Previous Year Question Papers for Class 12 Hindi
Explore authentic exam materials through the ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper 2018 with Solutions. Tailored for Class 12 learners, utilizing these Hindi previous year papers ensures thorough preparation and strengthens time management skills before final ISC evaluations.
Practice Class 12 Hindi Exam Papers
Navigate directly to the solved Hindi question papers using the digital viewer below. Each practice set includes detailed solutions, allowing students to instantly cross-check their work and identify areas requiring further revision.
ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper with Solutions
Section-A - Language (50 Marks)
प्रश्न 1. Write a composition in approximately 400 words in Hindi on any ONE of the topics given below: [20]
उत्तर:
(i) यह कटुसत्य है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में आम आदमी तनावग्रस्त हो रहा है। वह कम समय में अधिक-से-अधिक पाना और बड़े से बड़ा व्यक्ति होना चाहता है। भौतिकवाद ने इसे और भी तनावग्रस्त बना दिया है। हम अपने शारीरिक तथा मानसिक विकास से कोसों दूर होते जा रहे हैं।
मेरे विचार से आज के विभिन्न तनावों से मुक्त होकर स्वस्थ एवं संपूर्ण जीवन का आनंद लेने के लिए साहित्य, संगीत एवं कला का सहारा लेना चाहिए।
जब से मानव सभ्यता का विकास हुआ है तब से मनोरंजन के नए-नए तरीके अपनाए जा रहे हैं। साहित्य, संगीत एवं कला का मानव जीवन में विशिष्ट स्थान है। इनसे न केवल मनोरंजन होता है अपितु हमारे विकार भी दूर होते हैं। हमें नई प्रेरणाएँ मिलती हैं और हम उदात्त, उदार, सत्याधाररत एवं निश्छल जीवन की ओर उन्मुख होने लगते हैं। ये हमारी सद्प्रवृत्तियों को जगाने और पल्लवित करने वाले उपकरण हैं।
सर्वप्रथम साहित्य की बात की जाए साहित्य का अर्थ ही मनुष्य का हित-साधन है। मानव का स्वभाव है कि वह सीधे-सीधे दिए जाने वाले उपदेशों को ग्रहण नहीं करता। वही उपदेश जब निहित संदेश के रूप में साहित्य के माध्यम से दिए जाते हैं तो मनुष्य का साधारणीकरण हो जाता है। वह स्वयं को साहित्यक परिवेश के अनुसार ढालने लगता है। वह उन स्थितियों, घटनाओं, पात्रों या भावनाओं को हृदय में स्थान दे देता है। उसे खल पात्रों और सज्जनों का बोध होने लगता है। धीरे-धीरे वह सत्साहित्य के माध्यम से अपने आपको ऊपर उठता अनुभव करता है।
कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्यकार अपने समाज में जो कुछ भी अच्छाबुरा देखता है उसे अपनी आँख अर्थात् दृष्टिकोण से मंडित और सिंचित करके साहित्य की अलगअलग विधाओं के माध्यम से अभिव्यक्त कर डालता है। उपन्यास, कहानी, कविता, एकांकी, नाटक, संस्मरण, रेखाचित्र, निबंध, रिपोर्ताज आदि विविध विधाओं को अपनाकर साहित्यकार अपनी बात कहता है। इससे न केवल हमारा मनोरंजन होता है अपितु हमारा ज्ञान भी बढ़ता है। हमारे भीतर स्थितियों का सामना करने, समस्याओं का समाधान खोजने और परिवेश के अनुसार आचरण अपनाने की समझ पैदा होती है।
संगीत को एक श्रेष्ठ एवं लोकप्रिय कला होने का गौरव प्राप्त है। संगीत मनुष्य के स्नायु-तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। इससे हम दिनचर्या के बोझ एवं तनाव से मुक्त हो जाते हैं। प्रायः जन्म से ही मनुष्य को संगीत की समझ होती है। बच्चा जब लोरी सुनता है तो उसे संगीत की समझ नहीं होती। वह अबोध, अपठित तथा अज्ञानी होता है। तथापि उसे आनंद आता है। संगीत का मनुष्य तो मनुष्य पशु-पक्षियों पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि संगीत का दीवाना हिरण शिकारियों द्वारा फैलाए गए संगीत के जाल में फंसकर अपनी जान गँवा बैठता है।
जिस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण है उसी प्रकार कला उसके विभिन्न प्रकार के व्यवहारों की झाँकी कही जा सकती है। आचार्य विभु ने चौंसठ कलाओं का वर्णन किया है। कला हमारे जीवन को निखारती है। यह भावों को प्रस्फुटित करती है। मनुष्य के सुखी जीवन के लिए साहित्य, संगीत और कला अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। साहित्य से ज्ञानवर्धन होता है और कला तथा संगीत से मनोरंजन होता है। कला और संगीत ईश्वर के अलौकिक आनंद की अनुभूति कराते हैं। साहित्य मनुष्य को सत्मार्ग की प्रेरणा देता है। वह उसके चरित्र का निर्माण कर उत्कर्ष पर ले जाता है। कला और संगीत मिलकर अद्भुत आनंद की अनुभूति कराते हैं। हमारे देश की संस्कृति कला और संगीत में छिपी होती है। साहित्य नए समाज का निर्माण करता है। मनुष्य पर साहित्य का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रभाव पड़ता है। उसके सर्वांगीण विकास में साहित्य सहायक होता है। कला में नृत्य, चित्रकला, भवन निर्माण, मूर्ति कला, आदि विधाएँ आती हैं।
भारतीय मान्यता है कि जब सरस्वती ने अपने कोमल हाथों में वीणा धारण की तब सामवेद की रचना हुई, और संगीत के सात स्वरों का प्रादुर्भाव हुआ। धीरे-धीरे संगीत की यह परंपरा विदेशों में पहुँच गई और आज हमें संगीत की दो शैलियाँ पाश्चात्य संगीत और भारतीय संगीत के रूप में मिलती हैं। चाहे संगीत किसी भी शैली का क्यों न हो, उसका उद्देश्य मनुष्य को सुख और आनंद प्रदान करना ही होता है। संगीत सुनने व सीखने से मनुष्य को बहुत लाभ होते हैं।
संगीत के अंदर नवजीवन प्रदान करने की अद्भुत क्षमता होती है। जब थका-हारा मनुष्य कुछ समय संगीत का आनंद प्राप्त करता है तो उसकी सारी थकान दूर हो जाती है और वह स्वयं को तरोताजा अनुभव करने लगता है। गीत-संगीत और नृत्य तो प्राचीन काल से ही मनोरंजन के साधन माने गए हैं। आज भी यदि इस व्यस्त जीवन शैली में मनुष्य रोज सैर-सपाटे के लिए नहीं जा सकता है तो वह अपने घर में ही संगीत का आनंद प्राप्त करके मनोरंजन कर सकता है।
संगीत प्रेरणा स्रोत भी है। यह व्यक्ति को कार्य करने की प्रेरणा भी देता है। यदि हम काम करते समय संगीत भी सुनने जाते हैं तो वह काम जल्दी भी होता है और काम करने में आनंद का अनुभव होता है।
संगीत सुनने से हमारे ज्ञान में वृद्धि भी होती है। संगीत के क्षेत्र के अनेक राग-रागिनियों की जानकारी संगीत को सुनकर ही प्राप्त होती है। गीत, गजल आदि को सुनकर समझने से हमारे शब्द भंडार में भी वृद्धि होती है। अनेक जटिल शब्दों के अर्थ भी हमारी समझ में आते हैं।
शारीरिक दृष्टि से भी संगीत का आनंद मनुष्य के लिए लाभदायक होता है। संगीत की लय पर थिरकना एक प्रकार का व्यायाम है इससे शरीर का रक्त संचार बढ़ता है, संगीत की लय, गीतों के बोल याद रखना, उन्हें सटीक गाना इत्यादि क्रियाएँ मस्तिष्क को भी सुदृढ़ बनाती हैं। अतः हमारे जीवन में साहित्य, संगीत और कला का विशेष महत्व है क्योंकि ये तीनों हमारे लिए मनोरंजन, ज्ञानवर्धन, उदात्तीकरण तथा प्रेरणा के स्रोत हैं।
Teacher's Note:
a) An effective essay must have a clear introductory hook, well-structured body paragraphs, and a thoughtful conclusion.
b) Students should ensure relevant quotes, idioms, or sub-headings are used to enhance the richness of the composition while adhering to the word limit.
