Read Chapter 02 Nyay Ki Kursi of NCERT Class 5 Hindi
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पाठ 2: न्याय की कुर्सी
उज्जैन की प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी के बाहर एक लंबा-चौड़ा मैदान था। यहाँ-वहाँ टीले थे। एक दिन लड़कों का एक झुंड वहाँ खेल रहा था। एक लड़का कूदता-भागता एक टीले पर चढ़ गया। अचानक वह ठोकर खाकर गिर पड़ा। उसने इधर-उधर देखा कि किस चीज़ से ठोकर लगी है। उसको एक बड़े निकने पथर के अलावा ओर कुछ नहीं दिखा। वह उठकर गया ओर अपने मित्रों को बुलाकर वह शिला दिखाई। फिर शान से उस पर बैठकर बोला, "यह सिंहासन है मेरा। मैं राजा हूँ ओर तुम सब मेरे दरबारी। तुम अपनी-अपनी फरियाद लेकर आओ फिर में उनका फैसला करूँगा।"
[चित्र: बाहर खेलते हुए बच्चे, पाठ्यपुस्तक में देखें]
दूसरे लड़कों को यह खेल पसंद आया वे एक-एक करके आते ओर कोई काल्पनिक फरियाद सुनाते। फिर गवाह बुलाए जाते। उनकी गवाही ली जाती। उसके बाद राजा बना हुआ लड़का अपना फैसला सुनाता।
इस खेल में उसको इतना आनंद आया कि वे रोज़ ही यह खेल खेलने लगो। शिकायतें सुनी जातीं, अपराधी पेश किए जाते, बयान लिए जाते, फिर शिला पर बैठा हुआ लड़का अपना फैसला सुनाता।
शिक्षक की टिप्पणी
इस कहानी में लड़कों का खेल एक महत्वपूर्ण विचार दिखाता है: बच्चे वयस्कों को देखकर सीखते हैं। वे न्याय, निष्पक्षता और कानून जैसी गंभीर बातों को भी खेल के रूप में समझने लगते हैं। क्या आपने अपने घर या स्कूल में ऐसा कोई खेल देखा है जहाँ बच्चों ने किसी बड़ों के काम को दोहराया हो?
बात इधर-उधर फैलने लगी। लोग लड़के की न्याय-बुद्धि की चर्चा करने लगे ओर कहने लगे कि अवश्य ही उस लड़के में कोई देवी शक्ति है।
एक दिन दो किसानों के बीच जमीन को लेकर झगड़ा उठ खुदा हुआ मामला गंभीर था। टीलेवाले लड़के की इतनी चर्चा थी कि वे राजा के दरबार में जाने के बजाय उसी के पास गए ओर उसको अपना फैसला सुनाता।
इस खेल में उसको इतना आनंद आया कि वे रोज़ ही यह खेल खेलने लगो। शिकायतें सुनी जातीं, अपराधी पेश किए जाते, बयान लिए जाते, फिर शिला पर बैठा हुआ लड़का अपना फैसला सुनाता।
राजा का इशारा पते ही उस स्थान को खोदकर पथर को बाहर निकाला गया। राजा ने देखा कि वह पथर नहीं, बहुत ही सुंदर सिंहासन था। उस पर बहुत बारीक ओर खूबसूरत मूर्तियों खुदी हुई थीं। उसके चारों पायों पर चार देवताओं की मूर्तियाँ बनी हुई थीं। चारों ओर खबर फैल गई। बात ही बात में वहाँ अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई। विद्वान पंडितों
ने बताया कि वह कोई ऐसा-वैसा सिंहासन नहीं था - सदियों पुराना, राजा विक्रमादित्य का सिंहासन था। राजा विक्रमादित्य अपने न्याय ओर विवेक के लिए बहुत प्रसिद्ध था।
राजा ने आज्ञा दी कि सिंहासन को ले जाकर राजदरबार में रख दिया जाए। उसने कहा, "मैं इस पर बैठकर अपनी प्रजा की फरियाद सुनूँगा ओर उनका फैसला करूँगा।"
अगले दिन राजा दरबार में आया ओर सीधे उस सिंहासन की ओर बढ़ा। वह उस पर बैठने ही वाला था कि किसी की आवाज़ सुनाई दी, "ठहरो!"
