UP Board Solutions Class 9 Home Science Chapter 16 Samanya gharelu durghatnayein aur unse bachaav

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Class 9 Home Science Chapter 16 सामान्य घरेलु दुर्घटनये और उनसे बचाव UP Board Solutions PDF

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

Question 1. सामान्य घरेलू दुर्घटनाओं से क्या आशय है? उनसे बचाव एवं उपचार के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: सामान्य घरेलू दुर्घटनाओं का अर्थ
सामान्य घरेलू दुर्घटनाओं में उन दुर्घटनाओं को सम्मिलित किया जाता है जो घर, पास-पड़ोस या कार्य-स्थल पर कभी भी घटित हो सकती हैं तथा उनके परिणामस्वरूप सम्बन्धित व्यक्ति शारीरिक अथवा मानसिक रूप से क्षतिग्रस्त हो जाता है। ये दुर्घटनाएँ मुख्य रूप से लापरवाही, असावधानी अथवा अज्ञानता के कारण घटित हुआ करती हैं। वास्तव में व्यक्ति का जीवन आज के युग में अत्यधिक व्यस्त है। इस स्थिति में हर व्यक्ति को सदैव शीघ्रता एवं जल्दबाजी रहती है। जल्दबाजी में लापरवाही या त्रुटि हो जाना स्वाभाविक ही है। जनसंख्या-वृद्धि, भीड़-भाड़, विभिन्न प्रकार के मानसिक दबाव एवं तनाव, निराशा, कुण्ठा, सामाजिक दबाव आदि कारणों से दुर्घटनाओं की दर में वृद्धि हो रही है। इसी प्रकार व्यक्ति के अशिक्षित होने के कारण अथवा भावनात्मक असन्तुलन के कारण कुछ विशेष प्रकार की दुर्घटनाओं में वृद्धि हो रही है। कुछ दुर्घटनाएँ शरारतवश अथवा शत्रुता के कारण भी घटित हो जाया करती हैं। इस प्रकार की मुख्य दुर्घटनाएँ हैं-चोट लगना, फिसल कर गिरना, किसी वाहन से टकरा जाना, विषपान, पानी में डूबना तथा आग लगना आदि । कुछ दुर्घटनाएँ विभिन्न पशु-पक्षियों एवं कीट-पतंगों के कारण भी घटित हो जाया करती हैं। इन सभी दुर्घटनाओं को सामान्य घरेलू दुर्घटनाओं की श्रेणी में रखा जाता है।

मुख्य सामान्य घरेलू दुर्घटनाएँ
दैनिक जीवन में किसी भी प्रकार की साधारण अथवा गम्भीर दुर्घटना घटित हो सकती है; अतः व्यक्ति को हर प्रकार की दुर्घटना का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। परन्तु कुछ दुर्घटनाएँ ऐसी होती हैं जो सामान्य रूप से घटित होती रहती हैं। इस प्रकार की दुर्घटनाओं को सामान्य घरेलू दुर्घटना माना जाता है। प्रत्येक व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि उसे सामान्य घरेलु दुर्घटनाओं की समुचित जानकारी हो । मुख्य सामान्य घरेलू दुर्घटनाएँ हैं-जलना या झुलसना, चोट लगना तथा रक्तस्राव होना, लू या गर्मी लग जाना, पानी में डूब जाना, साँप, बिच्छू या बर्रे द्वारा डंक मार देना, कुत्ते, बन्दर आदि पशुओं द्वारा काटा जाना, बच्चों द्वारा आँख, नाक या कोन आदि में कोई वस्तु हँसा लेना, दम घुटना, बेहोशी या दौरा पड़ जाना या आकस्मिक हृदय का दौरा पड़ना आदि ।

