Official NCERT Solutions for Class 6 Science: Chapter 10 सजीव विशेषताओं का अन्वेषण
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Chapter-wise Solutions for Science: Chapter 10 सजीव विशेषताओं का अन्वेषण
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Question 1: पौधों और जंतुओं के जीवन-चक्र में समानताओं और भिन्नताओं को सूचीबद्ध कीजिए।
Answer:
पौधों और जंतुओं के जीवन-चक्र (life cycle) में कई महत्वपूर्ण समानताएँ और भिन्नताएँ पाई जाती हैं। समानताएँ: दोनों का जीवन एक सूक्ष्म प्रारंभिक इकाई (बीज अथवा अंडा/युग्मनज) से आरंभ होता है; दोनों ही परिपक्व होने के लिए पोषण प्राप्त करके वृद्धि और विकास (growth and development) के विभिन्न चरणों से गुजरते हैं; दोनों वयस्क अवस्था में पहुँचकर अपनी प्रजाति की निरंतरता बनाए रखने के लिए जनन (reproduction) करते हैं; और अंततः वृद्धावस्था के पश्चात दोनों के जीवन-चक्र का समापन प्राकृतिक मृत्यु से होता है। भिन्नताएँ: पौधों में वृद्धि जीवनपर्यंत मुख्य रूप से शीर्षस्थ भागों (meristem) में ऊपर और नीचे की दिशा में होती है, जबकि अधिकांश जंतुओं में वृद्धि एक निश्चित आयु तक ही शरीर के सभी अंगों में आनुपातिक रूप से होती है; पौधे जीवन भर एक ही स्थान पर स्थिर रहकर अपना जीवन-चक्र पूरा करते हैं, जबकि अधिकांश जंतु भोजन, सुरक्षा और प्रजनन हेतु स्थान-परिवर्तन या गमन (locomotion) करते हैं; इसके अतिरिक्त पौधों का विकास अंकुरण, पत्तियों, फूलों और फलों के निर्माण के रूप में दिखाई देता है, जबकि जंतुओं में यह सीधे शिशु से वयस्क बनने या कायांतरण (metamorphosis) के रूप में पूर्ण होता है।
मुख्य बिंदु:
• पौधे और जंतु दोनों जन्म, वृद्धि, परिपक्वता, जनन और मृत्यु के समान जीवन-चरणों का पालन करते हैं।
• पौधों में जीवन भर असीमित वृद्धि हो सकती है, जबकि जंतुओं में वृद्धि निश्चित अवधि तक सीमित होती है।
• जंतुओं में जीवन-चक्र के दौरान स्थान-परिवर्तन देखा जाता है, जबकि पौधे स्थिर रहते हैं।
आम गलतियाँ:
• केवल भिन्नताएँ लिखना और समानताओं (जैसे जनन, मृत्यु, वृद्धि) का उल्लेख करना भूल जाना।
• पौधों में गति न होने को उनके सजीव न होने या विकास न होने से जोड़ देना।
• जीवन-चक्र के वैज्ञानिक चरणों को स्पष्ट क्रम में न लिखना।
Exam Tips:
a) इस प्रकार के तुलनात्मक प्रश्नों में 'समानताएँ' और 'भिन्नताएँ' शीर्षक डालकर उत्तर लिखें।
b) वृद्धि, गमन, जनन और पोषण जैसे मानक वैज्ञानिक बिंदुओं के आधार पर ही अंतर स्पष्ट करें।
c) पौधों की असीमित वृद्धि और जंतुओं की सीमित वृद्धि के अंतर को अवश्य रेखांकित करें।
Question 2: नीचे तालिका में कुछ विवरण (डाटा) दिया गया है। तालिका का अध्ययन कीजिए और दूसरे व तीसरे स्तंभ में दी गई स्थितियों के लिए उपयुक्त उदाहरणों का पता लगाने का प्रयास कीजिए। यदि आपको लगता है कि नीचे दी गई किसी भी स्थिति के लिए उदाहरण संभव नहीं है, तो स्पष्ट कीजिए कि ऐसा क्यों है?