प्रश्न 2. Read the passage given below carefully and answer in Hindi the questions that follow, using your own words: [20]
किसी नगर में एक नवयुवक रहता था जिसका नाम सुन्दर था। वह मेहनत करने से हमेशा बचता था। जब भी कोई काम उसके सामने आ जाता था जिसमें उसे मेहनत करनी हो, तो वह उस कार्य से दूर भागने लगता था। मेहनत को लेकर उसके मन में यह बात बैठ गयी थी कि वह कभी मेहनत नहीं कर सकता लेकिन उसके अंदर अच्छी बात यह थी कि वह अपने जीवन में सफल होना चाहता था। वह सोचता था क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो उसे सफलता का मंत्र दे सके।
इस प्रश्न को लेकर वह बहुत से लोगों और विद्वानों के पास गया। कोई कहता था कि माता-पिता की सेवा करना सफलता का मंत्र है, तो कोई कहता था कि लोगों की मदद करना सफलता का मंत्र है। लेकिन किसी का भी उत्तर उसे संतुष्ट नहीं कर पाता था। एक दिन जब वह अपने नगर की एक सड़क से गुजर रहा था, तो उसने एक साधु को देखा जिसे एक बहुत बड़ी भीड़ ने घेर रखा था। उस साधु को उसने पहले कभी अपने नगर में नहीं देखा था। साधु के बारे में पूछने पर पता चला कि वे साधु लोगों के प्रश्नों के बहुत सटीक उत्तर देते हैं, आज तक कोई भी व्यक्ति उनके उत्तर से असंतुष्ट नहीं हुआ है। सुन्दर की आँखों में चमक आ गई। उसने सोचा कि क्यों न साधु से अपने प्रश्न का उत्तर जाना जाए। अगर उन्होंने मुझे सफलता का मंत्र बता दिया तो मैं जरूर सफल हो जाऊँगा।
वह साधु के पास गया और उनसे पूछा, “साधु महाराज, मैं अपने जीवन में सफल होना चाहता हूँ, क्या आप मुझे सफलता का मंत्र बता सकते हैं?” साधु के चेहरे पर मधुर मुस्कान आ गयी और उन्होंने कहा, “तुम्हारे इस प्रश्न के बारे में मैं तुम्हें अभी नहीं बताऊँगा। इस नगर में मुझे 10 दिन तक रुकना है। तुम कल आकर मुझसे मिलो।” अगले दिन साधु ने उसे एक बहुत बड़ी और मोटी किताब देते हुए कहा, “अगर तुम्हें सफलता का मंत्र जानना है तो इसके लिए तुम्हें इस किताब को पढ़ना होगा। इस किताब के किसी एक पृष्ठ पर सफलता का मंत्र दिया हुआ है। जैसे ही तुम उस पृष्ठ को पढ़ोगे, तो तुरंत तुम्हें वह मंत्र मिल जायेगा लेकिन शर्त यह है कि इस किताब को तुम शुरू से पढ़ोगे, यदि तुमने इसे कहीं बीच में से पढ़ा, तो वह मंत्र तुम्हें नहीं मिल पायेगा।”
सुन्दर किसी भी तरह सफलता का मंत्र जानना चाहता था। अतः उसने साधु की शर्त मान ली और तुरंत उस किताब को शुरू से पढ़ना प्रारम्भ कर दिया। वह जल्दी से जल्दी उस पृष्ठ पर पहुँचना चाहता था, जहाँ सफलता का मंत्र लिखा हुआ था। अतः उसने किताब को लगातार पढ़ना जारी रखा। कब रात हुई और कब दिन, उसे बिल्कुल भी ध्यान नहीं था। वह खाना और पीना तक भूल गया था। हर समय किताब पढ़ता रहता था। नींद बहुत सताती, तो कुछ देर सो जाता लेकिन उठते ही पढ़ने बैठ जाता। सात दिन बाद जब वह किताब के आखिरी पृष्ठ पर पहुँचा, तो उसे लगा कि यह तो किताब का आखिरी पृष्ठ है, यहाँ पर मुझे सफलता का मंत्र मिलना तय है लेकिन जब वह किताब की आखिरी लाइन पर पहुँचा तो उसमें लिखा था-“अगर तुम्हें सफलता का मंत्र जानना है, तो इस किताब के पिछले ‘कवर’ पृष्ठ की जिल्द हटा कर देखो।”
सुन्दर ने तुरंत पिछले ‘कवर’ पृष्ठ की जिल्द को हटाया, तो कुछ लाइनें वहाँ लिखी हुई थीं। उन्हें पढ़ते ही वह ख़ुशी से उछलने लगा और चिल्लाने लगा, “मुझे सफलता का मंत्र मिल गया। मुझे सफलता का मंत्र मिल गया।” इतना कहकर वह फिर से उन लाइनों को पढ़ने लगा, जिनमें यह लिखा था- “जिस तरह तुमने इस किताब को पढ़ने के लिए अपने दिन और रात एक कर दिए, तुम्हें अपने खाने पीने का ध्यान नहीं रहा, हर समय सफलता का मंत्र खोजने के लिए लगातार किताब पढ़ते रहे, तुमने अपना हर पल इस किताब में सफलता का मंत्र ढूँढने में लगा दिया, किसी भी अन्य चीज़ के बारे में तुमने एक पल के लिए भी नहीं सोचा, लगातार उत्साह और लगन के साथ तुमने अपने प्रत्येक क्षण को मंत्र पाने में डुबो दिया। यदि इसी ललक और दृढ़ इच्छा के साथ तुम दुनिया के किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करना चाहोगे, तो कोई भी तुम्हें सफल होने से नहीं रोक सकता।”
विवेकानन्द जी ने भी इस सफलता का मंत्र कुछ इस तरह बताया है- “अपना जीवन एक लक्ष्य पर निर्धारित करो। अपने पूरे शरीर को उस एक लक्ष्य से भर दो और हर दूसरे विचार को अपनी जिंदगी से निकाल दो। यही सफलता की कुंजी है।”
प्रश्न-
(i) सुन्दर किस चीज से घबराता था और क्यों? उसकी एक अच्छी बात क्या थी?
(ii) सुन्दर साधु के पास क्यों गया? समझाकर लिखिए।
(iii) साधु ने सुन्दर को सफलता का मंत्र पाने के लिए क्या करने को कहा? समझाकर लिखिए। [4]
(iv) सुन्दर को सफलता का मंत्र कैसे मिला? समझाकर लिखिए। [4]
(v) इस गद्यांश से आपको क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर:
(i) सुन्दर मेहनत करने से घबराता था। वह ऐसे प्रत्येक कार्य से बचना चाहता था जिसमें परिश्रम की आवश्यकता हो। उसमें एक अच्छी बात थी कि वह अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता था।
(ii) सुन्दर साधु के पास सफलता का मंत्र लेने गया। वह साधु की कीर्ति से प्रभावित था और उसे विश्वास था कि ऐसे श्रेष्ठ साधु के पास सफलता का मंत्र अवश्य होगा जिसे पाकर वह सफल व्यक्ति बन सकता है।
(iii) साधु ने सुन्दर को सफलता का मंत्र पाने के लिए एक मोटी पुस्तक देते हुए निर्देश दिया कि उस पुस्तक को पूरी की पूरी पढ़ना होगा। उसी के किसी पृष्ठ पर सफलता का मूल मंत्र लिखा है परंतु पुस्तक को आदि से लेकर अंत तक पढ़ना होगा।
(iv) सुन्दर जल्दी से जल्दी सफलता का मूल मंत्र पाना चाहता था। वह बेहद उत्सुक था। अतः उसने खाना-पीना, सोना आदि कम करके निरंतर पुस्तक पढ़ना जारी रखा। अंतिम पृष्ठ पर लिखा था कि सफलता का मंत्र ‘कवर’ पृष्ठ की जिल्द में छिपा है। वहीं पर लिखा था कि दृढ़ इच्छा के साथ दुनिया के किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त की जा सकती है।
(v) इस गद्यांश से हमें शिक्षा मिलती है कि हमें जीवन का लक्ष्य निर्धारित करके दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ कर्म करना चाहिए। यही सफलता का मूल मंत्र है।
Teacher's Note:
a) Reading comprehension answers must be precise, written in the student's own words while keeping the core meaning intact.
b) All sub-parts should be directly addressed referencing the provided passage details accurately.
प्रश्न 3.
(a) Correct the following sentences and rewrite: [5]
(i) ममता गाने की कसरत कर रही है।
(ii) पिछले कुछ वर्षों के बीच भारत की आबादी बढ़ी है।
(iii) अपने दुष्कर्मों के कारण वह आज कंगाल है।
(iv) चोर सोनाथ के घर पाँव दबाकर आया।
(v) स्वार्थी मित्र काम निकलते ही आँखें नीचे कर लेते हैं।
(b) Use the following idioms in sentences of your own to illustrate their meaning: [5]
(i) पापड़ बेलना।
(ii) कंधे से कंधा मिलाना।
(iii) पीठ दिखाना।
(iv) दाल में काला होना।
(v) फूला न समाना।
उत्तर:
(a)
(i) ममता गाने का अभ्यास कर रही है।
(ii) पिछले कुछ वर्षों में भारत की आबादी बढ़ी है।
(iii) अपने दुष्कर्मों के कारण वह आज कंगाल है।
(iv) चोर सोमनाथ के घर दबे पाँव आया।
(v) स्वार्थी मित्र काम निकलते ही आँखें फेर लेते हैं।
(b)
(i) गुलशन कुमार को फिल्म निर्देशक बनने के लिए न जाने कितने पापड़ बेलने पड़े।
(ii) आज की स्त्री पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है।
(iii) सच्चे शूरवीर कभी भी रणक्षेत्र में पीठ नहीं दिखाते।
(iv) लेखार ने फाइलें देखते ही घोषित कर दिया कि दाल में कुछ काला है।
(v) अपने पुत्र को इंजीनियर बनते देखकर निर्धन मजदूर फूला न समा रहा था।
Teacher's Note:
a) Sentence correction requires fixing grammatical errors, inappropriate verb usages, or spelling mistakes.
b) Idioms must be used in meaningful contexts so that their implied definitions are clearly illustrated.
Section-B - Prescribed Textbooks (50 Marks)
Answer four questions from this section on at least three of the prescribed textbooks.
