RBSE Solutions Class 11 Hindi Chapter 5 बिहारी

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Detailed Chapter 5 बिहारी RBSE Solutions for Class 11 Hindi

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Class 11 Hindi Chapter 5 बिहारी RBSE Solutions PDF

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 5 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोई। जा तन की झाँईं परें, श्यामु हरित दुति होइ ॥. उपर्युक्त दोहे के किस शब्द में श्लेष अलंकार है ?
(क) नागरि सोई
(ख) भव-बाधा
(ग) तन
(घ) हरित-दुति
Answer: (घ) हरित-दुति
In simple words: इस दोहे में 'हरित-दुति' शब्द के कई अर्थ हैं, जिसके कारण यहाँ श्लेष अलंकार है।

🎯 Exam Tip: श्लेष अलंकार को पहचानने के लिए एक शब्द के कई अर्थों पर ध्यान दें, जो उस शब्द को विशिष्ट बनाते हैं।

 

Question 2. 'पौष मास में दिनमान प्रभावहीन हो जाता है, इस भाव को स्पष्ट करने के लिए किससे उपमा दी है ?
(क) अतिथि से
Answer: (क) अतिथि से
In simple words: पौष महीने में दिन छोटे हो जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे मेहमान आने पर उनका मान-सम्मान कम हो जाता है।

🎯 Exam Tip: दोहे में वर्णित उपमा को समझें और उसका अर्थ स्पष्ट रूप से बताएं।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 5 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. 'त्रिभंगी लाल' शब्द का प्रयोग किसके लिए हुआ है ?
Answer: 'त्रिभंगी लाल' शब्द का प्रयोग श्रीकृष्ण के लिए हुआ है क्योंकि वंशी बजाते समय वे तीन अंगों को टेढ़े कर लेते हैं। इन तीन जगहों से मुड़ने के कारण उनका रूप बहुत मोहक लगता है।
In simple words: 'त्रिभंगी लाल' श्रीकृष्ण के लिए उपयोग किया गया है, क्योंकि वे बांसुरी बजाते समय तीन जगहों से मुड़ जाते हैं।

🎯 Exam Tip: साहित्यिक शब्दों के संदर्भ को पहचानें और उनका सही अर्थ बताएं।

 

Question 2. जनता का दुःख किस समय अधिक बढ़ जाता है ?
Answer: जनता का दुःख तब बढ़ जाता है जब राज्यव्यवस्था में लोगों के भले का ध्यान नहीं रखा जाता। यदि शासक अपनी प्रजा की भलाई के बजाय अपने स्वार्थों पर ध्यान देते हैं, तो जनता कष्ट में रहती है।
In simple words: जब सरकार लोगों की भलाई का ध्यान नहीं रखती, तब जनता का दुःख बढ़ जाता है।

🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में शासन व्यवस्था और जनता के बीच के संबंध को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 3. नायिका बादलों के किस व्यवहार से दुखी है?
Answer: नायिका बादलों के उस व्यवहार से दुखी है जहाँ बादल उसे जानबूझकर कष्ट दे रहे हैं और 'बदराह' (कुमार्गी) हो गए हैं। ऐसा लगता है जैसे बादल उसके विरह को और बढ़ा रहे हों।
In simple words: नायिका बादलों से दुखी है क्योंकि वे उसे जानबूझकर परेशान कर रहे हैं और गलत रास्ता अपना रहे हैं।

🎯 Exam Tip: नायिका की भावनाओं और बादलों के प्रतीक रूप को स्पष्ट करें।

 

Question 4. 'बाज पराएँ पानि परि' कथन किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
Answer: इस कथन का प्रयोग कवि ने आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह के लिए किया है जो औरंगजेब के पालतू बाज जैसा आचरण कर रहे थे। कवि उन्हें चेतावनी दे रहा था कि वे परायों के हाथ में पड़कर अपने ही लोगों पर अत्याचार न करें।
In simple words: यह कथन राजा जयसिंह के लिए है, जो औरंगजेब के कहने पर अपने ही लोगों को नुकसान पहुँचा रहे थे।

🎯 Exam Tip: प्रतीकात्मक भाषा के पीछे छिपे वास्तविक अर्थ और ऐतिहासिक संदर्भ को उजागर करें।

 

Question 5. 'कनक कनक ते सौ गुनी' में कौन-सा अलंकार है ?
Answer: 'कनक कनक ते सौ गुनी' में यमक अलंकार है, क्योंकि यहाँ 'कनक' शब्द का दो बार भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग हुआ है। एक 'कनक' का अर्थ धतूरा है और दूसरे 'कनक' का अर्थ सोना है।
In simple words: इस पंक्ति में 'कनक' शब्द दो बार आया है और हर बार उसका मतलब अलग है, इसलिए यह यमक अलंकार है।

🎯 Exam Tip: यमक अलंकार को समझने के लिए दोहराए गए शब्दों के विभिन्न अर्थों पर ध्यान दें।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 5 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. तौ बलियै, भलियै बनी, नागर नंद किसोर। जौ तुम नीकै कै लख्यौ, मो करनी की ओर ॥ उपर्युक्त दोहे में निहित कवि के मूलभाव को स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस दोहे में कवि बिहारी भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना कर रहे हैं। कवि कहते हैं कि हे चतुर नंद किशोर! यदि आप मेरे कर्मों पर ध्यान देंगे तो मेरा उद्धार कभी नहीं हो पाएगा। मैं तो आप पर बलिहारी जाता हूँ, इसलिए आप अपनी कृपा दृष्टि मुझ पर डालिए और मेरा उद्धार कीजिए। कवि यह कहना चाहते हैं कि व्यक्ति अपने कर्मों के बजाय ईश्वर की कृपा से ही मुक्ति पा सकता है।
In simple words: कवि भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि उनके कर्मों को देखकर मुक्ति नहीं मिलेगी, इसलिए वे सिर्फ भगवान की कृपा चाहते हैं।

🎯 Exam Tip: कवि की भक्ति भावना और ईश्वर पर निर्भरता के भाव को स्पष्ट रूप से व्यक्त करें।

 

Question. 3. कवि ने नीच व्यक्ति के स्वभाव की क्या विशेषता बताई है ?
Answer: कवि ने नीच व्यक्ति के स्वभाव को गेंद के खेल जैसा बताया है। नीच व्यक्ति तभी ठीक रहता है जब उसे कड़े अनुशासन में रखा जाता है। जैसे गेंद को जितना अधिक जोर से धरती पर पटका जाता है, वह उतनी ही ऊँची उछलती है। उसी प्रकार नीच व्यक्ति भी कठोरता से ही सुधर सकता है। यदि उन पर दबाव न रखा जाए तो वे मनमानी करते हैं।
In simple words: कवि के अनुसार, नीच व्यक्ति गेंद की तरह होता है; उसे जितना दबाया जाए, वह उतना ही ठीक रहता है और सुधरता है।

🎯 Exam Tip: नीच व्यक्ति के स्वभाव की तुलना को सरल शब्दों में समझाएं और इसके पीछे के नैतिक संदेश को बताएं।

 

Question. 4. 'अनबूडे बूड़े, तरे जे बूड़े सब अंग।' पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस पंक्ति का भाव है कि जो लोग सांसारिक सुखों (जैसे संगीत, काव्य और प्रेम) में पूरी तरह नहीं डूबते, वे संसार रूपी सागर में डूब जाते हैं, यानी उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है। इसके विपरीत, जो इन कलाओं और रसों का भरपूर आनंद लेते हैं, उनका जीवन सार्थक हो जाता है और वे इस भवसागर से तर जाते हैं।
In simple words: जो लोग जीवन के आनंद में नहीं डूबते, उनका जीवन बेकार हो जाता है, जबकि जो हर पल का आनंद लेते हैं, वे सफल होते हैं।

🎯 Exam Tip: पंक्ति के प्रतीकात्मक अर्थ को स्पष्ट करें और जीवन के आनंद के महत्व को रेखांकित करें।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 5 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. 'बिहारी अपनी बात कहते किसी से हैं और उसका प्रभाव किसी और पर पड़ता है।' उदाहारण देकर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
Answer: काव्य-कला की एक विशेषता है अन्योक्ति, जहाँ कवि किसी और को माध्यम बनाकर अपनी बात किसी अन्य को प्रभावित करने के लिए कहते हैं। बिहारी इस शैली में बहुत माहिर थे और उनके कई दोहों में अन्योक्ति के उदाहरण मिलते हैं, जैसे: "नहिं पावस, ऋतुराज यह, तजि तरवर चित-भूल। अपतु भएँ बिनु पाइहै, क्यों नव दल, फल, फूल॥" इस दोहे में कवि वृक्ष (तरवर) से बात कर रहे हैं, पर उनका असली संदेश उन लोगों के लिए है जो बिना कुछ त्याग किए जीवन में सब कुछ पाना चाहते हैं। कवि उन्हें समझाते हैं कि यदि नया कुछ पाना है, तो पुराने का त्याग प्रसन्न मन से करना होगा।
In simple words: बिहारी अपनी बात सीधे न कहकर किसी और के जरिए कहते हैं, ताकि उसका असर दूसरे पर हो। यह उनकी अन्योक्ति शैली है।

🎯 Exam Tip: अन्योक्ति अलंकार का अर्थ स्पष्ट करें और बिहारी के दोहों से उदाहरण देकर इसे समझाएं।

 

