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Detailed Chapter 3 मीराँ RBSE Solutions for Class 11 Hindi
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Class 11 Hindi Chapter 3 मीराँ RBSE Solutions PDF
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह पद्य Chapter 3 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1. मीराँ को जहर दिया था
(क) सन्तों ने
(ख) राणा ने
(ग) ननद ने
(घ) सास ने
Answer: (ख) राणा ने
In simple words: राणा ने मीराँ को मारने के लिए जहर दिया था क्योंकि वह कृष्ण भक्ति में लीन रहती थीं।
🎯 Exam Tip: जब किसी पात्र द्वारा की गई क्रिया के बारे में पूछा जाए, तो उस क्रिया को करने वाले पात्र का नाम स्पष्ट रूप से लिखें।
प्रश्न 2. मीराँ की भक्ति किस प्रकार की थी?
(क) माधुर्य भक्ति
(ख) सख्य भक्ति
(ग) दास्य भक्ति
(घ) वात्सल्य भक्ति
Answer: (क) माधुर्य भक्ति
In simple words: मीराँ अपने आराध्य कृष्ण को अपने पति या प्रेमी के रूप में पूजती थीं, जिसे माधुर्य भक्ति कहते हैं।
🎯 Exam Tip: भक्ति के प्रकारों को याद रखें और उन्हें उनके प्रमुख उदाहरणों से जोड़कर समझें।
प्रश्न 3. मीराँ किसकी अनन्य भक्त थी?
(क) राम
(ख) कृष्ण
(ग) विष्णु
(घ) शिव।
Answer: (ख) कृष्ण
In simple words: मीराँ केवल भगवान कृष्ण को ही अपना सब कुछ मानती थीं और उन्हीं की पूजा करती थीं।
🎯 Exam Tip: मीराँबाई की भक्ति का केंद्रीय बिंदु भगवान कृष्ण थे, यह तथ्य महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 4. मीराँ का काव्य किस प्रकार का है?
(क) वीर काव्य
(ख) सरल काव्य
(ग) गीति काव्य
(घ) हास्य काव्य
Answer: (ग) गीति काव्य
In simple words: मीराँ के लिखे हुए भजन और पद गाने के लिए बनाए गए थे, इसलिए उनके काव्य को गीति काव्य कहते हैं।
🎯 Exam Tip: गीति काव्य की मुख्य विशेषता यह है कि उसे संगीतबद्ध किया जा सकता है और वह भावनाओं को व्यक्त करता है।
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह पद्य Chapter 3 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. मीराँ के काव्य की प्रमुख भाषा कौनसी है?
Answer: मीराँ के काव्य की प्रमुख भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा है।
In simple words: मीराँ ने अपने भजन और कविताओं को राजस्थानी और ब्रजभाषा को मिलाकर लिखा था।
🎯 Exam Tip: भाषा शैली से संबंधित प्रश्नों में विशिष्ट भाषाओं और उनके मिश्रण का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 2. मीराँ स्वयं को किसकी दासी मानती हैं?
Answer: मीराँ स्वयं को अपने आराध्य श्रीकृष्ण की दासी मानती हैं।
In simple words: मीराँ खुद को भगवान कृष्ण की सेविका मानती थीं।
🎯 Exam Tip: दास्य भाव की भक्ति में भक्त स्वयं को ईश्वर का सेवक मानता है, यह मीराँ की भक्ति का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
प्रश्न 3. सोना, कुन्दन कैसे बनता है?
Answer:
In simple words:
🎯 Exam Tip: जब कोई प्रश्न किसी चीज़ के बनने की प्रक्रिया के बारे में पूछे, तो उसमें शामिल मुख्य सामग्री और चरणों पर ध्यान दें।
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह पद्य Chapter 3 लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. 'द्रोपदी की लाज राखी, तुरत बढ़ायो चीर' का आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer: मीराँ कहती हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी भक्त द्रौपदी की इज़्ज़त बचाई थी। जब कौरवों की सभा में दुर्योधन के कहने पर दु:शासन ने द्रौपदी का अपमान करने की कोशिश की और उनकी साड़ी खींचने लगा, तब द्रौपदी ने कृष्ण को याद किया। कृष्ण ने उनकी साड़ी को इतना लंबा कर दिया कि दु:शासन खींचते-खींचते थक गया, लेकिन साड़ी खत्म नहीं हुई। इस तरह भगवान ने द्रौपदी की लाज बचाई।
In simple words: मीराँ बताती हैं कि कृष्ण ने द्रौपदी की साड़ी को लंबा करके भरी सभा में उनकी इज़्ज़त बचाई थी।
🎯 Exam Tip: इस तरह के भावार्थ वाले प्रश्नों में, पहले पंक्ति का शाब्दिक अर्थ स्पष्ट करें, फिर उसके पीछे की कथा या संदर्भ को समझाएँ।
प्रश्न 2. 'हरि! तुम हरो जन की भीर' से क्या तात्पर्य है?