Te Vieneta (Gadya Sanklan)
प्रश्न 4. “ये वे हाथ नहीं हो सकते, मैं मन में सोच रही थी, जो बच्चों को मीठी लोरी की थपकियाँ देकर सुलाते हैं, पति की कमीज में बटन टाँकते हैं या चिमटा-सनसी पकड़ते हैं।”
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस पाठ से ली गई हैं? इस पाठ की लेखिका कौन हैं? उन्हें कहाँ से गाड़ी पकड़नी थी? [1 1/2]
(ii) सफर में उस डिब्बे में कौन-कौन-सी महिलाएँ थीं? उनका परिचय अत्यंत संक्षेप में दीजिए। [3]
(iii) लेखिका ने उपयुक्त कथन किस संदर्भ में कहा है? [3]
(iv) उपयुक्त कथन जिस महिला के बारे में कहा गया है, वे कहाँ जा रही थीं और क्यों? उनका कौन-सा सामान उन्हें परेशान किए जा रहा था? [5]
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘सती’ शीर्षक कहानी में से ली गई हैं। इस कहानी की लेखिका शिवानी हैं। उन्हें प्रयाग स्टेशन से गाड़ी पकड़नी थी।
(ii) सफर में उस डिब्बे में लेखिका शिवानी के अतिरिक्त एक पंजाबी और एक मराठी स्त्री थी। गाड़ी चलने के समय उस डिब्बे में एक चौथी महिला ने प्रवेश किया जिसने स्वयं को मदालसा सिंघाड़िया के रूप में परिचित कराया। पंजाबी स्त्री विस्थापित महिलाओं के लिए बनाए गए एक महिला आश्रम की संचालिका थी और मराठी स्त्री किसी मेजर जनरल वनोलकर की पत्नी थीं।
(iii) लेखिका ने उपयुक्त कथन पंजाबी स्त्री के संदर्भ में कहा है। उसे लगा कि उस पंजाबी स्त्री का घरेलू काम-काज या रख-रखाव से कोई लेना-देना नहीं था। उसके चेहरे पर एक अजीब खालीपन था। उसके हाथों की बनावट मर्दाना और पकड़ मजबूत थी।
(iv) प्रस्तुत कथन पंजाबी महिला के विषय में कहा गया है। वह किसी मीटिंग में भाग लेने जा रही थी। उसके पास एक मोटी-सी फाइल थी जिसे वह बीच-बीच में खोलकर कुछ आँकड़ों को पहाड़ों की तरह रटने लगती थी। उसकी सलवार, कमीज, दुपट्टा यहाँ तक कि रुमाल भी खादी का था और शायद उसी के संघर्ष से उसकी लाल नाक का सिर और भी अबीबी लग रहा था। उसके चेहरे पर रोब था परंतु लावण्य नहीं। उसमें जीवन के उल्लास की एक-आध भी रेखा नहीं थी।
Teacher's Note:
a) Answers should accurately cite the text, author name, and contextual details as asked in the sub-parts.
b) Character descriptions from stories must reflect precise observations made by the author.
प्रश्न 5. रज्जब कौन था? उसका पेशा क्या था? वह अपने पेशे से मिले धन को लेकर कहाँ जा रहा था? क्या वह अपने गंतव्य स्थल पर पहुँच सका? यदि हाँ, तो कैसे? ‘शरणागत’ कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए। [12 1/2]
उत्तर:
‘शरणागत’ शीर्षक कहानी वृंदावन लाल वर्मा द्वारा लिखित एक सामाजिक कहानी है। इसका कथानक हमारे समाज के खोखले मानदंडों की समीक्षा करते हुए उच्च जीवन मूल्यों की स्थापना का प्रस्ताव करता है। इसमें दिखाया गया है कि कर्म या वंश आदि के नाम पर किसी भी सामाजिक को छुआछूत या ऊँचेनीच का शिकार बनाना मानवता के विरुद्ध अपराध है। सबसे बड़ा धर्म मानव-धर्म है जो हमें दया, ममता, त्याग सिखाता है। प्रस्तुत कहानी का कथानक रज्जब नामक एक कसाई पर आधारित है।
रज्जब एक कसाई था वह दो-तीन सौ रुपए की रकम लेकर अपनी बीमार पत्नी के साथ ललितपुर से लौट रहा था। रास्ता बीहड़ और सुनसान था इसलिए उसने मड़पुरा नामक गाँव में रात बिताने का निश्चय किया। वह जानता था कि गाँव में कोई एक कसाई को आश्रय नहीं देगा फिर भी उसने कई लोगों से रातभर के लिए स्थान देने की याचना की, पर सबने इंकार कर दिया।
इसी गाँव में एक गरीब ठाकुर रहता था गाँववाले उसे ‘राजा’ कहकर पुकारते थे। रज्जब उसी के द्वार पर पहुँचा और बोला कि मैं दूर से आ रहा हूँ बहुत थका हुआ हूँ मेरी पत्नी को बुखार है, जाड़े में बाहर रहने से न जाने क्या हालत हो जाएगी इसलिए रातभर रहने के लिए दो हाथ जगह देने की कृपा करें। ठाकुर ने जब उससे उसकी जाति पूछी, तो रज्जब का उत्तर सुनकर वह आग बबूला हो गया। रज्जब ने बहुत अनुनय-विनय की, तो ठाकुर साहब ने उसे रातभर के लिए रुकने के लिए जगह दे दी। पति-पत्नी के सो जाने के बाद कुछ लोगों ने ठाकुर को इशारे से बुलाया और बताया कि एक कसाई रुपए की मोट बाँधे इसी ओर आया है, उसे कल देखेंगे। ठाकुर ने कहा कि मैं कसाई का पैसा नहीं छुऊँगा।
सवेरा होने पर भी रज्जब न जा सका, क्योंकि उसकी पत्नी के शरीर में बहुत दर्द था तथा वह एक कदम भी नहीं चल सकती थी। ठाकुर ने कुपित होकर रज्जब को जाने के लिए कह दिया। रज्जब ने बहुत विनती की, मगर ठाकुर न माना। विवश होकर रज्जब गाँव के बाहर एक पेड़ के नीचे जा बैठा। उसने एक छोटी जाति के लोग को किराए की गाड़ी पर ललितपुर ले जाने के लिए राजी कर लिया। गाड़ी से यात्रा करते हुए जैसे ही अंधेरा होने लगा। कुछ लोग उन्हें लूटने के लिए बड़े-बड़े लठ लेकर आ जाते हैं। परंतु वही राजा ठाकुर बचाता है जिनके यहाँ उन्होंने रात्रि में शरण ली थी। वह स्पष्टतः कहता है-“बुंदेला शरणागत के साथ घात नहीं करता, उस बात को गाँठ बाँध लेना।”
इस प्रकार राजा ठाकुर एक शरणागत दंपति की रक्षा करके भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ साधनाओं को संजीवनी देने का दायित्व निभाता है। उसका यह साहस उसके मानवतावादी दृष्टिकोण का सूचक है। कहानीकार ने समाज के दृष्टिकोणों का संदर्भ देते हुए उच्च जाति की महत्ता को स्वीकार किया है, जिसे हम मानव-जाति कह सकते हैं। इसके ऊपर कोई जाति नहीं है।
Teacher's Note:
a) Broad essay-type answers on stories must cover the core plot, character arcs, and moral theme.
b) Ensure references to specific plot points like the character of Raja Thakur and the message of humanity are well highlighted.
प्रश्न 6. ‘क्या निराश हुआ जाए?’ निबन्ध में निबन्धकार का क्या उद्देश्य है? किन दो घटनाओं के द्वारा निबन्धकार ने यह बताने का प्रयास किया है कि मनुष्यता अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है? उन घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए। [12 1/2]
उत्तर:
‘क्या निराश हुआ जाए’ शीर्षक निबंध हिंदी के सुप्रसिद्ध चिंतक, इतिहासकार व निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित है। वे भारतीयता, भारतीय संस्कृति तथा श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा पर आधारित निबंधों में अपने मन-मस्तिष्क की बात पाठकों के सामने रखते हैं। इसीलिए उनके निबंधों में आत्मीयता का गुण सर्वत्र विद्यमान रहता है।
प्रस्तुत निबंध में आचार्य द्विवेदी ने आज के भारत और भारतवासियों की चिंतन-मनन शैली व आचारविचार का मूल्यांकन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भौतिकवाद के प्रहार से आज हमारे सामाजिकों में कई प्रकार के संक्रमण आ चुके हैं, जो देश और मानवता के विरुद्ध पड़ते हैं। आज जीवन के उदात्त मूल्यों के प्रति आस्था डगमगाती दिखाई देती है परंतु इससे निराश होने की बात नहीं है। उन्होंने तर्क दिया है कि सभी लोगों में, सब समय में निराशाजनक स्थितियाँ नहीं देखी जातीं।
आज की मानवता, सेवा-भावना, ईमानदारी, सच्चाई और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति आस्था बनी हुई है। अनुपात में अंतर अवश्य आने लगा है परंतु वे नष्ट नहीं हुए हैं। समय के फेर में आकर वे मूल्य थोड़े दब अवश्य गए हैं परंतु इससे निराश होने का कोई औचित्य नहीं है।
लेखक ने अपनी विचारधारा को पुष्ट करने के लिए अपने साथ जुड़ी बीती दो घटनाओं का वर्णन किया है। एक बार रेलवे स्टेशन पर टिकट लेते समय दस रुपए के नोट की बजाए सौ रुपए का नोट थमा देते हैं। थोड़ी देर बाद टिकट-खिड़की पर बैठा वह क्लर्क बाबू प्रत्येक व्यक्ति का चेहरा परखते-पहचाने हुए उनके पास आता है। वह अत्यंत विनम्रता से भूल के कारण अधिक दे दी गई धनराशि लौटा देता है।
दूसरी घटना एक बस-यात्रा की है। एक बार लेखक बस द्वारा यात्रा कर रहा था। उसके साथ उसकी पत्नी तथा बच्चे भी थे। कोई पाँच मील की यात्रा तय करने के बाद बस एक सुनसान जगह पर रुक गई। सभी यात्री घबरा उठे। कंडक्टर एक साइकिल लेकर चलता बना। लोगों को संदेह हुआ क्योंकि दो दिन पहले भी इसी स्थान पर एक बस लूटी गई थी। बच्चे पानी-पानी चिल्ला रहे थे। कुछ नवयुवकों ने ड्राइवर को पकड़कर पीटने की योजना बनाई ड्राइवर घबरा गया। लोगों ने उसे पकड़ लिया। उसने लेखक से आग्रह किया कि वह उसे बचाए। लेखक स्वयं भी भयभीत था, परंतु उसने किसी प्रकार ड्राइवर को मारपीट से बचा लिया।
लोगों ने ड्राइवर को मारा तो नहीं, पर बस से उतार कर एक जगह घेर कर रखा। उसी समय देखा कि एक खाली बस आ रही थी और उस पर हमारी बस का कंडक्टर सवार था। वह लेखक के बच्चों के लिए दूध और पानी भी लेकर आया था। यात्रियों ने ड्राइवर से क्षमा माँगी और आई हुई बस पर बैठकर बस अड्डे पर पहुँच गए।
लेखक ने विचार दिया है कि उनके जीवन में ऐसी असंख्य घटनाएँ घटी हैं जिनसे सिद्ध होता है कि लोगों में ईमान, सत्यनिष्ठा, परोपकार, दया, सहयोग आदि मूल्यों के प्रति अभी भी वैसी ही आस्था है जैसी हमारे इतिहास व परंपरा में पाई जाती थी। अतः निराश होने की आवश्यकता कदापि नहीं है।
Teacher's Note:
a) In answering questions on essays, students should explain the underlying authorial intent alongside narrative examples.
b) The two incidents from the essay must be precisely recounted to demonstrate the persistence of human values.
