UP Board Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 12 Prachina Bharatiya Shiksha vyavastha

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UP Board Textbook Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 12 प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था

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UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 12 Prachin Bhartiya Shiksha Pranali Question Answer (गद्य - भारती)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 12 हिंदी अनुवाद प्राचीना भारतीयशिक्षाव्यवस्था के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

पाठ-सारांश

शिक्षा के स्वरूप-मनुष्य के वचन, शरीर और मन का जिससे संस्कार होता है, जिससे वह अपने अन्दर के पशुत्व को नियन्त्रित करता है और जिससे स्वयं में दया, उदारता आदि गुणों को धारण करता है, उसे शिक्षा कहते हैं। शिशु माता-पिता के पास रहकर ही बहुत शिक्षा प्राप्त करता है। वह माता की गोद में बैठे हुए; परिवार के सदस्यों के आचरण का सूक्ष्म निरीक्षण करके; उसका अनुकरण करता। है। यह उसकी अनौपचारिक शिक्षा है। इसीलिए माता-पिता बालक के आरम्भिक गुरु होते हैं। इसके बाद उसकी औपचारिक शिक्षा आरम्भ होती है, जिसे वह घर के बाहर गुरु के पास रहकर प्राप्त करता है। यहाँ वह गुरु के आदेशों का पालन करता हुआ कर्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान प्राप्त करता है। यही उसका व्यावहारिक ज्ञान भी है। जिस देश की जैसी संस्कृति होती है उसके अनुरूप ही वहाँ की। शिक्षा-व्यवस्था भी होती है।

शिक्षा एवं संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव-भारत की संस्कृति संसार की समस्त संस्कृतियों से श्रेष्ठ एवं प्राचीन है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। विदेशियों के आक्रमणों ने इसे अत्यधिक प्रभावित किया है। यही कारण है कि आज भारतीय जीवन-शैली पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव दिखाई देता है। इसका कारण हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली है, जो शिक्षा के मुख्य उद्देश्यों का स्पर्श भी नहीं करती। इस कारण ही न तो बालक के व्यक्तित्व का विकास हो पाता है और न आत्मा का।।

प्राचीन गुरुकुलीय शिक्षा-व्यवस्था

प्राचीनकाल में भारत में गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी। छात्र ब्रह्मचर्यपूर्वक, यज्ञोपवीत और मेखला धारण करके स्वयं गुरु के पास जाकर विद्या अध्ययन करते थे। गुरु गार्हस्थ्य जीवन समाप्त करके जंगलों में रहकर छात्रों को शिक्षा प्रदान करते थे। छात्र की योग्यता की परीक्षा लेकर ही गुरु उसकी योग्यतानुसार उसे गुरुकुल में प्रवेश देते थे। गुरुकुल में रहकर छात्र गुरुकुल के नियमों का पालन करते हुए विद्याध्ययन करते थे। वहाँ उसे समिधा लाना, गायें चराना, खेती करना आदि गुरु के काम भी करने होते थे। गुरु अपने शिष्यों को पुत्र के समान प्रेम करते थे। वहीं छात्र, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, त्याग, ध्यान, धारणा और समाधि का भी अभ्यास कर शिक्षा समाप्त करके और गुरु को दक्षिणा देकर वे गृहस्थाश्रम धर्म का पालन करते थे । गुरु और शिष्य का सम्बन्ध-गुरुकुल में गुरु के समीप रहकर शिष्य अपने चरित्र का विकास करते थे। ज्ञानार्जन के साथ ही वह दया, उदारता, स्वावलम्बन आदि सद्गुणों की शिक्षा भी प्राप्त करते थे। गुरु और शिष्य का सम्बन्ध स्नेहपूर्ण हुआ करता था। शिष्य गुरु के चरणों में प्रणाम करते थे, भक्ति से उनकी सेवा करते थे, विषयों से सम्बन्धित प्रश्न निःसंकोच पूछा करते थे । गुरु तत्त्वदर्शी, ज्ञानी, अध्यापन में रुचि रखने वाले होते थे।

चार सोपान-प्राचीन भारत में युवक ज्ञान के लिए विद्या अध्ययन करते थे। ज्ञान के बोध के अनुसार ही वे आचरण करते थे और आचारवान् होकर ही वे विद्या का प्रचार करते थे। उस समय शिक्षा की चार कोटियाँ अथवा सोपान विद्यमान थे-
(1) अध्ययन,
(2) बोध,
(3) आचरण और
(4) प्रचार ।।

विनय-सम्पन्नता

अध्ययन का फल विनय की सम्पन्नता है। पहले विद्या और विनय से सम्पन्न युवक ही समाज में आदर पाता था। विद्या प्राप्त कर लेने के पश्चात् भी अविनयी होने पर

अध्ययन में त्रुटि समझी जाती थी। पिता भी, विद्या पुढकर लौटे हुए पुत्र की विद्वत्ता' को विनय- के - आधार पर ही आँकता था। विद्या और विद्वत्ता की कसौटी विनय ही थी। अविनय से अध्ययन की

