ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper 2017 with Solutions

Official ISC Exam Papers for Class 12 Hindi

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Solved Previous Year Papers for Hindi

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ISC Class 12 Hindi Board Exam Question Paper with Solutions

 

Section-A

Language (50 Marks)

 

प्रश्न 1. Write a composition in approximately 400 words in Hindi on any ONE of the topics given below: [20]

Answer:
यदि मैं प्रधानाध्यापक होता
इसमें कोई भी संदेह नहीं कि विद्यालय का प्रधानाध्यापक का पद बहुत ही आदरणीय और उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। गंभीरता से सोचा जाए तो यह पद एक निर्माता का पद है जिसमें गरिमा का उत्कर्ष पाया जाता है। पूरा विद्यालय इस पद पर आसीन व्यक्ति की कार्यकुशलता, कर्मठता एवं दूरदर्शिता पर निर्भर करता है। विद्यालय के रूप, स्वरूप तथा गुणवत्ता में उसके प्रधानाचार्य की झलक दिखाई देती है। अच्छा शिक्षाशास्त्री व प्रशासक ही इस पद को सुशोभित कर सकने में समर्थ होता है। वह अपने आदर्श व्यक्तित्व द्वारा समूचे विद्यालय के परिवेश को गरिमा प्रदान करते हुए महिमामंडित करता है।
यदि मैं अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य के पद पर स्वयं को रखकर देखता हूँ, तो मेरे मन और मस्तिष्क में कई कल्पनाएँ आती हैं। मैं सोचता हूँ कि यदि इस पद पर मैं स्वयं होता, तो क्या कुछ ऐसा करना चाहता, जो वर्तमान व्यवस्था में नहीं हो पा रहा है। मैं यह भी सोचता हूँ कि कौन-सी ऐसी व्यवस्थाएँ या अनियमितताएँ हैं, जिन्हें मैं अपने कार्यकाल में नहीं देखना चाहता।
विद्यालय का अस्तित्व मूलतः विद्यार्थियों के आगमन की प्रवृत्ति पर आधाररत होता है। हमारे भैया बताया करते हैं कि जब वे इसी विद्यालय में पढ़ा करते थे, तब इसमें आठ सौ से भी ऊपर संख्या में विद्यार्थी पढ़ते थे। आज यह संख्या घटकर पाँच सौ के आसपास रह गई है। मैं सबसे पहले यह संख्या सम्मानजनक स्तर तक पहुँचाना चाहूँगा। इसके लिए विद्यालय की व्यवस्था को आकर्षक बनाया जाएगा तथा विद्यालय भवन की मरम्मत कराई जाएगी।
हमारे विद्यालय में खुले उद्यान जो बेकार पड़े हैं, उन्हें विभिन्न प्रकार के पौधों व फूलों से सुशोभित करूँगा। गर्मियों के दिनों में जल की आपूर्ति प्रायः ठप रहती है। बच्चों को ठंडा पानी तो दूर की बात, गरम पानी भी उपलब्ध नहीं होता। मैं विद्यालय में पानी तथा बिजली का उचित प्रबंध करवाऊँगा।
विद्यालय का स्वरूप गुणात्मक बनाने के लिए तीन स्तरों पर परिश्रम व दूरदृष्टि की आवश्यकता होती है- पढ़ाई, खेलकूद तथा सांस्कृतिक पहलू। मैं ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति करना चाहूँगा, जो विद्यार्थियों को शिक्षित करने के लिए पूर्णतः प्रशिक्षित हों। वर्तमान अध्यापकों को प्रेरित करूँगा कि वे मन लगाकर विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम को सहज व सरल ढंग से समझाएँ। खेलकूद के लिए अलग-अलग खेलों के लिए प्रशिक्षक रखे जाएँगे। खेलों का सामान भी खरीदा जाएगा। क्रीड़ा क्षेत्र को समतल बनाकर अभ्यास करवाया जाएगा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए कोई श्रेष्ठ, कुशल तथा निष्ठावान अध्यापक प्रभारी बनाया जाएगा, ताकि विद्यालय पढ़ाई और खेल के साथ-साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी आगे बढ़े।
मैं पुस्तकालय को समृद्ध करूँगा और वहाँ कंप्यूटर-प्रणाली लागू करूँगा, ताकि विद्यालय तकनीकी क्षेत्र में पिछड़ा न रहे। मेधावी परंतु गरीब विद्यार्थियों, खिलाड़ियों तथा कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक, पुस्तकीय व छात्रवृत्ति के रूप में सहायता दी जाएगी। इससे उनकी प्रतिभा में चार चाँद लगेंगे।
विद्यार्थियों को चिकित्सा संबंधी प्राथमिक सहायता देने के लिए प्राथमिक चिकित्सा की उचित व्यवस्था की जाएगी। प्राकृतिक चिकित्सा व व्यायाम के लिए रखे गए अध्यापक को प्रेरित करके इस क्षेत्र की गतिविधियाँ पुनः चालू करवाऊँगा। प्रयोगशालाओं का स्वरूप भी सुधारूँगा ताकि विज्ञान के विद्यार्थी हीन-भावना का अनुभव न करें। इन कार्यों को करने के बाद मेरा विश्वास है कि हमारा विद्यालय नगर के ही नहीं, बल्कि प्रांत के श्रेष्ठ विद्यालयों की सूची में अपना नाम लिखा सकेगा।

Teacher's Note:
a) निबंध लेखन में विषय की मौलिकता, भाषा की शुद्धता और प्रवाह का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।
b) छात्रों को चाहिए कि वे निर्धारित शब्द-सीमा (लगभग 400 शब्द) का पालन करें और अपने विचारों को तार्किक रूप से प्रस्तुत करें।

 

प्रश्न 2. Read the passage given below carefully and answer in Hindi the questions that follow, using your own words: [20]

ज्ञान-प्राप्ति के अनन्तर महात्मा बुद्ध ने अपना उपदेश सारनाथ में दिया। उसमें उन्होंने कहा—“जीवन के दो मार्ग हैं। एक मार्ग पर चलकर लोग सुख-साधनों को जुटाते हैं और भोगों से लिपटे रहते हैं। यह जीवन को सुखी नहीं बनाता। दूसरा मार्ग त्याग का है, तपस्या का है। इस पर चलकर लोग शरीर को कठोर यातनाएँ देकर भी अपने-आपको सुखी नहीं बना पाते। अतः ज्ञान-प्राप्ति के लिए, मानसिक सुख-शांति के लिए बीच का मार्ग ही श्रेयस्कर है। बुद्ध का यही सिद्धांत मध्यम-मार्ग के नाम से प्रसिद्ध है। कहते हैं कि महात्मा बुद्ध जहाँ बोधिवृक्ष के नीचे ध्यान-मग्न बैठे थे, उस मार्ग से एक भजन-मंडली जा रही थी। गीत की स्वर-लहरी वातावरण को गुंजित कर रही थी। सहसा समाधिस्थ बुद्ध के कानों में गायिका के गीत के मधुर स्वर गूँज उठे—'वीणा के तारों को ढीला न छोड़ो, नहीं तो उससे मधुर स्वर नहीं निकलेगा और न ही उन्हें इतना कसो कि वे टूट ही जायें।' इन शब्दों से बुद्ध को मध्यम-मार्ग की प्रेरणा मिली। उन्होंने अनुभव किया कि न तो भोगों से पूर्णतया तृप्ति हो सकती है और न ही भोगों को पूर्ण रूप से त्यागा जा सकता है। अतः जीवन के लिए भोग और त्याग के बीच का मार्ग ही श्रेयस्कर है।
महात्मा बुद्ध का चिंतन सरल और स्वाभाविक था। उनके मत में ऊँच-नीच का भेदभाव न था। राजा से लेकर रंक तक उनके लिए समान थे। उन्होंने धर्म के बाह्य आम्बरों की अपेक्षा आन्तरिक शुद्धि पर बल दिया। यज्ञ में दी जाने वाली पशु-बलि का उन्होंने विरोध किया। जनसाधारण की भाषा में उन्होंने अहिंसा और प्रेम का जो उपदेश दिया उसने जादू का काम किया और देखते ही देखते लाखों नर-नारी उनके अनुयायी बन गए। 45 वर्षों तक उन्होंने घूम-घूम कर अपने अमृतमयी उपदेशों से जन-कल्याण किया।
महात्मा बुद्ध जीवन के 80 वर्ष पार कर चुके थे। शरीर दिन-प्रतिदिन क्षीण होता जा रहा था। अन्त में उन्होंने कुशीनगर की ओर प्रस्थान किया। कुशीनगर पहुँचते-पहुँचते उनका शरीर निढाल हो गया। उनके प्रिय शिष्य भिक्षु आनन्द ने शय्या तैयार की। वह उस पर लेट गए। शिथिलता बढ़ती जा रही थी। निर्वाण की घड़ियाँ आ पहुँची थीं। यह देख आनन्द की आँखों से ऑँसू फूट पड़े। बोले-“देव! अब हमारा मार्ग दर्शन कौन करेगा?” बुद्ध ने आँखें खोली। बोले-“आनन्द! तुम्हारे सामने विशाल कर्म-क्षेत्र है। जरा, रोग और मृत्यु से त्रस्त मानवता को अहिंसा और प्रेम का मार्ग दिखाओ। क्यों भूलते हो संसार नश्वर है? जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म प्रकृति का अटल नियम है। रही मार्ग-दर्शन की बात। कौन किसका मार्ग-दर्शन करता है? कौन किसका मार्ग-दर्शन कर सकता है?” “अप्प दीपो भव - अपना दीपक आप बनो।” यह कहते हुए तथागत सदा के लिए समाधिस्थ हो गए। वातावरण शोक से भर गया। तथागत के निष्पंद पार्थिव शरीर के चारों ओर खड़े भिक्षु ऑँसू बहा रहे थे। रह-रह कर उनके कानों में तथागत के शब्द गूँज रहे थे।
“भिक्षुओ! मुझ पर विश्वास मत करना। मैं जो कहता हूँ उस पर भी इसलिए विश्वास मत करना कि मैंने कहा है। सोचना, विचारना और अपने अनुभव की कसौटी पर जो खरा उतरे वही करना।”

