RBSE Solutions Class 11 Hindi Chapter 3 मीरा बाई

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Detailed Chapter 3 मीरा बाई RBSE Solutions for Class 11 Hindi

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Class 11 Hindi Chapter 3 मीरा बाई RBSE Solutions PDF

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 3 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. 'लियो री बजंता ढोल' पंक्ति में 'बजंता ढोल' से मीरा का आशय है
(क) प्रसन्न होकर
(ख) निशंक होकर
(ग) सबको दिखाकर
(घ) छिपकर
Answer: (ख) निशंक होकर
In simple words: मीरा का मतलब है कि उन्होंने बिना किसी डर या संकोच के अपने प्रियतम को स्वीकार किया है।

🎯 Exam Tip: वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में, पंक्ति या शब्द के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए पद के पूरे संदर्भ को ध्यान से पढ़ें।

 

Question 2. मीरा के पदों में किस भाव की प्रधानता है ?
(क) वीर

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 3 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. मीरा संसार को किस खेल के समान मानती है?
Answer: मीरा संसार को चौसर के खेल के समान मानती है जो शाम होने पर बंद हो जाता है।
In simple words: मीरा मानती हैं कि दुनिया चौसर के खेल जैसी है, जो शाम होते ही खत्म हो जाती है।

🎯 Exam Tip: 'संसार को किस खेल के समान माना है' जैसे प्रश्नों में, मीरा की फिलॉसफी को संक्षेप में स्पष्ट करें।

 

Question 2. सद्गुरु ने मीरा को कौन-सी अमूल्य वस्तु प्रदान की?
Answer: सद्गुरु ने मीरा को राम नाम रूपी अमूल्य वस्तु प्रदान की।
In simple words: सद्गुरु ने मीरा को भगवान राम का नाम दिया, जो उनके लिए अनमोल है।

🎯 Exam Tip: 'अमूल्य वस्तु' का उल्लेख करते समय, 'राम नाम' जैसे विशिष्ट शब्दों का प्रयोग करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. 'लियौ री आँखी खोल' कथन से मीरा का क्या आशय है ?
Answer: मीरा के कथन का आशय है कि उन्होंने श्रीकृष्ण का वरण किसी के कहने से नहीं अपितु अपनी अन्तरात्मा की प्रेरणा से किया है।
In simple words: मीरा कहती हैं कि उन्होंने भगवान कृष्ण को अपनी इच्छा और अंतरात्मा की आवाज सुनकर अपनाया है, किसी और के कहने पर नहीं।

🎯 Exam Tip: किसी कथन का आशय समझाते समय, उसके पीछे के मुख्य विचार या भावना को स्पष्ट करें।

 

Question 4. मीरा को किस रत्न की प्राप्ति हुई ?
Answer: मीरा को राम नाम रूपी अमूल्य रत्न की प्राप्ति हुई।
In simple words: मीरा को भगवान राम के नाम जैसा अनमोल रत्न मिला है।

🎯 Exam Tip: 'किस रत्न की प्राप्ति हुई' जैसे प्रश्नों में, सटीक उत्तर दें जैसे 'राम नाम रूपी अमूल्य रत्न'।

 

Question 5. मीरा की भक्ति किस कोटि की है ?
Answer: मीरा की भक्ति अत्यन्त उच्च कोटि की है, जो पूर्ण समर्पण और संसार से विराग के उपरान्त ही प्राप्त होती है।
In simple words: मीरा की भक्ति बहुत ऊंची श्रेणी की है। यह तब मिलती है जब कोई पूरी तरह खुद को समर्पित कर दे और दुनिया से लगाव छोड़ दे।

🎯 Exam Tip: 'भक्ति की कोटि' बताते समय, उसके मुख्य गुणों (जैसे पूर्ण समर्पण, विराग) को संक्षेप में बताएं।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 3 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. मीरा की संसार के प्रति क्या धारणा है और वह अपने मन को क्या प्रेरणा देती हैं ?
Answer: मीरा इस संसार को नाशवान मानती है। उनका कहना है कि धरती और आकाश के बीच जो कुछ भी दृश्यमान जगत है वह एक दिन नाशवान है। मीरा सतगुरु से राम नाम रूपी रत्न पाकर स्वयं को धन्य मान रही है। उनके अनुसार यह नाम-रत्न अमूल्य धन है। यह उन्हें गुरु कृपा से ही प्राप्त हुआ है। इस धन में अनेक विशेषताएँ हैं। वह सांसारिक धन के समान खर्च नहीं होता। इसे कोई चोर चुरा नहीं सकता और यह दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है। जितना इस नाम का जप किया जाता है उतनी ही इसके प्रभाव में वृद्धि होती जाती है।
In simple words: मीरा इस दुनिया को खत्म होने वाला मानती हैं। वे कहती हैं कि धरती और आकाश के बीच जो कुछ भी दिख रहा है, एक दिन नष्ट हो जाएगा। उन्हें अपने गुरु से राम नाम का अनमोल रत्न मिला है, जिसे कोई चुरा नहीं सकता और यह समय के साथ बढ़ता ही जाता है।

🎯 Exam Tip: धारणा और प्रेरणा दोनों को अलग-अलग स्पष्ट करें, जिससे उत्तर व्यवस्थित लगे।

 

Question 3. 'मीरा कें प्रभु दरसण दीज्यो, पूरब जनम को कोल' यहाँ 'पूरब जन्म को कोल' से क्या तात्पर्य है ?
Answer: इस पंक्ति में मीरा ने अपने प्रभु को स्मरण कराया है कि उन्होंने पूर्व (पिछले) जन्म में उन्हें दर्शन देने और अपनाने का वचन दिया था। अतः वह उनको शीघ्र दर्शन देकर विरह-वेदना से मुक्त कर दें। इस कथन के पीछे यह मान्यता चली आ रही है कि मीरा पिछले जन्म में ललिता सखी थीं जो कृष्ण को बहुत प्रेम करती थीं। कृष्ण ने उन्हें अगले जन्म में दर्शन देने का वचन दिया था।
In simple words: इस पंक्ति में मीरा भगवान को याद दिला रही हैं कि उन्होंने पिछले जन्म में उन्हें दर्शन देने का वादा किया था। मीरा चाहती हैं कि भगवान उन्हें जल्दी दर्शन देकर उनके दुख को खत्म कर दें, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि पिछले जन्म में मीरा कृष्ण की सखी ललिता थीं।

🎯 Exam Tip: 'तात्पर्य' वाले प्रश्नों में, सिर्फ शाब्दिक अर्थ नहीं बल्कि उसके पीछे के गहरे भाव और मान्यताओं को भी समझाएं।

 

