RBSE Solutions Class 11 Political Science Chapter 17 भारत में संवैधानिक विकास की पृष्ठ

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Class 11 Political Science Chapter 17 भारत में संवैधानिक विकास की पृष्ठ RBSE Solutions PDF

RBSE Class 11 Political Science Chapter 17 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Political Science Chapter 17 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. 1909 के अधिनियम द्वारा केन्द्रीय विधान परिषद में जिन चार प्रकार के सदस्यों का उल्लेख था, वे कौन थे?
Answer: वे चार प्रकार के सदस्य थे –
1. पदेन सदस्य
2. मनोनीत सरकारी सदस्य
3. मनोनीत गैर सरकारी सदस्य
In simple words: 1909 के कानून के अनुसार, केंद्रीय विधान परिषद में चार तरह के सदस्य होते थे: वे जो पद के कारण सदस्य बने, वे जिन्हें सरकार ने चुना, और वे जिन्हें सरकार ने चुना पर वे सरकारी अधिकारी नहीं थे.

🎯 Exam Tip: जब भी किसी अधिनियम के सदस्यों के प्रकार पूछे जाएँ, तो प्रत्येक प्रकार को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध करें और उनके नाम याद रखें.

 

Question 3. भारतीय विधान परिषद अधिनियम, 1909 द्वारा, कौन व्यक्ति केन्द्रीय विधान परिषद के सदस्य नहीं बन सकते थे?
Answer: भारतीय विधान परिषद अधिनियम, 1909 के अनुसार, निम्नलिखित व्यक्ति केंद्रीय विधान परिषद के सदस्य नहीं बन सकते थे:
1. सरकारी कर्मचारी
2. महिला
3. मानसिक रोगी
4. 25 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति
5. सरकारी सेवा से निष्कासित व्यक्ति
6. दिवालिया घोषित व्यक्ति
In simple words: 1909 के कानून ने कुछ लोगों को केंद्रीय परिषद का सदस्य बनने से रोक दिया, जैसे सरकारी कर्मचारी, महिलाएं, मानसिक रोगी, युवा लोग, और वे लोग जिन्हें सरकारी सेवा से हटाया गया था या जो दिवालिया थे.

🎯 Exam Tip: उन वर्गों को याद रखें जिन्हें विशेष रूप से किसी कानून के तहत अयोग्य घोषित किया गया था, क्योंकि यह अक्सर भेदभावपूर्ण प्रावधानों पर प्रश्न होते हैं.

 

Question 4. 1909 के अधिनियम द्वारा ब्रिटिश भारत के किन क्षेत्रों को केन्द्रीय विधान परिषद में गैरसरकारी सदस्यों के रूप में प्रतिनिधित्व से वंचित रखा गया?
Answer: 1909 के अधिनियम के तहत, ब्रिटिश भारत के उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रान्त, कुर्ग और अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्रों को केंद्रीय विधान परिषद में गैर-सरकारी सदस्यों के रूप में प्रतिनिधित्व से वंचित रखा गया था. इन क्षेत्रों के लोगों को परिषद में अपने प्रतिनिधि भेजने की अनुमति नहीं थी.
In simple words: 1909 के कानून ने ब्रिटिश भारत के कुछ हिस्सों, जैसे उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रान्त, कुर्ग और अजमेर-मेरवाड़ा, को केंद्रीय परिषद में अपने गैर-सरकारी सदस्य भेजने से रोक दिया था.

🎯 Exam Tip: विशिष्ट क्षेत्रों या समूहों को याद रखें जिन्हें प्रतिनिधित्व से वंचित किया गया था, क्योंकि यह अक्सर ऐतिहासिक अन्याय और सीमित भागीदारी को दर्शाता है.

 

Question 5. 1909 के परिषद अधिनियम द्वारा केन्द्रीय विधान परिषद के गठन हेतु निर्वाचन मण्डल को कितनी श्रेणियों में बाँटा गया? उनके नाम बताइये।
Answer: 1909 के परिषद अधिनियम द्वारा केंद्रीय विधान परिषद के चुनाव के लिए मतदाताओं को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा गया था:
1. सामान्य निर्वाचक वर्ग
2. वर्गीय निर्वाचक वर्ग
3. विशिष्ट निर्वाचक वर्ग
In simple words: 1909 के कानून में केंद्रीय परिषद के चुनावों के लिए वोट देने वाले लोगों को तीन समूहों में बांटा गया था: सामान्य लोग, विशेष समूह और विशिष्ट लोग.

🎯 Exam Tip: निर्वाचन मंडल की विभिन्न श्रेणियों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कानून में प्रतिनिधित्व के जटिल और अक्सर भेदभावपूर्ण स्वरूप को दर्शाता है.

 

Question 6. 1919 के अधिनियम की कोई दो प्रमुख प्रावधान बताइए।
Answer: 1919 के अधिनियम के दो प्रमुख प्रावधानों में से एक 'द्वैध शासन' था. इसका मतलब था कि प्रांतीय शासन को दो हिस्सों में बांटा जाएगा और इन दोनों हिस्सों का प्रबंधन अलग-अलग अधिकारियों द्वारा किया जाएगा. उनके काम और जिम्मेदारियां भी अलग-अलग थीं. इस प्रकार, यह अधिनियम प्रांतों में कुछ हद तक उत्तरदायी शासन स्थापित करने का प्रयास था.
In simple words: 1919 के कानून का एक बड़ा नियम 'द्वैध शासन' था, जहाँ प्रांतों में सरकार को दो हिस्सों में बांट दिया गया था, ताकि काम अलग-अलग अधिकारी चला सकें.

🎯 Exam Tip: 1919 के अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों को याद रखना महत्वपूर्ण है, विशेषकर 'द्वैध शासन' जैसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों को, क्योंकि यह भारतीय संवैधानिक विकास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था.

 

Question 8. द्वैध शासन व्यवस्था में प्रान्तीय विषयों का विभाजन किन दो श्रेणियों में किया गया?
Answer: द्वैध शासन व्यवस्था में प्रांतीय विषयों को निम्नलिखित दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था:
1. रक्षित विषय
2. हस्तान्तरित विषय
In simple words: द्वैध शासन में, राज्यों के काम को दो तरह के विषयों में बांटा गया था: कुछ सुरक्षित थे (रक्षित) और कुछ दूसरे मंत्रियों को दिए गए थे (हस्तांतरित).

🎯 Exam Tip: 'रक्षित' और 'हस्तांतरित' विषयों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें, क्योंकि यह द्वैध शासन की कार्यप्रणाली का मूल था.

 

Question 9. 1919 के अधिनियम के अन्तर्गत केन्द्र में स्थापित विधानमण्डल के दोनों सदनों के क्या नाम रखे गये?
Answer: 1919 के अधिनियम के तहत केंद्र में स्थापित विधानमंडल के दो सदन थे, जिनके नाम थे:
1. विधानसभा
2. राज्य परिषद
In simple words: 1919 के कानून से केंद्र में दो सदन वाली संसद बनी, जिन्हें विधानसभा और राज्य परिषद कहा गया.

🎯 Exam Tip: केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना भारतीय संवैधानिक विकास में एक महत्वपूर्ण कदम था, इसके दोनों सदनों के नाम याद रखें.

 

Question 10. गृह सरकार है?
Answer: गृह सरकार का अर्थ उन संस्थाओं से था जो भारत के शासन को इंग्लैंड से चलाती थीं. इसमें ब्रिटिश सम्राट, ब्रिटिश संसद, मंत्रिमंडल, भारत सचिव और भारत परिषद शामिल थे. इन सभी को सामूहिक रूप से गृह सरकार कहा जाता था.
In simple words: 'गृह सरकार' का मतलब उन सभी अंग्रेजी संस्थाओं से था जो इंग्लैंड से बैठकर भारत का राज-काज चलाती थीं.

🎯 Exam Tip: गृह सरकार की अवधारणा और इसमें शामिल विभिन्न अंगों को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत पर ब्रिटिश नियंत्रण की प्रकृति को स्पष्ट करता है.

RBSE Class 11 Political Science Chapter 17 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 के कोई दो प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।
Answer: भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 के दो प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे:
1. केंद्रीय विधान परिषद में सुधार: इस अधिनियम ने केंद्रीय विधान परिषद में सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी. इसमें 37 सरकारी सदस्य, 23 गैर-सरकारी सदस्य (जो चुने जाते थे) और 9 पदेन सदस्य (जो मनोनीत होते थे) शामिल थे, जिससे कुल सदस्य संख्या 69 हो गई. निर्वाचित सदस्यों के चयन के लिए मतदाताओं को तीन वर्गों में बांटा गया था: सामान्य, वर्गीय और विशिष्ट निर्वाचक वर्ग.
2. प्रांतीय विधान परिषदों का संगठन और अधिकार: इस अधिनियम ने प्रांतीय विधान परिषदों की सदस्य संख्या को भी संशोधित किया, जो 30 से 50 के बीच निर्धारित की गई. मद्रास, बंबई और बंगाल जैसे प्रांतों में सदस्य संख्या बढ़ाकर 50 कर दी गई, जबकि संयुक्त प्रांत और पूर्वी बंगाल के लिए यह 50 और पंजाब, असम व बर्मा के लिए 30 कर दी गई. इन परिषदों को जनहित के विषयों पर बहस करने और विधेयक पारित करने का अधिकार दिया गया, साथ ही बजट पर भी चर्चा कर सकते थे, लेकिन मतदान नहीं कर सकते थे. इनमें पदेन, मनोनीत सरकारी, मनोनीत गैर-सरकारी और निर्वाचित सदस्य शामिल थे. इस अधिनियम ने प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत स्थापित किया.
In simple words: 1909 के कानून ने केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में सुधार किए. केंद्रीय परिषद में सदस्यों की संख्या बढ़ी और उन्हें तीन वर्गों में बांटा गया. प्रांतीय परिषदों में भी सदस्य संख्या बढ़ाई गई, और उन्हें कुछ मामलों पर बहस व विधेयक पारित करने का अधिकार मिला.

🎯 Exam Tip: 1909 के अधिनियम में केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में किए गए विशिष्ट परिवर्तनों और उनके अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करें.

 

Question 2. 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा केन्द्रीय वे प्रान्तीय विधान परिषदों का सदस्य बनने के लिए निर्धारित योग्यताएँ बताइये।
Answer: 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम के तहत केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों का सदस्य बनने के लिए कुछ नियम बनाए गए थे. हालांकि, ये योग्यताएँ अलग-अलग प्रांतों में भिन्न थीं. उदाहरण के लिए, मद्रास, बंगाल और बंबई जैसे प्रांतों में नगरपालिका या जिला बोर्ड का सदस्य होना आवश्यक था, लेकिन संयुक्त प्रांत में ऐसा कोई नियम नहीं था. अन्य सामान्य योग्यताओं में संपत्ति करदाता होना और ब्रिटिश नागरिक होना शामिल था. कुछ विशेष वर्ग के लोगों को सदस्य बनने के योग्य नहीं माना गया था, जैसे सरकारी कर्मचारी, महिलाएं, मानसिक रोगी, 25 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति, सरकारी सेवा से निकाले गए लोग, और दिवालिया घोषित व्यक्ति.
In simple words: 1909 के कानून ने केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों के सदस्य बनने के लिए योग्यताएं तय कीं, लेकिन ये नियम हर जगह एक जैसे नहीं थे. इसमें धनवान होना और ब्रिटिश नागरिक होना जरूरी था, जबकि सरकारी कर्मचारी, महिलाएं, मानसिक रोगी आदि सदस्य नहीं बन सकते थे.

🎯 Exam Tip: योग्यता और अयोग्यता दोनों को याद रखें, विशेषकर उन वर्गों को जिन्हें बाहर रखा गया था, क्योंकि यह उस समय के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को दर्शाता है.

 

Question 3. 1909 के भारतीय परिषद् अधिनियम के कोई दो दोष बताइये।
Answer: 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम के दो प्रमुख दोष इस प्रकार थे:
1. साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली: इस अधिनियम ने मुसलमानों के लिए अलग से निर्वाचन प्रणाली शुरू की. इसका मतलब था कि मुसलमान अपने प्रतिनिधियों को सिर्फ मुसलमानों के वोटों से चुनते थे. इससे भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला और देश के विभाजन की मांग के लिए रास्ता तैयार हुआ.
2. केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत: इस अधिनियम ने केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी सदस्यों को बहुमत दिया, जिससे गैर-सरकारी सदस्यों की स्थिति कमजोर हो गई. इसी वजह से गैर-सरकारी सदस्य विधान परिषदों में कम उपस्थित रहते थे और उनके पास सरकार को चुनौती देने की शक्ति कम थी.
In simple words: 1909 के कानून के दो बड़े दोष थे: पहला, मुसलमानों के लिए अलग चुनाव प्रणाली शुरू करना जिससे फूट पड़ी; दूसरा, केंद्रीय परिषद में सरकार का बहुमत होने से चुने हुए सदस्यों की ताकत कम हो गई.

🎯 Exam Tip: 1909 के अधिनियम के सबसे बड़े दोषों, जैसे सांप्रदायिक निर्वाचन और सरकारी बहुमत, पर ध्यान दें, क्योंकि इन्होंने भारतीय राजनीति पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला.

 

Question 4. 1909 के अधिनियम द्वारा प्रान्तीय विधान परिषदों में गैरसरकारी बहुमत से क्या तात्पर्य है?
Answer: 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम ने प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों को बहुमत दिया था, लेकिन यह सिर्फ एक दिखावा था. गैर-सरकारी सदस्य दो प्रकार के होते थे: मनोनीत गैर-सरकारी सदस्य और निर्वाचित गैर-सरकारी सदस्य. मनोनीत गैर-सरकारी सदस्य हमेशा सरकार का साथ देते थे, और सरकारी सदस्यों के साथ मिलकर उनकी संख्या निर्वाचित सदस्यों से अधिक हो जाती थी. इसलिए, यह बहुमत सिर्फ नाम का था और इसका कोई वास्तविक महत्व नहीं था. गवर्नर के पास कई मामलों में हस्तक्षेप करने की शक्तियाँ थीं, जिससे गैर-सरकारी बहुमत बेअसर हो जाता था.
In simple words: 1909 के कानून में, प्रांतीय परिषदों में दिखने में गैर-सरकारी सदस्य ज्यादा थे, लेकिन वे असली ताकत नहीं रखते थे. क्योंकि सरकार द्वारा चुने गए सदस्य हमेशा सरकार का साथ देते थे, इसलिए यह बहुमत सिर्फ दिखाने के लिए था.

🎯 Exam Tip: अधिनियमों में 'दिखावटी' प्रावधानों को पहचानना महत्वपूर्ण है, जहाँ संख्यात्मक बहुमत वास्तविक शक्ति को नहीं दर्शाता. गवर्नर की वीटो शक्तियों को भी याद रखें.