 

(i) मध्यम-मार्ग से आप क्या समझते हैं? महात्मा बुद्ध को मध्यम-मार्ग की प्रेरणा कैसे मिली? [4]

Answer:
मध्यम मार्ग का अर्थ है - 'बीच का रास्ता।' महात्मा बुद्ध जहाँ बोधिवृक्ष के नीचे ध्यान मग्न बैठे थे, उस मार्ग से एक भजन-मंडली जा रही थी। मंडली की गायिका जो गीत गा रही थी, उसका अर्थ था कि "वीणा के तार ढीले न छोड़ो, नहीं तो उससे मधुर स्वर नहीं निकलेगा और न ही इतना कसो कि वे टूट ही जाएँ।" बुद्ध को इसी से मध्यम मार्ग की प्रेरणा मिली।

Teacher's Note:
a) छात्र मध्यम मार्ग की परिभाषा को वीणा के उदाहरण के साथ स्पष्ट रूप से समझें।
b) उत्तर लिखते समय संदर्भ और प्रसंग का ध्यान रखना अनिवार्य है।

 

(ii) महात्मा बुद्ध के मत की क्या-क्या विशेषताएँ थीं कि देखते ही देखते लाखों नर-नारी उनके अनुयायी बन गए? [4]

Answer:
महात्मा बुद्ध का चिंतन सरल व स्वाभाविक था। वे ऊँच-नीच का भेद मिटाकर समानता का सिद्धांत प्रचारित करते थे। उन्होंने धर्म के बाहरी आम्बरों को छोड़ आंतरिक शुद्धि पर बल दिया। वे पशु-बलि का विरोध करते हुए अहिंसा और प्रेम का उपदेश देते थे। इससे लाखों नर-नारी उनके अनुयायी बन गए।

Teacher's Note:
a) बुद्ध के उपदेशों की सरलता और सामाजिक समता उनके लोकप्रिय होने का मुख्य कारण थी।
b) बाह्य आडंबरों का विरोध और आंतरिक शुद्धि जैसे बिंदुओं को उत्तर में अवश्य शामिल करें।

 

(iii) महात्मा बुद्ध ने शोकाकुल भिक्षु को क्या उपदेश दिया? इससे हमें क्या शिक्षा मिलती है? [4]

Answer:
महात्मा बुद्ध ने भिक्षु आनंद से कहा-तुम्हारे सामने विशाल कर्मक्षेत्र है। जरा, रोग और मृत्यु से भयभीत मानवता को अहिंसा और प्रेम का मार्ग दिखाओ। संसार नश्वर है। जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म प्रकृति का अटल नियम है। यहाँ कोई किसी का मार्गदर्शक नहीं बन सकता। 'अपना दीपक आप बनो।' इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि मृत्यु और जन्म प्रकृति का अटल नियम है।

Teacher's Note:
a) 'अप्प दीपो भव' के संदेश को भिक्षु आनंद को दिए गए उपदेश के संदर्भ में समझें।
b) जीवन की नश्वरता और आत्मनिर्भरता इस उपदेश का मूल सार है।

 

(iv) महात्मा बुद्ध के निष्पंद पार्थिव शरीर के चारों ओर खड़े शोकाकुल भिक्षुओं के कानों में क्या शब्द गूँज रहे थे? इन शब्दों से क्या प्रेरणा मिलती है? [4]

Answer:
महात्मा बुद्ध के पार्थिव शरीर के चारों ओर खड़े शोकग्रस्त भिक्षुओं के कानों में ये शब्द गूँज रहे थे-“भिक्षुओ! मुझ पर विश्वास मत करना। मैं जो कहता हूँ उस पर भी इसलिए विश्वास मत करना कि मैंने कहा है। सोचना, विचारना और अपने अनुभव की कसौटी पर जो खरा उतरे वही करना। इन शब्दों से हमें प्रेरणा मिलती है कि उपदेशों को ज्ञान के आलोक में परख कर ही अपनाना चाहिए।”

Teacher's Note:
a) बुद्ध का यह कथन उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्वतंत्र चिंतन को दर्शाता है।
b) किसी भी बात को आँख मूँदकर स्वीकार न करने की सीख इस उपदेश से मिलती है।

 

(v) ‘अप्प दीपो भव’ का क्या अर्थ है? ज्ञान-प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध ने अपना उपदेश कहाँ दिया और उनका निर्वाण कहाँ हुआ? [4]

Answer:
‘अप्प दीपो भव’ का अर्थ है कि अपना दीपक अर्थात् मार्ग दर्शक स्वयं बनो। महात्मा बुद्ध ने अपना उपदेश सारनाथ में दिया। उनका निर्वाण कुशीनगर में हुआ था।

Teacher's Note:
a) इस प्रश्न में तीन छोटे तथ्यात्मक प्रश्न पूछे गए हैं, जिनके स्पष्ट उत्तर दिए जाने चाहिए।
b) सारनाथ (उपदेश स्थल) और कुशीनगर (निर्वाण स्थल) के नाम सही रूप में लिखें।

 

प्रश्न 3.

(a) Correct the following sentences and rewrite: [5]

(i) मैंने आज जाना है। [1 Mark]

Answer: मुझे आज जाना है।

Teacher's Note:
a) सर्वनाम के प्रयोग संबंधी अशुद्धि को सुधारा गया है।
b) 'मैंने' के स्थान पर 'मुझे' उचित कारक चिह्न है।

 

(ii) पुलिस को देखकर चोर आठ तीन ग्यारह हो गए। [1 Mark]

Answer: पुलिस को देखकर चोर नौ दो ग्यारह हो गए।

Teacher's Note:
a) मुहावरे के सटीक रूप का प्रयोग किया जाना चाहिए।
b) 'नौ दो ग्यारह होना' सही मुहावरा है, न कि 'आठ तीन ग्यारह होना'।

 

(iii) सूर्यास्त के छिपते ही वातावरण में अँधेरा छा गया। [1 Mark]

Answer: सूर्य के छिपते ही वातावरण में अँधेरा छा गया। (या: सूर्यास्त होते ही वातावरण में अँधेरा छा गया।)

Teacher's Note:
a) वाक्य में शब्दों की पुनरावृत्ति (सूर्यास्त और छिपते) की अशुद्धि है।
b) एक ही अर्थ वाले दो शब्दों का एक साथ प्रयोग त्रुटિपूर्ण माना जाता है।

 

(iv) साहित्य और समाज का घोर संबंध है। [1 Mark]

Answer: साहित्य और समाज का गहन संबंध है।

Teacher's Note:
a) विशेषण के अनुचित प्रयोग को ठीक किया गया है।
b) संबंधों के साथ 'घोर' के स्थान पर 'गहन' या 'घनिष्ठ' शब्द का प्रयोग होता है।

 

(v) यह कार्य तत्काल अभी पूर्ण करना है। [1 Mark]

Answer: यह कार्य तत्काल पूर्ण करना है।

Teacher's Note:
a) यहाँ 'तत्काल' और 'अभी' दोनों एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं, जो पुनरावृत्ति दोष है।
b) एक शब्द को हटाकर वाक्य को शुद्ध किया गया है।

 

(b) Use the following idioms in sentences of your own to illustrate their meaning: [5]

(i) गले का हार होना [1 Mark]

Answer: बच्चे अपने माता-पिता के गले का हार होते हैं।

Teacher's Note:
a) 'गले का हार होना' मुहावरे का अर्थ बहुत अधिक प्रिय होना है।
b) वाक्य प्रयोग ऐसा होना चाहिए जिससे अर्थ स्पष्ट हो जाए।

 

(ii) रंग चढ़ना [1 Mark]

Answer: देखते ही देखते पूरे निर्वाचन क्षेत्र में स्वामी जी का रंग चढ़ गया।

Teacher's Note:
a) 'रंग चढ़ना' का अर्थ प्रभाव पड़ना या उत्साह छा जाना है।
b) वाक्य रचना प्रसंग के अनुकूल होनी चाहिए।

 

(iii) सिर उठाना [1 Mark]

Answer: कश्मीर में अब भी आतंकवाद सिर उठा रहा है।

Teacher's Note:
a) 'सिर उठाना' का अर्थ विरोध करना या प्रगट होना है।
b) इस मुहावरे का प्रयोग नकारात्मक या सकारात्मक दोनों संदर्भों में होता है।

 

(iv) चाँदी होना [1 Mark]

Answer: टमाटर के दामों में अभूतपूर्व तेजी से किसानों की चाँदी हो गई।

Teacher's Note:
a) 'चाँदी होना' का अर्थ अत्यधिक लाभ होना या अमीर होना है।
b) छात्रों को वाक्य में मुहावरे का मूल रूप ही प्रयोग करना चाहिए।

 

(v) अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना [1 Mark]

Answer: आजकल के नेता अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनते फिरते हैं।

Teacher's Note:
a) इस मुहावरे का अर्थ अपनी प्रशंसा स्वयं करना है।
b) वाक्य प्रयोग करते समय व्याकरण नियमों का ध्यान रखें।

 

Section-B

Prescribed Textbooks (50 Marks)

गद्य संकलन

 

प्रश्न 4.

