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Detailed निबंध लेखन GSEB Solutions for Class 12 Hindi
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Class 12 Hindi निबंध लेखन GSEB Solutions PDF
GSEB Std 12 Hindi Rachana निबंध-लेखन
निबंध लिखते समय ध्यान में रखने योग्य बातें :
विषय का चुनाव : निबंध के लिए दिए गए विषयों में से किसी एक विषय को सावधानी से चुन लीजिए। कुछ छात्र तुरंत ही किसी भी विषय पर निबंध लिखना शुरू कर देते हैं, लेकिन 10-12 पंक्तियाँ लिखने के बाद वे आगे लिख नहीं पाते और उस निबंध को अधूरा छोड़कर किसी और विषय पर लिखना शुरू कर देते हैं। परीक्षा की दृष्टि से ऐसा करना हानिकारक सिद्ध होता है। इसीलिए विद्यार्थियों को भलीभांति विचार करके उसी विषय पर अपनी कलम उठानी चाहिए, जिस पर लिखने के लिए उनके पास पर्याप्त सामग्री हो।
रूपरेखा : निबंध का विषय चुनने के बाद उस पर विचार करके कच्ची रूपरेखा अवश्य तैयार करनी चाहिए। रूपरेखा से निबंध की लंबाई का अनुमान लग जाएगा। यदि वह अधिक लंबी जान पड़े तो कम महत्त्व के मुद्दों (Points) को छोड़ देना चाहिए।
रूपरेखा का विस्तार : रूपरेखा भलीभांति तैयार करने के बाद ही उसके मुद्दों का क्रमशः उचित विस्तार करना चाहिए।
(अ) प्रारंभ या भूमिका : निबंध का प्रारंभ आकर्षक, स्वाभाविक और संक्षिप्त होना चाहिए। अच्छा प्रारंभ आधी सफलता का सूचक है। (Well begun is half-done.) प्रारंभ निबंध के विषय से संबंधित होना चाहिए।
प्रारंभ या भूमिका के कुछ तरीके :
- विषय की व्याख्या देकर
- विषय का महत्त्व स्पष्ट करते हुए
- वर्तमान परिस्थिति की चर्चा से ।
- किसी संबंधित प्रसंग के उल्लेख से
- किसी कहानी या संवाद से
- किसी कहावत या लोकोक्ति से
- किसी अवतरण से
- किसी काव्यपंक्ति से
(ब) मध्यभाग : निबंध का यह भाग बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इस भाग में विषय-संबंधी महत्त्वपूर्ण बातों की चर्चा करनी चाहिए।
(क) उपसंहार या अंत : अच्छे निबंध का अंत भी प्रारंभ की तरह अत्यंत स्वाभाविक हो – संक्षिप्त और स्पष्ट, आकर्षक और भावपूर्ण । इसमें पूरे निबंध का निचोड़ आ जाना चाहिए।
निम्नलिखित प्रत्येक विषय पर 150 शब्दों में निबंध लिखिए :
Question. मेरा प्रिय हिन्दी लेखक
Answer: [परिचय – साहित्य का रूप – कहानियाँ और उपन्यास - विशेषताएँ – अन्य बातें – प्रिय होने का कारण]
हिन्दी में कई महान लेखक हैं। सबकी अपनी-अपनी खासियतें हैं। उन्होंने बेहतरीन साहित्य का सृजन कर पूरे संसार में नाम कमाया है, पर इन सबमें मुझे सबसे अधिक प्यारे हैं हिन्दी कथा-साहित्य के अमर सम्राट मुंशी प्रेमचंदजी।
प्रेमचंदजी आम लोगों के जीवन के कहानीकार हैं। उन्होंने किसानों, हरिजनों और अन्य वंचितों के जीवन पर अपनी कलम चलाई। उन्होंने किसानों के दुःख, उनके जीवन-संघर्ष, उन पर जमींदारों द्वारा होनेवाले अत्याचार आदि को स्वाभाविक तरीके से पढ़े-लिखे समाज के सामने रखा। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय किसानों के अंधविश्वास, अशिक्षा, दया, प्रेम और सहानुभूति का सच्चा चित्रण किया। इस तरह प्रेमचंदजी का साहित्य भारत के ग्रामीण जीवन का दर्पण है।
प्रेमचंदजी की कहानियाँ बहुत सीधी, सरस और दिल को छूने वाली हैं। 'कफन', 'बोध', 'ईदगाह', 'सुजान भगत', 'नमक का दारोगा', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'बड़े घर की बेटी', 'दूध का दाम', 'पूस की रात' जैसे कई कहानियों में प्रेमचंदजी की स्वाभाविक और रोचक लेखन शैली के दर्शन होते हैं। उनके उपन्यास भी लाजवाब हैं। 'गोदान' तो किसानों के जीवन का बड़ा उपन्यास ही है। 'गबन' में मध्यम वर्ग के समाज का गहरा चित्रण किया गया है।
'रंगभूमि', 'सेवासदन', 'निर्मला' जैसे उपन्यासों ने प्रेमचंदजी और उनकी कला को हमेशा के लिए प्रसिद्ध कर दिया है। सचमुच, प्रेमचंदजी के साहित्य को पढ़ने से अच्छे गुण और संस्कार विकसित होते हैं। प्रेमचंदजी का चरित्र-चित्रण अद्भुत है। संवाद भी बहुत स्वाभाविक और सुंदर हैं। बोलचाल की मुहावरेदार भाषा उनकी सबसे बड़ी पहचान है। गांधीजी के विचारों का प्रेमचंदजी पर बहुत गहरा असर पड़ा है।
सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन ने उनकी रचनाओं को काफी प्रभावित किया है। प्रेमचंदजी के साहित्य में राष्ट्रीय जागरण का बड़ा संदेश है, हमारे सामाजिक जीवन के आदर्शों का निरूपण है। इसमें देशप्रेम के आदर्शों की झलक है। गुलामी का विरोध और देश को बेहतर बनाने की प्रेरणा है। उनकी कलम जाति-पाति या ऊंच-नीच के भेदभाव तथा प्रांतीयता आदि सामाजिक बुराइयों को हमेशा दूर करने का प्रयास करती रही।
साहित्य-सृजन द्वारा वे हिन्दू-मुस्लिम की एकता के लिए हमेशा कोशिश करते रहे। इस प्रकार वे साहित्यकार के साथ ही साथ एक बहुत बड़े समाजसुधारक भी थे। स्वतंत्रता-आंदोलन के दिनों में उनकी कलम ने तलवार का काम किया। लोकजीवन के ऐसे महान कथाकार और सच्चे साहित्यकार प्रेमचंदजी यदि मेरे पसंदीदा लेखक हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
In simple words: मुंशी प्रेमचंद मेरे पसंदीदा हिंदी लेखक हैं क्योंकि उन्होंने ग्रामीण जीवन, किसानों के संघर्ष और सामाजिक बुराइयों पर लिखा है। उनकी कहानियाँ सरल और मार्मिक हैं, और उनके उपन्यासों ने उन्हें अमर बना दिया है।
Exam Tip: जब किसी पसंदीदा लेखक के बारे में लिखें, तो उनकी रचनाओं, लेखन शैली और उनके विचारों के प्रभाव का उल्लेख करें।
Question. देश के प्रति युवकों का कर्तव्य
Answer: [प्रस्तावना – युवक ही देश के रक्षक - देश की प्रगति के आधार – राष्ट्र-निर्माण के अन्य कार्य – उपसंहार]