सामान्य दुर्घटनाओं से बचाव एवं उपचार
दुर्घटनाएँ आकस्मिक होती हैं तथा उनसे बचने के लिए व्यक्ति को अधिक-से-अधिक ध्यानपूर्वक कार्य करने चाहिए। लापरवाही नहीं करनी चाहिए तथा हर प्रकार की आवश्यक जानकारी प्राप्त करते रहना चाहिए। इन समस्त उपायों के बाद भी दुर्घटनाएँ घट सकती हैं। यदि कोई दुर्घटना घटित हो जाती है । तो उसे देखकर घबराना नहीं चाहिए। घबराने या हाथ-पैर फुलाने से दुर्घटना की गम्भीरता बढ़ सकती है; अतः दुर्घटना का सामना धैर्यपूर्वक करना चाहिए तथा निम्नलिखित सामान्य उपाय किए जाने चाहिए
1. किसी भी दुर्घटना के घटित होते ही सर्वप्रथम उसके कारण को ज्ञात करना चाहिए तथा तुरन्त उस कारण का उन्मूलन करने का उपाय करना चाहिए।
2. दुर्घटना की गम्भीरता को बढ़ने से रोकने के उपाय किए जाने चाहिए।
3. दुर्घटना की प्रकृति को जानने का प्रयास करना चाहिए तथा उसकी प्रकृति के अनुसार निम्नलिखित उपायों में से आवश्यक उपाय किया जाना चाहिए
(क) यदि शरीर से रक्त बह रहा हो, तो सर्वप्रथम रक्त-स्राव को रोकने का हर सम्भव उपाय किया जाना चाहिए, क्योंकि अधिक रक्तस्राव हो जाना घातक सिद्ध हो सकता है।
(ख) यदि दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति पानी में डूबा हो, तो सम्बन्धित व्यक्ति के फेफड़ों तथा पेट में से पानी को निकालने के उपाय किए जाने चाहिए ।
(ग) यदि दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को श्वसन में कठिनाई हो रही हो, तो सर्वप्रथम कृत्रिम श्वसन के उपाय किए जाने चाहिए।
(घ) यदि व्यक्ति ने विष-पान कर लिया हो, तो सर्वप्रथम विष को शरीर में से निकालने अथवा उसके प्रभाव को घटाने के उपाय किए जाने चाहिए।
(ङ) यदि साँप या बिच्छू आदि ने डंक मार दिया हो तो सर्वप्रथम विष को शरीर में फैलने से रोकने । के उपाय किए जाने चाहिए ।
(च) यदि व्यक्ति मूर्छित हो गया हो, तो सर्वप्रथम उसे होश में लाने के उपाय किए जाने चाहिए । उपर्युक्त सामान्य उपायों के अतिरिक्त दुर्घटना की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए सूझ-बूझ द्वार यथाआवश्यक उपाय किए जाने चाहिए। यदि दुर्घटना गम्भीर प्रतीत हो, तो प्राथमिक उपचार के साथ-साथ किसी योग्य चिकित्सक से भी यथाशीघ्र सम्पर्क स्थापित करना चाहिए।
In simple words: सामान्य घरेलू दुर्घटनाएँ वो हैं जो घर या आसपास लापरवाही, असावधानी या अज्ञानता से होती हैं और जिनसे शारीरिक या मानसिक चोट लगती है। इनसे बचने के लिए सावधान रहना और जानकारी रखना चाहिए, और अगर दुर्घटना हो जाए तो धैर्य से काम लेकर तुरंत सही प्राथमिक उपचार करना चाहिए, जैसे खून रोकना या पानी निकालना, और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर के पास जाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में दुर्घटनाओं की परिभाषा, प्रकार और प्राथमिक उपचार को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है, विशेषकर बचाव और उपचार के उपायों को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करें।

 

Question 2. जलने व झुलसने में क्या अन्तर है? जलने के विभिन्न प्रकार एवं उनके उपचार बताइए ।
Answer: जलना एवं झुलसना-जलना एवं झुलसना प्रायः शरीर पर अधिक ताप का प्रभाव होते हैं। झुलसना; तरल पदार्थों; जैसे-गरम दूध, पानी, घी, तेल व चाय आदि के त्वचा पर गिर जाने से होता है। जलना; भाप, गरम तवा तथा अन्य प्रकार की शुष्क आग के सम्पर्क में त्वचा के आने पर होता है। जलने एवं अधिक झुलस जाने के गम्भीर परिणाम होते हैं। शरीर के 50 प्रतिशत अथवा अधिक जल जाने पर पीड़ित व्यक्ति पर मृत्यु का संकट हो सकता है। गम्भीर रूप से जलने से शरीर में द्रव पदार्थों की कमी उत्पन्न हो जाती है, शरीर के आन्तरिक अवयव बुरी तरह से कुप्रभावित होते हैं तथा पीड़ित व्यक्ति मानसिक आघात का शिकार हो सकता है।

जलने के प्रकार
जलने के विभिन्न प्रकारों को वर्गीकृत करने के दो आधार हैं (क) शारीरिक लक्षणों को आधार तथा (ख) जलने के स्रोतों का आधार ।।
(क) शारीरिक लक्षणों के आधार पर जलने के प्रकार: जलने पर मुख्यतः निम्नलिखित लक्षण दिखाई पड़ते हैं
1. त्वचा लाल रंग की हो जाती है, परन्तु नष्ट नहीं होती।
2. लालिमा के साथ-साथ शरीर पर फफोले भी पड़ जाते हैं।
3. प्रभावित भाग कम हो अथवा अधिक उसके स्नायु तन्तु नष्ट हो जाते हैं।
(ख) विभिन्न स्रोतों से जलना: यह निम्न प्रकार से हो सकता है
1. वस्त्रों में आग लग जाने से जलना ।
2. अम्लों से जलना।
3. क्षार से जलना ।
4. बिजली से जलना।

