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Detailed Chapter 1 फ्रांसिसी क्रांति UP Board Solutions for Class 9 Social Science
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Class 9 Social Science Chapter 1 फ्रांसिसी क्रांति UP Board Solutions PDF
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
Question 1. फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई?
Answer: फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत निम्न परिस्थितियों में हुई-
1. राजनैतिक कारण-तृतीय स्टेट के प्रतिनिधियों ने मिराब्यो एवं आबेसिए के नेतृत्व में स्वयं को राष्ट्रीय सभा घोषित कर इस बात की शपथ ली कि जब तक वे लोग सम्राट की शक्तियों को सीमित करने तथा अन्यायपूर्ण विशेषाधिकारों वाली सामंतवादी प्रथा को समाप्त करने वाला संविधान नहीं बना लेंगे तब तक राष्ट्रीय सभा को भंग नहीं करेंगे। राष्ट्रीय सभा जिस समय संविधान बनाने में व्यस्त थी, उस समय सामंतों को विस्थापित करने के लिए अनेक स्थानीय विद्रोह हुए। अपने पिता की मृत्यु के बाद सन् 1774 ई. में 'लुईस सोलहवाँ' फ्रांस का राजा बना था। वह एक सज्जन परन्तु अयोग्य शासक था। राजा पर उसकी पत्नी 'मैरी एंटोइनेट' को भारी प्रभाव था।
प्रांतीय प्रशासन दो भागों में बँटा हुआ था जिन्हें क्रमशः 'गवर्नमेंट' तथा 'जनरेलिटी' के नामों से जाना जाता था। फ्रांसीसी शासन में एकरूपता का अभाव था। देश के भिन्न-भिन्न भागों में भिन्न-भिन्न प्रकार के कानून लागू थे। इसी बीच खाद्य संकट गहरा गया तथा जनसाधारण का गुस्सा गलियों में फूट पड़ा। 14 जुलाई को सम्राट ने सैन्य टुकड़ियों को पेरिस में प्रवेश करने के आदेश दिये। इसके प्रत्युत्तर में सैकड़ों क्रुद्ध पुरुषों एवं महिलाओं ने स्वयं की सशस्त्र टुकड़ियाँ बना लीं। ऐसे ही लोगों की एक सेना बास्तील किले की जेल (सम्राट की निरंकुश शक्ति का प्रतीक) में जा घुसी और उसको नष्ट कर दिया। इस प्रकार फ्रांसीसी क्रांति का प्रारंभ हुआ और व्यवस्था बदलने को आतुर लोग क्रांति में शामिल हो गए।
2. फ्रांस की आर्थिक परिस्थितियाँ-बूबों वंश का लुई सोलहवाँ 1774 में फ्रांस का राजा बना। उसने ऑस्ट्रिया की राजकुमारी मैरी एंटोइनेट से विवाह किया। उसके सत्तासीन होने के समय फ्रांस का कोष रिक्त था। राज्य पर कर्ज का बोझ निरंतर बढ़ रहा था। राज्य की कर व्यवस्था असमानता और पक्षपात के सिद्धांत पर निर्मित होने के कारण अत्यंत दूषित थी। कर दो प्रकार के थे- प्रत्यक्ष कर (टाइल) और धार्मिक कर (टाइद)। पादरी वर्ग और कुलीन वर्ग जिनका फ्रांस की लगभग 40% भूमि पर स्वामित्व था, प्रत्यक्ष करों से पूर्ण मुक्त थे तथा अप्रत्यक्ष करों से भी प्रायः मुक्त थे। ऐसे समय में अमेरिका के ब्रिटिश उपनिवेशों के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के सरकारी निर्णय ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया।
सेना का रखरखाव, दरबार का खर्च, सरकारी कार्यालयों या विश्वविद्यालयों को चलाने जैसे अपने नियमित खर्च निपटाने के लिए सरकार कर बढ़ाने पर बाध्य हो गई। कर बढ़ाने के प्रस्ताव को पारित करने के लिए फ्रांस के सम्राट लुई सोलहवें ने 5 मई, 1789 ई. को एस्टेट के जनरल की सभा बुलाई। प्रत्येक एस्टेट को सभा में एक वोट डालने की अनुमति दी गई। तृतीय एस्टेट ने इस अन्यायपूर्ण प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने सुझाव रखा कि प्रत्येक सदस्य का एक वोट होना चाहिए। सम्राट ने इंस अपील को ठुकरा दिया तथा तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधि सदस्य विरोधस्वरूप सभा से वाक आउट कर गए। फ्रांसीसी जनसंख्या में भारी बढ़ोत्तरी के कारण इस समय खाद्यान्न की माँग बहुत बढ़ गई थी। परिणामस्वरूप, पावरोटी (अधिकतर लोगों के भोजन का मुख्य भाग) के भाव बढ़ गए। बढ़ती कीमतों व अपर्याप्त मजदूरी के कारण अधिकतर जनसंख्या जीविका के आधारभूत साधन भी वहन नहीं कर सकती थी। इससे जीविका संकट उत्पन्न हो गया तथा अमीर और गरीब के मध्य दूरी बढ़ गई।
3. दार्शनिकों का योगदान- इस काल में फ्रांसीसी समाज में मांटेस्क्यू, वोल्टेयर तथा रूसो आदि विचारकों के विचारों के कारण तर्कवाद का प्रसार आरम्भ हुआ। इन विचारकों ने अपने साहित्य द्वारा पादरियों, चर्च की सत्ता तथा सामंती व्यवस्था की जड़ों को हिला दिया। अठारहवीं सदी के दौरान मध्यम वर्ग शिक्षित एवं धनी बन कर उभरा। सामंतवादी समाज द्वारा प्रचारित विशेषाधिकार प्रणाली उनके हितों के विरुद्ध थी। शिक्षित होने के कारण इस वर्ग के सदस्यों की पहुँच फ्रांसीसी एवं अंग्रेज राजनैतिक एवं सामाजिक दार्शनिकों द्वारा सुझाए गए समानता एवं आजादी के विभिन्न-विचारों तक थी। ये विचार सैलून एवं कॉफीघरों में जनसाधारण के बीच चर्चा तथा वाद-विवाद के फलस्वरूप पुस्तकों एवं अखबारों के द्वारा लोकप्रिय हो गए। दार्शनिकों के विचारों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जॉन लॉक, जीन जैक्स रूसो एवं मांटेस्क्यू ने राजा के दैवीय सिद्धान्त को नकार दिया।
4. सामाजिक परिस्थितियाँ- फ्रांस में सामंतवादी प्रथा प्रचलित थी, जो तीन वर्गों में प्रचलित थी। इन वर्गों को एस्टेट कहते थे। प्रथम एस्टेट में पादरी वर्ग आता था। इनका देश की 10% भूमि पर अधिकार था। द्वितीय एस्टेट में फ्रांस का कुलीन वर्ग सम्मिलित था। इनका देश की 30% भूमि पर अधिकार था। तृतीय एस्टेट में फ्रांस की लगभग 94% जनसंख्या आती थी। इस वर्ग में मध्यम वर्ग (लेखक, डॉक्टर, जज, वकील, अध्यापक, असैनिक अधिकारी आदि), किसानों, मजदूरों और दस्तकारों को सम्मिलित किया जाता था। यह केवल तृतीय एस्टेट ही थी जो सभी कर देने को बाध्य थी। पादरी एवं कुलीन वर्ग के लोगों को सरकार को कर देने से छूट प्राप्त थी परन्तु सरकार को कर देने के साथ-साथ किसानों को चर्च को भी कर देना पड़ता था। यह एक अन्यायपूर्ण स्थिति थी जिसने तृतीय एस्टेट के सदस्यों में असंतोष की भावना को बढ़ावा दिया।
5. तात्कालिक कारण- लुई सोलहवें ने 5 मई, 1789 ई. को नए करों के प्रस्ताव हेतु 1614 ई. में निर्धारित संगठन के आधार पर तीनों एस्टेट की एक बैठक बुलाई। तृतीय एस्टेट की माँग थी कि सभी एस्टेट की एक संयुक्त बैठक बुलाई जाए तथा 'एक व्यक्ति एक मत' के आधार पर मतदान कराया जाए। लुई सोलहवें ने ऐसा करने से मना कर दिया। अतः 20 जून को तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधि टेनिस कोर्ट में एकत्रित हुए तथा नवीन संविधान बनाने की घोषणा की।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत कई राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और तात्कालिक कारणों से हुई, जिसमें सम्राट की अयोग्यता, भारी कर्ज, खाद्य संकट, दार्शनिकों के विचारों का प्रसार और सामंतवादी व्यवस्था का अन्यायपूर्ण कर ढाँचा प्रमुख थे। इन परिस्थितियों ने जनता में असंतोष को बढ़ावा दिया, जिससे बास्तील पर हमले जैसी घटनाएँ हुईं और क्रांति शुरू हो गई।
🎯 Exam Tip: फ्रांसीसी क्रांति के कारणों को राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और तात्कालिक शीर्षकों में वर्गीकृत करना महत्वपूर्ण है ताकि परीक्षा में पूर्ण अंक प्राप्त हो सकें।
Question 2. फ्रांसीसी समाज के किन तबकों को क्रान्ति का फायदा मिला? कौन-से समूह सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर हो गए? क्रांति के नतीजों से समाज के किन समूहों को निराशा हुई होगी?
Answer: फ्रांसीसी क्रान्ति से सर्वाधिक लाभ तृतीय एस्टेट के धनी सदस्यों को हुआ। तृतीय एस्टेट में किसान, मजदूर, वकील, छोटे अधिकारीगण, अध्यापक, डॉक्टर एवं व्यवसायी शामिल थे। क्रांति से पहले इन्हें सभी कर अदा करने पड़ते थे। साथ ही इन लोगों को पादरियों और कुलीनों के द्वारा अपमानित भी किया जाता था। लेकिन क्रांति के बाद उनके साथ समाज के उच्च वर्ग के समान व्यवहार किया जाने लगा। पादरियों एवं कुलीन वर्ग के लोगों को अपने विशेषाधिकारों को त्यागने पर विवश होना पड़ा। क्रान्ति के परिणामों से महिलाओं को निराशा हुई क्योंकि वे लैंगिक आधार पर पुरुषों की समानता का अधिकार हासिल नहीं कर सकीं।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति का सबसे अधिक लाभ तृतीय एस्टेट के धनी सदस्यों को मिला, जिन्हें पहले अपमान और करों का बोझ सहना पड़ता था, लेकिन क्रांति के बाद उन्हें समाज में उच्च वर्ग के समान माना जाने लगा। पादरी और कुलीन वर्ग अपने विशेषाधिकार खोकर सत्ता छोड़ने पर मजबूर हो गए, जबकि महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार न मिलने के कारण निराशा हुई।
🎯 Exam Tip: क्रांति के लाभार्थियों, सत्ता खोने वालों और निराश समूहों को स्पष्ट रूप से पहचानना महत्वपूर्ण है, खासकर महिलाओं की स्थिति पर ध्यान दें।
Question 3. उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की दुनिया के लिए फ्रांसीसी क्रान्ति कौन-सी विरासत छोड़ गई?
Answer: इस क्रान्ति से विश्व के लोगों को निम्न विरासत प्राप्त हुई-
1. फ्रांसीसी क्रान्ति वैश्विक स्तर पर मानव इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।
2. यह विश्व का पहला ऐसा राष्ट्रीय आंदोलन था जिसने स्वतंत्रता, समानता और भाई-चारे जैसे विचारों को अपनाया। 19वीं व 20वीं सदी के प्रत्येक देश के लोगों के लिए ये विचार आधारभूत सिद्धान्त बन गए।
3. राजा राममोहन राय जैसे नेता फ्रांसीसियों द्वारा राजशाही एवं उसके निरंकुशवाद के विरुद्ध प्रचारित विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे।
4. इस क्रान्ति ने जनता की आवाज को प्रश्रय दिया। जनता उस समय दैवी अधिकार की धारणा, सामंती विशेषाधिकार, दास प्रथा एवं नियंत्रण को समाप्त करके योग्यता को सामाजिक उत्थान का आधार बनाना चाहती थी।
5. इसने यूरोप के लगभग सभी देशों सहित दक्षिण अमेरिका में प्रत्येक क्रान्तिकारी आंदोलन को प्रेरित किया।
6. इसने 'राष्ट्रवादी आंदोलन को बढ़ावा दिया। इस क्रांति ने पोलैण्ड, जर्मनी, नीदरलैण्ड तथा इटली के लोगों को अपने देशों में राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना हेतु प्रेरित किया।
7. इसने राजतंत्रात्मक स्वेच्छाचारी शासन का अन्त कर यूरोप तथा विश्व के अन्य भागों में गणतंत्र की स्थापना को बढ़ावा दिया।
8. इसने देश के सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार की अवधारणा का प्रचार किया जो बाद में कानून के सम्मुख लोगों की समानता की धारणा का आधार बना।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति ने दुनिया को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूलभूत विचार दिए, जिसने 19वीं और 20वीं सदी में कई राष्ट्रीय आंदोलनों को प्रेरित किया। इसने राजतंत्र को समाप्त कर गणतंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया, साथ ही दास प्रथा और सामंती विशेषाधिकारों के उन्मूलन की वकालत करते हुए सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों की अवधारणा को फैलाया।
🎯 Exam Tip: क्रांति की विरासत को वैश्विक प्रभाव और आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों के विकास पर इसके असर के संदर्भ में समझाना चाहिए।
Question 4. उन जनवादी अधिकारों की सूची बनाएँ जो आज हमें मिले हुए हैं और जिनका उद्गम फ्रांसीसी क्रान्ति में है।
Answer: ऐसे लोकतांत्रिक अधिकार जिनका हम आज सरलता से प्रयोग करते हैं तथा जिनका उद्भव फ्रांस की क्रान्ति के फलस्वरूप हुआ था, उनका विवरण इस प्रकार है-
1. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
2. शोषण के विरुद्ध अधिकार
3. संवैधानिक उपचारों का अधिकार
4. विचार अभिव्यक्ति का अधिकार
5. समानता का अधिकार
6. स्वतंत्रता का अधिकार
7. एकत्र होने तथा संगठन बनाने का अधिकार
8. सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार
9. संपत्ति का अधिकार।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति ने आधुनिक लोकतांत्रिक अधिकारों की नींव रखी, जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध अधिकार, संवैधानिक उपचार, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, स्वतंत्रता, संगठन बनाने का अधिकार, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार और संपत्ति का अधिकार शामिल हैं। ये अधिकार आज भी दुनिया भर के लोकतांत्रिक समाजों में मौलिक माने जाते हैं।
🎯 Exam Tip: इन अधिकारों की सूची को याद रखना महत्वपूर्ण है और यह पहचानना कि ये आधुनिक लोकतंत्रों में कैसे अंतर्निहित हैं।
Question 5. क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि सार्वभौमिक अधिकारों के सन्देश में नाना अंतर्विरोध थे?
