Step-by-Step Textbook Solutions for Class 11 Geography Chapter 13 महासागरीय जल संचलन
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Question 1:
(i) महासागरीय जल की ऊपर एवं नीचे गति किससे संबंधित है?
(क) ज्वार
(ख) तरंग
(ग) धाराएँ
(घ) ऊपर में से कोई नहीं
Answer:
सही उत्तर (क) ज्वार है। ज्वार-भाटा के अंतर्गत महासागरीय जल नियमित रूप से ऊपर उठता और नीचे गिरता है, जो चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण होता है।
मुख्य बिंदु:
• ज्वार-भाटा महासागरीय जल की ऊर्ध्वाधर गति है।
• यह मुख्य रूप से चंद्रमा और सूर्य के आकर्षण बल के कारण उत्पन्न होता है।
• तरंगें क्षैतिज गति करती हैं जबकि ज्वार ऊर्ध्वाधर गति से संबंधित है।
आम गलतियाँ:
• तरंगों और ज्वार की गतियों में भ्रमित होना।
• धाराओं को ऊर्ध्वाधर गति समझना।
• विकल्पों को बिना पढ़े गलत निशान लगाना।
Exam Tips:
a) ज्वार को हमेशा जल के ऊपर उठने और नीचे गिरने की ऊर्ध्वाधर प्रक्रिया के रूप में याद रखें।
b) जल संचलन के विभिन्न प्रकारों (तरंग, ज्वार, धारा) की परिभाषा स्पष्ट रखें।
c) बहुविकल्पीय प्रश्नों में सही विकल्प को ध्यान से चुनकर लिखें।
Question 2:
(ii) वृहत् ज्वार आने का क्या कारण है?
(क) सूर्य और चन्द्रमा का एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल
(ख) सूर्य और चन्द्रमा द्वारा एक दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल
(ग) तटरेखा का दन्तुरित होना
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Answer:
सही उत्तर (क) सूर्य और चन्द्रमा का एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल है। जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में (सिजिजी की स्थिति) होते हैं, तो उनके सम्मिलित गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सबसे ऊँचे ज्वार या वृहत् ज्वार आते हैं।
मुख्य बिंदु:
• वृहत् ज्वार पूर्णिमा और अमावस्या के दिन आते हैं।
• इस स्थिति में सूर्य और चंद्रमा का बल एक ही दिशा में कार्य करता है।
• इसे युति-वियुति या सिजिजी की स्थिति भी कहा जाता है।
आम गलतियाँ:
• विपरीत दिशा और एक ही दिशा के प्रभावों को मिला देना।
• लघु ज्वार और वृहत् ज्वार के कारणों में अंतर न समझ पाना।
• केवल चंद्रमा को ज्वार का एकमात्र कारक मानना।
Exam Tips:
a) वृहत् ज्वार के लिए 'एक ही दिशा' (युति) का नियम याद रखें।
b) चित्र बनाकर समझें कि जब सूर्य और चंद्रमा एक तरफ होते हैं तो खिंचव अधिक होता है।
c) परिभाषा और कारणों को सटीक रूप से लिखें।
Question 3:
(iii) पृथ्वी तथा चंद्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?
(क) अपसौर
(ख) उपसौर
(ग) उपभू
(घ) अपभू
Answer:
सही उत्तर (ग) उपभू है। जब चंद्रमा अपनी कक्षा में परिक्रमण करते हुए पृथ्वी के सबसे निकट होता है, तो उस स्थिति को उपभू (Perigee) कहते हैं। इस स्थिति में ज्वार अधिक ऊँचे आते हैं।
मुख्य बिंदु:
• उपभू चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की न्यूनतम दूरी की स्थिति है।
• इसके विपरीत अपभू अधिकतम दूरी की स्थिति होती है।
• उपसौर और अपसौर पृथ्वी तथा सूर्य की दूरियों से संबंधित हैं।
आम गलतियाँ:
• उपभू और उपसौर के शब्दों में भ्रमित होना।
• चंद्रमा और पृथ्वी की दूरी तथा सूर्य और पृथ्वी की दूरी को एक मानना।
• गलत विकल्प का चयन करना।
Exam Tips:
a) चंद्रमा से संबंधित शब्दों (उपभू/अपभू) और सूर्य से संबंधित शब्दों (उपसौर/अपसौर) को अलग-अलग याद करें।
b) न्यूनतम दूरी के लिए 'उप' उपसर्ग का प्रयोग ध्यान रखें।
c) यह प्रश्न अक्सर बहुविकल्पीय रूप में पूछा जाता है।
Question 4:
(iv) पृथ्वी उपसौर की स्थिति कब होती है?