अपूर्णता ज्ञात होती थी। छान्दोग्य उपनिषद् के एक प्रसंग में बताया गया है कि गुरु के आश्रम से लौटे हुए अपने पुत्र के अहंकार को देखकर पिता ने उसकी विद्या-प्राप्ति में सन्देह किया था। कुछ प्रश्न पूछने पर उसे उसकी विद्या की अपूर्णता ही ज्ञात हुई थी।

स्त्री-शिक्षा-गुरुकुलीय शिक्षा-पद्धति में युवकों की तरह युवतियाँ भी शिक्षा पाती थीं। गार्गी, वागाम्भृणी आदि विदुषी युवतियाँ इसकी उदाहरण हैं।

बौद्धयुगीन शिक्षा-प्रणाली-बौद्धयुग में गुरुकुलीय शिक्षा-प्रणाली का ह्रास हो गया था। इस काल में विश्वविद्यालयों में शिक्षा दी जाती थी । वलभी, तक्षशिला, नालन्दा आदि विश्वविद्यालय उस समय शिक्षा के प्रधान केन्द्र थे। इन विश्वविद्यालयों में देश-विदेश के विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। इनमें पढ़ाने वाले अध्यापक अपने ज्ञान के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध थे । विश्वविद्यालयों में अत्यधिक समृद्ध पुस्तकालय भी होते थे। पढ़ने के इच्छुक छात्रों को योग्यता के आधार पर ही प्रवेश दिया जाता था। चीनी यात्री ह्वेनसाँग ने उन विश्वविद्यालयों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