Question 2. बिहारी के दोहों में भावों की सघनता है' सप्रमाण स्पष्ट कीजिए।
Answer: कवि बिहारी के विषय में प्रसिद्ध है कि उन्होंने 'दोहे रूपी गागर में भावों का सागर' भरने का प्रयास किया है, जिसे सामासिक रचना शैली भी कहते हैं। उनकी विशेषता यह है कि वे थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह देते हैं, जिससे उनके दोहों में भावों की सघनता और विभिन्न भावों की उपस्थिति दिखाई देती है। बिहारी मुख्यतः श्रृंगारी कवि हैं, और उनकी रचनाओं में नायक-नायिकाओं के प्रेम प्रसंग, मान, वियोगावस्था और रूप-सौंदर्य का वर्णन अधिक मिलता है। इन प्रसंगों से जुड़े भावों, अनुभावों और संचारी भावों का जैसा सजीव और स्वाभाविक वर्णन बिहारी ने किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। उदाहरण के लिए, "अली कली ही सौं बिंध्यौ" में नवोढ़ा पत्नी के प्रेमपाश में बंधे राजा जयसिंह का वर्णन है, और "लाज-लगाम" जैसे दोहे नायिका की चेष्टाओं और सौंदर्य के दुर्लभ नमूने हैं। "कौन सुनै, कासौं कहाँ, सुरति विसारी नाह" विरहिणी की दुख भरी दासता को व्यक्त करता है। इसी प्रकार, "तिय कित कमनैती पढ़ी, बिनु जिहि भौंह कमान। चलचित-बेझैं चुकति नहिं, बंकबिलोकनि-बान॥" जैसे दोहों में नायिका की चेष्टाएँ अनुभावों के बाण चलाती हुई दिखाई देती हैं। इन दोहों में लज्जा, मद, हर्ष जैसे संचारी भाव भी व्यक्त हुए हैं। इस प्रकार, बिहारी वियोग और संयोग श्रृंगार के भावों की सृष्टि करने में सिद्धहस्त हैं।
In simple words: बिहारी के दोहे छोटे होते हुए भी गहरे अर्थों से भरे होते हैं, जैसे एक छोटे घड़े में बहुत सारा पानी भर देना। वे नायक-नायिका के प्रेम, वियोग और सौंदर्य को बहुत सुंदर तरीके से दर्शाते हैं।

🎯 Exam Tip: 'गागर में सागर' उक्ति को उदाहरण सहित समझाएं और बिहारी के दोहों में भावों की विविधता और सघनता पर प्रकाश डालें।

 

Question 3. बिहारी की वाक्पटुता स्पष्ट कीजिए।
Answer: वाक्पटुता का अर्थ है बात को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करना, जो एक सफल कवि की पहली विशेषता होती है। कवि बिहारी इस काव्य-कला में माहिर थे, और उनके दोहे पग-पग पर उनकी वाक्पटुता का प्रमाण देते हैं। वाक्पटुता ही चमत्कार की जननी है। इस दोहे को देखिए: "करी कुवत जगु कुटिलता तजौं न दीनदयाल। दुखी हो हुगे सरल हिय, बसत भंगी लाल' ॥" इस दोहे में बिहारी दीनदयालु को भी अपनी वाक्पटुता का निशाना बना रहे हैं। कवि ने बड़ी चतुराई से अपनी कुटिलता को भगवान की कृपा पाने का आधार बना दिया है। 'कुटिलता' का अर्थ टेढ़ा भी होता है। कवि कहते हैं कि जब देवता स्वयं तीन अंगों से टेढ़े हैं तो भक्त का हृदय भी टेढ़ा ही होना चाहिए ताकि प्रभु आराम से उसमें फिट हो जाएँ। सीधी जगह में टेढ़ी वस्तु नहीं आ सकती। अन्योक्ति के प्रयोग के लिए भी वाक्पटुता आवश्यक है। "नहिं परागु, नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहिं काल। अली, कली ही सौं बिंध्यौ, आमैं कौन हवाल ॥" यह दोहा भी उनकी वाक्पटुता का एक और उदाहरण है।
In simple words: बिहारी अपनी बातों को बहुत चतुर और प्रभावशाली तरीके से कहते हैं। वे सीधे कहने के बजाय घुमा-फिराकर गहरी बातें कह जाते हैं, जो उनके काव्य की एक खास विशेषता है।

🎯 Exam Tip: वाक्पटुता का अर्थ समझाएं और बिहारी के दोहों से उदाहरण देकर उनकी इस विशेषता को प्रमाणित करें।

 

Question 4. निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर बिहारी के काव्य की विशेषताएँ बताइए
(क) अलंकार योजना
(ख) प्रकृति वर्णन
(ग) उक्ति वैचित्र्य
(घ) भाषा

Answer:
(क) अलंकार योजना: बिहारी को अलंकारों से खेलने वाला कवि कहा जाए तो गलत नहीं होगा। वे मानते थे कि कविता और स्त्री बिना आभूषणों के शोभा नहीं देतीं। हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित दोहों का आरंभ ही चमत्कारपूर्ण अलंकार-योजना से हुआ है। जैसे, "जा तन की झाँईं परै, स्यामु हरित-दुति होइ ॥" इस पंक्ति में 'स्याम हरित-दुति होइ' अंश में कवि बिहारी ने श्लेष का अद्भुत चमत्कार प्रस्तुत किया है। 'स्याम' के अर्थ श्रीकृष्ण, नीला वर्ण तथा पाप हैं। इसी प्रकार 'हरित दुति' का अर्थ हरी कान्ति, प्रसन्न, कान्तिहीन आदि हैं। 'कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाइ' में यमक, 'तरि संसार, पयोधि कौं, हरि नावें करि नाउ॥' में रूपक, 'सुनत पथिक...जियति बिचारी बाम ॥' में अतिशयोक्ति, 'रुक्यौ साँकरै...आवतु जातु ॥' में सांगरूपक, 'अनबूड़े बूड़े तरे जे बूड़े सबअंग' में विरोधाभास, 'कुटिल अलक...होतु ॥' में दृष्टांत तथा 'आली, बाढ़तु विरह ज्यौं, पांचाली कौ चीरु' में उपमा अलंकार है। इस प्रकार बिहारी की अलंकार योजना विविधता तथा भव्यता से सजी हुई है।
(ख) प्रकृति वर्णन: बिहारी लाल ने प्रकृति के मनोहारी छोटे चित्र भी प्रस्तुत किए हैं और प्रकृति को रस के उद्दीपक के रूप में भी वर्णित किया है। जैसे, "नहिं पावस, ऋतुराज यह तजि तरवर चित-भूल। अपतु भएँ बिनु पाइहै क्यों नव दल, फल, फूल ॥" इस दोहे में प्रकृति को अन्योक्ति का आधार बनाया गया है। इसी प्रकार 'रुक्यौं साँकरे...आवतु जातु' में प्रकृति का आलंकारिक वर्णन है। 'बदाबदी...बदाह ॥' पंक्ति में बादल विरहिणी की व्यथा बढ़ा रहे हैं।
(ग) उक्ति वैचित्र्य: कथन में नाटकीयता या बात को कुछ नए ढंग से प्रस्तुत करना उक्ति वैचित्र्य कहलाता है। संकलित दोहों में यह विशेषता विद्यमान है। 'कुटिलता तजौं न दीनदयाल' में कवि ने भगवान की कृपा पाने की इच्छा विचित्र ढंग से प्रकट की है।
(घ) भाषा: बिहारी की ब्रजभाषा को उनके समालोचकों ने 'मानक ब्रजभाषी' माना है। बिहारी ने व्यंजना शब्द-शक्ति का पूरा उपयोग किया है। कुछ उदाहरण हैं: 'करौ कुबेतु जगु, कुटिलता तजौ न दीनदयाल। दुखी हो हुगे सरल हिय, बसत त्रिभंगी लाल।' इस दोहे में कवि ने अपनी भाषागत चतुराई के बल पर 'कुटिलता' के दुर्गुण को सद्गुण सिद्ध कर दिया है। सटीक शब्द-चयन का एक नमूना है 'रुक्यौ साँकझें कुंज-मग, करतु झाँझि झकुरातु। मंद-मंद मारुत-तुरँगु, बूंदतु आवतु जातु ॥'
In simple words: बिहारी के काव्य में अलंकारों का सुंदर प्रयोग, प्रकृति का मनमोहक वर्णन, बातों को अनोखे ढंग से कहने की कला और ब्रजभाषा का निपुण उपयोग उसकी मुख्य विशेषताएँ हैं।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक काव्य विशेषता को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और बिहारी के दोहों से सटीक उदाहरण देकर अपनी बात को प्रमाणित करें।

 

Question 5. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(क) कौड़ा आँसू........... डारे रहत,
(ख) जोग-जुगति ............ सेवत नैक
(ग) अब तजि नाए ............ कुसुम की वास
(घ) नीच हियै ............ ऊँचे होते।

Answer: इन पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या के लिए, छात्रों को 'सप्रसंग व्याख्याएँ' नामक प्रकरण का अवलोकन करना चाहिए और स्वयं व्याख्या करनी चाहिए। यह छात्रों के स्वयं के अभ्यास के लिए है।
In simple words: इन कविताओं का अर्थ समझने के लिए आपको पाठ्यपुस्तक में दिए गए 'सप्रसंग व्याख्याएँ' वाले भाग को देखना होगा और खुद से समझना होगा।

🎯 Exam Tip: सप्रसंग व्याख्या करते समय, कविता के प्रसंग, संदर्भ, व्याख्या और विशेष बिंदुओं को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करें।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 5 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. 'कुटिलता तजौं न दीनदयाल कान के ऐसा कहने का कारण है –
(क) कवि का कुसंग में फँसा होना
(ख) कवि का दीनदयाल को चुनौती देना
(ग) भगवान के निवास में सुविधा का ध्यान रखना।
(घ) कवि का अहंकारी होना
Answer: (ग) भगवान के निवास में सुविधा का ध्यान रखना।
In simple words: कवि भगवान से कुटिलता न छोड़ने के लिए कहते हैं ताकि त्रिभंगी लाल (टेढ़े) प्रभु उनके (टेढ़े) हृदय में आराम से रह सकें।

🎯 Exam Tip: कवि की उक्ति वैचित्र्य को समझें और उसके पीछे के प्रतीकात्मक अर्थ को बताएं।

 

Question 4. आड़े दै आले बसन, जाड़े हूँ की राति। साहसु ककै सनेहबस, सखी सबै ढिंग जाति॥ इस दोहे में वर्णित रस है –
(क) शान्तरस
(ख) भयानक रस
(ग) संयोग श्रृंगार
(घ) वियोग श्रृंगार
Answer: (घ) वियोग श्रृंगार
In simple words: यह दोहा विरहिणी नायिका की पीड़ा को बताता है, इसलिए इसमें वियोग श्रृंगार रस है।

🎯 Exam Tip: दोहे के भाव को पढ़कर उसमें निहित रस की पहचान करें।

 