युवा देश की जान होते हैं। देश को अपने युवाओं से बहुत उम्मीदें होती हैं। इसलिए युवाओं को देश के प्रति अपने कर्तव्यों का ज्ञान होना चाहिए।
मातृभूमि की रक्षा की जिम्मेदारी युवाओं पर होती है। इसलिए युवाओं का कर्तव्य है कि वे अपनी पसंद के अनुसार जल, थल या वायुसेना में भर्ती हों। वे युद्ध कौशल में माहिर बनें। स्वतंत्रता की लड़ाई में कई युवाओं ने अपना बलिदान दिया था। भगतसिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां जैसे शहीदों ने अपने साहस और देशप्रेम से भारतवासियों में आजादी का जुनून भर दिया था।
अब देश के स्वाभिमान और गौरव की रक्षा के लिए भी युवाओं को ही आगे आना होगा। देश की प्रगति युवाओं पर निर्भर करती है। विज्ञान, कला, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में युवाओं को ही देश की जरूरतें पूरी करनी पड़ेंगी। आज हमारे देश में खाद्यान्न की कमी है। देश के कई हिस्सों में पीने के पानी की समस्या है। सड़कों की जरूरत है। बिजली उत्पादन बढ़ाना है। इन सबके लिए आधुनिक तकनीक का ज्ञान जरूरी है।
यह ज्ञान पाकर हमारे युवा इस पिछड़े देश को विकास की नई दिशाएं दिखा सकते हैं। कृषि, उद्योग, व्यापार में आधुनिक तरीके अपनाकर वे देश में प्रगति का नया उजाला ला सकते हैं। आज के जीवन में राजनीति बहुत महत्त्वपूर्ण बन गई है। देश के युवाओं को राजनीति में भाग लेकर उसे साफ-सुथरा बनाना चाहिए।
आज हमारे यहाँ राजनीति और आर्थिक क्षेत्र में बहुत भ्रष्टाचार फैला हुआ है। प्रशासन में भ्रष्ट तत्व घुस गए हैं। चुनावों में भी गड़बड़ी होती है। देश से ये सारे बुरे काम युवा ही दूर कर सकते हैं। शासन को कल्याणकारी रूप देना युवाओं के ही हाथ में है। समाज भी अपनी समस्याओं के हल के लिए युवाओं का ही मुंह देखता है।
आज जरूरत है ऐसे समझदार युवाओं की जो समाज को छोटी सोच से मुक्त करके उसे बड़ा और व्यावहारिक दृष्टिकोण दें। वे जातिप्रथा को समाप्त करें। समाज में ऊंच-नीच का भेदभाव दूर करें। वे बिना दहेज लिए शादी करने का व्रत लें और इस प्रकार देश को दहेज के राक्षस से मुक्त करें। वे सिनेमा और दूरदर्शन के माध्यम से समाज को नई सोच दें। वे गांवों में शिविरों का आयोजन करें और उनके द्वारा सामाजिक समस्याओं को सुलझाएं।
इस प्रकार युवा चाहें तो कई तरह से देश की सेवा कर सकते हैं। वे जुआ, शराब, चोरी, बेईमानी से बचें और अपनी शक्तियों का देश के विकास में सही उपयोग करें। वे राम, कृष्ण, अर्जुन जैसे वीर बनकर देश के बुरे तत्वों का नाश करें। वे बुद्ध और महावीर जैसे देश को सही रास्ते पर ले चलें और गांधी जैसे आत्मशक्ति से संपन्न बनें। वे अच्छे नेता, सेनापति, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर और कलाकार बनकर देश के विकास में अपना योगदान करें।
In simple words: युवाओं को देश की रक्षा करनी चाहिए, युद्ध कौशल सीखना चाहिए और विज्ञान, कला और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में देश की जरूरतों को पूरा करना चाहिए। उन्हें भ्रष्टाचार दूर कर राजनीति में भाग लेना चाहिए, सामाजिक बुराइयों को खत्म करना चाहिए और देश के विकास में योगदान देना चाहिए।
Exam Tip: देश के प्रति युवाओं के कर्तव्यों को बताते समय, रक्षा, शिक्षा, सामाजिक सुधार और आर्थिक विकास जैसे मुख्य बिंदुओं पर जोर दें।
Question. अब्दुल कलाम
Answer: [प्रस्तावना – अब्दुल कलाम – बचपन – पढ़ाई के लिए संघर्ष – वैज्ञानिक के रूप में – इन्सानियत और कलाम साहब – राष्ट्रपति – कार्यक्षेत्र]
भारतरत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का पूरा नाम डॉ. अबुल पकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम था। उनको मिसाइल मैन के नाम से जाना जाता है। वे भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 15 अक्तूबर 1931 को, तमिलनाडु के रामेश्वर में हुआ था। उनके पिता का नाम जैनुलाबद्दीन और माता का नाम आशियाअम्मा था। कलामजी के पिता एक नाविक थे और माता गृहिणी थीं।
कलाम साहब के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए उन्हें छोटी-सी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। कलाम साहब बचपन में समाचारपत्र बेचने का काम करते थे। बचपन में अखबार बेचने का काम आसान नहीं था, क्योंकि गांव के रेलवे स्टेशन पर ट्रेन रुकती नहीं थी। ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकती थी, जो 3-4 किलोमीटर दूर था। ट्रेन से अखबार की पेटी उस स्टेशन पर फेंक दी जाती थी।
वे चार किलोमीटर दूर चलकर जाते थे। स्कूल के दिनों में कलाम साहब सामान्य विद्यार्थी थे लेकिन नई चीजें सीखने के लिए हमेशा उत्सुक रहते थे। उनके अंदर बहुत जिज्ञासा थी और पढ़ाई पर घंटों ध्यान देते थे। मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद कलाम ने रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) में वैज्ञानिक के तौर पर भर्ती हुए। यहां रहकर ही उनके नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने प्रोटोटाइप होवर क्राफ्ट तैयार किया।
डॉ. कलाम रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन 1962 में छोड़कर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़ गए। डॉ. कलाम ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में 1963 से 1982 तक कई पदों पर काम किया। इसके बाद वे एरोडायनमिक्स से जुड़े, फिर वे थम्बा में सैटेलाइट प्रक्षेपण यान टीम के सदस्य बने, उसके बाद, एस. एल. वी के निर्देशक के रूप में काम किया।
इस योजना के तीन डिजाइन विकास और परीक्षण में उन्होंने बहुत मेहनत से काम किया। इस योजना के तहत 1980 में सफलतापूर्वक रोहिणी सैटेलाइट का प्रक्षेपण किया गया। इसकी सफलता को महत्व देते हुए 1981 में डॉ. कलाम को पद्मभूषण अवार्ड से सम्मानित किया गया। 1982 में वे फिर रक्षा अनुसंधान से जुड़ने के बाद इन्ट्रीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेन्ट प्रोग्राम को आगे बढ़ाते हुए, देश का सबसे सफल सैन्य अनुसंधान किया।