Answer: मीराँ अपने आराध्य कृष्ण से कहती हैं कि हे हरि! तुम अपने भक्तों के दुख दूर करो। मीराँ खुद को कृष्ण की सेविका मानती थीं। राणा-परिवार के लोग उनकी भक्ति में रुकावट डालते थे और उन्हें तरह-तरह से परेशान करते थे। मीराँ को कई दुख मिले, फिर भी वह अपनी अटूट भक्ति में लगी रहीं। इसी भावना से मीराँ ने भगवान से प्रार्थना की कि वे उनके दुखों को जल्दी खत्म करें और उन्हें अपनी सेविका मानकर मुक्ति दें। वे चाहती हैं कि जैसे उन्होंने अपने अन्य भक्तों के दुख दूर किए, वैसे ही उनके दुख भी खत्म करें।
In simple words: मीराँ भगवान कृष्ण से प्रार्थना करती हैं कि वे अपने भक्तों और उनके दुखों को दूर करें, जैसे उन्होंने दूसरों के दुख मिटाए हैं।
🎯 Exam Tip: इस पंक्ति में मीराँ की दास्य भक्ति और उनकी प्रार्थना भावना को उजागर करना आवश्यक है, साथ ही उनके व्यक्तिगत संघर्षों का उल्लेख भी करें।
प्रश्न 3. "हे री मैं तो दरद दीवानी मेरा दरद न जाणे कोय।” पंक्ति में मीराँ किस दर्द की बात कर रही है?
Answer: मीराँ अपने आराध्य श्रीकृष्ण को अपना प्रियतम और पति मानती थीं। इस पंक्ति में वे अपने विरह-वेदना (जुदाई के दर्द) की बात कर रही हैं। मीराँ का प्रियतम उनके पास नहीं था। मीराँ मानती थीं कि उनके प्रियतम परदेस में हैं, और जब वह उनके पास आएँगे, तो उनका सारा दर्द, यानी संसारिक दुख और जीवन के मोह से उन्हें मुक्ति मिल जाएगी। इस प्रकार मीराँ का दर्द आध्यात्मिक जुदाई का दर्द था, जो सामान्य पीड़ा से अलग था। उनका मानना था कि इस दर्द का इलाज तभी होगा जब श्रीकृष्ण खुद वैद्य बनकर आएँगे। इस तरह मीराँ ने दाम्पत्य भाव की भक्ति, यानी प्रेमाभक्ति के दर्द का वर्णन किया है।
In simple words: मीराँ यहां अपने प्रियतम कृष्ण से दूर रहने के दर्द की बात कर रही हैं, जिसे वे आध्यात्मिक विरह-वेदना मानती हैं।
🎯 Exam Tip: मीराँ के विरह-वर्णन में उनके प्रेम के आध्यात्मिक और लौकिक दोनों पहलुओं को स्पष्ट करना चाहिए।
प्रश्न 4. “बूड़ते गज ग्राह मार्यो कियो बाहर नीर" के आधार पर अन्तर्कथा अपने शब्दों में लिखिए।
Answer: मीराँ ने अपने पदों में भगवान के कई भक्तोद्धारक कर्मों का उल्लेख किया है, जिनमें से कुछ प्रमुख अन्तर्कथाएँ इस प्रकार हैं:
1. **द्रोपदी का चीर बढ़ाना:** कौरवों की सभा में जब दु:शासन ने द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास किया, तब भगवान कृष्ण ने अपनी भक्त द्रौपदी की लाज बचाई और उनके चीर को इतना बढ़ाया कि दु:शासन अंततः हारकर चुप हो गया।
2. **नृसिंह रूप धारण करना:** हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान मानता था और अपने पुत्र प्रहलाद को भगवान विष्णु की भक्ति करने से रोकता था। इसके लिए उसने प्रहलाद को कठोर यातनाएँ दीं। अंत में भगवान नृसिंह का रूप धारण करके आए और हिरण्यकशिपु को मारकर भक्त प्रहलाद की रक्षा की।
3. **गजेन्द्र का रक्षण:** एक बार गजेन्द्र हाथी जब जलक्रीड़ा कर रहा था, तो एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। बहुत कोशिश करने के बाद भी गजेन्द्र अपना पैर छुड़ा नहीं सका। तब उसने भगवान का ध्यान किया और मुक्ति की प्रार्थना की। इससे भगवान तुरंत आए और गजेन्द्र को मगरमच्छ सहित पानी से बाहर निकालकर उसकी रक्षा की।
In simple words: मीराँ ने बताया कि कैसे भगवान ने द्रौपदी, प्रहलाद और गजेन्द्र जैसे अपने भक्तों की मदद करके उन्हें मुश्किलों से बचाया।
🎯 Exam Tip: अन्तर्कथा वाले प्रश्नों में, कहानी को संक्षेप में और स्पष्टता से बताना महत्वपूर्ण है, साथ ही यह भी बताना कि यह कैसे भक्ति के महत्व को दर्शाता है।
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह पद्य Chapter 3 निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. पठित पदों के आधार पर मीराँ की काव्यगत विशेषताएँ लिखिए।