Question 4. "सत की नाव खेवटिया सद्गुरु भव सागर तर आयो।" पंक्ति का आशय क्या है ?
Answer: गुरु को साक्षात् पारब्रह्म का स्वरूप माना गया है। बिना गुरु की शरण में जाए संसार रूपी भवसागर के पार जा पाना सम्भव नहीं है। मीरा को गुरु कृपा से ही 'राम रतन धन प्राप्त हुआ है'। इस पंक्ति द्वारा उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रही हैं। उनका कहना है कि उन्होंने प्रभु के संत नाम को नौका बनाया और गुरु को खेवनहार बनाया। इस प्रकार उन्होंने संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गई हैं।
In simple words: इस पंक्ति का मतलब है कि गुरु भगवान का ही रूप हैं। गुरु की मदद के बिना इस संसार रूपी सागर को पार करना मुश्किल है। मीरा को गुरु की कृपा से ही भगवान राम का नाम मिला है। मीरा कहती हैं कि उन्होंने भगवान के नाम को अपनी नाव और गुरु को मल्लाह बनाया, जिससे वे जन्म-मृत्यु के बंधन से आजाद हो गईं।

🎯 Exam Tip: किसी पंक्ति का आशय समझाते समय, उसके सभी मुख्य तत्वों (जैसे गुरु, नाव, भवसागर) को स्पष्ट करें।

 

Question 5. मीरा के अनुसार हमारी देह किस प्रकार की है ?
Answer: भारतीय दर्शन के अनुसार हमारी देह पंच महातत्वों से निर्मित है। क्षिति (पृथ्वी) जल, पावक (अग्नि) गगन (आकाश) समीर (वायु) साधु-संत इसे मिट्टी का बना, कच्चा घड़ा आदि कहते आए हैं। शरीर के प्रति तुच्छता का भाव हमारी संस्कृति की एक विचित्र मान्यता है। मीरा की भी मानव देह के प्रति यही भावना है। वह कहती हैं कि इस मनुष्य शरीर पर गर्व करना मूर्खता है क्योंकि एक दिन इसे मिट्टी में मिल जाना है। एक दृष्टि से मीरा का यह कथन यह संदेश भी देता है कि विनम्रता ही मनुष्य का भूषण है। अहंकार-चाहे वह तन का हो या धन का-सदा दुखदायी हुआ करता है। अतः इससे बचना चाहिए।
In simple words: मीरा के अनुसार, हमारा शरीर पांच तत्वों से बना है और यह मिट्टी के कच्चे घड़े जैसा है। इस पर घमंड करना बेकार है क्योंकि एक दिन यह मिट्टी में मिल जाएगा। इसलिए हमें विनम्र रहना चाहिए और किसी भी तरह के अहंकार से बचना चाहिए।

🎯 Exam Tip: 'देह की प्रकृति' पर प्रश्न आने पर, दार्शनिक और मीरा के निजी विचार दोनों को संतुलित रूप से प्रस्तुत करें।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 3 निबन्धात्मक प्रश्न

 

Question 1. मीरा की भक्ति भावना पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
Answer: उन्हें घर, परिवार और संसार किसी की आलोचना और व्यंग्य बाणों की चिन्ता नहीं। वह तो 'ढोल बजाकर' निशंके भाव से अपने प्रियतम का वरण करती हैं। उन्होंने आँखें खोल कर, तराजू पर तोल कर और अनमोल धन चुकाकर अपने प्रिय गोविन्द को पाया है। मीरा की भक्ति भावना की यदि कुछ तुलना की जा सकती है तो वह गोपियाँ की भक्ति से ही की जा सकती है। इस भक्ति में सहज समर्पण है, अपने प्रभु में अडिग निष्ठा है और अपने माधुर्यमय सम्बन्ध की सार्वजनिक स्वीकृति है। मीरा की भक्ति-भावना सचमुच अनुपम है।
In simple words: मीरा को दुनिया की परवाह नहीं है। वे बिना किसी डर के अपने प्रियतम को अपनाती हैं। उन्होंने खूब सोच-समझकर अपने गोविंद को पाया है। उनकी भक्ति गोपियों जैसी है, जिसमें पूरा समर्पण, भगवान पर पक्का विश्वास और उनके साथ प्रेम संबंध की खुली स्वीकारोक्ति है। मीरा की भक्ति सच में अनोखी है।

🎯 Exam Tip: भक्ति भावना का वर्णन करते समय, मीरा के व्यक्तिगत अनुभव, उनके रिश्ते और उनके समर्पण को उदाहरणों के साथ उजागर करें।

 

Question 2. मीरा के पदों की काव्यगत विशेषता बताइए।
Answer: हमारी पाठ्य-पुस्तक में मीराबाई के चार पद संकलित हैं। इन पदों में मीरा के पदों की प्राय: सभी काव्यगत विशेषताएँ उपस्थित हैं।
भाव-पक्ष – मीरा मूलतः एक कवयित्री नहीं हैं वह तो एक समर्पित भक्त हैं। अपनी भक्ति-भावना के प्रकाशन में उनके वियोगी हृदय से जो वाग्धारा प्रवाहित हुई है वही मीरा की कविता है। मीरा का काव्य भाव प्रधान है। माधुर्य भाव की भक्ति का आदर्श रूप मीरा के पदों में देखा जा सकता है। वह अपनी प्रत्येक भावना, व्यथा और समस्या अपने प्रभु गिरधर नागर को ही सुनाती है। जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने के लिए, वह अपने आराध्य श्रीकृष्ण के श्रीचरणों का ध्यान करने की प्रेरणा अपने मन को दे रही है। भज मन चरण-कँवल अविनासी' मीरा के काव्य की एक विशेषता उनकी विरह-वेदना का मर्मस्पर्शी प्रकाशन भी है। वह एक मिलन के लिए व्याकुल नारी-हृदय की पुकार है –
"दरस बिनु दूखण लागे नैन।
जब के तुम बिछुरे प्रभु मोरे, कबहुँ न पायौ चैन।"
इस विरह गीत में कोई बनावट, कोई प्रस्तावना या कोई कवित्व प्रदर्शन की कामना नहीं है। सीधा-सपाट एक व्याकुल मन को विरह गान है।
गुरु के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव मीरा के काव्य में उपस्थित है। गुरु-कृपा से उन्हें 'राम रतन धन' मिला है। मीरा के भाव पक्ष की एक विलक्षण विशेषता उनका दृढ़ आत्मविश्वास और परमप्रिय श्रीकृष्ण से प्रेम सम्बन्ध की सार्वजनिक स्वीकृति है। एक भक्त अपने भगवान को मोल ले ले और भगवान उसके हाथों बिक जाएँ। यह एक मीरा के भाव-पक्ष की एक अनूठी विशेषता है।
कला-पक्ष – मीरा का कवयित्री होना एक संयोग मात्र है। यह मीरा का लक्ष्य नहीं है। मीरा की भाषा राजस्थानी और ब्रजभाषा का मिश्रित स्वरूप है। मीरा की भाषा की भक्ति उसकी अकृत्रिमता, बनावट का अभाव है। मीरा ने मुहावरों और लोकोक्तियों को भी यथास्थान प्रयोग किया है। मीरा की समस्त रचनाएँ मुक्तक गीति शैली में हैं। उनकी गेयता और भाव-प्रवाह उन्हें आज तक लोकप्रिय बनाए हुए है। अलंकार स्वाभाविक रूप से उपस्थित हुए है। 'माटी में मिल', 'कथा का कहूँ', 'राम रतन धन' तथा 'अमोलक मोल' आदि में अनुप्रास अलंकार है।'जनम-जनम', दिन-दिन, 'हरखि-हरखि' में पुनरुक्ति प्रकाश तथा 'यो संसार चहर की बाजी' में उपमा तथा 'राम रतन धन', 'सत की नाव खेवटिया सत्गुरु' में रूपक अलंकार उपस्थित है। इस प्रकार मीरा काव्य भाव प्रधान काव्य है। भावपक्ष ही उनके काव्य का मूलधन है।
In simple words: मीरा के पदों में कई काव्यगत विशेषताएँ हैं।
भाव-पक्ष: मीरा मुख्य रूप से एक भक्त हैं। उनकी कविताएं उनके वियोगी हृदय से निकली हैं। उनके काव्य का मुख्य भाव माधुर्य है। वे अपनी हर भावना और समस्या भगवान कृष्ण को बताती हैं। उनके दुख और मिलन दोनों में प्रेम की गहरी भावना दिखती है। गुरु के प्रति उनकी श्रद्धा भी दिखती है, क्योंकि गुरु की कृपा से ही उन्हें राम नाम का धन मिला। मीरा की भक्ति में आत्मविश्वास और भगवान कृष्ण के साथ प्रेम संबंध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना खास है।
कला-पक्ष: मीरा की भाषा राजस्थानी और ब्रजभाषा का मिश्रण है। उनकी भाषा में सादगी और बनावट नहीं है। उनके पद गेय हैं और आज भी लोकप्रिय हैं। उनके काव्य में अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश, उपमा और रूपक जैसे अलंकार स्वाभाविक रूप से आते हैं। मीरा का काव्य भाव प्रधान है, और भाव ही उसकी मुख्य पूंजी है।