क्रम सं. 1: क्या इसकी वृद्धि होती है? - नहीं | क्या यह श्वास लेता है? - नहीं
क्रम सं. 2: क्या इसकी वृद्धि होती है? - नहीं | क्या यह श्वास लेता है? - हाँ
क्रम सं. 3: क्या इसकी वृद्धि होती है? - हाँ | क्या यह श्वास लेता है? - नहीं
क्रम सं. 4: क्या इसकी वृद्धि होती है? - हाँ | क्या यह श्वास लेता है? - हाँ
Answer:
तालिका में दी गई चारों स्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण और उपयुक्त उदाहरण इस प्रकार हैं: स्थिति 1 (वृद्धि: नहीं, श्वसन: नहीं) — इसका उदाहरण पत्थर, लकड़ी की मेज या प्लास्टिक की बोतल जैसी निर्जीव वस्तुएं (non-living things) हैं; टिप्पणी: निर्जीवों में न तो कोशिकीय श्वसन होता है और न ही आंतरिक जैविक वृद्धि होती है। स्थिति 2 (वृद्धि: नहीं, श्वसन: हाँ) — इसका उदाहरण सुप्त बीज (dormant seeds) या शीतनिद्रा (hibernation) में गया मेंढक है (अथवा पूर्ण वयस्क सजीव जिनकी शारीरिक वृद्धि रुक चुकी है); टिप्पणी: सुप्त अवस्था में सजीव जीवित रहने के लिए अत्यंत मंद गति से श्वसन करते हैं, परंतु उनमें कोई दृश्य वृद्धि नहीं होती। स्थिति 3 (वृद्धि: हाँ, श्वसन: नहीं) — इसका उदाहरण रेत का टीला (sand dune), हिम का ढेर या फिटकरी का क्रिस्टल है; टिप्पणी: किसी सजीव के लिए यह स्थिति असंभव है क्योंकि जैविक वृद्धि बिना श्वसन द्वारा उत्पन्न ऊर्जा के नहीं हो सकती, परंतु निर्जीवों में बाहरी पदार्थों के कणों के जमाव से आकार में आभासी वृद्धि संभव है। स्थिति 4 (वृद्धि: हाँ, श्वसन: हाँ) — इसका उदाहरण नीम का पौधा, गाय, बिल्ली और मनुष्य जैसे सभी सक्रिय सजीव (living organisms) हैं; टिप्पणी: यह सजीवों का मूलभूत अभिलक्षण है जिसमें ऊर्जा उत्पादन हेतु श्वसन और शारीरिक विकास हेतु वृद्धि दोनों साथ-साथ चलते हैं।
मुख्य बिंदु:
• सजीवों में जैविक वृद्धि के लिए श्वसन द्वारा ऊर्जा प्राप्त करना अनिवार्य है।
• सुप्त बीजों में जीवन प्रक्रियाएं अत्यंत धीमी होती हैं, जहाँ वृद्धि के बिना भी सूक्ष्म श्वसन जारी रहता है।
• निर्जीवों में वृद्धि केवल बाहरी संचय द्वारा होती है, आंतरिक कोशिकीय विभाजन द्वारा नहीं।
आम गलतियाँ:
• कवक (फफूँद) या यीस्ट को वृद्धि न करने वाला मान लेना, जबकि वे तेजी से वृद्धि और गुणन करते हैं।
• स्थिति 3 में रेत के टीले या क्रिस्टल की बाहरी वृद्धि को जैविक वृद्धि समझ लेना।
• स्थिति 2 को पूर्णतः असंभव मान लेना, जबकि सुप्त बीजों में यह स्थिति स्पष्ट रूप से पाई जाती है।
Exam Tips:
a) प्रत्येक क्रम संख्या (1 से 4) के सामने उदाहरण और उसका वैज्ञानिक कारण दोनों स्पष्ट रूप से लिखें।
b) सजीवों की आंतरिक वृद्धि और निर्जीवों के बाह्य जमाव के अंतर को अपनी टिप्पणी में अवश्य रेखांकित करें।
c) स्थिति 2 में 'सुप्त बीज' (dormant seed) का उदाहरण देना सबसे सटीक और वैज्ञानिक माना जाता है।
Question 3: आपने सीखा है कि बीजों के अंकुरण के लिए भिन्न-भिन्न परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। अनाजों और दालों के उपयुक्त भंडारण के लिए हम इस ज्ञान का उपयोग किस प्रकार कर सकते हैं?
