UP Board Solutions Class 9 Home Science Chapter 19 Grih paricharya aur grih paricharika

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Detailed Chapter 19 गृह परिचर्या और गृह परिचारिका UP Board Solutions for Class 9 Home Science

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Class 9 Home Science Chapter 19 गृह परिचर्या और गृह परिचारिका UP Board Solutions PDF

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. गृह-परिचर्या की परिभाषा देते हुए उसका महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
या
गृह-परिचर्या का क्या महत्त्व है?
Answer: गृह-परिचर्या का अर्थ एवं परिभाषा
सामान्य स्वस्थ व्यक्ति अपने सभी दैनिक कार्य स्वयं ही किया करते हैं अर्थात् प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति नहाना-धोना, शौच, कपड़े बदलना तथा भोजन ग्रहण करना आदि कार्य स्वयं ही करता है, परन्तु अस्वस्थ अथवा दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति अनेक बार अपने इन व्यक्तिगत कार्यों को स्वयं करने में असमर्थ हो जाता है। इन परिस्थितियों में व्यक्ति के ये सभी साधारण कार्य भी किसी अन्य व्यक्ति द्वारा ही किए जाते हैं। रोगी अथवा दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के इन कार्यों तथा कुछ अन्य सहायक कार्यों को ही सम्मिलित रूप से रोगी की परिचर्या कहते हैं। रोगी की परिचर्या के अन्तर्गत रोगी व्यक्ति को आवश्यक औषधि देना, उसकी मरहम-पट्टी करना, उठने-बैठने आदि में सहायता प्रदान करना आदि सभी कुछ सम्मिलित होता है। रोगी के इन सेवा-शुश्रूषा सम्बन्धी समस्त कार्यों को रोगी की परिचर्या कहते हैं। यदि रोगी अथवा दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति अस्पताल में भर्ती हो, तो उसकी परिचर्या का कार्य वहाँ के कर्मचारी ही करते हैं। सामान्य रूप से यह कार्य नस द्वारा किया जाता है। जब रोगी घर पर होता है, उस समय रोगी की परिचर्या या सेवा-शुश्रूषा का कार्य घर पर ही किया जाता है। इस स्थिति में होने वाली परिचर्या को 'गृह-परिचय' कहते हैं। इस प्रकार गृह-परिचय को इन शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है, “घर पर रहने वाले रोगी व्यक्ति की चिकित्सक के निर्देशानुसार की जाने वाली सेवा-शुश्रूषा अथवा परिचर्या को ही गृह-परिचर्या कहते हैं।” रोगी के रोग-काल में गृह-परिचर्या का विशेष महत्व होता है। गृह-परिचर्या के माध्यम से ही रोगी का सफल उपचार सम्भव हो पाता है। उत्तम गृह-परिचर्या के अभाव में चिकित्सक द्वारा रोगी का सफल उपचार कर पाना प्रायः कठिन ही होता है।
गृह-परिचर्या का महत्त्व
रोगी की स्नेहपूर्वक देख-रेख औषधीय चिकित्सा. के समान ही महत्त्वपूर्ण है, बल्कि कई बार (मानसिक रोग आदि में) तो यह औषधियों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है। औषधियाँ यदि रोग का निवारण करती हैं, तो रोगी से किया जाने वाला प्रेमपूर्ण व्यवहार रोगी को साहस एवं धैर्य बँधाता है। गृह-परिचर्या एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है जिसका निर्वाह करने के लिए विनम्र, हँसमुख, बुद्धिमान एवं कार्यकुशल परिचारिका की आवश्यकता होती है। परिचारिका को स्वास्थ्य के नियमों एवं उनके पालन के महत्त्व को भली-भाँति समझना चाहिए। उसे चिकित्सक से रोगी के लिए देख-रेख एवं औषधि सम्बन्धी आवश्यक निर्देश प्राप्त कर लेने चाहिए, क्योंकि तब ही वह रोगी की नियमित परिचर्या कर सकती है। औषधियों का उचित प्रयोग, विनम्र एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार रोगी की रोग की अवधि में अत्यधिक सहायता करता है। रुग्ण होने की दशा में यदि, उपयुक्त चिकित्सा उपलब्ध हो, तो रोगी को सर्वोत्तम परिचर्या घर पर ही मिलती है। घर पर परिवार के सदस्यों को प्रेमपूर्ण व्यवहार, आस-पास का परिचित वातावरण एवं अन्य सुख-सुविधाएँ रोगी में असुरक्षा की भावनाओं को दूर करती हैं तथा उसकी दशा में सुधार शीघ्रतापूर्वक होता है। रोग की गम्भीर अवस्था में रोगी डर एवं सदमे का शिकार हो सकता है। इस खतरनाक एवं गम्भीर परिस्थिति में अस्पताल अथवा नर्सिंग होम की परिचारिका की अपेक्षा गृहिणी (गृह-परिचारिका) अधिक प्रभावी ढंग से रोगी को धैर्य बँधा सकती है तथा रोगमुक्त होने के लिए आशान्वित कर सकती है। गृह-परिचारिका को चिकित्सक के निर्देशों का नियमपूर्वक पालन करना चाहिए अन्यथा हानि होने की सम्भावना भी हो सकती है। उसमें पर्याप्त आत्मविश्वास होना चाहिए। रोगी की गम्भीर अवस्था में भी उसे उत्तेजित अथवा घबराना नहीं चाहिए। इस प्रकार के गुणों से युक्त गृह-परिचारिका रोगी की अस्पताल से भी अच्छी परिचर्या कर सकती है। आधुनिक काल में रोग एवं दुर्घटनाएँ प्रत्येक घर एवं परिवार के लिए सामान्य घटनाओं के समान बन चुकी हैं। अतः गृह-परिचर्या के महत्त्व को भली-भाँति समझा जा सकता है। प्रत्येक गृहिणी एवं परिवार के अन्य सदस्यों को परिचर्या के आवश्यक नियमों का ज्ञान अनिवार्य रूप से प्राप्त करना चाहिए, क्योंकि गृह-परिचर्या में दक्ष गृहिणी किसी भी प्रकार की आपात स्थिति में घर में अस्पताल की सभी सुविधाएँ सुलभ कर परिवार के पीड़ित सदस्य अथवा सदस्यों की उपयुक्त देख-रेख कर सकती है।
In simple words: गृह-परिचर्या का अर्थ है घर पर रोगी की चिकित्सक के निर्देशानुसार सेवा करना। यह रोगी के शीघ्र स्वस्थ होने, उसे भावनात्मक सहारा देने और परिवार के सदस्यों को आपातकालीन स्थिति के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