उपसंहार-हमारे राष्ट्र के नेताओं का कर्तव्य है कि राष्ट्र की उन्नति के लिए वे पुरातन और नवीन शिक्षा-प्रणालियों का समन्वय करके शिक्षा योजना तैयार करें। तभी देश में राष्ट्रीय पुरुष होंगे और देश उन्नति करेगा।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) मनुष्यस्य वाक्कायमेनसां सम्यक् संस्कारो यया भवति, यया च स जन्पना पशु-निर्विशेष सन्नपि स्वपशुत्वं नियमयति स्वस्मिन् दयादाक्षिण्यादिमानवधर्मान् आधत्ते सा शिक्षेत्यभिधीयते । जन्मकालान्मृत्युं यावत् मनुष्यस्यानुदिनं विकासो भवति । सेयं विकासपरम्परा एकानवरता प्रक्रिया भवति । शिशुः पित्रोराचार्याणाञ्च सन्निधौ स्वत एवानल्पं शिक्षते । मातुरुत्सङ्गे स्थितः शुिशुः कुटुम्बिजनानां दैनन्दिनमाचरणं सूक्ष्मेक्षिकया निरीक्षते तज्जनितकुतूहलेन तदनुकुरुते । सेयं मनुष्यस्य आदिमानौपचारिकी शिक्षा भवति । क्रमशः शिशुत्वमतिक्रम्य स पित्रोः विधिनिषेधपरानादेशान् पालयन् कर्तव्याकर्त्तव्यज्ञानमर्जयति तद् द्वारा तस्य व्यवहारज्ञानं भवति । एवं पितरौ बालस्याद्यौ गुरू स्तः । मनुष्यमात्रस्यैवं शिक्षा गृहप्राङ्गणादेव प्रारभते । औपचारिकी शिक्षा तदनन्तरं गृहाद बहिर्गुरुसन्निधौ भवति । एतादृश्याः शिक्षाव्यवस्थायाः स्वरूपं प्रतिदेशं भिद्यते । यादृशी संस्कृतिः यस्य देशस्य भवति तदनुरूपा शिक्षाव्यवस्थापि तस्य देशस्य भवति ।।
शब्दार्थ
सम्यक् = भली प्रकार से ।
संस्कारः = शुद्धि ।
पशु-निर्विशेषः = पशु के समान ।
स्वपशुत्वं = अपनी पशुता को ।
नियमयति = नियन्त्रित करता है।
दाक्षिण्य = चतुरता ।
आधत्ते = धारण करता है।
शिक्षेत्यभिधीयते = शिक्षा कहलाती है।
यावत् = जब तक ।
अनुदिनम् = प्रतिदिन ।
अनवरता = निरन्तरता।
सन्निधौ = पास में।
अनल्पम् = बहुत ।
उत्सङ्ग = गोद में ।
दैनन्दिनम् = दैनिक ।
सूक्ष्मेक्षिकया = सूक्ष्म दृष्टि से ।
तदनुकुरुते = उसका अनुकरण करता है।
अर्जयति = अर्जित करता है।
पितरौ = माता-पिता।
बालस्याद्यौ = बच्चे के प्रारम्भिक ।
प्रतिदेशम् = प्रत्येक देश में।
भिद्यते = अन्तर होता है।
तदनुरूपा = उसी के अनुसार ।
सन्दर्भ
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत गद्य-भारती' में संगृहीत 'प्राचीन भारतीयशिक्षाव्यवस्था' शीर्षक पाठ से उधृत है । [संकेत-इस पाठ के शेष गद्यांशों के लिए भी यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा ।]
प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में शिक्षा का औपचारिक और अनौपचारिक स्वरूप बताया गया है।
अनुवाद
मनुष्य की वाणी, मन और शरीर की शुद्धि जिससे भली प्रकार से होती है, जिससे जन्म से पशुओं से अभिन्न होते हुए भी (मनुष्य) अपनी पशुता को नियन्त्रित करता है, स्वयं में दया, उदारता आदि मनुष्य के गुणों को धारण करता है, वह 'शिक्षा' कही जाती हैं। जन्म के समय से मृत्यु तक मनुष्य का नित-प्रति विकास होता है। यह विकासक्रम एक लगातार प्रक्रिया होती है। बच्चा माता-पिता और गुरुओं के पास में स्वयं ही बहुत कुछ सीखता है। माता की गोद में बैठा हुआ बच्चा परिवार वालों के दिनभर के आचरण को सूक्ष्म दृष्टि से देखता है और उससे उत्पन्न उत्सुकता से उसी
प्रभृतयस्ते गुरवो वानप्रस्थाश्रमिणः संन्यासिनो वा सन्तः अरण्येऽवसन्। अध्ययनाध्याप तत्त्वचिन्तनं च तेषां दिनचर्यासीत् । वैराग्यप्रभावात् कामक्रोधादिषरिपूणां सुतरामप्रभावोऽ भवत् तेषां मनस्सु । शुद्धचित्तास्ते तपस्विनो विद्यार्थिनां योग्यतां सम्यक् परीक्ष्य तेषामर्हताञ्च निर्धार्य तदनु तान् स्वान्तेवासिनः अकुर्वन् । अद्यत्वे यथा निर्धारितं शिक्षाशुल्कं दत्वा ये केऽपि जनाः शालासु प्रवेशं लभन्ते विहिताविहितोपायैश्च परीक्षां समुत्तीर्य विद्वत्पदवीधारिणो भवनि, तथा प्राचीनव्यवस्थायां सम्भावना नासीत्। अर्हतां कुमाराणामेव तदा विद्याध्ययनेऽधिकारोऽभवत्। श्रुतिरपि आदिशति
नापुत्राय दातव्यं नाशिष्याय दातव्यम् ।
सम्यक् परीक्ष्य दातव्यं मासं षण्मासवत्सरम् ॥
शब्दार्थ
पुरा = प्राचीन काल में ।
परिसमाप्य = समाप्त करके।
अरण्येषु = वनों में ।
बटवः = ब्रह्मचारी छात्र ।
अन्तेवासिनः = पास में रहने वाले (शिष्य)।
कृतोपनयनाः (कृत + उपनयनाः) = उपनयन संस्कार किये गये।
समेखलाः = करधनी पहने हुए।
सपलाशदण्डः = ढाक का दण्ड धारण किये हुए।
समित्पाणयः भूत्वा = हाथ में समिधा लेकर ।
अन्तिकम् = पास ।
जग्मुः = जाते थे ।
सुतराम् = पूरी तरह से ।
अर्हताम् = योग्यता को।
निर्धार्य = निर्धारित करके ।
तदनु = उसके बाद ।
विहिताविहितोपायैः = उचित और अनुचित उपायों से ।
समुत्तीर्य = उत्तीर्ण करके ।
नासीत् = नहीं थी ।
अर्हताम् = योग्य को ।
श्रुतिरपि = वेद भी ।
नापुत्राय = अयोग्य पुत्र के लिए नहीं।
नाशिष्याय = अयोग्य शिष्य के लिए नहीं।
पाण्मासवत्सरम् = छः महीने अथवा साल भर ।
प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में प्राचीनकाल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों के प्रवेश की व्यवस्था का वर्णन किया गया है ।
अनुवाद
वर्ण और आश्रमों को प्रधानता देने वाले भारतवर्ष में प्राचीनकाल में गुरुकुल की शिक्षा का प्रचलन था। गृहस्थ जीवन को समाप्त करके जो लोग वानप्रस्थी होकर वन में रहते थे, शिक्षा-प्राप्त करने के इच्छुक ब्रह्मचारी छात्र प्रायः उन्हीं के पास रहते थे और वहीं उनकी शिक्षा होती थी। उपनयन-संस्कार किये हुए (जनेऊ धारण किये हुए) बालक ब्रह्मचर्यव्रत रखकर मेखला (तगड़ी) पहने हुए, पलाश का दण्ड लिये हुए, हाथ में समिधा लेकर वेदों के अध्ययन के लिए गुरु के समीप जाते थे। इसके लिए वेद का यह आदेश है-"विशेष ज्ञान के लिए ब्रह्मचारी हाथ में समिधा लेकर वेदपाठी, ब्रह्म में निष्ठा रखने वाले गुरु के पास ही जाये।” द्रोण, वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि वे गुरु हैं, जो वानप्रस्थ आश्रम वाले या संन्यासी होकर जंगल में रहते थे। अध्ययन, अध्यापन और तत्त्वों का चिन्तन करना उनकी दिनचर्या थी। वैराग्य के प्रभाव से उनके मनों में काम, क्रोध आदि छः शत्रुओं का अत्यधिक अभाव हो जाता था। निर्मल मन वाले वे तपस्वी विद्यार्थियों की योग्यता की अच्छी तरह से जाँच करके और उनकी योग्यता निश्चित करके उसके बाद उन्हें अपना अन्तेवासी (शिष्य) बनाते थे। आजकल जैसा कि निर्धारित शिक्षा-शुल्क (फीस) देकर जो कोई भी लोग विद्यालयों में प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं और उचित-अनुचित तरीकों से परीक्षा उत्तीर्ण करके विद्वान् की उपाधि धारण करने वाले हो जाते हैं, वैसी प्राचीन व्यवस्था में सम्भावना नहीं थी। योग्य बालकों का ही उस समय विद्या-अध्ययन में अधिकार होता था। वेद भी आदेश देते हैं अयोग्य पुत्र को (शिक्षा) नहीं देनी चाहिए, न ही अयोग्य शिष्य को (शिक्षा) देनी चाहिए । अच्छी तरह छः महीने-सालभर जाँच करके ही (शिक्षा) देनी चाहिए ।

