NCERT Class 9 Hindi Ganga Chapter 03 Samvadheen (संवादहीन) PDF Download

Class 9 Hindi Chapter 03 Samvadheen: NCERT Study Material

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पाठ 3: संवादहीन

शेखर जोशी

शेखर जोशी का जन्म सन् 1932 में अल्मोड़ा, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका पहला कहानी संग्रह कोसी का घटवार सन् 1958 में प्रकाशित हुआ। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं - साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, आदमी का डर, डांगरी वाले, मेरा पहाड़ (कहानी संग्रह), एक पेड़ की याद (शब्दचित्र-संग्रह), स्मृति में रहें वे (संस्मरण), न रोको उन्हें शुभ्रा (कविता संग्रह), मेरा ओलिया गाँव (आत्मवृत्त)। उनकी कहानियों का संग्रह शेखर जोशी कथा समग्र शीर्षक से प्रकाशित है। शेखर जोशी ने ग्रामीण-शहरी मध्यवर्गीय समाज के जीवन-मूल्यों तथा कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के जीवन-संघर्षों को अपनी कहानियों में प्रमुखता से उभारा है।

उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 'महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार' तथा 'साहित्य भूषण सम्मान', मध्य प्रदेश शासन द्वारा 'अखिल भारतीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान' तथा 'श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। सन् 2022 में उनका निधन हो गया।

'संवादहीन' कहानी ग्रामीण वृद्ध स्त्री के अकेलेपन की संवेदनशील कहानी है। कहानी के दो मुख्य पात्र ताई और मिट्ठू हैं। मिट्ठू ताई के लिए केवल एक तोता नहीं बल्कि संवाद का माध्यम और ममता का केंद्र है। इन दोनों के बीच कभी प्रेमपूर्ण संवाद है तो कभी नोक-झोंक भी रहती है। मनुष्य और पशु-पक्षी के संबंधों को दर्शाने के साथ ही यह कहानी समकालीन जीवन-यथार्थ की विसंगतियों, जैसे- पलायन, अकेलेपन और आदर्श एवं यथार्थ के द्वंद्व को अभिव्यक्त करती है।

शिक्षक की टिप्पणी

a) शेखर जोशी का पहला कहानी संग्रह 'कोसी का घटवार' (1958) है; 'मेरा ओलिया गाँव' उनका आत्मवृत्त है।
b) भूमिका के अनुसार कहानी के दो मुख्य पात्र हैं: ताई और तोता मिट्ठू।
c) 'पलायन' का अर्थ है गाँव छोड़कर दूसरी जगह (जैसे शहर) चले जाना; भूमिका में इसे कहानी की एक विसंगति बताया गया है।

गहरी साँस लेकर ताई कहतीं, "भगवान! कैसे नैया पार लगेगी?" और बंद पिंजड़े में अपने पंखों को फड़फड़ाता, उछल-कूद मचाता मिट्ठू उत्तर देता, "राम-राम कहो, सीताराम कहो।"

ताई दुहरातीं - सीताराम! सीताराम!

ताई और मिट्ठू
मिट्ठू और ताई।

अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे। ताई ने अपने जीवन में अच्छे दिन भी देखे थे। पूत-परिवार, बहू-बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, क्या नहीं था बड़े घर में! देखते ही देखते क्या से क्या हो गया! बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए। बेटियाँ अपने-अपने हाथ पीले कराकर अपनी गृहस्थी में रम गईं, किसके भरोसे कारबार संभलता। धीरे-धीरे सब पराए हाथों में चला गया। जब खेती-बाड़ी नहीं, कारबार नहीं, तो नौकर-चाकर किस दम पर टिकते! अपनी अकेली जान के लिए ताई दो जून का एक जून चूल्हा फूँक लेतीं, व्रत-उपवास के बहाने चौका-चूल्हा टाल जातीं, पेट की समस्या उनके लिए कभी समस्या नहीं रही, पर सूने घर की भाँय-भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।

भला हो गनपत का, जिसने ताई के सूनेपन को सहारा दे दिया था, वह न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था। ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी। वह रात-दिन मिट्ठू को लेकर ही बेचैन रहने लगीं। जो ताई अपनी खातिर चूल्हा जलाने में आलस्य कर जाती थीं, वही अब नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं। मिट्ठू के वक्त-बेवक्त के तकाजों के लिए रोटी बचाकर रखतीं। अब ताई को इस बात की पूरी जानकारी रहने लगी थी कि किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हो गई हैं और किस पेड़ में फसल के आखिरी अमरूद बचे हैं।

शिक्षक की टिप्पणी

a) 'हाथ पीले करना' मुहावरे का अर्थ है विवाह होना; 'दो जून' का अर्थ है दो समय का भोजन।
b) 'भाँय-भाँय' ध्वन्यात्मक शब्द है, जो सूने घर के सन्नाटे को बताता है।
c) तोता गनपत लाया था; उसके आने के बाद ताई की दिनचर्या कैसे बदली, इसे पाठ की पंक्तियों से मिलाकर देखिए।

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