Kavya Manjari
प्रश्न 7. भीतर जो डर रहा छिपाए, हाय! वही बाहर आया। एक दिवस सुखिया के तन को ताप-तप्त मैंने पाया। ज्वर में विहवल हो बोली वह, क्या जानूँ किस डर-से-डर, मुझको देवी के प्रसाद का, एक फूल ही दो लाकर।
(i) ‘मैंने’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है? उसे किस बात का डर था?
(ii) सुखिया का स्वभाव कैसा था? उसके इस स्वभाव का क्या परिणाम निकला? उसने किससे, क्या इच्छा जाहिर की? [3]
(iii) क्या सुखिया की इच्छा पूरी हो सकी? कारण सहित लिखिए। [3]
(iv) इस कविता में कवि ने किस बुराई को किस प्रकार उजागर किया है?
उत्तर:
(i) ‘मैंने’ सर्वनाम का प्रयोग सुखिया के पिता के लिए हुआ है। वह सुखिया को बाहर जाकर खेलने से रोकता था क्योंकि बाहर महामारी फैली हुई थी। परंतु सुखिया कहाँ मानने वाली थी? अंततः वह भी महामारी से ग्रस्त हो गई। उसे ज्वर रहने लगा। अतः पिता का डर सच सिद्ध हुआ।
(ii) सुखिया बीमार होते हुए भी घर में एक पल के लिए न ठहरती थी। उसका पिता उसे बाहर खेलने से रोकता था परंतु वह पिता का कहना नहीं मानती थी। उसके इस स्वभाव का फल यह हुआ कि वह महामारी की चपेट में आ गई। उसका शरीर बुखार से तपपने लगा। उसने पिता से इच्छा व्यक्त की उसे देवी माँ के प्रसाद का एक फूल लाकर दिया जाए।
(iii) सुखिया की देवी माँ के प्रसाद का एक फूल पाने की इच्छा पूर्ण न हो सकी। वह उन दिनों की सामाजिक व्यवस्था में पाए जाने वाले जातिवाद के विध्वंसक व अमानवीय नीतियों का शिकार हो गई। सवर्णों ने उसके पिता को मंदिर परिसर में अमानवीय मार-पीट करके भगा दिया।
(iv) प्रस्तुत कविता में कवि ने धार्मिक अवधारणा की संकीर्णता पर व्यंग्य करते हुए जातिवाद को अमानवीय बताया है। छुआछूत एक भयंकर सामाजिक बुराई है। ईश्वर ने सभी मनुष्यों को एकसा बनाया है। एक परमपिता की संतानों में परस्पर भेदभाव तर्क से परे है। ईश्वर के समक्ष सभी समान हैं।
Teacher's Note:
a) Poetry comprehension requires clear referencing to stanzas and tracing character motivations or socio-critical themes.
b) Ensure answers accurately reflect the tragedy and social critique embedded in Siyaramsharan Guha's poetry.
प्रश्न 8. “बाल लीला” के आधार पर बताइए कि सूरदास जी ने श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का कैसा वर्णन किया है? श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम की शिकायत किससे करते हैं और क्या शिकायत करते हैं? [12]
उत्तर:
सूरदास भक्तिकालिन कृष्ण-काव्य धारा के महत्वपूर्ण कवि हैं। उन्होंने अपने काव्य में कृष्ण बाल-लीलाओं का अद्भुत वर्णन किया है। इस वर्णन में स्वाभाविकता और वात्सल्य रस का सुंदर योग मिलता है। सूरदास जी बालरूप कृष्ण की जिस झलक का वर्णन कर रहे हैं, उसमें उनके हाथ में मक्खन है। उनके मक्खन में सने हाथ अत्यंत सुंदर लग रहे हैं। वे घुटनों के बल चल रहे हैं जिसके कारण उनका शरीर धूल से सना है। कृष्ण को मक्खन और दही बहुत भाता है। अतः उनके मुँह पर दही लगी हुई है।
कृष्ण के स्वरूप की सुंदरता का वर्णन करते हुए कवि ने उनके सुंदर गालों तथा चंचल आँखों की चर्चा की है। उनके माथे पर गोरोचन का तिलक लगा है। बालों की लटें लटक रही हैं, जो मुख पर फैल रही हैं। ऐसा लगता है मानो मस्त भौरे गालों रूपी फूलों का मादक रस पी रहे हों। उनके गले में कटुला और शेर का नाखून अत्यंत शोभा दे रहा है। सूरदास जी कहते हैं कि श्री कृष्ण के बाल रूप का एक पल के लिए दर्शन करके सुख प्राप्त करना सैकड़ों युगों के सुख से भी अधिक श्रेष्ठ तथा मनोहर है।
जब कृष्ण थोड़े बड़े हो जाते हैं तो वे बोलना सीख जाते हैं। यशोदा को वे मैया, नंद को बाबा और बलराम को भैया कहने लगें हैं। वे चलने लगे हैं जिसके कारण माता उन्हें खेलते-खेलते दूर तक जाने से रोकती है। उसे भय है कि कोई गाय उनके बच्चे को कोई हानि न पहुँचा दे। ब्रज की गोपियाँ और गोपालों के बच्चे आश्चर्य तथा उत्सुकता से वात्सल्य रस का यह दृश्य देखते हैं। प्रत्येक घर में इस बात की बधाइयाँ दी जा रही हैं। सूरदास भी कृष्ण के इस बालरूप पर न्योछावर हो रहे हैं।
समवयस्क बच्चे प्रायः खेलते-खेलते लड़ पड़ते हैं और एक-दूसरे को चिढ़ाने लगते हैं। इसी का मार्मिक और हृदयस्पर्शी वर्णन करते हुए कवि ने कृष्ण द्वारा बलराम भैया की शिकायत करने का दृश्य उपस्थित किया है।
बलराम कहता है कि कृष्ण यशोदा का पुत्र नहीं अपितु उसे वे लोग कहीं से खरीद कर लाए हैं। वह बार-बार उनके वास्तविक माता-पिता के नाम पूछता है।
बलराम तर्क देकर पूछता है कि नंद और यशोदा तो दोनों गोरे रंग के हैं, फिर उनके यहाँ तुझ जैसा साँवला कैसे हो सकता है? बलराम के इस तर्क पर सभी ग्वालों के बच्चे चुटकी बजा-बजाकर उपहास उड़ाते हैं और बलराम उन्हें बढ़ावा देता है। कृष्ण अब अपनी माँ पर भी संदेह व्यक्त करते हैं क्योंकि वह बलराम को कभी कुछ नहीं कहती उल्टे उसे डाँटती रहती है। ये बातें सुनकर यशोदा मैया मन ही मन प्रसन्न हो रही है। वह उन्हें समझाने के लिए कहती हैं कि बलराम तो जन्म से अत्यंत धूर्त है। अर्थात् उसकी इन बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। वह उन्हें विश्वास दिलाने के लिए गोधन की शपथ लेकर कहती है कि वही उसकी माता है और वह उन्हीं का अपना पुत्र है।
इस प्रकार सूरदास ने श्रीकृष्ण के बालरूप और वात्सल्य रस का सुंदर, मनोहर और स्वाभाविक चित्रण किया है। उनका यह चित्रण बालमनोविज्ञान के अनुसार चित्रित हुआ है जो आज तक अद्वितीय माना जाता है।
Teacher's Note:
a) Answers on classical poetry must elaborate upon the poetic elements, imagery, and emotional nuances (vatsalya ras).
b) Clearly distinguish between the description of child Krishna's appearance and the specific episode of complaint against Balaram.
