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Detailed Sahitya Sagar Chapter 1.2 Sakhi Kavita ICSE Solutions for Class 10 Hindi
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Class 10 Hindi Sahitya Sagar Chapter 1.2 Sakhi Kavita ICSE Solutions PDF
Question क-i. निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागू पायँ।
बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियौ बताय॥
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि।
प्रेम गली अति साँकरी, तामे दो न समाहि॥
कबीर के गुरु के प्रति दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए।
Answer: कबीरदास ने गुरु का स्थान ईश्वर से श्रेष्ठ माना है। कबीर कहते है जब गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों एक साथ खडे हो तो गुरु के श्रीचरणों मे शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा रुपी प्रसाद से गोविंद का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गुरु ज्ञान प्रदान करते हैं, सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं, मोह-माया से मुक्त कराते हैं।
In simple words: कबीरदास गुरु को ईश्वर से भी बड़ा मानते हैं क्योंकि गुरु ही हमें ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं, ज्ञान देते हैं और मोह-माया से मुक्त करते हैं। इसलिए उनके चरणों में शीश झुकाना सर्वोपरि है।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में गुरु के महत्व और कबीरदास की गुरुभक्ति को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है। विस्तृत उत्तर के लिए गुरु को ज्ञानदाता और मुक्तिदाता के रूप में वर्णित करें।
Question क-ii. निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागू पायँ।
बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियौ बताय॥
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि।
प्रेम गली अति साँकरी, तामे दो न समाहि॥
कबीर के अनुसार कौन परमात्मा से मिलने का रास्ता दिखाता है?
Answer: कबीर के अनुसार गुरु परमात्मा से मिलने का रास्ता दिखाता है।
In simple words: कबीर कहते हैं कि गुरु ही वह मार्गदर्शक हैं जो हमें ईश्वर तक पहुँचने का सही मार्ग दिखाते हैं।
🎯 Exam Tip: यह एक सीधा प्रश्न है, जिसमें पद्यांश से सीधे उत्तर निकालना है। मुख्य बिन्दु 'गुरु' को रेखांकित करें।
Question क-iii. निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागू पायँ।
बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियौ बताय॥
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि।
प्रेम गली अति साँकरी, तामे दो न समाहि॥
'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।' - का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस पंक्ति द्वारा कबीर का कहते है कि जब तक यह मानता था कि 'मैं हूँ', तब तक मेरे सामने हरि नहीं थे। और अब हरि आ प्रगटे, तो मैं नहीं रहा। अँधेरा और उजाला एक साथ, एक ही समय, कैसे रह सकते हैं? जब तक मनुष्य में अज्ञान रुपी अंधकार छाया है वह ईश्वर को नहीं पा सकता अर्थात् अहंकार और ईश्वर का साथ-साथ रहना नामुमकिन है। यह भावना दूर होते ही वह ईश्वर को पा लेता है।
In simple words: इस पंक्ति का अर्थ है कि जब तक व्यक्ति के भीतर अहंकार (मैं) होता है, तब तक उसे ईश्वर (हरि) की प्राप्ति नहीं होती। अहंकार मिटते ही ईश्वर का अनुभव होता है।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में 'मैं' और 'हरि' के प्रतीकात्मक अर्थ को समझाना और अहंकार के त्याग से ईश्वर प्राप्ति के विचार को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question क-iv. निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागू पायँ।
बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियौ बताय॥
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि।
प्रेम गली अति साँकरी, तामे दो न समाहि॥
यहाँ पर 'मैं' और 'हरि' शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है?
