Get the most accurate UP Board Solutions for Class 9 Social Science Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति here. Updated for the 2026 27 academic session, these solutions are based on the latest UP Board textbooks for Class 9 Social Science. Our expert-created answers for Class 9 Social Science are available for free download in PDF format.
Detailed Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति UP Board Solutions for Class 9 Social Science
For Class 9 students, solving UP Board textbook questions is the most effective way to build a strong conceptual foundation. Our Class 9 Social Science solutions follow a detailed, step-by-step approach to ensure you understand the logic behind every answer. Practicing these Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति solutions will improve your exam performance.
Class 9 Social Science Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति UP Board Solutions PDF
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
Question 1. रूस के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालात 1905 ई. से पहले कैसे थे?
अथवा
1905 ई. से पूर्व रूस की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक दशाओं का वर्णन कीजिए।
Answer: 19वीं शताब्दी में लगभग समस्त यूरोप में महत्त्वपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए थे। इनमें कई देश गणराज्य थे, तो कई संवैधानिक राजतंत्र। सामंती व्यवस्था समाप्त हो चुकी थी और सामंतों का स्थान नए मध्य वर्ग ने ले लिया था। परन्तु रूस अभी भी 'पुरानी दुनिया में जी रहा था। यह बात रूस की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक दशा से स्पष्ट हो जाएगी -
1. 1905 ई. से पूर्व रूस की सामाजिक और आर्थिक स्थिति-
(i) किसानों की शोचनीय स्थिति- रूस में किसानों की स्थिति अत्यन्त शोचनीय थी। वहाँ कृषि-दास प्रथा अवश्य समाप्त हो चुकी थी, लेकिन किसानों की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ था। उनकी कृषि जोतें बहुत ही छोटी थीं और खेती को विकसित तरीके से करने के लिए उनके पास पूँजी का अभाव था। इन छोटी-छोटी जोतों को पाने के लिए भी उन्हें अनेक दशकों तक मुक्ति कर के रूप में बड़ी कीमत चुकानी पड़ती थी।
(ii) श्रमिकों की हीन दशा- औद्योगिक क्रांति के कारण रूस में बड़े-बड़े पूँजीपतियों ने अधिक मुनाफा कमाने की इच्छा से मजदूरों का शोषण करना आरम्भ कर दिया। वे उन्हें कम वेतन देते थे तथा कारखानों में उनके साथ बुरा व्यवहार करते थे। यहाँ तक कि बच्चों व स्त्रियों के जीवन से भी खिलवाड़ करने में वे कभी नहीं चूकते थे। ऐसी अवस्था से बचने के लिए मजदूर एक होने लगे। किन्तु 1900 ई. में इन पर हड़ताल करने व संघ बनाने पर भी रोक लगा दी गई। उन्हें न तो कोई राजनीतिक अधिकार प्राप्त थे और न ही उन्हें सुधारों की कोई आशा थी। ऐसे समय में उनके पास मरने अथवा मारने के अलावा और कोई चारा नहीं था।
यूरोप के देशों की तुलना में रूस में औद्योगीकरण बहुत देर से शुरू हुआ। इसीलिए वहाँ के लोग बहुत पिछड़े हुए थे। रूस में उद्योग-धन्धे लगाने के लिए पूँजी का अभाव होने के कारण विदेशी पूँजीपति रूस के धन को लूटकर स्वदेश पहुँचाते रहे। सन् 1904 मजदूरों के लिए बहुत बुरा था। आवश्यक वस्तुओं के दाम बहुत बढ़ गए। मजदूरी 20 प्रतिशत घट गयी। कामगार संगठनों की सदस्यता शुल्क नाटकीय तरीके से बढ़ जाता था।
2. रूस की राजनीतिक स्थिति-रूस की राजनीतिक स्थिति 1905 ई. से पूर्व अत्यन्त चिंताजनक थी। रूस में जार का निरंकुश शासन था जिसमें जनता 'पुरानी दुनिया की तरह रह रही थी क्योंकि वहाँ पर अभी तक यूरोप के अन्य देशों की भाँति आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन नहीं हो रहे थे। रूस के किसान, श्रमिक और जनसाधारण की हालत बड़ी खराब थी। रूस में औद्योगीकरण देरी से हुआ। सारा समाज विषमताओं से पीड़ित था। राज्य जनता को कोई अधिकार देने को तैयार नहीं था क्योंकि वह दैवी सिद्धान्त में विश्वास रखता था। जार और उसकी पत्नी बुद्धिहीन और भोग-विलासी थे। वह जनता पर दमनपूर्ण शासन रखना चाहता था।
In simple words: 1905 से पहले रूस में सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ व्याप्त थीं, जिसमें किसानों और मजदूरों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। राजनीतिक रूप से, जार का निरंकुश शासन था, जो जनता को कोई अधिकार नहीं देता था, जिससे असंतोष बढ़ता जा रहा था।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में 1905 से पूर्व रूस की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों का विस्तृत वर्णन करना महत्वपूर्ण है, जिसमें किसानों, मजदूरों और जार के शासन की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डाला जाए।
Question 2. 1917 ई. से पहले रूस की कामकाजी आबादी यूरोप के बाकी देशों के मुकाबले किन-किन स्तरों पर भिन्न थी?
अथवा
1917 ई. से पहले रूस की श्रमिक जनसंख्या यूरोप के अन्य देशों की श्रमिक जनसंख्या से किस प्रकार भिन्न थी?
Answer: रूस की कामकाज करने वाली जनसंख्या यूरोप के अन्य देशों से 1917 ई. से पहले भिन्न थी। ऐसा इसलिए क्योंकि सभी रूसी कामगार कारखानों में काम करने के लिए गाँव से शहर नहीं आए थे। इनमें से ज्यादातर गाँवों में ही रहना पसन्द करते थे और शहर में काम करने के निमित्त रोज गाँव से आते और शाम को वापस लौट जाते थे। वे सामाजिक स्तर एवं दक्षता के अनुसार समूहों में बँटे हुए थे और यह उनकी पोशाकों से परिलक्षित होता था। धातुकर्मी अपने को मजदूरों में खुद को साहब मानते थे। क्योंकि उनके काम में ज्यादा प्रशिक्षण और निपुणता की जरूरत रहती थी तथापि कामकाजी जनसंख्या कार्य स्थितियों एवं नियोक्ताओं के अत्याचार के विरुद्ध हड़ताल के मोर्चे पर एकजुट थी।
अन्य यूरोपीय देशों के मुकाबले में रूस की कामगार जनसंख्या जैसे कि किसानों एवं कारखाना मजदूरों की स्थिति बहुत भयावह थी। ऐसा जार निकोलस द्वितीय की निरंकुश सरकार के कारण था जिसकी भ्रष्ट एवं दमनकारी नीतियों से इन लोगों से उसकी दुश्मनी दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी। कारखाना मजदूरों की स्थिति भी इतनी ही खराब थी। वे अपनी शिकायतों को प्रकट करने के लिए कोई ट्रेड यूनियन अथवा कोई राजनीतिक दल नहीं बना सकते थे। अधिकतर कारखाने उद्योगपतियों की निजी संपत्ति थे।
वे अपने स्वार्थ के लिए मजदूरों का शोषण करते थे। कई बार तो इन मजदूरों को न्यूनतम निर्धारित मजदूरी भी नहीं मिलती थी। कार्य घण्टों की कोई सीमा नहीं थी जिसके कारण उन्हें दिन में 12-15 घण्टे काम करना पड़ता था। उनकी स्थिति इतनी दयनीय थी कि न तो उन्हें राजनैतिक अधिकार प्राप्त थे और न ही सन् 1917 की रूसी क्रांति की शुरुआत से पहले किसी प्रकार के सुधारों की आशा थी।
किसान जमीन पर सर्फ के रूप में काम करते थे और उनकी पैदावार का अधिकतम भाग जमीन के मालिकों एवं विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों को चला जाता था। कुलीन वर्ग, सम्राट तथा रूढ़िवादी चर्च के पास बहुत अधिक संपत्ति थी। ब्रिटेन में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान किसान कुलीनों का सम्मान करते थे और उनके लिए लड़ते थे किन्तु रूस में किसान कुलीनों को दी गई जमीन लेना चाहते थे। उन्होंने लगान देने से मना कर दिया और जमींदारों को मार भी डाला। तत्कालीन रूस के किसान अपनी कृषि भूमि एकत्र कर अपने कम्यून (मीर) को सौंप देते थे और किसानों को कम्यून उस कृषि भूमि को प्रत्येक परिवार की आवश्यकता के अनुसार बाँट देता था, जिससे उस कृषि भूमि पर सुगमता से कृषि की जा सके।
In simple words: 1917 से पहले रूस की कामकाजी आबादी यूरोप के अन्य देशों से भिन्न थी क्योंकि यहाँ के मजदूर ग्रामीण क्षेत्रों से आते थे और सामाजिक समूहों में बँटे हुए थे। उनकी कार्यदशाएँ अत्यंत खराब थीं, उन्हें न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती थी और राजनीतिक अधिकार भी नहीं थे, जबकि किसान जमीन का स्वामित्व चाहते थे और अक्सर विद्रोह करते थे।
🎯 Exam Tip: रूस की कामकाजी आबादी और यूरोपीय देशों की आबादी के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए सामाजिक संरचना, कार्यदशाओं, राजनीतिक अधिकारों और कृषि व्यवस्था के बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 3. 1917 ई. में जार का शासन क्यों खत्म हो गया?
Answer: जार की नीतियों के प्रति बढ़ते जन असन्तोष के कारण सन् 1917 में जार के शासन का अंत हो गया। जार निकोलस द्वितीय ने रूस में राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगा दी, मतदान के नियम परिवर्तित कर दिए तथा अपनी सत्ता के विरुद्ध उठे जन आक्रोश को निरस्त कर दिया। रूस में युद्ध तो अत्यधिक लोकप्रिय थे और जनता युद्ध में जार का साथ भी देती थी किन्तु जैसे-जैसे युद्ध जारी रहा, जार ने डयूमा के प्रमुख दलों से सलाह लेने से मना कर दिया। इस प्रकार उसने समर्थन खो दिया और जर्मन विरोधी भावनाएँ प्रबल होने लगीं। जारीना अलेक्सान्द्रा के सलाहकारों विशेषकर रास्पूतिन ने राजशाही को अलोकप्रिय बना दिया। रूसी सेना लड़ाई हार गई। पीछे हटते समय रूसी सेना ने फसलों एवं इमारतों को नष्ट कर दिया। फसलों एवं इमारतों के विनाश से रूस में लगभग 30 लाख से अधिक लोग शरणार्थी हो गए जिससे हालात और बिगड़ गए।
प्रथम विश्व युद्ध का उद्योगों पर बुरा प्रभाव पड़ा। बाल्टिक सागर के रास्ते पर जर्मनी का कब्जा हो जाने के कारण माल का आयात बन्द हो गया। औद्योगिक उपकरण बेकार होने लगे तथा 1916 ई. तक रेलवे लाइनें टूट गईं। अनिवार्य सैनिक सेवा के चलते सेहतमन्द लोगों को युद्ध में झोंक दिया गया जिसके परिणामस्वरूप मजदूरों की कमी हो गई। रोटी की दुकानों पर दंगे होना आम बात हो गई। 26 फरवरी, 1917 ई. को डयूमा को बर्खास्त कर दिया गया। यह आखिरी दाँव साबित हुआ और इसने जार के शासन को पूरी तरह जोखिम में डाल दिया। 2 मार्च, 1917 ई. को जार गद्दी छोड़ने पर मजबूर हो गया और इससे निरंकुशता का अन्त हो गया।
किसान जमीन पर सर्फ के रूप में काम करते थे और उनकी पैदावार को अधिकतम भाग जमीन के मालिकों एवं विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों को चला जाता था। किसानों में जमीन की भूख प्रमुख कारक थी। विभिन्न दमनकारी नीतियों तथा कुण्ठा के कारण वे आमतौर पर लगान देने से मना कर देते और प्रायः जमींदारों की हत्या करते। कार्ल मार्क्स की साम्यवादी धारणा और सर्वहारा की विश्व-विजय के उद्घोष ने रूस के जारशाही से आक्रोशित लोगों को विद्रोह के लिए उद्वेलित किया।
In simple words: 1917 में जार का शासन इसलिए समाप्त हो गया क्योंकि उसकी दमनकारी नीतियाँ, प्रथम विश्व युद्ध में लगातार हार, खाद्य संकट, और जनता के बढ़ते असंतोष ने उसे समर्थनहीन कर दिया। डयूमा को बर्खास्त करने के उसके अंतिम प्रयास ने स्थिति को और बिगाड़ दिया, जिससे उसे गद्दी छोड़नी पड़ी और निरंकुशता का अंत हो गया।
🎯 Exam Tip: जार के शासन के अंत के कारणों का वर्णन करते समय उसकी नीतियों, युद्ध के प्रभाव, आर्थिक संकट और जनता के बढ़ते असंतोष के बिंदुओं पर ध्यान दें।
Question 4. दो सूचियाँ बनाइए : एक सूची में फरवरी क्रांति की मुख्य घटनाओं और प्रभावों को लिखिए और दूसरी सूची में अक्टूबर क्रांति की प्रमुख घटनाओं और प्रभावों को दर्ज कीजिए।
Answer: जार की गलत नीतियों, राजनीतिक भ्रष्टाचार तथा जनसाधारण एवं सैनिकों की दुर्दशा के कारण रूस में क्रान्ति का वातावरण तैयार हो चुका था। एक छोटी-सी घटना ने इस क्रान्ति की शुरुआत कर दी और यह दो चरणों में पूरी हुई। ये दो चरण थे-फरवरी क्रान्ति और अक्टूबर क्रान्ति।
संक्षेप में क्रान्ति का सम्पूर्ण घटनाक्रम इस प्रकार है-
फरवरी क्रान्ति- 1917 ई. के फरवरी माह में शीतकाल में राजधानी पेत्रोग्राद में हालात बिगड़ गए। मजदूरों के क्वार्टरों में खाने की अत्यधिक कमी हो गयी जबकि संसदीय प्रतिनिधि जार की डयूमा को बर्खास्त करने की इच्छा के विरुद्ध थे। नगर की संरचना इसके नागरिकों के विभाजन का कारण बन गयी। मजदूरों के क्वार्टर और कारखाने नेवा नदी के दाएँ तट पर स्थित थे। बाएँ तट पर फैशनेबल इलाके जैसे कि विंटर पैलेस, सरकारी भवन तथा वह महल भी था जहाँ डयूमा की बैठक होती थी।