प्रश्न 9. ‘प्रकृति भाग्य-बल से नहीं, भुजल से झुकती है।’ -‘उद्यमी नर’ कविता के आधार पर सिद्ध कीजिए। [12 1/2]
उत्तर:
कवि रामधारी सिंह दिनकर ने ‘उद्यमी नर’ शीर्षक कविता में इस तथ्य को उजागर व स्थापित किया है कि ‘प्रकृति भाग्य-बल से नहीं, भुजबलों से झुकती है। प्रस्तुत कविता की मूल चेतना व स्वर प्रगतिवादी है। इसमें कवि ने भाग्यवादी के सिद्धांत की आलोचना करते हुए पुरुषार्थ या परिश्रम के महत्त्व को स्थापित किया है।
प्रगतिवादी विचारधारा का प्रथम सोपान नियतिवादी दृष्टिकोण का विरोध है। नियतिवादी अर्थात् भाग्य को दोष देने वाला व्यक्ति सदैव पिछड़ता रहेगा। जिस व्यक्ति को अपने श्रम और भुजाओं की शक्ति पर भरोसा नहीं, वह उन्नति के मार्ग पर कभी आगे नहीं बढ़ सकेगा। कवि ने विचार किया है कि ईश्वर ने सभी प्रकार के तत्त्वों को आवरण में या धरती के गर्भ में छिपा कर रखा हुआ है। उन्हें केवल उद्यमी नर निकाल पाता है-
छिपा दिए सब तत्व आवरण के नीचे ईश्वर ने,
संघर्षों से खोज निकाला उन्हें उद्यमी नर ने।
कवि दिनकर ने उस सिद्धांत की खुलकर निंदा की है जिसमें लोग ब्रह्मा या विधाता से लिखाकर आने की धारणा का समर्थन करते हैं। उनको विचार है कि मनुष्य ब्रह्मा से कुछ भी लिखाकर नहीं लाता। उसने अपना प्रकार का सुख केवल अपनी भुजाओं के बल पर पाया है। कवि के शब्दों में-
“ब्रह्मा से कुछ लिखा
भाग्य में मनुज नहीं लाया है,
अपना सुख उसने अपने
भुजबलों से ही पाया है।”
कवि ने पूँजीवादी व्यवस्था के सबसे बड़े अस्त्र के रूप में इसी भाग्यवादि को माना है। ये ऊँचे लोग भाग्यवादि की ओट लेकर पाप कमाते हैं। यह शोषण का अचूक अस्त्र है। इसी के द्वारा एक मनुष्य दूसरे मनुष्य का भाग या अधिकार दबा लेता है। कवि इन भाग्यवादि के समर्थकों से प्रश्न करता है कि यदि विधि का लिखा हुआ इतना शक्तिशाली और अमिट है तो यह बताओं कि पृथ्वी अपने सारे रत्न स्वयं ही तुम्हारे सामने निकालकर क्यों नहीं डाल देती।
कवि ने मनुष्य के परिश्रम की प्रतिष्ठा को सबसे ऊपर स्थान दिया है। वह प्रकृति के वैभव को जल से सींच-सींच कर पैदा करता है। यदि भाग्य इतना प्रबल होता तो भाग्य का धनी व्यक्ति अपने संचित कोष को भाग्य के सहारे ही क्यों, नहीं उठा लाता? कवि के शब्दों में-
“उपजाता क्यों विभव प्रकृति को
सींच-सींच वह जल से?
क्यों न लेता निज संचित
कोष भाग्य के बल से?”
कवि कहता है कि मनुष्य का यदि कुछ भाग्य है, तो वह है-भुजाओं की शक्ति। भुजाओं की इसी शक्ति के सम्मुख पृथ्वी और आकाश झुकते हैं। कवि कहता है कि जिसने भी परिश्रम किया है उसे पीछे मत रहने दो. उसे उसके परिश्रम का सुख भोगने दो। भाव यह है कि परिश्रमशील व्यक्ति को उसके परिश्रम का पूरा लाभ मिलना चाहिए।
इस प्रकार कवि ने इस उद्बोधन गीत में मनुष्य को पुरुषार्थ के महत्त्व को पहचानने के लिए कहा है। वास्तव में यह एक उद्बोधन गीत के साथ-साथ प्रेरणा-गीत भी है। इसमें कवि ने प्रगतिवादी विचार देते हुए शोषण के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त किया है। दूसरी ओर कवि मनुष्य को शोषित होने से बचने का भी संकेत देता है। यह तभी संभव है, जब वह अपने पुरुषार्थ और भुजाओं की शक्ति को पहचान कर इनका अनुकूल उपयोग करेगा।
Teacher's Note:
a) Answers based on progressive poetry (Pragatisheel Kavya) should highlight the critique of fatalism and the glorification of human labor.
b) Quoting lines from the poem adds authenticity and depth to the analytical answer.
Saara Akash
प्रश्न 10. “मुझे पता होता तो मैं कभी भी नहीं करती। मैंने समझा कि कोई सादा मिट्टी का ढेला है।”
(i) प्रस्तुत पंक्तियों के वक्ता और श्रोता कौन-कौन हैं? उनके बीच किस विषय पर चर्चा हो रही है? [1]
(ii) वक्ता की बात सुनकर श्रोता ने गुस्से में क्या-क्या कहा? [3]
(iii) उक्त घटना के सन्दर्भ में समर की क्या प्रतिक्रिया थी? [3]
(iv) समर की आत्मग्लानि का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पंक्तियों की वक्ता राजेंद्र यादव द्वारा रचित उपन्यास ‘सारा आकाश’ की नायिका प्रभा है। श्रोता उसका पति समर है।
(ii) जब वक्ता प्रभा ने बताया कि उसने पूजा में रखे गणेश को साधारण मिट्टी का ढेला समझकर उससे बर्तन माँज दिए, तो समर की भाभी ने बहुत ही हल्ला मचाया। वह सोचती है कि अब पूजा के अपमान पर कुछ अनिष्ट अवश्य होगा। इस पर समर ने प्रभा के चाँटा जड़ दिया।
(iii) चाँटा जड़ने के बाद समर को पश्चात्ताप होने लगता है। उसको दुःख था कि वह सात-आठ महीने से प्रभा के साथ बोल नहीं रहा था। इस लम्बे ‘अबोले’ के बाद वह पहली बार बोला, तो गाली और तमाचे के साथ।
(iv) समर का अपनी पत्नी से ‘अबोली’ चल रहा था। गणेश की मूर्ति से बर्तन माँजने के प्रसंग ने उसे इतना उत्तेजित व क्रुद्ध कर दिया कि प्रभा को तमाचा जड़ दिया और गाली भी दी। यहीं से समर की आत्मग्लानि का प्रकरण प्रारम्भ होता है। वह देर तक उस गाली व चाँटे के व्यवहार पर पश्चात्ताप करता रहा। उसे लगा कि औरत पर हाथ उठाना कतई ठीक नहीं था। यहीं से उसका हृदय-परिवर्तन शुरू होता है।
Teacher's Note:
a) Novel-based extracts require identifying the characters, immediate context, and the psychological impact on the protagonist.
b) Focus on how Samer's internal guilt acts as a turning point in his relationship with Prabha.
प्रश्न 11. प्रभा के परदा न करने से परिवार में क्या प्रतिक्रिया हुई, उसका परदा न करना कहाँ तक उचित था, स्पष्ट कीजिए। [12 1/2]
उत्तर:
प्रभा राजेंद्र यादव द्वारा रचित सामाजिक व पारिवारिक उपन्यास ‘सारा आकाश’ की नायिका है। उसका चरित्र एक गरिमामयी, घरेलू सुघड़ शिक्षिता व सुसंस्कृत नारी के रूप में दिखाया गया है। जिस काल का यह उपन्यास है। उस समाज में प्रभा का मैट्रिक पास होना एक विशेष उपलब्धि रखता है।
शिक्षिता होने के कारण प्रभा का थोथे मापदंडों और प्राणहीन रूढ़ियों या प्रथाओं में विश्वास नहीं है। वह ‘परदा प्रथा’ को भी इस प्रकार की एक थोथी प्रथा के रूप में देखती है। इसीलिए वह जब ससुराल आती है तो परदे की प्रथा को स्वीकार नहीं करती। परंतु उसके ससुर और समर के बाबूजी की विचारधारा रूढ़िवादि है। वे परंपरा से चली आ रही गली-सड़ी मान्यताओं को ओढ़े हुए हैं। उनके विचार उस काल का समाज की अंधी परंपराओं से मेल खाते हैं। इसमें एक विचार यह भी है कि युवा होते ही अपनी संतान का हर हाल में विवाह कर देना सबसे बड़ा पुण्य है। इसी सोच के कारण वे मुन्नी की पढ़ाई बीच में ही छुड़वाकर उसका विवाह कर देते हैं। समर भी उनकी इसी सोच का शिकार होता है। उसे छात्रावस्था में ही विवाह के कठिन बंधन में बाँध दिया जाता है.
बाबूजी पर्दे की प्रथा जैसी प्राणहीन रूढ़ियों का समर्थन करते हैं। इसीलिए अपनी बहू प्रभा को यदा-कदा इस बात को लेकर डाँटते रहते हैं कि वह चूँघट नहीं निकालती। उनके विचार देखिए-
“फिर बेटी और बहू में फर्क ही क्या रह गया? बेटी भी मुँह खोले बाल बिखरे घूमती है और बहू को भी चिंता नहीं है कि पल्ला किधर जा रहा है।” वे प्रभा को छत पर दाल बीनने के लिए जाने से भी मना करते हैं।
पर्दे की प्रथा प्रभा के घर में बवाल मचा देती है। बाबूजी किसी न किसी बात पर बहुराणी प्रभा को परदे में रहने के लिए कोंचते रहते हैं। एक स्थल देखिए
“अरे, इससे परदा नहीं करती तो मत करो। छाती पर पत्थर रखे उसे भी सह लेंगे, लेकिन बेशर्मी की ऐसी हद तो मत करो। ऊपर जाकर सिर धोते समय तुम्हें दिखा नहीं कि लोग क्या कहेंगे? जाड़ों में धूप सेंकने के बहाने सभी तो ऊपर छतों पर चले जाते हैं। इधर-उधर ताक-झाँक करने में उनके बाप का क्या जाता है। यह मुन्नी भी इतनी बड़ी हो गई, इसे नहीं सूझा? बैठी-बैठी सिर पर पानी डाल रही थी………….” दूसरी ओर उनकी अपनी पुत्री मुन्नी विरोध पर उतर आती है। वह भी प्रभा की इस बात का समर्थन करती है कि घर में परदे की प्रथा का क्या काम? वह पिता का विरोध करती है और प्रभा भाभी के छत पर जाने, बाल धोने और सुखाने की आदत का समर्थन करती है। वह पिता से कहती है-
“बाबूजी तुम भी अनोखी बातें करते हो अब ऐसी तो ठंड है। तुमने तो राम-राम करके उल्टा सीधा पानी दो लोटे डाला, और नहाने का काम करके चल दिए, पर हम लोगों का सिर कोई ऐसे धुलता है? दो घंटे लगते हैं। तब तक नीचे ऐसे जाड़े में कोई कैसे भीगे? हाथ में पानी लो, तो काटने को दौड़ता है। ऊपर छत पर धूप थी, अगर चली ही गई तो क्या ऐसी आफत आ गई?”