(क) अक्टूबर
(ख) जुलाई
(ग) सितंबर
(घ) जनवरी
Answer:
सही उत्तर (घ) जनवरी है। पृथ्वी जब सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है, तो 3 जनवरी के आसपास वह सूर्य के सबसे निकट होती है, जिसे उपसौर (Perihelion) कहा जाता है।
मुख्य बिंदु:
• उपसौर की स्थिति प्रतिवर्ष 3 जनवरी को होती है।
• इस समय पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है।
• 4 जुलाई को पृथ्वी सूर्य से अधिकतम दूरी पर होती है, जिसे अपसौर कहते हैं।
आम गलतियाँ:
• उत्तरी गोलार्ध की सर्दी को देखकर जनवरी में दूरी अधिक समझ लेना।
• जुलाई और जनवरी की तिथियों में उलटफेर कर देना।
• उपसौर और अपसौर की परिभाषा में गलती करना।
Exam Tips:
a) याद रखें कि उत्तरी गोलार्ध में सर्दी होने के बावजूद पृथ्वी जनवरी में सूर्य के सबसे पास होती है।
b) उपसौर (जनवरी) और अपसौर (जुलाई) की तिथियाँ कंठस्थ कर लें।
c) भौगोलिक शब्दावली का सही प्रयोग करें।
Question 5: निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
(i) तरंगें क्या हैं?
Answer:
तरंगें वास्तव में ऊर्जा हैं, जल नहीं, जो कि महासागरीय सतह के आर-पार गति करती हैं। तरंगों में जल के कण छोटे वृत्ताकार रूप में गिरते हैं। वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं। जैसे ही एक तरंग महासागरीय तट पर पहुँचती है, इसकी गति कम हो जाती है। बड़ी तरंगें खुले महासागरों में पाई जाती हैं। तरंगें जैसे-जैसे आगे की ओर बढ़ती हैं, बड़ी होती जाती हैं।
मुख्य बिंदु:
• तरंगें महासागरीय सतह पर चलने वाली ऊर्जा की गति हैं।
• इनका मुख्य स्रोत पवन (वायु) है जो जल को ऊर्जा देती है।
• तट के पास पहुँचने पर इनकी गति और आकार में परिवर्तन होता है।
आम गलतियाँ:
• तरंगों को जल का एक स्थान से दूसरे स्थान पर बहना समझ लेना।
• पवन की भूमिका को नजरअंदाज करना।
• उत्तर को बहुत अधिक लंबा लिख देना।
Exam Tips:
a) परिभाषा में यह अवश्य लिखें कि "तरंगें ऊर्जा हैं, जल नहीं"।
b) शब्द सीमा (30 शब्द) का ध्यान रखते हुए संक्षिप्त और सटीक उत्तर दें।
c) मुख्य कारकों जैसे पवन का उल्लेख करना न भूलें।
Question 6:
(ii) महासागरीय तरंगें कहाँ से प्राप्त करती हैं?
Answer:
महासागरीय तरंगें मुख्य रूप से वायु (पवन) से ऊर्जा प्राप्त करती हैं। जब वायु जल की सतह के ऊपर चलती है, तो वह घर्षण बल के कारण जल को ऊर्जा स्थानांतरित करती है, जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। इसके अलावा, भूकंप, ज्वालामुखी उद्गार या भूस्खलन जैसी भूवैज्ञानिक घटनाएँ भी कभी-कभी महासागरों में विशाल तरंगें (जैसे सूनामी) उत्पन्न करती हैं, जिन्हें आंतरिक ऊर्जा या भू-हलचलों से ऊर्जा मिलती है।
मुख्य बिंदु:
• वायु का घर्षण महासागरीय तरंगों का मुख्य ऊर्जा स्रोत है।
• पवन की गति और अवधि तरंगों के आकार को निर्धारित करती है।
• भू-गर्भिक हलचलें भी महासागरों को विशेष प्रकार की ऊर्जा प्रदान करती हैं।
आम गलतियाँ:
• केवल ज्वार-भाटा के कारणों को तरंगों से जोड़ देना।
• ऊर्जा के स्रोत के रूप में पवन की भूमिका को स्पष्ट न करना।
• उत्तर को अनावश्यक रूप से बढ़ाना।
Exam Tips:
a) ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में 'पवन' का नाम स्पष्ट रूप से लिखें।
b) घर्षण प्रक्रिया को संक्षिप्त में दर्शाएँ।
c) सटीक शब्दावली का प्रयोग करें।
Question 7:
(iii) ज्वार-भाटा क्या है?