Answer:
बीज अंकुरण (seed germination) के वैज्ञानिक अध्ययन से हम जानते हैं कि बीजों को सुप्तावस्था से सक्रिय अवस्था में आने के लिए अनिवार्य रूप से नमी (जल), वायु (ऑक्सीजन) और अनुकूल तापमान की आवश्यकता होती है। अनाजों और दालों के सुरक्षित दीर्घकालिक भंडारण (storage) में हम इस ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग अंकुरण के लिए आवश्यक इन सभी अनुकूल कारकों को पूरी तरह समाप्त करके करते हैं: सबसे पहले, भंडारण से पूर्व बीजों को तेज धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है ताकि उनकी आंतरिक नमी (moisture content) न्यूनतम हो सके और बीज सुप्तावस्था (dormancy) में बने रहें; दूसरा, उन्हें वायुरोधी (airtight) धातु के बर्तनों या सीलबंद बोरियों में रखा जाता है जिससे उन्हें अंकुरण तथा कवक के पनपने हेतु आवश्यक नमी और खुली हवा न मिल सके; और तीसरा, भंडारण कक्ष को शीतल, सूखा और हवादार रखा जाता है ताकि अनुकूल तापमान न मिलने से बीज अंकुरित न हों और सूक्ष्मजीवों व कीटों के संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित रहें।
मुख्य बिंदु:
• नमी, वायु और उचित तापमान बीजों के अंकुरण के तीन अनिवार्य कारक हैं।
• भंडारण का मुख्य सिद्धांत इन तीनों कारकों को नियंत्रित करके बीजों को सुप्तावस्था में रखना है।
• सुखाने से आंतरिक नमी घटती है जिससे अंकुरण और कवक का आक्रमण दोनों रुक जाते हैं।
आम गलतियाँ:
• केवल धूप में सुखाने का उल्लेख करना और वायुरोधी भंडारण व तापमान नियंत्रण को छोड़ देना।
• यह वैज्ञानिक संबंध न समझाना कि नमी हटाने से बीज अंकुरित होने से कैसे बचते हैं।
• बीजों के सड़ने और अंकुरित होने के अंतर को स्पष्ट न कर पाना।
Exam Tips:
a) उत्तर में अंकुरण की तीनों शर्तों (नमी, वायु, तापमान) का संदर्भ देकर भंडारण के उपाय बताएं।
b) 'सुप्तावस्था' (Dormancy) शब्द का प्रयोग उत्तर को अधिक प्रभावी बनाता है।
c) धूप में सुखाने, वायुरोधी पात्रों के उपयोग और सूखे स्थान के चयन को क्रमवार लिखें।
Question 4: आपने सीखा है कि टैडपोल की एक पूँछ होती है लेकिन जब वृद्धि के बाद यह मेंढक बनता है तो पूँछ लुप्त हो जाती है। टैडपोल अवस्था में पूँछ होने से क्या लाभ मिलता है?