 

Question 5. 1919 के अधिनियम की कोई चार प्रमुख प्रावधान बताइये।
Answer: 1919 के अधिनियम के चार प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे:
1. भारत परिषद में परिवर्तन: भारत परिषद के गठन में बदलाव किए गए. इसमें कम से कम 8 और ज्यादा से ज्यादा 12 सदस्य नियुक्त करने की व्यवस्था थी. इनमें से कम से कम आधे सदस्य ऐसे होने चाहिए थे जो नियुक्ति के समय से पहले भारत में कम से कम 10 साल रह चुके हों और उन्होंने अपनी नियुक्ति से 5 साल पहले देश नहीं छोड़ा हो. इस परिषद का कार्यकाल 7 साल से घटाकर 5 साल कर दिया गया.
2. नरेश मंडल की स्थापना: देशी राजाओं के महत्व को ध्यान में रखते हुए एक नरेश मंडल बनाने का सुझाव दिया गया था. इसी सुझाव के आधार पर 9 फरवरी, 1921 को दिल्ली में एक नरेश मंडल की स्थापना की गई. इसका अध्यक्ष वायसराय होता था. यह सिर्फ सलाह देने वाली संस्था थी.
3. सांप्रदायिक निर्वाचन का विस्तार: 1909 के अधिनियम में सिर्फ मुसलमानों को अलग चुनाव का अधिकार मिला था. इस अधिनियम द्वारा सिखों, ईसाइयों, यूरोपियनों और एंग्लो-भारतीयों को भी अलग से चुनाव का अधिकार दिया गया. मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने हालांकि सांप्रदायिक निर्वाचन की आलोचना की थी, लेकिन इसे मुसलमानों के अलावा पंजाब में सिखों, तीन प्रांतों को छोड़कर शेष प्रांतों में यूरोपियनों और दो प्रांतों में एंग्लो-भारतीयों के लिए भी लागू किया गया.
4. सत्ता का विकेंद्रीकरण: प्रशासन और राजस्व के कुछ विषयों को केंद्रीय सरकार के नियंत्रण से हटाकर प्रांतीय सरकारों को दे दिया गया. प्रांतों को पहली बार कर्ज लेने और कर लगाने का अधिकार भी दिया गया. प्रांतों में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित करके विकेंद्रीकरण की दिशा में प्रयास किए गए.
In simple words: 1919 के कानून के मुख्य नियम थे: भारत परिषद में सदस्यों की संख्या और कार्यकाल में बदलाव, देशी राजाओं के लिए नरेश मंडल बनाना, अलग-अलग चुनाव का अधिकार सिखों और ईसाइयों तक बढ़ाना, और राज्यों को ज्यादा अधिकार देकर सत्ता को बांटना.

🎯 Exam Tip: 1919 के अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों को विस्तार से समझें, क्योंकि ये भारत के संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण मील के पत्थर थे.

 

Question 6. 1919 के अधिनियम में निर्वाचन व मताधिकार की क्या व्यवस्था की गयी थी?
Answer: 1919 के अधिनियम द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रक्रिया शुरू की गई और इसका विस्तार किया गया. इस अधिनियम से मताधिकार का दायरा बढ़ाया गया, जिससे लगभग दस प्रतिशत भारतीय जनता को वोट देने का अधिकार मिला. हालांकि, 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम ने केवल मुसलमानों को अलग से चुनाव का अधिकार दिया था, मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने इस प्रणाली की आलोचना की थी. फिर भी, 1919 के अधिनियम में इसे मुसलमानों के अलावा पंजाब में सिखों, तीन प्रांतों को छोड़कर शेष प्रांतों में यूरोपियनों, और दो प्रांतों में एंग्लो-भारतीयों के लिए भी लागू कर दिया गया. एक प्रांत में भारतीय ईसाइयों के लिए भी यह व्यवस्था लागू हुई.
In simple words: 1919 के कानून ने सीधे चुनाव शुरू किए और ज्यादा लोगों को वोट देने का अधिकार दिया. मुसलमानों के लिए जो अलग चुनाव पहले से थे, उन्हें सिखों, ईसाइयों और अन्य यूरोपीय लोगों तक भी बढ़ा दिया गया.

🎯 Exam Tip: 1919 के अधिनियम में मताधिकार के विस्तार और सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली के फैलाव को नोट करें, क्योंकि यह उस समय की राजनीति में महत्वपूर्ण पहलू थे.

 

Question 7. द्वैध शासन की योजना के चार प्रमुख अन्तर्निहित दोष बताइए।
Answer: द्वैध शासन की योजना के चार प्रमुख दोष निम्नलिखित थे:
1. दोषपूर्ण सिद्धांत: द्वैध शासन प्रणाली सिद्धांत रूप से दोषपूर्ण थी. एक ही प्रांत की शासन व्यवस्था को दो भिन्न और अलग-अलग शक्तियों के अधीन रखने से शासन में गतिरोध होना स्वाभाविक था. यह दोहरी व्यवस्था प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकती थी.
2. गवर्नर की मनमानी शक्तियाँ: गवर्नर को मंत्रियों को नियंत्रित करने, उनके प्रस्तावों को अस्वीकार करने और हर मामले में हस्तक्षेप करने की बहुत अधिक शक्तियाँ मिली हुई थीं. इस नीति के कारण मंत्रियों को वास्तविक उत्तरदायित्व नहीं मिला, और वे स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पाते थे.
3. मंत्रियों का सेवाओं पर नियंत्रण का अभाव: लोक सेवा के सदस्यों की नियुक्ति, स्थानांतरण और पदोन्नति पर गवर्नर का नियंत्रण होता था, न कि उस मंत्री का जिसके अधीन वे काम करते थे. इससे मंत्रियों को अपने विभागों पर पूरा नियंत्रण नहीं मिल पाता था.
4. विषयों का अविवेकपूर्ण और अव्यावहारिक विभाजन: प्रांतीय विषयों का विभाजन तर्कहीन और अव्यावहारिक था. उदाहरण के लिए, किसी मंत्री को सिंचाई विभाग के बिना कृषि मंत्री बना देना या उद्योगों के लिए बिजली, जलशक्ति, खनिज पदार्थ और श्रम के बिना उद्योग मंत्री बना देना पूरी तरह से अव्यावहारिक निर्णय था. इस विभाजन से मंत्रियों के लिए प्रभावी ढंग से काम करना मुश्किल हो गया.
In simple words: द्वैध शासन की योजना में कई समस्याएं थीं: यह सिद्धांत में ही गलत थी क्योंकि एक ही जगह दो तरह की सरकार थी, गवर्नर के पास बहुत ज्यादा ताकत थी, मंत्री अपनी सेवाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते थे, और विषयों को बांटने का तरीका भी सही नहीं था.

🎯 Exam Tip: द्वैध शासन की आंतरिक कमजोरियों और इसके कारण होने वाली समस्याओं को याद रखें, क्योंकि यह प्रणाली इसकी विफलता का मुख्य कारण थी.

RBSE Class 11 Political Science Chapter 17 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 की प्रमुख प्रमुख विशेषताओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
Answer: भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 को 15 नवंबर, 1909 को ब्रिटिश सम्राट की मंजूरी मिली और उसके बाद इसे लागू किया गया. इस अधिनियम को लॉर्ड मॉर्ले (भारत सचिव) और लॉर्ड मिंटो (वायसराय) की महत्वपूर्ण भूमिका के कारण मॉर्ले-मिंटो सुधार अधिनियम भी कहा जाता है.
इस अधिनियम में केंद्रीय विधान परिषद में सुधार, प्रांतीय विधान परिषदों के संगठन और अधिकारों में वृद्धि, कार्यकारी परिषदों का विस्तार और मताधिकार के प्रतिनिधित्व के संबंध में महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए थे. हालांकि, यह अधिनियम भारत में उदारवादियों को भी संतुष्ट नहीं कर पाया और इसकी आलोचनाएं निम्नलिखित थीं:
1. सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की स्थापना: 1909 के अधिनियम द्वारा सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली शुरू की गई, जिसमें विभिन्न हित समूहों और वर्गों को अलग से चुनाव का अधिकार दिया गया. मुसलमानों, वाणिज्य संघों और जमींदारों के लिए सीटें आरक्षित की गईं, और ये सीटें उनकी जाति की संख्या के अनुपात से अधिक थीं. इससे सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला और धर्मनिरपेक्षता को नुकसान पहुंचा, जिसने अंततः भारत विभाजन की मांग का रास्ता तैयार किया. बाद में, पंजाब में सिखों, मद्रास में गैर-ब्राह्मणों और एंग्लो-भारतीयों ने भी अलग निर्वाचन की मांग शुरू कर दी.
2. केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत: 1909 का अधिनियम केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी सदस्यों को बहुमत देता था, जिससे गैर-सरकारी सदस्यों की स्थिति कमजोर हो गई. इसी कारण गैर-सरकारी सदस्य विधान परिषदों में बहुत कम उपस्थित होते थे.
3. प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत सिर्फ दिखावा: सिद्धांत रूप में प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत स्थापित किया गया था, लेकिन व्यवहार में स्थिति बिल्कुल विपरीत थी. मनोनीत और सरकारी गैर-सरकारी सदस्य हमेशा सरकार का साथ देते थे. निर्वाचित गैर-सरकारी सदस्य कई वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे, जिससे सरकार के खिलाफ एकजुट होना कठिन था. गवर्नरों के पास कई विषयों पर वीटो (निषेधाधिकार) शक्तियां थीं, जिससे गैर-सरकारी बहुमत का कोई महत्व नहीं रह गया.
4. सीमित और पक्षपातपूर्ण मताधिकार: 1909 के अधिनियम में दिया गया मताधिकार सीमित और पक्षपातपूर्ण था. मुसलमानों में मध्यवर्गीय जमींदारों, व्यापारियों और स्नातकों को मताधिकार मिला, लेकिन इस श्रेणी के गैर-मुसलमानों को मताधिकार से वंचित रखा गया. जैसे पूर्वी बंगाल में 5000 रुपये वार्षिक राजस्व देने वाले हिंदू को मताधिकार था, लेकिन 750 रुपये राजस्व देने वाले मुसलमान को भी मताधिकार दिया गया. हिंदू बहुल प्रांतों में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए मुसलमानों को विशेष प्रतिनिधित्व दिया गया, लेकिन मुस्लिम बहुल प्रांतों (पंजाब, पूर्वी बंगाल और असम) में हिंदुओं को ऐसा प्रतिनिधित्व नहीं मिला.
5. उत्तरदायी शासन व्यवस्था का प्रयास नहीं: भारतीय जनता राष्ट्रीय आंदोलन के माध्यम से लंबे समय से उत्तरदायी शासन की मांग कर रही थी, लेकिन 1909 के अधिनियम में उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं की गई. इसका उद्देश्य सिर्फ कुछ भारतीयों को कानून निर्माण और अन्य प्रशासनिक कार्यों का प्रशिक्षण देना था.
6. निहित स्वार्थों को अनावश्यक प्रोत्साहन और महत्व: इस अधिनियम ने जमींदारों, चैंबर ऑफ कॉमर्स (व्यापार मंडल) जैसे कुछ विशेष समूहों को अनावश्यक प्रतिनिधित्व देकर महत्व दिया. ये निहित स्वार्थी तत्व ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में थे और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ थे. अंत में, 1909 का अधिनियम अधूरा, कई दोषपूर्ण व्यवस्थाओं को जन्म देने वाला और भारतीयों को संतुष्ट न करने वाला था. इससे भारतीयों को कुछ संस्थाओं में पहले से अधिक सहभागिता मिली, लेकिन कई विसंगतियाँ भी पैदा हुईं.
In simple words: 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों में कुछ बदलाव किए, लेकिन इसने भारतीयों को संतुष्ट नहीं किया. इसके मुख्य दोष थे: मुसलमानों के लिए अलग चुनाव प्रणाली जिसने फूट डाली, केंद्रीय परिषदों में सरकार का ज्यादा दबदबा, प्रांतीय परिषदों में दिखावटी बहुमत, सीमित और भेदभावपूर्ण वोट का अधिकार, और जिम्मेदार सरकार न बनाना.

🎯 Exam Tip: मॉर्ले-मिंटो सुधारों की विशेषताओं और आलोचनाओं को संतुलित रूप से प्रस्तुत करें. यह दर्शाएं कि ये सुधार ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों और भारतीय प्रतिक्रियाओं को कैसे दर्शाते हैं.

 

Question 3. भारत शासन अधिनियम, 1919 के प्रावधानों की व्याख्या कीजिए और उनके महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
Answer: भारत शासन अधिनियम, 1919 के मुख्य प्रावधान इस प्रकार थे:
1. गृह शासन और भारत परिषद में परिवर्तन: भारतीय उपनिवेश के मामलों को देखने के लिए ब्रिटेन में एक मंत्री होता था, जिसे भारत सचिव कहा जाता था. उसकी एक भारत परिषद होती थी, जिसका खर्च भारत को ही वहन करना पड़ता था. भारतीय राष्ट्रवादी इसकी समाप्ति की मांग कर रहे थे. इस अधिनियम में इसे समाप्त तो नहीं किया गया, लेकिन इसकी संरचना में कुछ बदलाव किए गए. भारत परिषद में सदस्यों की संख्या कम से कम 8 और अधिकतम 12 कर दी गई (पहले यह कम से कम 12 और अधिकतम 14 सदस्य थे).
2. भारतीय प्रशासन पर गृह सरकार के नियंत्रण में कमी: प्रांतीय स्तर पर आरक्षित विषयों और केंद्रीय स्तर पर सभी विषयों पर भारत सचिव (जो इंग्लैंड में मंत्री को सचिव कहा जाता था) का नियंत्रण पहले जैसा ही रहा. हालांकि, हस्तांतरित विषयों के मामलों में प्रांतों को कुछ छूट दी गई. भारत सचिव ब्रिटिश साम्राज्य के हितों, केंद्रीय विषयों के प्रशासन और अपने विशेष अधिकारों की रक्षा के लिए ही हस्तक्षेप कर सकता था. यह उम्मीद की गई थी कि धीरे-धीरे यह हस्तक्षेप कम हो जाएगा.
3. प्रांतों में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन या द्वैध शासन की स्थापना: 1919 के अधिनियम द्वारा प्रांतों में आंशिक उत्तरदायी शासन स्थापित किया गया. प्रांतीय शासन को दो भागों में बांटा गया: रक्षित विषय और हस्तांतरित विषय. रक्षित विषय गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद के नियंत्रण में थे, जबकि हस्तांतरित विषय भारतीय मंत्रियों के नियंत्रण में थे, जो विधान परिषद के प्रति जिम्मेदार होते थे.
4. प्रांतीय कार्यकारी परिषद में भारतीयों को अधिक प्रतिनिधित्व: इस अधिनियम द्वारा रक्षित क्षेत्र का प्रशासन गवर्नर को सौंपा गया था. लेकिन प्रांतों की कार्यकारी परिषदों में भी भारतीय सदस्यों की संख्या पहले से बढ़ा दी गई थी. इन सदस्यों की नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा भारत मंत्री की सिफारिश पर की जाती थी.
5. प्रांतीय विधान परिषदों का पुनर्गठन: इस अधिनियम द्वारा 'विनियम' और 'अविनियमन' प्रांतों का भेद समाप्त कर एक तरह के प्रांत बनाए गए. विधान परिषदों को निर्वाचित सदस्यों का बहुमत रखकर अधिक लोकतांत्रिक बनाया गया और उनके अधिकारों में वृद्धि की गई.
6. केंद्र में अनुत्तरदायी शासन: अधिनियम द्वारा प्रांतों में आंशिक उत्तरदायी शासन की स्थापना की गई, लेकिन केंद्रीय शासन पहले की तरह केंद्रीय विधान परिषद के नियंत्रण से मुक्त रहा. शासन को प्रभावित करने के लिए विधान सभा का विस्तार अवश्य किया गया, लेकिन गवर्नर जनरल की शक्तियों में भी वृद्धि कर दी गई. परिणामस्वरूप, वह विधान सभा की सहमति के बिना भी महत्वपूर्ण कार्य कर सकता था. इस प्रकार, केंद्रीय विधान सभा के सदस्यों में वृद्धि के बावजूद केंद्र में अनुत्तरदायी शासन बना रहा.
7. केंद्रीय कार्यकारी परिषद में अधिक भारतीयों की नियुक्ति: गवर्नर जनरल को पहले की तरह निरंकुश और स्वेच्छाचारी बने रहने दिया गया, लेकिन कार्यकारी परिषद में कुछ सुधार किए गए. पहला, कार्यकारी सदस्यों की निर्धारित सदस्य संख्या संबंधी प्रतिबंध हटा दिया गया. दूसरा, भारतीय उच्च न्यायालयों के उन वकीलों को जिन्हें 10 साल का अनुभव हो, परिषद का विधि सदस्य बनने के योग्य ठहराया गया. तीसरा, कार्यकारी परिषद में भारतीय सदस्यों की संख्या एक से बढ़ाकर तीन कर दी गई, लेकिन ये सदस्य जनता के प्रतिनिधि न होकर सरकार का समर्थन करने वाले होते थे. इन भारतीय सदस्यों को सरकार के सबसे कम महत्वपूर्ण विभाग दिए जाते थे.
8. द्विसदनात्मक केंद्रीय विधानमंडल: इस अधिनियम द्वारा केंद्र के स्तर पर एक सदनात्मक विधानमंडल के स्थान पर द्विसदनात्मक विधानमंडल की स्थापना की गई. इन सदनों के नाम केंद्रीय विधान सभा और राज्य परिषद रखे गए.
9. विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दिया जाना: इस अधिनियम द्वारा प्रशासन और राजस्व के कुछ विषयों का विकेंद्रीकरण कर दिया गया. प्रांतों को पहली बार कर्ज लेने और कर लगाने का अधिकार भी प्रदान किया गया.
10. मताधिकार और निर्वाचन: इस अधिनियम द्वारा मताधिकार में वृद्धि की गई, जिससे लगभग 10 प्रतिशत जनता को मताधिकार प्राप्त हुआ. 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा केवल मुसलमानों को ही अलग निर्वाचन का अधिकार प्रदान किया गया था, लेकिन इस अधिनियम द्वारा सिखों, ईसाइयों, यूरोपियनों और एंग्लो-भारतीयों को भी पृथक निर्वाचन का अधिकार दे दिया गया.
11. शक्ति विभाजन: 1919 के अधिनियम द्वारा केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया. जिन विषयों का संबंध पूरे भारत या अंतर-प्रांतीय हितों से था, वे केंद्र के अधीन रखे गए, और जो विषय प्रांतीय हितों (स्थानीय महत्व) से विशेष संबंध रखते थे, वे प्रांतों के अंतर्गत रखे गए.
In simple words: 1919 के भारत शासन अधिनियम ने कई बदलाव किए: भारत परिषद में बदलाव, प्रांतों में आंशिक रूप से जिम्मेदार सरकार (द्वैध शासन), केंद्र में दो सदन वाली संसद बनाना, भारतीयों को ज्यादा वोट का अधिकार देना और ब्रिटिश शासन के नियंत्रण को कुछ हद तक कम करना.