🎯 Exam Tip: गृह-परिचर्या की परिभाषा और उसके महत्व को स्पष्ट रूप से समझाना, विशेषकर रोगी की भावनात्मक देखभाल और परिवार की भूमिका पर जोर देना, उच्च अंक दिला सकता है।

 

Question 2. अच्छी परिचारिका में क्या गुण होने चाहिए? विस्तार से वर्णन कीजिए ।
या
परिचारिका के मुख्य गुणों का वर्णन कीजिए ।
Answer: परिचारिका के गुण
रोगी अथवा दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के उपचार के लिए जितनी अच्छी चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है उतनी ही आवश्यकता अच्छी परिचर्या की भी होती है, इसके लिए एक कुशल एवं बुद्धिमान परिचारिका का होना अत्यन्त आवश्यक है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यह अनिवार्य नहीं कि गृह-परिचर्या को कार्य किसी महिला (परिचारिका) द्वारा ही किया जाए। सुविधा एवं परिस्थितियों के अनुसार गृह-परिचर्या का कार्य परिवार का कोई पुरुष सदस्य भी कर सकता है। ऐसे पुरुष को 'गृह-परिचारक' कहा जाता है। गृह-परिचर्या का कार्य करने वाले व्यक्ति के लिए आवश्यक गुणों का विवरण निम्नवर्णित है
(1) उत्तम स्वास्थ्य: परिचारिका को एक लम्बी अवधि तक निरन्तर रोगी की देखभाल करनी होती है; अतः उसका पूर्णतः स्वस्थ होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त पूर्ण रूप से स्वस्थ परिचारिका के रोगी के पास में रहने पर रोग से संक्रमित होने की सम्भावना भी कम रहती है। इसके साथ-साथ यह भी सत्य है कि यदि परिचारिका स्वयं भी रोग से ग्रस्त हो तो उस स्थिति में सम्बन्धित रोग का संक्रमण रोगी अथवा दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को भी हो सकता है।
(2) कार्य-कुशल एवं दूरदर्शी होना: परिचारिका का परिचर्या के कार्यों में दक्ष होना आवश्यक है। उसका दूरदर्शी होना भी अत्यन्त अनिवार्य है ताकि वह रोगी की अवस्था एवं आवश्यकताओं का अनुमान कर आवश्यक प्रबन्ध कर सके।
(3) विनम्र एवं हँसमुख होना: स्वभाव से कोमल तथा हँसमुख परिचारिका रोगी के चिड़चिड़ेपन को दूर कर मानसिक सन्तोष प्रदान कर सकती है, जिसकी रोगी को अत्यधिक आवश्यकता होती है। सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार से रोगी परिचारिका की सभी बातें मानता है तथा शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता है।
(4) सहानुभूति के गुण से परिपूर्ण: रोगग्रस्त व्यक्ति की सच्चे मन से तथा पूरी लगन से सेवा एवं देखभाल का कार्य वही व्यक्ति कर सकता है जिसके मन में सहानुभूति की भावना प्रबल हो। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही परिचारिका का एक आवश्यक गुण सहानुभूति से परिपूर्ण होना माना गया है।
(5) सहनशीलता: अधिक समय तक अस्वस्थ रहने पर रोगी प्रायः क्रोधी व चिड़चिड़ा हो जाता है। औषधियों के प्रति उसमें विरक्ति उत्पन्न हो जाती है तथा वह ऊट-पटांग बातें एवं कार्य करने लगता है। उसकी देख-रेख के लिए एक ऐसी सहनशील परिचारिका की आवश्यकता होती है जो कि उसकी उपर्युक्त बातों का बुरा न माने तथा पूर्णरूप से सहज एवं विनम्र रहकर उसकी परिचर्या करती रहे।
(6) अच्छी स्मरण-शक्ति-रोगी को निश्चित समय पर औषधि सेवन कराना, भोजन एवं फल आदि देना तथा उसकी अन्य दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना परिचारिका के महत्त्वपूर्ण दायित्व हैं। इनका नियमित पालन करने के लिए उसमें अच्छी स्मरण शक्ति का होना अनिवार्य है।
(7) तीव्र निरीक्षणशक्ति एवं निर्णय लेने की क्षमता: परिचारिका की निरीक्षण शक्ति तीव्र होनी चाहिए ताकि वह रोगी की बिगड़ती अवस्था का तुरन्त अनुमान लगा सके। ऐसी अवस्था में चिकित्सक को अविलम्ब बुलाना, चिकित्सक के उपलब्ध न होने पर चिकित्सक के पूर्व निर्देशों के अनुसार औषधि की मात्रा या प्रकार में परिवर्तन, कृत्रिम श्वसन आदि उपायों को अपनाने के उपयुक्त निर्णय लेने की क्षमता का होना भी एक अच्छी परिचारिका का गुण है।