Answer:
मेंढक का टैडपोल (tadpole) पूर्णतः एक जलीय जीव होता है जिसके पास प्रारंभिक अवस्था में तैरने के लिए हाथ-पैर नहीं होते हैं; इस अवस्था में लंबी चपटी पूँछ उसकी जीवन-रक्षा और गतिशीलता (locomotion) के लिए अत्यंत आवश्यक अंग होती है। पूँछ की सहायता से टैडपोल जल में तीव्र गति से तैर सकता है, दिशा बदल सकता है और जलीय शिकारियों (predators) जैसे बड़ी मछलियों और जल-कीटों से बचकर अपनी जान बचा सकता है। इसके अतिरिक्त, पूँछ जल में तैरते हुए भोजन और शैवाल की खोज करने तथा जल के भीतर संतुलन बनाए रखने में प्राथमिक भूमिका निभाती है। जब कायांतरण (metamorphosis) के दौरान टैडपोल के मजबूत पैर विकसित हो जाते हैं और वह भूमि पर फुदकने व जल में पैरों से तैरने में सक्षम हो जाता है, तो पूँछ का पोषण शरीर द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है और वह विलुप्त हो जाती है।
मुख्य बिंदु:
• टैडपोल की पूँछ जलीय वातावरण में तैरने और दिशा बदलने का मुख्य प्रेरक अंग है।
• पूँछ की तेज गति टैडपोल को जल के शिकारियों से सुरक्षित रखने में मदद करती है।
• कायांतरण के समय पैरों के विकसित होने पर पूँछ के ऊतकों का पुनः अवशोषण हो जाता है।
आम गलतियाँ:
• पूँछ का कार्य केवल 'संतुलन बनाना' लिखकर तैरने और शिकारियों से बचने का मुख्य कार्य छोड़ देना।
• यह मान लेना कि पूँछ कटकर गिर जाती है, जबकि वह शरीर द्वारा पुनरावशोषित होती है।
• टैडपोल के पूर्ण जलीय आवास और वयस्क मेंढक के उभयचर आवास के अंतर को न समझना।
Exam Tips:
a) 'जलीय अनुकूलन' (Aquatic adaptation) और 'तीव्र तैराकी' को मुख्य लाभ के रूप में प्रस्तुत करें।
b) शिकारियों से बचाव (escape from predators) वाले बिंदु को अवश्य शामिल करें।
c) कायांतरण (Metamorphosis) शब्द का उल्लेख करते हुए पूँछ के लुप्त होने का कारण संक्षेप में दें।
Question 5: चरण का कहना है लकड़ी का लट्ठा निर्जीव है क्योंकि इसमें गति नहीं होती। इसके विपरीत चारु इसे सजीव मानती है, क्योंकि यह वृक्षों से प्राप्त होता है। चरण और चारु के कथनों के पक्ष या विपक्ष में अपने तर्क दीजिए।
Answer:
चरण और चारु के कथनों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने पर ज्ञात होता है कि निष्कर्ष के रूप में चरण का कथन सही है कि लकड़ी का लट्ठा एक निर्जीव वस्तु (non-living object) है, परंतु उसके द्वारा दिया गया तर्क (गति न होना) त्रुटिपूर्ण है; क्योंकि गति या प्रचलन न होना निर्जीवता का एकमात्र प्रमाण नहीं है (जीवित वृक्ष भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति नहीं करते, फिर भी सजीव होते हैं)। लकड़ी का लट्ठा वास्तव में इसलिए निर्जीव है क्योंकि वृक्ष से कटकर अलग होने के बाद उसकी कोशिकाएं मृत हो चुकी हैं और उसमें श्वसन, पोषण, वृद्धि, उत्सर्जन तथा जनन जैसी कोई भी जीवन प्रक्रियाएं नहीं हो रही हैं। दूसरी ओर, चारु का यह तर्क कि यह वृक्ष से प्राप्त हुआ है, केवल यह सिद्ध करता है कि लकड़ी एक समय किसी जीवित वृक्ष का अंग थी (अर्थात यह जैविक मूल की सामग्री है); परंतु किसी सजीव से प्राप्त अंश यदि अपनी सभी जैविक क्रियाएं स्थायी रूप से समाप्त कर चुका हो, तो उसे वर्तमान में सजीव नहीं कहा जा सकता। अतः वर्तमान अवस्था में लकड़ी का लट्ठा पूर्णतः निर्जीव है।
मुख्य बिंदु:
• लकड़ी का लट्ठा निर्जीव है क्योंकि उसमें जीवन की कोई भी मूल जैविक क्रिया (श्वसन, वृद्धि आदि) नहीं होती।
• केवल गति का अभाव सजीव या निर्जीव होने का निर्णायक पैमाना नहीं हो सकता।
• किसी सजीव से उत्पन्न होना यह सिद्ध नहीं करता कि वह वस्तु वर्तमान में भी जीवित है।
आम गलतियाँ:
• चारु के इस विचार को सही मान लेना कि पेड़ से मिलने वाली हर वस्तु हमेशा सजीव रहती है।
• चरण के निष्कर्ष (निर्जीव) के साथ-साथ उसके तर्क (गति न होना) को भी सही मान लेना।
• सजीवता के निर्धारण के लिए कोशिकीय जीवन प्रक्रियाओं (श्वसन, पोषण) का संदर्भ न देना।
Exam Tips:
a) चरण और चारु दोनों के कथनों के पक्ष और विपक्ष का अलग-अलग तार्किक विश्लेषण करें।
b) यह स्पष्ट करें कि पौधों में स्वतः गमन न होने पर भी वे सजीव होते हैं।
c) अंतिम निष्कर्ष स्पष्ट रूप से लिखें कि लकड़ी का लट्ठा निर्जीव क्यों है।
Question 6: मच्छर और मेंढक के जीवन-चक्र में क्या समानताएँ और क्या विभेदकारी विशेषताएँ होती हैं?