सर्दी बहुत ज्यादा थी - असाधारण कोहरा और बर्फबारी हुई थी। 22 फरवरी को दाएँ किनारे पर एक कारखाने में तालाबंदी हो गई। अगले दिन सहानुभूति के तौर पर 50 और कारखानों के मजदूरों ने हड़ताल कर दी। कई कारखानों में महिलाओं ने हड़ताल की अगुवाई की। रविवार, 25 फरवरी को सरकार ने डयूमा को बर्खास्त कर दिया। 27 फरवरी को पुलिस मुख्यालय पर हमला किया गया। गलियाँ रोटी, मजदूरी, बेहतर कार्य घण्टों एवं लोकतंत्र के नारे लगाते हुए लोगों से भर गईं।
घुडसवार सैनिकों की टुकड़ियों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से मना कर दिया तथा शाम तक बगावत कर रहे सैनिकों यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रान्ति एवं हड़ताल कर रहे मजदूरों ने मिलकर पेत्रोग्राद सोवियत नाम की सोवियत या काउंसिल बना ली। । जार ने 2 मार्च को अपनी सत्ता छोड़ दी और सोवियत तथा डयूमा के नेताओं ने मिलकर रूस के लिए अंतरिम सरकार बना ली। फरवरी क्रांति के मोर्चे पर कोई भी राजनैतिक दल नहीं था। इसका नेतृत्व लोगों ने स्वयं किया था। पेत्रोग्राद ने राजशाही का अन्त कर दिया और इस प्रकार उन्होंने सोवियत इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया।
फरवरी क्रान्ति का प्रभाव यह हुआ कि जनसाधारण तथा संगठनों की बैठकों पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया। पेत्रोग्राद सोवियत की तरह ही सभी जगह सोवियत बन गई यद्यपि इनमें एक जैसी चुनाव प्रणाली का अनुसरण नहीं किया गया। अप्रैल, 1917 ई. में बोल्शेविकों के नेता ब्लादिमीर लेनिन देश निकाले से रूस वापस लौट आए। उसने 'अप्रैल थीसिस' के नाम से जानी जाने वाली तीन माँगें रखीं। ये तीन माँगें थीं- युद्ध को समाप्त किया जाए, भूमि किसानों को हस्तांतरित की जाए और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया जाए। उसने इस बात पर भी जोर दिया कि अब अपने रैडिकल उद्देश्यों को स्पष्ट करने के लिए। बोल्शेविक पार्टी का नाम बदलकर कम्युनिस्ट पार्टी रख दिया जाए।
अक्टूबर क्रान्ति- जनता की सबसे महत्त्वपूर्ण चार माँगें थीं- शांति, भूमि का स्वामित्व जोतने वालों को, कारखानों पर मजदूरों का नियंत्रण तथा गैर-रूसी जातियों को समानता का दर्जा। अस्थायी सरकार का प्रधान केरेस्की इनमें से किसी भी माँग को पूरा न कर सका और सरकार ने जनता का समर्थन खो दिया। लेनिन फरवरी क्रान्ति के समय स्विट्जरलैण्ड में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा था, वह अप्रैल में रूस लौट आया। उसके नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने युद्ध समाप्त करने, किसानों को जमीन देने तथा 'सारे अधिकार सोवियतों को देने की स्पष्ट नीतियाँ सामने रखीं। गैर-रूसी जातियों के प्रश्न पर भी केवल लेनिन की बोल्शेविक पार्टी के पास एक स्पष्ट नीति थी। अक्टूबर क्रांति अंतरिम सरकार तथा बोल्शेविकों में मतभेद के कारण हुई। सितम्बर में ब्लादिमीर लेनिन ने विद्रोह के लिए समर्थकों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया।
16 अक्टूबर, 1917 ई. को उसने पेत्रोग्राद सोवियते तथा बोल्शेविक पार्टी को सत्ता पर सामाजिक कब्जा करने के लिए मना लिया। सत्ता पर कब्जे के लिए लियोन ट्रॉटस्की के नेतृत्व में एक सैनिक क्रांतिकारी सैनिक समिति नियुक्त की गई। जब 24 अक्टूबर को विद्रोह शुरू हुआ, प्रधानमंत्री केरेस्की ने स्थिति को नियंत्रण से बाहर होने से रोकने के लिए सैनिक टुकड़ियों को लाने हेतु शहर छोड़ा। क्रांतिकारी समिति ने सरकारी कार्यालयों पर हमला बोला; ऑरोरा नामक युद्धपोत ने विंटर पैलेस पर बमबारी की और 24 तारीख की रात को शहर पर बोल्शेविकों का नियंत्रण हो गया।
थोड़ी सी गम्भीर लड़ाई के उपरान्त बोल्शेविकों ने मॉस्को पेत्रोग्राद क्षेत्र पर पूरा नियंत्रण पा लिया। पेत्रोग्राद में ऑल रशियन कांग्रेस ऑफ सोवियत्स की बैठक में बोल्शेविकों की कार्रवाई को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। अक्टूबर क्रान्ति का नेतृत्व मुख्यतः लेनिन तथा उसके अधीनस्थ ट्रॉटस्की ने किया और इसमें इन नेताओं का समर्थन करने वाली जनता भी शामिल थी। इसने सोवियत पर लेनिन के शासन की शुरुआत की तथा लेनिन के निर्देशन में बोल्शेविक इसके साथ थे।
In simple words: फरवरी क्रांति 1917 में पेट्रोग्राद में मजदूरों की हड़तालों से शुरू हुई, जिससे जार को सत्ता छोड़नी पड़ी और अंतरिम सरकार बनी। इसके बाद अप्रैल में लेनिन वापस आए और 'अप्रैल थीसिस' रखी। अक्टूबर क्रांति में बोल्शेविकों ने सत्ता संभाली, जिसमें लेनिन और ट्रॉटस्की के नेतृत्व में पेट्रोग्राद पर नियंत्रण किया गया और सोवियत शासन की शुरुआत हुई।
🎯 Exam Tip: फरवरी और अक्टूबर क्रांतियों की प्रमुख घटनाओं और उनके तात्कालिक प्रभावों को अलग-अलग सूचियों में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना आवश्यक है, जिसमें तिथियों और प्रमुख व्यक्तियों का उल्लेख हो।
Question 5. बोल्शेविकों ने अक्टूबर क्रान्ति के फौरन बाद कौन-कौन से प्रमुख परिवर्तन किए?
Answer: अक्टूबर क्रांति के पश्चात् बोल्शेविकों द्वारा किए गए प्रमुख परिवर्तन- रूस की बागडोर अपने हाथ में लेकर बोल्शेविक पार्टी ने युद्ध को समाप्त करने, किसानों को जमीन दिलाने तथा सम्पूर्ण सत्ता सोवियतों को सौंपने के सम्बन्ध में स्पष्ट नीतियाँ अपनाईं। सबसे पहले रूस ने अपने-आपको प्रथम विश्वयुद्ध से बिलकुल अलग कर लिया चाहे इसके लिए उसे भारी कीमत क्यों न चुकानी पड़ी। इसके पश्चात् जो-जो उपनिवेश रूस के अधीन थे उन सब उपनिवेशों को स्वतंत्र कर दिया गया। तदुपरान्त बोल्शेविक पार्टी ने अनेक घोषणाएँ कीं जिनसे रूस में समाजवाद का सूत्रपात हुआ। यह घोषणाएँ निम्नलिखित थीं
1. बोल्शेविक पार्टी का नाम बदल कर रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) रख दिया गया।
2. नवम्बर में संविधान सभा के चुनावों में बोल्शेविकों की हार हुई और जनवरी, 1918 में जब सभा ने उनके प्रस्तावों को खारिज कर दिया तो लेनिन ने सभा बर्खास्त कर दी। मार्च, 1918 में राजनैतिक विरोध के बावजूद रूस ने ब्रेस्ट लिटोव्स्क में जर्मनी से संधि कर ली।
3. रूस एक-दलीय देश बन गया और ट्रेड यूनियनों को पार्टी के नियंत्रण में रखा गया।
4. उन्होंने पहली बारे केन्द्रीकृत नियोजन लागू किया जिसके आधार पर, पंचवर्षीय योजनाएँ बनाई गईं।
5. बोल्शेविक निजी सम्पत्ति के पक्षधर नहीं थे अतः अधिकतर उद्योगों एवं बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
6. भूमि को सामाजिक सम्पत्ति घोषित कर दिया गया और किसानों को उस भूमि पर कब्जा करने दिया गया जिस पर वे काम करते थे।
7. शहरों में बड़े घरों के परिवार की आवश्यकता के अनुसार हिस्से कर दिए गए।
8. पुराने अभिजात्य वर्ग की पदवियों के प्रयोग पर रोक लगा दी गई।
9. परिवर्तन को स्पष्ट करने के लिए बोल्शेविकों ने सेना एवं कर्मचारियों की नई वर्दियाँ पेश कीं।
In simple words: अक्टूबर क्रांति के बाद बोल्शेविकों ने रूस को प्रथम विश्व युद्ध से अलग कर दिया, भूमि का किसानों में पुनर्वितरण किया, उद्योगों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, और एकदलीय शासन स्थापित करके केंद्रीकृत नियोजन की शुरुआत की।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में बोल्शेविकों द्वारा सत्ता संभालने के तुरंत बाद किए गए प्रमुख सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों की सूची बनाना महत्वपूर्ण है।
Question 6. निम्नलिखित के बारे में संक्षेप में लिखिए-
(क) कुलक
(ख) ड्यू मा
(ग) 1900 से 1930 ई. के बीच महिला कामगार
(घ) उदारवादी
(ङ) स्तालिन का सामूहिकीकरण कार्यक्रम।
Answer:
(क) कुलक- ये सोवियत रूस के धनी किसान थे। कृषि के सामूहिकीकरण कार्यक्रम के अन्तर्गत स्तालिन ने इनका अन्त कर दिया। स्तालिन का विश्वास था कि वे अधिक लाभ कमाने के लिए अनाज इकट्ठा कर रहे थे। 1927-28 ई. तक सोवियत रूस के शहर अन्न आपूर्ति की भारी किल्लत को सामना कर रहे थे। इसलिए इन कुलकों पर 1928 ई. में छापे मारे गए और उनके अनाज के भण्डारों को जब्त कर लिया गया। माक्र्सवादी स्तालिनवाद के अनुसार कुलक गरीब किसानों के वर्ग शत्रु थे। उनकी मुनाफाखोरी की इच्छा से खाने की किल्लत हो गई और अन्ततः स्तालिन को इन कुलकों का सफाया। करने के लिए सामूहिकीकरण कार्यक्रम चलाना पड़ा और सरकार द्वारा नियंत्रित बड़े खेतों की स्थापना करनी पड़ी।
(ख) डयूमा- डयूमा रूस की राष्ट्रीय सभा अथवा संसद थी। रूस के जार निकोलस द्वितीय ने इसे मात्र एक सलाहकार समिति में परिवर्तित कर दिया था। इसमें मात्र अनुदारवादी राजनीतिज्ञों को ही स्थान दिया गया। उदारवादियों तथा क्रान्तिकारियों को इससे दूर रखा गया।
(ग) 1900 से 1930 ई. के बीच महिला कामगार- महिला मजदूरों ने रूस के भविष्य निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। महिला कामगार सन् 1914 तक कुल कारखाना कामगार शक्ति का 31 प्रतिशत भाग बन चुकी थी किन्तु उन्हें पुरुषों की अपेक्षा कम मजदूरी दी जाती थी। महिला कामगारों को न केवल कारखानों में काम करना पड़ता था अपितु उनके परिवार एवं बच्चों की भी देखभाल करनी पड़ती थी। वे देश के सभी मामलों में बहुत सक्रिय थीं। प्रायः अपने साथ काम करने वाले पुरुष कामगारों को प्रेरणा भी देती थीं।
1917 ई. की अक्टूबर क्रान्ति के बाद समाजवादियों ने रूस में सरकार बनाई। 1917 ई. में राजशाही के पतन एवं अक्टूबर की घटनाओं को ही सामान्यतः रूसी क्रांति कहा जाता है। उदाहरण के लिए लॉरेंज टेलीफोन की महिला मजदूर मार्फा वासीलेवा ने बढ़ती कीमतों तथा कारखाने के मालिकों की मनमानी के विरुद्ध आवाज उठाई और सफल हड़ताल की। अन्य महिला मजदूरों ने भी माफ वासीलेवा का अनुसरण किया और जब तक उन्होंने रूस में समाजवादी सरकार की स्थापना नहीं की तब तक उन्होंने राहत की साँस नहीं ली।।
(घ) उदारवादी- उदारवाद एक क्रमबद्ध और निश्चित विचारधारा नहीं है, इसका सम्बन्ध न किसी एक युग से है और न ही किसी सर्वमान्य व्यक्ति विशेष से। यह तो युगों-युगों तथा अनेक व्यक्तियों के दृष्टिकोणों का परिणाम है। इस विचारधारा के समर्थक प्रायः निम्न विषयों में परिवर्तन चाहते थे
1. उदारवादी ऐसा राष्ट्र चाहते थे जिसमें सभी धर्मों को बराबर का सम्मान और जगह मिले।
2. व्यक्ति की गरिमा और प्रतिष्ठा को बनाए रखा जाए क्योंकि समाज और राज्य व्यक्ति की प्रगति और उत्थान के साधन मात्र हैं।
3. प्रत्येक व्यक्ति को इच्छानुसार व्यवसाय करने तथा सम्पत्ति अर्जित करने का अधिकार होना चाहिए। राज्य को आवश्यक कर ही लगाने चाहिए।
4. नागरिकों को कानून के द्वारा आवश्यक स्वतन्त्रता प्रदान की जानी चाहिए जिससे स्वेच्छाचारी शासन का अन्त हो सके तथा व्यक्ति का विकास तीव्र गति से सम्भव हो सके।
5. इनके अनुसार व्यक्तियों को प्राचीन रूढ़ियों एवं परम्पराओं का दास नहीं बनना चाहिए। प्रगति एवं विकास के लिए यदि परम्पराओं का विरोध करना पड़े तो भी करना चाहिए।
(ङ) स्तालिन का सामूहिकीकरण कार्यक्रम- सन् 1929 से स्तालिन के साम्यवादी दल ने सभी किसानों को सामूहिक स्रोतों (कोलखोज) में काम करने का निर्देश जारी कर दिया। ज्यादातर जमीन और साजो-सामान को सामूहिक खेतों में बदल दिया गया। रूस के सभी किसान सामूहिक खेतों पर मिल-जुलकर काम करते थे। कोलखोज के लाभ को सभी किसानों के बीच बाँट दिया जाता था। इस निर्णय से नाराज किसानों ने सरकार का विरोध किया।
इस विरोध को जताने के लिए वे अपने जानवरों को मारने लगे। परिणामस्वरूप रूस में 1929 से 1931 ई. के बीच जानवरों की संख्या में एक तिहाई की कमी आयी। सरकार द्वारा सामूहिकीकरण का विरोध करने वालों को कठोर दण्ड दिया जाता था। अनेक विरोधियों को देश से निर्वासित कर दिया गया। सामूहिकीकरण के फलस्वरूप कृषि उत्पादन में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई। दूसरी तरफ 1930 से 1933 ई. के बीच खराब फसल के बाद सोवियत रूस में सबसे बड़ा अकाल पड़ा। इस अकाल में 40 लाख से अधिक लोग मारे गए।
In simple words: यह प्रश्न 'कुलक' (धनी किसान), 'डयूमा' (रूस की संसद), 'महिला कामगार' (उनकी भूमिका और स्थिति), 'उदारवादी' (उनकी विचारधारा) और 'स्तालिन के सामूहिकीकरण कार्यक्रम' (किसानों को सामूहिक खेती में शामिल करने की नीति) जैसे प्रमुख ऐतिहासिक शब्दों और घटनाओं को संक्षेप में परिभाषित करता है, जो रूसी क्रांति के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।
🎯 Exam Tip: इन सभी शब्दावलियों की सटीक परिभाषाएँ और रूसी क्रांति में उनकी भूमिका को स्पष्ट रूप से याद करना महत्वपूर्ण है।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. रूस में सामूहिक खेतों को किस नाम से जाना जाता था?