एक जगह गरम-गरम जलेबियाँ बन रही थीं। बच्चों के लिए थोड़ी-सी खरीद लीं। घर के दरवाजे पर पहुँचा। दरवाजा खुला था। घर के अन्दर पैर रखने में हृदय धड़कता था। न जाने बच्चे किस हालत में हों?

 

(i) किसने और कब जलेबियाँ खरीदीं? जलेबियाँ खरीदने वाले का बच्चों से क्या सम्बन्ध था? [1]

Answer:
सीताराम ने देश के लिए एक वर्ष की जेल काटी थी। जेल से रिहा होते ही उन्होंने अपने बच्चों के लिए जलेबियाँ खरीदीं। उनकी पत्नी का देहांत हो चुका था और वे दो बच्चों के पालनपोषण के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम में योगदान भी कर रहे थे।

Teacher's Note:
a) सीताराम बच्चों के पिता थे जो जेल से छूटकर आए थे।
b) उत्तर concise और तथ्यात्मक होना चाहिए।

 

(ii) जलेबियाँ खरीदने वाला व्यक्ति कहाँ और क्यों गया था? [3]

Answer:
सीताराम को देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने के दोष में अंग्रेज सरकार द्वारा जेल भेज दिया गया था।

Teacher's Note:
a) सीताराम की देशभक्ति और उनके जेल जाने के कारण को स्पष्ट करें।
b) तीन अंकों के प्रश्न के अनुसार उत्तर पर्याप्त होना चाहिए।

 

(iii) सीताराम जी की अनुपस्थिति में बच्चों की देखभाल किसे करनी पड़ती थी? इस बारे में सीताराम जी क्यों चिंतित थे? [3]

Answer:
सीताराम जी की अनुपस्थिति में बच्चों की देखभाल कहारिन किया करती थी। वे इस बारे में चिंतित थे कि कहारिन के अपने भी तीन-चार बच्चे थे। उनके साथ दो और बच्चों को संभालना कठिन कार्य था।

Teacher's Note:
a) कहारिन की पारिवारिक स्थिति और बच्चों की सुरक्षा को लेकर सीताराम की चिंता का वर्णन करें।
b) कहानी के कथानक के आधार पर उत्तर लिखें।

 

(iv) इस बार बच्चों की देखभाल किसने और क्यों की? सीताराम जी का उससे कब और कैसे परिचय हुआ था? [5]

Answer:
इस बार सीताराम के बच्चों की देखभाल गौरी ने की थी। सीताराम एक बार गौरी को अपने बच्चों की नई माँ के रूप में देखने गए थे। वह राधाकृष्ण जी की पुत्री थी। जब दोनों का संबंध सफल नहीं हो पाया तो सीताराम निराश नहीं हुए। परन्तु जब उन्हें एक साल का कारावास हो गया तो यह समाचार पढ़ते ही गौरी ने उनके बच्चों की माँ बनना स्वीकार कर लिया और उनके पास कानपुर चली गई।

Teacher's Note:
a) गौरी के चरित्र और सीताराम से उसके संबंधों के विकास को विस्तार से समझाएँ।
b) पाँच अंकों के प्रश्न के लिए सभी मुख्य बिंदुओं का समावेश आवश्यक है।

 

प्रश्न 5. “मजबूरी’ कहानी मातृत्व प्रेम से परिपूर्ण एक सरल वृद्धा की कहानी है।” इस कथन की पुष्टि कहानी की घटनाओं के आधार पर कीजिए। [12 1/2]

Answer:
‘मजबूरी’ शीर्षक कहानी में लेखिका मन्नू भंडारी ने मातृत्व प्रेम से परिपूर्ण एक सरल वृद्धा ‘अम्मा’ का करुण व ममतामयी चित्रांकन किया है। गाँव में रहने वाली ममतामयी, ‘अम्मा’ को पुत्र रामेश्वर को कलेजे से दूर करना पड़ता है। यह उनकी पहली मजबूरी है। रामेश्वर के बिना उन्हें घर मसान जैसा लगता है। पहाड़ जैसा दिन उन्हें अकेले काटना पड़ता है। लेकिन अकेलेपन की यातना से दुखी अम्मा के अकेले जीवन में रामेश्वर के बड़े बेटे बेटू के आ जाने से बहार आ जाती है।
दूसरा पहलू यह है कि बहू रमा के कड़े नियंत्रण के बाद दादी अम्मा के असीम दुलार में पलता हुआ बेटू एकदम अनुशासनहीन हो जाता है। रमा की मजबूरी थी कि वह अगली संतान को ध्यान में रखकर अपने बेटू को अम्मा के पास छोड़ती है। वर्ष बाद लौटने पर उसे दुःख होता है क्योंकि बेटू उद्दंड और अनुशासनहीन हो चुका है। वह उसे ले जाना चाहती है परंतु ले जा नहीं पाती।
इसके तीन वर्ष बाद रमा और रामेश्वर तीन साल के पप्पू को लेकर आए। पप्पू ने अंग्रेज़ी की छोटी-छोटी कविताएँ याद कर रखी थीं। दो महीने पूर्व ही उसे एक अंग्रेज़ी स्कूल में भर्ती करवाया गया था। रमा ने रामेश्वर से कहा कि जैसे भी हो इस बार बेटू को अपने साथ लेकर जाना होगा। रामेश्वर ने जवाब दिया कि “इस बात से अम्मा को बहुत दुःख होगा तथा दूसरी समस्या यह है कि बेटू तुम्हारे पास जरा भी नहीं आता। वह अम्मा को छोड़कर वहाँ कैसे रहेगा?”
रामेश्वर बेचारा धर्म संकट में था। उसने सारी बात रमा पर छोड़ दी। अम्मा ने जब रमा का प्रस्ताव सुना कि वह बेटू को अपने साथ ले जाना चाहती है, तो उसके पैरों तले की जमीन सरक गई। बोली, “मेरे बिना वह एक पल भी तो नहीं रहता …… एकाएक मुझसे दूर कैसे रहेगा?” रमा ने बेटू की पढ़ाई की बात की और कहा, “……” उसके साथ दुश्मनी हीानी है, तो रखिए इसे अपने पास।”
अम्मा यह बात सुनकर फूट-फूट कर रोने लगी। कुछ देर बाद स्वर को संयत करके बोली, “ले जा बहू, ले जा।”
दो दिन बाद रमा औषधाालय के एकमात्र नौकर और दोनों बच्चों को लेकर अपनी माँ के यहाँ चल पड़ी। रमा ने बेटू को बताया ही नहीं कि वह उसे अपने साथ ले जा रही है।
उसके बाद घर में जो कोई भी आता उसे बेटू के चले जाने पर आश्चर्य होता। अम्मा ने उन्हें बताया कि गठिया के मारे उठना बैठना तक हराम हो रहा है, इसीलिए मैंने ही कह दिया कि पप्पू अब बड़ा हो गया है, सो बेटू को ले जाओ।
शाम को गुब्बारेवाला आया, बुढ़िया का बालवाला आया, मिठाई के खिलौने बेचने वाला आया, तो अम्मा ने सबको जवाब दिया- “जाओ भाई, जाओ ! आज तुम्हारा ग्राहक नहीं है। उसे मैंने उसकी अम्मा के साथ भेज दिया। अब यहाँ मत आया करो।”
तीसरे दिन औषधालय का नौकर वापस आया, तो उसने बताया कि दादी अम्मा को याद करते-करते बेटू को बुखार आ गया। रमा के हाथ से न कुछ खाता है न दवाई पीता है। अम्मा पागलों की भाँति दौड़ती हुई औषधालय पहुँची।
अम्मा बेटू को लेने चली गई और तीसरे दिन ही बेटू को लेकर लौट आईं। एक साल उन्होंने इसी प्रकार निकाल दिया। रमा मुंबई से आई तो बेटू का वही रवैया देखा। वह एक बार फिर दादी माँ को रुलाकर उनके मना करने पर भी बेटू को लेकर मुंबई के लिए चल पड़ी। अम्मा ने शिब्बू को साथ कर दिया।
शिब्बू मुंबई से लौटकर अम्मा को बताता है कि बेटू अब रमा के साथ हिल-मिल गया है और उसकी वहाँ लड़कों से दोस्ती हो गई है। इस पर अम्मा परसाद बाँटने के लिए सवा रुपया निकालती है। लेखिका ने यहाँ पर उसकी करुण स्थिति और रोती आँखों की मजबूरी उजागर की है। वह प्रसाद भले ही बाँट रही थी परंतु अकेले, सुनसान व शुष्क जीवन की मजबूरी उसे रुला रही थी।

Teacher's Note:
a) इस दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में कहानी की मुख्य पात्र 'अम्मा' के वात्सल्य और उसकी विवशता (मजबूरी) का विस्तृत विश्लेषण किया जाना चाहिए।
b) बाल मनोविज्ञान और पारिवारिक परिस्थितियों के प्रभाव को उत्तर में स्पष्ट रूप से रेखांकित करें।

 

प्रश्न 6. संस्कृति की परिभाषा न देकर लेखक ने किन लक्षणों का उल्लेख कर संस्कृति को समझाने का प्रयत्न किया है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। [12]