इसके अंतर्गत दस वर्षों में पांच महत्वपूर्ण कार्यों को लागू करने का लक्ष्य रखा गया। जिसमें नाग, आकाश, पृथ्वी, त्रिशूल, अग्नि जैसे प्रक्षेपास्त्रों का उत्कृष्ट विकास शामिल था। डॉ. कलाम को भारतीय रक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के कारण देश का सर्वोच्च सम्मान 'भारतरत्न' 25 नवम्बर, 1997 को दिया गया।
डॉ. कलाम की माताजी बहुत दयालु और धार्मिक स्वभाव की थीं। उनसे डॉ. कलाम प्रेरित थे। डॉ. कलाम साहब नेक-दयालु और अनुशासन का पालन करते थे। वे कुरान और भगवद्गीता दोनों का अध्ययन करते थे। उनकी आंतरराष्ट्रीय ख्याति थी। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को आगे बढ़ाकर महाशक्ति बनाना चाहते थे। वे एक अच्छे इंसान तो थे ही साथ में अच्छे लेखक भी थे।
उन्होंने कई प्रेरणादायक किताबें भी लिखी हैं। बच्चों और युवाओं में डॉ. कलाम बहुत लोकप्रिय थे। वे 'भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान' के कुलपति भी थे। 'मिसाइल मैन' कहे जानेवाले डॉ. कलाम भारत के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 तक रहे। 83 वर्ष की आयु में 27 जुलाई 2015 को उनका निधन हुआ। आज भी डॉ. कलाम को देश बहुत सम्मान से याद करता है।
In simple words: डॉ. अब्दुल कलाम 'मिसाइल मैन' के नाम से जाने जाते थे और भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति थे। उन्होंने गरीबी में अखबार बेचकर पढ़ाई की, एक महान वैज्ञानिक बने और भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह एक दयालु इंसान और प्रेरणादायक लेखक थे, जिन्हें 1997 में 'भारतरत्न' मिला।
Exam Tip: अब्दुल कलाम के जीवन पर निबंध लिखते समय, उनके बचपन के संघर्षों, वैज्ञानिक योगदानों (मिसाइल मैन), राष्ट्रपति पद और उनकी प्रेरणादायक किताबों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Question. मेरी प्रिय ऋतु
Answer: [भारत में ऋतुओं का क्रमिक आगमन – प्रिय ऋतु का परिचय - प्रिय होने का कारण -अन्य ऋतुओं से तुलना – मेरी प्रिय ऋतु और मेरा जीवन – उपसंहार]
भारत ऋतुओं का देश है। वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर इन छ: ऋतुओं का जो सुंदर क्रम हमारे देश में है, वह दूसरी जगह बहुत मुश्किल से मिलता है। हर ऋतु की अपनी सुंदरता है, अपना आकर्षण है। पर इन सभी ऋतु-सुंदरियों में मुझे वसंत ऋतु सबसे अधिक प्रिय है।
सचमुच, वसंत की दुनिया सबसे अनोखी है। शिशिर का अंत होते ही वसंत की सवारी सज-धज कर आ पहुंचती है। बागों में, वाटिकाओं में, वनों में प्रकृति वसंत के स्वागत की तैयारियां करने लगती है। कलियां अपने घूंघट खोल देती हैं, फूल अपनी सुगंध बिखेर देते हैं, भौंरे गूंज उठते हैं और तितलियां अपने चटकीले-चमकीले रंगों से ऋतुराज का स्वागत करने के लिए तैयार हो जाती हैं।
पृथ्वी के हर कण में नया आनंद, नया उत्साह, नया संगीत, नया जीवन नजर आता है। जब सारी प्रकृति वसंत में झूम उठती है, तब मेरा मन क्यों न झूमे? सचमुच, वसंत की शोभा मेरे हृदय में बस जाती है। एक ओर शीतल, धीमी, सुगंधित हवा के मीठे झोंके मन को मदहोश करते हैं, तो दूसरी ओर फुलवारियों का यौवन बूढ़ों को भी जवान बना देता है। खिलती कलियां देखकर मेरे मन की कली भी खिल उठती है।
न तो यहां गरमी की बेचैनी है, न जाड़े की ठिठुरन । एक ओर प्रकृति के रंग और ऊपर से रंगभरी होली! अबीर-गुलाल के रूप में मानो हृदय का प्रेम ही बाहर आता है। ऐसा मनभावन फागुन का वसंत मुझे प्रिय क्यों न हो? कुछ लोग वर्षा को वसंत से अच्छा मानते हैं। पर कहां वर्षा का कीचड़-पानी भरा मौसम और कहां वसंत की बहार! वह वर्षा, जो घरों को तोड़ देती है, फसलों पर पानी फेरती है, नदियों को पागल बनाकर गांव के गांव साफ कर देती है, सुखद कैसे हो सकती है?
इसी प्रकार शरद की शोभा भी वसंतश्री के सामने फीकी पड़ जाती है। वसंत, सचमुच, ऋतुराज है। अन्य ऋतुएं उसकी रानियां या दासियां ही हो सकती हैं। मैं तो वसंत को जीवन की ऋतु मानता हूं। उसका आगमन होते ही मेरा मन इंद्रधनुष-सा रंग-बिरंगा बन जाता है और मेरी कल्पना रेशमी बन जाती है। बागों में घूमने से मन नहीं भरता।
मेरी आंखों पर प्रकृति के आकर्षण का जादू छा जाता है और मेरे दिल में उमंगों का सूर्योदय होता है। कोयल के गीत मुझे कविता लिखने की प्रेरणा देते हैं। फूल मन को खिलना और होठों को हंसना सिखाते हैं। तितली फूलों को प्यार करना और भौंरे गुनगुनाना सिखाते हैं। ऐसी अनोखी और मनभावनी है मेरी प्रिय वसंत ऋतु ! मैं सालभर इसकी प्रतीक्षा करता रहता हूं।
In simple words: मुझे वसंत ऋतु सबसे ज्यादा पसंद है क्योंकि इसमें प्रकृति बहुत सुंदर और खुशहाल दिखती है। यह न तो बहुत गर्म होती है न बहुत ठंडी, और त्योहारों तथा रंगों से भरी होती है।
Exam Tip: अपनी पसंदीदा ऋतु का वर्णन करते समय, उसके प्राकृतिक सौंदर्य, मौसम की विशेषताओं और वह आपको क्यों प्रिय है, इन बिंदुओं पर विस्तार से लिखें।
Question. बाढ़ के दृश्य अथवा नदी का रौद्र रूप
Answer: [बाढ़ का कारण – बाढ़ आने पर – बाड़ के समय – बाढ़ का पानी उतर जाने के बाद - हमारा कर्तव्य]
सचमुच, बाढ़ नदी का भयानक रूप है। बहुत तेज़ वर्षा से और ऊंचे पहाड़ों पर जमी बर्फ पिघलकर बहने से तटीय-प्रदेश में बाढ़ का विनाशकारी नृत्य शुरू हो जाता है। कभी-कभी भारी वर्षा के कारण नदी के बांध टूट जाते हैं और नदी में भयानक बाढ़ आ जाती है।