Answer: विश्व में नागरिक अधिकारों की प्रथम घोषणा का प्रयास संभवतः फ्रांस में ही किया गया। फ्रांस के सार्वभौमिक अधिकारों के संदेश में स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के तीन मौलिक सिद्धान्तों पर बल दिया गया। वर्तमान में सभी लोकतांत्रिक देशों द्वारा इन सिद्धान्तों को अंगीकार किया गया है। लेकिन यह सत्य है कि फ्रांस का सार्वभौमिक अधिकारों का संदेश अनेक विरोधाभासों से घिरा हुआ है जिनका विवरण इस प्रकार है-
1. व्यापार और कार्य की स्वतंत्रता का कोई उल्लेख नहीं था।
2. स्वतंत्रता को अधिक प्रोत्साहन दिया गया था।
3. व्यक्ति के चहुँमुखी विकास को लक्ष्य नहीं बनाया गया।
4. शिक्षा के अधिकार को कोई महत्त्व नहीं दिया गया।
5. घोषणा में कहा गया था कि “कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है। सभी नागरिकों को व्यक्तिगत रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से इसके निर्माण में भाग लेने का अधिकार है। कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं।” किन्तु जब फ्रांस एक संवैधानिक राजशाही बना तो लगभग 30 लाख नागरिक जिनमें 25 वर्ष से कम आयु के पुरुष एवं महिलाएँ शामिल थीं, उन्हें बिल्कुल वोट ही नहीं डालने दिया गया।
6. फ्रांस ने उपनिवेशों पर कब्जा करना व उनकी संख्या बढ़ाना जारी रखा।
7. फ्रांस में उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक दासप्रथा जारी रही।
In simple words: हाँ, फ्रांसीसी क्रांति के सार्वभौमिक अधिकारों के संदेश में कई विरोधाभास थे। जबकि इसने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर जोर दिया, इसने व्यापार और कार्य की स्वतंत्रता, शिक्षा का अधिकार या व्यक्ति के समग्र विकास को स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं किया। साथ ही, इसने मतदान के अधिकार को सीमित रखा और दास प्रथा तथा उपनिवेशवाद को जारी रखा, जो इसके समानता के दावों के विपरीत था।
🎯 Exam Tip: अधिकारों के सार्वभौमिक संदेश में अंतर्विरोधों को स्पष्ट करने के लिए मतदान, दास प्रथा और उपनिवेशवाद जैसे विशिष्ट उदाहरण देना महत्वपूर्ण है।
Question 6. नेपोलियन के उदय को कैसे समझा जा सकता है?
Answer: नेपोलियन का उदय 1796 में निर्देशिका के पतन के बाद हुआ। निदेशकों का प्रायः विधान सभाओं से झगड़ा होता था जो कि बाद में उन्हें बर्खास्त करने का प्रयास करती। निर्देशिका राजनैतिक रूप से अत्यधिक अस्थिर थी; अतः नेपोलियन सैन्य तानाशाह के रूप में सत्तारूढ़ हुआ। सन् 1804 में नेपोलियन बोनापार्ट ने स्वयं को फ्रांस का सम्राट बना लिया। 1799 ई. में डायरेक्टरी के शासन का अंत करके वह फ्रांस का प्रथम काउंसल बन गया। शीघ्र ही शासन की समस्त शक्तियाँ उसके हाथों में केंद्रित हो गईं।
सन् 1793-96 के मध्य फ्रांसीसी सेनाओं ने लगभग सम्पूर्ण पश्चिमी यूरोप पर विजय हासिल कर ली। जब नेपोलियन माल्टा, मिस्र और सीरिया की ओर बढ़ा (1797-99) तथा इटली से फ्रांसीसियों को बाहर ढकेल दिया गया तब सत्ता पर नेपोलियन का कब्जा हुआ, फ्रांस ने अपने खोए हुए भूखण्ड पुनः वापस ले लिए। उसने आस्ट्रिया को 1805 में, प्रशा को 1806 में और रूस को 1807 में परास्त किया। समुद्र के ऊपर ब्रिटिश नौ सेना पर फ्रांसीसी अपना प्रभुत्व कायम नहीं कर सके। अंततः लगभग सारे यूरोपीय देशों ने मिलकर 1813 ई. में लिव्जिंग में फ्रांस को परास्त किया। बाद में इन मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने पेरिस (फ्रांस की राजधानी) पर अधिकार कर लिया। जून, 1815 ई. में नेपोलियन ने वाटरलू में पुनः विजय प्राप्त करने का असफल प्रयास किया। नेपोलियन ने अपने शासन काल में निजी संपत्ति की सुरक्षा और नाप-तोल की एक समान दशमलव प्रणाली सम्बन्धी कानून बनाए।
In simple words: नेपोलियन का उदय डायरेक्टरी शासन की राजनीतिक अस्थिरता और संघर्षों का परिणाम था। 1796 में सत्ता में आने के बाद, उसने सैन्य सफलताओं के माध्यम से अपनी शक्ति बढ़ाई और 1804 में खुद को सम्राट घोषित कर दिया, जिससे वह फ्रांस का प्रथम काउंसल बना और शासन की सभी शक्तियाँ अपने हाथों में केंद्रित कर लीं।
🎯 Exam Tip: नेपोलियन के उदय को डायरेक्टरी की कमजोरियों और उसकी सैन्य विजयों के संयोजन के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. गिलोटिन किसे कहते हैं?
Answer: यह दो स्तम्भों और एक फरसे से मिलकर बना एक ऐसा यंत्र है जिसमें फरसा ऊपर से नीचे की ओर आता है ओर नीचे लिटाये गए मृत्युदण्ड प्राप्त व्यक्ति का एक ही बार में सिर धड़ से अलग कर देता है। फ्रांसीसी क्रांति के बाद इस यंत्र का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया।
In simple words: गिलोटिन एक प्रकार का यंत्र था जिसमें दो खंभे और एक भारी ब्लेड होता था, जिसका उपयोग फ्रांसीसी क्रांति के दौरान अपराधियों के सिर को धड़ से अलग करके मृत्युदंड देने के लिए किया जाता था।
🎯 Exam Tip: गिलोटिन की कार्यप्रणाली और फ्रांसीसी क्रांति में इसके उपयोग को संक्षेप में बताएं।
Question 2. आतंक के राज्य से क्या आशय है?
Answer: फ्रांस में क्रान्ति के बाद अस्तित्व में आयी रोब्सपियर सरकार में कुलीन एवं पादरी, दूसरे राजनीतिक दल के सदस्यों, रोब्सपियर की कार्य-पद्धति से असहमत पार्टी के सदस्यों को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया जाता था। इन बंदियों पर क्रान्तिकारी अदालत में मुकदमा चलाया जाता था। दोष सिद्ध होने पर इन लोगों को गिलोटिन पर चढ़ा दिया जाता था।
In simple words: आतंक का राज्य फ्रांसीसी क्रांति के दौरान रोब्सपियर के नेतृत्व वाली सरकार का वह दौर था, जिसमें असहमति रखने वाले कुलीनों, पादरियों और राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार करके गिलोटिन पर चढ़ाया जाता था।
🎯 Exam Tip: आतंक के राज्य की अवधि और रोब्सपियर की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 3. रोब्सपियर सरकार के दो प्रमुख कार्य बताइए।
Answer: रोब्सपियर सरकार के दो प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं-
1. खाद्यान्न संकट को देखते हुए मांस और पावरोटी की बिक्री हेतु राशनिंग व्यवस्था लागू कर दी गयी।
2. मजदूरी और कीमतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करने वाला कानून बनाया गया।
In simple words: रोब्सपियर सरकार के दो प्रमुख कार्य थे खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए मांस और पावरोटी की राशनिंग व्यवस्था लागू करना और मजदूरी तथा कीमतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करना।
🎯 Exam Tip: रोब्सपियर सरकार के प्रमुख आर्थिक नियंत्रण उपायों पर प्रकाश डालें।
Question 4. रोब्सपियर को गिलोटिन पर चढ़ाने का कारण बताइए।
Answer: रोब्सपियर की कठोर नीतियों को फ्रांस में निर्ममता से लागू किया गया, जिसमें हजारों निर्दोष लोग भी सन्देह में मारे गए। सन् 1794 में न्यायालय द्वारा रोब्सपियर को उत्पीड़ने का दोषी ठहराया गया और बंदी बना लिया गया तथा अगले ही दिन उसे गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया।
In simple words: रोब्सपियर को उसकी अत्यधिक कठोर और निर्मम नीतियों के कारण गिलोटिन पर चढ़ाया गया, जिसके तहत हजारों निर्दोष लोगों को संदेह के आधार पर मार दिया गया था, जिससे उसके अपने सहयोगी भी उसके खिलाफ हो गए।
🎯 Exam Tip: रोब्सपियर के पतन का मुख्य कारण उसकी निरंकुश और कठोर नीतियां थीं।
Question 5. 'सोसाइटी ऑफ रेवोल्यूशनरी एण्ड रिपब्लिकन विमेन' की प्रमुख माँग बताइए।
Answer: इस क्लब की प्रमुख माँग थी कि फ्रांस के समाज में महिला-पुरुष के बीच लैंगिक आधार पर विभेद न करके उन्हें एक समान माना जाए और समान राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाएँ।
In simple words: 'सोसाइटी ऑफ रेवोल्यूशनरी एण्ड रिपब्लिकन विमेन' की मुख्य मांग थी कि फ्रांस में महिलाओं और पुरुषों के बीच लैंगिक भेदभाव समाप्त किया जाए और महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार मिलें।
🎯 Exam Tip: महिला क्लबों की मांग के मूल में लैंगिक समानता और राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति थी।
Question 6. नेपोलियन बोनापार्ट का उदय किस प्रकार हुआ?
Answer: डायरेक्टरी शासन के दौरान फ्रांस में डायरेक्टरी के सदस्यों के मध्य परस्पर झगड़ा विधान परिषदों से होता था और विधान परिषद् डायरेक्टरी को बर्खास्त करने का प्रयास करती थी। डायरेक्टरी की राजनीतिक अस्थिरता ने सेनिक तानाशाह नेपोलियन बोनापार्ट के उद्भव का मार्ग प्रशस्त किया।
In simple words: नेपोलियन बोनापार्ट का उदय डायरेक्टरी शासन की राजनीतिक अस्थिरता और उसके सदस्यों के आपसी झगड़ों के कारण हुआ, जिससे एक मजबूत सैन्य नेता के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ।
🎯 Exam Tip: डायरेक्टरी की राजनीतिक अस्थिरता ने नेपोलियन के लिए सत्ता में आने का अवसर प्रदान किया।
Question 7. फ्रांस के राष्ट्रीय गान को किस नाम से जाना जाता है?
Answer: फ्रांस के राष्ट्रीय गान को 'मार्सिले' नाम से जाना जाता है।
In simple words: फ्रांस के राष्ट्रीय गान का नाम 'मार्सिले' है।
🎯 Exam Tip: 'मार्सिले' नाम याद रखना सीधे तौर पर अंक दिला सकता है।
Question 8. जैकोबिन क्लब के नेता का नाम लिखिए।
Answer: मेक्समिलियन रोबेस्प्येर।
Question 9. फ्रांसीसी क्रांति के समय फ्रांस पर किस शासक का शासन था?