🎯 Exam Tip: 1919 के अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों को उनके महत्व और भारतीय शासन पर पड़े प्रभावों के साथ समझाना महत्वपूर्ण है. 'द्वैध शासन' की अवधारणा पर विशेष ध्यान दें.

 

Question 4. 1919 के अधिनियम में निहित द्वैध शासन की व्यवस्था सिद्धान्ततः दोषपूर्ण और कार्य संचालन में अव्यवहारिक थी। व्याख्या कीजिए।
अथवा
द्वैध शासन की दोषपूर्णता एवं अव्यवहारिकता
अथवा
द्वैध शासन की असफलता के प्रमुख कारण
Answer: 1 अप्रैल, 1837 को द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त हो गई थी. इसकी असफलता के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
1. दोषपूर्ण सिद्धांत: द्वैध शासन प्रणाली सिद्धांत रूप से दोषपूर्ण थी. एक ही प्रांत में शासन व्यवस्था को दो भिन्न और अलग-अलग प्रकृति की शक्तियों के अधीन कर देने से शासन में गतिरोध उत्पन्न होना स्वाभाविक था. यह विभाजन शक्तियों के बजाय संघर्ष को बढ़ावा देता था.
2. विषयों का अव्यावहारिक विभाजन: विषयों का विभाजन इतना अतार्किक था कि इससे अधिक अव्यावहारिक विभाजन की कल्पना नहीं की जा सकती थी. उदाहरण के लिए, किसी मंत्री को सिंचाई विभाग के बिना कृषि मंत्री बना देना या कारखाने, बिजली, जलशक्ति, खनिज पदार्थ और श्रम के बिना किसी को उद्योग मंत्री बना देना पूरी तरह से अव्यावहारिक निर्णय था. इससे विभागों के बीच समन्वय कठिन हो गया.
3. गवर्नर की स्वेच्छाचारी शक्तियाँ: गवर्नर को मंत्रियों को नियंत्रित करने, उनके प्रस्तावों को अस्वीकार करने और प्रत्येक विषय में हस्तक्षेप करने की मनमानी शक्तियाँ प्राप्त थीं. इस नीति के कारण मंत्रियों को वास्तविक उत्तरदायित्व नहीं मिला और वे स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले पाते थे. लोक सेवा के सदस्यों की नियुक्ति, स्थानांतरण और पदोन्नति पर भी गवर्नर का नियंत्रण होता था, न कि उस मंत्री का जिसके अधीन वे काम करते थे.
4. विधान परिषदों का गठन दोषपूर्ण: विधान परिषदों में लगभग 80 प्रतिशत सदस्य सरकारी या सरकार द्वारा मनोनीत गैर-सरकारी सदस्य थे. जो सदस्य निर्वाचित थे, वे भी विशेष हितों के प्रतिनिधि थे और उनमें से अधिकांश सरकार को खुश करने में लगे रहते थे. इससे परिषदें वास्तविक जन प्रतिनिधित्व करने में विफल रहीं.
5. सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत का अभाव: गवर्नर मंत्रियों की नियुक्ति दलीय आधार पर नहीं करता था. सभी मंत्री एक ही दल के नहीं होने के कारण उनमें सामूहिक उत्तरदायित्व का अभाव रहता था. इससे मंत्रिमंडल में एकता और सामंजस्य की कमी थी.
6. तत्कालीन समय के राजनीतिक वातावरण का अनुकूल न होना: भारत में उस समय जलियांवाला बाग की घटना, खिलाफत आंदोलन और रॉलेट अधिनियम जैसे कठोर दमनकारी कानूनों ने भारतीयों के मन में ब्रिटिश शासन के प्रति अविश्वास और कुंठा पैदा कर दी थी. ब्रिटिश शासन द्वारा शुरू किए गए सुधारों के प्रति भारतीय जनमानस में उदासीनता का भाव आ गया था.
7. आर्थिक दुर्दशा और मैस्टन पंचाट: सन् 1920 में भयंकर अकाल पड़ा. भारतीय बाजारों में मंदी का माहौल था और जनता की गरीबी से भारतीयों में असंतोष था. मैस्टन पंचाट द्वारा आधे से अधिक प्रांतों द्वारा केंद्र को अधिक अनुदान दिए जाने के कारण आर्थिक स्थिति खराब हो गई.
8. कांग्रेस और मुस्लिम लीग का असहयोग: कांग्रेस और मुस्लिम लीग में परस्पर सहयोग का अभाव था. अंग्रेजों की "फूट डालो और राज करो" की नीति ने उनके बीच मतभेदों को बढ़ाया. दोनों ही दल प्रशासनिक सुधारों की अपेक्षा देश की स्वतंत्रता और अपने-अपने वर्गों में स्थिति मजबूत करने में लगे थे.
9. नौकरशाही का असहयोगपूर्ण व्यवहार: ब्रिटिश नौकरशाही भारतीय मंत्रियों के अधीन ईमानदारी से काम करने को तैयार नहीं थी. इससे द्वैध शासन असफल रहा, क्योंकि अधिकारियों का सहयोग बिना मंत्री प्रभावी नहीं हो सकते थे.
10. ब्रिटिश सरकार के दृष्टिकोण में परिवर्तन: ब्रिटेन में अनुदार दल की सरकार बन जाने पर ब्रिटिश शासन का दृष्टिकोण भी सुधारों के प्रति बदल गया. प्रांतों में हस्तक्षेप बढ़ गया, जिससे द्वैध शासन और भी कमजोर हो गया.
In simple words: द्वैध शासन की असफलता के कई कारण थे: यह प्रणाली खुद में दोषपूर्ण थी, विषयों को गलत तरीके से बांटा गया था, गवर्नर के पास बहुत ज्यादा शक्तियां थीं, विधान परिषदें कमजोर थीं, मंत्रियों में एकता नहीं थी, और जलियांवाला बाग जैसी घटनाओं से लोग अंग्रेजों पर भरोसा नहीं करते थे. आर्थिक समस्याएं और कांग्रेस-मुस्लिम लीग का असहयोग भी इसके फेल होने के बड़े कारण थे.

🎯 Exam Tip: द्वैध शासन की असफलता के कारणों को बिंदुवार प्रस्तुत करें, और प्रत्येक कारण का संक्षिप्त विवरण दें. यह प्रणाली भारतीय संवैधानिक विकास के महत्वपूर्ण नकारात्मक पहलुओं में से एक थी.

RBSE Class 11 Political Science Chapter 17 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 2. भारतीय परिषद, 1909 द्वारा केन्द्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की अधिकतम संख्या 16 से बढ़ाकरकी गयी -
(अ) 60
(ब) 50
(स) 30
(द) 69
Answer: (अ) 60
In simple words: 1909 के कानून में केंद्रीय विधान परिषद में सदस्यों की ज्यादा से ज्यादा संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी गई थी.

🎯 Exam Tip: अधिनियमों के तहत परिवर्तित की गई सदस्यों की संख्या जैसे संख्यात्मक तथ्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है.

 

Question 3. जमींदारों को उनके चुनाव क्षेत्रों में मताधिकार देने में यह अधिनियम विभेद करता था, मद्रास में यह मताधिकार किन्हें दिया गया -
(अ) जिनकी आय 15 हजार वार्षिक हो।
(ब) जिनके पास राजा या नवाब की उपाधि थी।
(स) जो मजिस्ट्रेट की मानद उपाधि रखते थे।
(द) सभी को।
Answer: (अ) जिनकी आय 15 हजार वार्षिक हो।
In simple words: मद्रास में, जो जमींदार हर साल 15 हजार रुपये कमाते थे, उन्हें वोट देने का अधिकार मिला.

🎯 Exam Tip: विभिन्न क्षेत्रों में मताधिकार के लिए निर्धारित विशिष्ट मानदंडों और भेदभावपूर्ण प्रकृति पर ध्यान दें.

 

Question 4. भारतीय शासन अधिनियम, 1919 की प्रस्तावना से सम्बन्धित नहीं है –
(अ) ब्रिटिश भारत, ब्रिटिश साम्राज्य का अखण्ड भाग रहेगा।
(ब) ब्रिटिश भारत में उत्तरदायी शासन, ब्रिटिश पार्लियामेंट की घोषित नीति का लक्ष्य है।
(स) उत्तरदायी शासन धीरे-धीरे ही दिया जा सकता है।
(द) उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए प्रशासन की हर शाखा से भारतीयों का अधिकाधिक सम्बन्ध और स्वशासी। संस्थाओं का क्रमिक परिवर्तन।
Answer: [Answer not provided in OCR for this question on page 14]

🎯 Exam Tip: किसी अधिनियम की प्रस्तावना के मुख्य बिंदुओं को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे उसके उद्देश्यों को दर्शाते हैं. उन कथनों को पहचानें जो प्रस्तावना का हिस्सा नहीं हैं.

 

Question 6. भारतीय शासन अधिनियम, 1919 के प्रावधान से सम्बन्धित है -
(अ) चुनावों हेतु पहली बार साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का आरम्भ
(ब) प्रान्तों में द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना
(स) केन्द्र में द्वैध शासन प्रणाली
(द) भारत परिषद को समाप्त कर दिया गया।
Answer: (अ) चुनावों हेतु पहली बार साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का आरम्भ
In simple words: 1919 के अधिनियम द्वारा चुनाव प्रणाली में साम्प्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था का विस्तार किया गया। यह व्यवस्था पहले केवल मुसलमानों के लिए शुरू की गई थी, लेकिन इस अधिनियम ने इसे अन्य समुदायों तक भी फैला दिया।

🎯 Exam Tip: याद रखें कि 'पहली बार' साम्प्रदायिक निर्वाचन 1909 के अधिनियम में मुसलमानों के लिए शुरू हुआ था, जबकि 1919 के अधिनियम ने इसे अन्य समुदायों तक 'विस्तारित' किया।

 

Question 7. द्वैध शासन की असफलता का कारण नहीं है -
(अ) विषयों का अतार्किक और अव्यावहारिक विभाजन
(ब) वायसराय को प्रदत्त स्वेच्छाचारी शक्तियाँ
(स) मन्त्रियों का सेवाओं पर नियन्त्रण
(द) सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धान्त का अभाव।
Answer: (स) मन्त्रियों का सेवाओं पर नियन्त्रण
In simple words: द्वैध शासन की असफलता के कई कारण थे, जैसे कि विषयों का गलत बँटवारा या गवर्नर की बहुत ज़्यादा शक्तियाँ। मन्त्रियों को सेवाओं पर पूरा नियन्त्रण नहीं था, बल्कि सेवाओं पर नियन्त्रण की कमी ही द्वैध शासन की विफलता का एक बड़ा कारण थी।

🎯 Exam Tip: जब 'कारण नहीं है' पूछा जाए, तो उस विकल्प को चुनें जो दी गई स्थिति का विपरीत हो या असफलता से सीधा सम्बन्ध न रखता हो।

 

Question 8. भारतीय शासन अधिनियम, 1919 के अन्तर्गत केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद में सुधार से सम्बन्ध नहीं रखता -
(अ) दस वर्ष का अनुभव रखने वाले भारतीय उच्च न्यायालय के वकीलों को परिषद की कानूनी सदस्य बनने के योग्य माना गया
(ब) तेज बहादुर सप्रू पहले भारतीय कानूनी सदस्य केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद में नियुक्त हुए
(स) केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद का सदस्य नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बनाया गया
(द) केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद में भारतीयों की संख्या एक से बढ़ाकर तीन कर दी गयी।
Answer: (स) केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद का सदस्य नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बनाया गया
In simple words: नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को कभी भी ब्रिटिश सरकार की केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद का सदस्य नहीं बनाया गया था। बाकी सभी विकल्प 1919 के अधिनियम से जुड़े हुए सही बदलाव हैं।

🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में, अक्सर एक विकल्प किसी प्रसिद्ध व्यक्ति या किसी असंगत तथ्य का उल्लेख करता है जो सही नहीं होता।

 

Question 10. द्वैध शासन की उपयोगिता से सम्बन्धित नहीं है -
(अ) द्वैध शासन के कारण मताधिकार का विस्तार हुआ
(ब) द्वैध शासन के कारण भारतीयों में राजनैतिक जागरूकता को बढ़ावा मिला
(स) द्वैध शासन के कारण सार्वजनिक सेवाओं के भारतीयकरण को प्रोत्साहन मिला
(द) द्वैध शासन व्यवस्था महिला मताधिकार के विरोध में थी।
Answer: (द) द्वैध शासन व्यवस्था महिला मताधिकार के विरोध में थी।
In simple words: 1919 के अधिनियम से लागू द्वैध शासन व्यवस्था में महिलाओं को भी वोट डालने का अधिकार दिया गया था, इसलिए यह व्यवस्था महिला मताधिकार के खिलाफ नहीं थी। बाकी सारे विकल्प द्वैध शासन के कुछ सकारात्मक प्रभावों को बताते हैं।

