NCERT Class 8 Hindi Malhar Chapter 04 Haridwar (हरिद्वार) PDF Download

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पाठ 4: हरिद्वार

[चित्र: लिंक पैनोरामिक व्यू ऑफ हर की पौड़ी व्यू2.jpg (लेखक: kumravels), पाठ्यपुस्तक में देखें]

हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध रचनाकार भारतेंदु हरिश्चंद्र अपनी यात्राओं के लिए चर्चित रहे हैं। उन्होंने भारत के अनेक गाँवों और नगरों की यात्राएँ की और उनके विषय में पत्र-पत्रिकाओं में लिखा भी। प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और परातत्व का अध्ययन करने में यात्राओं से उन्हें बहुत सहायता मिली वे मानते थे कि शिक्षा की पूर्ति पुस्तकों से ही नहीं यात्राओं से भी होती है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र 1871 ई. में हरिद्वार की यात्रा पर गए थे वे लिखते हैं - "मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।" हरिद्वार की प्रकृति, वहाँ के पर्वतों, पर्वतों, पुष्पों और कलकल बहती गंगा, वहाँ के घाटों, लोगों, दुकानों और गंगा तट के मनोरम दृश्यों को देखकर वे अति आनंदित हुए। इस पाठ में उन्होंने कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम पत्र लिखते हुए अपनी उसी हरिद्वार-यात्रा का रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है। इस पत्र में प्रयुक्त हिंदी का स्वरूप लगभग 150 वर्ष पुराना है।

श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेष्ठ!

मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है कि मैं उस पवित्र भूमि का वर्णन करता हूँ जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है। यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-भरे पर्वतों से घिरी है जिन पर्वतों पर अनेक प्रकार की बल्लियाँ हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोआशों की भीति फेलकर लहलहा रही है और बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खदे हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भीति धाम, ओस ओर वर्षा अपने ऊपर सहते हैं। अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थ विमुच जात ही नहीं फल, फूल, घष, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़;।

यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं। सज्जन ऐसे कि पथ्यर मारेने से फल देते हैं। इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दृष्ट बुद्धिमन्त से निकड़ होकर करलोल करते हैं। वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जाड़ों है। एक ओर मिश्रवान पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है। जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिश्ट भी वेषा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है, रंग जल का स्वच्छ और श्वेत है और अनेक प्रकार के जल-जंतु करलोल करते हुए। यहाँ श्री गंगा जी अपना नाम नदी सत्य करती हैं अर्थात् जल के वेग का शब्द बहुत होता है और शीतल बाय नदी के उन पवित्र छोटे-छोटे कर्नों का लेकर स्पर्श ही से पावन करता हुआ संचार करता है। यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं - एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से, इन दोनों धारों के बीच में एक सुंदर नीचा पर्वत है और नील धारा के तट पर एक छोटा-सा सुंदर चूड़िला पर्वत है और उसके शिखर पर चंडिका देवी की मूर्ति है। यहाँ हरि की पैड़ी नामक एक पवका घाट है और यहीं स्नान भी होता है। विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही वेवता हैं, दूसरा वेवता नहीं यों तो वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं। श्री गंगा जी का पाठ भी बहुत छोटा है पर वेग बड़ा है, तट पर राजाओं की धर्मशाला यात्रियों के उत्तरने के हेतु बनी हैं और दुकानें भी बनी हैं पर रात को बंद रहती हैं। यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा

[चित्र: हर की पौड़ी का पैनोरामिक दृश्य, पाठ्यपुस्तक में देखें]

क्रोध की खानि जो मनुष्य है सो वहाँ रहते ही नहीं पंडे दुकानदार इत्यादि कनखल व ज्वालापुर से आते हैं। पंडे भी यहाँ बड़े बिलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे का लाख करके मान लेते हैं। इस क्षेत्र में पाँच तीर्थ मुख्य हैं हरिद्वार, कुशावर्ती, नीलधारा, बिल्वपर्वत और कनखला हरिद्वार तो हरि की पैड़ी पर नहाते हैं, कुशावर्ती भी उसी के पास है, नीलधारा वहीं दूसरी धारा, बिल्व पर्वत भी पास ही एक सुहाना पर्वत है जिस पर बिल्लेश्वर महादेव की मूर्ति है और कनखल तीर्थ इधर ही है, यह कनखल तीर्थ बड़ा उत्तम है। किसी काल में वदस ने यहाँ यज्ञ किया था और यहीं सती ने शिव जी का अपमान न सहकर अपना शरीर भस्म कर दिया यहाँ कुछ छोटे-छोटे घर भी बने हैं; और भारामल जेकुष्णदास खत्री यहाँ के प्रसिद्ध धर्मिक हैं हरिद्वार में यह बस्वेड़ा कुछ नहीं है और शुद्ध निर्मल साधुओं के सेवन योग्य तीर्थ है। मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है। मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर ठिका था यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है। चारों ओर से शीतल पवन आती थी यहाँ त्राणि को प्रहण हुआ और हम लोगों ने प्रहण में बड़े आनंदपूर्ण स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया वेसे ही मेरे संग कल्लु जी मित्र भी परमानंदी थे। निदान इस उत्तम क्षेत्र में जितना समय बीता, बड़े आनंद से बीता। एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पथ्यर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। जल के छलके के पास ही ठेंठे-ठेंठे आते थो उस समय के पथ्यर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था। चित्त में बारबार ज्ञान,