🎯 Exam Tip: काव्यगत विशेषताएँ बताते समय, भाव-पक्ष और कला-पक्ष को अलग-अलग शीर्षकों के तहत समझाना प्रभावी होता है।

 

Question 4. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) भज मन चरण - फाँसी ॥
(ख) मैंने राम रतन - जस गायो॥
Answer: यहाँ उत्तर में संकेत दिया गया है कि छात्र 'सप्रसंग व्याख्याएँ' प्रकरण का अवलोकन करके स्वयं व्याख्या लिखें। इसका अर्थ है कि उत्तर इस पाठ्यपुस्तक में अलग से नहीं दिया गया है, बल्कि उन्हें स्वयं ढूंढना होगा।
In simple words: इस प्रश्न का उत्तर सीधे तौर पर नहीं दिया गया है। छात्रों को स्वयं पाठ्यपुस्तक में दिए गए संदर्भों को देखकर इन पद्यांशों की व्याख्या करनी होगी।

🎯 Exam Tip: ऐसे प्रश्नों में जहाँ उत्तर के लिए किसी अन्य खंड का संदर्भ दिया गया हो, आपको उस संदर्भ को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए।

 

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 3 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 3 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. मीरा ने चरण कँवल' की विशेषता बताई है
(क) वे कोमल हैं
(ख) वे अति सुंदर हैं।
(ग) वे अविनाशी है।
(घ) वे शरणागत के रक्षक हैं।
Answer: (ग) वे अविनाशी है।
In simple words: मीरा ने कहा है कि भगवान के चरण कमल कभी नष्ट नहीं होते, वे हमेशा रहते हैं।

🎯 Exam Tip: किसी शब्द की विशेषता बताते समय, पद में दिए गए विशिष्ट गुण को याद रखें।

 

Question 2. श्रीकृष्ण के दर्शन के बिना मीरा की कैसी दशा हो गई है ?
(क) उनका हृदय व्याकुल है।

 

Question 3. गुरु से मीरा को मिला है –
(क) आशीर्वाद
(ख) मार्गदर्शन
(ग) आश्वासन
(घ) राम रतन
Answer: (घ) राम रतन
In simple words: मीरा को गुरु से राम का नाम मिला है, जिसे वे एक अनमोल रत्न मानती हैं।

🎯 Exam Tip: मीरा के पदों में गुरु की महत्ता और उनके द्वारा दी गई 'राम रतन' की पूंजी को याद रखें।

 

Question 4. मीरा ने मोल लिया है –
(क) भवन को
(ख) गोविन्द को
(ग) प्रभु के मंदिर को
(घ) श्रीकृष्ण की प्रतिमा को
Answer: (ख) गोविन्द को
In simple words: मीरा ने भगवान गोविंद को खरीदा है, यानी वे पूरी तरह से उनकी हो गई हैं।

🎯 Exam Tip: 'मोल लेना' का अर्थ यहाँ प्रतीकात्मक है, जिसका मतलब है भगवान को पूरी तरह से अपनाना।

 

Question 5. मीरा अपने प्रभु के दर्शन चाहती हैं –
(क) अपनी भक्ति के बल पर
(ख) अपने सर्वस्व समर्पण के आधार पर
(ग) पूर्व जन्म में श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए वचन के आधार पर
(घ) गुरु की कृपा के आधार पर
Answer: (ग) पूर्व जन्म में श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए वचन के आधार पर
In simple words: मीरा भगवान के दर्शन चाहती हैं क्योंकि भगवान ने उन्हें पिछले जन्म में दर्शन देने का वादा किया था।

🎯 Exam Tip: मीरा की भक्ति में 'पूर्व जन्म का वचन' एक महत्वपूर्ण तत्व है, जिसे उत्तर में शामिल करना चाहिए।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 3 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. मीरा मनुष्य-शरीर के बारे में क्या कहती हैं ?
Answer: मीरा का कहना है कि मनुष्य को अपने शरीर पर गर्व नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह नाशवान है।
In simple words: मीरा कहती हैं कि इंसानी शरीर पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह हमेशा रहने वाला नहीं है।

🎯 Exam Tip: मनुष्य शरीर की नश्वरता का उल्लेख करते हुए, मीरा के अहंकार त्याग के संदेश को भी स्पष्ट करें।

 

Question 3. मीरा हाथ जोड़कर गिरधर नागर से क्या अर्ज करती हैं ?
Answer: वह गिरधर नागर से प्रार्थना करती हैं कि वह उनको जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करके अपने चरणों में स्थान प्रदान करे।
In simple words: मीरा हाथ जोड़कर भगवान कृष्ण से विनती करती हैं कि वे उन्हें जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त कर अपने चरणों में जगह दें।