Answer: मीराँ के काव्य की विशेषताओं को उनके भावपक्ष और कलापक्ष के रूप में समझा जा सकता है:
(1) **भावपक्ष:** मीराँ के काव्य में भक्ति और प्रेम की प्रधानता है। मीराँ ने अपने आराध्य को प्रियतम मानकर मधुर मिलन के बजाय विरह-वेदना का अधिक मार्मिक वर्णन किया है। उन्होंने खुद को रात-दिन तड़पने वाली प्रेमिका बताया है। उनके पदों में आत्म-समर्पण, प्रेमनिष्ठा और रहस्यवाद का सुंदर चित्रण मिलता है। मीराँ ने अपनी जुदाई की पीड़ा को चकोर, मछली, चातक और पपीहे के माध्यम से व्यक्त किया है। उनकी विरहानुभूति गहरी और गंभीर है, जिसमें माधुर्य भाव की भक्ति-निष्ठा जुड़ने से उनकी भावनाओं में हार्दिक वेदना महसूस होती है। इसी विशेषता के कारण मीराँ का काव्यगत भावपक्ष अत्यंत भावपूर्ण माना जाता है।
(2) **कलापक्ष:** मीराँ ने विरह-वेदना और प्रेम की सहजता और सरलता पर जोर दिया है। उन्होंने राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा का इस्तेमाल किया है, जिसमें गुजराती शब्द भी शामिल हैं। माधुर्य और प्रसाद गुण का समावेश है और मुहावरों का प्रयोग भी भाव के अनुसार किया है। उनका गीतिकाव्य कई राग-रागनियों पर आधारित और गाने योग्य है। इसमें उपमा, रूपक जैसे अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। इस तरह मीराँ का काव्य सभी विशेषताओं से भरा है।
In simple words: मीराँ के काव्य में गहरी भक्ति और प्रेम की भावनाएँ हैं, खासकर जुदाई का दर्द। उनकी भाषा राजस्थानी-ब्रज का मिश्रण है और उनके भजन गाने योग्य हैं।
🎯 Exam Tip: काव्यगत विशेषताओं का वर्णन करते समय, भावपक्ष (भावनाएँ, विषयवस्तु) और कलापक्ष (भाषा, शैली, अलंकार) दोनों का उल्लेख करना सुनिश्चित करें।
प्रश्न 2. मीराँ की भक्ति में जो विन डाले गये, उनका उल्लेख कीजिए।
Answer: मीराँ अपने प्रभु श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहती थीं, लेकिन उनके परिवार के लोग हमेशा उनकी भक्ति में बाधा डालते थे। उदाहरण के लिए, मीराँ के देवर राणा ने इसी उद्देश्य से उन्हें जहर का प्याला भेजा था और एक टोकरी में साँप भी भेजा था। राणा परिवार के लोगों ने मीराँ पर कई तरह के आरोप लगाए और उन्हें समाज की इज्जत का ख्याल रखने को कहा। वे नहीं चाहते थे कि मीराँ एक साध्वी की तरह कृष्ण की पूजा करें।
In simple words: मीराँ के परिवार वाले, खासकर राणा ने, उनकी कृष्ण भक्ति में कई रुकावटें डालीं, जैसे उन्हें जहर भेजना और साँप भेजना।
🎯 Exam Tip: भक्ति में आने वाली बाधाओं का वर्णन करते समय, घटनाओं और उन्हें अंजाम देने वाले पात्रों का स्पष्ट उल्लेख करें।
प्रश्न 3. “मीराँ की भक्ति में सगुण भक्ति के तत्त्व पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं।” यह कथन स्पष्ट कीजिए।
Answer: मीराँ के ज़्यादातर पद भगवान कृष्ण को समर्पित हैं। इन पदों में 'साँवरिया', 'स्याम', 'गिरधर गोपाल', 'हरि' और 'नटवर नागर' जैसे संबोधनों का प्रयोग हुआ है। इससे साफ पता चलता है कि मीराँ ने अपने आराध्य कृष्ण की भक्ति में ही अपना गौरव महसूस किया। सगुण-साकार भक्ति के सूत्र उनकी रचनाओं में हर जगह मिलते हैं। उन्होंने अपने आराध्य के रूप, सौंदर्य, आकार और उनकी लीलाओं का साकार वर्णन किया है और उन्हें अपने हृदय में शाश्वत प्रियतम के रूप में बसाया है। उन्होंने अपने आराध्य के सभी कामों को साकार रूप में दिखाया है। इससे स्पष्ट होता है कि मीराँ की माधुर्य भक्ति में उनकी सगुण भक्ति ही प्रमुख थी।
In simple words: मीराँ ने भगवान कृष्ण के साकार रूप की पूजा की थी। उनके भजन कृष्ण के नाम, रूप और लीलाओं का वर्णन करते हैं, जिससे पता चलता है कि उनकी भक्ति सगुण थी।
🎯 Exam Tip: सगुण भक्ति के तत्वों को स्पष्ट करने के लिए, कवि द्वारा उपयोग किए गए संबोधनों, रूप वर्णन और लीलाओं के उदाहरण दें।
प्रश्न 4. मीराँ की रचनाओं के बारे में विद्वानों का क्या अभिमत रहा है?