Answer: लुईस XVI (सोलहवाँ) का।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति के समय फ्रांस का शासक लुई सोलहवाँ था।
🎯 Exam Tip: शासक का नाम 'लुईस सोलहवाँ' स्पष्ट रूप से याद रखें।
Question 10. लुईस सोलहवाँ फ्रांस की राजगद्दी पर कब आसीन हुआ था?
Answer: 1774 ई. में।
In simple words: लुई सोलहवाँ 1774 ई. में फ्रांस की राजगद्दी पर बैठा था।
🎯 Exam Tip: यह एक सीधा तथ्य-आधारित प्रश्न है; वर्ष को सही ढंग से याद करें।
Question 11. लुईस XVI किस राजवंश से संबंधित था?
Answer: बूबों राजवंश।
In simple words: लुई सोलहवाँ बूबों राजवंश से संबंधित था।
🎯 Exam Tip: राजवंश का नाम 'बूबों' याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 12. फ्रांसीसी समाज किन तीन प्रमुख वर्गों में बँटा हुआ था?
Answer:
1. प्रथम एस्टेट,
2. द्वितीय एस्टेट,
3. तृतीय एस्टेट।
In simple words: फ्रांसीसी समाज तीन प्रमुख वर्गों- प्रथम एस्टेट, द्वितीय एस्टेट और तृतीय एस्टेट में बँटा हुआ था।
🎯 Exam Tip: फ्रांसीसी समाज के तीन एस्टेट्स के नाम याद रखना आवश्यक है।
Question 13. धार्मिक करों को किस नाम से जाना जाता था?
Answer: टाइद।
In simple words: धार्मिक करों को 'टाइद' के नाम से जाना जाता था।
🎯 Exam Tip: धार्मिक कर का नाम 'टाइद' सटीक रूप से याद करें।
Question 14. एस्टेट जनरल की बैठक में तीनों वर्गों के कितने-कितने प्रतिनिधि आमंत्रित किए गए थे?
Answer: प्रथम एस्टेट (300 प्रतिनिधि), द्वितीय एस्टेट (300 प्रतिनिधि)।
In simple words: एस्टेट जनरल की बैठक में प्रथम एस्टेट से 300 और द्वितीय एस्टेट से 300 प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक एस्टेट से प्रतिनिधियों की संख्या याद रखें।
Question 15. एस्टेट जनरल की बैठक में किन वर्गों का प्रवेश वर्जित था?
Answer:
1. किसानों,
2. औरतों,
3. कारीगरों।
In simple words: एस्टेट जनरल की बैठक में किसानों, औरतों और कारीगरों जैसे वर्गों का प्रवेश वर्जित था।
🎯 Exam Tip: बैठक में प्रवेश वर्जित वर्गों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सामाजिक असमानता को दर्शाता है।
Question 16. बास्तील का पतन कब हुआ?
Answer: 14 जुलाई, 1789 ई.।
In simple words: बास्तील का पतन 14 जुलाई, 1789 ई. को हुआ था।
🎯 Exam Tip: बास्तील के पतन की तारीख फ्रांसीसी क्रांति के एक महत्वपूर्ण मील के पत्थर के रूप में याद रखें।
Question 17. नेशनल असेम्बली ने सामंती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश कब पारित किया?
Answer: 4 अगस्त, 1789 ई.।
In simple words: नेशनल असेम्बली ने 4 अगस्त, 1789 ई. को सामंती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश पारित किया।
🎯 Exam Tip: सामंती व्यवस्था के उन्मूलन की तारीख को सटीक रूप से याद करें।
Question 18. त्रिभुज के अन्दर रोशनी बिखेरती आँख किसका प्रतीक है?
Answer: त्रिभुज के अन्दर रोशनी बिखेरती सर्वदर्शी आँख ज्ञान का प्रतीक है।
In simple words: त्रिभुज के अन्दर रोशनी बिखेरती सर्वदर्शी आँख ज्ञान का प्रतीक है।
🎯 Exam Tip: इस प्रतीक का अर्थ 'ज्ञान' के रूप में याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 19. फ्रांस के राष्ट्रीय रंग कौन-से हैं?
Answer: (This question is left blank in the source, so the answer will be blank as well)
In simple words: (The source text does not provide an answer for France's national colors).
🎯 Exam Tip: (Since the answer is not provided in the source, students should research France's national colors: Blue, White, Red).
Question 20. प्रारम्भिक वर्षों में क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं के जीवन में सुधार के लिए किस तरह के कानून पास किए?
Answer: सरकारी विद्यालयों की स्थापना के साथ ही सभी लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया। अब पिता उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ शादी के लिए बाध्य नहीं कर सकते थे।
In simple words: प्रारंभिक क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं के जीवन में सुधार के लिए सरकारी विद्यालयों की स्थापना की, सभी लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा अनिवार्य की, और पिता को उनकी मर्जी के खिलाफ शादी के लिए बाध्य करने पर प्रतिबंध लगा दिया।
🎯 Exam Tip: महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा के लिए उठाए गए कदमों को विशेष रूप से याद रखें।
Question 21. 18वीं सदी में फ्रांसीसी समाज कितने एस्टेट्स में बँटा हुआ था?
Answer: 18वीं सदी में फ्रांसीसी समाज तीन एस्टेट्स में बँटा हुआ था-
1. प्रथम एस्टेट-पादरी वर्ग,
2. द्वितीय एस्टेट-कुलीन वर्ग, तृतीय एस्टेट-बड़े व्यवसायी, व्यापारी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान, कारीगर, छोटे किसान, भूमिहीन, मजदूर, नौकर।
In simple words: 18वीं सदी में फ्रांसीसी समाज मुख्य रूप से तीन एस्टेट्स में विभाजित था: प्रथम एस्टेट (पादरी), द्वितीय एस्टेट (कुलीन वर्ग), और तृतीय एस्टेट (जिसमें बड़े व्यवसायी, वकील, किसान, मजदूर और नौकर सहित आम जनता शामिल थी)।
🎯 Exam Tip: तीनों एस्टेट्स के घटकों और उनकी सामाजिक स्थिति को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 22. 18वीं सदी में फ्रांस में किस नए सामाजिक वर्ग का उदय हुआ?
Answer: मध्यम वर्ग का।
In simple words: 18वीं सदी में फ्रांस में एक नए सामाजिक वर्ग, 'मध्यम वर्ग' का उदय हुआ।
🎯 Exam Tip: 'मध्यम वर्ग' के उदय को फ्रांसीसी क्रांति के एक महत्वपूर्ण सामाजिक विकास के रूप में याद रखें।
Question 23. एस्टेट जनरल (प्रतिनिधि सभा) की अन्तिम बैठक कब हुई थी?
Answer: 1614 ई.।
In simple words: एस्टेट जनरल की अंतिम बैठक 1614 ई. में हुई थी।
🎯 Exam Tip: अंतिम बैठक की तारीख को सटीक रूप से याद करें।
Question 24. 'द सोशल कॉन्ट्रैक्ट' नामक पुस्तक किसने लिखी थी?
Answer: रूसो।
In simple words: 'द सोशल कॉन्ट्रैक्ट' नामक पुस्तक जीन-जैक्स रूसो ने लिखी थी।
🎯 Exam Tip: रूसो को 'द सोशल कॉन्ट्रैक्ट' के लेखक के रूप में याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 25. जैकोबिन सरकार के पतन के बाद फ्रांस में किस तरह की सरकार स्थापित हुई?
Answer: जैकोबिन सरकार के पतन के उपरान्त एक नया संविधान लागू किया गया जिसने समाज के संपत्तिहीन नागरिकों को मताधिकार से वंचित रखा। संविधान में दो चुनी गई विधान परिषदों का प्रावधान था। इन परिषदों ने पाँच सदस्यों वाली एक कार्यपालिका डाइरेक्ट्री को नियुक्त किया जिसे डाइरेक्ट्री शासन कहा गया।
In simple words: जैकोबिन सरकार के पतन के बाद फ्रांस में एक नया संविधान लागू किया गया, जिसने संपत्तिहीन नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर दिया और दो विधान परिषदों के माध्यम से पाँच सदस्यों वाली 'डाइरेक्ट्री' नामक कार्यपालिका स्थापित की।
🎯 Exam Tip: जैकोबिन के बाद के शासन के ढांचे और मताधिकार पर इसके प्रतिबंधों पर ध्यान दें।
Question 26. तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ किस तरह के कार्य करती थीं?
Answer: तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ जीविका निर्वाह के लिए काम करती थीं। वे सिलाई, बुनाई, कपड़ों की धुलाई करती थीं, बाजारों में फल-फूल और सब्जियाँ बेचती थीं अथवा संपन्न घरों में घरेलू काम करती थीं।
In simple words: तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ अपनी जीविका चलाने के लिए सिलाई, बुनाई, कपड़े धोने, बाजारों में फल-सब्जियाँ बेचने और संपन्न घरों में घरेलू काम करने जैसे कार्य करती थीं।
🎯 Exam Tip: तीसरे एस्टेट की महिलाओं के विभिन्न प्रकार के कार्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है जो उनकी आर्थिक स्थिति को दर्शाता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. फ्रांस की क्रान्तिकारी महिला ओलिम्प डि गाजेस (1748-1793) के बारे में आप क्या जानते हैं?
Answer: फ्रांस की क्रान्तिकालीन राजनीति में सक्रिय ओलिम्प सबसे महत्त्वपूर्ण महिला थी। उन्होंने फ्रांस के संविधान नथा 'पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र' का विरोध किया क्योंकि उनमें महिलाओं को मानव मात्र के मूलभूत अधिकारों से वंचित किया गया था। इसलिए उन्होंने 1791 ई. में 'महिला एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र तैयार किया जिसे महारानी एवं नेशनल असेंबली के सदस्यों पर यह माँग करते हुए भेजा गया था कि वे इस पर कार्यवाही करें। सन् 1793 में ओलिम्प ने महिला क्लवों को जबरन बंद करने के लिए जैकोबिन सरकार की आलोचना की। उन पर नेशनल कन्वेंशन द्वारा मुकदमा चलाया गया तथा फाँसी पर लटका दिया गया।
In simple words: ओलिम्प डि गाजेस फ्रांसीसी क्रांति की एक महत्वपूर्ण महिला थीं जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने 'पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र' में महिलाओं को शामिल न किए जाने का विरोध किया, अपना स्वयं का घोषणापत्र तैयार किया, और जैकोबिन सरकार की आलोचना के कारण उन्हें 1793 में फाँसी दे दी गई।
🎯 Exam Tip: ओलिम्प डि गाजेस की भूमिका, उनके घोषणापत्र और उनके अंत को याद रखें, जो महिलाओं के अधिकारों के लिए उनके संघर्ष को दर्शाता है।
Question 2. फ्रांस की क्रान्ति के बाद समता स्थापित करने के लिए रोबेस्प्येर सरकार ने कौन-से नियम बनाए?
Answer:
1. बोलचाल और संबोधन में भी बराबरी का आचार-व्यवहार लागू करने की कोशिश की गई। परंपरागत मॉन्स्यूर (महाशय) एवं मदाम (महोदया) के स्थान पर अब सभी फ्रांसीसी पुरुषों एवं महिलाओं को सितोयेन (नागरिक) एवं सितोयीन (नागरिका) नाम से संबोधित किया जाने लगा।
2. चर्को को बन्द कर दिया गया और उनके भवनों को बैरक या दफ्तर बना दिया गया।
3. रोबेस्प्येर सरकार ने कानून बना कर मजदूरी एवं कीमतों की अधिकतम सीमा तय कर दी।
4. गोश्त एवं पावरोटी की राशनिंग कर दी गई।
5. किसानों को अपना अनाज शहरों में ले जाकर सरकार द्वारा तय कीमत पर बेचने के लिए बाध्य किया गया।
6. महँगे सफेद आटे के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई। सभी नागरिकों के लिए साबुत गेहूं से बनी और बराबरी का प्रतीक मानी जाने वाली ‘समता रोटी' खाना अनिवार्य कर दिया गया।
In simple words: रोबेस्प्येर सरकार ने समता स्थापित करने के लिए कई नियम बनाए, जिनमें संबोधन में बराबरी लाना (सितोयेन और सितोयीन का प्रयोग), चर्चों को बंद करना, मजदूरी और कीमतों की अधिकतम सीमा तय करना, खाद्यान्न की राशनिंग और किसानों को सरकारी कीमतों पर अनाज बेचने तथा 'समता रोटी' को अनिवार्य करना शामिल था।
🎯 Exam Tip: रोबेस्प्येर सरकार द्वारा समानता स्थापित करने के लिए किए गए सामाजिक और आर्थिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 3. फ्रांस में जून, 1793 ई. से जुलाई, 1794 ई. के बीच के कालखण्ड को 'आतंक का राज्य' क्यों कहते हैं?