(4) गुरुकुलं प्रविश्य ब्रह्मचारिणो गुरुकुलस्य नियमान् सम्यक् यथावत्परिपालयन्तः विद्याध्ययनमकुर्वन् । सममेव समिदाहरणगोचारणकृषिकर्मादिगुर्वाश्रमविहितव्यापारेष्वपि तेषां सहभागित्वं कुटुम्बिवदभवत् । गुरवोऽपि तेषु स्वसुतनिर्विशेषं स्निह्यन्ति स्म । अध्ययनकाले एव यमनयिमासनप्राणायामप्रत्याहारध्यानधारणासमाधीनामभ्यसोऽप्यभवत्। शिक्षासमाप्तौ गुरुदक्षिणां दत्त्वा स्नातकोपाधिभूषितास्ते प्रत्यावर्तनविधिमनुसृत्य गृहस्थाश्रमे प्रवेशमकुर्वन् । येषां शिष्याणां यावज्जीवनं शिक्षाप्राप्ती अभिरुचिरभवत् ते नैष्ठिकपदवीभाजः सन्तः गुरुकुलेष्वेवावसन्।
शब्दार्थ
प्रविश्य = प्रवेश पाकर । सममेव = साथ ही । समिदाहरण (समित् + आहरण) = लकड़ी लाना। विहितव्यापारेष्वपि = निश्चित कार्यों में भी। सहभागित्वम् = सहयोग । स्वसुतनिर्विशेष = अपने पुत्र के समान । प्रत्याहार = त्याग।
प्रत्यावर्तनविधिम् = शिक्षा प्राप्तकर गुरुकुल से विदा होने की विधि को । अनुसृत्य = अनुसरण करके । प्रवेशम् अकुर्वन् = प्रवेश करता था। यावज्जीवनम् = जीवनपर्यन्त । अभिरुचिरभवत् = लगन होती थी । नैष्ठिकपदवीभाजः = नैष्ठिक ब्रह्मचारी की पदवी धारण करने वाले ।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में गुरुकुल में प्रवेश प्राप्त करने के बाद शिक्षा-प्राप्ति की विधि का वर्णन किया गया है।
अनुवाद
गुरुकुल में प्रवेश पाकर ब्रह्मचारी गुरुकुल के नियमों को पूर्णतया अच्छी तरह पालन करते हुए विद्या-अध्ययन करते थे। साथ ही लकड़ी लाने, गायें चराने, खेती का काम आदि गुरु के आश्रम के योग्य कार्यों में उनका सहयोग परिवार के सदस्यों की तरह होता था। गुरु भी उन पर पुत्र के समान स्नेह करते थे। अध्ययन के समय में ही यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि आदि का अभ्यास हो जाता था। शिक्षा समाप्त करने पर गुरु को दक्षिणा देकर स्नातक की उपाधि से विभूषित होकर दीक्षान्त विधि को अनुसरण करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। जिन शिष्यों की जीवनपर्यन्त शिक्षा-प्राप्त करने में रुचि होती थी, वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी के पद को ग्रहण करते हुए गुरुकुल में ही रहते थे ।