Answer:
मच्छर और मेंढक के जीवन-चक्र की तुलना करने पर निम्नलिखित प्रमुख पहलू सामने आते हैं: समानताएँ: दोनों ही अपने अंडे जल में या जल की सतह के निकट देते हैं; दोनों के जीवन-चक्र में स्पष्ट कायांतरण (metamorphosis) पाया जाता है, जिसके अंतर्गत अंडे से निकलने वाली प्रारंभिक अवस्था (लार्वा या टैडपोल) रूप और स्वभाव में वयस्क जीव से पूरी तरह भिन्न होती है; और दोनों की प्रारंभिक अवस्थाएँ पूर्णतः जलीय होती हैं जो जल में तैरती हैं तथा वयस्क अवस्था जल के बाहर व्यतीत होती है। विभेदकारी विशेषताएँ: मच्छर एक अकशेरुकी कीट (invertebrate insect) है जिसके जीवन-चक्र में चार स्पष्ट अवस्थाएँ होती हैं—अंडा, लार्वा, प्यूपा और वयस्क; जबकि मेंढक एक कशेरुकी उभयचर (vertebrate amphibian) है जिसके जीवन-चक्र में तीन मुख्य अवस्थाएँ होती हैं—अंडा, टैडपोल और वयस्क (इसमें प्यूपा अवस्था नहीं होती); मच्छर का लार्वा जल की सतह से सांस लेने के लिए साइफन का उपयोग करता है, जबकि टैडपोल क्लोम (gills) से श्वसन करता है; वयस्क होने पर मच्छर के पंख और छह संधित पैर विकसित होते हैं और वह वायु में उड़ता है, जबकि वयस्क मेंढक फेफड़ों और नम त्वचा से सांस लेता है तथा चार पैरों की मदद से थल पर फुदकता और जल में तैरता है।
मुख्य बिंदु:
• मच्छर और मेंढक दोनों के जीवन-चक्र में जल और कायांतरण की केंद्रीय भूमिका होती है।
• मच्छर में चार विकासात्मक चरण (प्यूपा सहित) होते हैं, जबकि मेंढक में प्यूपा अवस्था अनुपस्थित होती है।
• मच्छर अकशेरुकी कीट है जबकि मेंढक रीढ़ की हड्डी वाला कशेरुकी उभयचर है।
आम गलतियाँ:
• मेंढक के जीवन-चक्र में भी प्यूपा अवस्था का उल्लेख कर देना।
• केवल शारीरिक अंतर लिखना और उनके जीवन-चक्र की अवस्थाओं के अंतर को छोड़ देना।
• लार्वा और टैडपोल के श्वसन अंगों (साइफन बनाम गिल्स) के अंतर को नजरअंदाज करना।
Exam Tips:
a) उत्तर को 'समानताएँ' और 'विभेदकारी विशेषताएँ' शीर्षकों के अंतर्गत बिंदुवार रूप में लिखें।
b) कायांतरण (Metamorphosis) शब्द का प्रयोग दोनों जीवों के संदर्भ में अवश्य करें।
c) जीवन-चक्र के चरणों का सही क्रम (मच्छर: 4 चरण, मेंढक: 3 चरण) स्पष्ट लिखें।
Question 7: एक पौधे को उसकी वृद्धि के लिए उपयुक्त सभी स्थितियाँ उपलब्ध कराई गई हैं। एक सप्ताह पश्चात् आप इस पौधे के प्ररोह और जड़ में क्या देखने की अपेक्षा करते हैं? उसका चित्र बनाइए। इसके कारण भी लिखिए।
Answer:
आकृति का विवरण: चित्र में भूमि पर क्षैतिज अवस्था में गिरे हुए गमले को दर्शाया गया है, जिसमें एक सप्ताह बाद पौधे का प्ररोह ऊपर की ओर मुड़कर ऊर्ध्वाधर बढ़ रहा है तथा जड़ें नीचे की ओर मुड़कर मिट्टी में गहराई की ओर बढ़ रही हैं।