Answer: कोलखोज।
In simple words: रूस में सामूहिक खेतों को 'कोलखोज' के नाम से जाना जाता था, जो स्तालिन के सामूहिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा थे।
🎯 Exam Tip: यह एक सीधा तथ्यात्मक प्रश्न है; 'कोलखोज' नाम को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 2. रूस में बोल्शेविक दल का मुख्य नेता कौन था?
Answer: रूस में बोल्शेविक दल का मुख्य नेता ब्लादिमीर इलिच उलियानोव (लेनिन) था।
In simple words: बोल्शेविक दल के मुख्य नेता व्लादिमीर लेनिन थे, जिन्होंने रूसी क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
🎯 Exam Tip: बोल्शेविक क्रांति के संदर्भ में लेनिन का नाम और उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
Question 3. 1917 ई. में रूस पर किसका प्रभाव था?
Answer: जार निकोलस द्वितीय का।
In simple words: 1917 में रूस पर जार निकोलस द्वितीय का निरंकुश शासन था, जो क्रांति का एक प्रमुख कारण बना।
🎯 Exam Tip: यह एक मूलभूत तथ्य है; शासक का नाम याद रखना आवश्यक है।
Question 4. रूस में किस धर्म के अनुयायी बहुमत में थे?
Answer: रूसी आर्थोडॉक्स क्रिश्चियैनिटी के।
In simple words: रूस में 'रूसी आर्थोडॉक्स क्रिश्चियैनिटी' के अनुयायी बहुमत में थे, जो वहाँ का प्रमुख धर्म था।
🎯 Exam Tip: रूसी समाज की धार्मिक संरचना को दर्शाने वाला यह एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक बिंदु है।
Question 5. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो के लेखक का नाम बताइए।
Answer: कार्ल मार्क्स एवं फ्रेड्रिक एंगेल्स।
In simple words: 'कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो' कार्ल मार्क्स और फ्रेड्रिक एंगेल्स द्वारा लिखा गया था, जो साम्यवादी विचारधारा का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
🎯 Exam Tip: यह प्रश्न कार्ल मार्क्स और फ्रेड्रिक एंगेल्स के योगदान को याद करने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 6. कार्ल मार्क्स कौन था?
Answer: यह आधुनिक वैज्ञानिक समाजवाद का जनक था। मूलतः जर्मन मार्क्स का ज्यादातर समय इंग्लैण्ड व यूरोपीय देशों में बीता। उसने अपने आजीवन साथी फ्रेड्रिक एंगेल्स से मिलकर प्रथम कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र तथा दास कैपिटल नामक विश्वविख्यात पुस्तक की रचना की।
In simple words: कार्ल मार्क्स आधुनिक वैज्ञानिक समाजवाद के जनक थे, जिन्होंने फ्रेड्रिक एंगेल्स के साथ मिलकर 'कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो' और 'दास कैपिटल' जैसी प्रभावशाली पुस्तकें लिखीं।
🎯 Exam Tip: कार्ल मार्क्स की पहचान, उनके प्रमुख कार्य और विचारधारा को संक्षिप्त में समझना आवश्यक है।
Question 7. रूसी क्रांतिकारियों का प्रमुख उद्देश्य क्या था?
Answer: उनका प्रमुख उद्देश्य था-
1. रूस को प्रथम विश्व युद्ध से हटाना,
2. कारखानों पर मजदूरों का नियंत्रण,
3. गैर-रूसी जातियों को समानता का दर्जा देना,
4. जमीन जोतने वाले को देना।
In simple words: रूसी क्रांतिकारियों के मुख्य उद्देश्य में युद्ध समाप्त करना, मजदूरों का कारखानों पर नियंत्रण स्थापित करना, सभी जातियों को समानता देना और जमीन को किसानों के हाथ में सौंपना शामिल था।
🎯 Exam Tip: रूसी क्रांति के मूल उद्देश्यों को याद करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये क्रांति की दिशा और उसके परिणामों को निर्धारित करते हैं।
Question 8. रैडिकल से क्या तात्पर्य है?
Answer: यूरोप में उन लोगों का समूह जो देश में ऐसी सरकार के पक्ष में थे जो देश की आबादी के बहुमत के समर्थन पर आधारित हो।
In simple words: 'रैडिकल' वे लोग थे जो बहुमत के समर्थन वाली सरकार के पक्षधर थे और समाज में बड़े बदलावों को चाहते थे।
🎯 Exam Tip: रैडिकल विचारधारा को परिभाषित करते समय बहुमत के शासन और सामाजिक परिवर्तन की उनकी वकालत पर जोर दें।
Question 9. राष्ट्रवादी से क्या तात्पर्य है?
Answer: उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में यूरोप में उन्होंने उदारवादियों एवं रैडिकल का समर्थन किया। वे ऐसा देश चाहते थे जहाँ सभी नागरिकों को समान अधिकार मिले।
In simple words: राष्ट्रवादी वे लोग थे जो अपने देश के लिए समान अधिकारों और संप्रभुता पर आधारित एक मजबूत राष्ट्र चाहते थे, अक्सर उदारवादी और रैडिकल विचारों का समर्थन करते थे।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रवाद की परिभाषा में राष्ट्रीय पहचान, समान अधिकार और स्वतंत्रता के तत्वों को शामिल करना महत्वपूर्ण है।
Question 10. विंटर पैलेस पर आक्रमण करने वाले युद्धपोत का नाम बताइए।
Answer: ऑरोरा युद्धपोत।
In simple words: विंटर पैलेस पर हमला 'ऑरोरा' नामक युद्धपोत द्वारा किया गया था, जो अक्टूबर क्रांति का एक प्रतीक बन गया।
🎯 Exam Tip: यह एक विशिष्ट घटना से जुड़ा नाम है, जिसे याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 11. रूसी डयूमा को कब बर्खास्त किया गया?
Answer: 25 फरवरी, 1917 ई. को।
In simple words: रूसी डयूमा को 25 फरवरी, 1917 को जार निकोलस द्वितीय द्वारा बर्खास्त कर दिया गया था, जिसने फरवरी क्रांति को गति दी।
🎯 Exam Tip: डयूमा की बर्खास्तगी की तारीख रूसी क्रांति के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।
Question 12. किस घटना के बाद जार निकोलस द्वितीय को गद्दी छोड़ना पड़ा?
Answer: घुडसवार सैनिकों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया। दूसरी रेजीमेंटों ने बगावत कर दी और हड़ताली मजदूरों के साथ आ मिले। अगले दिन एक प्रतिनिधिमंडल जार से मिलने गया। सैनिक कमांडरों ने सलाह दी कि वह राजगद्दी छोड़ दे। उसने कमांडरों की बात मान ली और 2 मार्च को गद्दी छोड़ दी।
In simple words: घुड़सवार सैनिकों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार करने और सेना में बगावत के बाद, सैनिक कमांडरों की सलाह पर जार निकोलस द्वितीय को 2 मार्च को गद्दी छोड़नी पड़ी।
🎯 Exam Tip: जार के गद्दी छोड़ने की तात्कालिक घटनाएँ, विशेषकर सेना के विद्रोह और सलाह पर ध्यान दें।
Question 13. घुमंतू तथा स्वायत्तता का अर्थ बताइए।
Answer: घुमंतू-ऐसे लोग जो किसी एक जगह ठहर कर नहीं रहते बल्कि अपनी आजीविका की खोज में एक जगह से दूसरी जगह आते-जाते रहते हैं। स्वायत्तता-अपना शासन स्वयं चलाने का अधिकार स्वायत्तता कहलाता है।
In simple words: 'घुमंतू' उन लोगों को कहते हैं जो आजीविका के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं, जबकि 'स्वायत्तता' का अर्थ है अपना शासन स्वयं चलाने का अधिकार।
🎯 Exam Tip: इन दोनों शब्दों की स्पष्ट और संक्षिप्त परिभाषाएँ महत्वपूर्ण हैं, खासकर सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में।
Question 14. बोल्शेविकों ने जमीन के पुनर्वितरण का आदेश दिया तो रूसी सेना में क्या प्रतिक्रिया हुई?
Answer: जब बोल्शेविकों ने जमीन के पुनर्वितरण का आदेश दिया तो रूसी सेना टूटने लगी। ज्यादातर सिपाही किसान थे। वे भूमि पुनर्वितरण के लिए घर लौटना चाहते थे इसलिए सेना छोड़कर जाने लगे।
In simple words: बोल्शेविकों के भूमि पुनर्वितरण के आदेश के बाद रूसी सेना टूटने लगी, क्योंकि ज्यादातर किसान-सिपाही जमीन लेने के लिए अपने घरों को लौटना चाहते थे।
🎯 Exam Tip: बोल्शेविक भूमि नीति के सैन्य प्रभाव को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने गृह युद्ध की स्थितियों को प्रभावित किया।
Question 15. रूस की जनता का कितना प्रतिशत भाग कृषि कार्य में संलग्न था?
Answer: रूस की जनता का लगभग 85 प्रतिशत भाग कृषि कार्य में संलग्न था।
In simple words: रूस की लगभग 85% जनता कृषि कार्य में लगी हुई थी, जो दर्शाता है कि देश मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान समाज था।
🎯 Exam Tip: यह आंकड़ा रूसी अर्थव्यवस्था की कृषि प्रधान प्रकृति को उजागर करता है और सामाजिक संरचना को समझने में महत्वपूर्ण है।
Question 16. वास्तविक वेतन से क्या तात्पर्य है?
Answer: यह इस बात का पैमाना है कि किसी व्यक्ति के वेतन से वास्तव में कितनी चीजें खरीदी जा सकती हैं।
In simple words: वास्तविक वेतन से तात्पर्य किसी व्यक्ति की कमाई की क्रय शक्ति से है, यानी वह अपने वेतन से कितनी वस्तुएँ और सेवाएँ खरीद सकता है।
🎯 Exam Tip: आर्थिक अवधारणा के रूप में 'वास्तविक वेतन' की परिभाषा में क्रय शक्ति पर जोर देना महत्वपूर्ण है, न कि केवल मौद्रिक मूल्य पर।
Question 17. खूनी रविवार से क्या समझते हैं?
Answer: पादरी गैपॉन के नेतृत्व में मजदूरों का एक जुलूस विंटर पैलेस के सामने पहुँचा तो पुलिस और कोसैक्स ने मजदूरों पर हमला बोल दिया। इस घटना में 100 से ज्यादा मजदूर मारे गए और लगभग 300 घायल हुए। इतिहास में इस घटना को खूनी रविवार के नाम से जाना जाता है।
In simple words: 'खूनी रविवार' 9 जनवरी, 1905 की घटना को कहते हैं, जब पादरी गैपॉन के नेतृत्व में विंटर पैलेस पहुँचे मजदूरों के शांतिपूर्ण जुलूस पर पुलिस ने गोली चला दी, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए या घायल हुए।
🎯 Exam Tip: खूनी रविवार की घटना और उसके कारणों तथा परिणामों को स्पष्ट रूप से याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह 1905 की क्रांति का ट्रिगर बिंदु था।
Question 18. रैडिकल किस तरह की सरकार के पक्ष में थे?
Answer: रैडिकल समूह के लोग ऐसी सरकार के पक्ष में थे जो देश की आबादी के बहुमत के समर्थन पर आधारित हो। इनमें से बहुत सारे महिला मताधिकार आंदोलन के भी समर्थक थे। ये लोग बड़े जमींदारों और संपन्न उद्योगपतियों को प्राप्त किसी भी तरह के विशेषाधिकारों के खिलाफ थे।
In simple words: रैडिकल समूह बहुमत के समर्थन पर आधारित सरकार चाहते थे, जो महिला मताधिकार का समर्थन करे और बड़े जमींदारों व उद्योगपतियों के विशेषाधिकारों का विरोध करे।
🎯 Exam Tip: रैडिकल विचारधारा की प्रमुख विशेषताओं और वे किस प्रकार की सरकार का समर्थन करते थे, इस पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 19. 1917 ई. से पहले रूस के दो प्रमुख औद्योगिक शहरों के नाम लिखिए।
Answer: 1917 ई. से पूर्व रूस के दो प्रमुख औद्योगिक शहर सेंट पीटर्सबर्ग और मास्को थे।
In simple words: 1917 से पहले रूस के दो मुख्य औद्योगिक शहर सेंट पीटर्सबर्ग और मास्को थे, जो देश के आर्थिक विकास के केंद्र थे।
🎯 Exam Tip: रूस के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों के नामों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे क्रांति के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
Question 20. रूढ़िवादी किस तरह के बदलाव चाहते थे?