Answer:
चन्द्रमा और सूर्य के आकर्षण के कारण दिन में एक बार या दो बार समुद्र तल के नियमित उठने तथा गिरने को ज्वार-भाटा कहा जाता है। जब समुद्र तल का जल समुद्र तल से ऊपर उठता है तो उसे ज्वार कहा जाता है और जब जल नीचे की ओर जाता है तो उसे भाटा कहते हैं। यह प्रक्रिया पृथ्वी के घूर्णन और खगोलीय पिंडों के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण नियमित रूप से होती है।
मुख्य बिंदु:
• समुद्र के जल का ऊपर उठना 'ज्वार' कहलाता है।
• समुद्र के जल का नीचे गिरना या उतरना 'भाटा' कहलाता है।
• यह सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण होता है।
आम गलतियाँ:
• ज्वार और भाटा को अलग-अलग परिघटना मान लेना।
• जल के बहने की दिशा को गलत बताना।
• गुरुत्वाकर्षण बल का उल्लेख न करना।
Exam Tips:
a) ज्वार और भाटा दोनों की परिभाषा एक ही उत्तर में स्पष्ट करें।
b) मुख्य कारणों (सूर्य और चंद्रमा का आकर्षण) का संक्षेप में जिक्र करें।
c) एनसीईआरटी के मानक शब्दों का प्रयोग करें।
Question 8:
(iv) ज्वार-भाटा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?
Answer:
चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण तथा कुछ हद तक सूर्य के गुरुत्वाकर्षण द्वारा ज्वार-भाटाओं की उत्पत्ति होती है। दूसरा कारक अपकेन्द्रिय बल है जो कि गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करता है। गुरुत्वाकर्षण बल तथा अपकेन्द्रिय बल दोनों मिलकर पृथ्वी पर दो महत्वपूर्ण ज्वार-भाटा को उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी हैं। चंद्रमा की तरफ पृथ्वी के भाग पर एक ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है तथा विपरीत भाग पर चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल उसकी दूरी के कारण कम होता है, तब अपकेन्द्रिय बल तरफ ज्वार-भाटा उत्पन्न करता है।
मुख्य बिंदु:
• चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव मुख्य कारण है।
• पृथ्वी का अपकेन्द्रिय बल (Centrifugal Force) दूसरा प्रमुख कारक है।
• इन दोनों बलों के संतुलन से पृथ्वी पर नियमित ज्वार-भाटा आते हैं।
आम गलतियाँ:
• केवल चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण को ही एकमात्र कारण बताना।
• अपकेन्द्रिय बल की भूमिका को छोड़ देना।
• दोनों बलों के बीच के संबंध को स्पष्ट न कर पाना।
Exam Tips:
a) दोनों बलों (गुरुत्वाकर्षण और अपकेन्द्रिय बल) का नाम अवश्य लिखें।
b) स्पष्ट करें कि कैसे पृथ्वी के दोनों विपरीत भागों पर ज्वार आते हैं।
c) उत्तर को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखें।
Question 9:
(iv) ज्वार-भाटा नौसंचालन से कैसे संबंधित है?