लेखक से परिचय

'निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल' का उद्धोष करने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कविता, नाटक, निबंध और यात्रा-वृत्तांत आदि अनेक विधाओं में लेखन कार्य किया। (1850-1885) इन्होंने कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगज़ीन, हरिश्चंद्र चंद्रिका और पिछौ के लिए बालाबोधिनी पत्रिकाएँ प्रकाशित की। इनकी रचनाओं में समाज-सुधार, राष्ट्र-प्रेम, अँग्रेज़ी शासन का विरोध, स्वाधीनता की भावना के स्वर सुनाई देते हैं। इन्हे आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता है। सत्य हरिश्चंद्र, भारत-दर्शन, अंधेर नगरी और सरयूपार की यात्रा इनकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैं।

शिक्षक की टिप्पणी

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पत्र के रूप में अपनी यात्रा का वर्णन किया है। पत्र लेखन एक ख़ास शैली है जहाँ लेखक अपने प्रिय मित्र या संपादक को संबोधित करते हुए बात करता है। यह पत्र एक समाचार पत्र के संपादक को लिखा गया है, इसलिए इसमें यात्रा के दौरान देखे गए स्थानों का विस्तृत और रोचक वर्णन है। जब आप किसी यात्रा के बारे में लिखें, तो देखे हुए स्थानों के बारे में विस्तार से लिखने की कोशिश करें ताकि पाठक को वह स्थान आँखों के सामने दिखाई दे।

पाठ से

आइए, अब हम इस पत्र को थोड़ा और विस्तार से समझते हैं। नीचे दी गई गतिविधियाँ इस कार्य में आपकी सहायता करेंगी।

मेरी समझ से

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सामुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

  1. "सज्जन ऐसे कि पथ्यर मारेने से फल देते हैं" का क्या अर्थ है?
    • लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं।
    • लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।
    • लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे।
    • लेखक को पथ्यर मारकर फल तोड़कर खाना पसंद था।
  2. "बैरागय और भक्ति का उदय होता था" इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?
    • शारीरिक श्रकान और मानसिक बेचेतनी
    • आर्थिक संतोष और मानसिक विकास
    • मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव
    • सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम
  3. "पथ्यर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था" इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?
    • संपृष्टि में सुख होता है।
    • सुखी लोग पथ्यर पर भोजन करते हैं।
    • लेखक के पास सोने की थाल नहीं थी।
    • पथ्यर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है।
  4. "एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पथ्यर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।" यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?
    • अंधविश्वास और लालच
    • मानवता और देशप्रेम

शिक्षक की टिप्पणी

यात्रा वर्णन में लेखक अपनी व्यक्तिगत भावनाओं और अनुभवों को भी व्यक्त करता है। इस पत्र में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हरिद्वार के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ ही वहाँ की आध्यात्मिक शांति को भी दर्शाया है। वे सिर्फ स्थान का वर्णन नहीं करते, बल्कि उस स्थान पर उन्हें जो भाव और भावनाएँ आई, उन्हें भी शब्दों में ढालते हैं। जब आप किसी पाठ को पढ़ें, तो लेखक के व्यक्तिगत भावों को समझने की कोशिश करें।

मुख्य बिंदु

  • भारतेंदु हरिश्चंद्र एक महान साहित्यकार थे जिन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया और आधुनिक हिंदी का विकास किया।
  • हरिद्वार एक पवित्र तीर्थ स्थल है जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य, आध्यात्मिक शांति और सांस्कृतिक महत्व का समन्वय है।
  • यात्रा वर्णन में लेखक अपने अनुभवों और भावनाओं को व्यक्त करता है, जिससे पाठकों के मन में उस स्थान का जीवंत चित्र बनता है।
  • गंगा नदी को भारतीय संस्कृति में पवित्र माना जाता है और हरिद्वार गंगा नदी पर एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है।

यह अध्याय के पहले 5 पृष्ठों का पूर्वावलोकन है। पूरा अध्याय पाने के लिए नीचे क्लिक करें।

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