Answer: हिंदी साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि कई रचनाओं का उल्लेख मीराँ के नाम से किया गया है। जिन रचनाओं को मीराँ द्वारा रचित बताया गया है, वे हैं-नरसीजी रो माहिरो, गीत गोविन्द की टीका, मीराँनी गरबी, मीराँ के पद, राग सोरठ के पद, रास गोविन्द। 'नरसीजी रो माहिरो' में नरसी मेहता के भात भरने का वर्णन है। 'गीत गोविन्द की टीका' अभी तक नहीं मिली है। 'रास गोविन्द' के बारे में माना जाता है कि उन्होंने ही इसकी रचना की होगी। 'रागसोरठ के पद' में मीराँ, कबीर और नामदेव के पद इकट्ठे किए गए हैं। 'मीराँनी गरबी' या 'गीत' रास मंडली के गीतों के जैसे गाए जाते हैं। ये सभी शुरुआत में मौखिक रूप से गाए जाते थे।
In simple words: विद्वानों का मानना है कि मीराँ ने कई रचनाएँ कीं, जैसे 'नरसीजी रो माहिरो', 'मीराँनी गरबी', और 'राग सोरठ के पद', जिनमें से कुछ अब उपलब्ध नहीं हैं।
🎯 Exam Tip: जब किसी कवि की रचनाओं के बारे में पूछा जाए, तो उनकी प्रमुख कृतियों के नाम और उनसे संबंधित विद्वानों के मतों का उल्लेख करें।
प्रश्न 5. मीराँ का वैवाहिक जीवन किस प्रकार का था? बताइये।
Answer: मीराँ का वैवाहिक जीवन कष्टों से भरा रहा। मीराँ का विवाह राजकुमार भोजराज से हुआ, लेकिन तीन-चार साल बाद लगभग वि.सं. 1580 में भोजराज का अचानक निधन हो गया। इस दुखद घटना से मीराँ को गहरा धक्का लगा। वे इस दुख को सहन नहीं कर पाई थीं कि वि. संवत् 1584 में उनके पिता रत्नसिंह और उसके बाद उनके ससुर भी चल बसे। इन घटनाओं से मीराँ का हृदय बहुत दुखी हो गया था। विधवा जीवन और राणा-परिवार की पुरानी परंपराओं के कारण मीराँ के हृदय में प्रभु-भक्ति की रुचि जागृत हुई, लेकिन उनके देवर और सास आदि ने इस कारण उन्हें बहुत कष्ट दिए। फलस्वरूप मीराँ ने घर छोड़कर वैराग्य अपना लिया।
In simple words: मीराँ का वैवाहिक जीवन दुखों से भरा था, उनके पति, पिता और ससुर का जल्दी निधन हो गया, जिससे उन्हें दुख हुआ और उन्होंने कृष्ण भक्ति में वैराग्य अपनाया।
🎯 Exam Tip: किसी पात्र के जीवन से संबंधित प्रश्नों में, प्रमुख घटनाओं और उनके प्रभावों का क्रमानुसार उल्लेख करना चाहिए।
RBSE Class 11 Hindi प्रज्ञा प्रवाह पद्य Chapter 3 निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. पठितांश के आधार पर मीराँ की उपासना पद्धति पर प्रकाश डालिए।
Answer: कृष्ण भक्त कवियों में मीराँ का एक खास स्थान है। उनकी भक्ति भावना माधुर्य भाव की थी। उनकी भक्ति में प्रेम, समर्पण, अटूट निष्ठा, विरह-वेदना और माधुर्य भावना की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है। मीराँ के काव्य में जनभाषा और गाने योग्य रागों का प्रयोग है। उनकी उपासना पद्धति को इन तीन रूपों में देखा जा सकता है:
1. निर्गुण भावना और प्रेम-अनुभूतियों की रहस्यवादी अभिव्यक्ति।
2. सगुण श्रद्धा और प्रेम से भरी भक्ति भावना।
3. सगुण प्रेम-आधारित माधुर्य भावना।
इन तीनों रूपों में मीराँ की उपासना पद्धति को समझा जा सकता है। ज़्यादातर विद्वानों का मानना है कि मीराँ के काव्य में माधुर्य भाव की भक्ति ही सबसे प्रमुख रही है।
In simple words: मीराँ कृष्ण को अपने प्रियतम के रूप में पूजती थीं, उनकी भक्ति में प्रेम, विरह, और समर्पण का मिश्रण था, और इसे निर्गुण व सगुण दोनों रूपों में देखा जा सकता है, पर माधुर्य भाव प्रमुख था।
🎯 Exam Tip: उपासना पद्धति के प्रश्नों में, भक्ति के प्रमुख भावों (जैसे माधुर्य, सख्य, दास्य) और उनके सगुण-निर्गुण स्वरूपों का वर्णन करें।
प्रश्न 2. मीराँ की भक्ति-भावना की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