🎯 Exam Tip: यह याद रखें कि 1919 के अधिनियम ने पहली बार कुछ भारतीय महिलाओं को मताधिकार दिया था, हालाँकि यह बहुत सीमित था।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 17 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Political Science Chapter 17 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. निम्न में से किस अधिनियम को मार्ले-मिण्टो सुधार भी कहा जाता है।
(अ) भारतीय परिषद अधिनियम, 1909
(ब) भारतीय शासन अधिमियम, 1919
(स) भारतीय शासन अधिनियम, 1935
(द) भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम 1947
Answer: (अ) भारतीय परिषद अधिनियम, 1909
In simple words: भारत में 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम को मार्ले-मिण्टो सुधार कहा जाता है क्योंकि इसे बनाने में भारत सचिव लॉर्ड मार्ले और वायसराय लॉर्ड मिण्टो की बड़ी भूमिका थी।

🎯 Exam Tip: मार्ले-मिण्टो सुधारों को हमेशा 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम से जोड़कर याद रखें, क्योंकि यह उस समय के प्रमुख ब्रिटिश अधिकारियों के नाम पर था।

 

Question 2. भारतीय परिषद अधिनियम, 1919 की प्रमुख विशेषता थी -
(अ) केन्द्रीय विधान परिषद में सुधार
(ब) प्रान्तीय विधान परिषदों का संगठन व अधिकार
(स) कार्यकारी परिषदों का विस्तार
(द) व...
Answer: (अ) केन्द्रीय विधान परिषद में सुधार
In simple words: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के तहत केन्द्रीय स्तर पर विधान परिषदों में बदलाव किए गए। इन बदलावों का मकसद परिषदों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाना था, जिससे शासन-प्रशासन और ज़्यादा प्रभावी हो सके।

🎯 Exam Tip: 1919 का अधिनियम केन्द्रीय और प्रान्तीय दोनों स्तरों पर विधान परिषदों में महत्वपूर्ण बदलावों के लिए जाना जाता है।

 

Question 4. निम्न में से किस अधिनियम के द्वारा साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का आरम्भ हुआ -
(अ) 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा
(ब) 1919 के भारत शासन अधिनियम द्वारा
(स) 1935 के भारत शासन अधिनियम द्वारा
(द) 1947 के भारत स्वतन्त्रता अधिनियम द्वारा।
Answer: (अ) 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा
In simple words: साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली पहली बार 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा शुरू की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों को अलग से प्रतिनिधित्व देना था।

🎯 Exam Tip: 1909 का अधिनियम (मार्ले-मिण्टो सुधार) ब्रिटिश की 'फूट डालो और राज करो' नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

 

Question 5. 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम का मुख्य दोष था -
(अ) साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का प्रारम्भ
(ब) केन्द्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत
(स) सीमित व पक्षपात पूर्ण अधिकार
(द) उपर्युक्त सभी।
Answer: (द) उपर्युक्त सभी।
In simple words: 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम में कई कमियाँ थीं, जिनमें साम्प्रदायिक चुनाव, केन्द्रीय विधान परिषद में सरकार का ज़्यादा बोलबाला और लोगों को सीमित वोट का अधिकार देना शामिल था। ये सभी अधिनियम के मुख्य दोष थे।

🎯 Exam Tip: 1909 के अधिनियम की आलोचना अक्सर इन तीन मुख्य बिन्दुओं पर आधारित होती है, जो इसकी सीमाओं को दर्शाते हैं।

 

Question 6. निम्न में से भारतीय शासन अधिनियम, 1919 की प्रमुख विशेषता नहीं है -
(अ) गृह शासन व भारत परिषद में परिवर्तन
(ब) केन्द्र में अनुत्तरदायी शासन
(स) द्विसदनीय केन्द्रीय मण्डल का निर्माण
(द) ...
Answer: (स) द्विसदनीय केन्द्रीय मण्डल का निर्माण
In simple words: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम ने केन्द्र में द्विसदनीय विधानमण्डल की स्थापना की थी। हालाँकि यह एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तन था, लेकिन शायद इसे प्रान्तों में द्वैध शासन या भारत परिषद में हुए अन्य परिवर्तनों की तुलना में 'प्रमुख विशेषता' के रूप में नहीं देखा गया, जो उस समय ज़्यादा चर्चा में थे।

🎯 Exam Tip: यह प्रश्न ऐसे विकल्प की तलाश करता है जो 1919 के अधिनियम का 'मुख्य' या 'सबसे महत्वपूर्ण' पहलू न हो, भले ही वह उस अधिनियम का हिस्सा क्यों न रहा हो।

 

Question 8. केन्द्र में अनुत्तरदायी शासन की स्थापना की गयी -
(अ) भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 द्वारा
(ब) पिट्स इण्डिया एक्ट द्वारा
(स) भारत शासन अधिनियम 1919 द्वारा
(द) भारत स्वतन्त्रता अधिनियम, 1947 द्वारा।
Answer: (स) भारत शासन अधिनियम 1919 द्वारा
In simple words: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के तहत प्रान्तों में तो कुछ हद तक ज़िम्मेदार सरकार बनाई गई, लेकिन केन्द्र में सरकार अभी भी लोगों के प्रति जवाबदेह नहीं थी। इसे ही 'अनुत्तरदायी शासन' कहा गया।

🎯 Exam Tip: 1919 के अधिनियम को 'मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार' के नाम से भी जाना जाता है, जिसने प्रान्तों में द्वैध शासन शुरू किया लेकिन केन्द्र में जवाबदेही नहीं लाई।

 

Question 9. 1919 के अधिनियम द्वारा केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद में प्रथम भारतीय कानूनी सदस्य बने -
(अ) तेज बहादुर सप्रू
(ब) बाल गंगाधर तिलक
(स) पं. जवाहर लाल नेहरू
(द) महात्मा गाँधी।
Answer: (अ) तेज बहादुर सप्रू
In simple words: 1919 के अधिनियम के बाद तेज बहादुर सप्रू पहले भारतीय व्यक्ति थे जिन्हें वायसराय की केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद में कानूनी सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था।

🎯 Exam Tip: प्रमुख नियुक्तियों और उनके अधिनियमों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये अक्सर सीधे प्रश्न के रूप में पूछे जाते हैं।

 

Question 10. द्विसदनीय केन्द्रीय विधानमण्डल का निर्माण हुआ -
(अ) 1919 के भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा
(ब) 1861 के अधिनियम द्वारा
(स) रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 द्वारा
(द) भारत शासन अधिनियम, 1919 द्वारा।
Answer: (द) भारत शासन अधिनियम, 1919 द्वारा।
In simple words: भारत में केन्द्र सरकार के स्तर पर दो सदनों वाली विधानमण्डल की शुरुआत 1919 के भारतीय शासन अधिनियम से हुई थी। इसमें एक विधान सभा और एक राज्य परिषद शामिल थे।

🎯 Exam Tip: 'द्विसदनीय विधानमण्डल' का मतलब है दो सदन (जैसे लोकसभा और राज्यसभा), और 1919 के अधिनियम ने पहली बार केन्द्र में यह प्रणाली स्थापित की।

 

Question 12. 1919 में अधिनियम द्वारा भारतीय शासन में जो महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया, वह था -
(अ) केन्द्र में द्वैध शासन की स्थापना
(ब) प्रान्तों में द्वैध शासन की स्थापना
(स) वायसराय के पद को समाप्त करना
(द) इनमें से कोई नहीं।
Answer: (ब) प्रान्तों में द्वैध शासन की स्थापना
In simple words: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम का सबसे बड़ा बदलाव यह था कि इसने भारत के प्रान्तों में 'द्वैध शासन' की शुरुआत की। इसका मतलब था कि प्रान्तीय विषयों को दो हिस्सों - आरक्षित और हस्तान्तरित - में बांट दिया गया था।

🎯 Exam Tip: द्वैध शासन (Dyarchy) 1919 के अधिनियम की एक पहचान है, और यह केवल प्रान्तीय स्तर पर लागू किया गया था, केन्द्र में नहीं।

 

Question 13. द्वैध शासन के अन्तर्गत हस्तान्तरित विषय नहीं था -
(अ) स्थानीय स्वशासन
(ब) भू-राजस्व
(स) चिकित्सा
(द) कृषि।
Answer: (ब) भू-राजस्व
In simple words: द्वैध शासन प्रणाली में, भू-राजस्व (जमीन से मिलने वाला टैक्स) एक 'आरक्षित विषय' था, जिसका मतलब है कि यह सीधे गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद के नियन्त्रण में था। यह 'हस्तान्तरित' विषयों की श्रेणी में नहीं आता था, जिन्हें मन्त्री नियंत्रित करते थे।

🎯 Exam Tip: द्वैध शासन में विषयों को 'आरक्षित' और 'हस्तान्तरित' में बांटा गया था। आरक्षित विषय सीधे गवर्नर के नियन्त्रण में थे, जबकि हस्तान्तरित विषय मंत्रियों के नियन्त्रण में थे।

 

Question 14. निम्न में से किस प्रान्त में द्वैध शासन लागू हुआ -
(अ) बंगाल
(ब) असम
(स) बिहार
(द) उपर्युक्त सभी।
Answer: (द) उपर्युक्त सभी।
In simple words: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के तहत द्वैध शासन प्रणाली भारत के लगभग सभी प्रमुख प्रान्तों में लागू की गई थी, जिसमें बंगाल, असम और बिहार जैसे क्षेत्र शामिल थे।

🎯 Exam Tip: द्वैध शासन की शुरुआत एक व्यापक योजना थी जो ब्रिटिश भारत के कई प्रान्तों में एक साथ लागू की गई।

 

Question 16. द्वैध शासन की असफलता का प्रमुख कारण था -
(अ) विषयों का अविवेकपूर्ण व अव्यावहारिक विभाजन
(ब) सामूहिक उत्तरदायित्वों के सिद्धान्त का अभाव
(स) गवर्नर की स्वेच्छाचारी शक्तियाँ
(द) उपर्युक्त सभी।
Answer: (द) उपर्युक्त सभी।
In simple words: द्वैध शासन की विफलता के कई कारण थे, जैसे कि विषयों को गलत तरीके से बांटना, मन्त्रियों में मिलकर काम करने की कमी और गवर्नर की बहुत ज़्यादा मनमानी करने की शक्तियाँ। ये सभी मिलकर द्वैध शासन को सफल नहीं होने दिया।

🎯 Exam Tip: द्वैध शासन की असफलता के कारणों को याद करते समय, शासन के विभाजन, मन्त्रियों के अधिकार और गवर्नर की शक्तियों के बीच के टकराव को ध्यान में रखें।

 

Question 17. निम्न में से भारतीय शासन अधिनियम, 1919 की आलोचना का आधार नहीं है -
(अ) प्रान्तों में प्रस्तावित द्वैध शासन की योजना सन्तोषप्रद न होना
(ब) साम्प्रदायिक निर्वाचन का अनुचित विस्तार
(स) केन्द्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत
(द) केन्द्र में शक्तिशाली विधानमण्डल का अभाव।
Answer: (स) केन्द्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत
In simple words: केन्द्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत का मुद्दा 1909 के अधिनियम से जुड़ा था, जहाँ सरकार का पलड़ा भारी रहता था। 1919 के अधिनियम ने केन्द्रीय विधानमण्डल की संरचना बदल दी, इसलिए यह उसकी आलोचना का मुख्य आधार नहीं था।

🎯 Exam Tip: 1919 के अधिनियम की आलोचनाएँ मुख्य रूप से प्रान्तों में द्वैध शासन, साम्प्रदायिक निर्वाचन के विस्तार और केन्द्र में सीमित जवाबदेही पर केन्द्रित थीं।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 17 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भारत में स्थापना कब हुई?
Answer: ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना 31 दिसम्बर सन् 1600 को हुई थी। यह कंपनी भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से आई थी।
In simple words: ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में 31 दिसम्बर, 1600 को बनी थी।

🎯 Exam Tip: ईस्ट इण्डिया कम्पनी का भारत में आगमन भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिससे आगे चलकर ब्रिटिश शासन की नींव पड़ी।

 

Question 2. ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर कौन-से एक्ट द्वारा ब्रिटिश संसद के नियन्त्रण की शुरुआत हुई?
Answer: ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर ब्रिटिश संसद का नियन्त्रण 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट द्वारा शुरू हुआ। इस एक्ट का उद्देश्य कम्पनी की गतिविधियों को नियंत्रित करना था।
In simple words: ब्रिटिश संसद ने 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से ईस्ट इण्डिया कम्पनी को नियंत्रित करना शुरू किया।

🎯 Exam Tip: 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में कम्पनी के शासन को औपचारिक रूप से नियंत्रित करने का पहला बड़ा कदम था।

 

Question 4. किस अधिनियम द्वारा भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन का अन्त हुआ?
Answer: भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन का अन्त भारत शासन अधिनियम, 1858 द्वारा हुआ। यह अधिनियम 1857 के विद्रोह के बाद लाया गया था।
In simple words: 1858 के भारत शासन अधिनियम से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज खत्म हो गया।

🎯 Exam Tip: 1858 का अधिनियम भारतीय प्रशासन में एक महत्वपूर्ण बदलाव था, जिसने कम्पनी के शासन को सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन कर दिया।

 

Question 5. भारत परिषद अधिनियम 1909 को मार्ले-मिण्टो सुधार क्यों कहते हैं?
Answer: भारत परिषद अधिनियम 1909 को मार्ले-मिण्टो सुधार कहते हैं क्योंकि इसके निर्माण में तत्कालीन भारत सचिव लॉर्ड मार्ले और वायसराय लॉर्ड मिण्टो का बहुत बड़ा योगदान था। इन दोनों के प्रयासों से यह अधिनियम बना था।
In simple words: 1909 के अधिनियम को मार्ले-मिण्टो सुधार इसलिए कहते हैं क्योंकि इसे भारत सचिव मार्ले और वायसराय मिण्टो ने मिलकर बनाया था।

🎯 Exam Tip: किसी अधिनियम को उसके निर्माताओं के नाम से जानना इतिहास को समझने में सहायक होता है।

 

Question 6. 1909 के अधिनियम द्वारा केन्द्रीय विधान परिषद में निर्वाचित सदस्यों के चयन हेतु निर्वाचक मण्डल को कितनी श्रेणियों में बाँट दिया गया?
Answer: 1909 के अधिनियम द्वारा केन्द्रीय विधान परिषद में निर्वाचित सदस्यों के चयन हेतु निर्वाचक मण्डल को तीन श्रेणियों में बाँट दिया गया था:
1. सामान्य निर्वाचक वर्ग।
2. वर्गीय निर्वाचक वर्ग।
3. विशिष्ट निर्वाचक वर्ग।
In simple words: 1909 में केन्द्रीय विधान परिषद के सदस्यों को चुनने के लिए वोट देने वालों को तीन हिस्सों में बांटा गया था।

🎯 Exam Tip: निर्वाचक मण्डल के वर्गीकरण को याद रखें, क्योंकि यह 1909 के अधिनियम की जटिलताओं को दर्शाता है।

 

Question 7. 1909 के अधिनियम के अन्तर्गत केन्द्रीय विधान परिषद् को कौन-कौन से अधिकार दिए गए?
Answer: 1909 के अधिनियम के अन्तर्गत केन्द्रीय विधान परिषद् को सामान्य विषयों से सम्बन्धित विधेयकों पर वाद-विवाद करने, बजट पर चर्चा करने और आम जनहित के मामलों पर नियम बनाने का अधिकार दिया गया था।
In simple words: 1909 में केन्द्रीय विधान परिषद् को आम मुद्दों पर कानून बनाने, बजट पर बहस करने और लोगों की भलाई के लिए बात करने का अधिकार मिला था।