Answer:
‘संस्कृति क्या है?’ शीर्षक निबंध में हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि, लेखक एवं सांस्कृतिक विचारकर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने संस्कृति के वास्तविक स्वरूप व लक्षणों को रेखांकित किया है।
दिनकर ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान की सकारात्मक प्रवृत्ति के उदाहरणों द्वारा इसके लक्षणों को संकेतित किया है। वे सबसे बड़ा उदाहरण मुस्लिमों के भारत में आगमन का देते हैं जिससे हमें कलाओं और भाषा (उर्दू) की समृद्धि प्राप्त हुई। चित्रकला भी इसी मुस्लिम शासन की देन है।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सकारात्मक व अनुकूल रूप सदैव हितकर होता है। यदि यूरोप से भारत का संपर्क न हुआ होता तो भारतीय विचारधारा पर विज्ञान की कृपा बहुत देर से हुई होती। इसी से जुड़ी बात है कि इसी यूरोपीय प्रभाव के कारण हमारे यहाँ राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, राम कृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी जैसे सुधारक व सांस्कृतिक चिंतक पैदा हुए हैं। जब दो जातियाँ मिलती हैं तो उनके संपर्क अथवा संघर्ष से जीवन की एक नवीन धारा फूटती है, जिसका प्रभाव उन दोनों जातियों पर पड़ता है। अतः सांस्कृतिक लेन-देन की यह प्रक्रिया ही संस्कृति की आत्मा है। इसी के सहारे उसके प्राण बने रहते हैं और वह देर तक और दूर तक जीवित रहते हुए अपना प्रभाव डालती रहती है।
निबंधकार बताते हैं कि केवल चित्रकला, काव्य, मूर्ति कला, स्थापत्य या वास्तु कला और वस्त्र शैली पर नहीं, सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव दार्शनिक चिंतन और विचार की दशा-दिशा पर भी पड़ता है। वे लिखते हैं - केवल चित्र, कविता, मूर्ति, मकान और पोशाक पर ही नहीं, सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव दर्शन और विचार पर भी पड़ता है। एक देश में जो दार्शनिक और महात्मा उत्पन्न होते हैं, उनकी आवाज दसरे देशों में भी मिलते-जुलते दार्शनिकों और महात्माओं को जन्म देती है। एक देश में जो धर्म खड़ा होता है, वह दूसरे देशों के धर्मों को भी बहुत-कुछ बदल देता है। यही नहीं, बल्कि प्राचीन जगत् में तो बहुत-से ऐसे देवी-देवता भी मिलते हैं जो कई जातियों के संस्कारों से निकलकर एक जगह जमा हुए हैं।
दिनकर जी का मानना है कि एक जाति विशेष की धार्मिक परिपाटी संपर्क में आने वाली किसी दूसरी जाति की परिपाटी या रिवाज बन जाता है। इसी प्रकार एक देश की प्रवृत्तियाँ किसी दूसरे देश के सामाजिकों की प्रवृत्तियों में जाकर समा जाती हैं। अतः संस्कृति की दृष्टि से वह जाति और देश शक्ति संपन्न और महान समझे जाने चाहिए जिसने विश्व के अधिकांश जन-समूह को प्रभावित किया। उनके शब्दों में -
एक जाति का धार्मिक रिवाज दूसरी जाति का रिवाज बन जाता है और एक देश की आदत दूसरे देश के लोगों की आदत में समा जाती है। अतएव, सांस्कृतिक दृष्टि से वह देश और वह जाति अधिक शक्तिशाली और महान् समझी जानी चाहिए जिसने विश्व के अधिक-से-अधिक देशों, अधिक-से-अधिक जातियों की संस्कृतियों को अपने भीतर जज़्ब करके, उन्हें पचा करके, बड़े-से-बड़े समन्वय को उत्पन्न किया है।
निबंधकार ने सांस्कृतिक दृष्टि से भारतीय संस्कृति को सबसे बड़ी समन्वयकहारी संस्कृति बताया है। इसका एकमात्र और महत्वपूर्ण कारण यह है कि यहाँ की संस्कृति में बाहर की अधिकाधिक संस्कृतियाँ मिश्रित होकर उसका अभिन्न और अटूट अंग बन गई हैं।

Teacher's Note:
a) दिनकर जी के निबंध के आधार पर संस्कृति के आदान-प्रदान और समन्वयवादी स्वरूप को समझाएँ।
b) उदाहरणों (जैसे मुस्लिम आगमन, यूरोपीय प्रभाव) का उल्लेख उत्तर को अधिक प्रभावी बनाता है।

 

काव्य मंजरी

 

प्रश्न 7.

जाऊँ कहाँ तजि चरण तुम्हारे।
काको नाम पतित पावन जग केहि अति दीन पियारे
कोने देव बराइ बिरद हित, हठि-हठि अधम उधारे।
खग, मृग, व्याध, पषाण, विटप जड़, जवन-कवन सुत तारे।
देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब, माया-बिबस विचारे। तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, प्रभु, कहा अपुनपौ हारै।

 

(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ कहाँ से ली गई हैं? इनके कवि कौन हैं? भक्त ने किसके प्रति अपनी आस्था प्रकट की है? [17]

Answer:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक काव्य मंजरी में संकलित तुलसीदास के पद’ शीर्षक कविता में से उद्धृत हैं। इसमें कवि तुलसीदास ने एक भक्त के रूप में भगवान श्रीराम के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट की है। वे उनके श्री-चरणों को अपना परम धाम मानते हुए उसे छोड़कर कहीं भी दूसरी जगह न जाने का संकल्प व्यक्त कर रहे हैं।

Teacher's Note:
a) संदर्भ, प्रसंग और कवि का नाम स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया जाना चाहिए।
b) तुलसीदास की रामभक्ति की अनन्यता इस पद का मुख्य आधार है।

 

(ii) पतितपावन किसे कहा गया है और क्यों? [3]

Answer:
पतितपावन प्रभु श्रीराम को कहा गया है। इस विशेषण की सार्थकता यह है कि वे एकमात्र ऐसे देव हैं जो नीच, अपवित्र, अधम या पतित व्यक्तियों का उद्धार करते हैं। उन्होंने न जाने कितने नरनारियों को मुक्ति प्रदान कर अपने चरणों में स्थान दिया है। जटायु, मरीच, जरा नामक शिकारी, अहल्या, यमलाजुड़ वृक्ष आदि इसी के उदाहरण हैं।

Teacher's Note:
a) 'पतितपावन' शब्द के अर्थ और श्रीराम द्वारा किए गए उद्धारों का संक्षेप में वर्णन करें।
b) पौराणिक संदर्भों (अहल्या, जटायु आदि) का उदाहरण देना आवश्यक है।

 

(iii) ‘माया-बिबस बिचारे’ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

Answer:
‘माया-बिबस बिचारे’ का भाव यह है कि यह संसार एक दिखावटी चकाचौंध है। इसकी माया में ग्रस्त होकर जीव भ्रम में जीवन काटता जाता है। माया-मोह के वश में पड़ा प्राणी प्रभु को भूल जाता है और मुक्ति के लिए सार्थक प्रयास नहीं करता।

Teacher's Note:
a) माया के आवरण और मनुष्य की विवशता को इस पंक्ति के माध्यम से समझाया गया है।
b) आध्यात्मिक दृष्टिकोण से मोह-माया के बंधन की व्यर्थता को स्पष्ट करें।

 

(iv) “जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे” शीर्षक पद के आधार पर कवि की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।

Answer:
प्रस्तुत पद में कवि तुलसीदास ने अपने आराध्य देव प्रभु श्रीराम के चरणों को अपने जीवन का चरम लक्ष्य माना है। वे उनकी कृपा, वत्सल भावना, उद्धार करने की सामर्थ्य व भक्तों पर अपार करुणा से प्रभावित हैं। उन्हें लगता है कि प्रभु श्रीराम ही उन जैसे संसारी जीवों का उद्धार कर उन्हें अपने चरणों में जगह दे सकते हैं। वे इसकी पुष्टि के लिए रामायण व अन्य ग्रंथों से उदाहरण देते हैं जिनमें नीच, पतित व अधम नर-नारियों का उद्धार किया गया है। इसीलिए तुलसीदास को राम का परमभक्त कहते हैं।

Teacher's Note:
a) तुलसीदास की दास्य भक्ति और राम के प्रति अनन्य समर्पण को विस्तार से लिखें।
b) शरणागति की भावना इस पद का मुख्य आकर्षण है।

 

प्रश्न 8. साखी के आधार पर सिद्ध कीजिए कि कबीरदास जी एक सफल कवि एवं श्रेष्ठ उपदेशक थे, उन्होंने बाहरी आडंबरों या पाखंडों का विरोध करके किस चीज़ पर अधिक ध्यान देने पर जोर दिया है? [12]