(5) गुरुकुलवासकाले शिष्याः गुरुसन्निधौ स्वचरित्रस्य सर्वाङ्गीणम् विकासमकुर्वन् । ज्ञानार्जनेन सहैव स्वावलम्बनादीनां सदगुणानामात्मन्याधानमपि कृतवन्तः। गुरुशिष्ययोः सम्बन्धः स्नेहसिक्त आसीत् श्रीमद्भगवद्गीतायामुक्तमस्ति
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
शब्दार्थ
गुरुसन्निधौ = गुरु के पास में।
आत्मन्याधानम् = आत्मा में धारण करना ।
प्रणिपातेन = प्रणिपात (प्रणाम) द्वारा।
पररिप्रश्नेन = प्रश्न (पूछने) की परिपाटी से ।
उपदेक्ष्यन्ति = उपदेश देंगे।
तत्त्वदर्शिनः = तत्त्वद्रष्टा।
प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गुरु और शिष्य के सम्बन्धों का वर्णन किया गया है।
अनुवाद
गुरुकुल में रहते समय शिष्य गुरु के पास अपने चरित्र का सर्वांगीण विकास करते. . थे । ज्ञान-प्राप्ति के साथ स्वावलम्बन आदि गुणों को भी आत्मा में धारणा करते थे। गुरु और शिष्य का सम्बन्ध स्नेह से सिंचित (पूर्ण) होता था । श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है। ज्ञानी और तत्त्वदर्शी गुरु प्रणाम करने से, सरलतापूर्वक प्रश्न पूछने से और सेवा करने से ही तुझे ज्ञान का उपदेश देंगे । तुम उस ज्ञान को उनके पास जाकर समझो ।

(6) अयं श्लोकः गुरुशिष्ययोरादर्शसम्बन्धं स्फुटं प्रकाशयति । स एव शिष्यो ज्ञानार्जने प्रभवति यः गुरोः चरणेषु प्रणिपातं करोति । प्रणिपातस्यात्र कोऽर्थः इति जिज्ञासायां सत्यां वाक्कायमनसां गुरवे समर्पणामिति मन्तव्यं भवति । तेन गुरुशिष्ययोर्मध्येऽभेदबुद्धिरुत्पद्यते । एष एव ज्ञानावाप्तेः ऋजुः मार्गः । समर्पणेन सहैव छात्रस्य बौद्धिकस्वातन्त्र्यस्य रक्षार्थं श्लोके परिप्रश्नानां व्यवस्थापि दृश्यते । गुरु प्रति अतिशयितः आदरः शिष्यान् विषयसम्बन्धिपरिप्रश्नेभ्यो न वारयति । सेवाभावः शिष्याणां परमो धर्मः । एवं सच्छिष्यलक्षणमत्र निरूपितम्। एवमेव तादृशा एव पुरुषाः गुरुवः भवन्ति ये तत्त्वद्रष्टारो ज्ञानिनश्च सन्ति । सममेव अध्यापनरुचिः तेषां गुरुभावं सर्वथा द्रढयति । एष सम्बन्धः एव शिक्षा समुन्नयति । अद्यत्वे न तादृशः गुरुशिष्ययोः सम्बन्धो दृश्यते । फलतः सर्वत्र शिक्षाप्राप्तिविधौ वैफल्यमेव लक्ष्यते । शिक्षायाः परमां कोटिं प्राप्तां अपि युवानो विनयविरहिताः दिग्भ्रान्ताः अद्य भवन्ति ।
शब्दार्थ स्फुटं = स्पष्ट । प्रकाशयति = प्रकाशित करता है। प्रभवति = समर्थ होता है। प्रणिपातं करोति = प्रणाम करता है। जिज्ञासायां सत्यां = जानने की इच्छा होने पर। वाक्कायमनसाम् = वाणी, शरीर और मन का। मन्तव्यं = मानना चाहिए। अभेदबुद्धिरुत्पद्यते = अभेद बुद्धि उत्पन्न होती है। ऋजुः = सरल, सीधा । परिप्रश्नानाम् = बार-बार पूछने की। अतिशयितः आदरः = अत्यधिक आदर । वारयति = रोकता है। सच्छिष्यलक्षणमत्र (सत् + शिष्य + लक्षणम् + अत्र) = अच्छे शिष्य को लक्षण यहाँ। सममेव = साथ ही । द्रढयति = दृढ़ करती है। समुन्नयति = समुन्नत करती है। वैफल्यम् एव = विफलता ही। दिग्भ्रान्ताः = दिशाहीन, भटके हुए।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में गुरुकुल की शिक्षा पर विधिवत् प्रकाश डाला गया है।
अनुवाद
यह श्लोक गुरु और शिष्य के आदर्श सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। वही शिष्य ज्ञानार्जन में समर्थ होता है, जो गुरु के चरणों में प्रणाम करता है। 'प्रणिपात' का यहाँ क्या अर्थ है? ऐसी जानने की इच्छा होने पर वाणी, शरीर और मन को गुरु को अर्पित करना, ऐसा समझना चाहिए। उससे गुरु और शिष्य के मध्य अभेद बुद्धि उत्पन्न होती है। यही ज्ञाने-प्राप्ति का सरल मार्ग है। समर्पण के साथ ही छात्र की बौद्धिक स्वतन्त्रता क रक्षा के लिए श्लोक में सरलतापूर्वक प्रश्न पूछने की व्यवस्था भी दिखाई देती है। गुरु के प्रति अत्यधिक आदर शिष्यों को विषय सम्बन्धी प्रश्न बार-बार पूछने से नहीं रोकता है। सेवा करना शिष्य का परम धर्म है। इस प्रकार उत्तम शिष्य का लक्षण यहाँ बताया गया है। इसी प्रकार वैसे ही पुरुष गुरु होते हैं, जो तत्त्वद्रष्टा और ज्ञानी होते हैं। साथ ही पढ़ाने में लगन उनके गुरु होने को सभी प्रकार से पुष्ट करती है। यह सम्बन्ध ही शिक्षा की उन्नति करता है। आजकल गुरु-शिष्य का वैसा सम्बन्ध नहीं दिखाई पड़ता है। फलस्वरूप सब जगह शिक्षा-प्राप्ति की विधि में विफलता ही दिखाई पड़ती है। शिक्षा की चरमसीमा को प्राप्त हुए युवक भी आज विनयहीन और दिग्भ्रमित होते हैं।