Answer: फ्रांस में जून, 1793 से जुलाई, 1794 ई. तक के फ्रांसीसी शासन को 'आतंक का राज्य' के नाम से संबोधित किया जाता है। इसके पीछे निम्न तथ्य उत्तरदायी हैं-
1. चर्चे को बन्द कर दिया गया और उनके भवनों को बैरक या दफ्तर बना दिया गया।
2. रोब्सपियर ने अपनी नीतियों को सख्ती से लागू किया। उसके लिए दया का अर्थ था देशद्रोह। उसके एक साल के शासन काल में हजारों व्यक्तियों को मृत्यु-दण्ड दिया गया जिसके कारण उसके सहयोगी भी उसके दुश्मन बन गए और 27 जुलाई, 1794 ई. को उसे कैद कर लिया गया।
3. क्योंकि इस काल में शासन के समस्त सूत्र जैकोबिन क्लब के नेता रोब्सपियर के हाथों में केन्द्रित हो गए थे। उसके अनुसार फ्रांस का कल्याण क्रांति की सफलता में ही निहित है और क्रांति की सफलता आतंक का राज्य स्थापित करके ही प्राप्त की जा सकती है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने सभी असहमत वर्गों के नेताओं तथा व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया तथा दोषी व्यक्तियों को गिलोटिन पर चढ़ाकर मृत्युदण्ड दे दिया गया।
4. उसने देश की रक्षा के लिए सेना की भर्ती आरंभ की और शीघ्र ही 7,50,000 फ्रेंच सेना तैयार हो गई।
5. उसने मजदूरी तथा कीमतों की अधिकतम सीमा निर्धारित की। गोश्त तथा पावरोटी की राशनिंग आरम्भ कर दी गई। इस प्रकार उसने महँगाई रोकने के लिए अनेक प्रयास किए।
In simple words: जून 1793 से जुलाई 1794 के बीच के कालखण्ड को 'आतंक का राज्य' कहा जाता है क्योंकि इस दौरान रोब्सपियर के नेतृत्व में जैकोबिन सरकार ने कठोर नीतियों को लागू किया। इसमें चर्चों को बंद करना, विरोधियों को गिरफ्तार करके गिलोटिन पर चढ़ाना, और मजदूरी-कीमतों पर सख्त नियंत्रण जैसे कदम शामिल थे, जिसके परिणामस्वरूप हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
🎯 Exam Tip: 'आतंक के राज्य' की क्रूरता और रोब्सपियर की केंद्रीकृत शक्ति को उजागर करने वाले प्रमुख बिन्दुओं को शामिल करें।
Question 4. जैकोबिन क्लब से आप क्या समझते हैं?
Answer: जैकोबिन क्लब की शुरुआत क्रान्ति के आरम्भिक समय में ही हो चुकी थी। शुरुआत में जैकोबिन के अनुयायी उदार तथा सुधारवादी ही थे। लेकिन धीरे-धीरे उसकी नीति उग्र होती गयी, फलस्वरूप मिराबो लाफाएत जैसे नरम विचार वाले सदस्य उससे पृथक् ही हो गए। परिणाम यह हुआ कि क्लब पर रोब्सपियर जैसे उग्र विचारक का नियंत्रण हो गया। इस क्लब का नाम पेरिस के भूतपूर्व कान्वेंट ऑफ सेंट जैकब के नाम पर पड़ा। इस क्लब का प्रधान स्थान पेरिस था। इस क्लब के सदस्य लम्बी धारीदार पतलून पहनते थे इसलिए इन्हें 'सौं कुलॉत' भी कहा जाता था। इसकी 400 के लगभग शाखाएँ थीं जो सारे देश में फैली हुई थीं। धीरे-धीरे यह क्लब अधिक शक्तिशाली हो गया और उसका प्रभाव इतना बढ़ गया कि फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात् फ्रांस की सत्ता पर जैकोबिनों को नियन्त्रण स्थापित हो गया।
In simple words: जैकोबिन क्लब फ्रांसीसी क्रांति के दौरान एक प्रभावशाली राजनीतिक क्लब था, जिसका नाम पेरिस के सेंट जैकब के कॉन्वेंट से आया था। रोब्सपियर के नेतृत्व में यह क्लब उग्रवादी नीतियों वाला बन गया, जिसके सदस्य 'सौं कुलॉत' कहलाते थे, और इसने क्रांति के बाद फ्रांस की सत्ता पर महत्वपूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।
🎯 Exam Tip: जैकोबिन क्लब के उदय, उसके नेता, उसकी नीतियों और 'सौं कुलॉत' शब्द के साथ उसके संबंध पर ध्यान दें।
Question 5. कुलीन वर्ग के फ्रांस से पलायन के क्या कारण थे?
Answer: 14 जुलाई, 1789 ई. को फ्रांस की क्रुद्ध भीड़ बास्तील के किले पर धावा बोलकर उसे नष्ट कर दिया तथा वहाँ के जेल में बन्द कैदियों को मुक्त कर दिया। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अफवाह फैल गयी कि जागीरों के मालिक भाड़े पर लठैतोंलुटेरों के गिरोह बुला लिए हैं जो पकी फसलों को नष्ट करने के लिए निकल पड़े हैं। अनेक जिलों में भय से आक्रान्त किसानों ने कुदालों और बेलचों से ग्रामीण किलों पर आक्रमण कर दिए। किसानों ने अन्न भण्डारों को लूट लिया तथा लगान सम्बन्धी दस्तावेजों को आग के हवाले कर दिया। ऐसी अराजक स्थिति में बड़ी संख्या में कुलीन अपनी जागीरें छोड़कर पलायन कर गए। और उन्होंने पड़ोसी देशों में शरण लेकर अपना जीवन सुरक्षित किया।
In simple words: कुलीन वर्ग के फ्रांस से पलायन का मुख्य कारण 14 जुलाई, 1789 को बास्तील के पतन के बाद देश में फैली अराजकता और ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों द्वारा किए गए विद्रोह थे। किसानों ने जागीरों पर हमले किए और अन्न भंडारों को लूटा, जिससे भयभीत होकर कुलीनों ने अपनी संपत्ति छोड़कर पड़ोसी देशों में शरण ली।
🎯 Exam Tip: कुलीन वर्ग के पलायन को बास्तील के पतन और ग्रामीण विद्रोहों के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में समझाएं।
Question 6: क्रान्तिकालीन फ्रांस में महिलाओं की भूमिका का वर्णन कीजिए।
Answer: फ्रांस में सामाजिक परिवर्तन लाने में महिलाओं की उल्लेखनीय भूमिका है। महिलाओं ने अपने जीवन में सुधार लाने के लिए क्रान्तिकारी सरकार पर आवश्यक कदम उठाने के लिए दबाव डाला। तत्कालीन फ्रांसीसी महिलाएँ अपने पतियों एवं परिवार की आर्थिक रूप से सहायता करने के लिए सिलाई-बुनाई, कपड़े धोने, बाजार में फूल, फल तथा सब्जियाँ बेचने का कार्य करती थीं। अपनी स्थिति में सुधार तथा इस पर चर्चा झुरने के लिए उन्होंने अनेक राजनैतिक क्लब एवं अखबार शुरू किए तथा कई महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए, जो इस प्रकार हैं-
1. उनकी माँगों में यह भी शामिल था कि उन्हें भी पुरुषों के समान राजनैतिक अधिकार दिए जाएँ।
2. उन्होंने मताधिकार, सभा में चुने जाने एवं राजनैतिक पद ग्रहण कर सकने की भी माँग की।
3. फ्रांस के विभिन्न शहरों में लगभग साठ क्लब अस्तित्व में आए।
4. सभी वर्गों की महिलाओं को शिक्षा एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाए।
5. उन्होंने माँग की कि उन्हें भी उन दिनों पुरुषों को दी जा रही उच्च मजदूरी के समान ही मजदूरी मिले।
In simple words: क्रान्तिकारी फ्रांस में महिलाओं ने सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उन्होंने अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए राजनीतिक क्लबों और अखबारों के माध्यम से दबाव डाला। उनकी मुख्य माँगें पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार, मताधिकार, शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और पुरुषों के समान उच्च मजदूरी थीं।
🎯 Exam Tip: महिलाओं की आर्थिक भूमिका, उनके राजनीतिक संगठन और उनकी प्रमुख मांगों को विस्तार से बताएं।
Question 7. फ्रांस की क्रान्ति का फ्रांस पर प्रभाव बताइए।
Answer: फ्रांस की क्रान्ति के फ्रांस पर निम्न महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े-
1. फ्रांसीसी क्रांति ने जनता की माँगों का समर्थन किया, दैवीय अधिकार के विचार, सामन्ती विशेषाधिकारों, दासत्व तथा नियंत्रण की समाप्ति तथा सामाजिक उत्थान के लिए योग्यता को आधार बनाया।
2. फ्रांस में राजशाही का अन्त हो गया। फ्रांस गणतंत्र बन गया।
3. पुरुष एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा भी फ्रांसीसी क्रांति की देन थी जिसने समानता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे अधिकार दिए।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति ने फ्रांस पर गहरा प्रभाव डाला: इसने जनता की मांगों का समर्थन किया, राजशाही को समाप्त कर गणतंत्र की स्थापना की, और 'पुरुष एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा' के माध्यम से समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकार प्रदान किए। इसने सामंती विशेषाधिकारों और दासत्व को भी समाप्त कर दिया।
🎯 Exam Tip: क्रांति के राजनीतिक, सामाजिक और नागरिक अधिकारों पर पड़े प्रभावों को प्रमुख बिन्दुओं के रूप में सूचीबद्ध करें।
Question 8. फ्रांस के 1791 ई. के संविधान की विशेषता बताइए।
Answer:
1. निर्वाचक की योग्यता पाने के लिए और पुनः सभा का सदस्य बनने के लिए लोगों को उच्च श्रेणी का करदाता होना आवश्यक था।
2. सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार नहीं था। केवल 25 वर्ष से अधिक आयु के पुरुष जो कि कम से कम एक मजदूर की 3 दिन की मजदूरी के समान कर अदा करते थे उन्हें ही सक्रिय नागरिक का दर्जा प्रदान किया गया अर्थात् उन्हें ही वोट देने का अधिकार था। बचे हुए सभी पुरुषों तथा सभी महिलाओं को निष्क्रिय नागरिक का दर्जा दिया गया था।
3. सन् 1791 के संविधान ने कानून बनाने की शक्ति राष्ट्रीय सभा को दे दी जो कि अप्रत्यक्ष रूप से चुनी जाती थी अर्थात् नागरिक किसी चुनने वाले समूह को वोट देते तथा वह समूह फिर सभा को चुनता।
In simple words: फ्रांस के 1791 के संविधान की मुख्य विशेषताएँ थीं कि यह एक संवैधानिक राजतंत्र था, जिसमें कानून बनाने की शक्ति अप्रत्यक्ष रूप से चुनी गई राष्ट्रीय सभा को दी गई। इसमें मताधिकार केवल 25 वर्ष से अधिक आयु के पुरुष करदाताओं को दिया गया (सक्रिय नागरिक), जबकि अन्य पुरुष और सभी महिलाएँ निष्क्रिय नागरिक थीं।
🎯 Exam Tip: संविधान की प्रमुख विशेषताओं में मताधिकार की सीमाएं और विधायिका की संरचना पर विशेष ध्यान दें।
Question 9. फ्रांस में सेंसरशिप की समाप्ति का प्रभाव बताइए।
Answer: 1789 ई. में बास्तील के पतन के बाद जो सबसे महत्त्वपूर्ण कानून अस्तित्व में आया, वह 'सेंसरशिप की समाप्ति' से सम्बन्धित था। इसके प्रभाव का विवरण इस प्रकार है-
1. नाटक, संगीत और उसकी जुलूसों में असंख्य लोग जाने लगे।
2. स्वतंत्रता और न्याय के बारे में राजनीतिज्ञों व दार्शनिकों के पांडित्यपूर्ण लेखन को समझने और उससे जुड़ने का यह लोकप्रिय तरीका था क्योंकि किताबों को पढ़ना तो मुट्ठी भर शिक्षितों के लिए ही संभव था।
3. अब अधिकारों के घोषणापत्र ने भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नैसर्गिक अधिकार घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप फ्रांस के शहरों में अखबारों, पर्चा, पुस्तकों एवं छपी हुई तस्वीरों की बाढ़ आ गई जहाँ से वह तेजी से गाँव-देहात तक जा पहुँची। उनमें फ्रांस में घट रही घटनाओं एवं परिवर्तनों का ब्यौरा और उन पर टिप्पणी होती थी।
4. प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब यह था कि किसी भी घटना पर परस्पर विरोधी विचार भी व्यक्त किए जा सकते थे। प्रिंट माध्यम का उपयोग करके एक पक्ष ने दूसरे पक्ष को अपने दृष्टिकोण से सहमत कराने की कोशिश की।
In simple words: बास्तील के पतन के बाद सेंसरशिप की समाप्ति ने भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक नैसर्गिक अधिकार बना दिया, जिससे नाटकों, संगीत, जुलूसों, अखबारों, पर्चों और पुस्तकों का प्रसार हुआ। इसने जनता को राजनीतिक और दार्शनिक विचारों को समझने और उन पर चर्चा करने का अवसर दिया, जिससे विचारों का आदान-प्रदान और लोगों का जुड़ाव बढ़ा।
🎯 Exam Tip: सेंसरशिप की समाप्ति के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभावों पर ध्यान दें, विशेष रूप से जनसंचार के विकास पर।
Question 10. 18वीं सदी से पहले फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास-प्रथा का उल्लेख कीजिए।
Answer: 18वीं सदी से पहले फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास प्रथा इस प्रकार थी-
(1) दास-व्यापार सत्रहवीं शताब्दी में शुरू हुआ। फ्रांसीसी सौदागर बोर्दै और नान्ते बंदरगाह से अफ्रीका तट पर जहाज ले जाते थे, जहाँ वे स्थानीय सरदारों से दास खरीदते थे। दासों को दाग कर एवं हथकड़ियाँ डालकर अटलांटिक महासागर के पार कैरिबिआई देशों तक तीन माह की लम्बी समुद्री-यात्रा के लिए जहाजों में ढूंस दिया जाता था। वहाँ उन्हें बागान-मालिकों को बेच दिया जाता था। दास-श्रुम के बल पर यूरोपीय बाजारों में चीनी, कॉफी एवं नील की बढ़ती माँग को पूरा करना संभव हुआ। बोर्दे और नान्ते जैसे बंदरगाह फलते-फूलते दास-व्यापार के कारण। ही समृद्ध नगर बन गए।
(2) फ्रांसीसी उपनिवेशों में से कैरिबिआई उपनिवेश-मार्टिनिक, गॉडेलोप और सैन डोमिंगों-तंबाकू, नील, चीनी एवं कॉफ़ी जैसी वस्तुओं के महत्त्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता थे। अपरिचित एवं दूर देश जाने और काम करने के प्रति यूरोपियों की अनिच्छा का मतलब था–बागानों में श्रम की कमी। इस कमी को यूरोप, अफ्रीका एवं अमेरिका के बीच त्रिकोणीय दास-व्यापार द्वारा पूरा किया गया।
In simple words: 18वीं सदी से पहले फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास प्रथा सत्रहवीं शताब्दी में शुरू हुए त्रिकोणीय दास-व्यापार का हिस्सा थी, जिसमें अफ्रीकी तट से दासों को कैरिबियाई उपनिवेशों में बागानों के मालिकों को बेचा जाता था। इन दासों का श्रम चीनी, कॉफी और नील जैसे उत्पादों की बढ़ती यूरोपीय मांग को पूरा करने के लिए आवश्यक था, जिससे बोर्दे और नान्ते जैसे बंदरगाह समृद्ध हुए।
🎯 Exam Tip: दास प्रथा के त्रि-कोणीय व्यापार मार्ग, दासों की खरीद-बिक्री की प्रक्रिया और उपनिवेशों में उनकी भूमिका को विस्तार से समझाएं।
Question 11. फ्रांस में दास प्रथा का उन्मूलन किस प्रकार हुआ?