Answer:
भक्तिकाल की निर्गुण काव्यधारा के संत कवि कबीरदास एक क्रांतिकारी ज्ञानमार्गी कवि हैं। उन्होंने मध्यकालीन धर्म-साधना में अद्भुत व मौलिक योगदान दिया। उन्होंने अपने समय में प्रचलित धार्मिक संकीर्णताओं, पाखंडों, आडंबरों एवं व्यर्थ कर्मकांडों की खुलकर निंदा की। कबीरदास ने अपनी क्रांतिकारी वाणी द्वारा मनुष्य को सच्चा मार्ग दिखाते हुए भक्ति के वास्तविक रूप का साक्षात्कार कराया। प्रस्तुत साखियों में कबीर का धर्म सुधारक तथा समाज सुधारक रूप दिखाई देता है। वे कहते हैं कि मनुष्य को सच्चे गुरु द्वारा दिया गया ज्ञानदान ही इस जगत् से मुक्ति दिला सकता है। लोक-प्रचलित विश्वासों और वैदिक सूत्रों की अपेक्षा सद्गुरु की शरण में जाना अनुकूल सिद्ध हुआ। उसके दिए हुए ज्ञान के प्रकाश से सारा अंधकार मिट जाता है। जब तक मनुष्य प्रेम के महत्व को नहीं समझता, तब तक उसकी आत्मा तृप्त नहीं हो सकती और वह शुष्कता का जीवन ही जीता रहता है।
कबीर ने स्पष्ट किया है कि आत्मा उस परमात्मा का अंश है जो अलख, निराकार अजर-अमर, स्वयंभू तथा एक है। उससे बिछड़ी आत्मा उसी ब्रह्म ्में लीन होने के लिए व्याकुल रहती है। उसे जब तक प्रभु से मिलन नहीं हो जाता, तब तक दिन-रात, धूप-छाँह और स्वप्न में भी कहीं सुख प्राप्त नहीं हो सकता। वे प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें जीते-जी दर्शन हो जाएँ तो अच्छा है क्योंकि मरने के बाद दर्शन किसी काम के नहीं।
कबीर की प्रभु से बिछड़ी आत्मा उसी का नाम पुकारती रहती है और उसका मार्ग निहारती रहती है। अब आँखें थक चुकी हैं जो प्रभु के आने के मार्ग पर सदैव से टिकी हुई थीं। जीभ पर भी उसका नाम रटते-रटते छाला पड़ चुका है।
कबीर ने प्रभु से सच्ची लौ लगाने का प्रस्ताव किया है। उनका विचार है कि योगी का पाखंड धारण करके जंगल-जंगल या पर्वत-पर्वत भ्रमण करने पर कुछ भी प्राप्त नहीं हो सका। प्रभु से मिलाने वाली बूटी अर्थात् साधना का सूत्र कहीं पर भी नहीं मिला। क्योंकि यह भक्ति का सच्चा मार्ग नहीं था। संसार में आकर मनुष्य अनुपम चकाचौंध में भ्रमित होने लगता है। उसे मोह-माया आकर्षित कर लेती है। जब तक इस मोह-बंधन से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक प्रभु दूर ही रहता है.
कबीर ने ईश्वर को प्राप्त करने के लिए शारीरिक रूप से योगी बनने के प्रचलन को भ्रामक व अर्थहीन बताया है। वे कहते हैं कि जब तक मनुष्य अपनी अंतरात्मा से योगी नहीं बनता, तब तक उसे कभी भी मुक्ति रूपी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। उनका आशय है कि बाहरी रूप से योगी या संत का पहनावा कुछ नहीं कर सकता। साधक को अपने भीतर के विकारों और अपनी भोगपरक इंद्रियों पर काबू पाना होगा। ऐसा मन का योगी कोई विरला ही होता है और वही मुक्ति रूपी सिद्धि का सच्चा तथा वास्तविक अधिकारी होता है.
कबीर ने जहाँ एक ओर इंद्रियों को वश में रखने और मन की शुद्धि पर बल दिया है। वहीं उन्होंने आचरण की स्वच्छता को भी अनिवार्य बताया है। सच्चा आचरण तभी अपनाया जा सकता है जब मनुष्य का अपने अहं पर पूर्ण नियंत्रण हो। जब तक उसमें अहं-भावना का प्रसार रहता है, तब तक उसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता। इस ज्ञान के बिना हरि से मिलन संभव नहीं है। वे कहते हैं कि अहंकार और ईश्वर एक ही शरीर के भीतर निवास नहीं कर सकते।
इस प्रकार कबीर ने ज्ञानमार्ग द्वारा तत्कालीन धार्मिक समाज को सही दिशा दिखाई है। वे वास्तव में एक क्रांतिकारी सुधारक थे।

Teacher's Note:
a) कबीर की साखियों के आधार पर उनके समाज-सुधारक और संत रूप का मूल्यांकन करें।
b) बाह्य आडंबरों के विरोध और आंतरिक साधना के महत्व को उत्तर में प्रमुखता दें।

 

प्रश्न 9. ‘जैसा हम बोयेंगे वैसा ही पायेंगे’। पंक्ति को आधार बनाकर ‘आः धरती कितना देती है’ कविता की समीक्षा कीजिए। [12]

Answer:
कवि सुमित्रानंदन पंत ने प्रस्तुत कविता में इस सूक्ति को प्रमाणित किया है कि समाज में रहने वाला प्राणी जैसा बोएगा, वैसा ही काटेगा। अर्थात् हम अपने कर्मों का फल अवश्य पाते हैं। कवि ने अपने बचपन के एक हास्यास्पद विचार को आधार बनाकर एक महान् सत्य की ओर संकेत दिया है।
कवि पंत ने बचपन में पैसों के बीज बोकर यह आशा की थी कि पैसों के पेड़ उगेंगे और उन पैसों को पाकर वह धनी सेठ बन जाएगा। परंतु ऐसा न हो सका।
इस घटना के पचास वर्ष बाद कवि अपने आँगन की गीली मिट्टी में सेम के बीज बोता है। कवि को यह देखकर आश्चर्य होता है कि समय पाकर उन बीजों पर अंकुर निकल आते हैं जो छतरियों की तरह दिखाई देते हैं।
समय पाकर सेम की लता फैल जाती है। उन लताओं पर बहुत-सी फलियाँ लगती हैं। कवि सोचता है कि धरती हमें कितना कुछ देती है। धरती हमारी माता है जो अपने पुत्रों को बहुत कुछ देती है। उसे बालपन में यह भेद समझ नहीं आया था। इसीलिए लालच में आकर उसके गर्भ में पैसों के बीज बो दिए थे।
कवि समझाना चाहता है कि प्रकृति का अपना नियम है। धरती में हम जो कुछ बोते हैं, वैसा ही काटेंगे। परंतु पैसे बोने से वह पैसों के पेड़ नहीं उगाती क्योंकि ऐसा करना लालच व स्वार्थ का सूचक है। जब हम उसके गर्भ में अनुकूल व प्रकृति के नियम के अनुसार बीज बोते हैं तो वह हमें कितना कुछ देती है। इस प्रकार वह रत्न पैदा करने वाली सिद्ध होती है। कवि के शब्दों में-
‘रत्न प्रसविनि है वसुधा, अब समझ सका हूँ।’
कवि की मूल दृष्टि मानवतावादी है। वह अपने समाज में फैले वर्ग-भेद से व्यथित है। उसे इस बात का दुःख है कि हम अपने समाज का घृणित स्तरीकरण कर रहे हैं। इस प्रकार अपने ही जैसे मनुष्यों से घृणा करने लगते हैं। हमें धरती से शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए। वह हमें कितना कुछ देती है और बदले में हमसे कुछ भी उम्मीद नहीं रखती।
पंत का विचार है कि हमें धरती में सच्ची समता के दाने बोने हैं ताकि विषमता और असमानता के अभिशाप से मुक्ति मिले। कवि के शब्दों में
‘इसमें सच्ची समता के दाने बोने हैं।’
पंत को मानव की क्षमता पर अटूट विश्वास है। वह चाहता है कि प्रत्येक मानव अपनी इस अद्भुत क्षमता का उपयोग जन-कल्याण के लिए करे। उसका विचार है-“इसमें जन की क्षमता के दाने बोने हैं।” आज मनुष्य ममताहीन या निर्मम होता जा रहा है। अतः हमें चाहिए कि मानव की ममता के दाने बोए जाएँ ताकि उससे सुनहली फसलें उग सकें। ये फसलें मानवता की होंगी। कवि के अनुसार
“मानवता की जीवन श्रम से हँसें दिशाएँ, हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे।”
ये कुल मिलाकर कवि ने प्रकृति-चित्रण के बहाने मानवता का संदेश दिया है जिसमें स्वार्थहीन परोपकार, समता, क्षमता और ममता का व्यवहार अपनाया जाए। तभी हमारा समाज वर्गहीन घृणाहीन और सक्षम बन पाएगा क्योंकि हम जैसा समाज रूपी धरती में बीज बोएंगे, वैसा ही फल प्राप्त करेंगे।

Teacher's Note:
a) सुमित्रानंदन पंत की इस कविता के प्रकृति-प्रेम और मानवीय संवेदना के संदेश को स्पष्ट करें।
b) कर्म और फल के सिद्धांत को धरती के उदाहरण के माध्यम से समझाएँ।

 

सारा आकाश

 

प्रश्न 10.

“बाबूजी तुम मुझे अपने हाथ से जहर देकर मार डालो
मेरा गला घोट दो ......... मुझे वहाँ मत भेजो ...........॥”

 

(i) इस कथन का वक्ता कौन है.? उसका परिचय दीजिए। [1]

Answer:
प्रस्तुत गद्यांश राजेंद्र यादव कृत उपन्यास ‘सारा आकाश’ में से उद्धृत है। इस संवाद की वक्ता मुन्नी नामक स्त्री है। वह उपन्यास के नायक समर की बहन है जिसका वैवाहिक जीवन अत्यंत करुण, विपन्न, उत्पीड़क तथा घातक सिद्ध होता है। परिणाम स्वरूप उसे प्रताड़ना का बोझ न सहते हुए आत्महत्या करनी पड़ती है।

Teacher's Note:
a) मुन्नी समर की बहन है जिसके पारिवारिक जीवन की त्रासदी इस उपन्यास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
b) उसके चरित्र की विवशता को संक्षेप में स्पष्ट करें।

 

(ii) उसे कहाँ भेजा गया और क्यों? समझाकर लिखिए। [3]

Answer:
मुन्नी को अपने सुसराल में पति का उत्पीडन तथा घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता था। जब वह तंग आकर मायके आ गई तो उसका पति उसे पुनः मनाने आ गया। वह वस्तु स्थिति जानती थी जिसके कारण पुनः सुसराल नहीं जाना चाहती थी। उसे पता था कि सास के देहांत के बाद अब सुसराल में उसका पक्ष लेने वाला कोई न था।

Teacher's Note:
a) सुसराल में होने वाले अत्याचारों के कारण मुन्नी वहाँ जाने से डरती थी।
b) सामाजिक दबाव के कारण माता-पिता उसे पुनः भेजने का प्रयास करते हैं।

 

(iii) बेटी की दुर्दशा देखकर माता-पिता की क्या स्थिति थी? [3]