Answer: रूढ़िवादी भी बदलाव की जरूरत को स्वीकार करने लगे थे। पुराने समय में यानि अठारहवीं शताब्दी में रूढ़िवादी आमतौर पर परिवर्तन के विचारों का विरोध करते थे। लेकिन उन्नीसवीं सदी तक आते-आते वे भी मानने लगे थे। कि कुछ परिवर्तन आवश्यक हो गया है परन्तु वह चाहते थे कि अतीत का सम्मान किया जाय. अर्थात् अतीत को पूरी तरह ठुकराया न जाए और बदलाव की प्रक्रिया धीमी हो।
In simple words: रूढ़िवादी धीमी गति से बदलाव चाहते थे और अतीत के सम्मान को बनाए रखना चाहते थे, न कि क्रांतिकारी या तीव्र परिवर्तन।
🎯 Exam Tip: रूढ़िवादी विचारधारा की पहचान उनके धीमी गति के परिवर्तन और परंपराओं के प्रति सम्मान से करें।
Question 21. उदारवादी समूह किस तरह की सरकार के पक्षधर थे?
Answer: उदारवादी समूह वंश आधारित शासकों की अनियंत्रित सत्ता के विरोधी थे। वे सरकार के समक्ष व्यक्ति मात्र के अधिकारों की रक्षा के पक्षधर थे। यह समूह प्रतिनिधित्व पर आधारित एक ऐसी निर्वाचित सरकार के पक्ष में था जो शासकों और अफसरों के प्रभाव से मुक्त और सुप्रशिक्षित न्यायपालिका द्वारा स्थापित किए गए कानूनों के अनुसार शासन कार्य चलाएँ।
In simple words: उदारवादी समूह वंशवादी शासकों की अनियंत्रित सत्ता के विरोधी थे और वे एक ऐसी निर्वाचित, प्रतिनिधित्व पर आधारित सरकार चाहते थे जो व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करे और सुप्रशिक्षित न्यायपालिका के माध्यम से शासन करे।
🎯 Exam Tip: उदारवादी विचारधारा की प्रमुख विशेषताओं, जैसे व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा और निर्वाचित सरकार की वकालत, पर ध्यान दें।
Question 22. रूस में स्थापित होने वाले प्रथम समाजवादी संगठन का नाम बताइए।
Answer: 'रसियन सोशल डेमोक्रेटिक वर्ल्स पार्टी (रूसी सामाजिक लोकतांत्रिक श्रमिक पार्टी) 1898 ई. में रूस में स्थापित होने वाला प्रथम समाजवादी संगठन था।
In simple words: रूस में स्थापित होने वाला पहला समाजवादी संगठन 'रूसी सामाजिक लोकतांत्रिक श्रमिक पार्टी' (Russian Social Democratic Labour Party) था, जिसकी स्थापना 1898 में हुई थी।
🎯 Exam Tip: रूसी समाजवादी आंदोलन के प्रारंभिक संगठन का नाम और स्थापना वर्ष याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 23. 1904 ई. में सेंट पीटर्सबर्ग के मजदूर हड़ताल पर क्यों चले गए थे?
Answer: 1904 में गठित की गई असेंबली ऑफ एशियन वर्कर्स के चार सदस्यों को प्युतिलोव आयरन वक्र्स में उनकी नौकरी से हटा दिया गया तो मजदूरों ने आंदोलन छेड़ने का एलान कर दिया। अगले कुछ दिनों के भीतर सेंट पीटर्सबर्ग के 1,10,000 से ज्यादा मजदूर काम के घण्टे घटाकर आठ घण्टे किए जाने, वेतन में वृद्धि और कार्यस्थितियों में सुधार की माँग करते हुए हड़ताल पर चले गए।
In simple words: 1904 में सेंट पीटर्सबर्ग के मजदूर इसलिए हड़ताल पर चले गए क्योंकि 'असेंबली ऑफ एशियन वर्कर्स' के चार सदस्यों को प्युतिलोव आयरन वर्क्स से निकाल दिया गया था, जिससे काम के घंटे कम करने, वेतन बढ़ाने और कार्यस्थलों में सुधार की मांग को लेकर एक बड़ा आंदोलन शुरू हो गया।
🎯 Exam Tip: 1904 की हड़ताल के विशिष्ट कारण और मजदूरों की मांगों को याद रखें, क्योंकि यह 1905 की क्रांति की पृष्ठभूमि का हिस्सा है।
Question 24. रूसी क्रान्ति में सक्रिय दो प्रमुख दल कौन-से थे?
Answer:
1. बोल्शेविक दल,
2. मेन्शेविक दल।
In simple words: रूसी क्रांति में बोल्शेविक और मेन्शेविक दो प्रमुख दल सक्रिय थे, जिनकी विचारधाराएँ और रणनीतियाँ भिन्न थीं।
🎯 Exam Tip: रूसी क्रांति के प्रमुख राजनीतिक दलों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 25. रैडिकल और उदारवादियों की आर्थिक दशा किस प्रकार थी?
Answer: बहुत सारे रैडिकल और उदारवादियों के पास काफी सम्पत्ति थी और उनके यहाँ बहुत सारे लोग नौकरी करते थे। उन्होंने व्यापार या औद्योगिक व्यवसायों के जरिए धन-दौलत इकट्ठा की थी इसलिए वह चाहते थे कि इस तरह के प्रयासों को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा दिया जाए।
In simple words: रैडिकल और उदारवादियों के पास अच्छी-खासी संपत्ति थी, जो उन्होंने व्यापार और उद्योगों से अर्जित की थी, और वे इन आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहते थे।
🎯 Exam Tip: रैडिकल और उदारवादियों की आर्थिक स्थिति और उनके आर्थिक विचारों को स्पष्ट रूप से समझें।
Question 26. 1905 ई. की क्रान्ति का आरम्भ किस घटना को माना जाता है?
Answer: 1905 ई. की क्रान्ति का आरम्भ 'खूनी रविवार को माना जाता है।
In simple words: 1905 की क्रांति की शुरुआत 'खूनी रविवार' की घटना से मानी जाती है, जब शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई थी।
🎯 Exam Tip: 'खूनी रविवार' का महत्व 1905 की क्रांति के उत्प्रेरक के रूप में याद रखें।
Question 27. किस कारण उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में समाज परिवर्तन के इच्छुक बहुत सारे कामकाजी स्त्री-पुरुष उदारवादी और रैडिकल समूहों व पार्टियों के इर्द-गिर्द गोलबंद हो गये थे?
Answer: उदारवादियों और रैडिकल समूहों की मान्यता थी कि यदि हरेक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता दी जाए, गरीबों को रोजगार मिले और जिनके पास पूँजी है उन्हें बिना रोकटोक काम करने का मौका दिया जाए तो समाज तरक्की कर सकता है। इसी कारण उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में समाज परिवर्तन के इच्छुक बहुत सारे कामकाजी स्त्री-पुरुष उदारवादी और रैडिकल समूहों व पार्टियों के इर्द-गिर्द गोलबंद हो गए थे।
In simple words: उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में कामकाजी लोग उदारवादी और रैडिकल समूहों से इसलिए जुड़े क्योंकि ये समूह व्यक्तिगत स्वतंत्रता, रोजगार और पूंजीपतियों को बिना रोक-टोक काम करने का अवसर देकर सामाजिक प्रगति में विश्वास करते थे।
🎯 Exam Tip: उदारवादी और रैडिकल विचारों के आकर्षण को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आर्थिक अवसर और सामाजिक प्रगति के संदर्भ में समझें।
Question 28. अस्थायी रूसी सरकार किसके नेतृत्व में बनी थी?
Answer: अस्थायी रूसी सरकार प्रिंस केरेंस्की के नेतृत्व में बनी थी।
In simple words: फरवरी क्रांति के बाद, अस्थायी रूसी सरकार प्रिंस केरेंस्की के नेतृत्व में स्थापित हुई थी।
🎯 Exam Tip: फरवरी क्रांति के बाद बनी अंतरिम सरकार के नेता का नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. समाजवाद की तीन विशेषताएँ बताइए।
Answer: समाजवाद की तीन प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
1. इसमें मजदूरों का शोषण नहीं होता है। समाजवाद के अनुसार सभी को काम पाने का अधिकार है।
2. समाजवाद में समाज वर्गविहीन होता है। इसमें अमीर-गरीब के बीच कम-से-कम अन्तर होता है। इसी कारण समाजवाद निजी सम्पत्ति का विरोधी है।
3. उत्पादन तथा वितरण के साधनों पर पूरे समाज का अधिकार होता है क्योंकि इसका उद्देश्य लाभार्जन नहीं, बल्कि समाज का कल्याण होता है।
In simple words: समाजवाद की मुख्य विशेषताएँ हैं कि इसमें मजदूरों का शोषण नहीं होता, समाज वर्गविहीन होता है जहाँ अमीर-गरीब का अंतर कम होता है, और उत्पादन व वितरण के साधनों पर समाज का अधिकार होता है जिसका उद्देश्य लाभ के बजाय कल्याण होता है।
🎯 Exam Tip: समाजवाद की मूल तीन विशेषताओं- शोषण का अभाव, वर्गविहीन समाज, और सामाजिक स्वामित्व-को स्पष्ट रूप से याद करें।
Question 2. केरेस्की की सरकार की अलोकप्रियता का कारण बताइए।
Answer: रूस में जार के शासन का अन्त होने के बाद प्रिंस केरेस्की की सरकार अस्तित्व में आयी।
इसके सम्मुख प्रमुख समस्याएँ थीं-
1. युद्ध की समस्या,
2. भूमि की समस्या,
3. औद्योगिक श्रमिकों की समस्या।
केरेंस्की की अलोकप्रियता के कारण- यद्यपि केरेंस्की एक योग्य नेता था, परन्तु वह इन समस्याओं को हल करने और जनता की माँगों को पूरा करने में असमर्थ रहा। इसीलिए मार्च, 1917 ई. की क्रांति के बाद रूस में जगह-जगह श्रमिक पंचायतों (सोवियतों) का निर्माण हो गया। इन पंचायतों ने केरेंस्की के स्थान पर स्वयं रूस का शासन संभालने का निश्चय किया। इसलिए वह अलोकप्रिय हो गया। 7 नवम्बर को केरेंस्की सरकार का पतन हो गया और लेनिन के नेतृत्व में एक नई सरकार बनी जिसे 'काउंसिल ऑफ पीपुल्स कमीसार्स का नाम दिया गया।
In simple words: केरेस्की की सरकार युद्ध, भूमि और औद्योगिक श्रमिकों की समस्याओं को हल करने में विफल रही, जिससे वह अलोकप्रिय हो गई। इसकी विफलता के कारण श्रमिक पंचायतों (सोवियतों) का उदय हुआ और अंततः लेनिन के नेतृत्व में उसकी सरकार गिर गई।
🎯 Exam Tip: केरेस्की सरकार की अलोकप्रियता के मुख्य कारणों में उसकी असमर्थता और सोवियतों के बढ़ते प्रभाव पर ध्यान दें।
Question 3. रैडिकल और रूढ़िवादी में क्या अन्तर है? बताइए।
Answer:
(1) रूढ़िवादी - रूढ़िवादी विचारधारा के समर्थक राजतंत्र एवं राजा के दैवी सिद्धान्तों में विश्वास करते थे। यह रैडिकल तथा उदारवादी दोनों विचारधाराओं का विरोध करते थे परन्तु 18वीं शताब्दी के अन्त तक इनकी विचारधारा में तीव्र परिवर्तन आया और इन्होंने भी परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया परन्तु यह चाहते थे कि परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी हो तथा अतीत को पूरी तरह न ठुकराया जाए।
(2) रैडिकल (आमूल परिवर्तनवादी)- इस विचारधारा के समर्थक बहुमत पर आधारित सरकार की स्थापना के पक्ष में थे। यह किसी भी व्यक्ति को प्राप्त विशेषाधिकारों के विरुद्ध थे। यह समानता पर आधारित समाज की स्थापना करना चाहते थे। प्राचीन रूढ़ियों के यह विरोधी थे। यह राजा के दैवी शक्ति के सिद्धान्त में विश्वास नहीं करते थे और राजतंत्र को नष्ट करने के लिए क्रांतिकारी उपायों को अपनाने के पक्ष में थे। फ्रांस में पेरिस कम्यून की स्थापना का श्रेय इसी विचारधारा के समर्थकों को जाता है।
In simple words: रूढ़िवादी धीमी गति से बदलाव चाहते थे और अतीत के सम्मान पर जोर देते थे, जबकि रैडिकल तेजी से आमूलचूल परिवर्तन चाहते थे, बहुमत आधारित सरकार और विशेषाधिकारों का अंत करते हुए समानता को बढ़ावा देते थे।
🎯 Exam Tip: रैडिकल और रूढ़िवादी विचारधाराओं के बीच अंतर को स्पष्ट करने के लिए उनकी बदलाव की गति, शासन प्रणाली के प्रति दृष्टिकोण, और विशेषाधिकारों पर उनके विचारों को तुलनात्मक रूप से प्रस्तुत करें।
Question 4. बोल्शेविक और मेन्शेविक दल के मध्य क्या बुनियादी अन्तर था?