Answer: मीराँ ने अपने आराध्य प्रभु को प्रियतम या पति के रूप में पूजा, इसलिए मीराँ की भक्ति को पति-पत्नी भाव या माधुर्य भाव की भक्ति माना जाता है। मीराँ ने अपने पदों में अपने प्रियतम से मिलने के लिए लोक-लाज को त्यागने का सुंदर वर्णन किया है और विरह-वेदना की तीव्र अनुभूति व्यक्त की है। मीराँ की भक्ति-भावना की विशेषताएँ-मीराँ की माधुर्य भाव की भक्ति लौकिक और अलौकिक दोनों रूपों में व्यक्त हुई है। माधुर्य भाव की भक्ति के तीन अंग होते हैं-रूप वर्णन, विरह-वर्णन और आत्मसमर्पण। मीराँ की भक्ति में इन तीनों ही अंगों का उचित मिश्रण हुआ है और इनके उदाहरण पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, जैसे:
1. **रूप-वर्णन:** मीराँ ने अपने आराध्य प्रियतम की सुंदर छवि का वर्णन किया है, जैसे:
बसो मेरे नैनन में नन्दलाल।
मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल अरुण तिलक दिये भाल।।
2. **विरह-वर्णन:** मीराँ के पदों में प्रियतम प्रभु से जुदाई की पीड़ा की सभी दशाओं और स्थितियों का मार्मिक चित्रण हुआ है, जैसे:
हे री मैं तो दरद-दिवानी मेरा दरद न जाणै कोय।।
3. **आत्म-समर्पण:** मीराँ ने खुद को गिरधर गोपाल की दासी बताया है और अपने परिवार को त्यागकर आराध्य की लीलाभूमि में रहकर अटूट निष्ठा और आत्मसमर्पण से युक्त भक्ति में लीन रहीं।
In simple words: मीराँ की भक्ति कृष्ण के प्रति माधुर्य भाव की थी, जिसमें वे कृष्ण को पति मानती थीं। इसमें कृष्ण के रूप, विरह-वेदना और मीराँ के पूर्ण समर्पण का सुंदर वर्णन है।
🎯 Exam Tip: भक्ति भावना की विशेषताओं का उल्लेख करते समय, उदाहरण के साथ प्रत्येक विशेषता को स्पष्ट करना चाहिए, ताकि उत्तर प्रभावशाली लगे।
रचनाकार का परिचय सम्बन्धी प्रश्न
प्रश्न 1. मीराँ का व्यक्तित्व-कृतित्व परिचय संक्षेप में दीजिए।
Answer: मीराँ का जन्म वि. संवत् 1555 में कुड़की गाँव (मारवाड़ रियासत) में राठौड़ रत्नसिंह की बेटी के रूप में हुआ था। बचपन में ही माता का निधन हो जाने के कारण, उनका पालन-पोषण उनके दादा राव दूदाजी ने किया, जो स्वयं परम वैष्णव भक्त थे। उन्हीं के प्रभाव से मीराँ के हृदय में कृष्ण-भक्ति के संस्कार पड़े, जो बाद में माधुर्य भाव की भक्ति में बदल गए। मीराँ का विवाह राणा परिवार के राजकुमार भोजराज से हुआ, लेकिन कुछ ही सालों में पति का निधन हो गया। तब मीराँ ने अपने बचपन के संस्कारों को बढ़ावा दिया और गिरिधर गोपाल को अपना पति मानकर सहज भक्ति और प्रेम को व्यक्त करने का प्रयास किया। मीराँ की रचनाओं में 'नरसीजी रो माहिरो', 'गीत गोविन्द की टीका', 'मीराँबाई का मलार', 'राग सोरठ के पद', 'राग गोविन्द' और 'मीराँ के पद' प्रमुख हैं। इनमें से कुछ अप्राप्त हैं और कुछ बाद में जोड़े गए हैं। फिलहाल उनकी रचनाओं का संग्रह 'मीराँ पदावली' के रूप में मिलता है। उन्होंने राजस्थानी मिश्रित साहित्यिक ब्रजभाषा का उपयोग भावनाओं के अनुरूप किया है।
In simple words: मीराँ का जन्म कुड़की में हुआ और दादा के पास पली-बढ़ीं, जहाँ उन्हें कृष्ण भक्ति मिली। पति भोजराज के निधन के बाद, उन्होंने कृष्ण को पति मानकर भक्ति की। उनकी प्रमुख रचनाएँ 'नरसीजी रो माहिरो' और 'मीराँ पदावली' हैं, और उन्होंने राजस्थानी ब्रजभाषा में लिखा।
🎯 Exam Tip: कवि परिचय देते समय, जन्म, परिवार, भक्ति का स्वरूप और प्रमुख रचनाओं को संक्षेप में और सटीक रूप से प्रस्तुत करें।
मीराँ – कवयित्री- परिचय-
मध्ययुगीन सगुण भक्ति काव्यधारा की महत्त्वपूर्ण भक्त कवयित्री मीरां का जन्म वि. संवत् 1555 में कुड़की ग्राम (मारवाड़ रियासत) में हुआ था। बचपन से ही मीराँ की माता का देहान्त हो जाने से इनका लालनपालन इनके दादा राव दूदाजी के पास मेड़ता में हुआ। जिस समय मीराँ का जन्म हुआ था वह राजपूतों के संघर्ष का काल था। इनके पिता रत्नसिंह प्रायः युद्ध-क्षेत्र में रहा करते थे। इसलिए इनकी शिक्षा का समुचित प्रबन्ध हो नहीं सका। मीराँ बाल्यावस्था से ही कृष्ण की प्रेमाभक्ति में निमग्न रहती थीं। इनका विवाह महाराणा साँगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ था। लेकिन कुछ ही वर्षों में भोजराज का अकस्मात् निधन हो गया। तब मीराँ ने अपने आराध्य को ही अपना सर्वस्व माना तथा पारिवारिक व सामाजिक बन्धनों से मुक्त होकर गृह-त्याग किया और वृन्दावन आदि स्थानों पर कृष्ण-भक्ति में लीन रहीं। इनका जीवनान्त वि. संवत् 1603 में हुआ।