बाढ़ का पानी तेज़ वेग से दहाड़ता हुआ आगे बढ़ता है। उसकी तेज़ लपेट में जो कुछ आता है, वह तुरंत खिंचा चला जाता है। जानवर रस्सियां तोड़कर भागने की कोशिश करते हैं। वे दर्दभरी आवाज़ें करते हुए भागते हैं। ऐसे समय मनुष्य की बुरी हालत की कोई सीमा नहीं रहती। कोई घर के छप्पर या पेड़ पर चढ़ जाता है, तो कोई गांव के पास यदि टीला अथवा ऊंची जगह हो तो उसकी शरण लेने दौड़ता है।
बाढ़ के भयानक वेग से नदी-किनारे पर खड़े बड़े-बड़े पेड़ पलभर में जड़ से उखड़कर गिर पड़ते हैं और प्रवाह में बहने लगते हैं। नदी किनारे बसी हुई बस्तियों के छोटे-छोटे मकान पानी में डूब जाते हैं और झोंपड़ियों का तो कोई निशान नहीं रहता! पानी का वेग और स्तर बढ़ते ही मिट्टी के कच्चे घर तुरंत गिरने लगते हैं।
'धड़ाम धड़ाम' की आवाज़ों, करुण पुकारों और हाहाकार से सारा वातावरण दुखी कर देता है। खेतों में खड़ी हुई फसलें नष्ट हो जाती हैं। बेबस इंसान अपनी जान बचाने के लिए तिनके का सहारा ढूंढते हैं। कभी-कभी कोई बहादुर उन्हें बचा लेता है, तो कभी-कभी लोग असहाय होकर देखते ही रह जाते हैं।
बहुत-से लोग ऊंचे और पक्के मकानों में आश्रय लेने की कोशिश करते हैं। पानी की धारा में पशुओं के शव तथा सांप, बिच्छू, आदि जहरीले जीवजंतु भी बहते हुए नजर आते हैं। आसपास के गांवों के लोग सहायता के लिए आ पहुंचते हैं। सरकारी तौर पर भी सहायताकार्य शुरू होता है। लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जाता है। हैलिकोप्टरों के जरिए बाढ़पीड़ित लोगों को मदद पहुंचाई जाती है। सामाजिक संस्थाएं भी सहायता के लिए आगे आती हैं।
बाढ़ के परिणामस्वरूप सैकड़ों-हजारों मनुष्य और पशु-पक्षी मौत के मुंह में चले जाते हैं। स्त्रियां और बच्चे बेसहारा हो जाते हैं। बेघर लोगों का कोई गिनती नहीं रहती। उनके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं होते, भोजन और पीने का पानी भी मुश्किल हो जाता है। गड्ढों में जमा पानी और कीचड़ को दूर करना मुश्किल हो जाता है।
रास्ते और पुल टूट जाते हैं। संचार-व्यवस्था ठप हो जाती है। बाढ़ के कारण पूरा जनजीवन खराब हो जाता है और लाखों की संपत्ति मिट्टी में मिल जाती है। जानलेवा बीमारियां फैलने लगती हैं। हमारे देश में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, नर्मदा जैसे नदियों में वर्षाऋतु में अक्सर भयंकर बाढ़ आती है। तब आसपास विनाश, हाहाकार और दुःखभरे दृश्य दिखाई पड़ते हैं। इस परिस्थिति में बाढ़पीड़ितों की भरपूर सहायता करने के अलावा बाढ़ रोकने के लिए कारगर उपाय करना बहुत जरूरी है।
In simple words: बाढ़ नदी का एक विनाशकारी रूप है जो भारी बारिश से आती है, जिससे घर, फसलें और पशु बह जाते हैं। यह लोगों के जीवन को तबाह कर देती है, इसलिए बाढ़ पीड़ितों की मदद करना और बाढ़ को रोकना महत्वपूर्ण है।
Exam Tip: बाढ़ के दृश्यों का वर्णन करते समय, कारण, प्रभावों (जनजीवन, संपत्ति, स्वास्थ्य पर) और समाधानों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question. कर्तव्यनिष्ठ सिपाही की आत्मकथा
Answer: [प्रस्तावना – जन्म – बचपन – शिक्षा – नौकरी-प्राप्ति धर्म-धन-घूस न लेना-ईमानदारी का फल-सुख]
मुझे गर्व है मेरे जीवन पर। मेरा जन्म सफल हो चुका है। मेरी आत्मकथा रंगीन नहीं, रोमांचक है, साहस से भरी है। मैं एक भूतपूर्व सिपाही! मैंने कई लड़ाइयों में हिस्सा लिया है। मेरे लिए मेरा देश ही ईश्वर है।
मेरा जन्म कांगड़ी के पहाड़ी प्रदेश में हुआ था। हमारे इलाके में खेतीबाड़ी के लायक जमीन बहुत कम है, इसलिए बहुत-से लोग सेना में भर्ती हो जाते हैं। इसीलिए हमें बचपन से ही व्यायाम की ट्रेनिंग विशेष रूप से दी जाती थी। मेरे पिताजी भी एक सिपाही थे और कई वर्षों तक सेना में रहकर उन्होंने भारतमाता की सेवा की थी। मेरे मन में भी उनकी तरह एक सैनिक बनने की इच्छा थी। युवा होते-होते मैंने घुड़सवारी, तैरना, पहाड़ पर चढ़ना आदि सीख लिया था।
आखिर एक दिन मैं देहरादून के सैनिक स्कूल में भर्ती हो गया। थोड़े दिनों में ही मैंने काफी अच्छी सैनिक-शिक्षा प्राप्त कर ली। राइफल, मशीनगन, तोप और टैंक आदि चलाने की मैंने पूरी ट्रेनिंग ली। मोटरड्राइविंग में भी मैंने कई प्रमाणपत्र प्राप्त किए। युद्ध-स्थल की कार्यवाही, फायरिंग और गोलंदाजी का काफी अनुभव प्राप्त किया।
आजादी के बाद मुझे सबसे पहले हैदराबाद की पुलिस कार्यवाही में निजाम की सेना का सामना करना पड़ा। इसके बाद कुछ वर्ष शांति से गुजरे। फिर चीन ने अचानक हमारी उत्तरी सीमा पर हमला कर दिया। उसका मुकाबला करने के लिए हमारे डिवीजन को वहां भेजा गया। बर्फीले प्रदेशों में हमने चौकियां बना ली और पड़ाव डाले। हमें आधुनिक हथियारों से सजे हजारों चीनी सैनिकों का सामना करना था।
एक बार हम कुछ सैनिक पहरा दे रहे थे, इतने में अचानक दुश्मन देश के सैनिक आ धमके। हमें प्यार से समझाकर सोने के सिक्कों से भरी थैली देना चाह रहे थे। मैंने उस दिन अपने प्राण हथेली पर रखकर उन सबका काम तमाम कर दिया। उनकी रिश्वत को ठोकर मार उनके एक सैनिक को घायल कर सारा धन लेकर वापस उनकी सीमा में फेंक दिया।
युद्धविराम के बाद अपने घर वापस लौटा। मां खुशी से पागल हो गई। पत्नी और मुन्ना बहुत खुश हुए। गांव के लोगों ने बड़े चाव से अनुभव सुने। मुझे अपनी इस वीरता के बदले भारत सरकार ने 'वीरचक्र' से सम्मानित किया। इसके बाद सन् 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में मुझे भेजा गया। उस युद्ध में मैंने बहुत वीरता दिखाई, पर मैं बुरी तरह घायल हो गया। मुझे कई महीनों अस्पताल में रहना पड़ा।
अब मैंने अवकाश पा लिया है। मैं अपने गांव में रहकर लोगों की छोटी-मोटी सेवा करता हूं। आज भी देश के लिए प्राण न्यौछावर करने की इच्छा रखता हूं। यह थी मेरी कहानी। अच्छा, तो अब मैं चलता हूं। जय हिंद! जय भारत !