Answer: बोल्शेविक और मेन्शेविक के बीच निम्नलिखित अन्तर इस प्रकार है-
| बोल्शेविक | मेन्शेविक |
|---|---|
| 1. बोल्शेविक रूस में 1917 ई. में एक सफल क्रांति ला सके और उन्होंने देश तथा समाज का ढाँचा पूरी तरह बदल दिया। | 1. किन्तु यह मेन्शेविक कोई उपलब्धि प्राप्त नहीं कर सका क्योंकि रूसी जार संसदीय तरीकों में विश्वास नहीं करता था। |
| 2. बोल्शेविक रूस में मजदूरों का बहुमत वाला समूह था जिसका नेता लेनिन था। वे समाज तथा देश में बदलाव के लिए संसदीय के लिए क्रान्तिकारी तरीकों में विश्वास करते थे। | 2. मेन्शेविक रूस में मजदूरों का एक दूसरा समूह था जो कि देश तथा समाज को चलाने तरीकों एवं चुनावों में भाग लेने में विश्वास रखता था। |
| 3. इन लोगों का मत था कि संसदीय तौर-तरीके रूस जैसे देश में बदलाव नहीं ला सकेंगे जहाँ लोकतांत्रिक अधिकारों का कोई अस्तित्व नहीं था और कोई संसद नहीं थी। | 3. ये लोग फ्रांस तथा जर्मनी में मौजूद दलों के पक्षधर थे जो कि अपने देशों में विधायिका के चुनावों में भाग लेते थे। |
In simple words: बोल्शेविक दल क्रांतिकारी तरीकों से सत्ता परिवर्तन में विश्वास रखते थे और 1917 में सफल हुए, जबकि मेन्शेविक दल संसदीय और चुनावी प्रक्रियाओं में भाग लेकर बदलाव लाना चाहते थे, लेकिन वे उतने सफल नहीं रहे।
🎯 Exam Tip: बोल्शेविक और मेन्शेविक के बीच के अंतर को उनकी विचारधारा, क्रांति के प्रति दृष्टिकोण और सफलता के आधार पर सारणीबद्ध करना प्रभावी होता है।
Question 5. साम्यवाद और फासिस्टवाद के बीच प्रमुख अन्तर बताइए।
Answer:
1. साम्यवाद ने अन्तर्राष्ट्रीयता के विचार को उभारा है। इस प्रकार साम्यवादी विचारधारा में विश्वबन्धुत्व एवं अन्तर्राष्ट्रीयता प्रमुख है। जबकि फासिस्टवाद के अनुसार दो राष्ट्रों या कई राष्ट्रों के मध्य कोई समन्वय अथवा मेल नहीं हो सकता। इसीलिए इन्होंने राष्ट्रीयता पर ही अधिक बल दिया।
2. साम्यवाद ने जातिभेद, रंगभेद एवं लिंगभेद को यदि समाप्त नहीं, तो कम अवश्य कर दिया। साम्यवाद स्वतंत्रता, समानता एवं प्रजातंत्र पर आधारित है। दूसरी ओर फासिस्टवाद, समाजवाद एवं प्रजातंत्र का विरोधी है। यह संसदीय प्रणाली में विश्वास नहीं करता। फासिज्म एवं प्रजातंत्र को परस्पर विरोधी माना जाता है। इसमें बहुमत के स्थान पर एक ही नेता की तानाशाही को अधिक महत्त्व दिया गया है।
In simple words: साम्यवाद अंतर्राष्ट्रीयता, समानता और प्रजातंत्र पर जोर देता है, जबकि फासिस्टवाद उग्र राष्ट्रवाद, एक नेता की तानाशाही और समाजवाद-प्रजातंत्र का विरोध करता है।
🎯 Exam Tip: साम्यवाद और फासिस्टवाद के बीच के अंतर को उनकी विचारधाराओं, राष्ट्रीयता, समानता और शासन प्रणाली के दृष्टिकोणों के आधार पर तुलनात्मक रूप से प्रस्तुत करें।
Question 6. खूनी रविवार और इसके बाद के घटनाक्रम को बताइए।
Answer: जनवरी, 1905 ई. में रूसी शासक जार से याचना करने के लिए एक रविवार को मजदूरों ने पादरी गैपॉन के नेतृत्व में एक शांतिपूर्ण जुलूस निकाला। लेकिन ज्यों ही जुलूस विंटर पैलेस पहुँचा, पुलिस एवं कोसैक्स ने उन पर हमला कर दिया। 100 से अधिक मजदूर मारे गए और कई घायल हो गए। यह घटना रविवार के दिन हुई थी, इसलिए इसे खूनी रविवार के नाम से जाना जाता है। खूनी रविवार ने घटनाओं की एक श्रृंखला को आरंभ कर दिया जिसे 1905 की क्रान्ति के नाम से जाना जाता है। पूरे देश में हड़तालों का आयोजन किया गया। जब नागरिक स्वतंत्रता के अभाव की शिकायत करते हुए छात्रों ने बहिष्कार किया तो विश्वविद्यालय बन्द हो गए। वकीलों, इंजीनियरों, डॉक्टर एवं अन्य मध्यम श्रेणी के मजदूरों ने यूनियन ऑफ यूनियन्स बनाया तथा एक संविधान सभा की माँग की।
In simple words: खूनी रविवार 9 जनवरी, 1905 को हुआ जब पादरी गैपॉन के नेतृत्व में मजदूरों के शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चलाई गई, जिसमें सैकड़ों लोग हताहत हुए। इस घटना ने पूरे देश में हड़तालों और विरोध प्रदर्शनों की एक श्रृंखला शुरू कर दी, जिसे 1905 की क्रांति के रूप में जाना जाता है, जिसमें नागरिक स्वतंत्रता और संविधान सभा की मांग उठी।
🎯 Exam Tip: खूनी रविवार की घटना के विवरण, उसके तत्काल परिणाम और 1905 की क्रांति को जन्म देने वाले व्यापक विरोध प्रदर्शनों को उजागर करना महत्वपूर्ण है।
Question 7. रूसी क्रान्ति की सफलता के पश्चात् समाजवादी प्रणाली लोगों के लिए किस तरह उपयोगी थी? स्पष्ट कीजिए।
Answer: निस्संदेह रूसी क्रान्ति की सफलता के बाद रूस में समाजवादी प्रणाली की स्थापना हुई थी। यह प्रणाली कई कारणों की वजह से लोगों के लिए अच्छी थी जिनमें से चार प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं जिनके आधार पर क्रांति के उपरांत स्थापित की गई समाजवादी प्रणाली लोकोपयोगी कही जा सकती है।
1. नई प्रणाली में निजी सम्पत्ति के स्वामित्व पर प्रतिबन्ध लगा दिया जोकि मूलतः पूँजीपतियों तथा मजदूरों को कम मजदूरी दिए जाने के कारण पैदा होती है।
2. रूसी क्रान्ति के बाद भूमि किसानों के पास तथा कारखाने मजदूरों के पास चले गए।
3. समाजवादी प्रणाली ने लोगों को स्वेच्छाचारी निरंकुश शासन से मुक्ति दिलाकर उन्हें सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद के अधीन ला दिया।
4. समाजवादी प्रणाली में हर व्यक्ति के लिए काम करना अनिवार्य हो गया। शोषण बन्द हो गया तथा प्रत्येक नागरिक को काम प्राप्त करने का मौलिक अधिकार मिल गया। एक नए समाज का निर्माण हुआ जोकि सामाजिक समानता और न्याय पर आधारित था।
In simple words: रूसी क्रांति के बाद स्थापित समाजवादी प्रणाली ने निजी संपत्ति पर प्रतिबंध लगाया, भूमि किसानों को और कारखाने मजदूरों को सौंप दिए, निरंकुश शासन से मुक्ति दिलाई, और हर व्यक्ति को काम का अधिकार देकर शोषण रहित, सामाजिक समानता और न्याय पर आधारित समाज की स्थापना की।
🎯 Exam Tip: समाजवादी प्रणाली के जनोपयोगी पहलुओं पर ध्यान दें, विशेषकर निजी संपत्ति के नियंत्रण, भूमि सुधार, शोषण मुक्ति और सामाजिक समानता के संदर्भ में।
Question 8. रूस में उदारवादियों के प्रमुख उद्देश्य क्या थे?
Answer: उदारवादियों के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार थे-
1. ये लोग सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (सभी नागरिकों को वोट का अधिकार देने) के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि वोट का अधिकार केवल संपत्तिधारियों को ही मिलना चाहिए। वे नहीं चाहते थे कि महिलाओं को भी मतदान का अधिकार मिले।
2. वे एक स्वतन्त्र न्यायपालिका चाहते थे।
3. उदारवादी एक ऐसा देश चाहते थे जो सभी धर्मों का सम्मान करे।
4. उन्होंने वंशवादी शासकों की निरंकुश सत्ता का विरोध किया।
5. वे सरकार के समक्ष व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा करना चाहते थे।
6. उन्होंने शासकों एवं अधिकारियों से मुक्त एक प्रतिनिधित्व करने वाली, निर्वाचित संसदीय सरकार की माँग की।
In simple words: रूस में उदारवादी वंशवादी शासकों की निरंकुश सत्ता के विरोधी थे और वे एक स्वतंत्र न्यायपालिका तथा निर्वाचित संसदीय सरकार चाहते थे जो व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करे, सभी धर्मों का सम्मान करे, लेकिन वे सार्वभौमिक मताधिकार के पक्ष में नहीं थे।
🎯 Exam Tip: उदारवादियों के उद्देश्यों को स्पष्ट करते समय उनकी शासन प्रणाली, मताधिकार, धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत अधिकारों पर उनके विचारों को शामिल करें।
Question 9. 1917 ई. की रूसी क्रान्ति में लेनिन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
Answer: लेनिन बोल्शेविक दल का एक नेता था। वह समाज तथा देश में बदलाव के लिए क्रांतिकारी तरीकों में विश्वास करता था। लेनिन मजदूरों में आर्थिक समानता लाना चाहता था। उसके विचार में संसदीय तौर-तरीके रूस जैसे देश में बदलाव नहीं ला सकते थे जहाँ लोकतंत्रात्मक अधिकारों का कोई अस्तित्व नहीं था और कोई संसद नहीं थी। अंततः बोल्शेविक रूस में 1917 ई. में एक सफल क्रान्ति ला सके और उन्होंने देश तथा समाज का ढाँचा पूरी तरह बदल दिया। उसने मजदूरों को 1917 की रूसी क्रांति के लिए एक हथियार के रूप में संगठित किया। उसने युद्ध का अन्त करने और किसानों को भूमि स्थानान्तरित करने की कोशिश की। केरेंस्की की सरकार के पतन के बाद लेनिन विश्व की प्रथम कम्युनिस्ट सरकार का मुखिया बना।
In simple words: व्लादिमीर लेनिन बोल्शेविक दल के प्रमुख नेता थे जिन्होंने 1917 की रूसी क्रांति में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने मजदूरों को संगठित किया, युद्ध समाप्त करने, किसानों को भूमि हस्तांतरित करने और लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रूस में क्रांतिकारी बदलाव लाने का नेतृत्व किया, अंततः विश्व की पहली कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना की।
🎯 Exam Tip: लेनिन की भूमिका का वर्णन करते समय उनके नेतृत्व, बोल्शेविक पार्टी से जुड़ाव, 'अप्रैल थीसिस' और क्रांति के बाद के प्रमुख निर्णयों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 10. 1917 की रूसी क्रान्ति के प्रमुख कारण बताइए।
Answer: रूस के उद्योगों पर प्रथम विश्व युद्ध का नकारात्मक प्रभाव पड़ा। बाल्टिक सागर पर जर्मनी के नियंत्रण के कारण रूस का आयात बन्द हो चुका था। 1916 ई. तक रेलवे लाइनें टूट चुकी थीं। अनिवार्य सैनिक सेवा के चलते देश के स्वस्थ लोगों को युद्ध में लगा दिया गया था जिससे देश में मजदूरों की कमी हो गयी थी। रूस में रोटी की दुकानों पर दंगे होना आम बात हो गयी थी।
किसान जमीन पर सर्फ के रूप में काम करते थे और उनकी पैदावार को अधिकतम भाग जमीन के मालिकों एवं विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों को चला जाता था। किसानों में जमीन की भूख प्रमुख कारक थी। विभिन्न दमनकारी नीतियों तथा कुण्ठा के कारण वे आमतौर पर लगान देने से मना कर देते और प्रायः जमींदारों की हत्या करते।
मजदूरों की स्थिति भी बहुत भयावह थी। वे अपनी शिकायतों को प्रकट करने के लिए कोई ट्रेड यूनियन अथवा कोई राजनीतिक दल नहीं बना सकते थे। अधिकतर कारखाने उद्योगपतियों की निजी सम्पत्ति थे। वे अपने स्वार्थ के लिए मजदूरों का शोषण करते थे। कई बार तो इन मजदूरों को न्यूनतम निर्धारित मजदूरी भी नहीं मिलती थी। कार्य घण्टों की कोई सीमा नहीं थी जिसके कारण उन्हें दिन में 12-15 घण्टे काम करना पड़ता था। जार का निरंकुश शासन बिल्कुल निष्प्रभावी हो चुका था। वह एक स्वेच्छाचारी, भ्रष्ट एवं दमनकारी शासक था जिसे देश के लोगों के हितों को कोई खयाल नहीं था।
In simple words: 1917 की रूसी क्रांति के प्रमुख कारणों में प्रथम विश्व युद्ध का नकारात्मक प्रभाव (आयात में कमी, रेलवे का टूटना, मजदूरों की कमी, खाद्य संकट), किसानों की दयनीय स्थिति (भूमिहीनता, शोषण) और मजदूरों का खराब कार्य माहौल (कम मजदूरी, लंबे घंटे) शामिल थे, जो जार के निरंकुश और भ्रष्ट शासन के तहत और बिगड़ गए।
🎯 Exam Tip: क्रांति के कारणों का वर्णन करते समय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों पहलुओं को शामिल करें, जिसमें प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव, किसानों और मजदूरों की दुर्दशा तथा जारशाही की निरंकुशता प्रमुख हैं।
Question 11. 1917 ई. की क्रान्ति के लिए रूस के पूँजीपति कहाँ तक उत्तरदायी थे?
Answer:
1. सेना के पास अस्त्र-शस्त्र, खाद्य-सामग्री और यहाँ तक कि पहनने के लिए वर्दी तक की भी कमी हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि युद्ध के दौरान भारी संख्या में रूसी सैनिक मारे गए। इसीलिए उन्हें युद्ध में भारी हार खानी पड़ी। इस प्रकार 1917 ई. की क्रांति लाने में रूस के पूँजीपतियों का भी योगदान था।
2. पूँजीपति किसानों तथा मजदूरों को बुरी तरह शोषण कर रहे थे। युद्ध के दिनों में भी उनके सामने मुनाफा कमाने के सिवाय और कोई काम न था। इसी उद्देश्य से वे चीजों के दाम बढ़ाते चले गए।
3. भ्रष्ट सेना अधिकारियों से मिलकर वे इतना अधिक मुनाफा कमाने लगे कि युद्ध के आठ महीनों में ही सेना को युद्ध सामग्री पहुँचानी असंभव हो गई।
In simple words: 1917 की क्रांति के लिए रूसी पूँजीपति इस मायने में उत्तरदायी थे कि उन्होंने युद्ध के दौरान भी मजदूरों और किसानों का शोषण जारी रखा, मुनाफाखोरी की, और भ्रष्ट सेना अधिकारियों के साथ मिलकर युद्ध सामग्री की आपूर्ति बाधित की, जिससे सेना कमजोर हुई और जनता में असंतोष बढ़ा।
🎯 Exam Tip: पूँजीपतियों की भूमिका को उनके शोषणकारी रवैये, मुनाफाखोरी और युद्ध के दौरान राष्ट्रहित की उपेक्षा के संदर्भ में समझाएँ।
Question 12. रूस की 1905 ई. की क्रान्ति को 1917 ई. की क्रान्ति की जननी क्यों कहा जाता है?