प्रभा का परदा न करना सर्वथा उचित था। वास्तव में यह समाज पुरातपंथी सोच को छोड़ना नहीं चाहता। अनेक प्रथाएँ ऐसी हैं, जो सर्वथा निंदनीय व अर्थहीन हैं। पर्दे की प्रथा भी ऐसी ही एक प्रथा थी जो समाज में स्त्रियों पर बलपूर्वक लादी जाती थी। शिक्षित व सभ्य समाज में इस प्रकार के परदे की कोई आवश्यकता नहीं आज स्त्री समाज में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। ऐसे आधुनिक समाज में उक्त प्राणहीन प्रथाओं के लिए कोई भी स्थान नहीं है।
Teacher's Note:
a) Character-driven thematic questions should explore social conventions versus individual liberation.
b) Discuss Prabha's progressive stance against conservative family structures with apt textual references.
प्रश्न 12. ‘सारा आकाश’ उपन्यास के प्रमुख पात्र ‘समर’ का चरित्र-चित्रण कीजिए। [12]
उत्तर:
समर राजेंद्र यादव कृत उपन्यास ‘सारा आकाश’ का नायक है। उसके चरित्र में निम्नलिखित गुण पाए जाते
1. विवाहित छात्र- समर एक विवाहित छात्र है। वह अभी इंटर में पढ़ रहा है। परंतु उसका प्रभा से विवाह हो जाता है। जिस काल की कथावस्तु इस उपन्यास में है, उस काल में विवाह ही प्रत्येक माता-पिता का चरम उद्देश्य हुआ करता था। वे अपने बच्चों का प्रायःछात्रावस्था में ही विवाह कर देते थे। समर की विवाह के संबंध में सहमति नहीं थी परंतु वह अपने माता-पिता की इच्छा का विरोध भी नहीं कर पाता। वह विवाह के संबंध में सोचता है
“इस समय तो ऐसा लगता है कि जैसे एक तेज बहाव है जो मुझे अपने साथ बहाए लिए जा रहा है। जाने कहाँ ले जाकर छोड़ेगा? लेकिन अब इस मर्तमाया का क्या करूँ? बीच में आए इस मायाजाल और मोहिनी में अपने को फँस जाने दूँ या इस झाड़ी से कतराकर निकल जाऊँ? जहाँ तक हो सकेगा मैं इसमें उलझूँगा नहीं, यह मेरा निश्चय है। हे भगवान, इस परीक्षा के समय मेरी आत्मा को बल देना, मुझे दृढ़ता देना कि मैं झुक न जाऊँ…..कहीं मैं हार न जाऊँ।’?
2. अहंवादी- उपन्यासकार ने समर को एक अहंवादी पति के रूप में चित्रित किया है। वह प्रभा को न जाने क्यों एक निर्जीव वस्तु समझता है। उसके सामने आते ही उसका अहं उसे झिझोरने लगता है और वह परंपरागत पुरुष की तरह अपने वर्चस्व के विषय में सोचने लगता है। सुहागरात के क्षणों में भी उसका पत्नी से न बोलना इसी अहं का परिचायक है। वह सोचता है-“मुझे तो आज एक बहुत बड़ा निश्चय करना है-परीक्षा का सबसे कठिन पेपर है। आज अगर फिसल गया तो संसार की कोई शक्ति मेरा उद्धार नहीं कर सकती और अगर आज ही निकल गया तो एक साथ सारे सिरदर्द से पीछा छूट जाएगा।” सुहागरात के अबोले से शुरू हुआ उसका अहं निरंतर चलता रहता है।
इस बीच प्रभा अपने मायके भी छह महीने तक रह आती है परंतु वह उसे लेने नहीं जाता। अंततः छोटे भाई को भेजा जाता है। समर का अंह इतना बड़ा तथा अकारण हिंसक हो जाता है कि वह प्रभा को किसी भी दशा में अपना जीवन-साथी मानने के लिए तैयार नहीं होता। वह सोचता है कि उसकी स्थिति सबसे अलग है”मेरा रास्ता हजारों लाखों लड़कों का रास्ता नहीं है। ऊपर से देखने में मैं चाहे जैसा लगूं, मैं उनसे हर हालत में भिन्न हूँ। मेरा भविष्य मेरे हाथों में है। मैं हर क्षण तलवार की धार पर चलता हूँ। बस जरासा अपने को साध लूँ। डगमगाऊँ नहीं। मैंने हर समय अपने को इन लोगों से कितना ऊँचा उठा हुआ पाया है।
वह इतना अहंवादी है कि प्रभा को अपनी दासी से भी कम महत्त्व देता है। यह प्रवृत्ति उसे एक अहंकारी पति सिद्ध करती है। दाल में नमक अधिक होने के प्रसंग में भी वह ऐसा ही व्यवहार करता है। वास्तव में उसे शिक्षा ही ऐसी मिली थी कि पत्नी को दबाकर रखा जाए। वह सोचता है कि प्रभा उसके पैरों में पड़ी रहे
मैं तो सोचता था कि वह मेरे पाँवों पर झुक जाएगी तो मैं उसके दोनों कंधे पकड़ कर उठा लूँगा। यही तमीज और अदब सिखाया है घर वालों ने? उस वक्त तो बड़े गर्व से कहा था कि लड़की मैट्रिक तक पढ़ी है।”
3. व्यवहारिक न होना - समर व्यवहार कुशल व्यक्ति नहीं है। उसमें अनुभव की बहुत कमी है। वह संबंधों में तालमेल बिठा पाना नहीं जानता। उसे परिवार में समरसता स्थापित करना नहीं आता। वह संयुक्त परिवार में रहता है। घर में अम्मा तथा बाबूजी है। बड़े भाई तथा भाभी हैं। पत्नी प्रभा के अतिरिक्त दुखद दंपत्य की प्रतीक बहन मुन्नी है। दो छोटे भाई भी हैं। इन सबमें व्यवहारिकता अपनाकर चलना आवश्यक था। परंतु वह इस दृष्टि से पूरे पूर्वार्ध में अयोग्य सिद्ध होता है। इसीलिए भाभी के बहकावे में आता रहता है और पत्नी प्रभा से दूर होता जाता है।
समर एक बार व्यवहार कुशल होने की बात सोचता भी है-
“हाँ मैं उससे कहूँगा, देखिए हम लोग काफी समझदार हैं। माँ-बाप जैसे भी हैं या जो भी कर सकते हैं, उन्होंने कर दिया, लेकिन अपना आगा-पीछा तो हमें ही देखना है। सबसे पहले तो हमें अपनी शिक्षा पूरी करनी होगी।”
परंतु प्रभा के सामने आते ही उसका दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। गणेश की मूर्ति से बर्तन माँजने के प्रसंग में तो वह थोड़ा-सा भी अनुभव नहीं दिखाता और भड़क उठता है। प्रभा कहती है कि उससे अज्ञानवश यह सब हो गया है। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई पशुपि पर उतर आए। समर उसके मुँह पर अचानक ही इतनी जोर से चाँटा मारता है कि पाँचों उंगलियाँ उभर कर छप जाती हैं। यही नहीं वह उसको गाली भी देता है कि “हरामजादी, यहाँ रहना है तो ढंग से रहो तथा बड़ी नास्तिक की बच्ची बनती है।” यह सत्य है कि समर को बाद में यह सोचकर बड़ा पश्चाताप होता है कि उसको प्रभा के साथ इस प्रकार पेश नहीं आना चाहिए था, किंतु उसके इस अव्यवहारिक क्रोध से प्रभा पर पाशविक प्रहार तो हो ही चुका था।
4. संयुक्त परिवार की घुटन का शिकार - समर संयुक्त परिवार की घुटन का शिकार युवक है। उसे डर डर कर जीना पड़ता है। अम्मा के कटाक्ष, बाबूजी का आतंक, भाभी के व्यंग्य-बाण-सब उसे दबाते रहते हैं। वह पिता से फीस के 25 रु० माँगने पर इतना अपमान सहता है कि उसे आत्मग्लानि हो उठती है। अम्मा तब तक तो ठीक थी, जब तक वह प्रभा के प्रतिकूल था परंतु स्थिति बदलते हुए वह भी समर की शत्रु हो जाती है। उसके कटाक्ष दूर-दूर तक मार करते हैं।
बाबूजी के सामने उसका इतिहास देखिए – “बाबूजी के सामने पड़ने से मैं हमेशा ही डरता रहा हूँ। यों इधर तीन-चार साल से उन्होंने हाथ नहीं उठाया, लेकिन शरीर पर पड़ी हुई पुरानी नीलें अभी भी ताजी हो आती हैं। और ये यादें ही जैसे उनके आतंक को दिन-दूना रात चौगुना बढ़ाया करती हैं। किस समय वे क्या बैठेंगे, कोई ठिकाना नहीं; जिन दिनों वे मुझे मारते थे उन दिनों तो एक अल्हड़ और जिद्दी निश्चिन्तता रहती थी कि ज्यादा-से-ज्यादा पीट ही तो देंगे।
समर की भाभी संयुक्त परिवार का एक सशक्त स्तंभ है। वह उस पर अलग-से दबदबा बनाए हुए हैं। वह उसे सहज नहीं होने देती। निरंतर प्रभा के विरुद्ध भड़काना उसकी आदत बन चुकी है –
“लो, सुनो लालाजी की बातें ! मैं क्या उसके पेट में घुस के देख आई, सुनी-सुनाई बात मैंने कह दी।” फिर गहरी साँस ली, “ओफ्फो, हद है घमंड की भी! आने-जाने के नाम खाक-धूल नहीं और घमंड ऐसा! कसम से कहती हूँ, मैं तो इतनी बड़ी हो गई, ऐसी घमंडी औरत अपनी जिंदगी में नहीं देखी। बोलो, गुन-तरतब हों तो नखरे भी सह जाएँगे, कोरे नखरे कौन उठाएगा? असल में उन्होंने लेना चाहा पढ़ाई और खूबसूरती के रोब में, सो ऐसी राजा इंदर की परी भी नहीं लगी।”
5. आत्मविश्लेषण - समर का चरित्र उपन्यास के दो अलग-अलग भागों में अलग-अलग प्रकृति का है। पहले भाग में वह एक उदंड और क्रोधी व अहंवादी पुरुष दिखाई देता है परंतु उत्तराधम में आत्मविश्लेषण के कारण परिवर्तित प्रतीत होता है। वह प्रभा के साथ किए गए व्यवहार की समीक्षा करता है। उपन्यासकार के शब्दों में – “आज अदालत में खड़ा करके कोई मुझसे पूछे कि सुहागरात के दिन तुम अपनी पत्नी से क्यों नहीं बोले थे? क्या केवल इसलिए कि वह तुम्हें देखते ही गठरी बनकर नहीं बैठ गई थी और यों ही खड़ी रही थी? या सिर्फ इसलिए कि तुम्हारी महत्त्वाकांक्षाएँ बहुत ऊँची थीं, और तुम नारी को उनमें बाधक मानते थे कि वह तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कर दिया गया था? ……… छि: यह भी कोई ठोस कारण है, न बोलने का?”