यदि गमले में लगे पौधे को क्षैतिज रूप से लिटाकर रख दिया जाए और उसे वृद्धि की सभी अनुकूल परिस्थितियाँ (जल, प्रकाश, पोषक तत्व) दी जाएँ, तो एक सप्ताह पश्चात हम यह प्रेक्षण करेंगे कि पौधे का प्ररोह (shoot) मुड़कर ऊपर की ओर (आकाश व प्रकाश की दिशा में) वृद्धि करने लगता है, जबकि पौधे की जड़ (root) नीचे की ओर (पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और मिट्टी की दिशा में) झुककर वृद्धि करती है। इस दिशात्मक वृद्धि का वैज्ञानिक कारण पौधों की अनुक्रियाएँ हैं: प्ररोह धनात्मक प्रकाशानुवर्तन (positive phototropism) और ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्तन (negative gravitropism) प्रदर्शित करता है क्योंकि पत्तियों को प्रकाश संश्लेषण हेतु सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है, अतः तना गुरुत्वाकर्षण के विपरीत ऊपर प्रकाश की ओर मुड़ जाता है; इसके विपरीत, जड़ें धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन (positive gravitropism) और ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन प्रदर्शित करती हैं क्योंकि जड़ों का मुख्य कार्य पौधे को स्थिरता प्रदान करना तथा मिट्टी से जल व खनिजों का अवशोषण करना है, अतः वे गुरुत्वाकर्षण बल के खिंचाव की दिशा में सीधे नीचे की ओर मुड़कर बढ़ती हैं।
मुख्य बिंदु:
• पौधे का प्ररोह प्रकाश की दिशा में ऊपर की ओर बढ़ता है (धनात्मक प्रकाशानुवर्तन)।
• पौधे की जड़ गुरुत्वाकर्षण की दिशा में नीचे की ओर बढ़ती है (धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन)।
• उद्दीपन के प्रति यह दिशात्मक झुकाव पादप हार्मोनों और उत्तरजीविता की आवश्यकताओं द्वारा नियंत्रित होता है।
आम गलतियाँ:
• प्ररोह और जड़ दोनों को गमले की लिटाई गई सीधी दिशा में ही बढ़ता हुआ मान लेना।
• प्रकाशानुवर्तन और गुरुत्वानुवर्तन के वैज्ञानिक शब्दों का उपयोग न करके केवल सामान्य भाषा लिखना।
• जड़ और तने के विपरीत दिशाओं में मुड़ने का जैविक कारण (प्रकाश व जल की आवश्यकता) न समझाना।
Exam Tips:
a) उत्तर के साथ एक साधारण नामांकित रेखाचित्र बनाएँ जिसमें तने को ऊपर और जड़ को नीचे मुड़ते दर्शाया गया हो।
b) 'धनात्मक प्रकाशानुवर्तन' और 'धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन' शब्दों को रेखांकित करें।
c) एक सप्ताह बाद होने वाले दृश्य परिवर्तन को स्पष्ट वाक्यों में लिखें।
Question 8: तारा और विजय ने एक प्रयोग का सेट-अप तैयार किया है जिसे चित्र 10.10 में दर्शाया गया है। आप क्या सोचते हैं कि वे क्या पता करना चाहते हैं? और, उन्हें यह कैसे पता चलेगा कि वे सही हैं?