Answer: 9 जनवरी, 1905 ई. को रविवार के दिन मास्को में एक विशाल जुलूस रूसी शासक जार के महल की ओर अग्रसर था। आंदोलनकारी नेता जार को अपनी 11 सूत्रीय मांगों वाली एक याचिका देने जा रहे थे। जुलूस में शामिल लोग यह नारा लगा रहे थे कि “छोटे भगवान! हमें रोटी दो!” जार चाहता था कि रूस की जनता उसे भगवान की तरह पूजे। इसी कारण रूस के लोग उसे 'छोटा भगवान' कहते थे। जार के सैनिकों ने इन निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी जिसमें एक हजार के लगभग लोग वहीं मारे गए।
सेना ने 60 हजार के लगभग लोगों को बंदी बना लिया। इसीलिए 9 जनवरी, 1905 ई. का दिन रूस के इतिहास में लाल रविवार (खूनी रविवार) के नाम से जाना जाता है। उस समय तो प्रदर्शनकारियों को सेना ने बलपूर्वक दबा दिया किन्तु क्रान्ति की चिंगारी उनके भीतर सुलगती रही और 1917 ई. में एक क्रान्ति के रूप में प्रकट हुई। इसीलिए 1905 ई. की क्रान्ति को 1917 ई. की क्रान्ति की जननी कहा जाता है।
In simple words: 1905 की क्रांति को 1917 की क्रांति की जननी कहा जाता है क्योंकि 'खूनी रविवार' की घटना ने जनता में व्यापक असंतोष और विद्रोह की भावना को जन्म दिया, जिससे मजदूरों और किसानों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना सीखा, और यह चिंगारी अंततः 1917 में बड़े पैमाने पर क्रांति के रूप में प्रकट हुई।
🎯 Exam Tip: 1905 की क्रांति के तात्कालिक प्रभाव और 1917 की क्रांति के लिए उसके द्वारा तैयार की गई पृष्ठभूमि (जनता में असंतोष, संगठनात्मक अनुभव) पर जोर दें।
Question 13. प्रथम विश्व युद्ध का 1917 की रूसी क्रान्ति पर क्या प्रभाव पड़ा?
Answer: प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ होने से पहले यूरोप में दो गुट सक्रिय थे। एक गुट में इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा रूस थे जबकि दूसरे गुट में जर्मनी, ऑस्ट्रिया और इटली शामिल थे। प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ होने के समय रूस अपने गुट का साथ देने के लिए युद्ध में शामिल हो गया। लेकिन रूस के पास धन, सैन्य शक्ति और अस्त्र-शस्त्रों का अभाव था। ऐसे में रूसी सरकार ने किसानों को बलपूर्वक सेना में शामिल करके बड़ी संख्या में युद्ध के मैदान में भेज दिया। एक अनुमान के अनुसार प्रथम विश्व युद्ध में 17 लाख सैनिक मारे गए, 5 लाख के लगभग घायल हुए तथा 20 लाख बन्दी बनाए गए। ऐसी विषम परिस्थिति में युद्ध से पीड़ित सैनिकों के परिवारों तथा पड़ोसियों में सरकार के विरुद्ध विद्रोह की भावनाएँ पनपने लगीं। ये जनभावनाएँ आगे चलकर रूसी क्रान्ति का एक प्रमुख कारण बनीं।
In simple words: प्रथम विश्व युद्ध ने 1917 की रूसी क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। युद्ध में भारी सैन्य और मानवीय नुकसान, संसाधनों की कमी, और सरकार द्वारा किसानों को बलपूर्वक सेना में शामिल करने से जनता और सैनिकों में तीव्र असंतोष पनपा, जिससे सरकार के प्रति विद्रोह की भावनाएँ प्रबल हुईं।
🎯 Exam Tip: प्रथम विश्व युद्ध के नकारात्मक प्रभावों को सूचीबद्ध करें, जैसे सैन्य नुकसान, आर्थिक संकट, और जन-असंतोष, जो क्रांति के मुख्य कारणों में से थे।
Question 14. किसानों की हीन दशा 1917 ई. की रूसी क्रान्ति हेतु उत्तरदायी थी।” स्पष्ट कीजिए।
Answer:
1. किसानों पर करों को भारी बोझ होता था और वे सदा ऋण से दबे रहते थे। उन्हें दो वक्त भरपेट भोजन भी प्राप्त नहीं होता था। ऐसे में किसानों के पास सिवाय क्रान्ति के कोई चारा नहीं था। यही कारण था कि किसानों की हीन दशा 1917 ई. की क्रांति का मुख्य कारण बनी।
2. 1861 ई. से पहले रूस में सामन्तवादी प्रथा थी। किसान भूमि-दासों के रूप में जमीनों को जोतते थे परन्तु उन्हें अपनी उपज का एक बड़ा भाग सामन्तों को देना पड़ता था।
3. यद्यपि 1861 ई. में सामंती प्रथा समाप्त कर दी गई थी परन्तु फिर भी किसानों की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। उनके खेत छोटे-छोटे होते थे जिन पर वे पुराने ढंग से खेती करते थे।
In simple words: 1917 की रूसी क्रांति के लिए किसानों की दयनीय स्थिति एक प्रमुख कारण थी। उन्हें भारी करों और ऋण के बोझ तले दबाया गया था, भोजन की कमी थी, और सामंती प्रथा समाप्त होने के बावजूद उनकी कृषि जोतें छोटी और अविकसित रहीं, जिससे उनमें गहरा असंतोष और क्रांति की इच्छा पनपी।
🎯 Exam Tip: किसानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विश्लेषण करते समय सामंती प्रथा, भूमि स्वामित्व, करों और खाद्य सुरक्षा जैसे पहलुओं पर प्रकाश डालें।
Question 15. अक्टूबर क्रान्ति के बाद रूस में गृह युद्ध का मार्ग किस प्रकार प्रशस्त हुआ?
Answer: बोल्शेविकों द्वारा जमीन के पुनर्वितरण का आदेश देने पर रूसी सेना टूटने लगी। सैनिक और किसान जमीन के पुनर्वितरण के लिए घर जाना चाहते थे और अन्ततः उन्होंने सेना छोड़ना शुरू कर दिया। बोल्शेविक समाजवादी, उदारवादी, उनके नेता और राजशाही के समर्थकों ने बोल्शेविकों के विद्रोह की निन्दा की। उनके नेता दक्षिण एशिया में चले गए और बोल्शेविकों (रेड्स) से लड़ने के लिए टुकड़ियाँ एकत्र करने लगे। 1918 ई. और 1919 ई. के बाद ग्रीन्स (समाजवादी क्रांतिकारी) एवं 'ह्वाइट्स' (प्रो-जारीस्ट) ने अधिकतर रूसी साम्राज्य पर नियंत्रण कर लिया। फ्रांसीसी, अमेरिकी, अंग्रेज एवं जापानी टुकड़ियों ने उनकी मदद की। ये सभी सेनाएँ भी रूस में बढ़ रहे समाजवाद से चिंतित थीं। इसलिए वहाँ इन टुकड़ियों एवं बोल्शेविकों के बीच गृह युद्ध हो गया। इसके परिणामस्वरूप लूटपाट, डकैती और भुखमरी आम हो गई।
In simple words: अक्टूबर क्रांति के बाद बोल्शेविकों द्वारा भूमि पुनर्वितरण के आदेश से सेना बिखर गई, जिससे अन्य समाजवादी, उदारवादी और राजशाही समर्थक गुटों ने बोल्शेविकों के खिलाफ 'रेड्स' और 'ह्वाइट्स' के रूप में मोर्चा खोल दिया। फ्रांसीसी, अमेरिकी और ब्रिटिश जैसे विदेशी हस्तक्षेप ने समाजवाद के डर से इस संघर्ष को और भड़काया, जिससे व्यापक लूटपाट और भुखमरी के साथ गृह युद्ध शुरू हो गया।
🎯 Exam Tip: गृह युद्ध के मार्ग को स्पष्ट करने के लिए बोल्शेविकों के भूमि सुधार के प्रभावों, विभिन्न विरोधी गुटों के गठन और विदेशी हस्तक्षेप की भूमिका को उजागर करें।
Question 16. प्रथम विश्व युद्ध के बाद रूस की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रूस की सेना जर्मनी और ऑस्ट्रिया में 1914 तथा 1916 ई. के बीच बुरी तरह पराजित हुई। 1917 ई. तक 70 लाख लोग युद्ध में मारे गए। पीछे हटते रूसी सैनिकों ने फसलों व इमारतों को इसलिए नष्ट कर दिया। जिससे शत्रु सेना को उस स्थान पर टिक पाना संभव न हों। फसलों और इमारतों के विनाश के परिणामस्वरूप 30 लाख से अधिक लोग अपने ही देश में शरणार्थी बन गए। इस स्थिति ने:आर और सरकार को अपने देश में लोकप्रिय बना दिया। युद्ध का उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
अनेक उद्योग बन्द हो गए। बाल्टिक सागर मार्ग पर जर्मनों का नियंत्रण होने के कारण रूस अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल का आयात न कर सका। शहरों में रहने वाले लोगों के लिए रोटी और आटे की किल्लत हो गयी। 1916 ई. तक रोटी की दुकानों पर दंगे होना आम बात हो गयी। यूरोप के अन्य देशों की अपेक्षा रूस के औद्योगिक उपकरण अधिक तेजी से बेकार होने लगे। 1916 ई. तक रेलवे लाईंटूटने लगीं। सेहतमन्द लोगों को युद्ध में झोंक दिया गया। परिणामस्वरूप मजदूरों की कमी हो गई और आवश्यक सामान बनाने वाली छोटी कार्यशालाओं को बन्द कर दिया गया। अनाज का एक बड़ा भाग सैनिकों के भोजन के लिए भेज दिया गया।
In simple words: प्रथम विश्व युद्ध के बाद रूस की स्थिति अत्यंत खराब हो गई थी। लाखों सैनिक मारे गए, फसलों और इमारतों को नष्ट कर दिया गया, जिससे 30 लाख से अधिक लोग शरणार्थी बन गए। उद्योग बंद हो गए, कच्चे माल की कमी हुई, शहरों में रोटी का संकट गहराया और मजदूरों की भारी कमी हो गई, जिससे सरकार अलोकप्रिय हो गई।
🎯 Exam Tip: प्रथम विश्व युद्ध के बाद रूस की सामाजिक, आर्थिक और मानवीय संकटों को स्पष्ट रूप से दर्शाएँ, जो क्रांति के लिए आधार बने।
Question 17. 1905 ई. की रूसी क्रान्ति के पश्चात् जार ने रूस में क्या परिवर्तन किए?
Answer: 1905 ई. की क्रान्ति के पश्चात् जार द्वारा रूस के राजनैतिक परिवेश में निम्न महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए गए-
1. जार ने प्रथम डयूमा को 75 दिन के अन्दर और पुनः निर्वाचित दूसरे डयूमा को तीन माह के अन्दर बर्खास्त कर दिया। वह अपनी सत्ता पर किसी प्रकार की जवाबदेही अथवा अपनी शक्तियों में किसी तरह की कमी नहीं चाहता थी। उसने मतदान के नियम बदल डाले और उसने तीसरी डयूमा में रूढ़िवादी राजनेताओं को भर डाला। उदारवादियों तथा क्रांतिकारियों को बाहर रखा गया।
2. 1905 ई. की क्रान्ति के उपरान्त सभी समितियाँ एवं संगठन गैरकानूनी घोषित कर दिए गए।
3. राजनैतिक दलों पर कड़े प्रतिबन्ध लगा दिए गए।
In simple words: 1905 की क्रांति के बाद, जार ने राजनीतिक परिवर्तन किए, जिसमें डयूमा का गठन और बर्खास्तगी, मतदान नियमों में बदलाव, रूढ़िवादियों को बढ़ावा और उदारवादियों व क्रांतिकारियों को बाहर रखना शामिल था। इसके साथ ही, उसने सभी संगठनों और राजनीतिक दलों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए।
🎯 Exam Tip: 1905 की क्रांति के बाद जार द्वारा किए गए परिवर्तनों को, विशेषकर डयूमा के गठन और उसके सीमित अधिकारों, तथा राजनीतिक दमन के संदर्भ में सूचीबद्ध करें।
Question 18. बोल्शेविकों ने गृह युद्ध के दौरान अर्थव्यवस्था को जारी रखने के लिए क्या किया?