🎯 Exam Tip: ध्यान दें कि ये अधिकार सीमित थे और वायसराय की स्वीकृति के बिना लागू नहीं हो सकते थे।

 

Question 8. 1909 के अधिनियम के तहत प्रान्तीय विधान परिषद में कौन-कौन से चार प्रकार के सदस्य होते थे?
Answer: 1909 के अधिनियम के तहत प्रान्तीय विधान परिषद में चार प्रकार के सदस्य होते थे:
1. पदेन सदस्य
2. मनोनीत सरकारी सदस्य
3. मनोनीत गैर सरकारी सदस्य
4. निर्वाचित सदस्य।
In simple words: प्रान्तीय विधान परिषद में चार तरह के सदस्य होते थे - कुछ पद के कारण, कुछ सरकार द्वारा चुने गए, कुछ सरकार द्वारा चुने गए लेकिन सरकारी नहीं, और कुछ चुनाव से चुने गए।

🎯 Exam Tip: प्रान्तीय विधान परिषदों में इन चार प्रकार के सदस्यों की बनावट 1909 के अधिनियम की एक प्रमुख विशेषता थी।

 

Question 10. 1909 के अधिनियम द्वारा कार्यकारी परिषद में कितने भारतीय सदस्य सम्मिलित किए गए?
Answer: 1909 के अधिनियम द्वारा कार्यकारी परिषद में एक भारतीय सदस्य को सम्मिलित किया गया। यह भारतीयों को प्रशासन में शामिल करने का एक शुरुआती कदम था।
In simple words: 1909 के अधिनियम में कार्यकारी परिषद में एक भारतीय सदस्य को शामिल किया गया।

🎯 Exam Tip: यह नियुक्ति भारतीयों को ब्रिटिश प्रशासन में प्रतिनिधित्व देने की दिशा में एक प्रतीकात्मक शुरुआत थी।

 

Question 11. 1909 के अधिनियम द्वारा भारत सचिव की परिषद में कितने भारतीय सदस्य सम्मिलित किए गए?
Answer: 1909 के अधिनियम द्वारा भारत सचिव की परिषद में दो भारतीय सदस्य सम्मिलित किए गए। इन सदस्यों को भारतीय मामलों पर सलाह देने के लिए नियुक्त किया गया था।
In simple words: भारत सचिव की परिषद में 1909 के अधिनियम से दो भारतीय सदस्य शामिल हुए।

🎯 Exam Tip: भारत सचिव की परिषद लंदन में स्थित थी और भारत के प्रशासन पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।

 

Question 12. किस अधिनियम द्वारा जनता को मताधिकार प्रदान किया गया?
Answer: जनता को मताधिकार भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 द्वारा सीमित लोगों के लिए प्रदान किया गया। यह अधिकार संपत्ति, शिक्षा और अन्य योग्यताओं पर आधारित था।
In simple words: 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम ने कुछ ही लोगों को वोट देने का अधिकार दिया था।

🎯 Exam Tip: 1909 का मताधिकार बहुत सीमित और पक्षपातपूर्ण था, जो समाज के एक छोटे वर्ग को ही लाभ पहुँचाता था।

 

Question 13. किस अधिनियम द्वारा पृथक् निर्वाचन की व्यवस्था की गयी?
Answer: पृथक् निर्वाचन की व्यवस्था भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 के द्वारा की गयी। इस व्यवस्था के तहत मुसलमानों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र बनाए गए थे।
In simple words: 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम से अलग चुनाव की व्यवस्था शुरू हुई थी।

🎯 Exam Tip: पृथक् निर्वाचन प्रणाली भारत में साम्प्रदायिक फूट डालने की ब्रिटिश नीति का हिस्सा थी।

 

Question 14. किस अधिनियम के तहत प्रान्तीय विधान परिषदों में गैर सरकारी सदस्यों का तो बहुमत था, लेकिन निर्वाचित सदस्यों का बहुमत नहीं था?
Answer: यह 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम के तहत था कि प्रान्तीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत तो था, लेकिन उनमें से निर्वाचित सदस्यों का बहुमत नहीं था।
In simple words: 1909 के अधिनियम में प्रान्तीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या ज़्यादा थी, पर उनमें से चुने हुए सदस्य कम थे।

🎯 Exam Tip: यह व्यवस्था इस बात पर ज़ोर देती है कि कैसे सरकार द्वारा मनोनीत सदस्य निर्वाचित सदस्यों से अधिक महत्वपूर्ण थे, जिससे वास्तविक जन-प्रतिनिधित्व कम हो गया।

 

Question 15. किस अधिनियम में सर्वप्रथम विधान परिषदों के सदस्यों को कार्यकारिणी सदस्यों से प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया?
Answer: सर्वप्रथम विधान परिषदों के सदस्यों को कार्यकारिणी सदस्यों से प्रश्न पूछने का अधिकार भारत परिषद अधिनियम, 1909 में दिया गया। यह विधायी प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण कदम था।
In simple words: 1909 के भारत परिषद अधिनियम ने विधान परिषद के सदस्यों को कार्यकारी सदस्यों से सवाल पूछने की अनुमति दी।

🎯 Exam Tip: प्रश्न पूछने का अधिकार विधानमंडलों में उत्तरदायित्व और पारदर्शिता लाने की दिशा में एक प्रारंभिक कदम था।

 

Question 17. प्रान्तीय विधान परिषदों में गैर सरकारी सदस्य कितने प्रकार के होते थे?
Answer: प्रान्तीय विधान परिषद में गैर-सरकारी सदस्य चार प्रकार के होते थे:
1. पदेन सदस्य
2. मनोनीत सरकारी सदस्य
3. मनोनीत गैर सरकारी सदस्य
4. निर्वाचित सदस्य।
In simple words: प्रान्तीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्य चार तरह के होते थे, जिनमें पद के अनुसार, सरकार द्वारा चुने गए, सरकार द्वारा चुने गए पर गैर-सरकारी, और चुनाव से चुने गए सदस्य शामिल थे।

🎯 Exam Tip: इन चार श्रेणियों को याद रखना 1909 के अधिनियम के तहत प्रान्तीय विधान परिषदों की जटिल संरचना को समझने में मदद करता है।

 

Question 18. कौन से अधिनियम में जनता को सीमित एवं पक्षपातपूर्ण मताधिकार दिया गया?
Answer: भारतीय परिषद् अधिनियम 1909 में जनता को सीमित एवं पक्षपातपूर्ण मताधिकार दिया गया। यह मताधिकार केवल कुछ विशेष वर्गों के लोगों को ही प्राप्त था।
In simple words: 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम में वोट देने का अधिकार बहुत ही कम लोगों को मिला था और यह भेदभावपूर्ण था।

🎯 Exam Tip: 'सीमित' और 'पक्षपातपूर्ण' शब्द 1909 के मताधिकार की मुख्य विशेषताएँ थीं।

 

Question 19. 1909 के भारतीय परिषद् अधिनियम की कोई दो विशेषताएँ बताइए।
Answer: 1909 के भारतीय परिषद् अधिनियम की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. केन्द्रीय विधान परिषद में सुधार किए गए।
2. कार्यकारी परिषदों का विस्तार किया गया।
In simple words: 1909 के अधिनियम ने केन्द्रीय विधान परिषद और कार्यकारी परिषदों में बदलाव किए, जिससे उनमें भारतीयों की भागीदारी बढ़ी।

🎯 Exam Tip: 1909 के अधिनियम ने ब्रिटिश शासन में भारतीयों को प्रतिनिधित्व देने की शुरुआत की, हालाँकि यह अभी भी सीमित था।

 

Question 20. 1999 के भारतीय परिषद अधिनियम के कोई दो दोष लिखिए।
Answer: 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम के दो प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं:
1. साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का आरम्भ किया गया।
2. केन्द्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत था।
In simple words: 1909 के अधिनियम में साम्प्रदायिक चुनाव और केन्द्रीय विधान परिषद में सरकार का ज़्यादा बोलबाला दो मुख्य कमियाँ थीं।

🎯 Exam Tip: हमेशा अधिनियम की कमियों और विशेषताओं को याद रखें, क्योंकि वे अक्सर सीधे प्रश्न के रूप में पूछे जाते हैं। (नोट: प्रश्न में 1999 की जगह 1909 होना चाहिए।)

 

Question 21. मॉटेग्यू - चेम्सफोर्ड रिपोर्ट का सम्बन्ध किस भारतीय शासन अधिनियम से था?
Answer: मॉटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट का सम्बन्ध भारतीय शासन अधिनियम, 1919 से था। यह रिपोर्ट इस अधिनियम का आधार बनी।
In simple words: मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट भारतीय शासन अधिनियम, 1919 से जुड़ी है।

🎯 Exam Tip: 'मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार' 1919 के अधिनियम का दूसरा नाम है, जिसे याद रखना आसान होता है।

 

Question 23. 1919 के अधिनियम की प्रस्तावना के कोई दो बिन्दु लिखिए।
Answer: 1919 के अधिनियम की प्रस्तावना के दो प्रमुख बिन्दु इस प्रकार हैं:
1. प्रशासन में भारतीयों का सम्पर्क बढ़ाया जाएगा।
2. स्वशासन की संस्थाओं का विकास किया जाएगा।
In simple words: 1919 के अधिनियम का मकसद भारतीयों को प्रशासन में ज़्यादा शामिल करना और उन्हें अपने शासन की संस्थाएँ बनाने में मदद करना था।

🎯 Exam Tip: अधिनियम की प्रस्तावना उसके उद्देश्यों और लक्ष्यों को दर्शाती है, इसलिए उसके मुख्य बिन्दुओं को जानना महत्वपूर्ण है।

 

Question 24. गृह शासन और भारत परिषद में परिवर्तन किस अधिनियम के तहत किया गया?
Answer: गृह शासन और भारत परिषद में परिवर्तन भारतीय शासन अधिनियम, 1919 के तहत किया गया। इस अधिनियम ने भारत सचिव और भारत परिषद की भूमिकाओं में बदलाव किए।
In simple words: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम से गृह शासन और भारत परिषद में बदलाव हुए।

🎯 Exam Tip: 1919 का अधिनियम भारत और ब्रिटेन के बीच के प्रशासनिक सम्बन्धों को नया आकार देने वाला था।

 

Question 25. भारतीय उपनिवेश के मामलों को देखने के लिए ब्रिटेन स्थित मन्त्रिमण्डल में एक मन्त्री होता था। उसे किस नाम से जाना जाता था?
Answer: ब्रिटेन स्थित मन्त्रिमण्डल में भारतीय उपनिवेश के मामलों को देखने वाले मन्त्री को भारत सचिव के नाम से जाना जाता था। यह पद बहुत महत्वपूर्ण था।
In simple words: ब्रिटेन में भारत के मामलों को देखने वाले मन्त्री को भारत सचिव कहते थे।

🎯 Exam Tip: भारत सचिव का पद ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य होता था और भारत के प्रशासन पर उसका सीधा नियन्त्रण होता था।

 

Question 26. भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलनकारी भारत परिषद की समाप्ति की माँग क्यों कर रहे थे?
Answer: भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलनकारी भारत परिषद की समाप्ति की माँग इसलिए कर रहे थे क्योंकि भारत परिषद पर होने वाला सारा खर्च भारत के खजाने से वसूला जाता था। उन्हें यह एक अनावश्यक बोझ लगता था।
In simple words: भारत परिषद का सारा खर्च भारत के लोग उठाते थे, इसलिए स्वतन्त्रता आन्दोलनकारी इसे खत्म करना चाहते थे।

🎯 Exam Tip: 'व्यय का बोझ' एक प्रमुख आर्थिक कारण था जिसके चलते राष्ट्रवादी ब्रिटिश संस्थाओं का विरोध करते थे।

 

Question 27. भारतीय प्रशासन पर गृह सरकार के नियन्त्रण में कमी किस अधिनियम के तहत की गयी?
Answer: भारतीय प्रशासन पर गृह सरकार के नियन्त्रण में कमी भारत परिषद अधिनियम, 1919 के तहत की गयी। इस अधिनियम ने कुछ प्रान्तीय विषयों पर ब्रिटिश सरकार का नियन्त्रण कम किया।
In simple words: गृह सरकार का नियन्त्रण 1919 के भारतीय शासन अधिनियम से कुछ कम किया गया था।

🎯 Exam Tip: 1919 के अधिनियम ने भारत सचिव की शक्तियाँ कुछ कम कीं, खासकर हस्तान्तरित विषयों के मामले में।

 

Question 28. किस अधिनियम के द्वारा प्रान्तों में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित किया गया?
Answer: प्रान्तों में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन 1919 के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया। इस व्यवस्था को द्वैध शासन कहा गया।
In simple words: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम ने प्रान्तों में कुछ हद तक ज़िम्मेदार सरकार की शुरुआत की।

🎯 Exam Tip: 'आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन' प्रान्तों में द्वैध शासन का ही दूसरा नाम है।

 

Question 31. 1919 के अधिनियम द्वारा केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद में किए गए दो प्रमुख सुधारों को लिखिए।
Answer: 1919 के अधिनियम द्वारा केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद में किए गए दो प्रमुख सुधार निम्नलिखित हैं:
1. कार्यकारी परिषद पर से सदस्यों की संख्या सम्बन्धी पहले के सभी प्रतिबन्ध हटा दिए गए।
2. 10 वर्ष का अनुभव रखने वाले भारतीय उच्च न्यायालय के वकीलों को परिषद का कानूनी सदस्य बनने के योग्य माना गया।
In simple words: 1919 के अधिनियम ने कार्यकारी परिषद के सदस्यों की संख्या पर लगी रोक हटा दी और अनुभवी भारतीय वकीलों को उसका सदस्य बनने का मौका दिया।

🎯 Exam Tip: ये सुधार भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी देने के उद्देश्य से किए गए थे।

 

Question 32. 1919 के अधिनियम के तहत केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद के कानूनी सदस्य बनने वाले प्रथम भारतीय कौन थे?
Answer: 1919 के अधिनियम के तहत केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद के कानूनी सदस्य बनने वाले प्रथम भारतीय तेजबहादुर सप्रू थे।
In simple words: तेजबहादुर सप्रू 1919 के अधिनियम के बाद केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद के पहले भारतीय कानूनी सदस्य बने।

🎯 Exam Tip: तेजबहादुर सप्रू का नाम कानूनी विशेषज्ञ और उदारवादी नेता के रूप में याद रखें।

 

Question 33. 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के तहत स्थापित द्विसदनीय केन्द्रीय विधानमण्डल के सदनों का नाम लिखिए।
Answer: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के तहत स्थापित द्विसदनीय केन्द्रीय विधानमण्डल के दो सदन थे:
1. विधानसभा
2. राज्य परिषद।
In simple words: 1919 के अधिनियम से केन्द्र में दो तरह की विधायिकाएँ बनीं- विधानसभा और राज्य परिषद।

🎯 Exam Tip: विधानसभा निचले सदन के रूप में और राज्य परिषद ऊपरी सदन के रूप में कार्य करती थी, जो आज के लोकसभा और राज्यसभा के समान है।

 

Question 34. 1919 के अधिनियम के तहत गठित राज्य परिषद की सदस्य संख्या बताइए।
Answer: 1919 के अधिनियम के तहत गठित राज्य परिषद की अधिकतम सदस्य संख्या 60 थी। इन सदस्यों में से कुछ चुने हुए और कुछ वायसराय द्वारा मनोनीत होते थे।
In simple words: 1919 के अधिनियम में राज्य परिषद में ज़्यादा से ज़्यादा 60 सदस्य हो सकते थे।

🎯 Exam Tip: विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या के आँकड़े अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।

 