Answer: फ्रांस में दास प्रथा का उन्मूलन निम्न प्रकार हुआ-
1. फ्रांस में दास प्रथा की अधिक निन्दा 18वीं सदी में नहीं हुई। नेशनल असेंबली में लम्बी बहस के बाद भी यह निर्धारित नहीं किया जा सका कि समस्त फ्रांसीसी प्रजा को समान अधिकार प्रदान किया जाए या नहीं। किन्तु दास-व्यापार पर निर्भर व्यापारियों के विरोध के भय के फलस्वरूप नेशनल असेंबली कोई कानून पारित नहीं कर सकी।
2. 1794 ई. के कन्वेंशन ने फ्रांसीसी उपनिवेशों में स्थित दासों को मुक्त करने सम्बन्धी कानून पारित कर दिया। यह कानून मात्र 10 वर्ष तक लागू रहा। दस वर्ष बाद नेपोलियन ने दास-प्रथा पुनः शुरू कर दी। अब फ्रांस में सक्रिय बागान मालिकों को अपने आर्थिक हित साधने के लिए अफ्रीकी नीग्रो लोगों को गुलाम बनाने की स्वतंत्रता मिल गयी।
3. सन् 1848 में फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास-प्रथा का पूरी तरह उन्मूलन कर दिया गया।
In simple words: फ्रांस में दास प्रथा का उन्मूलन एक जटिल प्रक्रिया थी। नेशनल असेंबली ने शुरू में व्यापारियों के विरोध के कारण कोई कानून पारित नहीं किया, लेकिन 1794 में कन्वेंशन ने इसे समाप्त कर दिया, जो केवल 10 साल तक चला। नेपोलियन ने इसे फिर से शुरू किया, और अंततः 1848 में फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास प्रथा का पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया गया।
🎯 Exam Tip: दास प्रथा के उन्मूलन की प्रक्रिया में विभिन्न चरणों और नेपोलियन की भूमिका को स्पष्ट करें।
Question 12. 18वीं सदी के फ्रांस में महिलाओं की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
Answer: 18वीं सदी के फ्रांस में महिलाओं की स्थिति निम्न प्रकार थी-
1. अधिकांश महिलाओं के पास पढ़ाई-लिखाई तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण के मौके नहीं थे। केवल कुलीनों की लड़कियाँ अथवा तीसरे एस्टेट के धनी परिवारों की लड़कियाँ ही कॉन्वेंट में पढ़ पाती थीं, इसके बाद उनकी शादी कर दी जाती थी।
2. कामकाजी महिलाओं को अपने परिवार का पालन-पोषण भी करना पड़ता था-जैसे खाना पकाना, पानी लाना, लाइन लगाकर पावरोटी लाना और बच्चों की देख-रेख करना आदि। उनकी मजदूरी पुरुषों की तुलना में कम थी।
3. महिलाएँ शुरू से ही फ्रांसीसी समाज में इतने अहम् परिवर्तन लाने वाली गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल थीं। उन्हें उम्मीद थी कि उनकी भागीदारी क्रांतिकारी सरकार को उनका जीवन सुधारने हेतु ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगी।
4. तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ जीविका निर्वाह के लिए काम करती थीं। वे सिलाई-बुनाई, कपड़ों की धुलाई करती थीं, बाजारों में फल-फूल-सब्जियाँ, बेचती थीं अथवा संपन्न घरों में घरेलू काम करती थीं। बहुत सारी महिलाएँ, वेश्यावृत्ति करती थीं।
In simple words: 18वीं सदी के फ्रांस में महिलाओं की स्थिति दयनीय थी, जहाँ अधिकांश को शिक्षा या व्यावसायिक प्रशिक्षण के अवसर नहीं मिलते थे, और कामकाजी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती थी। हालांकि, उन्होंने सामाजिक परिवर्तन लाने में सक्रिय भूमिका निभाई और राजनीतिक क्लबों के माध्यम से अपने अधिकारों और जीवन में सुधार के लिए दबाव बनाया।
🎯 Exam Tip: महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक भूमिका और सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 13. फ्रांस में व्याप्त आर्थिक तनाव क्रान्ति में किस प्रकार सहायक बना?
Answer: लुई सोलहवाँ 1774 ई. में फ्रांस का राजा बना। उस समय फ्रांस का राजकोष रिक्त था। सेना का रखरखाव, दरबार का खर्च, सरकारी कार्यालयों या विश्वविद्यालयों को चलाने जैसे अपने नियमित खर्च निपटाने के लिए सरकार कर बढ़ाने पर बाध्य हो गई। कर बढ़ाने के प्रस्ताव को पारित करने के लिए फ्रांस के सम्राट लुई सोलहवें ने 5 मई, 1789 ई. को एस्टेट्स के जनरल की सभा बुलाई। प्रत्येक एस्टेटस को सभा में एक वोट डालने की अनुमति दी गई। तृतीय एस्टेट्स ने इस अन्यायपूर्ण प्रस्ताव का विरोध किया।
उन्होंने सुझाव रखा कि प्रत्येक सदस्य का एक वोट होना चाहिए। सम्राट ने इस अपील को ठुकरा दिया तथा तृतीय एस्टेट्स के प्रतिनिधि सदस्य विरोधस्वरूप सभा से वाक आउट कर गए। फ्रांसीसी जनसंख्या में भारी बढ़ोत्तरी के कारण इस समय खाद्यान्न की माँग बहुत बढ़ गई थी। परिणामस्वरूप, पावरोटी' (अधिकतर लोगों के भोजन को मुख्य भाग) के भाव बढ़ गए। बढ़ती कीमतों व अपर्याप्त मजदूरी के कारण अधिकतर जनसंख्या जीविका के आधारभूत साधन भी वहन नहीं कर सकती थी। इससे जीविका संकट उत्पन्न हो गया तथा अमीर और गरीब के मध्य दूरी बढ़ गई।
In simple words: फ्रांस में आर्थिक तनाव क्रांति का एक प्रमुख कारण था, जिसमें लुई सोलहवें के शासनकाल में राजकोष खाली था, भारी कर्ज था, और कर बढ़ाने की आवश्यकता थी। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्यान्न की कमी और पावरोटी जैसी मुख्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ने जनता में व्यापक असंतोष पैदा कर दिया, जिससे अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ गई और तृतीय एस्टेट ने विरोध किया।
🎯 Exam Tip: आर्थिक संकट के विभिन्न पहलुओं (राजकोष की कमी, कर्ज, खाद्य संकट, कर वृद्धि) और उन्होंने कैसे असंतोष को बढ़ावा दिया, इसे उजागर करें।
Question 14. फ्रांस में जीविका संकट किन परिस्थितियों में उत्पन्न हुआ?