(8) कर्त्तव्यपरायण एवं आज्ञाकारी: परिचारिका को रोगी की देख रेख को अपना सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कर्तव्य समझना चाहिए। उसे एक आज्ञाकारी व्यक्ति की भाँति चिकित्सक द्वारा दिए गए सभी निर्देशों का पालन करना चाहिए। यदि रोगी किसी औषधि को लेना नहीं चाहता अथवी अपनी भोजन व्यवस्था में परिवर्तन चाहता है अथवा अन्य किसी प्रकार की इच्छा रखता है तो एक अच्छी परिचारिका स्वयं कोई निर्णय न लेकर चिकित्सक से ही उपयुक्त निर्देश प्राप्त करती है। एक अच्छी परिचारिका अपने कर्तव्य से भली प्रकार परिचित होती है तथा स्वयं चिकित्सक बनने का प्रयास नहीं करती।
(9) स्वच्छता का ध्यान रखना: परिचारिका को सफाई के प्रति पूर्णतः सचेत रहना चाहिए। रोगी के शरीर की सफाई, बिस्तर व उसके आसपास की सफाई तथा साथ ही रोगी के वस्त्र व भोजन आदि की स्वच्छता का उसे सदैव ध्यान रखना चाहिए। परिचारिका को रोगी के वस्त्र एवं बर्तन आदि को . समय-समय पर नि:संक्रमित करना चाहिए। इसके साथ-साथ परिचारिका को स्वयं अपने हाथों आदि की सफाई का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि यदि उसके हाथ साफ नहीं हैं, तो उस स्थिति में रोगी का अहित हो सकता है।
(10) प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान होना: अनेक बार रोगों या दुर्घटनाओं से पीड़ित व्यक्तियों को तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है। ऐसे गम्भीर समय में एक दक्ष परिचारिका पीड़ित व्यक्तियों को आपातकाल चिकित्सा उपलब्ध करा सकती है। अतः परिचारिका को प्राथमिक चिकित्सा का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।
(11) पाक-कला में निपुण होना: परिचारिका को रुग्णावस्था में दिए जाने वाले सभी आहारों के तैयार करने की विधियाँ आनी चाहिए। रुग्णावस्था में प्रायः रोगियों का स्वाद बिगड़ जाता है तथा वह भिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थों की माँग करते हैं। अतः परिचारिका को पाक-कला में निपुण होना चहिए।
In simple words: एक अच्छी परिचारिका को उत्तम स्वास्थ्य, कार्यकुशलता, दूरदर्शिता, विनम्रता, सहानुभूति, सहनशीलता, अच्छी स्मरण-शक्ति, तीव्र निरीक्षण शक्ति, निर्णय लेने की क्षमता, कर्तव्यपरायणता, स्वच्छता का ध्यान और प्राथमिक चिकित्सा व पाक-कला का ज्ञान होना चाहिए ताकि वह रोगी की उचित देखभाल कर सके।

🎯 Exam Tip: परिचारिका के गुणों का वर्णन करते समय प्रत्येक गुण का संक्षिप्त और स्पष्ट विवरण देना तथा रोगी के स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव को रेखांकित करना महत्वपूर्ण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. गृह-परिचारिका का रोगी के लिए क्या महत्त्व है?
Answer: रोगी को पूर्ण स्वास्थ्य लाभ कराने में परिचारिका का महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। वह रोगी एवं चिकित्सक के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है, जो कि
1. रोगी की देखभाल करती है।
2. रोगी व उसके आस-पास की सफाई की व्यवस्था करती है।
3. चिकित्सक के निर्देशानुसार रोगी को औषधि देती है।
4. घावों की आवश्यक मरहम-पट्टी करती है।
5. रोगी को स्नान व स्पंज कराती है।
6. रोगी को मल-मूत्र विसर्जन में सहायता करती है।
7. रोगी के आहार की व्यवस्था करती है।
8. रोगी के ताप आदि का चार्ट बनाती है।
9. रोगी की निराशा दूर कर उसे धैर्य बँधाती है।
10. रोगी से मित्रतापूर्ण व्यवहार करती है तथा उसकी सभी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखती है।
In simple words: गृह-परिचारिका रोगी की शारीरिक और मानसिक देखभाल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह चिकित्सक के निर्देशों का पालन करती है, रोगी को दवा देती है, साफ-सफाई का ध्यान रखती है और रोगी को भावनात्मक सहारा प्रदान कर उसे शीघ्र स्वस्थ होने में मदद करती है।