Answer:
आकृति का विवरण: चित्र 10.10 में तीन पारदर्शी नलियों या पेट्री डिशों में गीले माध्यम पर बीजों को तीन अलग-अलग विन्यासों में रखा गया है—बाएँ सेट में बीज क्षैतिज (horizontal), मध्य सेट में उल्टा (inverted), और दाएँ सेट में सीधा (upright) व्यवस्थित है।
तारा और विजय इस प्रयोग के माध्यम से यह पता करना चाहते हैं कि क्या बीज बोने की दिशा या अभिविन्यास (orientation) का अंकुरण के पश्चात जड़ और प्ररोह की वृद्धि की दिशा पर कोई प्रभाव पड़ता है, अथवा क्या जड़ें हमेशा नीचे की ओर और प्ररोह हमेशा ऊपर की ओर ही बढ़ते हैं, चाहे बीज को किसी भी दिशा में रखा गया हो। उन्हें अपने सही होने का पता तब चलेगा जब अंकुरण के बाद वे तीनों सेटों का अवलोकन करेंगे; वे देखेंगे कि चाहे बीज सीधा रखा गया हो, उल्टा रखा गया हो या तिरछा/क्षैतिज रखा गया हो, प्रत्येक स्थिति में मूलांकुर (radicle या जड़) स्वतः मुड़कर नीचे गुरुत्वाकर्षण की ओर (धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन) ही बढ़ती है और प्रांकुर (plumule या प्ररोह) स्वतः मुड़कर ऊपर प्रकाश की दिशा में (ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्तन) ही बढ़ता है; तीनों स्थितियों में दिशा का यह एकसमान परिणाम यह सिद्ध कर देगा कि उनका निष्कर्ष बिल्कुल सही है।
मुख्य बिंदु:
• प्रयोग का उद्देश्य बीज के अभिविन्यास का जड़ और तने की वृद्धि दिशा पर प्रभाव जाँचना है।
• बीज चाहे किसी भी स्थिति में रखा जाए, जड़ सदैव नीचे और प्ररोह सदैव ऊपर ही मुड़ता है।
• यह अवलोकन सिद्ध करता है कि पौधों में गुरुत्वाकर्षण और प्रकाश के प्रति स्वाभाविक संवेदनशीलता होती है।
आम गलतियाँ:
• यह समझ लेना कि उल्टे रखे गए बीज की जड़ ऊपर निकल जाएगी और प्ररोह नीचे जाएगा।
• प्रयोग के उद्देश्य में केवल 'अंकुरण देखना' लिखना और 'दिशात्मक संरेखण' के मूल विषय को छोड़ देना।
• यह स्पष्ट न करना कि वे अपने परिणाम की पुष्टि तीनों सेटों के समान प्रेक्षणों से करेंगे।
Exam Tips:
a) प्रश्न के दोनों भागों (प्रयोग का उद्देश्य और सत्यता की पुष्टि) का क्रमवार उत्तर दें।
b) 'मूलांकुर' (जड़) और 'प्रांकुर' (प्ररोह) के तकनीकी शब्दों का उपयोग करें।
c) गुरुत्वानुवर्तन के प्रभाव को परिणाम के मुख्य आधार के रूप में प्रस्तुत करें।
Question 9: बीज अंकुरण पर तापमान के प्रभाव की जाँच करने के लिए एक प्रयोग की योजना लिखिए।
Answer:
बीज अंकुरण पर तापमान के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए एक नियंत्रित प्रयोग की योजना इस प्रकार तैयार की जा सकती है: उद्देश्य: यह जाँचना कि विभिन्न तापमानों (अत्यधिक ठंडा, सामान्य और अत्यधिक गर्म) का बीजों के अंकुरण पर क्या प्रभाव पड़ता है। आवश्यक सामग्री: मूंग अथवा चने के 30 स्वस्थ बीज, तीन समान आकार के गमले या पेट्री डिश, रुई, जल और थर्मामीटर। कार्यविधि: (1) मूंग के बीजों को रात भर सामान्य जल में भिगो लें; (2) तीनों गमलों (लेबल 'क', 