Answer: फ्रांस की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हो रही थी। फ्रांस की जनसंख्या 1715 ई. में 2 करोड़ 30 लाख से बढ़कर 1789 ई. में 2 करोड़ 80 लाख हो गयी। फलस्वरूप इससे खाद्यान्न की माँग बहुत तेजी से बढ़ी। इसलिए पावरोटी की कीमत भी तेजी से बढ़ी क्योंकि यह आम आदमी का भोजन थी। बहुत से कामगार कारखानों में मजदूर का काम करते थे जिनके मालिक उनकी मजदूरी निर्धारित करते थे। किन्तु उनकी मजदूरी बढ़ती कीमतों के हिसाब से नहीं बढ़ रही थी। इसलिए अमीर और गरीब के बीच की दूरी बढ़ गई। जब कभी अकाल पड़ता या ओलावृष्टि होती तो फसल कम होने से स्थिति और बिगड़ जाती। इससे जीविका संकट पैदा हुआ।
In simple words: फ्रांस में जीविका संकट तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण उत्पन्न हुआ, जिससे खाद्यान्न की मांग और पावरोटी की कीमतों में वृद्धि हुई। मजदूरों की मजदूरी बढ़ती कीमतों के साथ नहीं बढ़ी, जिससे अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ गई, और अकाल या ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।
🎯 Exam Tip: जनसंख्या वृद्धि, खाद्य कीमतों, मजदूरी और प्राकृतिक आपदाओं के बीच संबंधों को स्पष्ट करें।
Question 15. फ्रांसीसी क्रान्ति में दार्शनिकों का योगदान बताइए।
Answer: फ्रांसीसी क्रान्ति में दार्शनिकों की भूमिका को हम निम्न प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं-
1. फ्रांसीसी दार्शनिकों ने क्रांतिकारी विचार प्रदान किए एवं फ्रांस के लोगों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने हेतु प्रेरित किया। उन्होंने सम्राट की अक्षमता की सफलतापूर्वक कलई खोली और लोगों को उसे चुनौती देने के लिए उकसाया।
2. इन दार्शनिकों के इन विचारों पर सैलून एवं कॉफी-घरों में गहन चर्चा हुई और ये विचार पुस्तकों एवं अखबारों के द्वारा जनसाधारण के बीच फैल गए। इसने 1789 ई. में होने वाली क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया।
3. जॉन लॉक ने राजा के दैवीय एवं स्वेच्छाचारी सिद्धान्त को नकार दिया।
4. रूसो ने लोगों एवं उनके प्रतिनिधियों के बीच एक सामाजिक करार पर आधारित सरकार का विचार सामने रखा।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति में दार्शनिकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिन्होंने अपने विचारों से लोगों को अधिकारों के लिए लड़ने और सम्राट की निरंकुशता को चुनौती देने के लिए प्रेरित किया। उनके विचार, जो सैलूनों और कॉफीघरों में चर्चा में रहते थे और पुस्तकों तथा अखबारों के माध्यम से फैले, जैसे जॉन लॉक का दैवीय सिद्धांत का खंडन और रूसो का सामाजिक करार का विचार, ने 1789 की क्रांति के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
🎯 Exam Tip: जॉन लॉक और रूसो जैसे दार्शनिकों के विशिष्ट विचारों को उजागर करें और बताएं कि उन्होंने क्रांति की वैचारिक नींव कैसे रखी।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Question 1. फ्रांसीसी क्रान्ति की शुरुआती घटनाओं का विश्लेषण कीजिए।
Answer:
(i) एस्टेट्स जनरल की बैठक- 5 मई, 1789 ई. को फ्रांस के शासक लुई सोलहवें ने नए करों के प्रस्ताव को 1614 ई. में निर्धारित संगठन के आधार पर वर्साय के महल में एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलाई। इस सभा में प्रथम और द्वितीय एस्टेट के 300-300 प्रतिनिधि और तृतीय एस्टेट के 600 प्रतिनिधियों को बुलाया गया। मतदान की प्राचीन पद्धति के अनुसार एस्टेट के प्रत्येक वर्ग को एक मत देने का अधिकार दिया गया था लेकिन लुई सोलहवाँ लोकतांत्रिक सिद्धान्त के आधार पर 'एक व्यक्ति एक मत' को अपनाने के स्थान पर कुलीन-वर्ग और साधारण वर्ग की माँगों के बीच समझौता कराना चाहता था। लुई चाहता था कि वित्तीय प्रश्न पर 'एक व्यक्ति एक मत' का सिद्धान्त अपनाया जाए तथा अन्य माँगों पर वर्ग के आधार पर मतदान का सिद्धान्त अपनाया जाए।
(ii) राष्ट्रीय सभा की स्थापना- 6 मई, 1789 ई. को राष्ट्रीय सभा की बैठक के दूसरे दिन यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि तीन एस्टेट के सदस्य अलग-अलग भवनों में मतदान करेंगे या एक साथ एक भवन में मतदान करेंगे। सर्वसाधारण वर्ग ने अलग बैठने से मना कर दिया। सरकार ने इस गतिरोध को समाप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया। अंततः सर्वसाधारण वर्ग के प्रतिनिधियों ने स्वयं को राष्ट्रीय सभा घोषित करके एक क्रान्तिकारी कदम उठाया। क्रमशः कुलीन व पादरी वर्ग के लोग राष्ट्रीय सभा में सम्मिलित हो गए। अंततः 26 जून को लुई सोलहवें ने विवश होकर कुलीन वर्ग का सर्वसाधारण वर्ग के साथ बैठक का आदेश जारी कर दिया।
(iii) संविधान का प्रारूप- राष्ट्रीय सभा ने संविधान का प्रारूप तैयार कर दिया जिसका प्रमुख उद्देश्य सम्राट की शक्तियों को सीमित करना तथा एक संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना करना था जिसमें शक्तियों को विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका में बाँटा जा सके।
(iv) बास्तील का पतन- किसी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए सम्राट ने पेरिस में सेना को एकत्रित करना आरम्भ कर दिया। सेना को एकत्रित होता देख जन आक्रोश भड़क उठा। पेरिस में आर्थिक असन्तोष को लेकर जगहजगह दंगे भड़क उठे। ये दंगे उस भुखमरी, महँगाई और बेरोजगारी के फलस्वरूप शुरू हुए थे, जो तत्कालीन पेरिस में व्याप्त थी। आक्रोशित जनता ने 14 जुलाई को बास्तील के किले पर धावा बोल दिया। बास्तील का पतन निरंकुश शासन के पतन का प्रतीक था। फ्रांस में प्रत्येक वर्ष 14 जुलाई का दिन राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाया जाता है। धीरे-धीरे यह आंदोलन गाँवों में फैल गया। किसानों ने ग्रामीण किलों को नष्ट करके अन्न भंडारों को लूट लिया और लगान संबंधी दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया। कुलीन-वर्ग के लोग बड़ी संख्या में दूसरे क्षेत्रों अथवा देशों में पलायन कर गए।
(v) संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना- जनता की शक्ति को भाँपते हुए फ्रांस के राजा लुई सोलहवें ने संवैधानिक राजतंत्र को मान्यता प्रदान कर दी। इस प्रकार फ्रांस में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हो गई। राष्ट्रीय सभा ने एक आदेश पारित किया जिसके द्वारा धार्मिक करों को समाप्त कर दिया गया, चर्च के स्वामित्व वाली जमीन जब्त कर ली गई, पादरी-वर्ग को उसके विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए विवश किया गया तथा सामंती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश पारित किया गया।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआती घटनाएँ 5 मई 1789 को एस्टेट्स जनरल की बैठक से शुरू हुईं, जहाँ तृतीय एस्टेट ने 'एक व्यक्ति, एक मत' की मांग की और बाद में खुद को राष्ट्रीय सभा घोषित कर दिया। इसके बाद 14 जुलाई को बास्तील का पतन हुआ, जो निरंकुश शासन के अंत का प्रतीक था और ग्रामीण विद्रोहों को जन्म दिया। इन घटनाओं के परिणामस्वरूप, लुई सोलहवें को संवैधानिक राजतंत्र को मान्यता देनी पड़ी, जिससे धार्मिक करों और सामंती व्यवस्था का उन्मूलन हुआ।
🎯 Exam Tip: क्रांति की शुरुआती घटनाओं को कालक्रमानुसार (एस्टेट्स जनरल, राष्ट्रीय सभा, बास्तील का पतन, संवैधानिक राजतंत्र) समझाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह घटनाक्रम क्रांति की दिशा निर्धारित करता है।
Question 2. फ्रांस की क्रान्ति के समय फ्रांस की राजनीतिक स्थिति का विवेचन कीजिए।
Answer:
(i) फ्रांस की क्रान्ति के समय फ्रांस पर लुई सोलहवें को शासन था। 1774 ई. में अपने पितामह की मृत्यु के बाद वह कठिन परिस्थिति में सिंहासनारूढ़ हुआ, उस समय राजकोष रिक्त था। राजा के ऊपर अत्यधिक ऋण भार था। इस परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए जिस योग्यता की आवश्यकता थी, वह लुई में नहीं थी।
(ii) दूसरे फ्रांसीसी राजाओं की भाँति उसकी पत्नी मैरी इंटोइनेट का शासन पर अत्यधिक प्रभाव था। उसकी इच्छा शक्ति बड़ी दृढ़ थी, उसमें साहस था और तुरंत निर्णय भी कर सकती थी। इस प्रकार जो गुण राजा में नहीं थे वे उसमें विद्यमान थे परन्तु उसमें भी शासन की समस्याओं को समझने तथा उनका समाधान करने की योग्यता नहीं थी। उसे अपने आमोद-प्रमोद से मतलब था। वह सदा लोभी, चाटुकारों से घिरी रहती थी जो उस समय की व्यवस्था से लाभ उठाते थे और इसी कारण सुधार के शत्रु थे।
वह शासन-कार्य में हस्तक्षेप करती रहती थी, मंत्रियों की नियुक्ति में दखल देती थी और सदा षडयंत्रों में लगी रहती थी जिसके परिणाम सदा फ्रांस के हित के विपरीत होते थे। इन कारणों से तथा उसके विलासमय जीवन एवं अत्यधिक खर्चीले रहन-सहन से राज्य की कठिनाइयाँ बढ़ती रहीं। इस काल में फ्रांस का शासन भी बड़ा अक्षम, अव्यवस्थित और खर्चीला था। शासन का प्रमुख राजा था। उसकी सहायता के लिए पाँच समितियाँ होती थीं जो कानून बनाती थीं, राज्यादेश निकालती थीं और राज्य का समस्त आंतरिक एवं बाह्य कार्य-संचालन करती थीं। यह व्यवस्था राजधानी में थी।
(iii) तत्कालीन फ्रांस के प्रांतीय शासन को दो प्रकार के प्रांतों में बाँटा गया था। एक प्रकार के प्रांत गवर्नमेंट कहलाते थे, जिनकी संख्या 40 थी। इनमें से अधिकांश फ्रांस के प्राचीन प्रांत थे। इनका शासन में कोई सहभागिता नहीं था। इन प्रांतों के गवर्नर उच्च वर्ग के कुलीन लोग होते थे। ये लोग अधिक वेतन पाते थे और राजा के सानिध्य में ऐशो-आराम की जिन्दगी व्यतीत करते थे।
(iv) शासन का वास्तविक कार्य फ्रांस के 36 अन्य प्रान्त करते थे, जिन्हें जेनरेलिटी कहते थे। प्रत्येक जेनरेलिटी में राजा द्वारा नियुक्त एक कर्मचारी होता था जिसे इंटेंडेट कहते थे। ये कर्मचारी मध्यम वर्ग के लोग होते थे तथा राजा के आदेशों का पालन करते थे। इन्हें जन आकांक्षाओं की ओर ध्यान देने की स्वतंत्रता नहीं थी। इसलिए ये अपने अधीन काम करने वालों में बहुत अलोकप्रिय होते थे।
(v) सरकारी पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि पहुँच के आधार पर होती थी। स्थानीय स्वशासन की कोई व्यवस्था नहीं थी।
(vi) स्थानीय कर्मचारियों को भी छोटी-छोटी बातों के लिए केन्द्र से आदेश प्राप्त करना पड़ता था। इस तरह शासन में जनता की भूमिका नगण्य थी। इसी के परिणामस्वरूप क्रांति के समय जब जनता ने शासन-सूत्र अपने हाथ में लिया तो अनेक गल्तियाँ भी कीं।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति के समय फ्रांस की राजनीतिक स्थिति अत्यंत कमजोर थी, जिसका नेतृत्व अयोग्य और ऋणग्रस्त लुई सोलहवें कर रहे थे, जिनकी पत्नी मैरी एंटोइनेट का शासन पर अत्यधिक नकारात्मक प्रभाव था। प्रांतीय प्रशासन अक्षम और अव्यवस्थित था, जहाँ पदों पर नियुक्ति योग्यता के बजाय पहुँच के आधार पर होती थी, जिससे जनता की शासन में कोई भागीदारी नहीं थी और व्यापक असंतोष बढ़ रहा था।
🎯 Exam Tip: लुई सोलहवें और मैरी एंटोइनेट की भूमिका, अक्षम प्रशासन और प्रांतीय शासन की संरचना पर ध्यान दें, जो क्रांति के लिए राजनीतिक कारण बने।
Question 3. फ्रांस के नए संविधान में शक्तियों का विभाजन किस प्रकार किया गया था? स्पष्ट कीजिए।
Answer: फ्रांस में नया संविधान बनाने के लिए राष्ट्रीय सभा ने 6 जुलाई, 1789 को एक समिति गठित की थी। इस नवनियुक्त समिति ने दो आधार पर संविधान तैयार किया-
(i) जनता की प्रभुता और
(ii) शक्ति विभाजन।
इस तरह संविधान पर मांटेस्क्यू का प्रभाव स्पष्ट था। संविधान में शक्तियों का विभाजन-
1. विधायिका,