🎯 Exam Tip: गृह-परिचारिका के महत्व को बताते समय उसके कार्यों और रोगी के प्रति उसके व्यवहार के सकारात्मक प्रभावों को सूचीबद्ध करना प्रभावी होता है।

 

Question 2. रोगी की रिपोर्ट लिखना क्यों आवश्यक है? रिपोर्ट में परिचारिका को क्या-क्या बातें लिखनी चाहिए?
Answer: रोगी की रिपोर्ट लिखने की आवश्यकताः
परिचारिका को नियमित रूप से रोगी की रिपोर्ट तैयार करते रहना चाहिए। इससे निम्नलिखित लाभ होते हैं
1. रुग्णावस्था में रोगी की सही दशा का अनुमान लगाने में सुविधा रहती है।
2. रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सक उपयुक्त चिकित्सा सम्बन्धी निर्देश दे सकता है।
रोगी की रिपोर्ट का अभिलेखनः इसके लिए परिचारिका को निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए
(i) रोगी की नाड़ी, श्वास गति एवं ताप का चार्ट तैयार करनाः यह एक नियन्त्रित चार्ट होता है, जिसमें समय-समय पर रोगी की नाड़ी की गति, श्वास गति तथा तापक्रम को अंकित किया जाता है। इन तथ्यों को ग्राफ के माध्यम से भी दर्शाया जा सकता है।
(ii) रोगी के मल-मूत्र विसर्जन का चार्ट बनाना: इसमें रोगी कितनी बार मल-मूत्र विसर्जित करता है, मल-मूत्र की बनावट, रंग व गन्ध तथा इस क्रिया में होने वाले कष्ट आदि का विवरण अंकित किया जाता है।
(iii) निद्रा एवं भूख की स्थिति का अंकन: इसमें रोगी सही नींद लेता है अथवा नहीं तथा उसे आवश्यक भूख लगती है अथवा नहीं आदि का अभिलेखन किया जाता है।
(iv) अन्य बातें:
इसमें औषधियों के प्रति रोगी की प्रतिक्रिया, औषधियों का प्रभाव, रोगी की मानसिक दशा तथा रोगी की जिह्वा का रंग आदि का अभिलेखन किया जाता है।
उपर्युक्त बातों को प्रायः निम्नलिखित तालिका द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है

रोगी का नामआयु...पुरुष / स्त्री / बच्चा
तिथि एवं माह ....सम्भावित रोग का नाम ......
अभिलेखन-तीन-तीन घण्टे पश्चात्
रोगी की दशा12345678
तापक्रम
श्वास गति
नाड़ी गति
मल-मूत्र
निद्रा
भोजन
वमन
सामान्य दशा
कोई विशेष बात

In simple words: रोगी की रिपोर्ट लिखना उसकी सही स्थिति का अनुमान लगाने और चिकित्सक को उचित निर्देश देने के लिए आवश्यक है। रिपोर्ट में नाड़ी, श्वास, ताप, मल-मूत्र विसर्जन, निद्रा, भूख, दवाओं की प्रतिक्रिया और मानसिक दशा जैसी महत्वपूर्ण बातें दर्ज करनी चाहिए।

🎯 Exam Tip: रिपोर्ट के महत्व और उसमें शामिल किए जाने वाले प्रमुख बिन्दुओं को स्पष्ट करना, विशेषकर तालिका के माध्यम से जानकारी प्रस्तुत करने की क्षमता, अच्छे अंक दिला सकती है।

 

Question 3. परिचारिका के रोगी के प्रति मुख्य रूप से क्या कर्तव्य होते हैं?
Answer: परिचारिका के रोगी के प्रति मुख्य रूप से निम्नलिखित कर्तव्य होते हैं।
1. परिचारिका का कर्तव्य है कि वह रोगी को हर प्रकार से आराम पहुँचाए ।
2. परिचारिका का कर्तव्य है कि वह रोगी के शरीर की स्वच्छता एवं अनिवार्य प्रसाधन को ध्यान रखे। रोगी के बालों में कंघा करके उसे साफ-सुथरे वस्त्र पहनाने का कार्य भी परिचारिका द्वारा ही किया जाता है।
3. परिचारिका को रोगी के भोजन की भी व्यवस्था करनी होती है; अतः रोगी के भोजन को पकाना भी उसे आना चाहिए ।
4. रोगी यदि स्वयं मल-मूत्र का त्याग न कर सकता हो, तो बिस्तर पर ही मल-त्याग कराने की सुविधा होनी चाहिए। यह कार्य भी परिचारिका द्वारा ही किया जाता है।
5. रोगी के कमरे एवं आवश्यक सामान को साफ एवं सही ढंग से रखना भी परिचारिका का ही कार्य है।
6. परिचारिका का कार्य है कि वह अपने व्यवहार से रोगी को मानसिक रूप से प्रसन्न रखे।
7. परिचारिका को रोगी के प्रति मित्रता का व्यवहार करना चाहिए।
8. यदि रोगी के लिए आराम आवश्यक हो, तो परिचारिका का कर्तव्य है कि वह रोगी से मिलने वाले व्यक्तियों को रोके तथा रोगी को हर प्रकार से आराम पहुँचाए ।
In simple words: परिचारिका का मुख्य कर्तव्य रोगी को शारीरिक और मानसिक आराम प्रदान करना है। इसमें रोगी की स्वच्छता, भोजन की व्यवस्था, मल-मूत्र त्याग में सहायता, कमरे की सफाई, और रोगी के साथ मित्रवत व्यवहार करते हुए उसे मानसिक रूप से प्रसन्न रखना शामिल है।