6. संघर्षशील - उपन्यास में समर को संघर्षशील दिखाया गया है। वह भारतीय संस्कृति में विश्वास रखने वाला युवक है और कम को ही धर्म मानता है। पारिवारिक दायित्व का स्मरण आते ही उसमें परिवर्तन आने लगता है। इसीलिए नौकरी के लिए हाथ-पैर मारने लगता है। उसे प्रभा के प्रति अपने उत्तरदायित्व का भी अहसास होता है इसीलिए नौकरी लगते ही सबसे पहला ध्यान प्रभा की तार-तार हुई धोती पर जाता है। वह दिवाकर से 20 रु० उधार लेकर उसके लिए नई धोती लाता है।
7. संवेदनशील - समर एक संवेदनशील युवक है। मुन्नी के प्रसंग में उसका आक्रोश इसी संवेदनशीलता का प्रतीक है। प्रेस में अधिक रुपयों पर हस्ताक्षर करवाने और कम रुपए देने का मामला भी संवेदनशीलता का है। प्रभा के प्रति उसका बदलता व्यवहार भी उसके मन में भरे करुणा के सागर की ओर संकेत करता है।
इस प्रकार उपन्यासकार ने उपन्यास के दो भागों में समर को दो अलग प्रकार के व्यक्तित्व का स्वामी बताया है। उत्तरदायित्व समझ में आ जाने पर उसमें व्यवहारिकता भी आ जाती है.
Teacher's Note:
a) Character sketches must comprehensively evaluate the evolution of the protagonist throughout the narrative.
b) Highlight Samer's transition from an egoistic, maladjusted youth to a responsible, sensitive husband.
Aashadh Ka Ek Din
प्रश्न 13. तुम जिसे भावना कहती हो वह केवल छलना और आत्म-प्रवंचना है। … भावना में भावना का वरण किया है! …… मैं पूछती हूँ भावना में भावना का वरण क्या होता है?
(i) उक्त कथन नाटक के किस अंक से लिया गया है तथा उक्त कथन किसने, किससे कहा है? [17]
(ii) उक्त कथन किस सन्दर्भ में कहा गया है? स्पष्ट कीजिए।
(iii) उक्त कथन के माध्यम से वक्ता श्रोता को क्या समझाना चाहती है?
(iv) वक्ता की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
(i) उक्त संवाद मोहन राकेश कृत नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ के प्रथम अंक से लिया गया है। प्रस्तुत कथन अंबिका अपनी पुत्री मल्लिका से कहती है।
(ii) उक्त कथन मल्लिका और कालिदास के प्रेम-प्रसंग को आधार बनाकर कहा गया है। मल्लिका कालिदास से भावना के स्तर पर बँधे होने की बात करती है। वह कहती है कि उसने भावना में एक भावना का वरण किया है। उसके लिए वह संबंध अन्य सभी संबंधों से बड़ा है।
(iii) उक्त संवाद द्वारा अंबिका अपनी पुत्री मल्लिका को समझाना चाहती है कि कालिदास के लिए उसकी यह भावना एक प्रवंचना है। वह अपने अनुभव द्वारा पुत्री को लोक-व्यवहार समझाना चाहती है। वह कहना चाहती है कि इस प्रकार की भावनाएँ जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पातीं।
(iv) वक्ता अंबिका एक ममतामयी माँ है। उसकी दृष्टि व्यावहारिक है। उसका सामाजिक मानदंडों और परंपराओं के प्रति मोह है। उसकी दूरदृष्टि और अनुभव नाटक में सत्य प्रमाणित होता है। वह मनोविज्ञान जानती है। वह वत्सल भावना व लोकाचार से प्रेरित होकर पुत्री को कालिदास के प्रति अंध-प्रेम से रोकना चाहती है। परंतु इतने कष्टों से पाली गई मल्लिका उसकी सीख को उपेक्षित कर देती है और असीम कष्ट भोगती है।
Teacher's Note:
a) Dialogue-based questions require identifying speaker, listener, and the underlying dramatic conflict.
b) Emphasize Ambika's practical worldview versus Mallika's idealistic emotional attachment.
प्रश्न 14. ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक के आधार पर कालिदास का चरित्र-चित्रण कीजिए [12 1/2]
उत्तर:
कालिदास मोहन राकेश द्वारा रचित प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ का नायक है। उसको नाटककार ने निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा मंडित करके प्रस्तुत किया है-
1. द्वंद्वग्रस्त कवि- कालिदास एक कवि है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषता उसका अंतर्द्वंद्व है। सबसे पहला अंतर्द्वंद्व मल्लिका के रूप में प्राप्त होता है। वह स्वयं सर्वहारा व अभावग्रस्त है। अपनी प्रेमिका मल्लिका के साथ घर बसाना चाहता है परंतु विपन्नता रास्ते में आ जाती है और उसके द्वंद्व सामने आ खड़ा होता है।
दूसरा द्वंद्व उज्जynyी जाकर कवि बनने या न बनने का है।
उज्जयनी से निमंत्रण आने पर यह द्वंद्व और अधिक मुखरित हो उठता है। वह भाग कर जगदंबा के मंदिर में जा छिपता है। वह सोचता है क्या वह मल्लिका से ग्राम प्रांतर से, अपी जन्म-भूमि से दूर चला जाए। क्या इससे उसकी प्रेरणा तो न छिन जाएगी? क्या वह यहाँ जाकर साहित्य सर्जना कर सकेगा?’नई भूमि सुखा भी तो दे सकती है?-और उस जीवन की अपनी अपेक्षाएँ भी होंगी। फिर भी कई-कई आशंकाएँ उठती हैं। मुझे हृदय में उत्साह का अनुभव नहीं होता…..’
इसी द्वंद्व के कारण वह काश्मीर जाता हुआ मल्लिका से मिलने नहीं आता। मिलने आता तो फिर क्या वह लौट पाता? संभवतः नहीं? अपनी स्थिति का स्पष्टीकरण करता हुआ वह कहता है-“मैं तब तुम से मिलने के लिए नहीं आया, क्योंकि भय था तुम्हारी आँखें मेरे अस्थिर मन को और अस्थिर कर देंगी। मैं उन से बचना चाहता था।’?
2. करुण हृदय- कालिदास के व्यक्तित्व में करुणा, कोमलतता और सहृदयता है। यही कारण है कि नाटक के प्रारंभ में हम उसे हिरण के बच्चे के प्रति करुणा से भरा हुआ पाते हैं। वह घायल हिरण के बच्चे को गोद में लिए मल्लिका के घर में आता है। वह कहता है-“न जाने इसके रूई जैसे कोमल शरीर पर उससे बाण छोड़ते बना कैसे?” फिर हिरण-शावक से बातें करता हुआ कहता है-“हम जिएँगे हिरण शावक। जिएंगे न! एक बाण से आहत होकर हम प्राण नहीं देंगे। हमारा शरीर कोमल है तो क्या हुआ? हम पीड़ा सह सकते हैं………….” कालिदास हिरण-शावक और स्वयं में कुछ अंतर नहीं समझते ……….” हम सोएँगे? हाँ, हम थोड़ी देर सो लेंगे तो हमारी पीड़ा दूर हो जाएगी।”
कालिदास के भीतर छिपी करुणा व कोलता को मल्लिका भी अच्छी तरह जानती है। इसलिए जब मातु ल कालिदास के पीछे तलवार पर हाथ रखकर जाने को कहता है, तो उससे कहती है “ठहरो राजपुरुष! हिरण-शावक के लिए हठ-मत करो। आपके लिए प्रश्न अधिकार का है, उनके लिए संवेदना का। कालिदास निःशस्त्र होते हुए भी आपके शस्त्र की चिंता नहीं करेंगे।”
3. प्रेम-भावना- नाटककार ने कालिदास को एक प्रगाढ़ प्रेमी के रूप में दिखाया है। उसके हृदय में मल्लिका के लिए असीम व एकनिष्ठ प्रेम है। प्रेमपाश में बंधा होने के कारण ही वह उज्जयनी नहीं जाना चाहता। मल्लिका उसे प्रेरित करके भेज तो देती है परंतु वहाँ जाकर भी वह ग्राम-प्रांतर में ही विचरन करने की कल्पना और मल्लिका की स्मृतियों में खोया रहता है। प्रियंगुमंजरी इस प्रेम की प्रगाढ़ता की गवाही देते हुए कहती है कि कालिदास ‘मेघदूत’ लिखते हुए उसे ही स्मरण किया करते थे। स्वयं कालिदास कहता है-“एक आकर्षण सदा मुझे इस सूत्र की ओर खींचता था जिसे तोड़ कर मैं यहाँ से गया था। यहाँ की एक-एक वस्तु में जो आत्मीयता थी वह यहाँ से जाकर मुझे कहीं कहीं नहीं मिली ………. और तुम्हारी आँखें। जाने के दिन तुम्हारी आँखों का जो रूप देखा था वह आज तक मेरी स्मृति में अंकित है।”
कालिदास ने जो भी लिखा, मल्लिका के प्रेम को सामने रख कर ही लिखा “……….. मैंने जब-जब लिखने का प्रयत्न किया तुम्हारे और अपने जीवन के इतिहास को फिर-फिर दोहराया।”
4. राजकवि- कालिदास एक श्रेष्ठ कवि है परंतु उसे राजकवि बनने का अवसर दिया जाता है तो वह दुविधा में पड़ जाता है। उज्जयनी में राजकवि के रूप में भी उसका जीवन बंध में रहता है। उसकी कवि-प्रतिभा का सहज और स्वाभाविक रूप दब जाता है। नाटककार बताना चाहता है कि इस प्रकार के राज्याश्रय में प्रायः साहित्यकारों की सहज प्रतिभा कुंठित हो जाती है।
5. प्रकृति-प्रेम- कालिदास मूलतः एक कवि रूप में चित्रित हुआ है। वह प्राकृतिक संपदा में विचरने वाला कवि है। उसकी रचनाएँ ऋतु संहार, मेघदूत आदि इसी प्रकृति-प्रेम की ओर संकेत करती हैं। कालिदास स्वयं स्वीकार करता है-“मैं अनुभव करता हूँ कि यह ग्राम-प्रांतर मेरी वास्तविक भूमि है। मैं कई सूत्रों से इस भूमि से जुड़ा हूँ। उन सूत्रों में तुम हो, यह आकाश और ये मेघ हैं, यहाँ की हरियाली है, हिरणों के बच्चे हैं, पशुपाल हैं।”
6. अहं एवं व्यक्ति-चेतना-मोहन राकेश के साहित्य के कई पात्रों में अहं और व्यक्ति-चेतना पाई जाती है। कालिदास भी अपवाद नहीं है। वह अहं की सजीव मूर्ति है। वह उज्जयनी जाकर अपनी व्यक्तिवादी चेतना का अनुभव करता है। वह मल्लिका के सामने स्वीकार करता है-“मन में कहीं यह आशंका थी कि वह वातावरण मुझे छा लेगा और मेरे जीवन की दिशा बदल देगा और यह शंका निराधार नहीं थी।” इस प्रकार कालिदास का चरित्र प्रवृत्तियों की ओर संकेत करता है.