पाठ-परिचय-
प्रस्तुत पाठ में मीराँ द्वारा रचित पाँच पद संकलित हैं। प्रथम पद में राणा द्वारा विष देकर मीराँ को मार डालने के षड्यन्त्र का वर्णन है। अन्य पदों में मीराँ द्वारा अपने आराध्य को लेकर दाम्पत्य-भाव की भक्ति का स्वर व्यक्त हुआ है, जिनमें विरह-वेदना के साथ ही अनन्य भक्ति की व्यंजना हुई है। मीराँ ने अपने आराध्य को संसार का उद्धार करने वाला और भक्तों की पीड़ा को मिटाने वाला बताया है। प्रियतम को प्रवासी मानकर मीराँ ने जो विरहवेदना, अनन्य भक्तिनिष्ठा एवं समर्पण भावना व्यक्त की है, वह उनकी भक्ति की श्रेष्ठता का परिचायक है।
सप्रसंग व्याख्याएँ
Question. पद (1) की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
राणाजी थे जहर दियो म्हे जाणी। (टेक)
जैसे कंचन दहत अगनि में, निकसत बाराँबांणी।
लोकलाज कुल-काण जगत की, दई बहाय जस पांणी।
अपणे घर का परदा करले, मैं अबला बौरांणी।
तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे, गरक गये सनकांणी।
सब संतन पर तन मन वारों, चरण-कंवल लपटांणी।
मीरां को प्रभु राखि लई है, दासी अपणी जाणी।।
Answer: मीराँ कहती हैं कि राणाजी ने कृष्ण का भजन करने से गुस्सा होकर मुझे जहर दिया, यह बात मैं जानती हूँ। मैंने उन बाधाओं को अपनी परीक्षा के रूप में माना। जिस प्रकार सोने को आग में तपाया जाता है और वह शुद्ध सोना बनकर निकलता है, उसी प्रकार बाधाओं से मेरी कृष्ण-भक्ति और भी बढ़ गई है, कम नहीं हुई। मैंने तो कृष्ण-भक्ति के लिए लोक-लाज, कुल की मर्यादा और संसार को पानी की तरह बहा दिया है, त्याग दिया है। मेरा उनसे कोई संबंध नहीं रहा। यदि आपको मेरा व्यवहार पसंद नहीं है तो आप मेरा व्यवहार न देखें, मैं तो कृष्ण-प्रेम में पागल हो गई हूँ। तरकश से निकले तीर की तरह कृष्ण-प्रेम मेरे हृदय में समा गया है। उससे मैं दीवानी हो गई हूँ। मुझे बस कृष्ण की भक्ति करने की धुन लग गई है और दूसरी बातों पर अब कोई ध्यान नहीं रहता। मैं संतों की आभारी हूँ जिन्होंने मुझमें भक्ति बढ़ाई है। मैं संतों पर अपना तन-मन न्यौछावर करती हूँ। अपने आराध्य के चरण-कमलों की वंदना करती हूँ। मीराँ कहती हैं कि कैसी भी परिस्थिति क्यों न आई हो, मेरे प्रभु श्रीकृष्ण ने अपनी दासी मानकर मुझे बचाया है और अपनाया है।
**विशेष-**
(1) यहाँ मीराँ की कृष्ण के प्रति अटूट भक्ति व्यक्त है।
(2) गहरी भक्ति होने पर भक्त को भगवान के अलावा कुछ नहीं दिखता, मीराँ की स्थिति भी वैसी ही है।
In simple words: मीराँ कहती हैं कि राणा ने उन्हें जहर दिया, पर इससे उनकी कृष्ण भक्ति और बढ़ गई। उन्होंने लोक-लाज छोड़ दी और पूरी तरह से कृष्ण के प्रेम में डूब गईं, संतों का आभार मानते हुए और कृष्ण के चरणों में समर्पित होकर।
🎯 Exam Tip: सप्रसंग व्याख्या में, पहले प्रसंग (संदर्भ), फिर व्याख्या (अर्थ) और अंत में विशेष (मुख्य बिंदु) को स्पष्ट करें।
Question. पद (2) की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(2) हेली म्हाँसू हरि बिन रह्यो न जाय।
सास लड़े मेरी ननद खिजावै, 'राणां रह्यो रिसाय।
पहरो भी राख्यो चौकी बिठायो, ताला दियो जुड़ाय।
पूर्व जनम की प्रीत पुराणी, सो क्यूँ छोड़ी जाय।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, और न आवे म्हारी दाय।।