2. कार्यपालिका और
3. न्यायपालिका के मध्य किया गया जिनका विवरण इस प्रकार है-
(1) विधायिका- नए संविधान के अन्तर्गत एक सदनीय विधान सभा की स्थापना की गयी। इसमें प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित 745 सदस्य रखे गए, जिनका कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित किया गया। निर्वाचन के लिए नागरिक दो भागों में विभक्त किए गए। जिन नागरिकों की अवस्था कम से कम 25 वर्ष की थी, जो कम से कम 3 दिन की आय कर के रूप में देते थे और जिनके नाम नगरपालिका के रजिस्टरों में तथा राष्ट्रीय रक्षक-दल में दर्ज थे वे सक्रिय नागरिकों की श्रेणी में रखे गए, शेष निष्क्रिय नागरिक रहे। सक्रिय नागरिक प्रति सौ नागरिकों के लिए एक फ्रांसीसी क्रान्ति निर्वाचक चुनते थे और इन निर्वाचकों का 'निर्वाचक-मंडल' प्रतिनिधि चुनता था। निर्वाचक के लिए यह आवश्यक था कि वह संपत्ति का स्वामी हो और वर्ष में 10 दिन की आय कर के रूप में देता हो।
प्रतिनिधि कोई भी सक्रिय नागरिक चुना जा सकता था, उसके लिए भूमि का स्वामी होना और 54 फ्रैंक कर के रूप में देना आवश्यक था। परन्तु न्यायिक अथवा प्रशासनिक पद पर नियुक्त कोई भी व्यक्ति विधान-सभा का सदस्य नियुक्त नहीं हो सकता था। इस विधान सभा को कानून-निर्माण के पूर्ण अधिकार थे। उस पर एकमात्र नियंत्रण राजा के 'स्थगनकारी निषेध' (सस्पेंशन वीटो) का था। राजा किसी भी कानून को दो सत्रों के लिए स्वीकार करने से इनकार कर सकता था, परन्तु उसका यह अधिकार आर्थिक बातों में लागू नहीं होता था।
(2) कार्यपालिका - कार्यपालिका प्रमुख के रूप में राजा का अस्तित्व बना रहा। उसे मंत्रियों की नियुक्ति, सेना का नेतृत्व एवं विदेश नीति को निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त था, लेकिन विधान सभा उसके प्रभाव से पूरी तरह मुक्त थी। वह विधानसभा के अधिवेशन आमंत्रित नहीं कर सकता था, न उसे भंग कर सकता था और न ही उसके सामने कानून के प्रस्ताव ही प्रस्तुत कर सकता था। उसे केवल स्थगनकारी निषेध का अधिकार मिला। न्यायालयों तथा न्यायाधीशों पर भी उसका कोई अधिकार नहीं रहा। उसके मंत्री विधानसभा के सदस्य नहीं हो सकते थे और इस तरह उन पर सभा का कोई नियंत्रण नहीं था। इस प्रकार राष्ट्रीय सभा ने इंग्लैण्ड का अनुकरण करके सांविधानिक एकतंत्र स्थापित किया, परन्तु इसके साथ मांटेस्क्यू के सिद्धान्त तथा अमेरिका के उदाहरण के अनुसार कार्यपालिका और विधायिका का परस्पर कोई संबंध नहीं रखा।
(3) न्यायपालिका - फ्रांस की राष्ट्रीय सभा ने देश में प्रचलित प्राचीन न्याय-व्यवस्था के स्थान पर नए केन्द्रीय एवं स्थानीय न्यायालयों का निर्माण किया। इन न्यायालयों के न्यायाधीशों के लिए सक्रिय न्यायाधीशों द्वारा निर्वाचन की व्यवस्था की गयी। मुद्रायुक्त पत्रों का चलन अवरुद्ध कर दिया गया और जूरी द्वारा मुकदमे पर विचार करने की व्यवस्था की गयी।
In simple words: फ्रांस के नए संविधान ने मांटेस्क्यू के शक्ति विभाजन के सिद्धांत पर आधारित होकर शक्तियों को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभाजित किया। विधायिका में प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित विधानसभा थी, जिसमें सक्रिय नागरिकों (करदाताओं) को ही मताधिकार प्राप्त था। कार्यपालिका का प्रमुख राजा था, जिसके पास कुछ सीमित अधिकार थे, जबकि न्यायपालिका को नए केन्द्रीय और स्थानीय न्यायालयों के माध्यम से स्वतंत्र रूप से कार्य करने की व्यवस्था दी गई।
🎯 Exam Tip: संविधान में शक्ति विभाजन के सिद्धांतों (जनता की प्रभुता, शक्ति विभाजन) और विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों को स्पष्ट रूप से समझाएं।
Question 4. पुरुष एवं नागरिक घोषणा-पत्र के प्रमुख बिन्दुओं को स्पष्ट कीजिए।
Answer:
1. मनुष्य स्वतंत्र पैदा होते हैं, स्वतंत्र रहते हैं जो और उनके अधिकार समान होते हैं।
2. कानून सम्मत प्रक्रिया के बाहर किसी व्यक्ति को न तो दोषी ठहराया जा सकता है और न ही गिरफ्तार या नजरबंद किया जा सकता है।
3. स्वतंत्रता का आशय ऐसे काम करने की शक्ति से है जो औरों के लिए नुकसानदेह न हो।
4. समाज के लिए किसी भी हानिकारक कृत्य पर पाबंदी लगाने का अधिकार कानून के पास है।
5. कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है। सभी नागरिकों को व्यक्तिगत रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से इसके निर्माण में भाग लेने का अधिकार है। कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं।
6. प्रत्येक नागरिक बोलने, लिखने और छापने के लिए आजाद है। लेकिन कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ऐसी स्वतंत्रता के दुरुपयोग की जिम्मेदारी भी उसी की होगी।
7. सार्वजनिक सेना तथा प्रशासन के खर्चे चलाने के लिए एक सामान्य कर लगाना अपरिहार्य था। सभी नागरिकों पर उनकी आय के अनुसार समान रूप से कर लगाया जाना चाहिए।
8. चूँकि सम्पत्ति का अधिकार एक पावन एवं अनुलंघनीय अधिकार है, अतः किसी भी व्यक्ति को इससे वंचित नहीं किया जा सकता है, जब तक कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत सार्वजनिक आवश्यकता के लिए संपत्ति का अधिग्रहण करना आवश्यक न हो। ऐसे मामले में अग्रिम मुआवजा जरूर दिया जाना चाहिए।
9. प्रत्येक राजनीतिक संगठन का लक्ष्य आदमी के नैसर्गिक एवं अहरणीय अधिकारों को संरक्षित रखना है। ये अधिकार हैं- स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा एवं शोषण के प्रतिरोध का अधिकार।
10. समग्र सम्प्रभुता का स्रोत राज्य में निहित है; कोई भी समूह या व्यक्ति ऐसा अनधिकार प्रयोग नहीं करेगा जिसे जनता की सत्ता की स्वीकृति न मिली हो।
In simple words: पुरुष एवं नागरिक घोषणा-पत्र के प्रमुख बिन्दुओं में मनुष्य की स्वतंत्रता और समानता, कानूनी प्रक्रिया के बिना गिरफ्तारी पर रोक, स्वतंत्रता का अधिकार (दूसरों को नुकसान न पहुँचाते हुए), कानून की नजर में सभी नागरिकों की समानता, बोलने और लिखने की स्वतंत्रता, और संपत्ति के अधिकार की पवित्रता शामिल थी। इसने यह भी घोषित किया कि संप्रभुता का स्रोत राष्ट्र में निहित है और सभी नागरिकों को अपनी आय के अनुसार कर देना चाहिए।
🎯 Exam Tip: घोषणा-पत्र के प्रत्येक प्रमुख बिंदु को याद रखें और समझाएं कि ये अधिकार कैसे स्वतंत्रता, समानता और न्याय के आधुनिक सिद्धांतों की नींव बने।
Question 5. फ्रांस में राजतंत्र का अन्त एवं गणतन्त्र की स्थापना किस प्रकार हुई?
Answer: 1791 ई. में फ्रांस की राष्ट्रीय सभा ने संविधान का पूर्ण प्रपत्र तैयार किया। संविधान द्वारा राजा के अधिकार सीमित करते हुए शासन की शक्तियाँ विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में वितरित की गयीं। इस प्रकार फ्रांस को संवैधानिक राजतंत्र में रूपांतरित किया गया। संविधान का प्रारम्भ पुरुष एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा के साथ हुआ जिन्हें नैसर्गिक एवं अहरणीय रूप में स्थापित किया गया जिन्हें कोई नहीं छीन सकता था। यह सरकार का कर्तव्य था कि वह प्रत्येक नागरिक के प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा करे ।
यद्यपि लुई सोलहवें ने संविधान पर हस्ताक्षर कर दिए थे बथापि उसने प्रशा के राजा से गुप्त समझौता कर लिया। इससे पहले कि लुई सोलहवाँ सन् 1789 की गर्मियों से चली आ रही घटनाओं को दबाने की अपनी योजनाओं पर अमल कर पाता, राष्ट्रीय सभा ने प्रशा एवं ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा का प्रस्ताव पारित कर दिया। जनसंख्या के बड़े वर्गों का यह विश्वास था कि क्रांति को आगे बढ़ाने की आवश्यकता थी क्योंकि 1791 ई. के संविधान ने धनी वर्ग को ही राजनैतिक अधिकार प्रदान किए थे।
राजनैतिक क्लब उन लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण बैठक स्थल बन गए जो सरकार की नीतियों पर चर्चा करना चाहते थे और अपनी रणनीति की योजना बनाई जाती थी। इनमें से एक जैकोबिन क्लब था । जैकोबिन क्लब के सदस्य मुख्यतः समाज के कम समृद्ध वर्ग से सम्बन्ध रखते थे जैसे कि छोटे दुकानदार, कारीगर, जूते बनाने वाले, पेस्ट्री बनाने वाले, घड़ीसाज, छपाई करने वाले, नौकर तथा दैनिक मजदूर आदि। उनके नेता का नाम मैक्समिलियन रोब्सपियर था। इन जैकोबिन लोगों को सौं कुलॉत के नाम से जाना जाने लगा। सौं कुलॉत लोग इसके अतिरिक्त एक लाल टोपी भी पहनते थे जो आजादी का प्रतीक थी।
1792 ई. की गर्मियों में जैकोबिन लोगों ने प्रशा के विरुद्ध विद्रोह की योजना बनाई जो कि कम आपूर्ति एवं खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों से गुस्साए हुए थे। 10 अगस्त की सुबह उन्होंने टयूलेरिए के महल पर आक्रमण कर दिया, राजा के रक्षकों को मार डाला और स्वयं राजा को घण्टों तक बंधक बनाए रखा। बाद में सभा ने शाही परिवार को जेल में डाल देने का प्रस्ताव पारित किया। चुनाव कराए गए तथा तब से 21 वर्ष या उससे अधिक आयु के सभी पुरुष, चाहे उनके पास संपत्ति हो या नहीं, सभी को वोट डालने का अधिकार मिल गया।
फ्रांस में नवनिर्वाचित सभा को कन्वेंशन नाम दिया गया। 21 सितम्बर, 1792 ई. को फ्रांस गणतन्त्र घोषित कर दिया गया। इसी के साथ फ्रांस में वंशानुगत राजतंत्र का अन्त हो गया। न्यायालय ने राजद्रोह के आरोप में लुई सोलहवें कों मृत्युदण्ड की सजा सुनाई। प्लेस डी ला कन्कोर्ड में 21 जनवरी, 1793 ई. को लुई सोलहवें को फाँसी दे दी गयी और इसके बाद रानी मैरी इंटोइनेट को भी फाँसी दे दी गयी ।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति ने 1791 में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना की, लेकिन लुई सोलहवें के गुप्त समझौतों और जैकोबिन क्लब के बढ़ते प्रभाव ने इसे बदल दिया। जैकोबिनों ने 1792 में विद्रोह किया, राजशाही को समाप्त किया और 1792 में फ्रांस को एक गणतंत्र घोषित कर दिया, जिसके बाद राजा और रानी को फाँसी दे दी गई।
🎯 Exam Tip: राजशाही के अंत और गणतंत्र की स्थापना की क्रमिक घटनाओं, विशेष रूप से जैकोबिन क्लब की भूमिका और लुई सोलहवें के भाग्य पर ध्यान दें।
Question 6. ओलिम्प डि गॉजेस के घोषणा-पत्र में उल्लिखित मूल अधिकारों का वर्णन कीजिए ।
Answer: ओलिम्प डि गाँजेस के घोषणा-पत्र में उल्लिखित मूल अधिकारों का वर्णन इस प्रकार है-
1. कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति होनी चाहिए। सभी महिला एवं पुरुष नागरिकों का या तो व्यक्तिगत रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से विधि-निर्माण में दखल होना चाहिए। यह सभी के लिए समान होना चाहिए। सभी महिला एवं पुरुष नागरिक अपनी योग्यता एवं प्रतिभा के बल पर समान रूप से एवं बिना किसी भेदभाव के हर तरह के सम्मान वे सार्वजनिक पद के हकदार हैं।
2. कोई भी महिला अपवाद नहीं है। वह विधिसम्मत प्रक्रिया द्वारा अपराधी ठहराई जा सकती है, गिरफ्तार और नजरबंद की जा सकती है। पुरुषों की तरह महिलाएँ भी इस कठोर कानून का पालन करें।
3. औरत जन्मना स्वतंत्र है और अधिकारों में पुरुष के समान है।
4. सभी राजनीतिक संगठनों का लक्ष्य पुरुष एवं महिला के नैसर्गिक अधिकारों को संरक्षित करना है। ये अधिकार हैं स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा और सबसे बढ़कर शोषण के प्रतिरोध का अधिकार ।
5. समग्र संप्रभुता का स्रोत राष्ट्र में निहित है जो पुरुषों एवं महिलाओं के संघ के सिवाय कुछ नहीं है।
In simple words: ओलिम्प डि गॉजेस ने महिलाओं के लिए समान अधिकार, कानून में पुरुषों के समान स्थिति, और राजनीतिक संगठनों में भागीदारी की मांग की। उनके घोषणा-पत्र में सभी नागरिकों के लिए स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा और शोषण के प्रतिरोध जैसे नैसर्गिक अधिकारों पर जोर दिया गया, जो पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए थे।