'ख' और 'ग') में नम रुई की एकसमान परत बिछाएं और प्रत्येक में 10-10 भीगे हुए बीज समान दूरी पर रखें; (3) गमला 'क' को अत्यंत कम तापमान वाले स्थान (रेफ्रिजरेटर, लगभग 4°C से 5°C) में रखें; (4) गमला 'ख' को सामान्य कक्ष तापमान (लगभग 22°C से 25°C) वाले हवादार कमरे में रखें; (5) गमला 'ग' को अत्यधिक उच्च तापमान वाले स्थान (धूप में बंद कांच के डिब्बे या हीटर के पास, लगभग 45°C से 50°C) पर रखें; (6) तीनों गमलों में नमी का स्तर एकसमान बनाए रखने के लिए आवश्यकतानुसार हल्का पानी छिड़कते रहें और 4-5 दिनों तक प्रतिदिन अंकुरण का निरीक्षण करें। अवलोकन व निष्कर्ष: हम देखेंगे कि केवल सामान्य कमरे के तापमान वाले गमले 'ख' के बीज स्वस्थ रूप से अंकुरित होकर लंबे अंकुर बनाते हैं; गमला 'क' (ठंडा) में अंकुरण या तो बिल्कुल नहीं होता या बहुत धीमा होता है, जबकि गमला 'ग' (अत्यधिक गर्म) में बीज सड़ जाते हैं और अंकुरण रुक जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि बीजों के सफल अंकुरण हेतु एक विशिष्ट अनुकूलतम तापमान (optimum temperature) अनिवार्य होता है।
मुख्य बिंदु:
• तापमान एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय कारक है जो अंकुरण के एंजाइमों की सक्रियता को नियंत्रित करता है।
• अत्यधिक ठंड और अत्यधिक गर्मी दोनों ही अंकुरण प्रक्रिया को बाधित या नष्ट कर देते हैं।
• बीज अंकुरण के लिए सामान्य मध्यम तापमान (अनुकूलतम सीमा) सबसे उपयुक्त होता है।
आम गलतियाँ:
• प्रयोग की योजना में केवल तापमान बदलना और जल व हवा जैसे अन्य कारकों को नियंत्रित रखना भूल जाना।
• अवलोकन और निष्कर्ष लिखे बिना केवल सामग्री और विधि लिखकर योजना समाप्त करना।
• तीनों तापमान सीमाओं (निम्न, अनुकूल, उच्च) की तुलनात्मक व्यवस्था न दर्शाना।
Exam Tips:
a) वैज्ञानिक प्रयोग की योजना को मानक शीर्षकों (उद्देश्य, सामग्री, विधि, अवलोकन, निष्कर्ष) में प्रस्तुत करें।
b) चर कारकों (Variables) में केवल तापमान को बदलना और जल/रुई को समान रखना स्पष्ट उल्लेख करें।
c) निष्कर्ष में 'अनुकूलतम तापमान' (Optimum temperature) शब्दावली का प्रयोग अवश्य करें।
NOTES: प्रश्न 2 में मूल पीडीएफ तालिका में कवक और यीस्ट को 'वृद्धि न करने वाला' बताया गया था, जो कि जैविक रूप से अशुद्ध है (कवक और यीस्ट तीव्र कोशिकीय वृद्धि व गुणन करते हैं); शुद्ध उत्तर में स्थिति 2 के लिए सुप्त बीज अथवा शीतनिद्रा के वैज्ञानिक उदाहरण दिए गए हैं। साथ ही प्रश्न 5 में मूल पीडीएफ ने केवल गति के अभाव को लकड़ी के निर्जीव होने का सही तर्क मान लिया था, जबकि वैज्ञानिक रूप से लकड़ी का लट्ठा कोशिकीय जीवन प्रक्रियाओं के स्थायी समापन के कारण निर्जीव है, जिसका स्पष्ट शुद्धिकरण उत्तर में किया गया है।
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NCERT Solutions for Class 6 Science Chapter 10 सजीव विशेषताओं का अन्वेषण
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