Answer: रूस में बोल्शेविक मजदूरों का बहुमत वाला समूह था जिसका नेता लेनिन था। बोल्शेविक समाज एवं देश में परिवर्तन लाने के लिए क्रांतिकारी तरीकों को अपनाने में विश्वास करते थे।
बोल्शेविकों ने गृह युद्ध के दौरान उद्योगों तथा बैंकों को राष्ट्रीयकृत रखा। उन्होंने समाजीकरण की हुई भूमि पर किसानों को खेती करने दी। बोल्शेविकों ने जब्त की गई भूमि के द्वारा यह दर्शाया कि सामूहिक कार्य क्या कर सकता है।
केन्द्रीयकृतं नियोजन की एक प्रक्रिया लागू की गई। कर्मचारियों ने यह आंका कि अर्थव्यवस्था किस प्रकार कार्य करेगी और अगले 5 वर्षों के लिए लक्ष्य निर्धारित किए। सभी मूल्य सरकार द्वारा निर्धारित किए जाते थे। केन्द्रीयकृत नियोजन से आर्थिक विकास को गति मिली। औद्योगिक उत्पादन बढ़ा (1929 से 1933 ई. के बीच में तेल, कोयले और इस्पात में 100 प्रतिशत वृद्धि हुई) । नए औद्योगिक नगर अस्तित्व में आए।
In simple words: गृह युद्ध के दौरान अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए बोल्शेविकों ने उद्योगों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, भूमि का समाजीकरण कर किसानों को खेती करने दी, और केंद्रीकृत नियोजन की प्रक्रिया लागू की, जिससे पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से उत्पादन में वृद्धि और नए औद्योगिक शहरों का विकास हुआ।
🎯 Exam Tip: बोल्शेविकों द्वारा गृह युद्ध के दौरान अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपनाई गई नीतियों, जैसे राष्ट्रीयकरण, भूमि नीति और केंद्रीकृत नियोजन पर ध्यान दें।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Question 1. स्तालिन के सामूहिकीकरण कार्यक्रम का विवरण दीजिए।
Answer: सोवियत रूस के कस्बे 1927-28 ई. तक अनाज की आपूर्ति में जबरदस्त कमी की समस्या से त्रस्त थे। अनाज की कमी की समस्या को दूर करने के लिए खेतों के सामूहिकीकरण का निर्णय सरकार द्वारा किया गया। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि अनाज की यह कमी आंशिक रूप से खेतों के छोटे आकार के कारण है। 1917 ई. के बाद जमीन किसानों को दे दी गई। इन छोटे आकार के खेतों का आधुनिकीकरण नहीं हो पाया। आधुनिक खेत विकसित करने और उन पर मशीनों की सहायता से औद्योगिक खेती करने के लिए कुलकों (रूस के धनी किसान) का सफाया करना, किसानों से जमीन छीनना और राज्य नियंत्रित बड़े खेत बेनाना आवश्यक हो गया।
स्तालिन का विचार था कि कुलक (रूस के धनी किसान) अधिक फायदा पाने के लिए अनाज को नहीं बेच रहे थे। इसलिए स्तालिन ने सामूहिकीकरण कार्यक्रम शुरू किया। 1929 ई. से सभी किसानों को सामूहिक खेत (कोलखोज) को जोतने के लिए विवश किया गया। ज्यादातर भूमि तथा कृषि यंत्रों का स्वामित्व सामूहिक खेतों को हस्तांतरित कर दिया गया। किसान भूमि पर काम करते तथा कोलखोज से होने वाला लाभ किसानों में बाँट दिया जाता था। यद्यपि स्तालिन की खेतों के सामूहिकीकरण की नीति किसानों में अलोकप्रिय थी और किसानों ने इसके विरोध में अपने पशुओं को मारना शुरू कर दिया।
फलस्वरूप 1929 से 1931 ई. के बीच पशुओं की संख्या एक तिहाई तक घट गयी। खेतों के सामूहिकीकरण का विरोध करने वालों को कठोर दण्ड दिया गया। स्तालिन सरकार ने कुछ स्वतंत्र खेती की अनुमति दी लेकिन ऐसे उत्पादकों के साथ कोई सहानुभूति नहीं दिखाई। सामूहिकीकरण के बावजूद उत्पादन तत्काल नहीं बढ़ा। 1930-33 ई. में खराब फसल के कारण भयंकर अकाल पड़ा जिसमें चालीस लाख लोग मारे गए।
In simple words: स्तालिन का सामूहिकीकरण कार्यक्रम 1929 में शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य अनाज की कमी को दूर करने के लिए छोटे खेतों को बड़े सामूहिक खेतों (कोलखोज) में बदलना था। यह नीति किसानों के विरोध के बावजूद लागू की गई, जिसके परिणामस्वरूप पशुधन में कमी और 1930-33 के अकाल में लाखों लोगों की मौत हुई।
🎯 Exam Tip: सामूहिकीकरण के उद्देश्यों और उसके परिणामों को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है, विशेषकर आर्थिक प्रभावों और किसान प्रतिक्रिया पर ध्यान देना चाहिए।
Question 2. उन परिस्थितियों को स्पष्ट कीजिए जिन्होंने जार को सत्ता छोड़ने पर विवश किया?
Answer: 7 मार्च, 1917 ई. को रूस की क्रान्ति शुरू हुई। शुरू में रूस की महिलाओं ने देश की असहनीय परिस्थितियों के विरुद्ध एक जुलूस निकाला जिसमें वे रोटी की माँग कर रही थीं। शीघ्र ही सैनिक, कारीगर तथा अन्य लोग इन विरोध प्रदर्शनो में शामिल हो गए। इन क्रान्तिकारियों ने बन्दीगृहों पर धावा बोलकर कैदियों को स्वतन्त्र कर दिया। क्रांतिकारियों की संख्या निरंतर बढ़ने लगी। इन लोगों ने मास्को एवं सेंट पीटर्सबर्ग पर अधिकार कर लिया। अंततः 15 मार्च, 1917 ई. को जार ने विवश होकर सत्ता का परित्याग कर दिया। राजकुमार ल्वोफ (केरेन्सकी) की देखरेख में पहली अस्थायी सरकार रूस में गठित की गयी।
निम्न कारण जार के पतन के लिए निश्चय ही उत्तरदायी थे-
1. किसान वर्ग भूमि पर केवल खेती करने वालों का अधिकार चाहता था, परन्तु जार ऐसा करने को तैयार न था।
2. कारीगर लोग कारखानों पर अपना नियंत्रण चाहते थे, परन्तु जार ने ऐसा करना स्वीकार न किया।
3. जार ने अपनी साम्राज्यवादी नीति के कारण अनेक जातियों को अपना दास बना रखा था। ऐसी जातियाँ जार को सहयोग देने के लिए तैयार न थीं।
4. बिना तैयारी के प्रथम विश्वयुद्ध में कूद पड़ने के कारण लाखों की संख्या में रूसी सैनिक मारे गए। ऐसे वातावरण में लोग शांति चाहते थे जबकि जार युद्ध को जारी रखने की बात पर अड़ा हुआ था।
5. देश में चारों ओर अकाल पड़ा था लोगों के पास खाने को कुछ नहीं था। जार लोगों की समस्या को नहीं सुलझा सका। अतः जार का शासन समाप्त हो गया और उसके राज्य का पतन हो गया।
In simple words: जार को 1917 में सत्ता छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध में भारी नुकसान, किसानों और मजदूरों के असंतोष, और जार की निरंकुश व जनविरोधी नीतियों ने पूरे देश में विद्रोह पैदा कर दिया था। बढ़ती भूखमरी और सैन्य हार ने जनता के गुस्से को भड़का दिया, जिससे अंततः जारशाही का पतन हुआ।
🎯 Exam Tip: जार के पतन के लिए उत्तरदायी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों को विस्तृत रूप से बताना चाहिए, खासकर युद्ध के प्रभावों और विभिन्न वर्गों के असंतोष पर बल दें।
Question 3. रूसी क्रान्ति में लेनिन की भूमिका बताइए ।
Answer: 1. जार की साम्राज्यवादी नीति का दुष्परिणाम रूस को भुगतना पड़ा। निरन्तर युद्धों के कारण देश के धन एवं संसाधनों का बड़े पैमाने पर विनाश हुआ। देश का आर्थिक संकट गहराने लगा और जनता जार के विरुद्ध हो गयी।
2. जार अपनी सुन्दर रानी जरीना के प्रभाव में था जबकि रानी जरीना पर रासपूतनिक नामक एक ढोंगी संत को प्रभाव था। यह ढोंगी संत दमन की नीति का पक्षपाती था। कहा जाता है कि यह संत एक गुण्डा था जो चोरी के अपराध में पकड़ा गया था। बाद में उसने साधु का वेश धारण कर लिया था। इतिहासकार रासपूतनिक को 'होली डेविल के नाम से पुकारते हैं।
3. 1905 ई. की क्रांति के कारण जार ने यह आश्वासन दिया था कि रूस में डयूमा अर्थात् पार्लियामेंट का निर्माण किया जाएगा परन्तु बाद में अपनी निरंकुशता के कारण उसने डयूमा को कोई काम नहीं करने दिया। वह इसके चुनाव में भी हस्तक्षेप करने लगा। पहली डयूमा को उसने केवल ढाई महीने में ही भंग कर दिया। जार ने एक विशाल साम्राज्य स्थापित कर रखा था जिसमें भाँति-भाँति के लोग रहते थे जो सदा उसके लिए कोई न-कोई समस्या खड़ी कर देते थे।
4. रूस का जार निकोलस द्वितीय बिल्कुल उद्दण्ड और निरंकुश शासक था। 1905 ई. की क्रांति दबाने के बाद भी निकोलस द्वितीय की निरंकुशता बढ़ती ही गई। उसने गुप्तचर विभाग का कार्य बहुत तेज कर दिया। जिन लोगों का क्रांति से जरा-सा भी संबंध समझा गया, उनको या तो मार दिया गया या उन्हें बंदी बना लिया गया या फिर देश-निकाला दे दिया गया।
In simple words: लेनिन बोल्शेविक दल के नेता थे जिन्होंने क्रांतिकारी तरीकों से रूस में सामाजिक और आर्थिक समानता लाने का प्रयास किया। उन्होंने 1917 की रूसी क्रांति में मजदूरों को संगठित करके युद्ध समाप्त करने, किसानों को भूमि हस्तांतरित करने और पहली कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
🎯 Exam Tip: लेनिन की भूमिका को 1917 की क्रांति में उनके योगदान, बोल्शेविक दल के नेतृत्व और नई आर्थिक नीतियों के संदर्भ में विश्लेषण करना चाहिए।
Question 4. रूस की क्रान्ति के वैश्विक प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
Answer: रूस की क्रान्ति का वैश्विक प्रभाव इस प्रकार है-
1. रूस की देखा-देखी अन्य सरकारों ने भी अपनी प्रजा की रोटी, कपड़ा व मकान जैसी मौलिक आवश्यकताओं की। पूर्ति को अपना मुख्य कर्तव्य समझना शुरू किया।
2. जब राष्ट्रसंघ की नींव रखी गई तो उसने विश्वभर के श्रमिकों की दशा सुधारने के लिए एक विशेष संस्था का निर्माण किया। यह संस्था अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
3. इसी प्रकार अनेक सरकारों ने शिक्षा देने का कार्य चर्च से छीन लिया।
4. पहले विश्वयुद्ध के बाद समाजवादी आंदोलन मोटे तौर पर दो भागों-सोशलिस्ट पार्टियों और कम्युनिस्ट पार्टियों में बँट गया। समाजवाद लाने की विधियों बल्कि समाजवाद की परिभाषा को लेकर भी उनके बीच अनेक मतभेद थे। इन मतभेदों के बावजूद अपने उदय के कुछ ही दशकों के अन्दर समाजवाद सबसे अधिक स्वीकृत विचारधाराओं में से एक बन गया। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद समाजवादी आंदोलन के प्रभाव को फैलना कुछ सीमा तक रूसी क्रांति का परिणाम है।
5. कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कोमिंटर्न), जिसका गठन पहली और दूसरी अन्तर्राष्ट्रीय क्रान्ति की तर्ज पर किया गया था, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रांतियों को प्रोत्साहन देने का साधन था। समाजवादी आन्दोलन में फूट पड़ गई। सोशलिस्ट पार्टियों के वामपंथी धड़ों ने अब स्वयं को कम्युनिस्ट पार्टियों के रूप में ढाल लिया। दुनिया के अधिकांश देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थापना हुई जो कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से संबंधित थीं। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल एक ऐसा मंच बन गया जहाँ नीतियों पर विचार-विमर्श होते थे और दुनिया में लागू करने के लिए साझी नीतियाँ तय होती थीं। 1943 ई. में कोमिंटर्न को समाप्त कर दिया।
6. क्रांति ने राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक सभी क्षेत्रों में क्रान्ति ला दी।
7. रूस की साम्यवादी सरकार को देखकर संसार के अन्य देशों, जैसे चीन व वियतनाम इत्यादि देशों में भी साम्यवादी सरकारें बनीं।
8. रूस की क्रान्ति के बाद पूरे विश्व में पूँजीपतियों व मजदूर वर्ग में एक निरंतर संघर्ष-सा चल पड़ा।
9. रूस में किसान व मजदूर वर्ग की सरकार स्थापित हो जाने से इस वर्ग का सम्मान संसार के अन्य देशों में भी बढ़ा।
In simple words: रूसी क्रांति के वैश्विक प्रभावों में अन्य सरकारों द्वारा जनता की बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देना, अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ का गठन, शिक्षा को चर्च से अलग करना, समाजवादी आंदोलन का दो भागों में बँटना (सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट), कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की स्थापना, तथा चीन और वियतनाम जैसे देशों में साम्यवादी सरकारों का उदय शामिल है। इसने पूंजीपतियों और मजदूर वर्ग के बीच संघर्ष को तेज किया और किसान-मजदूर सरकारों को सम्मान दिलाया।
🎯 Exam Tip: रूसी क्रांति के दूरगामी अंतर्राष्ट्रीय प्रभावों को स्पष्ट रूप से समझाना आवश्यक है, विशेषकर समाजवादी विचारधारा के प्रसार और अन्य देशों में सरकारों पर इसके प्रभाव को उजागर करें।
Question 5. लेनिन की नयी आर्थिक नीति का विवेचन कीजिए।
Answer: लेनिन की नयी आर्थिक नीति उसकी दूरदर्शिता का परिणाम थी जिसने रूस की स्थिर अर्थव्यवस्था को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर दिया। नई आर्थिक नीति, 1921 ई. में लागू की गयी। इस नीति के प्रमुख बिन्दु इस प्रकार हैं-
1. सरकारी फार्म स्थापित किए गए। इन फार्मों में कृषि संबंधी अनुसंधान कार्य (रिसर्च) तथा नये-नये प्रयोग किए जाने लगे।
2. भूमि की चकबंदी की गयी। इन बड़े फार्मों पर किसानों को नये यंत्र तथा अच्छी खाद-बीज आदि देकर मदद की गयी।
3. लोगों को वेतन नकद दिया जाने लगा।
4. युद्ध के समय साम्यवाद के अन्तर्गत (1917-1921) उठाए गए सभी कदमों को वापस ले लिया गया।
5. अनाज और माल का निजी क्षेत्र में व्यापार करने की अनुमति फिर दे दी गई।
6. कुछ उद्योगों में निजी प्रबंध स्वामित्व की छूट दी गई।
7. रूस में बहुत बड़ी संख्या में सहकारी संघ या समितियाँ स्थापित किए गए।
8. अकाल पीड़ितों की राहत के लिए बड़े पैमाने पर राहत कार्य शुरू किए गए।
In simple words: लेनिन की नई आर्थिक नीति (1921) का उद्देश्य युद्धकालीन साम्यवाद के कठोर कदमों को उलट कर अर्थव्यवस्था को स्थिर करना था। इसमें सरकारी फार्मों की स्थापना, भूमि चकबंदी, नकद वेतन की वापसी, अनाज और माल में निजी व्यापार की अनुमति, कुछ उद्योगों में निजी स्वामित्व, सहकारी संघों का गठन और अकाल राहत जैसे उपाय शामिल थे।