Answer:
ज्वार-भाटा नौसंचालकों व मछुआरों को उनके कार्य-संबंधी योजनाओं में मदद करता है। नौसंचालन में ज्वारीय प्रवाह का अत्यधिक महत्व है। ज्वार की ऊँचाई बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, विशेषकर नदियों के किनारे वाले बंदरगाहों और ज्वारनदमुख के भीतर, जहाँ प्रवेश द्वार पर छिछली रोधिकाएँ होती हैं, जो कि नौकाओं और जहाजों को बंदरगाह में प्रवेश करने से रोकती हैं। जिस नदी के समुद्री तट के मुहाने पर बंदरगाह हो और जब ज्वार आता है तो बड़े-बड़े जहाज बंदरगाह में प्रवेश कर जाते हैं। इसका उदाहरण भारत में हुगली नदी के तट पर स्थित कोलकाता बंदरगाह है।
मुख्य बिंदु:
• ज्वार के कारण जल स्तर बढ़ने से बड़े जहाज छिछले बंदरगाहों में आसानी से प्रवेश कर पाते हैं।
• यह नौसंचालन और मछुआरों की गतिविधियों को सुगम बनाता है।
• कोलकाता बंदरगाह इसका एक बेहतरीन भारतीय उदाहरण है।
आम गलतियाँ:
• नौसंचालन पर ज्वार के सकारात्मक प्रभाव को न समझा पाना।
• छिछले मुहानों और रोधिकाओं की भूमिका का उल्लेख न करना।
• उदाहरण के रूप में बंदरगाह का नाम न लिखना।
Exam Tips:
a) ज्वार के व्यावहारिक उपयोग (नौसंचालन) को स्पष्ट रूप से समझाएँ।
b) कोलकाता और हुगली नदी का उदाहरण अवश्य दें।
c) उत्तर को तार्किक और स्पष्ट बनाएँ।
Question 10: निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए।
(i) जलधाराएँ तापमान को कैसे प्रभावित करती हैं? उत्तर-पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्र के तापमान को ये किस प्रकार प्रभावित करती हैं?
Answer:
जलधाराएँ अधिक तापमान वाले क्षेत्रों से कम तापमान वाले क्षेत्रों की ओर तथा इसके विपरीत कम तापमान वाले क्षेत्रों से अधिक तापमान वाले क्षेत्रों की ओर बहती हैं। जब ये धाराएँ एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहती हैं तो वे उन क्षेत्रों के तापमान को प्रभावित करती हैं। किसी भी जलराशि के तापमान का प्रभाव उसके ऊपर की वायु पर पड़ता है। इसी कारण विषुवतलीय क्षेत्रों से उच्च अस्टैंडों वाले ठंडे क्षेत्रों की ओर बहने वाली गर्म जलधाराएँ उन क्षेत्रों के वायु के तापमान को बढ़ा देती हैं। उदाहरणार्थ गर्म उत्तरी अटलांटिक अपवाह जो उत्तर की ओर एवं यूरोप के पश्चिमी तट की ओर बहती है, यह ब्रिटेन और नार्वे के तट पर शीत ऋतु में भी बर्फ नहीं जमने देती। जलधाराओं का जलवायु पर प्रभाव और अधिक स्पष्ट हो जाता है, जब आप समान अक्षांशों पर स्थित ब्रिटिश द्वीप समूह की शीत ऋतु की तुलना कनाडा के उत्तरी पूर्वी तट के शीतऋतु से करते हैं। कनाडा का उत्तरीपूर्वी तट लैब्राडोर की ठंडी धारा के प्रभाव में आ जाता है, इसीलिए यह शीतऋतु में बर्फ से ढका रहता है।
मुख्य बिंदु:
• जलधाराएँ तापमान के संतुलन का कार्य करती हैं और उच्च/निम्न तापमान को प्रभावित करती हैं।
• गर्म जलधाराएँ ठंडे प्रदेशों के तटीय क्षेत्रों को गर्म रखती हैं और बंदरगाह खुले रहते हैं।
• उत्तरी अटलांटिक प्रवाह (गर्म धारा) और लैब्राडोर धारा (ठंडी धारा) इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
आम गलतियाँ:
• गर्म और ठंडी धाराओं के प्रभावों को आपस में मिला देना।
• यूरोप और कनाडा के उदाहरण को स्पष्ट रूप से न समझा पाना।
• शब्द सीमा के अनुसार विस्तृत भौगोलिक कारण न लिखना।
Exam Tips:
a) उत्तर लिखते समय गर्म जलधारा (उत्तरी अटलांटिक प्रवाह) और ठंडी जलधारा (लैब्राडोर) का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करें।
b) जलवायु और तापमान पर पड़ने वाले प्रत्यक्ष प्रभाव को वैज्ञानिक तर्कों से समझाएँ।
c) यूरोप के तटों पर बर्फ न जमने का कारण स्पष्ट रूप से उल्लेख करें।
Question 11:
(ii) जलधाराएँ कैसे उत्पन्न होती हैं?