🎯 Exam Tip: परिचारिका के कर्तव्यों को सूचीबद्ध करते समय, रोगी की समग्र देखभाल-शारीरिक और मानसिक दोनों-पर ध्यान केंद्रित करना और प्रत्येक कर्तव्य का संक्षिप्त विवरण देना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. गृह-परिचारिका का चिकित्सक के प्रति क्या कर्तव्य है?
Answer: परिचारिका रोगी और चिकित्सक के बीच की कड़ी है, अतः जहाँ उसका रोगी के प्रति देखभाल का कर्तव्य है, वहाँ चिकित्सक को उसके कार्यों में सहायता प्रदान करना भी उसका दायित्व है।” वह चिकित्सक के निर्देशों के अनुसार रोगी की देख-रेख करते हुए चिकित्सक को निम्नलिखित सूचनाएँ उपलब्ध कराती है
1. रोगी के दर्द, बेचैनी, वमन, खाँसी आदि के विषय में जानकारी देना ।
2. रोगी के मल-मूत्र विसर्जन की स्थिति की सूचना देना ।
3. रोगी की भूख-प्यास सम्बन्धी सूचना देना।
4. रोगी का ताप, नाड़ी श्वास इत्यादि का उपयुक्त चार्ट तैयार कर चिकित्सक को दिखाना।
5. रोगी पर औषधि के प्रभाव की सूचना देना।
6. रोगी की निद्रा तथा अन्य शारीरिक परिवर्तनों के विषय में चिकित्सक को सूचित करना।
In simple words: गृह-परिचारिका चिकित्सक के लिए रोगी की स्थिति का अवलोकन और रिपोर्ट करने का कार्य करती है। वह रोगी के लक्षणों, शारीरिक मापदंडों, दवाओं के प्रभाव और अन्य शारीरिक परिवर्तनों की जानकारी चिकित्सक को देकर सही उपचार में मदद करती है।

🎯 Exam Tip: चिकित्सक के प्रति परिचारिका के कर्तव्यों को समझाते समय, रोगी की स्थिति का सटीक अवलोकन और रिपोर्टिंग के महत्व पर जोर देना चाहिए, क्योंकि यह उपचार योजना का आधार होता है।

 

Question 5. गृह-परिचारिका के अपने स्वयं के प्रति क्या कर्त्तव्य होते हैं?
Answer: परिचारिका के कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य भी हैं जो प्रत्यक्ष रूप से तो स्वयं उसके अपने ही प्रति होते हैं, परन्तु इनका अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव रोगी पर पड़ता है। सर्वप्रथम परिचारिका को अपने शरीर की स्वच्छता का अधिक-से-अधिक ध्यान रखना चाहिए। उसे अपने हाथ आदि सदैव साफ एवं धुले हुए रखने चाहिए। परिचारिका को साफ एवं सफेद रंग के धुले हुए वस्त्र धारण करने चाहिए । परिचारिका को सदैव प्रसन्नचित्त, चुस्त एवं हँसते हुए रहना चाहिए। उसे अपने मनोरंजन एवं स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए।
In simple words: परिचारिका का अपने प्रति कर्तव्य है कि वह अपने शरीर की स्वच्छता, साफ-सुथरे वस्त्र और मानसिक प्रसन्नता का ध्यान रखे। यह न केवल उसके अपने स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से रोगी की देखभाल को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।

🎯 Exam Tip: परिचारिका के आत्म-देखभाल के महत्व पर प्रकाश डालते समय, यह समझाना आवश्यक है कि उसकी व्यक्तिगत स्वच्छता और मानसिक स्थिति सीधे रोगी की देखभाल की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।

 

Question 6. परिचारिका का दूरदर्शी होना क्यों आवश्यक है?
Answer: परिचारिका को अपने कार्यों में चतुर एवं विवेकशील होना आवश्यक है। उसका दूरदर्शी होना अति अनिवार्य है, क्योंकि
1. रोगी की आवश्यकताओं का पूर्वानुमान कर एक दूरदर्शी परिचारिका समय पर ही उनकी पूर्ति कर देती है।
2. रोगी पर औषधियों का विपरीत प्रभाव पड़ने पर वह उन्हें तत्काल देना बन्द कर चिकित्सक से परामर्श प्राप्त करती है।
3. रोगी की हालत बिगड़ने पर उसे परिस्थिति के अनसार कृत्रिम श्वसन, हृदय स्पन्दन अथवा ऑक्सीजन देने जैसी आपातकाल सहायता के विषय में तत्काल निर्णय लेकर उनके क्रियान्वयन की अविलम्ब व्यवस्था एक दूरदर्शी परिचारिका ही कर सकती है।
In simple words: परिचारिका का दूरदर्शी होना इसलिए आवश्यक है ताकि वह रोगी की जरूरतों का पहले से अनुमान लगा सके, दवाओं के प्रतिकूल प्रभावों को पहचान सके और आपातकालीन स्थितियों में तुरंत उचित निर्णय लेकर सहायता प्रदान कर सके।