राजा ने रुककर चारों ओर देखा कोई नज़र नहीं आया। वह फिर सिंहासन की ओर बढ़ा। फिर इसी प्रकार आवाज़ आई, "ठहरो!" इस बार राजा ने आश्चर्य से देखा कि सिंहासन के एक पायें पर बनी मूर्ति बोल रही है।
शिक्षक की टिप्पणी
कहानी का यह हिस्सा एक नई दिशा लेता है। अब एक रहस्यमय तत्व आता है जब सिंहासन की मूर्तियाँ बातें करने लगती हैं। यह एक कहानी कहने की तकनीक है जो पाठक को और भी ध्यान से सुनने के लिए आमंत्रित करती है।
मूर्ति ने कहा, "क्या तुम इस सिंहासन पर बैठने योग्य हो? क्या तुम्हें पूरा विश्वास है कि तुमने कभी चोरी नहीं की है?"
राजा ने लज़्ज़ा से सर झुका लिया। "यह सच है कि हाल में ही मैंने अपने एक दरबारी की जमीन पर कब्जा कर लिया था क्योंकि मैं उससे नाराज़ हो गया था।"
"तब तो तुम इसके योग्य नहीं हो", मूर्ति ने कहा। "तुम्हारो तीन दिन तक प्रायश्चित करना होगा।" यह कहकर मूर्ति अपने पंच फेलाकर आकाश में उड़ गई।
राजा ने तीन दिन तक फिर उपवास ओर पूजा-पाठ किया। तीसरी बार वह फिर सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ा। हिचकिचाते हुए वह आगे बढ़ा। वह बैठने ही वाला था कि तीसरी मूर्ति ने पूछा, "बैठने के पहले यह बताओ कि क्या तुमने कभी किसी की चोट नहीं पहुंचाई है?"
राजा पीछे हट गया। तीसरी मूर्ति भी अपने पंख फेलाकर उड़ गई। फिर तीन दिन तक उपवास ओर प्रार्थना करने के बाद राजा सिंहासन की ओर बढ़ा। उसके पैर लड़खड़ा गए। चौथी मूर्ति ने कहा, "ठहरो! जो लड़के इस सिंहासन पर बैठे थे, वे भोले-भाले थे। उनके मन में कलुष नहीं था। अगर तुम्हारो विश्वास है कि तुम इस योग्य हो तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो।"
राजा बड़ी देर तक सोचता रहा। फिर उसने मन ही मन कहा, "अगर एक लड़का इस पर बैठ सकता है तो भला मैं क्यों नहीं बैठ सकता हूँ। मैं राजा हूँ मुझसे ज़्यादा धनवान, बलवान ओर बुद्धिमान भला ओर कौन होगा? मैं अवश्य इस सिंहासन पर बैठने योग्य हूँ!"
मुख्य बिंदु
- कहानी दिखाती है कि न्याय करना एक महत्वपूर्ण काम है जिसके लिए सच्चाई और निष्पक्षता चाहिए।
- एक साधारण टीले पर मिली पुरानी शिला असल में राजा विक्रमादित्य के सिंहासन का रहस्य छिपाए रखती थी।
- सिंहासन की मूर्तियाँ राजा को सिखाती हैं कि सच्चा राजा वह है जो अपनी गलतियों को स्वीकार करता है और उन्हें सुधारता है।
- कहानी का संदेश यह है कि शक्ति और समृद्धि से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं ईमानदारी, सच्चाई और आत्म-ज्ञान।
यह अध्याय के पहले 5 पृष्ठों का पूर्वावलोकन है। पूरा अध्याय पाने के लिए नीचे क्लिक करें।
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