Question 5. 'अधिक अँधेरौ जग करत, मिलि मावस रवि चंद् ॥' इस कथन द्वारा कवि ने किस उक्ति को सिद्ध करना चाहा है।
(क) दो ज्योतियों के मिलने से अंधकार बढ़ता है।
(ख) दो विरोधियों का मिलन संकट कारक होता है।
(ग) दो राजाओं के राज में प्रजा का कष्ट बढ़ जाता है।
(घ) प्रकृति में अनेक चमत्कारिक घटनाएँ घटती रहती हैं।
Answer: (ग) दो राजाओं के राज में प्रजा का कष्ट बढ़ जाता है।
In simple words: कवि इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जब दो शासक एक साथ राज करते हैं, तो जनता को ज़्यादा परेशानी होती है।

🎯 Exam Tip: दोहे में दिए गए उदाहरण और उससे निकाले गए सामाजिक या राजनीतिक संदेश को स्पष्ट करें।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 5 अतिलघु उत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. कवि बिहारी लाल ने राधा से क्या प्रार्थना की है?
Answer: बिहारी ने राधा से अपने सांसारिक कष्टों को दूर करने की प्रार्थना की है। वे राधा नागरि की कृपा से भव बाधाओं से मुक्ति चाहते हैं।
In simple words: कवि बिहारी ने राधा जी से अपने जीवन के दुखों को दूर करने की विनती की है।

🎯 Exam Tip: कवि की प्रार्थना का मुख्य उद्देश्य स्पष्ट रूप से बताएं।

 

Question 3. 'तरि संसार-पयोधि कौं' इस पंक्ति में 'संसार पयोधि' में कौनसा अंलकार है?
Answer: 'संसार-पयोधि' में रूपक अलंकार है क्योंकि 'संसार' उपमेय पर 'पयोधि' (समुद्र) उपमान का भेदरहित आरोप हुआ है। यानी संसार को ही समुद्र का रूप दे दिया गया है।
In simple words: इस पंक्ति में संसार को सीधे समुद्र बता दिया गया है, इसलिए इसमें रूपक अलंकार है।

🎯 Exam Tip: रूपक अलंकार को पहचानने के लिए उपमेय और उपमान के बीच अभेद संबंध को ध्यान में रखें।

 

Question 4. 'पावस-मास' आने पर कवि ने किसे खेल जैसा नहीं बताया है?
Answer: कवि ने पावस मास अर्थात वर्षा ऋतु में कदम्ब के पुष्पों की उत्तेजक सुगंध के बीच सहज बने रहने को खेल जैसा नहीं कहा है। इसका अर्थ है कि वर्षा ऋतु में प्रिय की याद बहुत सताती है, और मन को काबू में रखना आसान नहीं होता।
In simple words: कवि ने कहा है कि बरसात के महीने में कदम्ब के फूलों की सुगंध के कारण मन को शांत रखना कोई आसान काम नहीं है।

🎯 Exam Tip: प्राकृतिक सौंदर्य के साथ मानवीय भावनाओं के जुड़ाव को स्पष्ट करें।

 

Question 5. पूस (पौष) के दिन का मान किसकी तरह घट गया है?
Answer: पूस के महीने के दिन का मान (गर्मी और अवधि) घर जमाई के मान (सम्मान) की तरह घट गया है। जिस प्रकार घर जमाई का सम्मान धीरे-धीरे कम हो जाता है, वैसे ही पूस में दिन छोटे हो जाते हैं।
In simple words: पूस के महीने में दिन का मान घर जमाई के सम्मान की तरह घट गया है, यानी दिन छोटे हो गए हैं।

🎯 Exam Tip: लोक व्यवहार से जुड़ी उपमाओं को समझने और उनका अर्थ बताने का अभ्यास करें।

 

Question 6. ऋतुराज बसंत में वृक्षों पर नए पत्ते, फल और फूल कब आते हैं?
Answer: पतझर में वृक्ष के सारे पत्ते झर जाने के बाद ही उस पर नए पत्ते, फल और फूल आया करते हैं। यह त्याग और नवीनता के चक्र को दर्शाता है।
In simple words: बसंत ऋतु में वृक्षों पर नए पत्ते, फल और फूल तभी आते हैं जब पुराने पत्ते झड़ जाते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रकृति के चक्र और उससे मिलने वाले नैतिक संदेश पर ध्यान दें।

 

Question 7. कवि बिहारी ने कुंजों में से होकर आ रहे मन्द पवन को किसका रूप प्रदान किया है?
Answer: कवि ने मंद पवन को कुंजों के संकरे मार्ग से निकलते एक रुष्ट घोड़े का रूप प्रदान किया है। पवन की धीमी और अटक-अटककर चलने की गति को घोड़े की चाल से तुलना की गई है।
In simple words: कवि ने धीरे-धीरे चलती हवा को कुंजों से निकलते एक नाराज घोड़े का रूप दिया है।

🎯 Exam Tip: प्रकृति के सूक्ष्म वर्णन में छिपे मानवीकरण या अन्य अलंकारों को पहचानें।

 

Question 8. 'तरे जे बूड़े सब अंग' बिहारी ने यह किनके लिए कहा है?
Answer: बिहारी ने यह उन लोगों के लिए कहा है जो संगीत, काव्य और प्रेम रस का जीभरकर आनंद लिया करते हैं। उनका मानना है कि ऐसे लोग जीवन का सच्चा सुख भोगते हैं और भवसागर से तर जाते हैं।
In simple words: यह उन लोगों के लिए कहा गया है जो जीवन के सुखों और कलाओं का पूरा आनंद लेते हैं।

🎯 Exam Tip: पंक्ति के गूढ़ अर्थ को स्पष्ट करें और कवि के जीवन दर्शन को बताएं।

 

Question 9. कनक में कनक (धतूरा) से सौ गुनी मादकता कैसे है?
Answer: धतूरे को खाने पर ही व्यक्ति मदग्रस्त हुआ करता है, किन्तु सोना (धन, सम्पत्ति) मिल जाने भर से ही वह बौरा जाता है। यानी धन का नशा धतूरे के नशे से भी सौ गुना अधिक होता है, क्योंकि धतूरा खाने पर ही नशा करता है, जबकि सोना तो सिर्फ मिल जाने पर ही इंसान को पागल कर देता है।
In simple words: सोना (धन) धतूरे से सौ गुना ज़्यादा नशा करता है, क्योंकि धतूरा खाने पर नशा होता है, जबकि सोना मिलने भर से ही व्यक्ति पागल हो जाता है।

🎯 Exam Tip: यमक अलंकार के दोनों अर्थों को स्पष्ट करते हुए धन के नशे की तीव्रता को बताएं।

 

Question 11. बाज पराए पानि परि, हूँ पच्छीनु न मारि ॥' पंक्ति के अनुसार बाज जैसा आचरण कौन कर रहा था?
Answer: बाज जैसा आचरण मिर्जा राजा जयसिंह कर रहे थे, जो औरंगजेब के आदेश पर छोटे देशी राजाओं पर अत्याचार कर रहे थे। कवि उन्हें चेतावनी दे रहे थे कि वे अपने ही लोगों को नुकसान न पहुँचाएं।
In simple words: मिर्जा राजा जयसिंह औरंगजेब के इशारे पर अपने ही छोटे राजाओं को सता रहे थे, उनका आचरण बाज जैसा था।

🎯 Exam Tip: प्रतीकात्मक भाषा के पीछे छिपे वास्तविक ऐतिहासिक या सामाजिक संदर्भ को स्पष्ट करें।

 

Question 12. बिहारी की नायिका ने अपने नेत्रों को क्या बताया है?
Answer: नायिका ने अपने नेत्रों को 'मुँहजोर-तुरंग' उद्दण्ड घोड़ा बताया है। वह कहती है कि उसके नेत्र उसके वश में नहीं हैं और लोक-लाज की चिंता किए बिना नायक की ओर खिंचे चले जाते हैं।
In simple words: नायिका ने अपने नेत्रों को एक जिद्दी घोड़े जैसा बताया है जो उसके वश में नहीं रहता।

🎯 Exam Tip: नायिका के आत्म-वर्णन में छिपे सौंदर्य और प्रेम भाव को स्पष्ट करें।

 

Question 13. 'कानन सेवत नैन' इस वचन का क्या आशय है?
Answer: इस कथन के दो आशय हैं। पहला यह कि नायिका के नेत्र कानों तक पहुँच रहे हैं, जो उनकी विशालता को दर्शाता है। दूसरा भाव यह है कि नेत्र कामदेव मुनि के आदेश पर 'कानन' अर्थात् वन में योगाभ्यास कर रहे हैं। यह उनके सौंदर्य और प्रभाव को बताता है।
In simple words: 'कानन सेवत नैन' का मतलब है कि नायिका के नेत्र बहुत बड़े हैं और वे कामदेव के आदेश पर जंगल में योग कर रहे हैं।

🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में शब्दों के श्लेष या दोहरे अर्थ को स्पष्ट करें और दोनों आशयों को समझाएं।

 

Question 14. 'कौन सुनै, कासौं कहो' कथन के अनुसार नायिका क्या कहना चाहती है?
Answer: नायिका कहना चाहती है कि उसके प्रिय द्वारा उसे भुला दिए जाने पर, बादल भी उसकी वेदना बढ़ाने को आ पहुँचे हैं। वह अपनी विरह-पीड़ा किसी को बता नहीं पा रही है, क्योंकि उसे सुनने वाला कोई नहीं है और बादल उसके दुख को और गहरा कर रहे हैं।
In simple words: नायिका अपनी विरह-पीड़ा किसी को बता नहीं पा रही है क्योंकि उसका प्रिय उसे भूल गया है और बादल भी उसके दुख को बढ़ा रहे हैं।

🎯 Exam Tip: विरहिणी नायिका की मनोदशा और प्रकृति के उद्दीपन रूप को स्पष्ट करें।

 

Question 15. बिहारी के अनुसार नायिका के मुख की शोभा किस कारण अत्यन्त बढ़ गई है?
Answer: नायिका के मुख पर बालों की तिरछी (टेढ़ी) लटों के लटकने से उसके मुख की शोभा बहुत बढ़ गई है। ये लटें मुख पर ऐसे पड़ रही हैं जैसे किसी आभूषण से सौंदर्य और बढ़ गया हो।
In simple words: नायिका के चेहरे पर बालों की टेढ़ी लटें गिरने से उसकी सुंदरता और ज़्यादा बढ़ गई है।