Answer: मीराँ कहती हैं कि हे सखी! मुझसे प्रियतम कृष्ण के बिना रहा नहीं जाता। मेरे इस कृष्ण-प्रेम के कारण सभी परिवारीजन मुझसे नाराज हैं। सास मुझसे लड़ती है और ननद मुझे चिढ़ाती रहती है। इसके साथ ही राणाजी मुझ पर क्रोध करते रहते हैं। उन्होंने मुझ पर पहरा बिठा रखा है और मेरी निगरानी के लिए चौकियाँ बैठा रखी हैं। यहाँ तक कि मुझे ताले में बंद कर दिया है। लेकिन हे सखी! मेरी और कृष्ण की प्रीत तो पिछले जन्मों से बहुत पुरानी है, यानी जन्म-जन्मांतरों की है। वह भला कैसे छोड़ी जा सकती है? आशय यह है कि उनके साथ मेरी प्रीत कभी नहीं टूटने वाली है। मीराँ कहती हैं कि मेरे आराध्य तो एकमात्र गिरधर नागर हैं, उन्हें छोड़कर मुझे और कोई भी पसंद नहीं आता है।
**कठिन शब्दार्थ-**
हेली = सखी। खिजावै = चिढ़ाती है। रिसाय = क्रोधित होना। दाय = हिस्सा, दान, पसंद।
**प्रसंग-** यह पद मीराँ द्वारा रचित है। इसमें मीराँ ने अपने स्वजनों द्वारा उनके साथ किए गए दुर्व्यवहार का वर्णन किया है।
In simple words: मीराँ अपनी सखी से कहती हैं कि वे कृष्ण के बिना नहीं रह सकतीं, भले ही सास, ननद और राणा उनसे नाराज हों और उन्हें पहरे में रखें। उनका कृष्ण से प्रेम जन्मों पुराना है, जिसे वे छोड़ नहीं सकतीं।
🎯 Exam Tip: सप्रसंग व्याख्या में कठिन शब्दों के अर्थ और प्रसंग को स्पष्ट करना, व्याख्या को आसान बनाता है।
Question. पद (3) की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
हरि! तुम हरो जीने की भीर।
दोपदी की लाज राखी, तुरत बढ़ायो चीर।
भक्त कारण रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर।
हिरनकश्यप मार लीनो, धयो नाहिन धीर।
बूडते गज ग्राह. मायो, कियो बाहर नीर।।
दासी मीराँ लालगिरधर, दुःख जहाँ तहाँ पीर।
Answer: मीराँ कहती हैं कि हे हरि! आप अपने लोगों, भक्तों का दुख हमेशा दूर कर देते हो। आपने पहले भी द्रौपदी की लाज बचाई थी। दु:शासन भरी सभा में द्रौपदी का चीर खींचकर उसे निर्वस्त्र करना चाहता था। आपने ही द्रौपदी का चीर बढ़ा दिया था और द्रौपदी की लाज बच गई थी। आपने अपने भक्त प्रहलाद के कारण नृसिंह अवतार लिया था, नृसिंह का शरीर धारण किया था और तब प्रहलाद के अत्याचारी पिता हिरण्यकश्यप को मार डाला था। आप दुष्टों को मारे बिना धैर्य धारण नहीं कर सके थे। हाथी को मगरमच्छ ने पकड़कर जल में खींच लिया था और हाथी डूबने ही वाला था। तब आपने मगरमच्छ को मारकर हाथी को पानी से बाहर निकाला था। मीराँ कहती हैं कि हे गिरिधर कृष्ण! मैं आपकी दासी हूँ। आपके विरह में मैं जहाँ भी रहूँ पीड़ा ही भोगती हूँ।
**कठिन शब्दार्थ-**
जन = भक्त। भीर = पीड़ा, दुख। द्रोपदी = पाण्डवों की पत्नी। नरहरि = नृसिंह। बूडते = डूबने पर। गज = हाथी। ग्राह = मगर। नीर = पानी।
**प्रसंग-** यह पद मीराँ द्वारा रचित 'पदावली' से लिया गया है। मीराँ कृष्ण को उनके द्वारा की गई भक्तों की सहायता की याद दिलाती है और चाहती है कि कृष्ण उसी प्रकार उसका भी उद्धार करें।
**विशेष-**
(1) द्रौपदी, प्रहलाद एवं गजराज से सम्बन्धित पौराणिक कथाओं की ओर संकेत कर भगवान की भक्तवत्सलता बतलाई गई है।
(2) मीराँ ने अपने आराध्य से अपने उद्धार की विनती की है। साथ ही विरह-वेदना की व्यंजना हुई है।
In simple words: मीराँ भगवान कृष्ण से प्रार्थना करती हैं कि वे उनके दुख दूर करें, जैसे उन्होंने द्रौपदी, प्रहलाद और गजेंद्र जैसे अपने भक्तों को बचाया था। वह खुद को कृष्ण की दासी बताती हैं और कहती हैं कि वह हर जगह उनके वियोग का दर्द सहती हैं।
🎯 Exam Tip: इस तरह की व्याख्या में, पौराणिक संदर्भों को स्पष्ट करते हुए यह बताएं कि मीराँ उनसे कैसे प्रेरणा लेती हैं और अपनी भक्ति को व्यक्त करती हैं।
Question. पद (4) की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(4) हे री मैं तो दरद-दिवानी मेरा दरद न जाणै कोय।
सूली ऊपर सेज हमारी, किस बिध सोना होय।
गगन-मण्डल पै सेज पिया की, किस बिध मिलना होय।
घायल की गति घायल जाने, की जिन लाई होय।
जौहर की गति जौहर जानै, की जिन जौहर होय।
दरद की मारी वन-वन डोलू, बैद मिला नहि कोय।
मीराँ की प्रभु पीर मिटेगी, जद बैद साँवलिया होय।