Question 35. 1919 के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा विधान सभा एवं राज्य परिषद का कार्यकाल कितने वर्ष तय किया गया?
Answer: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा विधान सभा का कार्यकाल 3 वर्ष और राज्य परिषद का कार्यकाल 5 वर्ष तय किया गया। ये निश्चित कार्यकाल थे।
In simple words: 1919 के अधिनियम में विधानसभा 3 साल के लिए और राज्य परिषद 5 साल के लिए बनी थी।

🎯 Exam Tip: दोनों सदनों के कार्यकाल की अवधि को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये उनकी संरचना का हिस्सा थे।

 

Question 37. किस अधिनियम द्वारा विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा दिया गया?
Answer: विकेन्द्रीकरण को भारतीय शासन अधिनियम, 1919 के द्वारा बढ़ावा दिया गया। इस अधिनियम ने प्रशासन और राजस्व के कुछ विषयों को केन्द्रीय नियन्त्रण से हटाकर प्रान्तीय सरकारों को दे दिया।
In simple words: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम ने चीज़ों को ज़्यादा बाँटकर प्रशासन को और विकेन्द्रीकृत किया।

🎯 Exam Tip: विकेन्द्रीकरण का अर्थ है सत्ता का केन्द्रीय सरकार से निचले स्तरों पर हस्तान्तरण, जिससे स्थानीय स्तर पर शासन प्रभावी हो सके।

 

Question 38. नरेश मण्डल की स्थापना का सुझाव किस रिपोर्ट में दिया गया था?
Answer: नरेश मण्डल की स्थापना का सुझाव मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में दिया गया था। इस रिपोर्ट में देशी रियासतों के महत्व को स्वीकार किया गया था।
In simple words: मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने नरेश मण्डल बनाने की सलाह दी थी।

🎯 Exam Tip: नरेश मण्डल देशी राजाओं को ब्रिटिश सरकार के साथ बातचीत करने का एक मंच प्रदान करने के लिए बनाया गया था।

 

Question 39. 1919 के अधिनियम द्वारा स्थापित दो केन्द्रीय विषयों का नाम लिखिए।
Answer: 1919 के अधिनियम द्वारा स्थापित दो केन्द्रीय विषय निम्नलिखित हैं:
1. सेना
2. रेल।
In simple words: 1919 के अधिनियम के तहत सेना और रेल जैसे बड़े मुद्दे केन्द्र सरकार के पास थे।

🎯 Exam Tip: केन्द्रीय विषय वे थे जो पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण थे और जिन पर केन्द्र सरकार का नियन्त्रण रहता था।

 

Question 40. 1919 के अधिनियम द्वारा प्रान्तों के अन्तर्गत रखे गए किन्हीं दो विषयों का नाम लिखिए।
Answer: 1919 के अधिनियम द्वारा प्रान्तों के अन्तर्गत रखे गए किन्हीं दो विषयों के नाम निम्नलिखित हैं:
1. स्थानीय स्वशासन
2. सिंचाई
In simple words: प्रान्तों में स्थानीय स्वशासन और सिंचाई जैसे विषय थे जिन पर प्रान्तीय सरकारें काम करती थीं।

🎯 Exam Tip: प्रान्तीय विषय वे थे जो क्षेत्रीय महत्व के थे और जिन पर प्रान्तीय सरकारों का नियन्त्रण होता था।

 

Question 41. साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की आलोचना किस रिपोर्ट में की गयी?
Answer: साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की आलोचना मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में की गयी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि यह प्रणाली देश के लिए हानिकारक है।
In simple words: मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को गलत बताया गया था।

🎯 Exam Tip: मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की निन्दा की, लेकिन 1919 के अधिनियम में इसे खत्म नहीं किया गया।

 

Question 44. किस अधिनियम द्वारा 10 वर्ष पश्चात् एक रॉयल कमीशन की नियुक्ति का प्रावधान किया गया?
Answer: 10 वर्ष पश्चात् एक रॉयल कमीशन की नियुक्ति का प्रावधान भारतीय शासन अधिनियम, 1919 के द्वारा किया गया। इस कमीशन का उद्देश्य अधिनियम के काम-काज की समीक्षा करना था।
In simple words: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम में कहा गया था कि 10 साल बाद एक रॉयल कमीशन बनेगा।

🎯 Exam Tip: यह प्रावधान ब्रिटिश सरकार की अधिनियम की सफलता का मूल्यांकन करने की इच्छा को दर्शाता है।

 

Question 45. भारत शासन अधिनियम, 1919 द्वारा लागू दो महत्वपूर्ण परिवर्तन क्या थे?
Answer: भारत शासन अधिनियम, 1919 द्वारा लागू दो महत्वपूर्ण परिवर्तन निम्नलिखित थे:
1. केन्द्र तथा प्रान्तों के मध्य शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया।
2. भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना हेतु प्रान्तों में द्वैध शासन प्रणाली लागू की गयी।
In simple words: 1919 के अधिनियम ने केन्द्र और प्रान्तों के बीच काम बाँट दिए और प्रान्तों में द्वैध शासन शुरू किया, जिससे कुछ हद तक ज़िम्मेदार सरकार बनी।

🎯 Exam Tip: शक्तियों का विभाजन और प्रान्तों में द्वैध शासन 1919 के अधिनियम की दो सबसे बड़ी पहचान थीं।

 

Question 46. 1919 के अधिनियम के अन्तर्गत साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार किन-किन समुदायों तक किया गया?
Answer: 1919 के अधिनियम के अन्तर्गत साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार मुसलमानों के साथ-साथ सिखों, यूरोपियनों, एंग्लो-इण्डियन व भारतीय ईसाई, जमींदार व व्यापार मण्डल तक किया गया।
In simple words: 1919 के अधिनियम से साम्प्रदायिक चुनाव का अधिकार मुसलमानों के अलावा सिख, यूरोपीय, एंग्लो-इण्डियन, ईसाई, जमींदार और व्यापारी समूहों को भी मिला।

🎯 Exam Tip: 1919 के अधिनियम ने साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व को और अधिक समुदायों तक फैलाकर 'फूट डालो और राज करो' की नीति को मज़बूती दी।

 

Question 47. भारतीय प्रान्तों में द्वैध शासन को कब लागू किया गया?
Answer: भारतीय प्रान्तों में द्वैध शासन को 1 अप्रैल, 1921 को लागू किया गया। यह व्यवस्था 1919 के अधिनियम का हिस्सा थी।
In simple words: द्वैध शासन 1 अप्रैल, 1921 से भारतीय प्रान्तों में शुरू हुआ।

🎯 Exam Tip: तारीखें अक्सर महत्वपूर्ण होती हैं, इसलिए इस अधिनियम के लागू होने की सटीक तारीख याद रखें।

 

Question 48. भारत के कौन-कौन से प्रान्तों में द्वैध शासन लागू किया गया?
Answer: भारत के आठ प्रान्तों-बंगाल, आसाम, बिहार, मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत एवं पंजाब में द्वैध शासन लागू किया गया। यह एक विस्तृत व्यवस्था थी।
In simple words: द्वैध शासन भारत के आठ प्रान्तों-बंगाल, आसाम, बिहार, मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत और पंजाब में लागू हुआ था।

🎯 Exam Tip: प्रमुख प्रान्तों के नाम याद रखें जहाँ द्वैध शासन लागू हुआ था, क्योंकि यह अधिनियम की पहुँच को दर्शाता है।

 

Question 51. द्वैध शासन की असफलता के कोई दो कारण लिखिए।
Answer: द्वैध शासन की असफलता के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. विषयों का अविवेकपूर्ण व अव्यावहारिक विभाजन
2. गवर्नर की स्वेच्छाचारी शक्तियाँ।
In simple words: द्वैध शासन इसलिए असफल रहा क्योंकि विषयों को सही ढंग से नहीं बांटा गया था और गवर्नर के पास बहुत ज़्यादा मनमानी करने की शक्तियाँ थीं।

🎯 Exam Tip: द्वैध शासन की कमियाँ उसके खराब डिज़ाइन और गवर्नर के अत्यधिक अधिकारों में निहित थीं।

 

Question 52. भारतीय शासन अधिनियम, 1919 की कोई दो कमियाँ बताइए।
Answer: भारतीय शासन अधिनियम, 1919 की दो प्रमुख कमियाँ निम्नलिखित हैं:
1. प्रान्तों में प्रस्तावित द्वैध शासन की योजना सन्तोषप्रद नहीं होना।
2. साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का अनुचित विस्तार।
In simple words: 1919 के अधिनियम की दो बड़ी कमियाँ यह थीं कि प्रान्तों में द्वैध शासन ठीक से काम नहीं कर पाया और साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली को बेवजह बढ़ा दिया गया।

🎯 Exam Tip: अधिनियम की कमियाँ अक्सर इसके आलोचकों द्वारा उजागर की जाती हैं और इसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझने में मदद करती हैं।

 

Question 53. 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के कोई दो महत्व बताइए।
Answer: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के दो महत्व निम्नलिखित हैं:
1. प्रान्तों के क्षेत्र में सर्वप्रथम उत्तरदायी शासन की दिशा में शुभारम्भ किया गया।
2. केन्द्र व प्रान्तों के विधान मण्डलों के विस्तार के साथ-साथ उनमें सुधार का प्रयास किया गया।
In simple words: 1919 के अधिनियम का महत्व यह था कि इसने प्रान्तों में पहली बार ज़िम्मेदार सरकार की शुरुआत की और विधानमंडलों में भी सुधार किए।

🎯 Exam Tip: 1919 का अधिनियम भारत में संवैधानिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसने भविष्य के सुधारों की नींव रखी।

 

Question 1. भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 को मार्ले-मिण्टो सुधार क्यों कहते हैं ?
Answer: भारत में बढ़ते स्वतन्त्रता आन्दोलन के दबाव के कारण, तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिण्टो ने ब्रिटिश सरकार को एक रिपोर्ट भेजी। इस रिपोर्ट के आधार पर भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने एक विधेयक तैयार किया। इस विधेयक को 17 फरवरी, 1909 को ब्रिटिश संसद के निचले सदन (कॉमन सभा) में पेश किया गया। क्योंकि इस अधिनियम के निर्माण और कार्यान्वयन में लॉर्ड मार्ले (भारत सचिव) और लॉर्ड मिण्टो (वायसराय) की मुख्य भूमिका थी, इसलिए इसे 'मार्ले-मिण्टो सुधार' कहा जाता है।
In simple words: 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम को मार्ले-मिण्टो सुधार कहते हैं क्योंकि इसे बनाने और लागू करने में भारत सचिव लॉर्ड मार्ले और वायसराय लॉर्ड मिण्टो का बहुत बड़ा योगदान था।

🎯 Exam Tip: अधिनियमों को अक्सर उनके पीछे के प्रमुख व्यक्तियों के नाम पर रखा जाता है, जो उनके योगदान को दर्शाता है।

 

Question 3. भारत शासन अधिनियम, 1919 के प्रावधानों की व्याख्या कीजिए और उनके महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
Answer: भारत शासन अधिनियम, 1919 के मुख्य प्रावधान और उनका महत्व इस प्रकार था: 1. गृह शासन और भारत परिषद में बदलाव: भारतीय उपनिवेश के मामलों को देखने के लिए ब्रिटेन में एक मंत्री होता था, जिसे भारत सचिव कहते थे। उसकी एक परिषद भी थी, जिसे भारत परिषद कहा जाता था। इस परिषद के खर्च का बोझ भारत पर पड़ता था, इसलिए भारतीय स्वतंत्रता सेनानी इसे खत्म करने की मांग कर रहे थे। इस अधिनियम में इसे पूरी तरह खत्म तो नहीं किया गया, लेकिन इसकी संरचना में कुछ बदलाव किए गए। अब भारत परिषद में कम से कम 8 और अधिक से अधिक 12 सदस्य हो सकते थे (पहले यह संख्या 12 से 14 थी)। 2. भारतीय प्रशासन पर गृह सरकार का नियंत्रण कम होना: प्रांतीय स्तर पर 'रक्षित' विषयों और केंद्रीय स्तर पर सभी विषयों पर भारत सचिव (इंग्लैंड में मंत्री) का नियंत्रण पहले जैसा ही रहा। 'हस्तांतरित' विषयों के मामलों में प्रांतों को कुछ प्रशासनिक छूट दी गई। भारत सचिव ब्रिटिश साम्राज्य के हितों, केंद्रीय विषयों के प्रशासन और अपने खास अधिकारों की रक्षा के लिए ही हस्तक्षेप कर सकता था। इस अधिनियम से यह उम्मीद थी कि धीरे-धीरे यह हस्तक्षेप कम हो जाएगा। 3. प्रांतों में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन या द्वैध शासन की शुरुआत: 1919 के अधिनियम के तहत प्रांतों में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन लागू किया गया। प्रांतीय शासन को दो हिस्सों में बांटा गया। 4. प्रांतीय कार्यकारिणी परिषद में भारतीयों का अधिक प्रतिनिधित्व: इस अधिनियम के तहत 'रक्षित' क्षेत्रों का प्रशासन गवर्नर को सौंपा गया था। हालांकि, प्रांतीय कार्यकारिणी परिषदों में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई। इन सदस्यों की नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा भारत मंत्री की सिफारिश पर की जाती थी। 5. प्रांतीय विधान परिषदों का पुनर्गठन: इस अधिनियम ने 'विनियम' और 'अविनियमन' प्रांतों के भेद को खत्म करके एक ही तरह के प्रांत बनाए। इस अधिनियम से विधान परिषदों को अधिक लोकतांत्रिक बनाया गया, क्योंकि निर्वाचित सदस्यों का बहुमत रखा गया और उनके अधिकार भी बढ़ाए गए। 6. केंद्र में अनुत्तरदायी शासन: इस अधिनियम से प्रांतों में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन शुरू किया गया, लेकिन केंद्रीय शासन पहले की तरह केंद्रीय विधान परिषद के नियंत्रण से मुक्त नहीं था। शासन को प्रभावित करने के लिए विधानसभा का विस्तार तो किया गया, लेकिन गवर्नर-जनरल की शक्तियां भी बढ़ा दी गईं। इसलिए वह विधानसभा की सहमति के बिना भी महत्वपूर्ण काम कर सकता था। इस तरह, केंद्रीय विधानसभा के सदस्यों की संख्या बढ़ने के बावजूद केंद्र में अनुत्तरदायी शासन बना रहा। 7. केंद्रीय कार्यकारिणी परिषद में अधिक भारतीयों की नियुक्ति: गवर्नर-जनरल को पहले की तरह निरंकुश और मनमानी शक्तियां मिली रहीं, लेकिन कार्यकारिणी परिषद में कुछ सुधार किए गए। पहला, कार्यकारिणी सदस्यों की संख्या संबंधी प्रतिबंध हटा दिया गया। दूसरा, भारतीय उच्च न्यायालयों के उन वकीलों को जो दस साल से काम कर रहे थे, परिषद का विधि सदस्य बनने योग्य माना गया। तीसरा, कार्यकारिणी परिषद में भारतीय सदस्यों की संख्या एक से बढ़ाकर तीन कर दी गई। हालांकि, ये सदस्य जनता के प्रतिनिधि नहीं बल्कि सरकार के समर्थक होते थे और उन्हें कम महत्वपूर्ण विभाग दिए जाते थे। 8. द्विसदनात्मक केंद्रीय विधानमंडल: इस अधिनियम से केंद्र में एक सदनात्मक विधानमंडल की जगह द्विसदनात्मक विधानमंडल स्थापित किया गया। इन सदनों को केंद्रीय विधानसभा और राज्य परिषद नाम दिया गया। 9. विकेंद्रीकरण को बढ़ावा: इस अधिनियम से प्रशासन और राजस्व के कुछ विषयों का विकेंद्रीकरण किया गया। प्रांतों को पहली बार कर्ज लेने और टैक्स लगाने का अधिकार भी दिया गया। 10. मताधिकार और निर्वाचन: इस अधिनियम से मताधिकार में वृद्धि की गई, जिससे लगभग 10 प्रतिशत जनता को वोट देने का अधिकार मिला। 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम ने केवल मुसलमानों को अलग निर्वाचन का अधिकार दिया था, लेकिन इस अधिनियम से सिखों, ईसाइयों, यूरोपियनों और एंग्लो-भारतीयों को भी अलग निर्वाचन का अधिकार दिया गया। 11. शक्ति विभाजन: 1919 के अधिनियम से केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच शक्तियों का बंटवारा किया गया। जो विषय पूरे भारत या अंतर्राज्यीय हितों से संबंधित थे, वे केंद्र के अधीन रखे गए, और जो विषय प्रांतीय हितों (स्थानीय महत्व) से संबंधित थे, वे प्रांतों के अधीन रखे गए।
In simple words: 1919 के अधिनियम ने भारत में ब्रिटिश शासन के कई नियमों को बदला। इसने प्रांतीय सरकारों को थोड़ी ज़्यादा ताकत दी, भारतीयों को ज़्यादा वोट देने का अधिकार मिला, और केंद्र में दो तरह की विधान सभाएं बनाईं, जिससे लोग अपने प्रतिनिधियों को चुन सकें।