🎯 Exam Tip: सौंदर्य वर्णन में सूक्ष्मता पर ध्यान दें और उसमें निहित अलंकारों को पहचानें।

 

Question 16. बिहारी की नायिका अपने विरह की अवधि बढ़ते चले जाने की तुलना किससे कर रही है?
Answer: नायिका अपने विरह की बढ़ती जा रही अवधि की तुलना पांचाली के चीर से कर रही है। जिस प्रकार द्रौपदी का चीर बढ़ता ही चला गया था और कभी समाप्त नहीं हुआ, उसी प्रकार नायिका का विरह भी अनंत प्रतीत हो रहा है।
In simple words: नायिका अपने बढ़ते हुए विरह की तुलना द्रौपदी के चीर से कर रही है, जो कभी खत्म नहीं होता था।

🎯 Exam Tip: पौराणिक संदर्भों का उपयोग करते हुए विरह की अतिशयोक्तिपूर्ण व्याख्या को स्पष्ट करें।

 

Question 19. पाठ्य-पुस्तक में संकलित बिहारी के दोहों में से अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन वाला एक दोहा उदधृत कीजिए।
Answer: अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन वाला दोहा है: "सुनत पथिक-मुँह, माह-निसि, चलति लुवै उहिं गाँम। बिनु बूझै, बिनु ही कहें, जियति विचारी बाम ॥" इस दोहे में विरहिणी के शरीर की गर्मी से माघ की ठंडी रात में लू चलने का वर्णन किया गया है, जो अतिशयोक्ति का सुंदर उदाहरण है।
In simple words: अतिशयोक्ति का दोहा है "सुनत पथिक-मुँह...", जिसमें विरहिणी की गर्मी से सर्दी की रात में भी गर्म हवा चलने का वर्णन है।

🎯 Exam Tip: अतिशयोक्ति अलंकार के लक्षण को ध्यान में रखते हुए सही उदाहरण का चयन करें।

 

Question 20. अपनी पाठ्य-पुस्तक में संकलित बिहारी के दोहे किन-किन विषयों पर आधारित हैं। तीन विषयों के नाम बताइए।
Answer: संकलित दोहे विविध विषयों पर आधारित हैं। इनमें तीन मुख्य विषय हैं: श्रृंगार रस, प्रकृति वर्णन और नीति। बिहारी ने इन विषयों पर अपने दोहों में गहरी बातें कही हैं।
In simple words: बिहारी के दोहे श्रृंगार रस, प्रकृति वर्णन और नीति पर आधारित हैं।

🎯 Exam Tip: बिहारी के काव्य की विषय-वस्तु की विविधता को संक्षेप में बताएं।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 5 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. 'दुखी हो हुगे सरल हिय बसत त्रिभंगी लाल, कवि ने भगवान से ऐसा क्यों कहा है?
Answer: यह दोहा कविवर बिहारी के उक्ति चातुर्य का एक सुंदर उदाहरण है। भगवान को हृदय में बसाने के लिए भक्त यही कहता है कि वह अपने सारे दुर्गुण त्याग देगा और हृदय को सरल व पवित्र बनाएगा। लेकिन इस दोहे में कवि दीनदयालु से कह रहे हैं कि वे अपनी 'कुटिलता' (जो एक दुर्गुण है) को नहीं छोड़ेंगे। कवि इसका कारण यह बताते हैं कि यदि उन्होंने अपने हृदय को सरल कर लिया, तो त्रिभंगी लाल (तीन अंगों से टेढ़े) प्रभु को सीधे हृदय में रहने में बड़ी असुविधा होगी, क्योंकि टेढ़ी वस्तु टेढ़े ही स्थान में सही ढंग से समा पाती है।
In simple words: कवि ने भगवान से कहा कि वह अपनी कुटिलता नहीं छोड़ेंगे, ताकि त्रिभंगी लाल (टेढ़े) भगवान उनके (टेढ़े) हृदय में आराम से रह सकें।

🎯 Exam Tip: कवि की वाक्पटुता और तर्क-शैली को स्पष्ट करें, जिसमें वे अपनी बात को अनोखे ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

 

Question 2. संसाररूपी सागर से पार जाने का कवि बिहारी ने क्या उपाय बताया है? संकलित दोहे के आधार पर लिखिए।
Answer: कवि बिहारी के अनुसार संसार-सागर से पार जाने के लिए एक दृढ़ नौका और उसके सही संचालन के लिए पतवार दोनों ही परम आवश्यक हैं। कवि कहते हैं कि यदि तुम्हें संसार-सागर से पार जाना है और उद्धार पाना है तो हरि (ईश्वर) के नाम को अपनी नाव बनाओ और उसमें मालारूपी पतवार लगाओ। इस प्रकार हरि के नाम की माला जपने से निश्चय ही तुम इस भवसागर से पार हो जाओगे। ईश्वर का नाम ही मुक्ति का एकमात्र उपाय है।
In simple words: बिहारी ने कहा है कि संसार-सागर को पार करने के लिए हरि के नाम को नाव और माला को पतवार बनाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: कवि के भक्ति मार्ग और ईश्वर के नाम स्मरण के महत्व को स्पष्ट करें।

 

Question 4. 'सुनत पथिक मुँह, माह निसि, चलति लुर्वै उहिं गाँम। इस पंक्ति में कवि ने माघ के महीने में, पूरे गाँव में लुएँ चलने का वर्णन किया है। इस कथन के निहितार्थ को स्पष्ट कीजिए।
Answer: कवि बिहारी व्यंजना शब्द-शक्ति के उपयोग में परम निपुण हैं। इस कथन का आशय यह है कि नायक को विदेश में यह जानकर बड़ा संतोष मिला कि उसकी विरह में तप रही पत्नी जीवित थी। पत्नी के शरीर की इतनी गर्मी थी कि माघ की ठंडी रात में भी पूरे गाँव में गर्म हवा (लू) चल रही थी। यह विरह-ताप का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है। इस दोहे में व्यंजना शब्द शक्ति के साथ-साथ अतिशयोक्ति अलंकार का भी प्रयोग किया गया है।
In simple words: इस पंक्ति का मतलब है कि विरहिणी नायिका के शरीर की गर्मी इतनी ज़्यादा थी कि माघ की सर्दी वाली रात में भी गाँव में गर्म हवा (लू) चलने लगी, जिससे नायक को उसके जीवित होने का पता चला।

🎯 Exam Tip: व्यंजना शब्द शक्ति और अतिशयोक्ति अलंकार के माध्यम से कवि ने विरह-वर्णन को कैसे प्रभावशाली बनाया, इसे समझाएं।

 

Question 5. 'नहिं पावसु, ऋतुराज यह, तजि तरवर चित-भूले। अपतु भएँ बिनु पाइहै, क्यों नव दल, फल, फूल।' इस पंक्ति में कौन-सा रूप प्रस्तुत हुआ है और दोहे में निहित संदेश क्या है ? लिखिए।
Answer: इस दोहे में प्रकृति का शिक्षाप्रद स्वरूप प्रस्तुत हुआ है। कवि ने वृक्ष के माध्यम से उन लोगों को संबोधित किया है जो बिना कुछ त्याग किए ही जीवन की सारी सुख-सुविधाएँ पा लेना चाहते हैं। कवि का संदेश है कि बसंत ऋतु में वृक्षों पर नए पत्ते, फल और फूल तभी आते हैं जब वे एक साल पुराने पत्ते त्याग देते हैं। इसका मतलब है कि नवीन कुछ पाने के लिए पुराने का त्याग करना पड़ता है। त्याग करने से ही भोग का सुख प्राप्त होता है।
In simple words: यह दोहा सिखाता है कि कुछ नया पाने के लिए कुछ पुराना छोड़ना पड़ता है, जैसे पेड़ पुराने पत्ते गिराकर नए फल-फूल पाते हैं।

🎯 Exam Tip: अन्योक्ति अलंकार के माध्यम से प्रकृति और मानवीय जीवन के बीच के संबंध को स्पष्ट करें, और निहित नैतिक संदेश को बताएं।

 

Question 6. 'कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय। उहिं खाएँ बौराइ जगु, इहिं पाएँ बौराइ॥' क्या यह दोहा वर्तमान सामाजिक परिवेश पर चुटीला व्यंग्य करता है? अपना मत लिखिए।
Answer: हाँ, प्रस्तुत दोहा वर्तमान सामाजिक परिवेश पर चुटीला व्यंग्य करता है। कवि ने जिस प्रवृत्ति को सामने रखकर यह दोहा रचा था, वह आज भी समाज में व्यापक रूप से मौजूद है। कनक (धन) की महिमा आज के समाज में बहुत बढ़ गई है। धन के बढ़ते ही व्यक्ति बौराने लगता है, उसकी चाल-ढाल, जीवन-शैली और स्वभाव सब कुछ बदल जाता है। यह दोहा आज के नव धनाढ्यों पर कवि का एक सटीक वार करता है, जो धन के नशे में चूर रहते हैं।
In simple words: हाँ, यह दोहा आज के समाज पर व्यंग्य है, क्योंकि आज भी लोग धतूरे से ज़्यादा धन के नशे में पागल हो जाते हैं।

🎯 Exam Tip: दोहे के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ उसके सामाजिक निहितार्थ और वर्तमान प्रासंगिकता को भी बताएं।

 

Question 7. लाज-लगाम न मानहीं, नैना मो बस नाहिं। ए मुँहजोर तुरंग ज्यों, ऍचत हूँ चलि जाहिं ॥ इस दोहे के काव्य-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस दोहे में कवि ने नायक-नायिका के प्रेम-प्रसंग का वर्णन किया है। यहाँ संयोग श्रृंगार रस की मधुर योजना हुई है। नायिका के नेत्रों को 'मुँहजोर तुरंग' (जिद्दी घोड़े) बताया गया है, जो उसके वश में नहीं रहते और लोक-लाज की चिंता किए बिना नायक की ओर खिंचे चले जाते हैं। 'लाज लगाम' में रूपक अलंकार है, और 'मुँहजोर तुरंग ज्यों, ऍचत हूँ' में उपमा अलंकार है। कवि ने प्रेम-व्यापार का सजीव शब्द-चित्र अंकित कर दिया है, जिससे नायिका के अनियंत्रित प्रेम और सौंदर्य का प्रभावी चित्रण होता है।
In simple words: यह दोहा नायिका के ऐसे नेत्रों का सुंदर वर्णन करता है जो उसके नियंत्रण में नहीं हैं और एक जिद्दी घोड़े की तरह नायक की ओर खिंचे चले जाते हैं, जिससे प्रेम का सौंदर्य उभरता है।