🎯 Exam Tip: 'अर्ज' का अर्थ प्रार्थना है, इसलिए उत्तर में प्रार्थना के मुख्य बिंदु (मुक्ति और शरण) को शामिल करें।

 

Question 4. बिरह कथा कासँ कहूँ सजनी' मीरा ने ऐसा क्यों कहा है ?
Answer: मीरा की विरह व्यथा को समझ सकने वाला श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई नहीं है। इसी कारण मीरा ने उपर्युक्त शब्द कहे हैं।
In simple words: मीरा ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि उनके दुख को भगवान कृष्ण के अलावा कोई और नहीं समझ सकता।

🎯 Exam Tip: विरह व्यथा की गहराई को समझाते हुए, मीरा के कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और विश्वास को दर्शाएं।

 

Question 5. मीरा का प्रभु से मिलन होने पर क्या होगा ?
Answer: इससे मीरा के सारे दुख दूर हो जाएंगे और उनका जीवन सुखों से भर जाएगा।
In simple words: जब मीरा भगवान से मिलेंगी, तो उनके सारे दुख खत्म हो जाएंगे और उनका जीवन खुशियों से भर जाएगा।

🎯 Exam Tip: मिलन के परिणाम बताते समय, भावनात्मक लाभ (दुख दूर, सुखमय जीवन) पर जोर दें।

 

Question 6. मीरा को सद्गुरु की कृपा किस रूप में प्राप्त हुई है ?
Answer: सद्गुरु ने मीरा को अपना बनाया है और उन्हें राम नाम रूपी अमूल्य धन प्रदान किया है।
In simple words: सद्गुरु ने मीरा को अपना शिष्य बनाया और उन्हें राम नाम का अनमोल उपहार दिया।

🎯 Exam Tip: गुरु कृपा के रूप में प्राप्त हुई वस्तु को स्पष्ट रूप से बताएं, जैसे 'राम नाम रूपी अमूल्य धन'।

 

Question 7. मीरा ने जनम जनम की पूँजी किसे माना है ?
Answer: मीरा ने मनुष्य जन्म पाने को जन्म-जन्मों के पुण्यों से प्राप्त पूँजी माना है क्योंकि इसी के द्वारा वह अपने प्रभु की भक्ति कर पा रही है।
In simple words: मीरा मानती हैं कि इंसान का जन्म लेना कई जन्मों के अच्छे कर्मों का फल है, क्योंकि इसी जीवन में वे भगवान की भक्ति कर सकती हैं।

🎯 Exam Tip: 'जन्म-जन्म की पूंजी' का अर्थ स्पष्ट करते हुए, मानव जीवन के महत्व को भी दर्शाएं।

 

Question 8. मीरा हर्षित होकर किसके यश का गान कर रही हैं ?
Answer: मीरा अपने प्रभु गिरधर नागर के तथा उनकी कृपा से प्राप्त गुरु के यश का गान कर रही हैं।
In simple words: मीरा अपने भगवान गिरधर नागर और अपने गुरु की महिमा गाकर खुश हैं, जिनकी कृपा उन्हें मिली है।

🎯 Exam Tip: यशगान के कारणों (प्रभु और गुरु की कृपा) को स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 9. 'लियो री बजंता ढोल' से मीरा का क्या आशय है ?
Answer: मीरा के कहने का आशय यह है कि उन्होंने कितने कष्ट, अपमान और विरह-वेदना सहकर गोविन्द से अपने नाते को पाला-पोसा है, इस बात को सब लोग जानते हैं।
In simple words: मीरा कहती हैं कि उन्होंने गोविंद को अपना बनाने के लिए बहुत दुख, अपमान और जुदाई सही है, और यह बात सब लोग जानते हैं।

🎯 Exam Tip: इस वाक्यांश के प्रतीकात्मक अर्थ को समझाते हुए, मीरा के समर्पण और दृढ़ता को दर्शाएं।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 3 लघूत्तरात्मक प्रश्न

 

Question 1. मीरा के काव्य का मुख्य भाव कौन सा है ? संकलित पदों के आधार पर इस भाव की उपस्थिति का उल्लेख कीजिए।
Answer: मीरा की कविता का प्रमुख भाव माधुर्य है। उन्होंने गिरधर गोपालं को अपना पति मानते हुए, अपनी अनुभूतियों और भावनाओं का प्रकाशन किया है। वियोग और संयोग दोनों स्थितियों में मीरा की माधुर्यमयी अभिव्यक्ति बड़ी मार्मिक है। मीरा का यह उपालम्भ (उलाहना) भी प्रेम के माधुर्य में भीगा हुआ है। उन्होंने शिकायत नहीं की है, उलाहना दिया है। वह पूछती हैं 'कबरे मिलौगे'? मीरा की विरह-वेदना भी माधुर्य से सिक्त है। गोविन्द का मोल लेना भी माधुर्य और प्रसन्नतासूचक अभिव्यक्ति है। गोविन्द से अपने मधुर सम्बन्ध की हास-परिहासमयी सूचना उनका हृदय हरि के आगमन की राह देखते हुए धड़कने लगता है। उन्हें एक पल के लिए भी चैन नहीं आता। उनके लिए एक रात छह महीने जितनी लंबी लग रही है, जो बीतती ही नहीं। मीरा अपने प्रभु से पूछती हैं कि वे उन्हें कब दर्शन देकर विरह-व्यथा से मुक्ति देंगे?
In simple words: मीरा की कविताओं का मुख्य भाव प्रेम और माधुर्य है। वे भगवान कृष्ण को अपना पति मानकर अपनी भावनाएं बताती हैं। उनके दुख और मिलन दोनों में प्रेम की गहरी भावना दिखती है। गोविंद को अपना बनाना भी उनके प्रेम की एक खुशी भरी बात है। उनका मन भगवान के आने का इंतजार करता है, उन्हें बिल्कुल चैन नहीं मिलता। एक रात भी उन्हें छह महीने जैसी लंबी लगती है। वे भगवान से पूछती हैं कि वे कब दर्शन देकर उनके दुख को खत्म करेंगे।

🎯 Exam Tip: 'मुख्य भाव' का वर्णन करते समय, प्रेम, वियोग, और मिलन के पहलुओं को उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें।

 

Question 2. 'भज मन चरण-कँवल अविनासी', इस पद में मीरा ने अपने मन को क्या-क्या चेतावनी दी हैं ? लिखिए।
Answer: मीरा संकेत करती हैं-हे मेरे मन! तू प्रभू श्रीकृष्ण के अविनाशी चरणों का भजन कर-क्योंकि इनके अतिरिक्त इस सृष्टि में सब नष्ट होने वाला है। वह सावधान करती हैं-इस मनुष्य शरीर को पाकर अहंकार मत करने लगना। इसे तो कुछ समय बाद मिट्टी में मिल जाना है। यह सांसारिक जीवन तो चौसर के खेल के समान है। शाम होते ही खिलाड़ी खेल बन्द करके चल देते हैं। भाव यह है। कि श्रीकृष्ण के चरण ही सदा-सदा रहने वाले हैं। संसार की बाकी सभी वस्तुएँ नश्वर हैं। अतः इनके मोहजाल में फंसना मूर्खता है। "
In simple words: मीरा अपने मन को चेतावनी देती हैं कि भगवान कृष्ण के अमर चरणों का भजन करो, क्योंकि उनके अलावा सब कुछ नाशवान है। वे कहती हैं कि इस शरीर पर घमंड मत करो, यह मिट्टी में मिल जाएगा। यह दुनिया चौसर के खेल जैसी है, जो खत्म हो जाती है। इसलिए दुनिया के मोह में फंसना मूर्खता है।