🎯 Exam Tip: ओलिम्प डि गॉजेस के घोषणा-पत्र के मुख्य बिंदुओं को याद रखें, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता पर उनके जोर को।
Question 7. फ्रांस की क्रान्ति के बाद महिलाओं की स्थिति में आए परिवर्तनों का विवेचन कीजिए।
Answer: फ्रांस की क्रान्ति के बाद महिलाओं की स्थिति में निम्न परिवर्तन घटित हुए-
(i) फ्रांस में आतंक के राज के दौरान देश में सक्रिय महिला अधिकारों के प्रति चेतना का प्रसार करने वाले क्लबों को | बन्द कर दिया गया। साथ ही महिलाओं की राजनीतिक गतिविधियों पर अंकुश लगा दिया गया। अनेक राजनीतिक रूप से सक्रिय महिलाओं को बन्दी बनाया गया तथा उनमें से कुछ को मृत्युदण्ड दे दिया गया।
(ii) मताधिकार और समान वेतन के लिए महिलाओं का आंदोलन अगली सदी में भी अनेक देशों में चलता रहा। मताधिकार का संघर्ष उन्नीसवीं सदी के अंत एवं बीसवीं सदी के प्रारंभ तक अंतर्राष्ट्रीय मताधिकार आंदोलन के जरिए जारी रहा। क्रांतिकारी आंदोलन के दौरान फ्रांसीसी महिलाओं की राजनीतिक सरगर्मियों को प्रेरक स्मृति के रूप में जिंदा रखा गया। अंततः सन् 1946 में फ्रांस की महिलाओं ने मताधिकार हासिल कर लिया।
(iii) फ्रांस की क्रांति के काल में ही महिलाओं ने अपने अधिकारों की माँग को लेकर अनेक महिला राजनीतिक क्लबों की स्थापना आरम्भ कर दी थी। 'द सोसाइटी ऑफ रेवलूशनरी एण्ड रिपब्लिकन विमेन' सबसे मशहूर क्लब था। उनकी एक प्रमुख माँग यह थी कि महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। महिलाएँ इस बात से निराश हुईं कि 17 ई. के संविधान में उन्हें निष्क्रिय नागरिक का दर्जा दिया गया था। महिलाओं ने मताधिकार, असेंबली के लिए चुने जाने तथा राजनीतिक पदों की माँग रखी। उनका मानना था कि तभी नई सरकार में उनके हितों का प्रतिनिधित्व हो पाएगा।
(iv) प्रारम्भिक वर्षों में क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं के जीवन में सुधार लाने वाले कुछ कानून लागू किए। सरकारी विद्यालयों की स्थापना के साथ ही सभी लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया। अब पिता उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ शादी के लिए बाध्य नहीं कर सकते थे। शादी को स्वैच्छिक अनुबन्ध माना गया और नागरिक कानूनों के तहत उनका पंजीकरण किया जाने लगा। तलाक को कानूनी रूप दे दिया गया और मर्द-औरत दोनों को ही इसकी अर्जी देने का अधिकार दिया गया। अब महिलाएँ व्यावसायिक प्रशिक्षण ले सकती थीं, कलाकार बन सकती थीं और छोटे-छोटे व्यवसाय चला सकती थीं।
In simple words: फ्रांसीसी क्रांति के बाद महिलाओं की स्थिति में मिश्रित बदलाव आए। आतंक के राज में क्लब बंद हुए और कई महिलाओं को मृत्युदंड मिला, लेकिन बाद में कुछ कानून पारित हुए जिससे लड़कियों के लिए शिक्षा अनिवार्य हो गई, विवाह को स्वैच्छिक बनाया गया, और तलाक को कानूनी मान्यता मिली। महिलाओं ने मताधिकार के लिए लंबा संघर्ष जारी रखा और अंततः 1946 में इसे हासिल किया।
🎯 Exam Tip: महिलाओं की स्थिति में हुए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिवर्तनों को याद रखें, और विशेष रूप से मताधिकार के लिए उनके लंबे संघर्ष पर ध्यान दें।
Question 8. फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए प्रथम एस्टेट का उत्तरदायित्व सिद्ध कीजिए ।
Answer: फ्रांस में प्रथम एस्टेट में पादरी वर्ग को शामिल किया जाता था। इस वर्ग में एक लाख तीस हजार के लगभग पादरी थे और इनका देश की 10 प्रतिशत भूमि पर नियंत्रण था। चर्च भी किसानों से टाइद (धार्मिक कर) नामक कर वसूलता था। इन्हें सरकारी करों से मुक्ति प्राप्त थी। साथ ही चर्च राज्य को दिए जाने वाले पंचवर्षीय अनुदान के द्वारा सरकार पर वित्तीय दबाव डालने की स्थिति में थे। फ्रांस की शिक्षा पद्धति, प्रचार के साधन तथा नैतिक व अनैतिक में अन्तर करने का अधिकार भी उन्हीं के हाथ में था।
फ्रांस का चर्च 18वीं सदी में बहुत अधिक बदनाम तथा अलोकप्रिय हो गया था। इस अलोकप्रियता के कारण पादरियों के व्यक्तिगत चरित्र, एवं जीवन से कम तथा तत्कालीन ऐतिहासिक परिस्थितियों से अधिक संबद्ध थे । व्यक्तिगत तौर पर आम पादरी का आचरण अपने युग के अनुकूल ही था, उससे बुरा नहीं। लोगों की नजरों में खटकने वाली बात तो यह थी कि चर्च की बढ़ती हुई सम्पदा के साथ पादरी अपने धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा करते जा रहे थे । चर्च की अलोकप्रियता का एक मुख्य कारण फ्रांस, विशेषकर उसके नगरों तथा मध्यम-वर्ग के व्यक्तियों में लोकप्रिय होती हुई संशयवाद की प्रवृत्ति थी जिसके प्रभाव में ईश्वर का अस्तित्व तथा चर्च की उपयोगिता दोनों ही विवाद का विषय बन गए थे।
एक दूसरा कारण चर्च के सामंतीय अधिकार तथा उनका कठोरता के साथ लागू किया जाना था, जिसके कारण किसानों में उसके विरुद्ध असंतोष उत्पन्न होता रहा। अन्त में पादरीवर्ग के अन्दर ही एकता को अभाव था। चर्च के उच्च पदों पर कुलीन-वर्ग के वंशजों का एकाधिकार था और इससे छोटे पादरियों में असंतोष बढ़ा तथा वे चर्च के प्रजातंत्रीय स्वरूप की स्थापना हेतु उत्सुक हो रहे थे।
In simple words: प्रथम एस्टेट, जिसमें पादरी वर्ग शामिल था, फ्रांसीसी क्रांति के लिए अत्यधिक उत्तरदायी था क्योंकि उन्हें करों से छूट थी, उनके पास बहुत अधिक भूमि और धन था, और वे किसानों से धार्मिक कर वसूलते थे। उनकी अलोकप्रियता, नैतिक पतन और सामंती अधिकारों का कठोरता से लागू करना, साथ ही छोटे पादरियों में असंतोष ने क्रांति को बढ़ावा दिया।
🎯 Exam Tip: प्रथम एस्टेट की कर छूट, भूमि स्वामित्व और सामंती अधिकारों के किसानों पर पड़ने वाले प्रभावों पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि ये क्रांति के प्रमुख कारण थे।
Question 9. फ्रांस का मध्यम वर्ग तत्कालीन व्यवस्था से क्यों असन्तुष्ट था? स्पष्ट कीजिए ।
Answer: तत्कालीन फ्रांस के मध्यम वर्ग में लेखक, डॉक्टर, वकील, जज, अध्यापक और असैनिक अधिकारी जैसे शिक्षित व्यक्ति तथा व्यापारी, बैंकर और कारखाने वाले धनी व्यक्ति सम्मिलित थे। समाज में इस वर्ग का आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व था। मध्यम वर्ग उन लोगों का अग्रगामी था, जिन्होंने 19वीं सदी में आर्थिक व सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी ।
मध्यम वर्ग तत्कालीन व्यवस्था से निम्न कारणों से असन्तुष्ट था-
(i) कुलीन-वर्ग के साथ ही तत्कालीन शासन-पद्धति से भी मध्यम-वर्ग के औद्योगिक एवं व्यावसायिक अंग को शिकायत थी। समाज का यह वर्ग मात्र एक उद्देश्य लेकर चल रहा था- भौतिक सम्पत्ति की वृद्धि; किन्तु तत्कालीन शासन उसके इस उद्देश्य की पूर्ति में अपनी गलत नीतियों के कारण बाधक सिद्ध हो रहा था।
(ii) मध्यम-वर्ग का बुद्धिजीवी भाग आदर्श भावना से भी प्रेरित था। यह आदर्श था विवेक एवं बुद्धि पर आधारित समाज की संरचना जिसमें सभी कुछ तर्कसंगत हो ।
(iii) इतिहास में व्यापारियों-उद्योगपतियों के ये समूह बिलकुल नए थे, किन्तु अमेरिका के फ्रांसीसी उपनिवेशों से व्यापार करने के कारण ये बहुत धनी हो गए थे और इनका महत्त्व बहुत बढ़ गया था। इनमें से कुछ ने जमीन खरीद ली थी और उनके पास बड़ी-बड़ी जमींदारियाँ हो गई थीं। इन व्यक्तियों के पास पर्याप्त धन था, इसलिए राज्य, पादरी और अभिजात-वर्ग सभी इनके ऋणी थे।
सामाजिक दृष्टि से वह स्तर पर आधारित श्रेणीबद्ध समाज के विरोधी न होकर समर्थक ही थे और उनकी महत्त्वाकांक्षा थी कि सामाजिक सीढ़ी की ऊँची पदान पर उन्हें स्थान मिले किन्तु रक्त के आधार पर श्रेणीबद्ध फ्रेंच समाज में कुलीन-वर्ग ने उस स्थान से उन्हें वंचित कर रखा था। इस प्रकार 18वीं शताब्दी का फ्रेंच बुर्जुआ (मध्यम-वर्ग) अपने को एक अजीब स्थिति में पाता था। उसके पास धन था, उसके पास योग्यता थी किन्तु इस धन और योग्यता के अनुरूप समाज में प्रतिष्ठा नहीं थी, सरकारी पद नहीं थे। इस विषमता को तभी दूर किया जा सकता था जब सामंतीय समाज के ढाँचे को नष्ट कर दिया जाए।
In simple words: फ्रांस का मध्यम वर्ग तत्कालीन व्यवस्था से असंतुष्ट था क्योंकि उन्हें कुलीन वर्ग और सरकार की गलत नीतियों से शिकायत थी, जो उनकी आर्थिक और सामाजिक उन्नति में बाधक थीं। धन और योग्यता होने के बावजूद, उन्हें सामंती व्यवस्था के कारण समाज में उचित प्रतिष्ठा और पद नहीं मिल रहे थे, जिससे उनमें गहरा असंतोष था।
🎯 Exam Tip: मध्यम वर्ग के असंतोष के मुख्य कारणों को समझें, विशेष रूप से कुलीन वर्ग के साथ उनके टकराव और सामाजिक पदानुक्रम में उनकी स्थिति पर।
Question 10. क्रांति से पहले की फ्रांस की आर्थिक स्थिति का विश्लेषण कीजिए।
Answer: क्रान्ति (1789) से पहले फ्रांस की आर्थिक स्थिति- फ्रांस की आर्थिक स्थिति अत्यन्त कठिन दौर से गुजर रही थी, ऐसे में सरकार की फिजूलखर्ची ने दशा को और भी शोचनीय बना दिया। उस समय फ्रांस में कर दो प्रकार के थे- प्रत्यक्ष और परोक्ष । प्रत्यक्ष कर (टाइल) जायदाद, व्यक्तिगत संपत्ति तथा आय पर लिए जाते थे। कुलीन वर्ग और पादरी इनमें से कुछ करों से तो बिल्कुल मुक्त थे और शेष करों से प्रायः मुक्त थे, क्योंकि कर निर्धारण करने वाले राज्य-कर्मचारी डरकर उन पर नाममात्र का कर लगाया करते थे। उसकी सारी कमी शेष जनता पर कर लगाकर पूरी की जाती थी और इस प्रकार उस पर करों का अत्यधिक भार था। कुलीन-वर्ग और पादरी भी सम्पन्न थे, रुपये में तीन आने भी कर नहीं देते थे जबकि मध्यमवर्ग के व्यक्ति से प्रायः दस गुना कर वसूल लिया जाता था। परोक्ष करों में मुख्य रूप से नमक, शराब, तंबाकू आदि पर लिए जाने वाले कर थे।
दूषित कर-व्यवस्था के फलस्वरूप राज्य जनता की सम्पत्ति का राष्ट्रीय कामों के लिए उपयोग नहीं कर सकता था। उसकी वाणिज्य-नीति भी ऐसी थी जिसमें राज्य में सम्पत्ति की उत्पत्ति भी पूरी तरह न हो पाती थी। फ्रेंच व्यापार अभी पूरी तरह से उन्नति नहीं कर पाया था। इस दोषपूर्ण अर्थ-व्यवस्था का परिणाम यह निकला कि राज्य का व्यय सदैव ही उसकी आय से अधिक रहा था तथा इस घाटे की पूर्ति हेतु सरकार को ऋण का आश्रय लेना पड़ा। अमेरिका के ब्रिटिश उपनिवेशों के स्वतंत्रता-संग्राम में भाग लेने के सरकारी निर्णय ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया। अगर इस संघर्ष में सम्मिलित होने के समय को फ्रांस सरकार के संकट का प्रारम्भ-बिन्दु माना जाए तो अत्युक्ति न होगी। इस संघर्ष की सफल समाप्ति ने फ्रांस में स्वतंत्रता की भावना को बल ही प्रदान नहीं किया अपितु उसका आर्थिक भार सरकार के लिए एक असह्य बोझ सिद्ध हुआ जिसे सम्हाल न सकने के कारण वह टूटकर बिखर गई ।
In simple words: क्रांति से पहले फ्रांस की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी, जिसमें सरकार की फिजूलखर्ची, प्रत्यक्ष और परोक्ष करों की असमान व्यवस्था प्रमुख थी। कुलीन और पादरी वर्ग को करों से छूट थी, जबकि आम जनता पर अत्यधिक बोझ था। दोषपूर्ण वाणिज्य नीति और अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी ने राज्य को भारी कर्ज में डाल दिया, जिससे आर्थिक संकट और गहरा गया।
🎯 Exam Tip: फ्रांस की आर्थिक दुर्दशा के प्रमुख कारणों-असमान कर व्यवस्था, फिजूलखर्ची और अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी-पर विशेष जोर दें, क्योंकि ये क्रांति के लिए महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि थे।
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