🎯 Exam Tip: दोहे में प्रयुक्त अलंकारों (रूपक, उपमा) को स्पष्ट करें और उनके माध्यम से अभिव्यक्त प्रेम भाव को समझाएं।

 

Question 9. 'दुसह दुराज प्रजानु को क्यों न बढ़े दुख-दंदु। इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस पंक्ति के 'दुराज' शब्द का अर्थ दो प्रकार से किया जाता है: पहला बुरा राज या कुशासन, और दूसरा दो राजाओं का एक साथ शासन करना। जब देश में कुशासन (बुरी शासन व्यवस्था) होगी, तो स्वाभाविक है कि प्रजाओं के कष्ट बढ़ेंगे। इसी प्रकार यदि एक ही प्रदेश पर दो राजा एक साथ राज करेंगे तो शासन दो गुना अच्छा नहीं होगा, बल्कि दोनों राजाओं की आपसी होड़, असहमति और योग्यता में भिन्नता होने से प्रजा का कष्ट और अधिक बढ़ जाएगा। कवि ने सूर्य और चंद्रमा का उदाहरण देकर इस तथ्य को प्रमाणित किया है, क्योंकि अमावस्या के दिन जब सूर्य और चंद्रमा एक साथ होते हैं, तब भी घोर अंधकार ही होता है।
In simple words: इस पंक्ति का मतलब है कि बुरे शासन या दो राजाओं के एक साथ राज करने से जनता का दुख हमेशा बढ़ता है, जैसे अमावस्या को सूर्य और चंद्रमा मिलकर भी अंधेरा ही करते हैं।

🎯 Exam Tip: 'दुराज' शब्द के दोनों अर्थों को समझाएं और प्रकृति के उदाहरण से मानवीय स्थितियों को जोड़ने का कवि का तरीका बताएं।

 

Question 10. संकलित दोहों में से एक ऐसे दोहे का उल्लेख और स्पष्टीकरण कीजिए, जिसमें कवि द्वारा किया गया 'विरह वर्णन' अस्वाभाविक और हास्यास्पद प्रतीत होता है।
Answer: एक दोहा जिसमें विरह वर्णन अस्वाभाविक और हास्यास्पद लगता है, वह है: "आड़े दै आले बसन, जाड़े हूँ की राति। साहसु ककै सनेह बस, सखी सबै ढिंग जाति।" इस दोहे में नायिका विरह के ताप से तप रही है। माघ की ठंडी रात में भी उसके शरीर से इतनी गर्मी निकल रही है कि सखियाँ गीले कपड़ों की आड़ लेकर हिम्मत करके उसके पास जा रही हैं। यह विरह वर्णन सर्वथा अस्वाभाविक और मज़ाक-सा लगता है, क्योंकि किसी व्यक्ति के शरीर से इतनी तीव्र गर्मी नहीं निकल सकती।
In simple words: इस दोहे में विरहिणी की गर्मी को इतना बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है कि सर्दी की रात में भी उसकी गर्मी से सखियाँ गीले कपड़ों की आड़ लेकर उसके पास जाती हैं, जो बहुत अजीब और हास्यास्पद लगता है।

🎯 Exam Tip: अतिशयोक्तिपूर्ण विरह-वर्णन के उदाहरण को स्पष्ट करें और बताएं कि यह क्यों अस्वाभाविक लगता है।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 5 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. संकलित दोहों के आधार पर कवि बिहारी की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।
Answer: बिहारी मुख्य रूप से श्रृंगारी कवि थे, लेकिन वृद्धावस्था में उनका ध्यान भगवान की ओर गया और उन्होंने कुछ भक्तिपरक रचनाएँ भी कीं। हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कई दोहे उनकी भक्ति-भावना का परिचय देते हैं। कवि के इष्टदेव श्रीकृष्ण और राधा हैं। कवि ने राधा जी को संबोधित करते हुए अपनी भव-बाधा (सांसारिक कष्टों) को हरने की प्रार्थना की है। कवि अपनी 'कुटिलता' को छोड़े बिना ही दीनदयाल को अपने हृदय में बसाना चाहते हैं। वे भगवान से मोक्ष भी अपना अधिकार समझते हुए मांगते हैं। उनके अनुसार संसार-सागर से तरने का एकमात्र उपाय भगवान का स्मरण करना है। वे यह मानते हैं कि व्यक्ति के लिए ईश्वर का नाम ही सबसे बड़ा सहारा है।
In simple words: बिहारी, जो मूल रूप से श्रृंगारी कवि थे, उन्होंने बाद में भक्ति पर दोहे लिखे। वे राधा और कृष्ण के भक्त थे, और मानते थे कि ईश्वर के नाम स्मरण से ही सांसारिक दुखों से मुक्ति मिल सकती है।

🎯 Exam Tip: बिहारी की भक्ति-भावना के स्वरूप को स्पष्ट करें और उनके दोहों से भक्ति-संबंधी विचारों को उदाहरण सहित बताएं।

बिहारी कवि परिचय

जीवन-परिचय

रीतिकालीन कवियों में बिहारी का अपना अलग ही स्थान है। उनकी श्रृंगार रस की रचनाएँ हिन्दी काव्य की अमूल्य निधि हैं। बिहारी का जन्म ग्वालियर के पास बसुआ गोविन्दपुर में सन् 1595 ई. में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवराय था। बिहारी ने संस्कृत, ज्योतिष, नीति शास्त्र आदि का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया था। यह दिल्ली के शहजादे खुर्रम (शाहजहाँ) के आश्रय में कुछ समय रहे। आमेर के राजा जयसिंह ने इनकी वार्षिक वृत्ति बाँध दी। नई रानी के मोहपाश से जयसिंह को मुक्त करने के लिए, बिहारी ने एक दोहा राजा के पास भिजवाया। इस दोहे से राजा की आँखें खुल गईं और उसने प्रसन्न होकर बिहारी को जागीर प्रदान कर दी। इसके बाद बिहारी आमेर में ही रहने लगे। इनका निधन सन् 1663 में हुआ।

साहित्यिक परिचय

बिहारी का एकमात्र काव्य ग्रन्थ उनकी 'सतसैया' नामक रचना है। इसमें विविध विषयों पर 713 दोहे तथा सोरठे हैं। 'सतसैया' या सतसई पर अनेक कवियों और विद्वानों ने टीकाएँ लिखी हैं। इस काव्यग्रन्थ से बिहारी की बहुज्ञता और काव्य-कौशल का परिचय प्राप्त होता है। बिहारी श्रृंगारी कवि हैं और उन्हें चमत्कार युक्त कथन प्रस्तुत करना विशेष प्रिय है। श्रृंगार रस के सभी अंग बिहारी की कविता में उपस्थित हैं। अनुभावों के सजीव और हृदयस्पर्शी प्रस्तुतीकरण में बिहारी बहुत प्रवीण हैं। भक्ति तथा नीति पर भी बिहारी ने दोहों और सोरठों की रचना की है। बिहारी के कलापक्ष की सबसे बड़ी विशेषता दोहे जैसे छोटे छंद में वृहत् अर्थ भर देना है। इनके काव्य के बारे में 'गागर में सागर भरने' की उक्ति प्रचलित है।

इस पाठ में बिहारी के विविध विषयों पर रचित 24 दोहे संकलित हैं। इनमें भक्ति, नीति, श्रृंगार तथा रूप वर्णन आदि विषयों पर कवि ने अपने विचार, वर्णन कौशल और भक्ति भाव को परिचय कराया है। संकलन के प्रथम दोहे से पाँचवें दोहे तक बिहारी के भक्तिपरक दोहे संकलित हैं। इनमें कवि ने राधा नागरि से भव-बाधा दूर करने की प्रार्थना की है। अपनी कुटिलता के बल पर दीन दयाल की कृपा चाही है। अधमता को मोक्ष प्राप्ति को आधार बताया है। संसार सागर से पार जाने के लिए माला की पतवार और हरि नाम की नाव आवश्यक बताई है। 'श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों के शब्द-चित्र प्रस्तुत हुए हैं। वर्षा ऋतु वियोगिनी के लिए एक चुनौती बनकर आई है। कहीं वियोगिनी के विरह तप्त शरीर से लुएँ चल रही हैं। वियोग श्रृंगार का अत्युक्तिपूर्ण वर्णन हुआ है। वियोग को पांचाली का चीर बताया गया है। नीति-वर्णन के अनेक दोहे इस संकलन में विद्यमान हैं। प्रकृति वर्णन में प्रकृति के अनेक अंगों का चित्रण है। रूप वर्णन में कुटिल अलकों से मुख की शोभा में वृद्धि हो रही है। भौंह कमानों से अचूक निशाने लगाए जा रहे हैं।

दोहे

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

1. मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोई। जा तन की झाँईं परें, स्यामु हरित-दुति होइ॥ करौ कुवतु जगु कुटिलता, तजौं न दीनदयाल। दुखी हो हुगे सरल हिय, बसत त्रिभंगी लाल॥ मोहूँ दीजै मोषु, ज्यों अनेक अघमनु दियौ। जौ बाँधै ही तोषु, तौ बाँधौ अपनै गुननु॥

कठिन शब्दार्थ: भव-बाधा = सांसारिक कष्ट। हरौ = हर लो, दूर कर दो। नागरि = चतुर। सोइ = वे ही। झाँईं = झलक। स्याम = श्रीकृष्ण, नील वर्ण, पाप। हरित-दुति = हरी कान्ति, प्रसन्न, कान्तिहीन। कुबतु = बुराई, आलोचना। कुटिलता = टेढ़ापन, दुष्टता। तजौ न = नहीं छोड़ सकता। सरल = सीधा, कपटरहित। त्रिभंगी = तीन स्थानों से झुके हुए या टेढ़े। मोषु = मोक्ष, छुटकारा। अघमनु = पापियों को। बाँधे = बाँधने से। तोषु = संतोष । गुननु = गुणों से, रस्सियों से।