(7) प्राचीनभारते युवानो बोधार्थम् अधीतिनोऽभवन् । बोधानुकूलं तेषामाचरणमभूत्। आचारवन्तः सन्तः ते विद्यां प्राचारयन्। एवम् अधीतिबोधाचरणप्रचारणानि तदा शिक्षाव्यवस्थायाः चतस्रः कोटयः आसन्।
शब्दार्थ
बोधार्थम् = ज्ञान के लिए।
अधीतिनः = पढ़ने वाले ।
बोधानुकूलम् = ज्ञान के अनुरूप ।
प्राचारयन् = प्रचार किया।
चतस्रः = चार ।
कोटयः = श्रेणियाँ ।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि विद्या की चार श्रेणियाँ होती हैं।
अनुवाद
प्राचीन भारत में युवक ज्ञान के लिए पढ़ते थे। ज्ञान के अनुसार ही उनका आचरण होता था। आचारवान् होकर वे विद्या का प्रचार करते थे। इस प्रकार उस समय पढ़ना, ज्ञान, आचरण और प्रचार शिक्षा-व्यवस्था के चार सोपान होते थे।

(8) ज्ञानिनो गुरवः श्रद्धालवश्छात्राः गुरुकुलस्य मणिकाञ्चनसंयोगं व्यञ्जन्ति स्म । एवं वैशिष्टययुक्ते गुरुकुले पठिता विद्या कथं न सफला भवेत्? अधीतेः फलं विनतिरिति गुरुकुले समाजेऽपि च स्वीकृती आसीत्। विद्याविनयसम्पन्न एव समाजे श्रद्धास्पदं जायते स्म, नहि विद्यासम्पन्नः केवलम् । अधीते स्नातकेऽविनयस्य स्थितिरधीतावेव काचित्रुटिरिति ते अमन्यन्त । पिताऽपि गुरुकुलात् प्रतिनिवृत्तस्य स्नातकभूतस्य स्वसूनोः विनयसम्पन्नतामेव परीक्षते स्म । विद्यायाः विद्वत्त्वस्य चोभयोः विनय एव तदानीं निकषमासीत्। अविनयेना- ध्ययनस्यैवापूर्णता द्योतिताऽभवत्। छान्दोग्योपनिषदि तादृश एकः प्रसङ्गोऽस्ति । यत्र गुरोराश्रमात्प्रतिनिवृत्तस्य स्वतनयस्य श्वेतकेतोः दर्पमवलोक्य पिता तस्य विद्यावाप्तौ सन्देग्धि । कतिपयैः प्रश्नैः पुत्रं परीक्ष्य स तस्य विद्याया एवापूर्णतामवगच्छति तत्पूर्व्यर्थं स्वयं प्रययते ।।
शब्दार्थ मणिकाञ्चनसंयोगम् = मणि और सुवर्ण का संयोग । व्यञ्जन्ति स्म = प्रकट करते थे । विनतिः = विनय, नम्रता। स्थितिरधीतावेव (स्थितिः + अधीतौ + एव) = होना अध्ययन में ही । अमन्यत = मानते थे। स्वसूनोः = अपने पुत्र का। परीक्षते = स्म परीक्षा करता था। निकषम् = कसौटी । द्योतिताऽभवत् = विदित होती थी। सन्देग्धि = सन्देह करता है। प्रयतते = प्रयत्न करता है।
प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में; शिक्षा का आधार छात्र को विनय सम्पन्न होना; बताया गया है।
अनुवाद
ज्ञानी गुरु और श्रद्धालु छात्र गुरुकुल के मणिकांचन योग को व्यक्त करते थे। इस प्रकार की विशेषता से युक्त गुरुकुल में पढ़ी गयी विद्या कैसे न सफल हो, अर्थात् अवश्य ही सफल होगी। अध्ययन का परिणाम विनय' है, यह गुरुकुल में और समाज में भी स्वीकार किया गया था। विद्या और विनय से युक्त (युवक) ही समाज में श्रद्धा का पात्र होता था, केवल विद्या से सम्पन्न नहीं। पढ़े हुए स्नातक में अविनय होना, पढ़ने में कोई कमी रह गयी है, ऐसा वे मानते थे। पिता भी गुरुकुल से लौटे हुए स्नातक बने अपने पुत्र की विनयसम्पन्नता की परीक्षा करता था। विद्या और विद्वत्ता दोनों की कसौटी उस समय विनय ही थी। अविनय से अध्ययन की अपूर्णता ही ज्ञात होती थी। छान्दोग्य उपनिषद् में ऐसा एक प्रसंग है जहाँ गुरु के आश्रम से लौटे हुए अपने पुत्र श्वेतकेतु के गर्व को देखकर पिता उसकी विद्या-प्राप्ति में सन्देह करता है। कुछ प्रश्नों से पुत्र की परीक्षा लेकर वह उसकी विद्या की अपूर्णता को जान जाता है। उसकी पूर्ति के लिए वह (पिता) स्वयं प्रयत्न करता है।