In simple words: मैं एक भूतपूर्व सिपाही हूं जिसे देशसेवा पर गर्व है। बचपन से ही सेना में जाने की इच्छा थी। मैंने कई युद्ध लड़े, वीरचक्र प्राप्त किया और देश के दुश्मनों को हराया। अब सेवानिवृत्त होने पर भी देश की सेवा करना चाहता हूं।
Exam Tip: आत्मकथा लिखते समय, जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों, अनुभवों और भावनाओं को व्यक्तिगत 'मैं' के रूप में व्यक्त करें।
Question. एक देशप्रेमी की आत्मकथा अथवा एक देशभक्त की आत्मकथा
Answer: [बचपन – स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना -जेलयात्रा – स्वतंत्रता-प्राप्ति पर हर्ष – पुरस्कार और पेंशन -अंतिम इच्छा]
जी हां, मैं एक देशभक्त हूं, मैंने देश से बहुत प्रेम किया है। देशप्रेम के मार्ग के कांटों को भी फूल मानकर चला है। आज अस्सी वर्ष की कमजोर आयु में भी देश ही मेरा देवता है। दरअसल देशप्रेम मुझे विरासत में मिला है। मेरे परदादा स्वतंत्रता की देवी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में रहकर शहीद हुए थे। मेरे पिता लोकमान्य तिलक के कट्टर समर्थक थे।
बचपन से ही मुझे उनके विचारों और संस्कारों ने प्रभावित किया था। मेरी पाठ्यपुस्तक में एक कविता थी, जिसकी निम्नलिखित पंक्तियाँ हमेशा मेरे होठों पर रहती थीं “जननी का मान बढ़ाए जो, होता सपूत वह सच्चा है; जिसको स्वदेश से प्यार नहीं, उस नर से तो पशु अच्छा है!" इन्हीं पंक्तियों को गुनगुनाते जब मैं हाईस्कूल से कॉलेज में पहुंचा तो देश की गुलामी मुझे कांटे की तरह खटकने लगी।
तिलक, गोखले, रानड़े जैसे नेता जनता को स्वतंत्रता की प्रेरणा दे रहे थे। देश के लोग गुलामी की बेड़ियां तोड़ने के लिए बेचैन थे। गांधीजी के नेतृत्व ने स्वतंत्रता आंदोलन में नई जान डाल दी थी। उनके सत्याग्रह के मंत्र से प्रभावित होकर मैं भी अपने कई साथियों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ा। सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह और 'भारत छोड़ो' आंदोलन में मैंने खुले दिल से भाग लिया। उनकी यादें आज भी मेरे हृदय को खुश कर देती हैं।
स्वतंत्रता के उस संघर्ष में जेल की यात्रा ही हम लोगों की तीर्थयात्रा बन गई थी। मैंने भी कई बार कारावास का स्वाद चखा। अंग्रेजों की जेलें मानवीय यातनाओं का बुरा केंद्र थीं ! मुझे और मेरे साथियों को घंटों तक बर्फ पर सुलाया जाता था। रात-रातभर सोने नहीं दिया जाता था। रहस्यों को उगलवाने के लिए हंटरों और चाबुकों से हमारी पिटाई की जाती थी। जो खाना हमें दिया जाता था, उसमें अनाज कम, कंकड़ ज्यादा होते थे। फिर भी सन् 1942 में जेलें सिनेमाघरों की तरह 'हाउसफुल' हो गई थीं!
हम लोगों के इसी त्याग-तप का यह नतीजा था कि 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। उस दिन सचमुच मैं खुशी से झूम उठा था। उस दिन को मैंने उसी तरह मनाया था जैसे लोग होली-दीवाली मनाते हैं। उस दिन के आनंद-उल्लासभरे दृश्य आज भी मेरी आँखों में बसे हुए हैं।
मैंने कभी किसी पद की इच्छा नहीं की। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मैं आदिवासियों के उद्धार में लग गया। सन् 1973 में दिल्ली बुलाकर मुझे स्वातंत्र्य सैनिक का पुरस्कार दिया गया। तबसे मुझे सरकार की ओर से पेंशन भी मिलनी शुरू हुई।
अब तो मैं तन-मन से पूरी तरह थक गया हूं। एक ओर स्वतंत्र भारत पर हृदय से गर्व और स्वाभिमान महसूस करता हूं, तो दूसरी ओर देश में फैली गरीबी, अशिक्षा, शोषण, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, आतंकवाद जैसे बुराइयों के कारण दिल टूट टूट जाता है। अब तो बस एक ही इच्छा है कि हमारा 'स्वराज' किसी तरह 'सुराज' में बदले और मरने के पहले मैं उन सपनों को सच में बदलते हुए देख लूं जो हमारे महान शहीदों ने देखे थे।
In simple words: मैं एक अस्सी वर्षीय देशभक्त हूं जिसने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और जेल यात्राएं कीं। मैंने देश की आजादी के लिए कई आंदोलनों में हिस्सा लिया और हमेशा भारत के विकास का सपना देखा।
Exam Tip: देशभक्त की आत्मकथा लिखते समय, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान, जेल के अनुभव, आजादी के बाद की भावनाएं और देश के प्रति भविष्य की आशाओं को शामिल करें।
Question. एक बाढ़पीड़ित की आत्मकथा
Answer: [परिचय -सुखमय जीवन – बाढ़ से उथल-पुथल -दर-दर की ठोकरें - अंतिम अभिलाषा]
जी हां, मैं एक बाढ़पीड़ित हूं। नदी की वे राक्षसी लहरें, उसका बढ़ता हुआ पानी आज भी इन आंखों के आगे घूम रहा है। कौन जानता था कि जो नदी हमारे गांव को अपने जल से जीवन देती थी, वही एक दिन गांव का जीवन छीन लेगी!
गांव में मेरा परिवार सबसे अधिक सुखी था। माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण मेरा लालन-पालन बड़े लाड़-प्यार से हुआ था। मेरी पांचों उंगलियां घी में थीं। मैंने सपने में भी दुःख नहीं देखा था। समय आने पर मेरा विवाह भी हो गया और रूप-गुण से संपन्न पत्नी ने मेरे घर और जीवन में और भी रोशनी भर दी। फिर वह प्यारी प्यारी भोली सूरत का चांद-सा शिशु ! खुशियों से भरा पड़ोस और मेरा वह सुखी गांव! किसी अनिष्ट की कल्पना भी कैसे हो सकती थी?
किंतु प्रकृति हमारे इस सुखी जीवन को देख न सकी। भयंकर गरमी के बाद वर्षा की शीतल बूंदें पड़ने लगीं। आषाढ़ बरसा, सावन बरसा। गांव की नदी पागल हो गई। आज तक उसने सारे गांव को अपना मीठा जल पिलाया था, पर आज वह स्वयं सारे गांव को मानो निगल जाना चाहती थी। सारा गांव नींद की बेखबर दुनिया में डूबा हुआ था। पूनम की रात थी, फिर भी बाहर भयंकर अंधेरा छा रहा था! भयंकर गर्जना के साथ मुसलाधार पानी बरस रहा था।
अचानक ज़ोर-ज़ोर से घनघोर शोर गूंज उठा। लोग उठ बैठे। मैंने बाहर आकर देखा तो नदी दरवाजे की मेहमान बनी हुई थी और घर में आने की तैयारी कर रही थी। पासपड़ोस का भी यही हाल था। अपनी जान लेकर हम सबने भागने की कोशिश की, पर भागकर जाते कहां? आखिर, छत पर चढ़ गए। मैं ऊपर से नदी की विनाशलीला देख रहा था, इतने में छत का एक हिस्सा गिरने लगा। देखते ही देखते कौन जाने क्या हो गया। इसके बाद जब मेरी आंखें खुलीं तो मैंने खुद को नगर के एक अस्पताल में पाया।
मैं तो बच गया, लेकिन नदी सबको निगल गई। अस्पताल से निकलकर मैं बाहर भटकने लगा। आंखों में मां-बाप, पत्नी तथा पुत्र के चेहरे बसे हुए थे। मैंने उनकी बड़ी तलाश की, लेकिन कुछ पता न चला। पेट के लिए मैंने दर-दर की ठोकरें खानी शुरू कीं। तभी एक दिन अखबार में पढ़ा की सरकार बाढ़पीड़ितों को काम देने का प्रबंध कर रही है। इसी सिलसिले में मुझे एक फैक्टरी में काम मिल गया।
एक शाम को फैक्टरी से लौटते समय मेरी दृष्टि एक स्त्री पर पड़ी। पास पहुंचा तो देखा कि वह लक्ष्मी है – मेरी पत्नी लक्ष्मी! हम दोनों मिलकर बड़े प्रसन्न हुए। बाद में उसने भी अपनी दुःखभरी आपबीती सुनाई। हम दोनों की आंखें आंसुओं से छलक उठीं। आज हम दोनों एक छोटे-से घर में रहते हैं और किसी तरह अपनी जिंदगी बिता रहे हैं। पर बीते दिनों की याद अब भी हमारे दिल को रुला देती है।
In simple words: मैं एक बाढ़पीड़ित हूं जिसने नदी के प्रकोप में अपना परिवार और सुखी जीवन खो दिया। बहुत संघर्ष के बाद, मैंने अपनी पत्नी को फिर से पाया और अब हम एक छोटे से घर में रहते हैं, लेकिन बाढ़ की यादें हमें अब भी दुखी करती हैं।
Exam Tip: बाढ़पीड़ित की आत्मकथा लिखते समय, घटना से पहले का सुखी जीवन, बाढ़ की त्रासदी, उसके बाद के संघर्ष और भावनात्मक प्रभाव को विस्तार से बताएं।
Question. नर्मदा नदी बोलती है...