प्रसंग तथा संदर्भ: प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्य-पुस्तक अपरा में संग्रहीत बिहारी के दोहों से उधृत हैं। इन दोहों में कवि ने राधा नागरि और श्रीकृष्ण से सांसारिक कष्टों को दूर करने और उद्धार करने की प्रार्थना की है।

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

 

Question 1. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोई।
जा तन की झाँईं परें, स्यामु हरित-दुति होइ॥
करौ कुवतु जगु कुटिलता, तजौं न दीनदयाल।
दुखी हो हुगे सरल हिय, बसत त्रिभंगी लाल॥
मोहूँ दीजै मोषु, ज्यों अनेक अघमनु दियौ।
जौ बाँधै ही तोषु, तौ बाँधौ अपनै गुननु॥
Answer: कवि बिहारी ने इन दोहों में राधा और श्रीकृष्ण से अपनी सांसारिक बाधाओं को दूर करने और मोक्ष दिलाने की प्रार्थना की है। कवि पहले दोहे में राधा से कहते हैं कि हे चतुर राधा, मेरी सांसारिक बाधाओं को हर लो। जिनकी छाया मात्र पड़ने से श्रीकृष्ण हरे (प्रसन्न) या नीले (पाप रहित) हो जाते हैं। दूसरे दोहे में कवि भगवान से कहते हैं कि हे दयालु, मैं अपनी कुटिलता (टेढ़ापन) नहीं छोड़ूँगा, क्योंकि यदि मेरा हृदय सीधा हो गया, तो टेढ़े (त्रिभंगी) श्रीकृष्ण को उसमें रहने में असुविधा होगी। कवि चाहता है कि भगवान उसके टेढ़ेपन के साथ ही उसके हृदय में निवास करें। तीसरे दोहे में कवि भगवान से मुक्ति मांगते हुए तर्क देते हैं कि यदि आप पापियों को मोक्ष देते हैं, तो मुझे भी मोक्ष दीजिए। यदि आप मुझे बांधना ही चाहते हैं, तो अपने गुणों की रस्सी से बांधिए। कवि ने इन दोहों में श्लेष अलंकार का सुंदर प्रयोग किया है, और अपनी बात को तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।
In simple words: कवि राधा और श्रीकृष्ण से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे उनकी मुश्किलें दूर करें। कवि कहते हैं कि वे अपनी बुराई (कुटिलता) नहीं छोड़ेंगे ताकि टेढ़े रहने वाले भगवान उनके हृदय में आराम से रह सकें। कवि यह भी कहते हैं कि यदि भगवान पापियों को मुक्ति देते हैं, तो उन्हें भी मुक्ति मिलनी चाहिए, या फिर अपने गुणों से बांध लेना चाहिए।

🎯 Exam Tip: दोहे की व्याख्या करते समय, कठिन शब्दों के अर्थ बताएं और फिर दोहे के मूल भाव को सरल भाषा में समझाएं। अलंकार और कवि के विचारों को स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 2. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
पतवारी माला पकरि, और न कछु उपाउ।
तरि संसार पयोधि कौं, हरि नावें करि नाउ॥
तौ, बलियै, भलियै बनी, नागर नंद किसोर।
जौ तुम नीकै कै लख्यौ, मो करनी की ओर॥
Answer: इन दोहों में कवि बिहारी ने भगवान के नाम का स्मरण करने को ही संसार-सागर से पार होने का सबसे आसान उपाय बताया है। कवि भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि संसार-सागर को पार करने के लिए माला की पतवार पकड़ना और भगवान के नाम की नाव बनाना ही एकमात्र उपाय है। कवि कहते हैं, हे चतुर नंदकिशोर! मैं आप पर बलिहारी जाता हूँ। यदि आपने मेरे कर्मों पर ध्यान दिया, तो मेरा उद्धार होना संभव नहीं है। अब मुझे केवल आपकी कृपा पर ही भरोसा है। कवि मनुष्य को अहंकार त्यागकर भगवान की दया दृष्टि प्राप्त करने की सलाह देते हैं। कवि ने 'पतवारी माला', 'संसार-पयोधि' और 'हरी नावें करि नाउ' में रूपक अलंकार का प्रयोग किया है, जिससे बात अधिक प्रभावशाली बन गई है।
In simple words: कवि कहते हैं कि संसार की मुश्किलों से पार पाने का एक ही तरीका है - भगवान के नाम का जाप करना और उन पर भरोसा रखना। वह भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे उनके कर्मों को न देखकर केवल अपनी कृपा से उन्हें बचाएं।

🎯 Exam Tip: भक्तिपरक दोहों की व्याख्या करते समय, कवि की प्रार्थना, उनके इष्टदेव का स्वरूप और मोक्ष प्राप्ति के उपाय को स्पष्ट करें। अलंकारों का उल्लेख भी करें।

 

Question 3. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
अब तजि नाउँ उपाव कौं, आए पावस-मास।
खेलु न रहिबौ खेम सौं केम-कुसुम की वास।
Answer: इन पंक्तियों में वियोगिनी नायिका की सखी उसे आने वाले कठिन दिनों के लिए सावधान कर रही है। सखी नायिका से कहती है कि अब तक तुम अपने प्रियतम का नाम लेकर खुद को धैर्य बंधाती रही, लेकिन अब यह तरीका काम नहीं आएगा। वर्षा ऋतु आ गई है। वनों और बागों में कदंब के फूल खिल गए हैं। इन फूलों की मादक सुगंध फैलने पर मन को काबू में रखकर सकुशल रहना अब आसान खेल नहीं होगा। अब तुम्हें अपने प्रियतम की याद और भी अधिक सताएगी। इसलिए तुम्हें कुछ और उपाय सोचने होंगे, जिससे वर्षा के दिन किसी तरह निकल जाएं। कवि ने इस दोहे में व्यंजना शब्द शक्ति का उपयोग करते हुए एक विरहिणी की विरह-व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है।
In simple words: सखी अपनी दोस्त को समझा रही है कि अब वर्षा ऋतु आ गई है, और प्रियतम की याद से परेशान होना तय है। वह उसे कोई नया तरीका ढूंढने को कहती है ताकि वह इस दुख से बच सके।

🎯 Exam Tip: वियोग श्रृंगार के दोहों में, नायिका की मनोदशा, प्राकृतिक चित्रण और कवि द्वारा प्रयुक्त अलंकारों पर ध्यान दें। शब्दों का सटीक चयन व्याख्या को प्रभावशाली बनाता है।

 

Question 4. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
आवत जात न जानियतु, तेजहिं तजि सियरानु।
घरहँ जॅवाई लौं घट्यौ, खरौ पूस दिन मानु॥
Answer: इस दोहे में कवि ने पूस (दिसंबर-जनवरी) के महीने के दिनों की तुलना घर जमाई (ससुराल में रहने वाले दामाद) के स्वभाव में आने वाले बदलाव से की है। कवि कहते हैं कि पूस के महीने में दिन और घर जमाई का स्वभाव एक जैसा होता है। जैसे ससुराल में रहने वाला दामाद कब आता है और कब जाता है, इसका पता नहीं चलता। उसी तरह पूस के महीने में दिन कब शुरू होता है और कब खत्म हो जाता है, पता ही नहीं चलता। जिस प्रकार घर जमाई अपना तेज स्वभाव छोड़कर विनम्र हो जाता है, उसी प्रकार पूस का दिन भी अपनी गर्मी त्यागकर ठंडा हो गया है। जैसे घर जमाई का ससुराल में सम्मान कम हो जाता है, वैसे ही पूस के दिन का 'मान' (अवधि) भी घट गया है, यानी दिन छोटा हो गया है। कवि ने पूस के दिन की तुलना घर जमाई से करके सटीक उपमा दी है।
In simple words: कवि कहते हैं कि पूस के महीने में दिन ऐसे छोटे हो जाते हैं जैसे घर जमाई का ससुराल में सम्मान कम हो जाता है। दिन कब आता-जाता है पता ही नहीं चलता, ठीक वैसे ही जैसे घर जमाई की उपस्थिति पर कोई ध्यान नहीं देता।

🎯 Exam Tip: तुलनात्मक व्याख्या वाले दोहों में, उपमेय और उपमान की समानता तथा अंतर को स्पष्ट करते हुए कवि के व्यंग्य या संदेश को उजागर करें।

 

Question 5. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
सुनत पथिक-मुँह माह-निसि, चलति लुवें उहिं गाँम।
बिनु बुझें, बिनु ही कहैं, जियत बिचारी बाम॥
Answer: इस दोहे में कवि ने एक विरहिणी नायिका के विरह से तपते शरीर का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है। एक विरहिणी का पति काम के लिए विदेश गया था। उसके गांव से आए एक पथिक ने बताया कि उस गांव में माघ महीने की रात में भी गर्म हवाएं (लू) चल रही थीं। यह सुनकर विरहिणी के पति ने बिना कुछ पूछे ही समझ लिया कि उसकी पत्नी जीवित थी। इसका अर्थ यह है कि विरहिणी के वियोग की आग से तपते शरीर की गर्मी इतनी तीव्र थी कि माघ की ठंडी रात में भी गर्म हवाएं चल रही थीं। यह वर्णन अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर किया गया है, जो रीतिकालीन कविता की विशेषता है।
In simple words: एक यात्री ने बताया कि नायिका के गांव में ठंडी रात में भी गर्म हवा चल रही है। यह सुनकर उसके पति ने समझ लिया कि नायिका अभी जीवित है, क्योंकि उसकी विरह-वेदना इतनी तेज़ थी कि उससे ही ठंडी रात में भी गर्मी पैदा हो रही थी।

🎯 Exam Tip: अतिशयोक्ति अलंकार वाले दोहों की व्याख्या में, बढ़ा-चढ़ाकर किए गए वर्णन को स्पष्ट करें और उसके पीछे के मूल भाव (जैसे विरह की तीव्रता) को समझाएं।

 