🎯 Exam Tip: इस अधिनियम के मुख्य प्रावधानों को बिंदुवार याद रखें, खासकर द्वैध शासन प्रणाली और मताधिकार में हुए बदलावों पर ध्यान दें।

 

Question 7. 1909 के भारत परिषद अधिनियम के प्रमुख दोष बताइए।
Answer: 1909 के भारत परिषद अधिनियम के प्रमुख दोष निम्नलिखित थे: 1. सांप्रदायिक और पृथक निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत: इस नियम ने मुसलमानों और अन्य वर्गों के लिए अलग चुनाव की व्यवस्था की, जिससे समाज में बंटवारा शुरू हो गया। 2. विधान परिषदों की सीमित शक्तियां और सरकारी बहुमत: परिषदों को बहुत कम अधिकार दिए गए थे, और सरकार के पास हमेशा बहुमत रहता था। 3. केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत: केंद्र में भी सरकारी सदस्यों का बहुमत था, जिससे गैर-सरकारी सदस्यों की आवाज कमजोर हो जाती थी। 4. प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत मात्र दिखावा: प्रांतों में भले ही गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत दिखाया गया, लेकिन असल में उनके पास कोई खास शक्ति नहीं थी। 5. सीमित और पक्षपातपूर्ण मताधिकार: वोट देने का अधिकार बहुत कम लोगों को और पक्षपातपूर्ण तरीके से दिया गया था। 6. उत्तरदायी शासन की स्थापना का प्रयास न करना: इस अधिनियम का उद्देश्य भारत में उत्तरदायी सरकार बनाना नहीं था। 7. निहित स्वार्थों को अनावश्यक प्रोत्साहन और महत्व: जमींदारों और व्यापार मंडलों जैसे कुछ खास समूहों को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया था।
In simple words: 1909 के अधिनियम में कई कमियां थीं, जैसे लोगों को बांटने वाले चुनाव, सरकारी सदस्यों का ज्यादा प्रभाव, और बहुत कम लोगों को वोट देने का अधिकार।

🎯 Exam Tip: 1909 के अधिनियम के दोषों को याद करते समय, सांप्रदायिक निर्वाचन और सीमित मताधिकार जैसे प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान दें, क्योंकि ये सबसे महत्वपूर्ण आलोचनाएं थीं।

 

Question 8. साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का प्रारम्भ 1909 के भारत परिषद अधिनियम का सर्वाधिक बड़ा दोष था। स्पष्ट कीजिए।
Answer: 1909 के भारत परिषद अधिनियम का सबसे बड़ा दोष सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत करना था। इस प्रणाली से विभिन्न हित समूहों और वर्गों को अलग से चुनाव लड़ने का अधिकार दिया गया। मुसलमानों, वाणिज्य संघों और जमींदारों के लिए सीटें आरक्षित की गईं, और इन सीटों की संख्या उनकी जाति की आबादी के अनुपात से भी अधिक थी। इससे समाज में सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला और धर्मनिरपेक्षता को भारी नुकसान पहुंचा। आखिरकार, इसी प्रणाली ने भारत के विभाजन की मांग के लिए रास्ता तैयार कर दिया। कुछ समय बाद, पंजाब में सिखों, मद्रास में गैर-ब्राह्मणों और एंग्लो-भारतीयों ने भी अलग निर्वाचन की मांग शुरू कर दी। भारत सचिव मार्ले ने वायसराय लॉर्ड मिंटो को एक पत्र में लिखा था कि, "याद रखना, पृथक निर्वाचन क्षेत्र बनाकर हम ऐसे घातक विष के बीज बो रहे हैं, जिनकी फसल बहुत कड़वी होगी।"
In simple words: 1909 का अधिनियम इसलिए बुरा था क्योंकि इसने अलग-अलग धर्मों के लोगों को अलग-अलग वोट देने का अधिकार दिया। इससे लोग बंट गए और आगे चलकर देश के विभाजन की नींव रखी गई।

🎯 Exam Tip: सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली के दोषों को स्पष्ट करते समय, यह बताएं कि इसने कैसे समाज को बांटा और भारत के विभाजन में भूमिका निभाई। मार्ले का कथन एक महत्वपूर्ण बिंदु है।

 

Question 9. आप किस आधार पर कह सकते हैं कि 1909 के अधिनियम द्वारा विधान परिषदों की शक्तियाँ सीमित कर दी गयीं? स्पष्ट कीजिए।
Answer: 1909 के अधिनियम में विधान परिषदों की शक्तियां कई कारणों से सीमित कर दी गई थीं: 1. विधान परिषदों में सरकारी सदस्यों का बहुमत होने के कारण वे सरकार के खिलाफ कोई प्रस्ताव पारित नहीं कर सकते थे। 2. सदस्यों को जनहित के मुद्दों पर प्रस्ताव पारित करने का अधिकार था, लेकिन सरकार उन्हें माने या न माने, यह सरकार की इच्छा पर निर्भर करता था। 3. वायसराय और गवर्नरों के पास कई मनमानी शक्तियां थीं, जिससे वे किसी भी निर्णय को बदल सकते थे। 4. विधान परिषदों की शक्तियों पर कई कानूनी प्रतिबंध भी लगाए गए थे।
In simple words: 1909 के अधिनियम ने विधान परिषदों की ताकत कम कर दी थी क्योंकि सरकार का बहुमत था, उनके पास कम अधिकार थे, और वायसराय व गवर्नरों की मनमानी चलती थी।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर देते समय, उन विशिष्ट बिंदुओं को उजागर करें जो दिखाते हैं कि परिषदों की शक्तियां केवल नाममात्र की थीं, खासकर सरकारी बहुमत और गवर्नर की मनमानी शक्तियों के संदर्भ में।

 

Question 10. '1909 के अधिनियम में प्रान्तीय विधान परिषदों में गैर सरकारी सदस्यों का बहुमत मात्र दिखावा था।' कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: यह कथन सही है कि 1909 के अधिनियम में प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत सिर्फ दिखावा था। सिद्धांत रूप से, प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत स्थापित किया गया था, लेकिन व्यवहार में स्थिति बिल्कुल अलग थी। गैर-सरकारी सदस्य दो प्रकार के होते थे: मनोनीत और निर्वाचित। मनोनीत और सरकारी सदस्य हमेशा सरकार का साथ देते थे। निर्वाचित गैर-सरकारी सदस्य कई वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे, जिससे सरकार के खिलाफ उनका एकजुट होना मुश्किल था। गवर्नरों को कई विषयों पर 'वीटो' (अस्वीकृति) की शक्तियां मिली थीं। इस कारण गैर-सरकारी बहुमत का कोई वास्तविक महत्व नहीं था।
In simple words: 1909 के अधिनियम में प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत सिर्फ कहने भर को था। असल में, मनोनीत सदस्य और सरकारी सदस्य हमेशा सरकार का समर्थन करते थे, और गवर्नर के पास वीटो की शक्ति थी, जिससे गैर-सरकारी बहुमत बेअसर हो जाता था।

🎯 Exam Tip: यह समझाने के लिए कि बहुमत सिर्फ दिखावा था, मनोनीत और सरकारी सदस्यों की भूमिका तथा गवर्नर के वीटो पावर पर जोर दें।

 

Question 11. '1909 के अधिनियम में जनता को प्रदत्त मताधिकार सीमित व पक्षपातपूर्ण था।' इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: यह कथन सही है कि 1909 के अधिनियम में जनता को दिया गया मताधिकार सीमित और पक्षपातपूर्ण था। मुसलमानों में मध्यम वर्ग के जमींदारों, व्यापारियों और स्नातकों को वोट देने का अधिकार दिया गया, लेकिन इस श्रेणी के गैर-मुसलमानों को मताधिकार से वंचित रखा गया। उदाहरण के लिए, पूर्वी बंगाल में उसी हिंदू को वोट दिया गया जिसकी वार्षिक आय Rs 5000 थी, जबकि Rs 750 वार्षिक राजस्व देने वाले मुसलमान को भी वोट का अधिकार मिला। हिंदू बहुल प्रांतों में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को विशेष प्रतिनिधित्व दिया गया, लेकिन मुस्लिम बहुल प्रांतों जैसे पंजाब, पूर्वी बंगाल और असम में हिंदुओं को ऐसा प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि मताधिकार में समानता नहीं थी। वोट देने का अधिकार हर प्रांत, हर वर्ग और हर धर्म के लोगों को पक्षपातपूर्ण ढंग से दिया गया था। मतदाताओं की संख्या बहुत सीमित थी। महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं दिया गया था। जमींदारों और वाणिज्य मंडल जैसे विशिष्ट हित समूहों और वर्गों को यह अनावश्यक रूप से दिया गया था।
In simple words: 1909 के अधिनियम में वोट देने का अधिकार बहुत कम लोगों को मिला था और यह बहुत भेदभावपूर्ण था। इसमें धर्म, आय और वर्ग के आधार पर अलग-अलग नियम थे, जिससे बहुत से लोगों को वोट देने का मौका नहीं मिला।

🎯 Exam Tip: सीमित और पक्षपातपूर्ण मताधिकार को स्पष्ट करते समय, विभिन्न वर्गों और धर्मों के लिए अलग-अलग पात्रता मानदंडों के उदाहरणों का उपयोग करें। यह बताएं कि महिलाओं और गरीब लोगों को इससे कैसे बाहर रखा गया।

 

Question 13. भारतीय शासन अधिनियम, 1919 की प्रस्तावना का उल्लेख कीजिए।
Answer: भारतीय शासन अधिनियम, 1919 की प्रस्तावना में ये मुख्य बातें कही गई थीं: 1. भारत ब्रिटिश साम्राज्य का एक अविभाज्य अंग बना रहेगा। 2. प्रशासन में भारतीयों का जुड़ाव बढ़ाया जाएगा। 3. भारत में ब्रिटिश नीति का लक्ष्य उत्तरदायी शासन स्थापित करना होगा। 4. स्वशासन की संस्थाओं का विकास किया जाएगा। 5. उत्तरदायी शासन और स्वशासन की संस्थाओं की स्थापना धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से होगी। 6. कितनी प्रगति होगी, इसका निर्णय ब्रिटेन की संसद द्वारा किया जाएगा। 7. प्रांतीय मामलों में, प्रांतीय सरकारों को केंद्रीय नियंत्रण से मुक्त रखने का भी प्रयास किया जाएगा।
In simple words: 1919 के अधिनियम की प्रस्तावना में कहा गया था कि भारत ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहेगा, भारतीयों का प्रशासन में योगदान बढ़ेगा, और धीरे-धीरे भारत में स्वशासन और उत्तरदायी सरकार स्थापित होगी।

🎯 Exam Tip: 1919 के अधिनियम की प्रस्तावना के मुख्य बिंदुओं को याद रखें, खासकर उत्तरदायी शासन और स्वशासन के विकास पर जोर दें।

 

Question 14. 1919 के भारत शासन अधिनियम द्वारा प्रान्तों में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन व द्वैध शासन की स्थापना किस प्रकार की गयी? अथवा प्रान्तों में द्वैध शासन को परिभाषित कीजिए।
Answer: 1919 के भारत शासन अधिनियम द्वारा प्रांतों में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित किया गया। प्रांतीय शासन को दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया: 'रक्षित' विषय (Reserved Subjects) और 'हस्तांतरित' विषय (Transferred Subjects)। 'रक्षित' विषयों पर गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद का नियंत्रण रहता था, जबकि 'हस्तांतरित' विषयों पर निर्वाचित मंत्रियों का नियंत्रण होता था। इस दोहरी व्यवस्था को ही द्वैध शासन कहते हैं।
In simple words: 1919 के अधिनियम ने प्रांतों में द्वैध शासन लागू किया, जिसमें सरकार को दो हिस्सों में बांट दिया गया: एक हिस्से पर गवर्नर और दूसरे पर भारतीय मंत्री शासन करते थे।

🎯 Exam Tip: द्वैध शासन को परिभाषित करते समय 'रक्षित' और 'हस्तांतरित' विषयों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 15. 1919 के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद में कौन-कौन से सुधार किए गए?
Answer: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा केंद्रीय कार्यकारिणी परिषद में निम्नलिखित सुधार किए गए: 1. कार्यकारी परिषद पर से पहले लगी संख्या संबंधी रोक हटा दी गई। 2. भारतीय उच्च न्यायालयों के उन वकीलों को, जिन्हें 10 वर्ष का अनुभव था, परिषद का कानूनी सदस्य बनने के योग्य माना गया। तेज बहादुर सप्रू ऐसे पहले भारतीय कानूनी सदस्य बने। 3. कार्यकारी परिषद में भारतीयों की संख्या एक से बढ़ाकर तीन कर दी गई, लेकिन ये सदस्य जनता के प्रतिनिधि नहीं बल्कि सरकार के समर्थक होते थे। इन्हें कम महत्वपूर्ण विभाग दिए जाते थे।
In simple words: 1919 के अधिनियम से केंद्रीय कार्यकारिणी परिषद में बदलाव हुए, जैसे संख्या पर लगी रोक हटाई गई, अनुभवी भारतीय वकीलों को सदस्य बनाया गया, और भारतीयों की संख्या बढ़कर तीन हो गई, हालांकि उनके अधिकार सीमित थे।

🎯 Exam Tip: केंद्रीय कार्यकारिणी परिषद में किए गए सुधारों को याद रखें, विशेष रूप से भारतीयों की बढ़ती संख्या और कानूनी सदस्यता के प्रावधान पर ध्यान दें।

 