Teacher's Note:
a) Character sketches of Kalidas must cover his dual nature as a sensitive poet and a conflicted urban royal courtier.
b) Highlight how external pressures and ambition conflict with his innate connection to nature and Mallika.
प्रश्न 15. ‘आषाढ़ का एक दिन’ शीर्षक नाटक ऐतिहासिक होते हुए भी आधुनिक समस्याओं का आंकलन प्रतीत होता है।-व्याख्या कीजिए। [12]
उत्तर:
‘आषाढ़ का एक दिन’ हिंदी के प्रयोगधर्मी नाटककार मोहन राकेश द्वारा लिखित है। यह एक यथार्थवादी नाटक है। इसमें ऐतिहासिक परिपार्श्व में आधुनिक जीवन के भाव-बोध को व्यंजित किया गया है। कालिदास की कहानी आधुनिक साहित्यकार से बिल्कुल भी भिन्न प्रतीत नहीं होती।
आलोचक स्वीकार करते हैं कि कालिदास के साथ समकालीन अनुभव के और भी कई संदर्भ इस नाटक में हैं। ये संदर्भ इसे एकाधिक स्तर पर रोचक बनाते हैं। उसका संघर्ष, कला और प्रेम, सर्जनशील व्यक्ति और परिवेश, भावना और कर्म, कलाकार और राज्याश्रय आदि कई स्तरों को स्पर्श करता है। काल के आयाम को बड़ी रोचकता और तीव्रता के साथ नाट्य रूप दिया गया है।
ऊपरी तौर पर इस नाटक में कालिदास की कहानी बताई गई प्रतीत होती है, परंतु वास्तविकता कुछ और है। नाटककार ने इस नाटक में कथा-तंत्र रचते समय ऐतिहासिक वस्तु-योजना को केवल आधार के रूप में रखा है। वास्तव में यहाँ पर कालिदासाकालीन परिस्थितियों के माध्यम से आधुनिक समस्याओं का समसामयिक रूप में विवेचन हुआ है। ऐतिहासिक कथानक के आधार पर आधुनिक समस्याओं को प्रस्तुत करना कोई नई बात नहीं है। यही कार्य प्रसाद जी भी अपने नाटककार के द्वारा कर चुके हैं। मोहन राकेश ने भी ‘आषाढ़ का एक दिन’ के द्वारा यही कार्य किया है। प्रसाद जी ने अपने नाटकों की विषय-वस्तु की ऐतिहासिकता पर भी विशेष ध्यान दिया है। परंतु मोहन राकेश ने ऐतिहासिक तथ्यों को महत्त्व नहीं दिया। उन्होंने केवल पात्र एवं वातावरण ही ऐतिहासिक चुने हैं, शेष सभी कुछ आधुनिक है।
स्थितियाँ प्राचीन हैं परंतु संदर्भ आधुनिक हैं। कालिदास भले ही मल्लिका से प्रेम करता है परंतु मूलतः वह एक कवि ही है। उसका एकमात्र और चरम मूल्य साहित्य की रचना करना है। पूरे नाटक में उसका यही अंतर्द्वंद्व दिखाई देता है। यही कारण है कि उज्जयनी जाकर वह मल्लिका और ग्राम-प्रदेश को भूल जाता है। उज्जयनी में कालिदास की जीवन-शैली बदल जाती उसका जीवन उसका अपना जीवन नहीं रहता। प्रियंगुमंजरी से विवाह करने की विवशता, विलासिता में पूरित वैभवपूर्ण जीवन और सृजन शक्ति पर छाए संकट के बादल इसी ओर संकेत करते हैं।
स्थिति का ज्ञान होने पर कालिदास स्वयं कहता है-“अधिकार मिला, सम्मान बहुत मिला, जो कुछ मैंने लिखा उसकी प्रतिलिपियाँ देश भर में पहुँच गईं परंतु मैं सुखी नहीं हुआ। किसी और के लिए वही वातावरण और जीवन स्वाभाविक हो सकता है, मेरे लिए नहीं था। एक राज्याधिकारी का कार्यक्षेत्र मेरे कार्यक्षेत्र से भिन्न था।
मुझे बार-बार अनुभव होता है कि मैंने प्रभुता और सुविधा के मोह से उस क्षेत्र में अनधिकार प्रवेश किया है और जिस विशाल क्षेत्र में मुझे रहना चाहिए था उससे हट आया हूँ।” राज्याश्रय और राजनीतिक वातावरण में साहित्य-सृजन की गति कुंठित हो जाती है। कालिदास के कथानुसार-“लोग सोचते हैं, मैंने उस जीवन और वातावरण में रहकर बहुत कुछ लिखा है। परंतु मैं जानता हूँ कि मैंने वहाँ रहकर कुछ भी नहीं लिखा। जो कुछ लिखा है यहाँ के जीवन का ही संचय था।” यह ऐतिहासिक कालिदास की नहीं आधुनिक कालिदास की तस्वीर है। आज महानगरों में उच्च पदों पर आसीन साहित्यकारों की भी यही स्थिति है। वे अपनी आत्मा के सच्चे आज्ञाकारी बनकर उच्च जीवन मूल्यों का जीवन जीते हुए सृजन करना चाहते हैं। परंतु राज्याश्रय का दबाव उन्हें ऐसा करने नहीं देता। वे राजाज्ञा के समक्ष कठपुतली नज़र आते हैं।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि नाटककार के नाट्य लेखन का ताना-बाना भले ही इतिहास से लिया हो परंतु उसकी साज-सज्जा और आत्मा अपनी कल्पना से सजाई है। उसमें आधुनिक नर-नारी संबंधों की समस्या भी उतनी ही प्रबिस जितनी राज्याश्रय की। अस्तित्व की रक्षा करने में कालिदास अंततः असमर्थ-सा दिखाई देता है।
Teacher's Note:
a) Critical appreciation answers must demonstrate how classical elements are fused with contemporary existential concerns.
b) Discuss the struggle between artistic integrity and institutional/state patronage as depicted in the play.
Free study material for Hindi
ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper 2018 with Solutions & Previous Year Question Papers for Class 12 Hindi
Download ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper 2018 with Solutions for Class 12 Hindi
Review authentic examination papers for Class 12 Hindi. Working through the ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper 2018 with Solutions allows learners to decode recurring question trends and familiarize themselves with official ISC evaluation standards.
Master Marking Schemes and Time Management
Practicing past question sets under timed home conditions helps refine pacing and time management skills, ensuring you complete your Hindi examination comfortably within the official duration.
Offline Revision & Comprehensive Study Material
Wrap up your exam preparation by reviewing detailed answer keys and tackling additional practice sets. All resources on our platform are free to access.
FAQs
The ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper 2018 with Solutions is available for download on StudiesToday.com. It includes complete set with all sections so that Class 12 students can practice with the exact same paper that came in the ISC exams.
Yes, the solutions for ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper 2018 with Solutions are prepared by subject matter experts as per official marking scheme. Class 12 students will understand the structure of answers and 'step-marks' methodology Hindi.
Solving previous year papers like ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper 2018 with Solutions is important to understand repeat themes and question difficulty levels of Hindi. It helps Class 12 students to test their time management skills too.
Yes, where applicable, ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper 2018 with Solutions is available in both English and Hindi mediums. All students from Class 12 can access Hindi study material in their preferred language.
No, all previous year question papers on StudiesToday, including ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper 2018 with Solutions, are provided free of charge in mobile-friendly PDF.