🎯 Exam Tip: 'चेतावनियां' बताते समय, हर चेतावनी को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें ताकि उत्तर सटीक लगे।

 

Question 3. मीरा ने संन्यासियों और योगियों पर क्या व्यंग्य किया है ? संकलित पद के आधार पर लिखिए।
Answer: मीरा उन संन्यासियों और योगियों पर व्यंग्य कर रही है जो केवल बाहरी उपायों से संन्यास और योग का फल पाना चाहते हैं। मीरा कहती है कि भगवा रंग के कपड़े धारण कर लेने से या घर त्याग कर देने से ही कोई संन्यासी नहीं हो जाता। जब तक मन सांसारिक विषयों के मोह से मुक्त नहीं होता तब तक संन्यास का कोई अर्थ नहीं। इसी प्रकार योगी तो बन गए लेकिन योग साधना के बाद भी 'योग' अर्थात् परमात्मा से एकाकार होने की युक्ति नहीं आई तो ऐसे योगभ्रष्टे को फिर से संसार में जन्म लेना पड़ता है।
In simple words: मीरा उन संन्यासियों और योगियों पर तंज कसती हैं जो सिर्फ बाहरी दिखावे से ही मुक्ति पाना चाहते हैं। वे कहती हैं कि सिर्फ भगवा कपड़े पहनने या घर छोड़ने से कोई सच्चा संन्यासी नहीं बन जाता। जब तक मन दुनिया के मोह से आजाद न हो, संन्यास का कोई मतलब नहीं। अगर योगी परमात्मा से जुड़ने की कला नहीं सीख पाते, तो उन्हें फिर से दुनिया में जन्म लेना पड़ता है।

🎯 Exam Tip: व्यंग्य को स्पष्ट करते हुए, मीरा के अनुसार सच्चे संन्यास और योग के आंतरिक महत्व को उजागर करें।

 

Question 5. 'जनम-जनम की पूँजी पाई' पंक्ति में मीरा ने जन्म-जन्मों की पूँजी किसे कहा है?
Answer: मीरा ने इस पंक्ति में जन्म-जन्मों की पूँजी मनुष्य देह को तथा गुरु से प्राप्त 'राम रतन धन' को कहा है। जीव जगत में मनुष्य शरीर ही ऐसा है जिसके माध्यम से कर्म, धन, विद्या आदि का साधन सम्भव है। इसलिए मीरा मनुष्य जन्म पाने को, अपने पिछले अनेक जन्मों का सुफल मानती है। इसके साथ ही गुरुकृपा से प्राप्त भगवान नाम का मंत्र भी कम मूल्यवान नहीं। उसी के जप से भगवत प्राप्ति हो सकती है। मानव जन्म सफल हो सकता है। यह ऐसी पूँजी है जो कभी घुटती नहीं।
In simple words: इस पंक्ति में मीरा ने इंसान के शरीर और गुरु से मिले 'राम नाम' को कई जन्मों की पूंजी कहा है। वे मानती हैं कि यह मानव शरीर कई जन्मों के अच्छे कर्मों का फल है, क्योंकि इसी से भगवान का नाम जपा जा सकता है और मुक्ति मिल सकती है। यह पूंजी कभी खत्म नहीं होती।

🎯 Exam Tip: 'जन्म-जन्म की पूंजी' का अर्थ समझाते समय, मानव जीवन और राम नाम दोनों के महत्व को विस्तार से बताएं।

 

Question 6. 'लियौ री अमोलक मोल' मीरा ने अपने गोविन्द को किस अमूल्य वस्तु से मोल लिया है ? स्पष्ट कीजिए।
Answer: श्रीकृष्ण जैसी वस्तु को मोल लेना किसी साधारण व्यक्ति और साधरण मूल्य द्वारा सम्भव नहीं हो सकता है। इसे खरीदने वाला तथा इसका मूल्य दोनों ही असाधारण हैं। मीरा ने गोविन्द को पाने के लिए क्या-क्या त्याग नहीं किया। उपेक्षा, तिरस्कार, प्राणों पर संकट और घरबार का त्याग, ये सभी कष्ट मीरा ने गिरधर नागर से अपने प्रेम के लिए सहन किए। यह प्रेम ही वह पूँजी है जिससे मीरा ने गोविन्द को मोल ले लिया है।
In simple words: मीरा ने भगवान गोविंद को अपने गहरे प्रेम और भक्ति से मोल लिया है। उन्होंने गोविंद को पाने के लिए दुनिया की उपेक्षा, अपमान, संकट और घर-बार सब कुछ त्याग दिया। उनका यह प्रेम ही वह अनमोल चीज़ है जिससे उन्होंने गोविंद को अपना बना लिया।

🎯 Exam Tip: 'अमूल्य वस्तु' के रूप में मीरा के अटूट प्रेम और त्याग को विस्तार से समझाएं।

 

Question 7. श्रीकृष्ण को मोल लेने के लिए मीरा ने वे सारे मानदण्ड अपनाए हैं जो एक उत्तम वस्तु खरीदते समय लोग अपनाते हैं। संकलित पद के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए।
Answer: साधारण वस्तु क्रय करते समय भी व्यक्ति उसकी भली भाँति जाँच-परख करता है और उपयुक्त मूल्य ही चुकाता है। मीरा ने भी ऐसा ही किया है। उन्होंने सारे समाज को साक्षी बनाकर-ढोल बजाकर अपने गोविन्द को मोल लिया है। तराजू-बुद्धि-विवेक और भावना से तोल कर ही गोविन्द को स्वीकर किया है। बुद्धिमान व्यक्ति, कोई भी बहुमूल्य वस्तु दूसरों के कहने मात्र से नहीं, अपितु स्वयं आँखें खोलकर, मूल्यांकन करके ही लिया करता है। मीरा ने भी ऐसा ही किया है। साथ ही क्रय की जाने वाली वस्तु के स्तर के अनुकूल ही मूल्य भी चुकाया है। अतः भक्तों की शिरोमणि मीरा ने, हर दृष्टि से एक उत्तम सौदा किया है।
In simple words: जिस तरह लोग अच्छी चीज़ खरीदते समय उसकी पूरी जांच-परख करते हैं, मीरा ने भी भगवान कृष्ण को अपनाते समय वैसा ही किया। उन्होंने समाज के सामने ढोल बजाकर, अपनी बुद्धि और भावनाओं से परखकर गोविंद को स्वीकार किया। मीरा ने यह सौदा पूरी तरह सोच-समझकर किया, जैसे कोई बुद्धिमान व्यक्ति कोई कीमती चीज़ खरीदता है।