Question 16. 1919 के भारतीय अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित द्विसदनीय केन्द्रीय विधान मण्डल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के तहत केंद्रीय स्तर पर एक सदनीय विधानमंडल को बदलकर द्विसदनीय विधानमंडल बनाया गया। इसमें दो सदन थे: 1. उच्च सदन (राज्य परिषद): इसमें 60 सदस्य होते थे, जिनमें से 33 निर्वाचित और 27 वायसराय द्वारा मनोनीत होते थे। 2. निम्न सदन (विधान सभा): इसमें 140 सदस्य होते थे (गठन के बाद यह संख्या 145 कर दी गई), जिनमें से 104 निर्वाचित (52 सामान्य, 32 सांप्रदायिक- 30 मुसलमान व 2 सिख, और 20 विशेष चुनाव क्षेत्रों- 7 जमींदार, 9 यूरोपियन और 4 व्यापार मंडल से) होते थे। विधान सभा का कार्यकाल 3 वर्ष और राज्य परिषद का कार्यकाल 5 वर्ष तय किया गया था। वायसराय को केंद्रीय विधानमंडल के किसी भी सदन को उसके कार्यकाल की समाप्ति से पहले भंग करने का अधिकार था। वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का हर सदस्य किसी न किसी सदन का सरकारी सदस्य होता था, और वह दोनों सदनों में उपस्थित होकर वाद-विवाद में भाग ले सकता था।
In simple words: 1919 के अधिनियम ने केंद्र में दो तरह की संसद बनाई - राज्य परिषद और विधानसभा। इसमें सदस्य चुने जाते थे और कुछ को वायसराय चुनते थे।

🎯 Exam Tip: द्विसदनीय विधानमंडल की संरचना, सदस्यों की संख्या और कार्यकाल को याद रखें। दोनों सदनों के नाम और उनके सदस्यों का चुनाव कैसे होता था, यह महत्वपूर्ण है।

 

Question 17. 1919 के अधिनियम ने किस प्रकार विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा दिया? बताइए।
Answer: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम ने केंद्रीयकरण की नीति को त्याग दिया। इस अधिनियम से प्रशासन और राजस्व के कुछ विषयों का विकेंद्रीकरण किया गया, जिसका अर्थ है कि उन्हें केंद्रीय सरकार के नियंत्रण से हटाकर प्रांतीय सरकार को दे दिया गया। प्रांतों को पहली बार कर्ज लेने और टैक्स लगाने का अधिकार भी दिया गया। प्रांतों में आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित करके भी विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दिया गया। इस प्रयास से प्रांतीय स्वायत्तता को बढ़ावा मिला। इस प्रकार 1919 के भारतीय शासन अधिनियम ने केंद्रीयकरण की उस नीति को समाप्त कर दिया जो वायसराय लॉर्ड कर्जन के समय चरम सीमा पर पहुंच गई थी।
In simple words: 1919 के अधिनियम ने प्रांतों को ज्यादा शक्तियां देकर विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दिया। इससे प्रांतों को अपने मामलों में फैसले लेने का अधिकार मिला और वे कर्ज लेकर टैक्स भी लगा सकते थे।

🎯 Exam Tip: विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देने में 1919 के अधिनियम की भूमिका को समझाते हुए, प्रांतों को दिए गए नए अधिकारों पर जोर दें।

 

Question 18. 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के अनुसार केन्द्रीय एवं प्रान्तीय सरकारों के मध्य शक्ति विभाजन को स्पष्ट कीजिए।
Answer: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के तहत केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया था। वे विषय जो पूरे भारत के हितों से संबंधित थे, उन्हें केंद्र के अधीन रखा गया था। इनमें सेना, रेल, डाक और तार, आयकर, रक्षा, मुद्रा, जहाजरानी व्यापार, दीवानी और फौजदारी कानून, धार्मिक मामले और अखिल भारतीय सार्वजनिक सेवाएं शामिल थीं। प्रांतों को वे विषय दिए गए जो मुख्य रूप से प्रांतों से संबंधित थे। इनमें स्थानीय स्वशासन, सार्वजनिक कार्य, शिक्षा, जन स्वास्थ्य और चिकित्सा, सिंचाई, अकाल पीड़ित सहायता, राजस्व, कृषि, जंगल, जेल, पुलिस और न्याय आदि का प्रबंधन और शासन का अधिकार शामिल था।
In simple words: 1919 के अधिनियम ने केंद्र और प्रांतों के बीच काम बांट दिया था। बड़े और महत्वपूर्ण विषय केंद्र को मिले, जबकि छोटे और स्थानीय विषय प्रांतों को दिए गए थे।

🎯 Exam Tip: शक्ति विभाजन को स्पष्ट करते समय, केंद्रीय और प्रांतीय विषयों के कुछ उदाहरण देना सहायक होगा।

 

Question 19. 1919 के अधिनियम के तहत स्थापित नरेश मण्डल के बारे में संक्षेप में बताइए।
Answer: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम के तहत नरेश मंडल की स्थापना की गई थी। मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में देशी राजाओं के महत्व को देखते हुए एक नरेश मंडल बनाने का सुझाव दिया गया था। 1919 का अधिनियम ब्रिटिश भारत तक ही सीमित था, और देशी राज्यों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया गया था। फिर भी, ब्रिटिश भारत के करीब लाने के लिए 9 फरवरी, 1921 को दिल्ली में एक नरेश मंडल की स्थापना की गई। इसका अध्यक्ष वायसराय होता था। यह केवल एक सलाहकारी संस्था थी। इस मंडल में कुल 121 सदस्य थे, जिनमें 109 बड़ी रियासतों के प्रतिनिधि और 12 छोटी रियासतों के प्रतिनिधि शामिल थे। यह मंडल देशी राज्यों की समस्याओं के बारे में ब्रिटिश सरकार को बताता था।
In simple words: 1919 के अधिनियम ने देशी राजाओं को सलाह देने के लिए 'नरेश मंडल' नाम की एक संस्था बनाई थी। वायसराय इसके प्रमुख थे, और यह राजाओं की समस्याओं को ब्रिटिश सरकार तक पहुंचाती थी।

🎯 Exam Tip: नरेश मंडल के उद्देश्य और संरचना को याद रखें। यह ध्यान दें कि यह केवल एक सलाहकारी संस्था थी।

 

Question 21. विषयों का अविवेकपूर्ण व अव्यावहारिक विभाजन किस प्रकार द्वैध शासन की असफलता का एक प्रमुख कारण बना? बताइए।
Answer: द्वैध शासन प्रणाली में प्रांतीय विषयों का विभाजन तर्कहीन, अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक था। विभागों का बंटवारा इस तरह किया गया था कि उसका कोई न कोई हिस्सा 'रक्षित' विभागों के अधीन रहता था। उदाहरण के लिए, शिक्षा एक 'हस्तांतरित' विषय था, लेकिन यूरोपीय और एंग्लो-भारतीयों की शिक्षा एक 'रक्षित' विषय थी। विषयों का यह विभाजन इतना अतार्किक था कि इससे अधिक अव्यावहारिक विभाजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उदाहरण के तौर पर, किसी मंत्री को सिंचाई विभाग के बिना कृषि मंत्री बना देना या कारखाने, जल विद्युत शक्ति, खनिज पदार्थ और श्रम के बिना किसी को उद्योग मंत्री बना देना पूरी तरह से अव्यावहारिक निर्णय था। व्यवहार में परिषदों के सदस्यों और मंत्रियों में आवश्यक सहयोग की कमी थी, जिसके कारण द्वैध शासन असफल हो गया।
In simple words: द्वैध शासन की असफलता का एक बड़ा कारण यह था कि विषयों को सही तरीके से नहीं बांटा गया था। इससे विभागों के बीच काम करना मुश्किल हो गया और कई फैसले अव्यावहारिक लगे।

🎯 Exam Tip: विषयों के अव्यावहारिक विभाजन के उदाहरण दें, जैसे सिंचाई और कृषि विभाग का अलग होना, यह समझाने के लिए कि यह कैसे द्वैध शासन की असफलता का कारण बना।

 

Question 22. द्वैध शासन की योजना की असफलता के लिए उत्तरदायी किन्हीं अन्य बाहरी परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए।
Answer: द्वैध शासन की योजना की असफलता के लिए उत्तरदायी अन्य बाहरी परिस्थितियां निम्नलिखित थीं: 1. नौकरशाही का नकारात्मक व्यवहार: ब्रिटिश लोक सेवक भारतीय मंत्रियों के अधीन ईमानदारी से काम करने को तैयार नहीं थे। उनका व्यवहार हमेशा नकारात्मक रहता था, जिससे मंत्रियों के फैसले ठीक से लागू नहीं हो पाते थे। 2. कांग्रेस और मुस्लिम लीग का असहयोग: ब्रिटिश भारत के दो प्रमुख राजनीतिक दल-कांग्रेस और मुस्लिम लीग-के बीच आपसी तालमेल की कमी थी। अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति ने उनके बीच मतभेदों को बढ़ावा दिया। दोनों दल प्रशासनिक सुधारों की बजाय देश की स्वतंत्रता और अपने वर्गों की स्थिति मजबूत करने में लगे हुए थे।
In simple words: द्वैध शासन इसलिए भी सफल नहीं हो पाया क्योंकि ब्रिटिश अधिकारी सहयोग नहीं करते थे और कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग आपस में सहमत नहीं थीं।

🎯 Exam Tip: द्वैध शासन की बाहरी असफलताओं में नौकरशाही के रवैये और राजनीतिक दलों के असहयोग जैसे प्रमुख बिंदुओं को शामिल करें।

 

Question 23. भारतीय शासन अधिनियम, 1919 की कोई दो कमियाँ बताइए।
Answer: भारतीय शासन अधिनियम, 1919 की दो प्रमुख कमियाँ निम्नलिखित थीं: 1. प्रांतों में प्रस्तावित द्वैध शासन की योजना संतोषजनक नहीं थी: प्रांतीय स्तर पर द्वैध शासन की योजना संतोषजनक नहीं थी। गवर्नर की कार्यकारी परिषद और मंत्रियों के कार्यों के बीच विभाजन स्पष्ट नहीं था। वित्त संबंधी अधिकार गवर्नर और कार्यकारी परिषद के सदस्यों के पास थे। वे मंत्रियों के कार्यों में हस्तक्षेप करते थे। मंत्रियों और उनके अधीन लोक सेवकों में तालमेल की कमी थी। गवर्नर की मनमानी शक्तियां और सामूहिक उत्तरदायित्व की कमी द्वैध शासन की प्रमुख कमियां थीं। 2. केंद्र में शक्तिशाली विधानमंडल का अभाव: हालांकि केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल - विधानसभा और राज्य परिषद की स्थापना की गई, लेकिन इनका गठन न तो लोकतांत्रिक था और न ही इन्हें पर्याप्त शक्तियां दी गईं। विधानसभा और राज्य परिषद पर कई प्रतिबंध लगे हुए थे।
In simple words: 1919 के अधिनियम की दो बड़ी कमियां थीं: प्रांतों में लागू किया गया द्वैध शासन ठीक से काम नहीं कर रहा था, और केंद्र में बनी संसद के पास पर्याप्त शक्तियां नहीं थीं और वह पूरी तरह लोकतांत्रिक नहीं थी।

🎯 Exam Tip: 1919 के अधिनियम की कमियों को बताते समय, द्वैध शासन की असंतोषजनक प्रकृति और केंद्रीय विधानमंडल की कमजोरियों पर ध्यान दें।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 17 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. भारतीय शासन अधिनियम, 1919 का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
Answer: भारतीय शासन अधिनियम, 1919 और भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 दोनों ही भारतीय जनता की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सके। जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही थी। 1909 की भारतीय विकेंद्रीकरण आयोग की रिपोर्ट, कलकत्ता से दिल्ली राजधानी (1911) बदलने, और प्रथम विश्व युद्ध के शुरू होने जैसे घटनाक्रमों ने भारतीय जन आंदोलन को बढ़ावा दिया। इसलिए, मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (20 अगस्त, 1917) के सुझावों के आधार पर एक विधेयक 28 मई, 1919 को ब्रिटिश लोक सदन (पार्लियामेंट के निम्न सदन) में रखा गया। पार्लियामेंट से पारित होने के बाद 23 दिसंबर, 1919 को सम्राट की स्वीकृति मिलने पर इसे भारतीय शासन अधिनियम, 1919 कहा गया। **शासन अधिनियम 1919 के दोष/आलोचनात्मक मूल्यांकन:** 1. द्वैध शासन की योजना संतोषजनक नहीं थी: यह इस अधिनियम का एक महत्वपूर्ण दोष था। इसमें गवर्नर की कार्यकारी परिषद और मंत्रियों के कार्यों के बीच स्पष्ट विभाजन नहीं था। वित्त संबंधी अधिकार गवर्नर और कार्यकारी सदस्यों के पास थे। वे मंत्रियों के काम में हस्तक्षेप करते थे, और मंत्रियों व उनके अधीन लोक सेवकों में सामंजस्य नहीं था। गवर्नर की मनमानी शक्तियां और सामूहिक उत्तरदायित्व की कमी द्वैध शासन की प्रमुख कमियां थीं। यह न तो लोकतांत्रिक था और न ही इसे पर्याप्त शक्तियां दी गईं। इस पर कई प्रतिबंध और सीमाएं थीं। 3. गवर्नर-जनरल की निरंकुशता बनी रही: इस अधिनियम में गवर्नर-जनरल को बहुत ज्यादा शक्तियां और अधिकार दिए गए थे। देश का पूरा प्रशासन उसी की देखरेख और नियंत्रण में चलता था। वह सुरक्षा और शांति बनाए रखने के नाम पर कभी भी विधानमंडल के काम में हस्तक्षेप कर सकता था। भारतीयों ने इसका कड़ा विरोध किया। 4. सांप्रदायिक निर्वाचन का अनुचित विस्तार: इस अधिनियम से सांप्रदायिक निर्वाचन का विस्तार किया गया, जो एक गलत कदम था। इसे मुसलमानों के साथ-साथ सिखों, यूरोपीयनों, जमींदारों, भारतीय वाणिज्य संघ, एंग्लो-भारतीयों और भारतीय ईसाइयों के लिए लागू कर दिया गया। बुद्धिजीवियों ने इस स्थिति को देश के लिए हानिकारक माना। 5. गृह सरकार के नियंत्रण में कमी संतोषजनक नहीं थी: भारत में गृह-शासन द्वारा हस्तक्षेप कम करने की मांग की जा रही थी, लेकिन इस अधिनियम से गृह सरकार के नियंत्रण में कमी करने के लिए भारत मंत्री के अधिकार में कोई औपचारिक बदलाव नहीं किया गया। **भारत शासन अधिनियम, 1919 का महत्व:** 1919 के भारत शासन अधिनियम का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत प्रस्तुत है: * इस अधिनियम की प्रस्तावना में ब्रिटिश शासन का लक्ष्य - भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना की पहली बार घोषणा की गई थी। * इस अधिनियम द्वारा प्रांतों में सबसे पहले उत्तरदायी शासन की दिशा में कदम बढ़ाया गया। * केंद्र और प्रांतों के विधानमंडलों के विस्तार के साथ-साथ उनमें सुधार के प्रयास किए गए। * पहले की तुलना में जनसंख्या के अधिक हिस्से को मताधिकार प्राप्त हो सका। * गवर्नर और गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषदों में पहले की तुलना में अधिक भारतीयों को प्रतिनिधित्व मिला। * शक्तियों का विकेंद्रीकरण किया गया। * भारतीयों को राजनीतिक प्रशिक्षण के अवसर प्राप्त हुए।
In simple words: 1919 के भारतीय शासन अधिनियम को भारत में कुछ सुधार लाने के लिए लाया गया था, लेकिन इसमें कई कमियां थीं, जैसे गवर्नर-जनरल की ज्यादा ताकत, भेदभावपूर्ण चुनाव और प्रांतों में आधा-अधूरा शासन। हालांकि, इसने भारतीयों को कुछ राजनीतिक अधिकार दिए और भविष्य के सुधारों की नींव रखी।

🎯 Exam Tip: इस निबंधात्मक प्रश्न का उत्तर देते समय, अधिनियम के दोषों और महत्व दोनों को संतुलित तरीके से प्रस्तुत करें। हर बिंदु को स्पष्ट उदाहरणों के साथ समझाएं।

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