Question 7. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
तंत्री-नाद, कवित्त-रस, सरस-राग, रति-रंग। अनबूड़े-बूड़े, तरे जे बूड़े सब अंग॥
कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय। उहिं खाए बौराइ जगु, इहिं पाए बौराइ॥
Answer: इन दोहों में कवि बिहारी ने नीति संबंधी बातें कही हैं। पहले दोहे में कवि संसार के सुखों से बचने वालों पर व्यंग्य करते हैं। कवि कहते हैं कि जो लोग वीणा के मधुर स्वरों, काव्य पाठ के आनंद, मन को मोह लेने वाले संगीत और प्रेम के सुखों में नहीं डूबते, उनका जीवन व्यर्थ है। जो इन सुखों का पूरी तरह आनंद लेते हैं, उनका ही जीवन सफल है। दूसरा दोहा धन के मद के बारे में है। कवि कहते हैं कि धतूरे की तुलना में सोने (धन) में सौ गुना अधिक नशा होता है। धतूरा खाने पर ही व्यक्ति पागल होता है, लेकिन सोना (धन) मिल जाने मात्र से ही व्यक्ति अहंकार के मद में पागल हो जाता है। कवि संदेश देते हैं कि मनुष्य सभी सांसारिक सुखों का आनंद ले, पर उन्हें ईश्वर से जोड़कर भोगे और धन के अहंकार से बचे। 'अनबूड़े-बूड़े' में विरोधाभास और 'कनक-कनक' में यमक अलंकार है।
In simple words: कवि कहते हैं कि जो लोग जीवन के सुखों (जैसे संगीत, कविता, प्रेम) का आनंद नहीं लेते, उनका जीवन बेकार है। वह यह भी समझाते हैं कि धन का नशा धतूरे से भी ज़्यादा होता है, क्योंकि धतूरा खाने पर नशा होता है, लेकिन धन तो बस मिलने भर से ही व्यक्ति को मदहोश कर देता है।

🎯 Exam Tip: नीतिपरक दोहों में कवि के नैतिक संदेश को सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत करें। यमक और विरोधाभास जैसे अलंकारों का प्रयोग किस प्रकार किया गया है, उसे भी बताएं।

 

Question 8. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
नहिं परागु, नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहिं काल।
अली, कली ही सौं बिंध्यौ, आगैं कौन हवाल॥
नीच हियँ हुलसे रहैं, गहे गेंद के पोत।
ज्यौं-ज्य माधैं मारियत, त्यौं-त्यौं ऊँचे होत॥
Answer: इन दोहों में कवि अन्योक्ति के माध्यम से राजा जयसिंह को चेतावनी दे रहे हैं और नीच व्यक्ति के स्वभाव की समानता गेंद से कर रहे हैं। पहले दोहे में कवि भौंरे के माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत करते हैं। कवि कहते हैं, हे पागल भौंरे! इस कली में न तो अभी सुगंधित पराग है, न मीठा शहद और न ही यह पूरी तरह खिली है। जब तुम इस अधखिली कली पर ही इतने आसक्त हो, तो इसके फूल बनने पर तुम्हारा क्या हाल होगा? कवि राजा जयसिंह को उनकी नई रानी के प्रेम में अत्यधिक लिप्त होने पर सचेत कर रहे हैं कि अभी तो रानी युवावस्था के आरंभ में है, जब वह पूरी तरह युवती होगी तब आपका राज-काज का क्या होगा? दूसरे दोहे में कवि नीच व्यक्ति के स्वभाव को गेंद के खेल जैसा बताते हैं। कवि कहते हैं कि नीच स्वभाव के लोग तभी ठीक रहते हैं जब उन्हें कठोर अनुशासन में रखा जाए। जिस प्रकार गेंद को जितनी जोर से धरती पर पटका जाता है, वह उतनी ही ऊंची उछलती है, वैसे ही नीच लोग भी कठोर व्यवहार से ही सुधरते और प्रसन्न रहते हैं।
In simple words: कवि राजा जयसिंह को चेतावनी देते हैं कि जैसे भौंरा अधखिली कली पर मोहित है, वैसे ही राजा को अपनी युवा रानी के प्रेम में राज-काज नहीं भूलना चाहिए। वह यह भी समझाते हैं कि नीच लोग गेंद की तरह होते हैं - उन्हें जितना दबाओ, वे उतना ही ऊपर उठते हैं, यानी कठोर व्यवहार से ही वे काबू में रहते हैं।

🎯 Exam Tip: अन्योक्ति अलंकार वाले दोहों में, प्रत्यक्ष बात के माध्यम से अप्रत्यक्ष संदेश को उजागर करें। नीच व्यक्ति के स्वभाव की तुलना करते समय, उदाहरण के पीछे के नैतिक संदेश को स्पष्ट करें।

 

Question 9. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
स्वारथु, सुकृत न श्रम वृथा, देखि, बिहंग बिचारि।
बाज, पराएँ पानि परि तूं पच्छीनु न मारि ॥
Answer: इस दोहे में कवि बिहारी ने अन्योक्ति के माध्यम से राजा जयसिंह को औरंगजेब की अधीनता में रहकर अपने ही धर्म के छोटे-छोटे राजाओं पर अत्याचार न करने का संदेश दिया है। कवि बाज को संबोधित करते हुए कहते हैं कि, हे पक्षी बाज! तू अपने मन में विचार कर। अपने स्वार्थ के लिए, दूसरों के हाथों में पड़कर, निरीह पक्षियों को मत मार। तेरी यह मेहनत व्यर्थ है, इसमें न तेरा कोई भला है और न कोई पुण्य। यहां 'बाज' राजा जयसिंह का प्रतीक है और 'पच्छीनु' (पक्षी) छोटे देशी राजाओं का। कवि राजा जयसिंह की धर्मबुद्धि को जगाना चाहते हैं और उन्हें औरंगजेब के हाथों की कठपुतली न बनने की सलाह देते हैं, ताकि वे अपने ही लोगों पर अत्याचार न करें।
In simple words: कवि बाज के ज़रिए राजा जयसिंह को समझाते हैं कि दूसरों के कहने पर अपने ही लोगों पर अत्याचार करना गलत है। यह स्वार्थ और पुण्य दोनों के लिए बुरा है।

🎯 Exam Tip: अन्योक्ति अलंकार के दोहों में, प्रतीकात्मक अर्थ को स्पष्ट करें और तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ को जोड़ते हुए व्याख्या करें। कवि के अप्रत्यक्ष संदेश पर विशेष ध्यान दें।

 

Question 10. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
लाज-लगाम न मानहीं, नैना मो बस नाहिं।
ए मुँहजोर तुरंग ज्यौं, ऐचत हूँ चलि जाहिं ॥
जोग-जुगति सिखए सबै, मनौ महामुनि नैन।
चाहत पिय-अद्वैतता कानन सेवत नैन॥
Answer: इन दोहों में कवि ने नायिकाओं के सुंदर, विशाल और हठी नेत्रों का वर्णन किया है। पहले दोहे में एक प्रेम में मग्न युवती कहती है कि उसके नेत्र उसके वश में नहीं हैं। ये नेत्र हठी घोड़ों के समान हैं, जो लगाम लगाने पर भी नहीं रुकते। उसी प्रकार उसके नेत्र भी लोक-लाज की चिंता न करते हुए, उसके रोकने पर भी न रुककर नायक (श्रीकृष्ण) की ओर खिंचे चले जाते हैं। अर्थात, लोक लज्जा के कारण युवती श्रीकृष्ण की ओर देखना नहीं चाहती, किंतु उसके नेत्र बरबस श्रीकृष्ण के सौंदर्य से आकर्षित होकर देखते रहते हैं। दूसरे दोहे में कवि कहता है कि ये विशाल नेत्र ऐसे लगते हैं मानो कामदेव रूपी महान मुनि ने इन्हें योग की सभी युक्तियां सिखा दी हों। इसलिए ये नेत्र कानों तक फैले हुए हैं और प्रियतम से एकाकार (मिलन) होना चाह रहे हैं। कवि ने यहां 'लाज-लगाम' में रूपक और 'मुँहजोर तुरंग ज्यौं' में उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग किया है।
In simple words: नायिका कहती है कि उसकी आंखें उसके वश में नहीं हैं। वे हठी घोड़े की तरह हैं जो रोकने पर भी नहीं रुकते और नायक की ओर खींचे चले जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे इन आंखों को प्रेम का पाठ सिखाया गया हो, इसलिए ये प्रिय से मिलना चाहती हैं।

🎯 Exam Tip: संयोग श्रृंगार के दोहों में, नायक-नायिका के प्रेम भाव, नेत्रों के वर्णन और अलंकारों (जैसे रूपक, उपमा) के प्रयोग को स्पष्ट करें। कवि के शब्द-चित्रण पर ध्यान दें।

 

Question 11. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
कौन सुनै, कासौं कहौं, सुरति विसारी नाह।
बदाबदी ज्यौं लेत हैं, ए बदरा बदराह॥
Answer: इस दोहे में एक विरहिणी नायिका वर्षा ऋतु में अपनी बढ़ी हुई विरह-वेदना को व्यक्त कर रही है। विरहिणी दुखी होकर कहती है कि उसकी पीड़ा को सुनने और समझने वाला कोई नहीं है। जिसे सुनना और समझना चाहिए था, उस उसके प्रियतम ने उसे भुला दिया है। ऐसे में यह बादल भी उससे जान-बूझकर बदला लेने पर तुले हुए हैं और उसकी वेदना को बढ़ा रहे हैं। विरहिणी की पीड़ा इस बात से और बढ़ जाती है कि बादल भी कुमार्गी (बदराह) बनकर उससे जान-बूझकर बदला ले रहे हैं। यहां विरह के कारण नायिका की वेदना को बादलों द्वारा और बढ़ाने का वर्णन किया गया है।
In simple words: एक विरहिणी नायिका कहती है कि उसके प्रिय ने उसे भुला दिया है और उसकी तकलीफ कोई नहीं सुन रहा। ऊपर से बादल भी जान-बूझकर उसकी उदासी बढ़ा रहे हैं।

🎯 Exam Tip: विरह-वर्णन वाले दोहों में, नायिका की मानसिक स्थिति, प्रकृति के तत्वों का उसके वियोग पर पड़ने वाले प्रभाव और कवि द्वारा प्रयुक्त मार्मिक शब्दों पर ध्यान दें।

 