Answer: [प्रस्तावना – जन्म और बचपन – प्रपातों में मेरी छबि - गुजरात की भाग्यरेखा – महिमा -अभिलाषा]
जी हां, आपने मुझे सही पहचाना। मैं ही नर्मदा नदी हूं। भारत की जो सात मुख्य नदियां हैं, उनमें एक मैं भी हूं। मेरी धारा में आज भी पौराणिक काल के पवित्र स्वर सुने जा सकते हैं।
मेरा जन्म मेकल पर्वतश्रेणी के अमरकंटक पर्वत पर के एक कुंड से हुआ। वहां से मैं उछलती-कूदती हुई आगे बढ़ती हूं। शाल के सुंदर पेड़ मुझे छाया देते हैं। उनके पत्ते मुझे लोरियां सुनाते हैं। उन पेड़ों के बीच बहते हुए मुझे बड़ा आनंद आता है। बड़े-बड़े पत्थरों और चट्टानों से टकराना मुझे बहुत अच्छा लगता है। मेरे दो भाई हैं-विंध्याचल और सतपुड़ा, ये सदा मेरी रक्षा करते हैं।
कुंड से सात किलोमीटर चलने के बाद मैं साहस करके प्रपात के रूप में नीचे गिरती हूं। इस प्रपात का नाम कपिलधारा है। इसके नीचे दूधधारा प्रपात है। मेरी झर-झर ध्वनि बहुत दूर तक सुनाई देती – है। धुआंधार में मेरा उज्ज्वल रूप जिसने एक बार देख लिया, वह उसे कभी नहीं भूल सकता। भेड़ाघाट में संगमरमर की नीली-पीली चट्टानें दर्शकों का मन मोह लेती हैं। यहां लोग मुझ में नौकाविहार भी करते हैं। मेरे दोनों ओर घने जंगल हैं जिनमें आदिवासियों की बस्तियां हैं। आदिवासी लोग मुझे अपनी माता मानते हैं। मैं भी उन्हें स्नेह से भर देती हूं।
बहुत दूर तक मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बहती हुई मैं गुजरात में प्रवेश करती हूं। मेरा कुल बहावमार्ग 1312 किलोमीटर का है। गुजरात में नवागाम के पास मुझ पर 1210 मीटर लंबा और 137.6 मीटर ऊंचा बांध बनाया जा रहा है। इस बांध से तैयार होनेवाले सरोवर को 'सरदार सरोवर' नाम दिया गया है। इस बांध के तैयार हो जाने पर मैं गुजरात की भाग्यरेखा बन जाऊंगी। मेरे पानी का लाभ कच्छ और सौराष्ट्र जैसे पानी की कमी वाले लोगों को मिलेगा। गुजरात के भरूच शहर के पास मैं अरबसागर में समा जाती हूं।
भारत के पौराणिक ग्रंथों में मेरी बड़ी महिमा गाई गई है। मेरे तटों पर कई ऋषि-मुनियों ने तप किया है। आज भी मेरे किनारों पर कई मंदिर हैं। इनमें ओंकारनाथ का प्रसिद्ध मंदिर भी है। बहुत से लोग मेरी परिक्रमा करते हैं। अपने प्रति लोगों का प्रेम, उनकी श्रद्धा-भक्ति देखकर मेरा हृदय गद्गद् हो उठता है। मेरी यही इच्छा है कि मैं युग-युग तक इसी तरह बहती रहूं और लोगों की सेवा करती रहूं।
In simple words: मैं नर्मदा नदी हूं, भारत की एक प्रमुख नदी। मेरा जन्म मेकल पर्वत पर हुआ, मैं कपिलधारा और दूधधारा जैसे प्रपात बनाती हूं। मेरा पानी गुजरात की भाग्यरेखा है और मैं अरबसागर में मिल जाती हूं।
Exam Tip: किसी नदी की आत्मकथा लिखते समय, उसके जन्मस्थान, मार्ग, महत्व (धार्मिक, आर्थिक) और लोगों के लिए उपयोगिता का वर्णन करें।
Question. हमारे त्योहार
Answer: [भारत और त्योहार - संस्कृति के प्रतीक – मनाने की विधि-आनंदप्राप्ति के साधन - कुछ दोष -हमारा कर्तव्य]
जीवन में त्योहार का बहुत महत्त्व है। हमारे देश में त्योहारों की योजना इस ढंग से की गई है कि प्रत्येक महीने और हर मौसम में लोग त्योहारों से आनंद और उल्लास प्राप्त कर सकें।
भारत के त्योहार भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। एक ओर दशहरा अन्याय पर न्याय की विजयघोषणा करता है, तो दूसरी ओर दीवाली यह बताती है कि हम प्रकाश के पुजारी हैं, अंधकार के नहीं। होली नृत्य और संगीत, रंग और राग का त्योहार है। रक्षाबंधन भाई-बहन के नि:स्वार्थ और पवित्र स्नेह की महिमा गाता है। इनके अतिरिक्त महाशिवरात्रि, गोकुलाष्टमी, रामनवमी, गणेश चतुर्थी जैसे त्योहारों में भी हमारी संस्कृति अपने भव्य और भिन्न-भिन्न रूपों में दिखाई देती है।
15 अगस्त, 26 जनवरी, गांधी जयंती, तिलक जयंती जैसे हमारे राष्ट्रीय त्योहार हैं। इन त्योहारों के पीछे हमारे देश का स्वर्णिम इतिहास है। लाखों शहीदों के बलिदान और अनेक महापुरुषों के त्याग की गौरवगाथा इनके साथ जुड़ी हुई है। इन त्योहारों से राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना मजबूत होती है। ये त्योहार हमें देशभक्ति और बलिदान का संदेश देते हैं।
त्योहार के दिन प्रायः स्कूल, कॉलेज, दफ्तर आदि बंद रहते हैं। प्रायः लोग घरों में मिठाई बनाते और खाते-खिलाते हैं। धार्मिक त्योहारों में लोग व्रत-उपवास रखते हैं। त्योहारों के अवसर पर घरों में सफाई और सजावट की जाती है। रोशनी की जगमगाहट से वातावरण आलोकित हो उठता है, तो कहीं संगीत-नृत्य से जिंदगी झूम उठती है। त्योहारों के अवसर पर कहीं-कहीं मेले, प्रदर्शनियां भी लगती हैं। सभी लोग कुछ समय के लिए दुःख और चिंताओं से मुक्त होकर आनंद के सागर में गोते लगाते हैं। बच्चे तो खुशी से फूले नहीं समाते ।
हमारे त्योहार आनंद और मनोरंजन के मुख्य साधन हैं। त्योहारों से लोगों को ताज़गी, स्फूर्ति तथा प्रेरणा मिलती है। धार्मिक त्योहारों से तनमन की कालिमा धुल जाती है। त्योहार जातीयता और प्रांतीयता की दीवारों को तोड़ देते हैं। वे हमारे दिलों में सहयोग और भाईचारा उत्पन्न करते हैं। इनसे हमें अन्याय और अत्याचारों से लड़कर देश में न्याय और शांति की स्थापना करने की प्रेरणा मिलती है, त्याग और तपस्या से जीवन को सुखी बनाने का सुनहरा संदेश मिलता है।
यह दुख की बात है कि आजकल कुछ लोग त्योहारों की पवित्रता को भुलाकर जुआ खेलते हैं, शराब पीते हैं और गाली-गलौज करते हैं। वे पैसा बरबाद करते हैं और कभी-कभी जरा-सी बात पर कहा-सुनी या हाथापाई भी करने लगते हैं। त्योहार का आनंद किसी भी हालत में विलासिता का पोषक नहीं होना चाहिए। त्योहार हमारे जीवन का सहारा और प्राणों का प्रकाश है, इसलिए हमें त्योहारों के महत्त्व को समझना चाहिए और उनसे संबंधित बुराइयों का त्याग करना चाहिए ।
In simple words: त्योहार भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा हैं, जो आनंद, एकता और भाईचारा लाते हैं। ये सामाजिक और धार्मिक महत्व रखते हैं, लेकिन आजकल लोग इन्हें गलत तरीके से मनाकर इनकी पवित्रता को भूल रहे हैं।
Exam Tip: त्योहारों पर निबंध लिखते समय, उनके सांस्कृतिक महत्व, मनाने के तरीकों, समाज पर प्रभाव और त्योहारों से जुड़ी समस्याओं व उनके समाधानों को शामिल करें।
Question. यदि मैं प्रधानमंत्री होता ...