🎯 Exam Tip: दूरदर्शिता के महत्व को समझाते समय, आपातकालीन स्थितियों में त्वरित और सही निर्णय लेने की क्षमता पर विशेष जोर देना चाहिए, जो रोगी के जीवन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

 

Question 7. रोगी को औषधि देते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
Answer: रोगी को औषधि देते समय एक अच्छी परिचारिका निम्नलिखित बातों का सदैव ध्यान रखती है
1. चिकित्सक के निर्देशों का सावधानीपूर्वक पालन करना।
2. निश्चित समय पर ही औषधि देना।
3. औषधि देते समय रोगी से मधुर व्यवहार करना तथा उसे धैर्य बँधाना ।
4. रोगी पर औषधि के प्रभाव की सूचना चिकित्सक को उपलब्ध कराना।
5. रोगी पर औषधि का विपरीत प्रभाव होने पर उसकी सूचना अविलम्ब चिकित्सक तक पहुँचाना तथा आवश्यकता पड़ने पर रोगी को आपातकाल सहायता देना।
In simple words: औषधि देते समय परिचारिका को चिकित्सक के निर्देशों का पालन करना, सही समय पर दवा देना, रोगी के साथ विनम्रता से पेश आना, और दवा के प्रभावों, खासकर किसी भी विपरीत प्रभाव की जानकारी तुरंत चिकित्सक को देना चाहिए।

🎯 Exam Tip: औषधि प्रशासन के दौरान सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने वाले प्रमुख चरणों पर ध्यान केंद्रित करना, विशेषकर चिकित्सक के निर्देशों का पालन और प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं की रिपोर्टिंग, महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. परिचारिका को रोगी व चिकित्सक के मध्य की कड़ी क्यों कहा जाता है?
Answer: परिचारिका रोगी की देख-रेख करती है। वह रोगी के उपचार में चिकित्सक की सहायता करती है। चिकित्सक के निर्देशानुसार रोगी की देख-रेख करती है तथा रोगी की रोग सम्बन्धी स्थिति की जानकारी चिकित्सक को देती है। इस भूमिका के कारण ही परिचारिका को रोगी एवं चिकित्सक के मध्य की कड़ी कहा जाता है।
In simple words: परिचारिका को रोगी और चिकित्सक के बीच की कड़ी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह रोगी की स्थिति का अवलोकन करती है, चिकित्सक के निर्देशों का पालन करती है, और रोगी की प्रगति या किसी समस्या की जानकारी चिकित्सक तक पहुँचाकर उपचार प्रक्रिया में समन्वय स्थापित करती है।

🎯 Exam Tip: परिचारिका की "कड़ी" भूमिका को स्पष्ट करते हुए, उसके सूचना प्रवाह और समन्वय कार्यों पर जोर देना, जो रोगी की देखभाल के लिए महत्वपूर्ण हैं, अच्छे अंक दिला सकता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. गृह-परिचर्या से क्या आशय है?
Answer: घर पर रहने वाले रोगी व्यक्ति की चिकित्सक के निर्देशानुसार की जाने वाली सेवा-शुश्रूषा अथवा परिचर्या को ही गृह-परिचर्या कहते हैं।
In simple words: गृह-परिचर्या का अर्थ है घर पर बीमार व्यक्ति की देखभाल करना, जिसमें डॉक्टर के बताए अनुसार दवा और अन्य सेवाएँ देना शामिल है।

🎯 Exam Tip: गृह-परिचर्या की परिभाषा में 'घर पर', 'रोगी व्यक्ति की' और 'चिकित्सक के निर्देशानुसार' शब्दों का समावेश महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. गृह-परिचारिका किसे कहते हैं?
Answer: घर पर रहकर रोगी अथवा दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की परिचर्या करने वाली स्त्री को गृह-परिचारिका कहते हैं।
In simple words: गृह-परिचारिका वह महिला है जो घर पर बीमार या घायल व्यक्ति की देखभाल करती है।

🎯 Exam Tip: 'गृह-परिचारिका' की परिभाषा में 'स्त्री' शब्द का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है, हालांकि यह कार्य पुरुष भी कर सकते हैं।

 

Question 3. क्या गृह-परिचर्या का कार्य केवल महिलाएँ ही कर सकती हैं?
Answer: नहीं, यह अनिवार्य नहीं है। गृह-परिचर्या का कार्य पुरुष भी कर सकते हैं। गृह-परिचर्या के कार्य को करने वाले पुरुष को 'गृह-परिचारक' कहते हैं।
In simple words: नहीं, गृह-परिचर्या का कार्य केवल महिलाएँ ही नहीं, पुरुष भी कर सकते हैं, जिन्हें 'गृह-परिचारक' कहा जाता है।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न के उत्तर में 'गृह-परिचारक' शब्द का उल्लेख करना और यह स्पष्ट करना कि यह कार्य लिंग-विशेष नहीं है, उत्तर को पूर्ण बनाता है।