🎯 Exam Tip: समीक्षा करते समय, मीरा के कार्य को सामान्य खरीद के 'मानदण्डों' से तुलना करें और मीरा के अद्वितीय प्रेम को स्पष्ट करें।

 

Question 8. अपनी पाठ्य-पुस्तक में संकलित पदों के आधार पर बताइए कि मीरा का सामान्य जन और भक्तजन को क्या संदेश है ?
Answer: मीरा ने काव्य-रचना किसी को कोई संदेश या उपदेश देने के लिए नहीं की है, फिर भी संकलित पदों से, उनमें निहित संदेश ध्वनित हो रहे हैं।
In simple words: मीरा ने कविताएँ किसी को उपदेश देने के लिए नहीं लिखीं, लेकिन उनके पदों में आम लोगों और भक्तों के लिए कई संदेश छिपे हैं।

🎯 Exam Tip: मीरा के संदेश को संक्षेप में बताते हुए, उनके पदों के अंतर्निहित शिक्षाओं पर ध्यान केंद्रित करें।

RBSE Class 11 Hindi अपरा Chapter 3 निबंधात्मक प्रश्न

 

Question 1. भज मन चरण कँवल अविनासी।” पद में मीरा ने ईश्वर की सगुण-साकार रूप में-उपासना का संदेश दिया है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ? अपने विचार लिखिए।
Answer: मीरा स्वयं भी स्वरूप और गुणसम्पन्न श्रीकृष्ण की उपासिका हैं। अत: उनका सगुण उपासना को समर्थन देना स्वाभाविक है। पद में 'चरण-कॅवल' श्रीकृष्ण के ही चरणों के लिए कहा गया है। निराकार ईश्वर के चरण होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसी प्रकार पद में संन्यास और योग को कठिन उपाय माना है। इनमें चूक होने की सम्भावना रहती है। अतः साधक को मन पर कठोर नियंत्रण रखना पड़ता है। भक्ति साकार ईश्वर की उपासना पद्धति है। इसमें मन को प्रभु से जोड़ने का प्रयास रहता है। इस उपासना में भूल-चूक-क्षमा कर दी जाती हैं। इस प्रकार ईश्वर के साकार स्वरूप श्रीकृष्ण से प्रेम और उनकी भक्ति ही, मीरा के अनुसार सबसे सुगम मार्ग है।
In simple words: मीरा खुद भी साकार भगवान कृष्ण की भक्त हैं, इसलिए वे सगुण भक्ति का समर्थन करती हैं। पद में 'चरण-कमल' भगवान कृष्ण के चरणों के लिए ही कहा गया है। मीरा संन्यास और योग को मुश्किल रास्ता मानती हैं, क्योंकि उनमें गलतियाँ होने की संभावना रहती है। साकार ईश्वर की भक्ति सबसे आसान तरीका है, जहाँ मन को भगवान से जोड़ा जाता है और गलतियों को माफ कर दिया जाता है।

🎯 Exam Tip: अपने विचार व्यक्त करते समय, सगुण भक्ति के पक्ष में मीरा के तर्क और उसके लाभों को स्पष्ट करें।

 

Question 2. प्रभु की कृपा पाने के लिए गुरु की कृपा भी आवश्यक है। “मैंने राम रतन धन पायौ” पद के आधार पर इस कथन पर अपना मत स्पष्ट कीजिए।
Answer: उपर्युक्त पद में मीरा ने अपने सतगुरु की महिमा का गान किया है। गुरु ने उन पर कृपा करते हुए उन्हें राम नाम रूपी अमूल्य धन प्रदान किया है। इस नाम स्मरण मंत्र के बिना मीरा के अपने प्रभु गिरधर नागर की कृपा कैसे प्राप्त हो सकती थी। गुरु द्वारा मार्ग-दर्शन किए जाने पर ही भक्त भगवान तक पहुँच पाता है। गुरु तो एक मार्गदर्शक है, साधना तो भक्त को ही करनी पड़ती है। मीरा ने भी अपने प्रभु की कृपा पाने के लिए कठोर साधना की। परिवार, समाज, व्यंग्य, आक्षेप आदि कितनी बाधाओं को पार करते हुए मीरा कृष्णमय हो पायी, यह सर्वविदित है। अतः प्रभु कृपा रूपी लक्ष्य को पाने के लिए गुरुकृपा का सहयोग भी परम आवश्यक है।
In simple words: मीरा ने 'मैंने राम रतन धन पायौ' पद में अपने गुरु की महिमा बताई है। गुरु ने ही उन्हें राम नाम का अनमोल धन दिया। गुरु के बिना भगवान की कृपा नहीं मिल सकती, क्योंकि गुरु ही रास्ता दिखाते हैं। मीरा ने भी भगवान की कृपा पाने के लिए बहुत मेहनत की और कई बाधाओं को पार किया। इसलिए भगवान की कृपा पाने के लिए गुरु की कृपा बहुत जरूरी है।

🎯 Exam Tip: गुरु और प्रभु की कृपा के बीच के संबंध को तर्क के साथ प्रस्तुत करें, और मीरा के उदाहरण से अपने मत को पुष्ट करें।

मीराबाई कवयित्री परिचय

जीवन परिचय-गिरधर गोपाल की अनन्य आराधिका, कृष्ण-प्रेम की साक्षात् प्रतिमूर्ति मीराबाई का हिन्दी के कृष्ण भक्त कवियों में एक विशिष्ट स्थान है। मीरा के जन्म तथा जीवन के विषय में विद्वान एक मते नहीं हैं। मीरा मेड़ता के राव रत्नसिंह की पुत्री थीं। इनका जन्म 1498 ई. में माना जाता है। राणा साँगा के पुत्र भोजराज से मीरा का विवाह हुआ किन्तु भोजराज के युद्ध में वीरगति पाने पर मीरा असमय ही विधवा हो गईं। मीरा को बचपन से कृष्ण के प्रति अनुराग था। वह श्रीकृष्ण को ही अपना पति मानती थीं। विधवा होने के पश्चात भगवद् भक्ति में मीरा की रुचि बढ़ती चली गई। मीरा का साधु-संतों की संगति करना राजपरिवार को स्वीकार नहीं था। उनका बहुत विरोध हुआ और अंतत: मीरा घर-परिवार त्याग कर प्रियतम कृष्ण की दीवानी बनी हुई उनके लीलास्थलों में रहीं। अंत में वह द्वारका चली गई और वहीं कृष्ण की मूर्ति से एकाकार हो गई, ऐसा विश्वास है।