Answer:
मुन्नी की दुर्दशा दहेज उत्पीड़न तथा घरेलू हिंसा का जीवंत उदाहरण है। अपनी बेटी की दुर्दशा देखकर माता-पिता का दिल दहलता जाता था। परन्तु सामाजिक रीति को निभाते हुए उन्होंने उसे दूसरी बार उसके नारकीय सुसराल में भेजने का निर्णय ले लिया।

Teacher's Note:
a) माता-पिता की लाचारी और सामाजिक रूढ़ियों के बंधन को रेखांकित करें।
b) पुत्री के प्रति प्रेम और समाज के भय के द्वंद्व को स्पष्ट करें।

 

(iv) उपन्यास के आधार पर तत्कालीन नारी की दशा का वर्णन कीजिए। [5]

Answer:
प्रस्तुत उपन्यास एक यथार्थवादी उपन्यास है जिसमें मुख्यतः नारी पर होने वाले अनुदार अत्याचारों का चित्रांकन हुआ है। समर की पत्नी प्रभा और बहन मुन्नी नामक दो नारियों का जीवन तत्कालीन समाज की भेदभाव भरी दृष्टि तथा उत्पीड़क व्यवहार की ओर संकेत करता है। प्रभा को न केवल दहेज के लिए ताने सुनने पड़ते हैं बल्कि पति के दुर्व्यवहार (पूर्वाद्ध भाग में) का भी सामना करना पड़ता है। उसकी सास व भाभी उत्पीड़क पात्रों के रूप में स्थित हैं। दूसरी ओर मुन्नी का करुण और त्रासद जीवन तत्कालीन पुरुष की लंपट तथा अमानवीय विचारधारा का प्रतीक है। यहाँ उपन्यासकार की दृष्टि नारी के प्रति संवेदना प्रकट करती दिखाई देती है।

Teacher's Note:
a) मध्यवर्गीय समाज में महिलाओं की स्थिति, दहेज प्रथा और घरेलू हिंसा को उत्तर का आधार बनाएँ।
b) प्रभा और मुन्नी के पात्रों के माध्यम से तत्कालीन नारी की विवशता को समझाएँ।

 

प्रश्न 11. समर का मन आत्म-ग्लासि से कब भर गया और क्यों? समझाकर लिखिए। [12 1/2]

Answer:
समर प्रसिद्ध उपन्यासकार राजेंद्र यादव कृत यथार्थवादी उपन्यास ‘सारा आकाश’ का नायक है। उपन्यासकार ने उसका चरित्र दो भागों में चित्रित किया है। उपन्यास के प्रथम आधे चरण में समर एक दम्भी पुरुषप्रधान व नारी उत्पीड़क दृष्टि का प्रतीक बनकर आता है। उपन्यास के दूसरे चरण में उसकी दृष्टि सहिष्णुअनुशासित, तर्कशील, पत्नी-प्रेमी और न्यायसंगत व्यक्ति का उदाहरण प्रस्तुत करती है। समर एक संवेदनशील युवक है। वह पत्नी के प्रति होने वाले संयुक्त परिवार के दुर्व्यवहार व घरेलू हिंसा को निष्पक्ष होकर सोचता है, तो एकदम बदल जाता है। प्रभा की सहिष्णुता उसे आत्म-ग्लासि से भर देती है। उसका व्यवहार बदलने लगता है और वह पत्नी के प्रति एकदम करुण तथा प्रेमिल हो उठता है।
समर और प्रभा के बीच सुहागरात से ही मन-मुटाव चल रहा था जो लम्बा खींचता चला गया। विवाह के बहुत दिन बाद एक दिन आधी रात के समय छत पर अपनी पत्नी को रोता-सिसकता देख नायक समर का मन करुणाद्रवित हो उठता है और वह अपने निष्ठुर व्यवहार पर लज्जित हो, प्रभा से क्षमा माँगता है और दोनों के हृदय में एक-दूसरे के प्रति प्रेम तथा अपनाव की सरिता बहने लगती है।
प्रभा व समर दोनों रात-भर रो-रोकर अपने हृदय को हल्का करते रहे, एक-दूसरे के प्रति पूर्णतः आत्म समर्पित होकर एक नया जीवन बिताने की सौगंध खाते रहे। उस मिलन ने दोनों के बीच अहं की दीवार को तोड़ दिया। प्रातःकाल होते ही प्रभा तो घर का काम काज करने के लिए रसोई-घर में चली गई और समर को एक नयी अनुभूति हुई, उसे सब कुछ उल्लासमय और प्रफुल्लित दिखने लगा.
वास्तव में समर और प्रभा के बीच मन-मुटाव का मुख्य कारण असमय विवाह था। छात्रावस्था में विवाह हो जाने पर समर समस्याओं से घिर जाता है। वह आर्थिक व मानसिक दृष्टि से माता-पिता पर आश्रित था। उसकी स्वतंत्र चिंतन-धारा उसे एक अहंवादी पति बना देती है। इसी कारण उसका व्यवहार अपनी सुशील, सुंदर व सुशिक्षिता पत्नी के प्रति कठोर होता गया। वह उसकी हर उचित प्रक्रिया पर भी प्रश्न चिह्न लगाने लगा था। परन्तु इस घटना ने उसे भीतर तथा बाहर से बदल दिया।

Teacher's Note:
a) समर के चरित्र में आए सकारात्मक परिवर्तन और उसके आत्म-विश्लेषण को स्पष्ट करें।
b) असमय विवाह और पारिवारिक परिवेश की भूमिका को उत्तर में शामिल करें।

 

प्रश्न 12. ‘सारा आकाश’ उपन्यास के आधार पर नायिका प्रभा का चरित्र-चित्रण कीजिए। [12]

Answer:
प्रभा उपन्यासकार राजेंद्र यादव कृत यथार्थवादी उपन्यास ‘सारा आकाश’ की नायिका है। उसके चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं-
1. शिक्षित, सुसंस्कृत एवं सुशील- उपन्यासकार ने प्रभा को एक शिक्षिता युवती के रूप में दिखाया है। जिस काल का यह उपन्यास है, उस काल में प्रभा का मैट्रिक पास होना अत्यंत महत्व रखता है। उस समय इतनी पढ़ी-लिखी लड़की मिलना कठिन था क्योंकि प्रायः मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय लोग अपनी कन्याओं को शिक्षा देने के विरोधी होते थे। उस समय इतनी शिक्षिता युवती सुगमता से कहीं भी नौकरी पा सकती थी।
मैट्रिक पास होने पर भी प्रभा सुसंस्कृत तथा सुशील है। उसके मन-मस्तिष्क में इस बात का कोई भी घमंड नहीं है। वह सबसे विनम्रता से पेश आती है।
2. स्वाभिमान एवं आत्मसम्मान- प्रभा में स्वाभिमान तथा आत्मसम्मान की भावना भरपूर है। सुहागरात से ही उसका ऐसा ही चरित्र उजागर होता है। जब वह मायके चली जाती है तो तब तक वापस नहीं आती जब तक सुसराल से समर उसे लेने नहीं जाता। छह महीने के बाद सुसराल लौटने पर भी उसमें अनावश्यक छोटापन दिखाई नहीं देता। जब भाभी उसे समर के कमरे में जाकर सोने को कहती है तो वह स्वाभिमान और आत्मसम्मान का परिचय देते हुए इस प्रकार कहती है-
“जबरदस्ती वहीं जाकर सो जाऊँ? मुझसे तो नहीं होता जिठानीजी कि कोई दुत्कारता रहे और पूँछ हिलाते रहो, ठोकर मारता रहे और तलुए चाटते रहो। उनके बोर्ड के इम्تحان हैं, मैं क्यों तंग करूँ? कुछ हो गया तो बाद में सब मेरा ही नाम लेंगे। हमारा यहाँ आना तो जम दिखाई दिया और तुम कहती हो कि वहीं चली जा।”
3. कार्यकुशल- प्रभा एक कार्यकुशल स्त्री है। उसका जेठ धीरज भी उसकी प्रशंसा में कहता है कि वह बहुत स्वादिष्ट रसोई पकाती है। भले ही भाभी (जेठाानी) उससे ईर्ष्या करते हुए उसकी दाल में अतिरिक्त नमक डाल कर उसे डाँट पिलवा देती है परंतु वह हारती नहीं। उसे अपनी कार्यकुशलता पर भरोसा था। यही कारण है कि उसके बाद वह काम से कभी भी पराजित नहीं हुई।
समर की उपेक्षा के बावजूद प्रभा संयुक्त परिवार की पूरी-पूरी व्यवस्था संभाल लेती है। वह घर के रख-रखाव पर पूरा ध्यान देती है। उसे प्रातः से लेकर रात ग्यारह साढ़े ग्यारह तक काम करना पड़ता है। इससे प्रभावित समर सोचता है-
“वह सब कुछ इतनी आसानी और चुपचाप करती चली जाती है, मानो मशीन हो और उसे यह सब करने में कोई कष्ट न होता हो। हर-नए काम को ऐसी स्वाभाविकता से ग्रहण करती चली जाती कि लगता ही नहीं था कि उसे करने में कहीं भी अनिच्छा का लेश या थकान है और मैं इसी पर खीझ उठता। उसके व्यवहार में कहीं अनिच्छा या थकान दिखे तो मैं अपने को उसके कष्ट से आनन्दित कर सकूं, मन में कहूँ कि “कहहो बच्ची जी, अब कैसा लग रहा है?”।”
4. सहिष्णु- प्रभा इतनी सहिष्णु है कि अपने ऊपर किया गया हर प्रकार का दुर्व्यवहार चुपके से सह जाती है। उसमें सहनशीलता की चरम सीमा दिखाई देती है। उसे कभी किसी से ऊँचा बोलते नहीं सुना। न ही वह किसी आवश्यक वाद-विवाद में पड़ती है। दाल में नमक का प्रसंग, नामकरण के उत्सव पर गणेश की मूर्ति की घटना आदि उसे तनिक भी विचलित नहीं करतीं। वह सब प्रकार की गाली-गलौज और पति का तमाचा तक सह जाती है।
प्रभा की सहिष्णुता का प्रमाण यह है कि विपरीत व्यवहार पर तुल्ला हुआ समर भी पिघल जाता है। वह उसकी सहनशीलता से प्रभावित होकर इस प्रकार सोचता है-
“जब भी इस बात का ध्यान आता कि एक निरीह बेकसूर किसी की लाड़ प्यार से पाली गई इकलौती लड़की को लाकर मैंने क्या-क्या अत्याचार नहीं किए, कौन-कौन से कहर उस पर नहीं तोड़े, उसे कितनी-कितनी यातनाएँ नहीं दी, और उसका यहाँ था ही कौन जिससे अपना दुखड़ा रोती, तो हजारों बरछे-जैसे एक साथ ही छाती में आ लगते और रुलाइ दुगुनी चौगुनी होकर उमड़ने लगती। उस बेचारी के पास धीरे-धीरे घुटने के सिवा चारा ही क्या था? उस क्षण तो ऐसा लगा जैसे आँसू, सिसकी, तड़प किसी में भी ऐसी शक्ति नहीं है कि हृदय के इस पश्चात्ताप और मन की इस बैचेनी को, इस छटपटाहट और मर्मान्तक पीड़ा को बाहर निकालकर ला सके।”
अम्मा की डाँट, दहेज के ताने, निरर्थक लाँछन आदि भी उसकी सहनशीलता की शीतलता को कम नहीं कर पाते।
5. मर्यादा-भावना- उपन्यासकार ने प्रभा को एक मर्यादा में रहने वाली स्त्री के रूप में चित्रित किया है। उसमें उच्छृंखलता, उदंडता या अशिष्टता का लेशमात्र भी अंश नहीं है। वह जानती है कि संयुक्त परिवारों में किस प्रकार की मर्यादा का पालन करना पड़ता है। यही कारण है कि वह न तो भाभी के कटु व्यंग्य सुनकर उत्तेजित होती है और न ही समर के प्रारंभिक व्यवहार पर। वह अम्मा के कठोर वाक्यों और दहेज के लोभ में सने शब्दों पर भी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती.
इस प्रकार लेखक ने उसे एक मर्यादित व्यवहार कुशल, सुसंस्कृत सहिष्णु परन्तु तर्कशील नारी के रूप में दिखाया है।