Question 12. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
कुटिल अलक छुटि परतमुख, बढ़िगौ इतौ उदोतु।
बंक बकारी देत ज्यौं, दामु रुपैया होतु॥
Answer: इस दोहे में कवि ने एक सुंदरी के मुख पर लटकती हुई घुंघराली लटों के सौंदर्य का चमत्कारपूर्ण वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि जब उस सुंदरी के मुख पर घुंघराली अलकें (बालों की लटें) छूटकर लटक जाती हैं, तो उसके मुख की शोभा इतनी बढ़ जाती है, जैसे पहले के समय में 'बकारी' नामक तिरछा चिह्न लगाने मात्र से ही दमड़ी (बहुत कम मूल्य वाला सिक्का) रुपए के बराबर मूल्यवान हो जाती थी। यहां कवि ने 'बंक बकारी' शब्द में अनुप्रास अलंकार और पूरे दोहे में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग किया है। कवि ने मुँह पर अलकों के लटकने से होने वाली शोभा का एक अनोखा और आकर्षक चित्रण किया है।
In simple words: कवि कहते हैं कि जब एक सुंदर स्त्री के चेहरे पर घुंघराली लटें आती हैं, तो उसका चेहरा इतना खूबसूरत लगने लगता है, जैसे पहले के ज़माने में एक छोटे से निशान से सस्ती चीज़ भी महंगी हो जाती थी।

🎯 Exam Tip: रूप-सौंदर्य के दोहों में, कवि के सूक्ष्म अवलोकन, तुलनात्मक वर्णन और अलंकारों के प्रयोग (विशेषकर अतिशयोक्ति) को स्पष्ट करें। पुराने समय के संदर्भों को समझाएं।

 

Question 13. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
रह्यौ ऐचि अंतु न लहै, अवधि-दुसासनु बीरु।
आली, बाढ़तु विरह ज्यौं, पांचाली कौ चीरु ॥
Answer: इस दोहे में विरहिणी नायिका अपने वियोग की अवधि को द्रौपदी के चीर (साड़ी) के समान कभी समाप्त न होने वाला बता रही है। विरहिणी अपनी सखी से कहती है कि हे सखी! ऐसा लगता है कि मेरे वियोग की अवधि (दुःख) कभी समाप्त नहीं होगी। यह विरह तो दुःशासन द्वारा खींचे गए द्रौपदी के वस्त्र की तरह बढ़ता ही जा रहा है। जिस प्रकार कौरवों की राजसभा में दुःशासन द्रौपदी को वस्त्रहीन करने के लिए उसकी साड़ी को खींचता रहा, लेकिन वह समाप्त नहीं हुई, उसी प्रकार प्रियतम के लौटने की अवधि भी बीत नहीं रही है और मेरा विरह लगातार बढ़ता चला जा रहा है। यहां कवि ने विरह की तीव्रता का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है। 'अवधि-दुसासन' में रूपक अलंकार और 'बाढ़तु विरह ज्यौं पांचाली कौ चीरु' में उपमा अलंकार है।
In simple words: नायिका अपनी सखी से कहती है कि उसके प्रिय के आने का इंतज़ार और उसका विरह-दुख कभी खत्म नहीं होता, यह द्रौपदी की साड़ी की तरह बढ़ता ही जा रहा है।

🎯 Exam Tip: विरह की तुलना वाले दोहों में, तुलना के आधार (जैसे द्रौपदी का चीर) को स्पष्ट करें। अतिशयोक्ति और उपमा अलंकारों को पहचानें और उनके प्रभाव को बताएं। मुहावरों के प्रयोग को भी उजागर करें।

 

Question 14. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
दुसह दुराज प्रजानु कौं, क्यों न बढ़े दुख-दंदु।
अधिक अँधेरौ जग करत, मिलि मावस रवि-चंदु॥
Answer: इस दोहे में कवि ने 'दुराज' (बुरा शासन या दो राजाओं का शासन) में प्रजा को होने वाले कष्टों का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि जहां राज्य व्यवस्था में दो शासकों का हस्तक्षेप होता है, वहां प्रजा का कष्ट और झगड़े-झंझटों में पड़ना स्वाभाविक है। कवि इस तथ्य को प्रकृति के उदाहरण से प्रमाणित करते हैं। अमावस्या की रात को जब सूर्य और चंद्रमा एक साथ मिलते हैं, तो वे दुनिया में और अधिक अंधेरा कर देते हैं, न कि प्रकाश। यहां 'दुसह दुराज', 'दुख-दंदु' और 'मिलि मावस' में अनुप्रास अलंकार है, और पूरे दोहे में 'दृष्टांत' अलंकार का प्रयोग किया गया है। कवि ने इस दोहे के माध्यम से शासकों को संदेश दिया है कि प्रजा का हित उनके लिए सबसे ऊपर होना चाहिए।
In simple words: कवि कहते हैं कि जब किसी जगह दो राजा मिलकर शासन करते हैं, तो लोगों का दुख बढ़ जाता है। जैसे अमावस्या पर सूर्य और चंद्रमा के मिलने से अंधेरा और गहरा हो जाता है, वैसे ही दो राजाओं के शासन से लोगों को अधिक कष्ट होता है।

🎯 Exam Tip: नीतिपरक दोहों की व्याख्या में, कवि के संदेश को स्पष्ट करें और उसके समर्थन में दिए गए प्राकृतिक या सामाजिक उदाहरणों को समझाएं। अलंकारों का सही पहचान करें।

 

Question 15. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
तिय कित कमनैती पढ़ी, बिनु जिहि भौंह कमान।
चलचित-बेझै चुकति नहिं, बंकबिलोकनि-बान॥
Answer: इस दोहे में कवि ने एक युवती की धनुर्विद्या (बाण चलाने की कुशलता) का अद्भुत वर्णन किया है। कवि युवती से प्रश्न करते हैं कि, हे सुंदरी! तुमने यह अद्भुत धनुर्विद्या कहां से सीखी है? तुम तो बिना डोरी वाले भौंहों के धनुष पर तिरछी दृष्टि रूपी बाण चढ़ाकर, चंचल मन से भी अचूक निशाना लगाती हो। या, तुम चंचल चित्त वाले, रसिक युवाओं के हृदयों को वेध देती हो। यह असंभव प्रतीत होता है कि बिना डोरी के धनुष से बाण चलाया जाए और अचूक निशाना लगाया जाए, खासकर जब चित्त चंचल हो और दृष्टि तिरछी हो। लेकिन कवि ने अपनी उक्ति के चमत्कार से इसे संभव दिखाया है। यहां विरोधाभास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है। 'कित कमनैती' और 'बंक विलोकनि बान' में अनुप्रास अलंकार है।
In simple words: कवि एक सुंदर युवती से पूछते हैं कि उसने यह बाण चलाने की कला कहां से सीखी है। वह बिना धनुष की डोरी के, केवल अपनी तिरछी भौंहों और चंचल मन से ही अचूक निशाना लगा लेती है।

🎯 Exam Tip: चमत्कारपूर्ण वर्णन वाले दोहों में, कवि की कल्पना और अलंकारों (जैसे विरोधाभास, अनुप्रास) के प्रयोग को विस्तार से समझाएं। कठिन शब्दों के अर्थ अवश्य दें।

 

Question 16. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
आड़े दै आले बसन, जाड़े हूँ की राति।
साहसु ककै सनेह-बस, सखी सबै ढिंग जाति॥
Answer: इस दोहे में कवि ने एक विरहिणी नायिका के विरह से तपते शरीर का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है। जाड़े की ठंडी रात है, लेकिन विरहिणी के शरीर से इतनी गर्मी निकल रही है कि उसकी सखियां गीले कपड़े की आड़ लेकर, बहुत साहस जुटाकर स्नेहवश उसके पास जा रही हैं। यह बात स्वाभाविक नहीं है कि इतनी ठंड में भी किसी के शरीर से इतनी गर्मी निकले कि गर्म हवाएं चलें और सखियों को गीले कपड़ों की जरूरत पड़े। कवि बिहारी लाल ने यहां विरहिणी के विरह-ताप का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करके अतिशयोक्ति अलंकार का कमाल दिखाया है। 'सनेह-बस सखी सबै' में अनुप्रास अलंकार है।
In simple words: कवि कहते हैं कि जाड़े की रात में विरहिणी के शरीर से इतनी गर्मी निकल रही थी कि उसकी सखियों को गीले कपड़े ओढ़कर बड़ी हिम्मत से उसके पास जाना पड़ा।

🎯 Exam Tip: अतिशयोक्तिपूर्ण विरह-वर्णन में, कवि के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए चित्रण को स्पष्ट करें और उसके माध्यम से व्यक्त होने वाले विरह की पराकाष्ठा को बताएं।

 

Question 17. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
कौड़ा आँसू-बूंद, कसि सॉकर बरुनी सजल।
कीने बदन निर्मूद, दृग-मलिंग डारे रहत॥
Answer: इस दोहे में कवि ने एक विरहिणी के आंसुओं से भीगी और झुकी हुई आंखों की तुलना मलंग फकीर से की है। कवि कहते हैं कि इस विरहिणी के नेत्र मलंग फकीर के समान हैं। मलंग फकीर जैसे कौड़ी (मोती) धारण करते हैं, वैसे ही इन आंखों से टपकते हुए आंसू हैं। मलंग फकीर जैसे जंजीर से बंधे रहते हैं, वैसे ही इन आंखों की बरौनियाँ (पलकों के रोये) आंसुओं से भीगकर कस गई हैं। मलंग फकीर की तरह ये नेत्र भी मुख बंद करके नीचे झुके रहते हैं, मानो ध्यान में लीन हों। इस सोरठे में नेत्रों पर मलंग के स्वरूप का आरोप किया गया है, इसलिए यहां रूपक और सांगरूपक अलंकार हैं। कवि ने कम शब्दों में बहुत कुछ कहने का प्रयास किया है, हालांकि इस प्रयास में कुछ बाधा भी आ रही है।
In simple words: कवि एक विरहिणी की आंखों को मलंग फकीर जैसा बताते हैं। उनकी आंखें आंसुओं से भरी हैं और पलकें झुकी हुई हैं, जैसे फकीर ध्यान में लीन होते हैं और उनके पास कौड़ी होती है।

🎯 Exam Tip: रूपक और सांगरूपक अलंकार वाले दोहों की व्याख्या में, उपमेय और उपमान के बीच समानता को स्पष्ट करें और कवि के प्रतीकात्मक वर्णन के पीछे के भाव को समझाएं।

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