काव्य-परिचय-रचनाएँ-मीरा रचित चार ग्रन्थ माने गए हैं-

मीरा ने प्रमुखतः पदों की रचना की। उनके पदों की भाषा राजस्थानी का मिश्रित ब्रजभाषा है। मीरा ने कवित्व प्रदर्शन के लिए पद-रचना नहीं की थी। अपने इष्ट और सर्वस्व कृष्ण के प्रति अपनी भावनाओं को ही उन्होंने कविता के माध्यम से व्यक्त किया है। कृष्ण-मिलन की उनकी आतुरता, विरह जन्य वेदना, संसार की असारता, सहज भक्तिभाव आदि उनकी रचनाओं के विषय हैं।

एक प्रेमाकुल नारी हृदय की भाव-व्यंजना माधुर्य और प्रसाद गुणों के साथ, सीधी-सादी शैली में व्यक्त होकर उनकी कविता बन गई है। इसी कारण उनके पद बड़े लोकप्रिय रहे हैं। मीरा भक्तिभाव और सम्पूर्ण समर्पण का आदर्श है।

पाठ-परिचय

संकलित पदों में श्रीकृष्ण के प्रति उनकी अनन्य प्रेम-भावना व्यक्त हुई है। प्रथम पद में वह अविनाशी प्रभु के चरण-कमलों की वंदना करते हुए, सांसारिक जीवन की असारता का उल्लेख कर रही हैं। उनके अनुसार बाहरी वेश-भूषा और अहंकार के द्वारा मुक्ति नहीं मिल सकती। प्रभु को मानने और कृपा पाने पर ही मनुष्य जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो सकता है।

दूसरे पद में मीरा की विरह वेदना साकार हुई। वह कृष्ण-मिलन के लिए अत्यन्त व्याकुल है।

तीसरे पद में प्रभुनाम रूपी अमूल्य धन की प्रशंसा की गई है और चौथे पद में मीरा स्पष्ट घोषणा कर रही हैं कि उन्होंने अपने प्रेम रूपी धन से अपने प्रिय श्रीकृष्ण को अपना बनाया है। यह सौदा उन्होंने चुपचाप या छिपकर नहीं, बल्कि ढोल बजाकर, सबको जताकर, किया है। उन्हें विश्वास है कि उनके प्रियतम श्रीकृष्ण उन्हें दर्शन देकर अवश्य कृतार्थ करेंगे।

पदावली

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

 

1. भज मन! चरण-कँवल अविनासी।

जेताई दीसै धरणि-गगन विच, तेता (इ) सब उठ जासी ॥
इस देही का गरब न करणा, माटी में मिल जासी।
यो संसार चहर की बाजी, साँझ पड्यां उठ जासी॥
कहा भयो है भगवा पहरयाँ, घरे तज भए सन्यासी।
जोगी होइ जुगति नहिं जांणी, उलटि जनम फिर आसी॥
अरज करूँ अबला कर जोरे, स्याम! तुम्हारी दासी।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर! काटो जम की फाँसी ॥

कठिन शब्दार्थ:

कँवले = कमल। अविनासी = नष्ट न होने वाला, शाश्वत। जेताई = जितना भी। धरणि = धरती। गगन = आकाश। बिच = बीच में। तेता = उतना। उठ जासी = नष्ट हो जाएगा। देही = शरीर। गरबे = गर्व, अहंकार। जासी = जाएगा। यो = यह। चहर की बाजी = चौसर नामक खेल की बाजी। उठ जासी = उठ जाएगी, खेल समाप्त हो जाएगा। भगवा = साधु-संन्यासियों द्वारा पहने जाने वाले

आत्मकल्याण चाहने वाले लोगों को संबोधित कर रही है। वह कहती है कि धरती से आकाश तक जितना भी यह दृश्यमान जगत है, यह सभी एक दिन नष्ट हो जाएगा। केवल श्रीकृष्ण के चरण ही अविनाशी हैं अतः उन्हीं का आश्रय लेना बुद्धिमानी है। इस मनुष्य शरीर की सुंदरता या बल पर गर्व करना मूर्खता है। यह तो एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। यह सारा संसार चौसर खेल की बाजी जैसा है जो शाम होते ही उठ जाती है। संसार का मोह त्यागे बिना भगवा वस्त्र धारण करने या घर को त्यागकर संन्यासी हो जाने से कोई लाभ नहीं होने वाला। योगी तो बन गए लेकिन मुक्ति की युक्ति नहीं जान पाए तो ऐसे योग से क्या लाभ? मीरा अपने प्रभु श्यामसुंदर से प्रार्थना करती हैं कि वह उनकी दासी है। अतः वह उनको यम के फन्दे से-जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त करने की कृपा करें।

विशेष-

(i) मीरा का संदेश है कि मन को नाशवान सांसारिक-विषयों से विमुख करके भगवान के श्रीचरणों में लगाने से ही मनुष्य काल-चक्र से मुक्त हो सकता है। बाहरी वेश-भूषा और उपायों से कुछ लाभ नहीं हो सकता।
(ii) राजस्थानी मिश्रित श्रवण सुखद ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।
(iii) यो संसार चहर की बाजी में उपमा अलंकार है।

 

2. दरस बिनु दुखण लागे नैन।

जब के तुम बिछुरे प्रभु मोरे, कबहुँ न पायो चैन॥
सबद सुनत मेरी छतियाँ कांपै, मीठे-मीठे बैन।
बिरह बिथा का कहूँ सजनी, बह गई करवत अन॥
कल न परत पल, हरि मग जोवत, भई छमासी रैण।
मीरा के प्रभु कबरे मिलौगे, दुख मेटण सुख दैण॥

कठिन शब्दार्थ- दरस = दर्शन। दूखण = दुखना। सबद = शब्द, आहट। बैन = वचन, शब्द। बिथा = व्यथा, वेदना। बह गई = बीत गई। करबत = करवट। कल = चैन। मग = मार्ग। जोवत = देखते। छमासी = छह मास जितनी बड़ी बहुत लम्बी। रैण = रात। मेटण = मिटाने को। दैण = देने को।

प्रसंग तथा संदर्भ- प्रस्तुत पद भक्तशिरोमणि मीराबाई की रचना है। मीरा अपने प्रभु श्रीकृष्ण को अपनी विरह-व्यथा और निरंतर प्रतीक्षा में बीत रहीं घड़ियों का हाल निवेदित कर रही हैं।