Teacher's Note:
a) प्रभा के चरित्र की सहनशीलता, बुद्धिमत्ता और स्वाभिमान उसके व्यक्तित्व के मजबूत पहलू हैं।
b) उपन्यास में उसके संघर्षपूर्ण जीवन और आदर्श चरित्र का संतुलित मूल्यांकन करें।

 

आषाढ़ का एक दिन

 

प्रश्न 13.

“यह लोकनीति है मैं तो कहूँगा कि लोकनीति और मूर्खनीति दोनों का एक ही अर्थ है।”

 

(i) उपर्युक्त कथन कौन, किससे और कब कह रहा है? [17]

Answer:
प्रस्तुत कथन सुप्रसिद्ध नाटककार मोहन राकेश कृत ऐतिहासिक नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ में से उद्धृत है। इसका वक्ता मातुल् है। वह कालिदास का मामा है। यह कथन उसने तब कहा, जब वह अपनी बहन अंबिका से कालिदास के विचारों पर टिप्पणी कर रहा था।

Teacher's Note:
a) वक्ता (मातुल्) और श्रोता (अंबिका) के बीच के संवाद के संदर्भ को स्पष्ट करें।
b) कालिदास के उज्जैनी जाने के निर्णय पर मातुल् की प्रतिक्रिया को दर्शाया गया है।

 

(ii) उपर्युक्त वाक्य किस सन्दर्भ में कहा गया है?

Answer:
प्रस्तुत वाक्य मातुल् द्वारा कालिदास के उज्जयिनी न जाने के निर्णय के प्रसंग में कहा गया है। जब अंबिका बताती है कि कालिदास अपने स्वाभिमान के कारण राजकीय सम्मान नहीं ग्रहण करना चाहता क्योंकि यह क्रय-विक्रय की नीति है, तो मातुल् उक्त टिप्पणी करता है। वह इसे लोक-नीति न कहकर मूर्खनीति घोषित करता है।

Teacher's Note:
a) कालिदास के वैराग्य और स्वाभिमान के विरुद्ध मातुल् के व्यावहारिक दृष्टिकोण को समझाएँ।
b) राज्याश्रय और कला के संबंध पर नाटक के दृष्टिकोण को स्पष्ट करें।

 

(iii) वक्ता का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

Answer:
वक्ता मातुल् कालिदास का मामा है। वह पशु पालने का व्यवसाय करता है। उसे साहित्य की कोई समझ नहीं है। वह चाहता है कि जैसे-वैसे कालिदास को पद और प्रतिष्ठा मिल जाए। वह एक व्यवहार-कुशल सामाजिक है जो अवसर का लाभ उठाना चाहता है। उसे यश की चाह है। वह एक चाटुकार और स्वार्थी चरित्र वाला व्यक्ति है। राज्याश्रय का कटु अनुभव उसे धरती पर लाकर खड़ा कर देता है।

Teacher's Note:
a) मातुल् अवसरवादी और व्यावहारिक चरित्र का प्रतीक है।
b) कला के प्रति उसकी व्यावसायिक सोच का नाटक में विशेष महत्व है।

 

(iv) ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक का उद्देश्य लिखिए।

Answer:
‘आषाढ़ का एक दिन’ নামক नाटक तीन समस्याओं को लेकर चलता है। राज्याश्रय, सर्जक का अहं तथा नर-नारी संबंध। पूरे नाटक in कालिदास को केंद्र में रखकर इन्हीं तीन समस्याओं को उद्देश्य के रूप में चित्रित किया गया है।
वास्तव में नाटककार ने कालिदास के अहं को नाटक की पहली समस्या के रूप में उभारा है। नाटक में दूसरी समस्या राज्याश्रय से जुड़ी है। नाटककार यह स्थापित करना चाहता है कि राजकीय मुद्राओं से खरीदा गया साहित्यकार कभी भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए नहीं रख सकता। राजदरबार में जाते ही उसकी प्रतिभा कुंद हो जाती है। कालिदास के संदर्भ में भी यही होता है। वह अपने स्वतंत्र जीवन-दर्शन और रचनात्मक चिंतन से हाथ धो बैठता है।
तीसरी समस्या नर-नारी संबंधों के रूप में आती है। मल्लिका और कालिदास का निश्छल और निश्चल पवित्र प्रेम एक ओर रह जाता है और राज्याश्रय का प्रकोप प्रबल हो उठता है। यद्यपि राज्याश्रय में जाने की प्रेरणा स्वयं मल्लिका देती है तथापि उसके पीछे उसकी दुर्गति भी कम त्रासद नहीं है। माँ अंबिका के स्वर्गवास के बाद वह दाने-दाने को मोहताज हो जाती है तो विवशता में विलोम का आश्रय स्वीकार कर लेती है। किंतु उसके मन-मस्तिष्क पर कालिदास ही छाया रहता है। अंत में उसे अनिश्चितता के धरातल पर खड़ा देखते हैं।
राजकुमारी प्रियंगुमंजरी से कालिदास का विवाह भी इसी ओर संकेत करता है कि कालिदास के लिए प्रेम अंतिम व चरम मूल्य नहीं बन सका। इस प्रकार नाटककार ने इन तीन समस्याओं के आलोक में प्रस्तुत नाटक का ताना-बाना बुना है।

Teacher's Note:
a) नाटक के केंद्रीय विषयों (राज्याश्रय, सर्जक का अहंकार और प्रेम संबंध) का समग्र विश्लेषण करें।
b) कालिदास और मल्लिका के जीवन की त्रासदियों को रेखांकित करें।

 

प्रश्न 14. मल्लिका ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक की एक महत्वपूर्ण पात्र है, जिसके चरित्र ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। उसकी चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [12]