(9) प्रसङ्गोऽयं गुरुकुलस्य माहात्म्यं स्वीकुर्वन्नपि पित्रोरभिभावकस्य पालकस्य वा शिक्षापूर्तये कर्तव्यमनुदिशति । ये च पितरोऽभिभावकोः वा शिक्षालयमेवालमिति मत्वा विरमन्ति सन्तुष्यन्ति च तेषां तनयाः बोधीप्तौ कृतार्थाः न भवेयुरिति छान्दोग्योपनिषदः प्रसङ्गस्याशयः । गुरुकुलशिक्षा-व्यवस्थायां यथा युवानस्तथ युवतयोऽपि शिक्षामाप्नुवन् । गार्गीवागाम्भृणीप्रभृतयो नार्यः विद्वत्संसत्सु प्रतिष्ठामलभन्त ।
बौद्धकालिके भारते गुरुकुलव्यवस्थायाः ह्रासः प्रारब्धः । तदा शिक्षण कार्यार्थं विश्वविद्यालयाः प्रादुरभवन् । वलभीतक्षशिलानालन्दादयः प्रमुखानि शिक्षाकेन्द्राण्यासन् ।
शब्दार्थ
पित्रोः = माता-पिता का ।
अनुदिशति = बतलाता है।
विमन्ति = उदासीन हो जाते हैं।
सन्तुष्यन्ति = सन्तुष्ट करते हैं।
बोधावाप्तौ = (बोध + अवाप्तौ) ज्ञान की प्राप्ति में ।
युवतयोऽपि = युवतियाँ भी ।
विद्वत्संसत्सु = विद्वानों की सभाओं में ।
बौद्धकालिके भारते = बुद्धकालीन भारत में ।
ह्रासः = अवनति । प्रादुरभवन् = प्रादुर्भूत हुए ।
प्रसंग
प्रस्तुत गद्य अवतरणों में माता-पिता और अभिभावक को अपने कर्तव्य के प्रति सचेत किया गया है तथा गुरुकुलीय शिक्षा-व्यवस्था के ह्रास एवं विश्वविद्यालयीय शिक्षा-व्यवस्था के प्रादुर्भाव को बताया गया है।
अनुवाद
यह प्रसंग गुरुकुल की महत्ता को स्वीकार करता हुआ भी माता-पिता, अभिभावक अथवा पालक के शिक्षा-पूर्ति के कर्तव्य को बतलाता है। जो माता-पिता अथवा अभिभावक (शिक्षा के लिए) विद्यालय (को) ही पर्याप्त है, ऐसा मानकर उदासीन हो जाते हैं और सन्तुष्ट हो जाते हैं, उनके पुत्र ज्ञान-प्राप्ति में सफल नहीं होते–यह छान्दोग्य उपनिषद् के प्रसंग का तात्पर्य है।
गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली में जैसे युवक (शिक्षा प्राप्त करते थे) वैसे ही युवतियाँ भी शिक्षा प्राप्त करती थीं। गार्गी, वागाम्भृणी आदि नारियों ने विद्वानों की सभाओं में सम्मान प्राप्त किया था।
बौद्धकाल में भारत में गुरुकुल प्रणाली का पतन प्रारम्भ हो गया था। उस समय शिक्षा-कार्य के लिए विश्वविद्यालयों का प्रादुर्भाव हुआ । वलभी, तक्षशिला, नालन्दा आदि प्रमुख शिक्षा- केन्द्र थे ।