Answer:
महासागरीय जलधाराओं को उत्पन्न करने वाले कारक निम्नलिखित हैं:
प्रचलित पवनें: हवाओं को उत्पन्न करने में प्रचलित पवनों का बहुत बड़ा योगदान होता है। प्रचलित पवनें सदा एक ही दिशा में चलती हैं। ये सागर के ऊपरी तल से गुजरते समय जल को अपनी घर्षण शक्ति से सदा आगे धकेलती हैं और धाराओं को जन्म देती हैं।
तापमान में भिन्नता: गर्म जल हल्का होकर फैलता है, इसलिए उसका तल ऊँचा हो जाता है। ठंडा जल भारी होता है, इसलिए नीचे बैठ जाता है। इस प्रकार तापमान में भिन्नता के कारण सागरीय जल के तल में अंतर आ जाता है और महासागरीय धाराओं का जन्म होता है।
वाष्पीकरण: जिन स्थानों पर वाष्पीकरण अधिक होता है वहाँ पर जल का तल नीचे हो जाता है। संतुलन बनाए रखने के लिए वहाँ अन्य क्षेत्रों से जल एकत्रित होना शुरू हो जाता है, इस प्रकार एक धारा उत्पन्न होती है।
लवणता में अंतर: अधिक लवणता वाला जल भारी होता है, इसलिए नीचे बैठ जाता है। उसका स्थान लेने के लिए कम लवणता तथा घनत्व वाला जल ऊपर उठता है और एक जल धारा बन जाती है।
भूपूर्णन: पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करती है, जिससे कोरिऑलिस बल उत्पन्न होता है। कोरिऑलिस बल के प्रभाव से बहता हुआ जल दीर्घ वृत्ताकार मार्ग का अनुसरण करता है, जिसे गायर्स कहते हैं। इन गायर्स में जल का परिसंचरण उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों के अनुकूल तथा दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों के प्रतिकूल होता है। अतः, फेरेल के नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्ध में धाराएँ अपनी दाहिनी और तथा दक्षिणी गोलार्ध में अपनी बाईं ओर मुड़ जाती हैं। इससे नई धाराएँ बनती हैं।
तटरेखा की आकृति: तटरेखा की आकृति का महासागरीय धाराओं को प्रवाहित दिशा पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उत्तर हिंद महासागर में पैदा होने वाली धाराएँ भारतीय प्रायद्वीप की तट पर रेखा का अनुसरण करती हैं।
ऋतु परिवर्तन: उत्तरी हिंद महासागर में समुद्री धाराओं की दिशा, ऋतु परिवर्तन के साथ बदल जाती है। शीत ऋतु में मानसून ट्रिफ्ट की दिशा के पूर्व से पश्चिम तथा ग्रीष्मऋतु में पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। हिंद महासागर में भूमध्य रेखीय विपरीत धारा केवल शीत ऋतु में ही होती है और भूमध्यरेखीय धारा केवल ग्रीष्म ऋतु में ही बहती है।
मुख्य बिंदु:
• प्रचलित पवनें महासागरीय धाराओं के संचलन का सबसे प्रमुख प्राथमिक कारण हैं।
• तापमान और लवणता में भिन्नता जल के घनत्व को प्रभावित करती है जिससे धाराएँ चलती हैं।
• पृथ्वी का घूर्णन और कोरिऑलिस बल धाराओं की दिशा को मोड़ते हैं।
आम गलतियाँ:
• केवल एक कारक (जैसे केवल पवन) को धाराओं की उत्पत्ति का कारण मान लेना।
• कोरिऑलिस बल और फेरेल के नियम की व्याख्या में गलती करना।
• तापमान और लवणता के घनत्व संबंधी प्रभाव को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) सभी प्रमुख कारकों की हेडिंग बनाकर बिंदुवार उत्तर लिखें ताकि उत्तर स्पष्ट और आकर्षक लगे।
b) कोरिऑलिस बल और पृथ्वी के घूर्णन के प्रभाव को भूगोल के संदर्भ में विशेष रूप से दर्शाएँ।
c) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न के सभी पहलुओं को कवर करें।
Question 12:
(ii) एक ग्लोब या मानचित्र लें, जिसमें महासागरीय धाराएँ दर्शाई गई हैं, वह भी बताएँ कि क्यों कुछ जलधाराएँ गर्म व अन्य ठंडी हैं। इसके साथ ही यह भी बताएँ कि निश्चित स्थानों पर क्यों यह विक्षेपित होती हैं। कारणों का विवेचन करें।
Answer:
महासागरीय जलधाराओं का गर्म या ठंडा होना उनके उद्गम स्थल पर निर्भर करता है। विषुवत वृत्त (भूमध्य रेखा) के पास सूर्य की किरणें वर्षभर सीधी पड़ती हैं, जिसके कारण यहाँ का महासागरीय जल अत्यधिक गर्म हो जाता है। जब इस क्षेत्र से जलधाराएँ ध्रुवों की ओर बहती हैं, तो उन्हें 'गर्म जलधाराएँ' कहा जाता है, क्योंकि वे ठंडे क्षेत्रों में ऊष्मा पहुँचाती हैं। इसके विपरीत, ध्रुवीय क्षेत्रों में सूर्य की किरणें तिरछी होती हैं और तापमान बहुत कम रहता है, जिससे वहाँ का जल ठंडा हो जाता है। जब ये ठंडी जलधाराएँ ध्रुवों या उच्च अक्षांशों से विषुवत वृत्त की ओर बहती हैं, तो इन्हें 'ठंडी जलधाराएँ' कहा जाता है।
निश्चित स्थानों पर इन धाराओं के विक्षेपित होने का मुख्य कारण पृथ्वी का घूर्णन, कोरिऑलिस बल, महाद्वीपों की तटरेखा और तटीय स्थलाकृतियाँ हैं। पृथ्वी के अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व घूमने के कारण एक बल उत्पन्न होता है जिसे कोरिऑलिस बल (Coriolis Force) कहते हैं। इस बल के प्रभाव से उत्तरी गोलार्ध में धाराएँ अपनी दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में अपनी बाईं ओर मुड़ (विक्षेपित) जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जब कोई बहती हुई जलधारा किसी महाद्वीप के तट से टकराती है, तो तटरेखा की दिशा के अनुसार वह अपनी दिशा बदल लेती है (विक्षेपित हो जाती है)। इस प्रकार, तापमान की भिन्नता धाराओं के प्रकार (गर्म या ठंडी) को तय करती है, जबकि कोरिऑलिस बल और तटरेखाएँ उनकी दिशा को विक्षेपित करती हैं।
मुख्य बिंदु:
• विषुवत वृत्त से ध्रुवों की ओर बहने वाली धाराएँ गर्म होती हैं क्योंकि उनका उद्गम उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होता है।
• ध्रुवों से विषुवत वृत्त की ओर बहने वाली धाराएँ ठंडी होती हैं क्योंकि वे उच्च अक्षांशों से आती हैं।
• कोरिऑलिस बल और महाद्वीपीय तटरेखाएँ धाराओं की दिशा को विक्षेपित करने के लिए उत्तरदायी हैं।
आम गलतियाँ:
• गर्म और ठंडी धाराओं के उद्गम क्षेत्रों को आपस में मिला देना।
• कोरिऑलिस बल के प्रभाव (उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में विक्षेप) को गलत लिखना।
• तटरेखाओं की भूमिका को नजरअंदाज करना।
Exam Tips:
a) मानचित्र या ग्लोब का संदर्भ देते हुए अपने उत्तर में स्पष्ट रूप से विषुवत वृत्त और ध्रुवीय क्षेत्रों का जिक्र करें।
b) कोरिऑलिस बल के फेरेल के नियम को संक्षिप्त में अवश्य समझाएँ।
c) कारणों का विवेचन करते समय 'उद्गम' और 'विक्षेप' दोनों भागों को अलग-अलग पैराग्राफ में स्पष्ट करें।
Geography Class 11 Curriculum Solutions: Chapter 13 महासागरीय जल संचलन
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