Answer: [प्रधानमंत्री बनना एक सौभाग्य – जनता की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना – राजनीतिक सुधार -अन्य समस्याओं का हल -विदेश नीति – मेरा आदर्श]
किसी भी जनतंत्र देश में प्रधानमंत्री का विशेष महत्त्व होता है। मंत्रीमंडल में प्रधानमंत्री ही सबसे मुख्य होता है। उसकी दूरदर्शिता और कार्यकुशलता पर ही देश के भविष्य का आधार है। इसलिए यदि मैं अपने देश का प्रधानमंत्री होता तो अपने आपको, सचमुच, बड़ा भाग्यशाली मानता, क्योंकि देशसेवा का ऐसा अवसर शायद ही मिल सकता है।
आज हमारे देश में लाखों-करोड़ों लोगों को पेट भरने के लिए भोजन, पहनने के लिए कपड़ा और रहने के लिए घर नहीं मिलता। प्रधानमंत्री के नाते मैं सबसे पहले देश की जनता की इन प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भरसक प्रयत्न करता । मजदूरों, कारीगरों आदि के कल्याण के लिए तथा निम्न वर्ग की दशा सुधारने के लिए मैं विशेष आयोजन करता। देश के बहुमुखी विकास के लिए मैं हर संभव प्रयत्न करता।
हमारे देश में आज प्रांतवाद और जातिवाद पनप रहे हैं। राजनीतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार बढ़ गया है। रिश्वतखोरी, कालाबाजारी, तस्करी और दंगे-फसादों की कोई सीमा ही नहीं रही। यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो इन बुराइयों को दूर करने के लिए कड़े हाथों से काम लेता। किसी भी हालत में देश की एकता को बनाए रखता और देश की प्रगति के लिए जी-जान से कोशिश करता।
बेकारी और गरीबी जैसी समस्याओं को हल करने के लिए मैं छोटे-मोटे उद्योगों को प्रोत्साहन देता। निरक्षरता दूर करने के लिए उचित प्रबंध करता, भारतवासियों के स्वास्थ्यसुधार के लिए ठोस कदम उठाता, गांवों की प्रगति के लिए पंचायतों को विशेष अधिकार देता, समाजसुधारकों और ग्रामसेवकों को भी प्रोत्साहित करता। इसके अतिरिक्त देश में वैज्ञानिक शिक्षण के लिए ठोस आयोजन करता।
मैं भारत का प्रधानमंत्री बनकर सभी देशों के साथ सहयोग और मित्रता का व्यवहार रखता और गुटबंदी से अलग रहता। परमाणुशस्त्रों पर विश्वव्यापी प्रतिबंध लगवाने का पूरा समर्थन करता। मैं विद्यालयों में फौजी तालीम अनिवार्य कराता और सुरक्षा की दृष्टि से देश को आत्मनिर्भर बनाता। जहां तक हो सके, युद्ध से दूर रहता, फिर भी अन्यायपूर्ण आक्रमणों का मुंहतोड़ जवाब देता। भुज-बल और चरित्र-बल दोनों के समन्वय से देश को ऊंचा उठाने का प्रयत्न करता।
मैं अपनी सेवा और कर्तव्यनिष्ठा से देशवासियों के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता। मैं विरोध पक्षों के दृष्टिकोण को समझने की पूरी कोशिश करता और देश की समस्याओं को हल करने के लिए उनका भी सहयोग लेता। मेरे मंत्रीमंडल के सदस्यों को मैं उनकी योग्यता के अनुसार उचित जिम्मेदारी सौंपता। उन सबके प्रति मेरा व्यवहार सहानुभूतिपूर्ण और निष्पक्ष होता, फिर भी किसी तरह का भ्रष्टाचार मैं बर्दाश्त न करता। प्रधानमंत्री के नाते मेरा लक्ष्य देश को हर तरह से सुखी, समृद्ध और शक्तिशाली बनाना होता। काश! मैं अपनी अभिलाषाओं को पूरा कर पाऊं !
In simple words: अगर मैं प्रधानमंत्री होता, तो मैं सबसे पहले गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा जैसी समस्याओं को हल करता। मैं भ्रष्टाचार खत्म करता, देश की एकता बनाए रखता और विज्ञान व रक्षा में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता।
Exam Tip: ऐसे कल्पनाशील निबंधों में, स्पष्ट रूप से अपनी प्राथमिकताएं, सुधारों के लिए योजनाएं और देश के प्रति अपनी दूरदृष्टि बताएं।
Question. भारतीय किसान
Answer: [प्रस्तावना – खेतीप्रधान देश – राज्य – वातावरण की अनिश्चितता - खेती की उपयोगिता -किसान का कार्यभार - किसान की चिंता]
किसान श्रम, सेवा और त्याग की साक्षात् मूर्ति है। फटे-पुराने कपड़े, दुबला-पतला शरीर और नंगे पैर उसके दीन-हीन जीवन की कहानी सुनाते हैं। वह हमारा अन्नदाता कहा जाता है, फिर भी उसकी झोपड़ी में अक्सर गरीबी का ही साम्राज्य रहता है!