(10) तेषु विश्वविद्यालयेषु बहुसङ्ख्यकाः स्वदेशीयविदेशीयाः छात्राः शिक्षामलभन्त । तत्राध्यापनरताः शिक्षकाः स्व-स्वज्ञान-वैभवप्रभावात् सर्वत्र प्रख्याता आसन् । तेषु विश्वविद्यालयेषु सुसमृद्धाः पुस्तकालया आसन् । तत्र प्रपठिषवश्छात्राः पूर्वं द्वारपण्डितैः परीक्षिताः जायन्ते स्म । अर्हतानिर्धारणोपरि तेषां प्रवेशोऽभवत्। चीनदेशीयह्वेनसाङ्गाख्य-महोदयैः तेषां विश्वविद्यालयानां व्यवस्था भूरि-भूरि प्रशंसिता । हा हन्त! क्रूरकालप्रहारेण तेषामस्तित्वमप्या स्मृतिपर्यवसायि भवति । तेन सममेव भारतस्य भारतीयता समाप्तप्राया दृश्यते । राष्ट्रसमुन्नतये सततं प्रयतमानानां राष्ट्रनेतृणां प्रथमं कर्त्तव्यमस्ति यत्ते नूतनपुरातनशिक्षाव्यवस्थयोः सामानुपातिकं समन्वयं विधाय शिक्षा संयोजयेयुः । तदैव राष्ट्रे राष्ट्रपुरुषाः प्रादुर्भविष्यन्ति, राष्ट्रोन्नतिश्च भविष्यति ।।
शब्दार्थ बहुसङ्ख्य काः = अधिक संख्या में प्रख्याताः = प्रसिद्ध । प्रपठिषवः = पढ़ने के इच्छुक । द्वारपण्डितैः = द्वारपण्डितों के द्वारा । अर्हतानिर्धारणोपरि = योग्यता निश्चित करने के बाद । भूरि-भूरि = बहुत अधिक । स्मृतिपर्यवसायि = स्मृति की समाप्ति । सततप्रयतमानानाम् = लगातार प्रयत्न करने वालों का। यत्ते (यत् + ते) = कि वे । समानुपातिकम् = समान अनुपात में । समन्वयं = ताल-मेल । विधाये = करके । संयोजयेयुः = सुनियोजित करना चाहिए।
प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में प्राचीन विश्वविद्यालय प्रणाली की शिक्षा की प्रशंसा एवं उसकी समाप्ति का वर्णन किया गया है।
अनुवाद
उन विश्वविद्यालयों में अपने देश के और विदेश के बहुत संख्या में छात्र शिक्षा प्राप्त करते थे। उनमें अध्यापन में लगे हुए शिक्षक अपने ज्ञान के वैभव के प्रभाव से सब जगह प्रसिद्ध थे। उन विश्वविद्यालयों में बहुत समृद्ध पुस्तकालय थे। वहाँ पढ़ने के इच्छुक छात्र पहले द्वार पर स्थित विद्वानों के द्वारा परीक्षित किये जाते थे। योग्यता के आधार पर उनका प्रवेश होता था। चीन देश के ह्वेनसाँग महोदय ने उन विश्वविद्यालयों की व्यवस्था की बहुत-बहुत प्रशंसा की है। हाय खेद है! समय के कठोर प्रहार से आज उनका अस्तित्व भी स्मृति से परे हो गया है। उसके साथ ही भारत की भारतीयता भी प्रायः समाप्त दिखाई पड़ रही है। राष्ट्र की उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्न करने वाले राष्ट्र के नेताओं का प्रथम कर्तव्य है कि वे नयी और पुरानी शिक्षा-व्यवस्था का समान अनुपात में मेल करके शिक्षा की योजना बनाएँ, तभी राष्ट्र में राष्ट्रभक्त पुरुष उत्पन्न होंगे और राष्ट्र की उन्नति होगी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. प्राचीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के सम्बन्ध में पठित अंश के आधार पर दस : वाक्य लिखिए।
Answer: [संकेत-'पाठ-सारांश' मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये शीर्षक 'प्राचीन गुरुकुलीय शिक्षा-व्यवस्था की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें ।]
In simple words: This question asks you to summarize the ancient Indian education system based on what you've read, focusing on its key features like Gurukuls, teacher-student relationships, and learning methods.

🎯 Exam Tip: For descriptive answers, structure your points logically, use clear language, and ensure you cover at least 5-7 distinct aspects mentioned in the text to score well.

 

Question 2. 'प्राचीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था' पाठ के आधार पर गुरु-शिष्य सम्बन्धों पर प्रकाश डालिए।
Answer: [संकेत-'पाठ-सारांश' मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये शीर्षक 'गुरु और शिष्य का सम्बन्ध' की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें ।]
In simple words: This question requires you to describe the unique and respectful relationship between gurus and disciples in the ancient Indian education system, as presented in the chapter.

🎯 Exam Tip: Emphasize key aspects like mutual respect, service, shared learning, and the holistic development fostered by this relationship, using specific examples if possible, to earn full marks.

 

Question 3. बौद्धयुगीन शिक्षा-पद्धति पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: [संकेत-'पाठ-सारांश' मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये 'बौद्धयुगीन शिक्षा प्रणाली शीर्षक की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें ।]
In simple words: This question asks for a brief note on the Buddhist era's education system, highlighting how it differed from the Gurukul system, particularly with the rise of universities.

🎯 Exam Tip: Focus on the transition from Gurukuls to universities, naming significant educational centers like Nalanda and Taxila, and mention the shift in teaching methods to provide a comprehensive answer.

 

Question 4. शिक्षा के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए इस पर पाश्चात्य प्रभाव की विवेचना कीजिए।
Answer: [संकेत-'पाठ-सारांश' मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये शीर्षकों; “शिक्षा के स्वरूप और शिक्षा एवं संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव'; की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें ।
In simple words: This question asks you to explain the nature of education as described in the chapter and discuss the impact of Western influence on it.

🎯 Exam Tip: Clearly define the traditional concept of education (संस्कार, दया, उदारता) first, then explain how Western influence altered Indian lifestyle and the core objectives of education, presenting a balanced view.

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