 

Question 4. अच्छी परिचारिका के चार मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
Answer: अच्छी परिचारिका के चार मुख्य गुण हैं
1. उत्तम स्वास्थ्य,
2. विनम्र एवं हँसमुख स्वभाव,
3. प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान होना तथा
4. हर प्रकार की स्वच्छता का ध्यान रखना।
In simple words: एक अच्छी परिचारिका के मुख्य गुण उत्तम स्वास्थ्य, विनम्र और हँसमुख स्वभाव, प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान और स्वच्छता के प्रति जागरूकता हैं।

🎯 Exam Tip: चार गुणों को संक्षेप में सूचीबद्ध करते हुए, उनके महत्व को समझना और याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. परिचारिका को प्राथमिक चिकित्सा का पूर्ण ज्ञान होना क्यों आवश्यक है?
Answer: रोगी अथवा दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को, चिकित्सक के उपलब्ध न होने पर, तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान करने के लिए परिचारिका को प्राथमिक चिकित्सा का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है।
In simple words: परिचारिका को प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान इसलिए आवश्यक है ताकि डॉक्टर की अनुपस्थिति में वह आपातकालीन स्थितियों में रोगी या घायल व्यक्ति को तुरंत प्रारंभिक उपचार दे सके।

🎯 Exam Tip: प्राथमिक चिकित्सा के महत्व को 'तत्काल सहायता' और 'चिकित्सक की अनुपस्थिति' के संदर्भ में समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. गृह-परिचारिका का प्रमुख कर्त्तव्य क्या है?
Answer: रोगी को उचित समय पर उचित वस्तु उपलब्ध कराना तथा चिकित्सक के परामर्श के अनुसार कार्य करना गृह-परिचारिका के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कर्तव्य हैं।
In simple words: गृह-परिचारिका का मुख्य कर्तव्य रोगी की ज़रूरतों को पूरा करना और डॉक्टर के निर्देशों का पालन करते हुए उसकी देखभाल करना है।

🎯 Exam Tip: प्रमुख कर्तव्य को परिभाषित करते समय 'उचित समय पर वस्तु उपलब्धता' और 'चिकित्सक के परामर्श का पालन' पर जोर दें।

 

Question 7. अस्पतालों में परिचर्या का कार्य कौन करता है?
Answer: अस्पतालों में परिचर्या का कार्य नर्स करती हैं।
In simple words: अस्पतालों में रोगी की देखभाल और परिचर्या का काम नर्स करती हैं।

🎯 Exam Tip: अस्पतालों के संदर्भ में 'नर्स' शब्द का प्रयोग करना सही उत्तर है।

 

Question 8. रोगी के जीवन में परिचारिका का महत्त्व बताइए ।
Answer: परिचारिका रोगी की शारीरिक व मानसिक क्रियाओं को ध्यान में रखकर उसके कल्याण हेतु कार्य करती है।
In simple words: परिचारिका रोगी के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों की देखभाल करके उसके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे रोगी का समग्र कल्याण होता है।

🎯 Exam Tip: रोगी के 'शारीरिक' और 'मानसिक' दोनों पहलुओं पर परिचारिका के प्रभाव का उल्लेख करना उत्तर को व्यापक बनाता है।

 

Question 9. रोगी तथा चिकित्सक के सन्दर्भ में परिचारिका की क्या भूमिका है?
Answer: रोगी तथा चिकित्सक के सन्दर्भ में परिचारिका द्वारा एक सम्पर्क सूत्र या बीच की कड़ी की भूमिका निभाई जाती है।
In simple words: परिचारिका रोगी और चिकित्सक के बीच एक सेतु का काम करती है, जो रोगी की जानकारी चिकित्सक तक पहुँचाती है और चिकित्सक के निर्देशों को रोगी तक कार्यान्वित करती है।

🎯 Exam Tip: परिचारिका की भूमिका को 'सम्पर्क सूत्र' या 'बीच की कड़ी' के रूप में परिभाषित करना महत्वपूर्ण है, जो उसके समन्वय कार्य को दर्शाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question. प्रत्येक प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। इनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए
(1) परिचर्या के अन्तर्गत किया जाता है
(क) रोगी व्यक्ति की देख-भाल करना,
(ख) चिकित्सक के निर्देशानुसार औषधि देना,
(ग) समय पर आहार देना तथा अन्य सभी कार्यों में सहायता प्रदान करना,
(घ) ये सभी ।
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: परिचर्या में रोगी की देखभाल, डॉक्टर के निर्देशों का पालन करना, दवा और आहार देना, तथा अन्य सहायक कार्य शामिल होते हैं।

🎯 Exam Tip: 'ये सभी' विकल्प वाले प्रश्नों में, यदि सभी व्यक्तिगत विकल्प सही लगते हैं, तो आमतौर पर 'ये सभी' ही सही उत्तर होता है।

 

