्ठी तत्पुरुष |
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