Answer:
मल्लिका ‘आषाढ़ का एक दिन’ शीर्षक नाटक की नायिका है। वह कालिदास की प्रेमिका है जो प्रेम प्रसंग के दुखांत को अकेले ही भोगती है। उसके चरित्र में प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. स्वतंत्र चिंतन- मल्लिका के चरित्र में सबसे बड़ी विशेषता स्वतंत्र चिंतन की है। वह कालिदास से प्रेम करती है और अपनी माँ से स्वतंत्र रूप में अपने प्रेम-प्रसंग की पैरवी करती है। वह कहती है कि उसने कालिदास के रूप में एक भावना का वरण किया है और यह वरण उसकी स्वतंत्रता को पुष्ट करता है। वह लोक-लाज की तनिक भी परवाह नहीं करती। वह कहती है-
“क्या कहते हैं वे? क्या अधिकार है उन्हें कुछ कहने का? मल्लिका का जीवन उसकी अपनी संपत्ति है।” उसका विश्वास व्यक्तिगत स्वतंत्रता में है।
2. प्रेम-भावना- मल्लिका कालिदास की प्रेमिका है। उसका प्रेम अत्यंत उज्ज्वल है। उसमें स्वार्थ भावना का लेश मात्र भी अंश नहीं है। यही कारण है कि वह उसे उज्जयिनी चले जाने की प्रेरणा देती है। कोई स्वार्थी लड़की होती तो अपने जीवन-आधार को अपने से इस प्रकार अलग होने के लिए विवश न करती।
वह अपनी माँ से अपने पवित्र प्रेम की चर्चा करते हुए कहती है-
“………. मैं जानती हूँ कि माँ का अपवाद होता है। आपके दुःख को भी जानती हूँ, फिर भी मुझे अपराध का अनुभव नहीं होता। मैंने भावना में एक भावना का वरण किया है। मेरे लिए वह संबंध और संबंधों से बड़ा है। मैं वास्तव में अपनी भावना से ही प्रेम करती हूँ, जो पवित्र, कोमल, अनश्वर है……….”
जब मल्लिका को पता चलता है कि कालिदास ने राजकुमारी प्रियंगुमंजरी से विवाह कर लिया है तो भी वह चिंतित व दुखी नहीं होती। वह तो कालिदास से पवित्र प्रेम करती है। वह शांत बनी रहती है, कहती है “……… तो इसमें दोष क्या है? ………. वे असाधारण हैं। उन्हें जीवन में असाधारण का ही संसर्ग चाहिए था……….. इसके विपरीत मुझे अपने से ग्लानि होती है, यह कि, ऐसे मैं उनकी प्रगति के मार्ग में बाधा भी बन सकती थी।”
3. स्वाभिमान- मल्लिका को नाटक में एक स्वाभिमानी युवती के रूप में दिखाया है। वह अंत तक आत्म-सम्मान को बनाए रखने का भरसक प्रयास करती है।
वह बीमार माँ के लिए विलोम द्वारा मधु भिजवाने की बात सुनकर उसे मना कर देती है, यह कह कर कि उसके घर पर्याप्त मात्रा में मधु है। वह प्रियंगुमंजरी द्वारा रखे गए घर के परिसंस्कार के प्रस्ताव को भी ठुकरा देती है। कहती है “……….. आप बहुत उदार हैं। परंतु हमें ऐसे घर में रहने का ही अभ्यास है, इसलिए हमें असुविधा नहीं होती।”
जब प्रियंगुमंजरी उसका विवाह करवाने का प्रस्ताव रखती है तो उसके अहम् को चोट लगती है। वह आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए कह उठती है कि “……… आप इस विषय में चर्चा न ही करें तो अच्छा होगा।” जाते-जाते प्रियंगुमंजरी उसे कुछ वस्त्र और स्वर्ण-मुद्राएँ भिजवाती हैं, जिन्हें मल्लिका आदरपूर्वक लौटा देती है।
4. ममता- नाटककार ने मल्लिका में ममता व करुणा के गुण दिखाए हैं। उसकी यह करुणा और ममता उस संदर्भ में देखी जाती है जब कालिदास घायल हिरण के बच्चे को लाकर मल्लिका से कहता है कि वह उसे वहाँ इसलिए लाया है कि वहाँ उसे माँ का-सा स्नेह मिलेगा-
“मैंने कहा तुम्हें वहाँ ले चलता हूँ, जहाँ तुम्हें अपनी माँ की सी आँखें और उसका सा ही स्नेह मिलेगा ……….”
नाटक के अंत में भी उसका यही वात्सल्य का रूप दोबारा देखने को मिलता है। अपने तीव्र अंतर्द्वन्द्व के क्षणों में भी वह अपनी बच्ची को नहीं भूलती, उसे बार-बार देखने, चुप कराने अंदर जाती है और अंत में कालिदास के पीछे भागती-भागती भी उसी बच्ची के कारण रुक जाती है और उसे अपनी छाती से चिपका लेती है।
5. कर्तव्य-बोध- मल्लिका में अपने कर्तव्य के प्रति चेतना पाई जाती है। कालिदास को उज्जयिनी जाने की प्रेरणा देते समय इसी कर्तव्य को निभाती है और कहती है-
“मैं जानती हूँ कि आपके चले जाने पर मेरे अंतर को एक रिक्तता छा लेगी, और बाहर भी संभवतः बहुत सूना प्रतीत होगा। फिर भी मैं अपने साथ छल नहीं कर रही। मैं हृदय से कहती हूँ तुम्हें जाना चाहिए ……… यहाँ ग्राम प्रांतर में रह कर आपकी प्रतिभा को विकसित होने का अवकाश कहाँ मिलेगा ……….. आपको आज नई भूमि की आवश्यकता है, जो आपके व्यक्तित्व को अधिक पूर्ण बना सके ………..” इस प्रकार वह अपने कर्तव्य-बोध के मार्ग में अंधे प्रेम को बाधा नहीं बनने देती। दूसरी ओर अभावग्रस्तता के प्रकोप में विलोम की शरण को स्वीकार कर लेती है और परिवार के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करती है।
इस प्रकार नाटककार ने मल्लिका के चरित्र को एक सशक्त रूप में प्रस्तुत किया है जो अंत तक हार नहीं मानती।

Teacher's Note:
a) मल्लिका का चरित्र त्याग, प्रेम, स्वाभिमान और कर्तव्यनिष्ठा का अद्भुत संगम है।
b) नाटक में उसकी त्रासद स्थिति और मानसिक संघर्ष को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करें।

 

प्रश्न 15. मोहन राकेश द्वारा लिखित ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाट्य लेखन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। नाटक के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। [12 1/2]

Answer:
मोहन राकेश द्वारा रचित ‘आषाढ़ का एक दिन’ शीर्षक नाटक हिंदी नाटक और रंगमंच के इतिहास में एक विलक्षण स्थान रखता है। वे पहले नाटककार हैं जिन्होंने नाटक और रंगमंच का परस्पर रिश्ता जोड़ा। उन्होंने रंगमंच के अनुसार नाटय-लेखन को महत्व दिया। प्रस्तुत नाटक इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है क्योंकि देश के विभिन्न मंचों पर इसका सफल मंचन हुआ है।
मोहन राकेश के নাটकों को लिखकर और उनका मंचन देखकर स्पष्ट हो जाता है कि वे कथातंत्र और नाट्य विधा दोनों पर समान अधिकार रखते हैं। दोनों विधाओं पर उनकी गहरी पकड़ है। वे कहीं भी कथात्मकता के चक्कर में नाट्य विधा को पीछे नहीं छोड़ते। उन्होंने दोनों का समान निर्वाह किया है। वास्तव में मोहन राकेश को अपने संक्षिप्त जीवनकाल में जो ख्याति प्राप्त हुई, उसका कारण उनके नाटक ही थे- जिसके कारण वे एक युगान्तकारी नाटककार सिद्ध हुए।
संभवतः ऐसा सौभाग्य अन्य नाटककारों को प्राप्त नहीं हो सका। इनके नाटकों से कथा साहित्य में एक नवीनता के दर्शन हुए और हिन्दी रंगमंच के विकास में भारी सहायता मिली।
मोहन राकेश के नाटकों को ख्याति इसलिए भी प्राप्त हुई कि वे अपने नाटकों के मंचन से सम्बन्धित सभी बातों का विवरण देते थे। यह बात उनकी डायरी के पन्नों से स्पष्ट होती है। इन बातों से रचना-धर्मिता के प्रति उनकी समर्पण भावना का पता चलता है।
प्रस्तुत नाटक मोहन राकेश का एक ऐसा नाटक है जिसमें इतिहास को आधार बनाकर समकालीन समस्याओं की ओर प्रबल व प्रभावपूर्ण ढंग से संकेत किया गया है। हिंदी नाट्य-लेखन के क्षेत्र में यह एक ऐतिहासिक कृति है। इसमें मूल रूप से कालिदास के जीवन को आधार में लेकर साहित्य-सृजन, सृजन की स्वतंत्रता, सर्जक के स्वाभिमान और राज्याश्रय की समस्या पर विचार किया गया है। नाटक की एक और बड़ी समस्या नर-नारी संबंधों अर्थात् प्रेम-भावना को लेकर चलती है।
प्रस्तुत नाटक का नामकरण छायावादी प्रतीत होता है। वास्तव में यह नाटक भावनाओं के वरण और राज्याश्रय के कारण कुंठित स्वाभिमान के बीच मंचित होता है। नाटककार ने नाटक के प्रारंभ में भी आषाढ़ के दिन बरसते मेघों की चर्चा की है और अंत भी इसी नैसर्गिक परिवेश में होता है। नाटककार ने इसी को संकेतित करने के लिए बरसते मेघों, कड़कती चमकती बिजली आदि की योजना को प्रस्तुत किया है.
वास्तव में नाटक के मूल में जिस भावनात्मक परिवेश की आवश्यकता थी, उसे प्राकृतिक संसर्ग द्वारा ही दिखाया जा सकता था। इसलिए आषाढ़ का बरसता दिन और उसमें भीगती हुई मल्लिका को दिखाना एक सार्थक तथा उपयुक्त प्रयास है। रोमांसिकता का बोध नाटक को एक सटीक आधार दे जाता है।
नाटककार मोहन राकेश ने दिखाया है कि आषाढ़ की पहली वर्षा मल्लिका के लिए- कुछ हद तक कालिदास के लिए भी, जिस आनन्द का सन्देश लेकर आई थी, वही और उसी प्रकार की वर्षा, बादलों की गरज और बिजली की चमक उन दोनों के हर्षोल्लास को सदा सदा के लिए छीनकर, जीवन का यथार्थ का कटु आभास देकर समाप्त हो जाती है। नाटक का यह वातावरण प्रेम-भावना को सजग एवं सजीव बनाने में विशेष रूप से सहायक हुआ है।

Teacher's Note:
a) 'आषाढ़ का एक दिन' शीर्षक की प्रतीकात्मकता और प्रासंगिकता का मूल्यांकन करें।
b) प्रकृति और मानवीय भावनाओं के अंतर्संबंध को नाटक के संदर्भ में स्पष्ट करें।

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