किसान बड़े सवेरे हल-बैल लेकर अपने खेत में चला जाता है और दिनभर वहां खेती के काम में जुटा रहता है। दोपहर तक लगातार वह परिश्रम करता है। भोजन और थोड़ा आराम करके वह काम में लगता है और शाम तक सख्त मेहनत करता है। वैशाख-जेठ की कड़ी धूप पड़ रही हो, तब भी किसान अपने प्यारे बगीचे (खेत) को अपने खून से (पसीने से) सींचता रहता है।
भयंकर शीत में या दिल दहला देनेवाली बिजली की कड़कड़ाहट और वर्षा की झड़ियों में भी वह अपने काम में लगा रहता है। इस कठोर श्रम के बाद भी जब भाग्यदेवता उस पर प्रसन्न नहीं होते तो उसे मन मसोसकर रह जाना पड़ता है। भारतीय किसान का रहन-सहन बड़ा सीधा-सादा और सरल होता है। एक छोटी-सी झोपड़ी में या मिट्टी से बने कच्चे मकान में वह अपने परिवार के साथ रहता है।
उसे जीवनोपयोगी वस्तुएं भी पर्याप्त मात्रा में नहीं प्राप्त होती. फिर भी वह संतोष से अपना जीवन बिताता है। उसके जीवन में आए दिन बदलते हुए फैशन का नाम तक नहीं होता। वह तो प्रकृति के पालन में ही पलता है। साहस और आत्मसम्मान की उसमें कमी नहीं। परिश्रम और सेवा का तो वह अवतार ही है। वह दानधर्म करने में कोई कसर उठा नहीं रखता। वह खुले दिल से आतिथ्य करता है।
हमारे अधिकांश किसान अशिक्षित और अंधविश्वासी हैं। भूत-प्रेत और जादू-टोने पर उसका अटूट विश्वास रहता है। मृत्युभोज, विवाह आदि में अपने खून की कमाई को पानी की तरह बहा देना वह अपना गौरव समझता है, लकीर का फकीर जो ठहरा । इस तरह बेशुमार खर्च करने के कारण वह साहूकारों एवं जमींदारों के चंगुल में फंसा रहता है।
ललितकलाओं और उद्योगों में रुचि न होने से वर्ष में कई मास तो वह हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। ताड़ी, भांग, तंबाकू और शराब जैसे नशीली चीजों का सेवन करके कभी-कभी वह अपने सोने के संसार में आग लगा देता है। देश को आजादी मिलने के बाद हमारे किसानों की दशा में काफी सुधार हुआ है। आज वे भले ही गरीब हों, पर लाचार नहीं हैं। अब उन्हें खेती के नए तरीके सिखाए जा रहे हैं।
सरकार भी उनको उत्तम बीज, रासायनिक खाद और मशीन खरीदने के लिए भरपूर सहायता दे रही है। उन्हें सेठ-साहूकारों और जमींदारों के पंजे से छुड़ाने की भी भरसक कोशिश हो रही है। ग्रामपंचायतों की स्थापना उनके जीवन को बड़ी तेजी से बदल रही है। सचमुच, कृषिप्रधान भारत में किसान का बड़ा महत्त्व है। जिस दिन किसान सुख से झूमेगा, उस दिन भारत का भाग्य मुस्कराएगा। जय किसान!
In simple words: भारतीय किसान बहुत मेहनती है लेकिन फिर भी गरीबी में रहता है, अक्सर अनपढ़ और अंधविश्वासी होता है। सरकार अब उन्हें नए तरीके और सहायता दे रही है ताकि उनका जीवन बेहतर हो सके।
Exam Tip: किसान पर निबंध लिखते समय, उसके कठिन जीवन, संघर्ष, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और सरकार द्वारा किए जा रहे सुधारों पर प्रकाश डालें।
Question. मातृप्रेम
Answer: [मां का जीवन में स्थान -मातृस्नेह -माता के प्रेम का प्रभाव – त्याग और बलिदान की मूर्ति -बालक में संस्कार सींचन - इतिहास प्रसिद्ध उदाहरण-कृष्ण, शिवाजी-मातृप्रेम ईश्वर तुल्य]
जननी या मां शब्द का उच्चारण करते ही आंखों के सामने एक ऐसी दिव्य मूर्ति खड़ी हो जाती है, जिसकी माया-ममता का कोई अंत नहीं; जिसकी गोद में बैठने का सुख तीनों लोकों के राज्य-सिंहासन पर बैठने के सुख से भी बढ़कर है।
माता का स्नेह स्वाभाविक होता है। पशु-पक्षियों में भी अपार मातृप्रेम के अनेक उदाहरण मिलते हैं। बंदरिया अपने बच्चे को सदा अपने पेट से चिपकाए रहती है। बिल्ली अपने बच्चे को मुंह में दबाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाती है, पर बच्चे के शरीर पर अपने दांत की एक खरोंच तक नहीं पड़ने देती। कंगारू पेट की थैली में ही अपने बच्चे को रखता है। गौरैया स्वयं भूखी रहकर भी अपने बच्चे को चुगाती है। यही नहीं, कई बार पशु-पक्षी अपने बच्चों की रक्षा के लिए अपनी जान तक दे देते हैं।
मातृप्रेम की तुलना में संसार के सारे प्रेम और रिश्ते-नाते फीके पड़ जाते हैं। मां बच्चे की मुस्कराहट को देखकर स्वर्गीय सुख का अनुभव करती है। जब बच्चा रोता, बिलखता है या कभी ठोकर खाकर भूमि पर गिर पड़ता है, तब मां उसे कितने दुलार से चूमकर उठाती है और उसका मन बहलाती है। चाहे बच्चा निकम्मा, कुरूप, मूर्ख, मंद बुद्धिवाला, अपाहिज, अंधा तथा गूंगा ही क्यों न हो, फिर भी उसके प्रति माता के प्रेम में कभी कमी नहीं आती। माता जिस प्रकार सुंदर, होनहार बच्चे का पालनपोषण करती है, उसी प्रकार निकम्मे बच्चे का भी।
बच्चे के रोगग्रस्त होने पर माता उसकी देखभाल में दिन-रात एक कर देती है। पिता का स्नेह बहुधा बदले में कुछ पाने की आशा रखता है। वह पुत्र को इसलिए पालता-पोसता और पढ़ाता-लिखाता है कि बुढ़ापे में वह घर की जिम्मेदारी संभाल ले और उसकी सेवा करे। पुत्र निकम्मा या कपूत निकले तो पिता उसे घर से निकाल देना चाहता है या उसकी शिक्षा-दीक्षा में पैसा खर्च करने से साफ इन्कार कर देता है। लेकिन माता कभी ऐसा नहीं सोचती क्योंकि वह ममता की मूरत जो ठहरी।
माता के नि:स्वार्थ और स्वाभाविक प्रेम से बच्चे में अनेक सद्गुणों का विकास होता है। माता के सदाचरण, सद्भाव और सत् प्रवृत्ति की अमिट छाप बालक के मन पर पड़ती है। माता का स्नेह – ही बालक को सच्चा मनुष्य बना सकता है। माता का एक बार का प्रोत्साहन ही ध्रुव के लिए ध्रुव-पद की प्राप्ति का कारण बन गया था।
यदि जीजाबाई न होती तो छत्रपति शिवाजी भी वीर न होते। मोहन को महात्मा गांधी बनानेवाली भी उनकी माता पुतलीबाई ही तो थी। सचमुच, वात्सल्यमूर्ति माताओं ने अनेक नररत्नों को जन्म दिया है। पुत्र कुपुत्र बन सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं बनती। सचमुच, वात्सल्यमयी माता का स्नेह अनुपम है।
In simple words: मातृप्रेम अतुलनीय होता है, जो पशु-पक्षियों में भी दिखता है। माता बिना किसी स्वार्थ के अपने बच्चे की देखभाल करती है, चाहे बच्चा कैसा भी हो। यह प्रेम बच्चे में अच्छे संस्कार डालता है और उसे महान बनाता है, जैसा कि शिवाजी और गांधी के उदाहरणों से दिखता है।
Exam Tip: मातृप्रेम पर निबंध में, मां के निस्वार्थ प्रेम, उसके त्याग, बच्चे के विकास में भूमिका और ऐतिहासिक उदाहरणों को शामिल करना चाहिए।
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