🎯 Exam Tip: लेनिन की नई आर्थिक नीति के मुख्य बिंदुओं को स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए, खासकर इसके उद्देश्यों और तात्कालिक प्रभावों पर ध्यान दें।
Question 6. रूस में 1905 ई. की क्रान्ति से पूर्व के घटनाक्रम का विवरण दीजिए।
Answer: रूस में जार का शासन तानाशाही शासन का प्रतिरूप था। जार निकोलस द्वितीय एक भ्रष्ट, दमनकारी एवं स्वेच्छाचारी शासक था। रूस में जार द्वारा जनसामान्य की उपेक्षा ने ही लोगों की स्थिति को विपन्न बना दिया था। मजदूर और किसान आपस में विभाजित थे। किसान प्रायः लगाने देने से मना कर देते थे और कभी-कभी वे जमींदार की हत्या तक कर देते थे।
पश्चिमी यूरोपीय देशों द्वारा किए गए लोकतांत्रिक प्रयोगों से प्रभावित होकर रूस के लोगों ने भी एक उत्तरदायी सरकार की माँग आरम्भ की, लेकिन जार ने उनकी माँग को अस्वीकार कर दिया। फलस्वरूप उदार सुधारक भी क्रान्ति की बातें करने लगे। सन् 1904 का वर्ष किसानों के लिए बहुत ही दुष्कर था। आवश्यक वस्तुओं के दाम बहुत ज्यादा बढ़ गए थे तथा मजदूरी 20 प्रतिशत तक घट गयी थी। कामगार संगठनों की सदस्यता शुल्क नाटकीय तरीके से बढ़ा दी गयी। सेंट पीटर्सबर्ग के 1,10,000 से अधिक मजदूर प्रतिदिन काम के घण्टों को कम करने, मजदूरी बढ़ाने तथा कार्यस्थितियों में सुधार करने की माँगों को लेकर हड़ताल पर चले गए।
जनवरी, 1905 ई. में जोर से याचना करने के लिए एक रविवार को मजदूरों ने पादरी गैपॉन के नेतृत्व में एक शान्तिपूर्ण जुलूस निकाला। किन्तु जब यह जुलूस विंटर पैलेस पहुँचा तो पुलिस ने उन पर हमला कर दिया। परिणामस्वरूप 100 से अधिक मजदूर इस हमले में मारे गए जबकि इससे कहीं अधिक घायल हो गए। यह घटना खूनी रविवार के नाम से जानी जाती है जिसने घटनाओं की एक श्रृंखला को शुरू कर दिया जिसे 1905 की क्रान्ति के नाम से जाना जाता है। इसी कारण पूरे देश में हड़ताले
In simple words: 1905 की क्रांति से पहले रूस में जार निकोलस द्वितीय का निरंकुश शासन था, जो किसानों और मजदूरों की दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार था। 1904 में महंगाई बढ़ने और मजदूरी घटने से असंतोष बढ़ा, जिसके कारण सेंट पीटर्सबर्ग में मजदूरों ने हड़ताल की। 1905 में पादरी गैपॉन के नेतृत्व में विंटर पैलेस पहुंचे जुलूस पर पुलिस ने हमला किया, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए, जिसे "खूनी रविवार" कहा गया, जिसने पूरे देश में क्रांति की लहर पैदा कर दी।
🎯 Exam Tip: 1905 की क्रांति से पहले की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और "खूनी रविवार" की घटना को विस्तार से समझाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने बाद की क्रांतियों की नींव रखी।
Question 7. रूसी क्रान्ति के प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: रूसी क्रान्ति के प्रमुख कारण : 19वीं शताब्दी में लगभग समस्त यूरोप में महत्त्वपूर्ण सामाजिक, आर्भिक एवं राजनीतिक परिवर्तन हो रहे थे। इनमें से ज्यादातर देश फ्रांस की भाँति गणतन्त्र थे और इंग्लैण्ड की भाँति संवैधानिक राजतंत्र । यूरोप के ज्यादातर देशों में प्राचीन सामंती अभिजात वर्ग के स्थान पर नवीन मध्यम वर्ग सत्तासीन हो गया था। लेकिन वह अभी भी पुरानी व्यवस्था में जी रहा था। इसी के चलते रूस में 1905 ई. और 1917 ई. में क्रान्ति घटित हुई। रूसी क्रान्ति के लिए निम्न परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं-
(1) विचारकों का प्रभाव- अनेक रूसी विचारक यूरोप में हो रहे परिवर्तनों से बहुत प्रभावित हुए। वे उसी तरह के परिवर्तन रूस में भी चाहते थे। इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने किसानों में जागृति लाने और मजदूरों में संगठित होने की विचारधारा का प्रसार किया। रूस की तत्कालीन स्थितियों में एक नरमपंथी, जनतंत्रवादी अथवा सुधारक को भी क्रांतिकारी बनने के लिए मजबूर होना पड़ा। 19वीं शताब्दी के अन्तिम चरण के दौरान जनता के पास जाओ' नामक एक आन्दोलन आरम्भ हुआ। यूरोप के उदार विचारों ने भी रूसी-क्रांति लाने में बड़ा योगदान दिया।
भौतिक क्रांति से पहले रूसी जनता के विचारों में क्रांति हुई। जार के अनेक प्रतिबंध लगाने पर भी पश्चिम के उदार विचारकों ने रूस में साहित्य के माध्यम से प्रवेश किया। विभिन्न रूसी लेखकों जैसे टालस्टाय, टर्जने आदि ने नवयुवकों के विचारों में क्रांति पैदा कर दी और वे पश्चिमी देशों के लोगों को प्राप्त सुविधाओं और अधिकारों की माँग करने लगे। जार ने जब उन्हें ठुकराने की कोशिश की तो उन्होंने क्रांति का मार्ग अपनाया।
(2) 1904-05 ई. में रूस-जापान युद्ध- 1904-05 ई. के रूसी-जापानी युद्ध में रूस की हार हुई। छोटे से देश से हारने के कारण जनता जार के शासन की विरोधी बन गई; क्योंकि उसको विश्वास हो गया कि इस हार का एकमात्र कारण जार की निर्बल और अयोग्य सरकार है जो युद्ध का ठीक प्रकार संचालन करने में असफल रही है।
(3) प्रथम विश्व युद्ध में हुई क्षति- प्रथम विश्व युद्ध में रूस की सेना की कई मोर्चे पर पराजय हुई। इस युद्ध में रूस के 60 लाख सैनिक मारे गए। रूस के लोग युद्ध को चालू रखने के पक्ष में नहीं थे। लगभग समस्त देशवासियों और विशेषकर सैनिकों में युद्ध को लेकर आक्रोश व्याप्त था।
(4) निरंकुश राजतंत्र- रूस की राजनैतिक स्थिति अक्टूबर क्रान्ति से बहुत अच्छी नहीं थी। चूँकि रूस में लम्बे समय से जार का निरंकुश, स्वेच्छाचारी, अत्याचारी, अकुशल और शोषक शासन अस्तित्व में था, ऐसे में रूस में क्रान्ति का घटित होना अवश्यम्भावी नहीं था। क्रांति से पूर्व रूस में शासन पर भ्रष्ट जमींदारों, शाही परिवार के लोगों, अमीरों एवं सैनिक अधिकारियों का प्रभुत्व था। कहने को तो रूस का साम्राज्य बहुत बड़ा था लेकिन इसमें गैररूसी जनता पर और भी अधिक अत्याचार होते थे।
जार को शेष जनता की भावनाओं का कोई आदर नहीं था। वस्तुतः शासकों व शासितों के मध्य अन्तर निरन्तर बढ़ता ही जा रहा था। अतः जनता में असंतोष की सभी सीमाएँ पार हो गई थीं। रूस के जार पूरी तरह निरंकुश व स्वेच्छाचारी थे। उन्होंने समय-समय पर जो परामर्शदात्री सभाएँ बनाईं, उनके विचारों को मानने के लिए वे बाध्य नहीं थे। जापान से परास्त
हो जाने के बाद निकोलस द्वितीय को डयूमा नामक संसद के गठन के लिए मजबूर होना पड़ा किन्तु वह वास्तव में जनता तथा विशेषतः समाज के दुर्बल वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी। इसकी शक्तियाँ सीमित थीं। सम्राट इसके निर्णय से बँधा हुआ नहीं था। वह पूर्ववत् निरंकुश शासक बना रहा। जब कभी जार के शासन के विरुद्ध जन-आंदोलन उठे, उन्हें निर्दयतापूर्वक दबा दिया गया। जार दैवी सिद्धान्त में विश्वास रखती था। वह और उसकी बुद्धिहीन पत्नी भोग-विलासी में डूबे थे। जनसाधारण को कोई राजनैतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे।
(5) किसानों की विपन्न दशा- रूस में किसानों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। रूस में 1861 ई. से पहले। सामन्तवादी व्यवस्था अस्तित्व में थी। अधिकांश किसान भूमि दासों या सर्फ के रूप में जमीन जोता करते थे। उन्हें अपनी उपज का एक बहुत बड़ा हिस्सा सामंतों को देना पड़ता था। यद्यपि 1861 ई. में सामंत-प्रथा समाप्त कर दी गई तो भी किसानों की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। उनके खेत बहुत छोटे होते थे जिने पर वे पुराने ढंग से खेती करते थे। उन पर लगे करों को बोझ भारी थी इसलिए वे सदा ऋण से दबे रहते थे। सच तो यह है कि उन्हें दो समय का भरपेट भोजन भी नसीब नहीं होता था। रूस में जमीन के लिए किसानों की भूख असंतोष का एक प्रबल सामाजिक कारण था।
(6) श्रमिकों की विपन्न दशा- औद्योगिक क्रान्ति के कारण रूस में अनेक उद्योगों की स्थापना की गयी थी, जिनमें लाखों मजदूर काम करते थे किन्तु मजदूरों की आर्थिक स्थिति और उनके कार्यस्थल की दशाएँ अत्यन्त शोचनीय थीं। ऐसी दयनीय स्थिति से बचने के लिए मजदूर एक होने लगे। उन्होंने श्रम संघों का निर्माण शुरू किया। परन्तु पूँजीपति व उनके इशारों पर चलने वाली सरकार ने 1900 ई. में श्रम संघ बनाने एवं हड़ताल करने पर रोक लगा दी। उन्हें न तो कोई राजनैतिक अधिकार प्राप्त थे और न ही उन्हें सुधारों की कोई उम्मीद थी।
(7) 1905 ई. की क्रान्ति- 9 जनवरी, 1905 को रविवार के दिन मास्को में जनसाधारण ने अपनी 11 सूत्रीय मांगों के साथ एक जुलूस निकाला। प्रदर्शनकारियों का उद्देश्य इन 11 सूत्रीय मांगों को जार के महल तक जाकर उसे जार को सौंपना था। “छोटे भगवान! हमें रोटी दो ।” के नारे के साथ ये लोग जार के महल की ओर बढ़ रहे थे, किन्तु जार ने इनसे बात करना तो दूर इन पर गोली चलवा दी। लगभग 1,000 प्रदर्शनकारी मारे गए तथा 60,000 गिरफ्तार कर लिए गए। रूस की सड़कों पर इस दिन बहुत रक्तपात हुआ। इसीलिए 9 जनवरी, 1905 ई. का रविवार का दिन रूसी इतिहास में खूनी रविवार के नाम से प्रसिद्ध है।
अनेक इतिहासकारों की राय है कि यद्यपि 1905 ई. की क्रांति को कुचलने में जार कामयाब रहा लेकिन इस क्रांति ने अक्टूबर, 1917 ई. की क्रांति के लिए उचित वातावरण तैयार करने में अहम् भूमिका अदा की। इस दिन हुए हत्याकांड से सारे रूस में रोष फैल गया। क्रांतिकारियों के समर्थन में जगह-जगह बन्द आयोजित किए गए और हड़ताले हुईं। इस क्रांति के कारण शिक्षित वर्ग के लोग भी क्रांतिकारियों के साथ मिल गए। इसीलिए 1905 ई. की क्रांति को कई बार 1917 ई. की क्रांति की जननी भी कहा जाता है।
In simple words: रूसी क्रांति के प्रमुख कारणों में यूरोपीय विचारों का प्रभाव, 1904-05 के रूस-जापान युद्ध में हार, प्रथम विश्व युद्ध की भारी क्षति, जार का निरंकुश शासन, किसानों और श्रमिकों की दयनीय स्थिति, तथा 1905 की क्रांति ("खूनी रविवार") शामिल थे। इन सभी कारकों ने जनता में व्यापक असंतोष और विद्रोह को जन्म दिया, जिससे अंततः क्रांति हुई।
🎯 Exam Tip: रूसी क्रांति के कारणों का विश्लेषण करते समय, विभिन्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों की स्थिति, युद्धों के प्रभाव और जारशाही की निरंकुश प्रकृति को बिंदुवार तरीके से प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है।
Free study material for Social Science
UP Board Solutions Class 9 Social Science Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति
Students can now access the UP Board Solutions for Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति prepared by teachers on our website. These solutions cover all questions in exercise in your Class 9 Social Science textbook. Each answer is updated based on the current academic session as per the latest UP Board syllabus.
Detailed Explanations for Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति
Our expert teachers have provided step-by-step explanations for all the difficult questions in the Class 9 Social Science chapter. Along with the final answers, we have also explained the concept behind it to help you build stronger understanding of each topic. This will be really helpful for Class 9 students who want to understand both theoretical and practical questions. By studying these UP Board Questions and Answers your basic concepts will improve a lot.
Benefits of using Social Science Class 9 Solved Papers
Using our Social Science solutions regularly students will be able to improve their logical thinking and problem-solving speed. These Class 9 solutions are a guide for self-study and homework assistance. Along with the chapter-wise solutions, you should also refer to our Revision Notes and Sample Papers for Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति to get a complete preparation experience.
FAQs
The complete and updated UP Board Solutions Class 9 Social Science Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति is available for free on StudiesToday.com. These solutions for Class 9 Social Science are as per latest UP Board curriculum.
Yes, our experts have revised the UP Board Solutions Class 9 Social Science Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Social Science concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.
Toppers recommend using UP Board language because UP Board marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our UP Board Solutions Class 9 Social Science Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति will help students to get full marks in the theory paper.
Yes, we provide bilingual support for Class 9 Social Science. You can access UP Board Solutions Class 9 Social Science Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति in both English and Hindi medium.
Yes, you can download the entire UP Board Solutions Class 9 Social Science Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति in printable PDF format for offline study on any device.