Answer: मीराँ कहती हैं कि मैं तो प्रेम की पीड़ा में पागल हो गई हूँ, और मेरा दर्द कोई नहीं जानता। कृष्ण से मिलना उतना ही कठिन है जितना सूली पर बनी हुई सेज पर सोना। आकाश-मंडल में सेज हो, वहाँ तक पहुँचना जितना कठिन है, उतना ही कठिन कृष्ण से मिलना है। मैं कृष्ण के बिना बहुत दुखी हूँ। मेरी स्थिति को मेरे जैसा दुखी व्यक्ति ही जान सकता है। जिसके शरीर में घाव हो गया हो, वही घायल की पीड़ा का अनुमान लगा सकता है, दूसरा नहीं। रत्न की खूबियों को तो कोई जौहरी ही जान सकता है या स्वयं रत्न। मैं दर्द के मारे चैन नहीं पाती हूँ और मारी-मारी फिरती हूँ, लेकिन मेरी पीड़ा दूर करने वाला कोई नहीं मिला। जिस प्रकार बीमार की पीड़ा को वैद्य दूर करता है उसी प्रकार मेरी पीड़ा को साँवलिया कृष्ण ही दूर कर सकते हैं।
**कठिन शब्दार्थ-**
दिवानी = पागल। जाणै = जाने। सेज = शय्या। जद = जब। बैद = वैद्य। गगन मण्डल = शून्य स्थित सहस्रार चक्र। जौहर = रत्न।।
**विशेष-**
(1) विरहिणी मीराँ ने अपनी विरह-वेदना का वर्णन किया है।
(2) आध्यात्मिक विरह की पीड़ा सामान्य पीड़ा से बहुत भिन्न प्रकार की होती है। उसे वैद्य आदि दूर नहीं कर सकते। वह तो ईश्वर-दर्शन से ही दूर हो सकती है। मीराँ ने यही बात कही है।
(3) ईश्वर को प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। यह बात 'सूली ऊपर सेज', 'गगन-मंडल पै सेज' द्वारा व्यक्त की गई है।
In simple words: मीराँ कहती हैं कि उनके प्रेम का दर्द इतना गहरा है कि कोई नहीं समझ सकता। कृष्ण से मिलना उतना ही कठिन है जितना असंभव काम करना। उनका दर्द केवल साँवलिया कृष्ण ही दूर कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: इस पद की व्याख्या में मीराँ की विरह-वेदना की गहराई और ईश्वर प्राप्ति की कठिनाई को विभिन्न उपमाओं से समझाना महत्वपूर्ण है।
Question. पद (5) की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(5) मतवारो बादर आयो रे हरि को सनेसो नहिं लायो रे।
दादुर मोर पपइया बौलै, कोयल सबद सुणायो रे।
कारी अँधियारी बिजरी चमकै, बिरहिणी अति डरपायो रे।
गाजे बाजे पवन मधुरिया, मेहा अति झड़ लायो रे।
कारी नाग बिरह अति जारी, मीराँ मन हरि भायो रे।
Answer: मीराँ कहती हैं कि मस्ती में उमड़ते-घुमड़ते बादल आए हैं, लेकिन वे मेरे प्रियतम कृष्ण का संदेश नहीं लाए। वर्षा ऋतु में मेंढक, मोर और पपीहा मधुर स्वर में बोलने लगे हैं और कोयल अपने मीठे शब्द सुना रही है। बादलों की घटा से रात काली और अंधेरी हो गई है और बिजली चमक रही है, जो मुझ जैसी विरहिणी नारियों को बहुत डरा रही है। बादलों की गर्जना को हवा मधुरता से चारों ओर फैला रही है और बादलों की लगातार रिमझिम बारिश हो रही है। वर्षा की झड़ी लगातार हो रही है। मीराँ कहती हैं कि विरह रूपी काला नाग मुझे बहुत परेशान कर रहा है। ऐसे समय पर मुझे प्रियतम कृष्ण का मधुर स्मरण हो रहा है और मेरे मन को वे बहुत अच्छे लग रहे हैं।
**कठिन शब्दार्थ-**
मतवारो = मतवाला, मस्ती से उमड़ने-घुमड़ने वाला। हरि = कृष्ण। दादुर = मेंढक। पपइयो = पपीहा। कारी = काली। मधुरिया = मधुर शब्द वाला। मेहा = बादल।।
**प्रसंग-** यह पद मीराँ द्वारा रचित 'पदावली' से संकलित है। इसमें मीराँ ने वर्षाकालीन प्रकृति का उत्तेजित रूप में वर्णन कर अपनी विरह-वेदना प्रकट की है।
**विशेष-**
(1) विरह-वेदना को लेकर मेंढक, मोर, पपीहा, बिजली की चमक एवं बादलों की रिमझिम का परम्परागत वर्णन किया गया है।
In simple words: मीराँ कहती हैं कि बादल आए हैं पर कृष्ण का संदेश नहीं लाए। मेंढक, मोर, पपीहा और कोयल की आवाजें, बिजली की चमक और बारिश उन्हें डरा रही हैं, क्योंकि कृष्ण के बिना विरह का काला नाग उन्हें बहुत सता रहा है।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट करें कि वे विरह-वेदना को कैसे बढ़ाते हैं, और कवि की भावनाओं को कैसे दर्शाते हैं।
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