Answer: यहाँ पर 'मैं' और 'हरि' शब्द का प्रयोग क्रमशः अहंकार और परमात्मा के लिए किया है।
In simple words: इस दोहे में 'मैं' शब्द व्यक्ति के अहंकार को दर्शाता है, जबकि 'हरि' शब्द सर्वशक्तिमान परमात्मा को इंगित करता है।
🎯 Exam Tip: यह प्रश्न शब्दावली के प्रतीकात्मक अर्थ को समझने पर आधारित है। 'मैं' को अहंकार और 'हरि' को परमात्मा से जोड़ना आवश्यक है।
Question ख-i. निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ॥
पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार॥
सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बरनाय।
सब धरती कागद करौं, हरि गुन लिखा न जाय।।
शब्दों के अर्थ लिखिए -
पाहन, पहार, मसि, बनराय
Answer:
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| पाहन | पत्थर |
| पहार | पहाड़ |
| मसि | स्याही |
| बनराय | वन |
In simple words: इस प्रश्न में दिए गए कठिन शब्दों के अर्थ इस प्रकार हैं: पाहन-पत्थर, पहार-पहाड़, मसि-स्याही, और बनराय-वन।
🎯 Exam Tip: काव्य पंक्तियों में प्रयुक्त क्षेत्रीय या अप्रचलित शब्दों के अर्थ याद रखना हिंदी साहित्य के प्रश्नों में अच्छा स्कोर करने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question ख-ii. निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥
पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार॥
सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बरनाय।
सब धरती कागद करौं, हरि गुन लिखा न जाय।।
'पाहन पूजे हरि मिले' - दोहे का भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस दोहे द्वारा कवि ने मूर्ति-पूजा जैसे बाह्य आडंबर का विरोध किया है। कबीर मूर्ति पूजा के स्थान पर घर की चक्की को पूजने कहते है जिससे अन्न पीसकर खाते है।
In simple words: इस पंक्ति में कबीरदास बाहरी दिखावे और मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए कहते हैं कि यदि पत्थरों को पूजने से ईश्वर मिलते हैं, तो मैं बड़े पहाड़ पूजूँगा। वे कहते हैं कि पत्थर की चक्की, जिससे अनाज पीसकर भोजन प्राप्त होता है, वह व्यर्थ पत्थरों से कहीं अधिक उपयोगी है।
🎯 Exam Tip: कबीर के बाह्य आडंबरों के विरोध को स्पष्ट रूप से दर्शाना और उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण को समझाना महत्वपूर्ण है। मूर्ति पूजा का खंडन मुख्य बिन्दु है।
Question ख-iii. निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ॥
पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार॥
सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बरनाय।
सब धरती कागद करौं, हरि गुन लिखा न जाय।।
“ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय” - पंक्ति में निहित व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।
Answer: शप्रस्तुत पंक्ति में कबीरदास ने मुसलमानों के धार्मिक आडंबर पर व्यंग्य किया है। एक मौलवी कंकड़-पत्थर जोड़कर मस्जिद बना लेता है और रोज़ सुबह उस पर चढ़कर ज़ोर-ज़ोर से बाँग (अजान) देकर अपने ईश्वर को पुकारता है जैसे कि वह बहरा हो। कबीरदास शांत मन से भक्ति करने के लिए कहते हैं।
In simple words: इस पंक्ति में कबीरदास मुसलमानों के ज़ोर-ज़ोर से अजान देने के तरीके पर व्यंग्य करते हैं। वे सवाल करते हैं कि क्या ईश्वर बहरे हैं जो उन्हें इतनी ऊंची आवाज़ में पुकारने की ज़रूरत है, जबकि सच्ची भक्ति तो शांत मन से होती है।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में कबीर के धार्मिक आडंबरों के प्रति व्यंग्य को पकड़ना और स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है, विशेषकर अजान की लाउडनेस और आंतरिक भक्ति के महत्व पर ध्यान केंद्रित करें।
Question ख-iv. निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ॥
पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार॥
सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बरनाय।
सब धरती कागद करौं, हरि गुन लिखा न जाय।।
कबीर की भाषा पर टिप्पणी कीजिए।
Answer: कबीर साधु-सन्यासियों की संगति में रहते थे। इस कारण उनकी भाषा में अनेक भाषाओं तथा बोलियों के शब्द पाए जाते हैं। कबीर की भाषा में भोजपुरी, अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली, उर्दू और फ़ारसी के शब्द घुल-मिल गए हैं। अतः विद्वानों ने उनकी भाषा को सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी कहा है।
In simple words: कबीरदास की भाषा कई बोलियों और भाषाओं का मिश्रण है, जिसे विद्वानों ने 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' नाम दिया है, क्योंकि वे घुमक्कड़ साधु-संतों की संगति में रहते थे।
🎯 Exam Tip: कबीर की भाषा की विशिष्टता, जिसे 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है, और इसके पीछे के कारण (विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण और साधु-संगति) को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
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ICSE Solutions Class 10 Hindi Sahitya Sagar Chapter 1.2 Sakhi Kavita
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FAQs
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