Question. (2) परिचारिका को नहीं करना चाहिए
(क) रोगी से विनम्र व्यवहार,
(ख) औषधि निर्धारण,
(ग) रोगी की देख-रेख,
(घ) चिकित्सक से परामर्श ।
Answer: (ख) औषधि निर्धारण
In simple words: परिचारिका का कार्य दवा निर्धारित करना नहीं होता है; यह केवल चिकित्सक द्वारा ही किया जाता है।

🎯 Exam Tip: परिचारिका के कार्यक्षेत्र की सीमाओं को समझना महत्वपूर्ण है, खासकर दवा निर्धारण जैसे गंभीर मामलों में जो केवल योग्य चिकित्सक ही कर सकते हैं।

 

Question. (3) परिचारिका को नहीं होना चाहिए
(क) स्वस्थ,
(ख) हँसमुख,
(ग) दूरदर्शी,
(घ) चिड़चिड़ा ।
Answer: (घ) चिड़चिड़ा
In simple words: एक अच्छी परिचारिका को स्वस्थ, हँसमुख और दूरदर्शी होना चाहिए, न कि चिड़चिड़ा, क्योंकि उसका स्वभाव रोगी की देखभाल को प्रभावित करता है।

🎯 Exam Tip: परिचारिका के लिए आवश्यक सकारात्मक गुणों के विपरीत गुण की पहचान करना इस प्रकार के प्रश्न का उत्तर देने में सहायक होता है।

 

Question. (4) गृह-परिचर्या से अभिप्राय है
(क) गृहिणी द्वारा रोगी की देख-रेख,
(ख) नर्स द्वारा रोगी की देख-रेख,
(ग) चिकित्सक द्वारा रोगी का उपचार,
(घ) रोगी द्वारा स्वयं की देख-रेख ।
Answer: (क) गृहिणी द्वारा रोगी की देख-रेख
In simple words: गृह-परिचर्या का मतलब मुख्य रूप से घर पर परिवार के सदस्य, विशेषकर गृहिणी द्वारा रोगी की देखभाल करना है।

🎯 Exam Tip: 'गृह-परिचर्या' की परिभाषा में 'गृह' शब्द पर ध्यान दें, जो 'गृहिणी' से संबंधित है, अस्पताल या स्वयं रोगी द्वारा देखभाल से नहीं।

 

Question. (5) परिचारिका को आज्ञापालन करनी चाहिए
(क) रोगी की,
(ख) गृह-स्वामी की,
(ग) चिकित्सक की,
(घ) इन सभी का ।
Answer: (ग) चिकित्सक की
In simple words: परिचारिका को मुख्य रूप से चिकित्सक के निर्देशों का पालन करना चाहिए क्योंकि वही रोगी के उपचार का विशेषज्ञ होता है।

🎯 Exam Tip: परिचारिका की भूमिका चिकित्सक के निर्देशों के पालन के लिए होती है ताकि रोगी को सही और प्रभावी उपचार मिल सके।

 

Question. (6) गृह-परिचर्या को कार्य भली-भाँति किया जा सकता है
(क) बच्चों द्वारा,
(ख) गृह-स्वामी द्वारा,
(ग) गृहिणी द्वारा,
(घ) किसी के भी द्वारा ।
Answer: (ग) गृहिणी द्वारा
In simple words: गृह-परिचर्या का कार्य सबसे अच्छी तरह गृहिणी द्वारा किया जा सकता है क्योंकि वह घर और परिवार की जरूरतों को समझती है।

🎯 Exam Tip: गृह-परिचर्या के संदर्भ में, 'गृहिणी' वह प्राथमिक व्यक्ति है जो घर पर देखभाल के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

 

Question. (7) गृह-परिचारिका को समुचित ज्ञान होना चाहिए
(क) विभिन्न रोगों का,
(ख) विभिन्न रोगों की निर्धारित औषधियों का,
(ग) सामान्य प्राथमिक चिकित्सा का,
(घ) इन सभी का ।
Answer: (ग) सामान्य प्राथमिक चिकित्सा का
In simple words: गृह-परिचारिका को सामान्य प्राथमिक चिकित्सा का उचित ज्ञान होना चाहिए ताकि वह आपातकाल में तुरंत सहायता दे सके।

🎯 Exam Tip: परिचारिका के लिए सामान्य प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान सबसे आवश्यक है, क्योंकि यह आपात स्थितियों में तत्काल मदद प्रदान करने में सक्षम बनाता है।

 

Question. (8) यदि रोगी के स्वास्थ्य में कोई असामान्य लक्षण प्रकट होने लगे तो गृह-परिचारिका को तुरन्त सूचित करना चाहिए
(क) घर के मुखिया को,
(ख) पड़ोसियों को,
(ग) ज्योतिषी को,
(घ) सम्बन्धित चिकित्सक को ।
Answer: (घ) सम्बन्धित चिकित्सक को
In simple words: यदि रोगी के स्वास्थ्य में कोई असामान्य लक्षण दिखें, तो गृह-परिचारिका को तुरंत संबंधित चिकित्सक को सूचित करना चाहिए ताकि उचित चिकित्सा सलाह और उपचार मिल सके।

🎯 Exam Tip: रोगी के स्वास्थ्य संबंधी किसी भी बदलाव की जानकारी सीधे और अविलंब संबंधित चिकित्सक को देना, सही उपचार सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।

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