व्याख्या- मीरा अपने परमप्रिय श्रीकृष्ण से कह रही है कि उनके दर्शन के बिना उनके प्रतीक्षा करने वाले नेत्र अब दुखने लगे हैं। मीरा कहती हैं-हे प्रभु! जब से आप बिछुड़े हो, मेरे मन को कभी चैन नहीं मिल पाया। तनिक-सी आहट होते ही मेरा हृदये काँपने लगता है कि कहीं आप तो नहीं आए। मुझे लगता है कि अभी आप मधुर स्वर में मुझे पुकारोगे। मीरा कहती है-हे सखि! मैं अपनी विरह-वेदना किसे सुनाऊँ। मेरी रातें तो करवट लेते बीत जाती हैं। मुझे एक पल को भी चैन नहीं मिलता। प्रियतम श्रीकृष्ण के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए मुझे एक रात छह मास जितनी लम्बी प्रतीत होती है। मीरा कहती है-हे मेरे प्रभु! आप मुझे कब दर्शन दोगे। आपके दर्शन और मिलन से ही मेरे दुख दूर होंगे और मेरा मन सुखी हो पाएगा।

 

मैंने राम रतन धन पायो।

बसत अमोलक दी मेरे सतगुर, करि किरपा अपणायो॥
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सबै खोवायो।
खरचै नहिं चोर न लेवें, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाव खेवटिया सतगुर, भवसागर तरि आयो।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर हरखि-हरखि जस गायो॥

कठिन शब्दार्थ- राम रतन धन = राम नाम या प्रभु नाम रूपी अमूल्य रत्न। बसत = वस्तु। अमोलक = अत्यन्त मूल्यवान। किरपा = कृपा। खरचै नहिं = घटती नहीं। सवायो = सवा गुना एक और चौथाई के बराबर। सत = सत्य। खेवटिया = केवट, मल्लाह। भवसागरः संसार या जीवनरूपी समुद्र। तरि आयो = पार कर लिया। हरखि = प्रसन्न होकर। जस = यश।

प्रसंग तथा संदर्भ- प्रस्तुत पद मीराबाई की रचना है। इस पद में मीराबाई अपने सद्‌गुरु का कृपा कर रही हैं। सद्‌गुरु ने उन्हें राम नाम रूपी अमूल्य रत्न प्रदान किया है और उन्हें भवसागर से पार किया है।

व्याख्या- मीरा कहती है कि उन्हें गुरु कृपा से राम नाम रूपी अमूल्य धन प्राप्त हुआ है। उनके सद्‌गुरु ने कृपा करके उन्हें यह अद्भुत धन प्रदान किया है और अपने चरणों में स्थान दिया है। जन्म-जन्मातर के पुण्यों के फल से उन्हें यह मनुष्य शरीर प्राप्त हुआ है। किन्तु अज्ञानवश यह संसार के सुखों में नष्ट हो रहा था। किन्तु गुरु ने मुझे राम रतनधन देकर निहाल कर दिया। मुझे जीवन का सही लक्ष्य-प्रभु के नाम का स्मरण-बताया। यह ऐसा धन है जो खर्च करने पर भी घटता नहीं है अपितु यह दिन-प्रतिदिन संवाया बढ़ता हुआ) होता जाता है। इसे कोई चोर भी चुरा नहीं सकता। मीरा कहती है कि उन्होंने सत्य रूपी नौका और सद्‌गुरु रूपी केवट के द्वारा भवसागर पार कर लिया है। अपनी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर लिया है। यह सब उनके प्रभु गिरधर नाम की कृपा से ही सम्भव हुआ है। अत: वह आनंदमग्न होकर प्रभु के यश का गान कर रही हैं।

विशेष-

(i) सांसारिक धन क्षीण होते जाने वाले हैं। इनकी चोरी का भय रहता है। केवल प्रभु का नाम-स्मरण ही वह अमूल्य और अद्भुत धन है जो निरंतर बढ़ता ही रहता है और भक्त को भवसागर के पार ले जाता है।
(ii) 'राम रतन धन', 'करि किरपा' में अनुप्रास, 'जनम-जनम', 'दिन-दिन', 'हरखि-हरखि' में पुनरुक्ति प्रकाश तथा 'सत की नाव खेवटिया सतगुरु' में रूपक अलंकार है।
(iii) 'प्रभु नाम स्मरण' और 'गुरु-कृपा' का महत्व दर्शाया गया है।

 

माई री मैं तो लियो गोविन्दो मोल।

कोई कहै छानै, कोई कहे चौड़े, लियो री बजंता ढोल॥
कोई कई मुँहघो, कोई कहै, मुँहघो, लियो री तराजू तोल।
कोई कहै कारो, कोई कहै गोरो, लियो री आँखी खोल॥

प्रसंग तथा संदर्भ- प्रस्तुत पद श्रीकृष्ण को समर्पित मीराबाई की रचना है। इस पद में मीरा लोकमत की चिन्ता न करते हुए श्रीकृष्ण से अपने पवित्र अनुराग की घोषणा कर रही हैं। वह कह रही हैं कि उन्होंने श्रीकृष्ण का वरण अपनी अन्तरात्मा की प्रेरणा से किया हैं। लोग क्या कहते हैं इसकी उन्हें चिन्ता नहीं।

व्याख्या- मीरा कहती हैं कि उन्होंने अपने गोविन्द को मोल ले लिया है। कोई कहता है कि मैंने छिपकर अपने प्रिय को अपनाया है, कोई कहता है कि खुले में स्वीकार किया है। परन्तु मैंने तो ढोल बजाकर सबको जताकर यह सौदा किया है। चाहे कोई इसे महँगा सौदा बताए चाहे सस्ता बताए। मैंने तो तराजू पर तोल कर, अपने गोविन्द को अपनाया है। मुझे अपने निर्णय पर पूरा भरोसा है। मेरा प्रिय चाहे काला हो चाहे गोरा वह जैसा भी है, उसे मैंने आँखें खोलकर खूब सोच-विचार कर अपनाया है। सारा जगत इस बात को जानता है कि मैंने गोविन्द को पाने के लिए अमूल्य धन-अपना पवित्र अनुरागी हृदय हृदय समर्पित करके चुकाया है। मीरा कहती हैं-हे मेरे प्रभु! आप मुझे दर्शन देकर और अपनाकर कृतार्थ कीजिए क्योंकि आपने पूर्व जन्म में मुझे स्वीकार करने का वचन दे रखा है।

विशेष-

(i) गोविन्द को मोल लेना सब के वश की बात नहीं। मीरा जैसी समर्पिता और शरणागती ही उसका मोल चुका सकती है, संसारिक ठाट-बाट, विराट मंदिर, उत्सवों की धूमधाम उस सर्वान्तरयामी को नहीं रिझा सकती। यही संदेश इस पद में निहित है।
(ii) 'बजंता ढोल', 'तराजू तोल', आँखी खोल मुहावरों ने कथन को प्रभावशाली बना दिया है।
(iii) 'पूरब जनम को कोल' का रहस्य वैसे तो मीरा ही जानती होंगी किन्तु कुछ भावुक भक्तों ने पूर्व जन्म में मीरा को ललिता सखी माना है, जिसे कृष्ण ने प्रेमभाव दान दिया था। कोई कहै', 'तराजू तोल' तथा 'जग जाणत' में अनुप्रास अलंकार है।

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