जल जाने पर उपचार
जल जाने की विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न प्रकार से प्राथमिक उपचार किए जाते हैं। इनका क्रमशः विवरण निम्नलिखित है
(1) वस्त्र में आग लग जाने पर उपचार: यह एक सामान्य दुर्घटना है जो कि घरों में प्रायः खाना आदि पकाते समय घटित हुआ करती है। साधारणतः इसके उपचार निम्न प्रकार से करने चाहिए|
1. रोगी को तुरन्त भूमि पर लिटाकर लुढकाना चाहिए। रोगी का मुंह खुला छोड़कर उसकी शेष शरीर किसी कम्बल जैसे कपड़े से ढक देना चाहिए।
2. जलते हुए व्यक्ति पर पानी नहीं डालना चाहिए, क्योंकि इससे घावों के और अधिक गम्भीर होने का भय रहता है।
3. रोगी के कपड़े व जूते किसी प्रकार से उतार देने चाहिए।
4. रोगी को पीने के लिए गरम पानी, दूध, चाय अथवा कॉफी देनी चाहिए।
5. रोगी के बिस्तर पर गरम पानी की बोतलें भी रख देनी चाहिए।
6. यदि त्वचा पर फफोले पड़ गए हों, तो उन्हें फोड़ना नहीं चाहिए।
7. एक भाग अलसी का तेल व एक भाग चूने का पानी मिलाकर स्वच्छ रूई अथवा कपड़े के फाये द्वारा जले हुए भाग पर लगाना लाभप्रद रहता है।
8. जले हुए स्थान पर से सावधानीपूर्वक वस्त्र हटाने का प्रयास करना चाहिए। यदि वस्त्र चिपक गए हैं, तो उस स्थान पर जैतून अथवा नारियल का तेल लगाना चाहिए।
9. जले हुए स्थान पर हल्के-हल्के बरनॉल या इसी प्रकार का कोई अन्य मरहम लगाना चाहिए ।
10. मरहम उपलब्ध न होने पर नारियल का तेल प्रयोग में लाया जा सकता है।
11. यदि रोगी होश में है तो उसे सांत्वना एवं धैर्य बँधाना चाहिए ।
12. रोगी को शीघ्रातिशीघ्र अस्पताल ले जाना चाहिए।
(2) अम्लों से जल जाने पर उपचार: गन्धक, नमक व शोरे के सान्द्र अम्ल मानव त्वचा के लिए अत्यन्त घातक होते हैं। ये जिस स्थान पर गिरते हैं, उसे तत्काल अन्दर तक जला देते हैं। अम्लों से जलने पर निम्नलिखित उपाय तुरन्त करने चाहिए
1. प्रभावित स्थान पर तुरन्त पानी की धार डालें।
2. रोगी के वस्त्र उतारते समय पानी डालते रहें।
3. जले स्थान को स्वच्छ कपड़े से ढक दें।
4. जले स्थान पर खाने का सोड़ा पानी में घोलकर लगाएँ। इससे अम्ल का प्रभाव घटने लगता है।
5. अधिक जल जाने पर रोगी को इस प्रकार लिटाएँ कि उसका सिर शरीर के अन्य भागों से कुछ ऊँचा रहे ।
6. यदि रोगी होश में है तो उसे ऐल्कोहॉल रहित पेय पदार्थ पीने के लिए दें।
7. शीघ्रातिशीघ्र चिकित्सक को बुलाएँ।
(3) क्षार से जलने पर उपचारः चूना, कास्टिक सोड़ा तथा पोटाश आदि क्षार मानव त्वचा को गम्भीर रूप से जला देते हैं। इस प्रकारे जले रोगियों का उपचार निम्न प्रकार से करना चाहिए
1. प्रभावित स्थान को पानी के तीव्र प्रवाह से धोना चाहिए।
2. जले हुए भाग पर नींबू के रस अथवा सिरके में पानी मिलाकर लगाने से क्षार के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
3. जले हुए स्थान पर ऐल्कोहॉल लगाने से रोगी को आराम होता है।
4. रोगी को मद्यरहित पेय पदार्थ पर्याप्त मात्रा में पीने के लिए देने चाहिए।
5. यदि अधिक भाग जला हो, तो तुरन्त चिकित्सक से सम्पर्क स्थापित करना चाहिए।
(4) बिजली से जलने पर उपचार: बिजली के सम्पर्क में आने पर व्यक्ति को घातक झटका लगता है तथा कभी-कभी वह बिजली से चिपक भी जाता है। इस प्रकार का पीड़ित व्यक्ति सदमे के साथ-साथ जलने का शिकार भी हो जाता है। उपयुक्त उपचार के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए
1. सर्वप्रथम बिजली का मुख्य स्विच बन्द कर देना चाहिए।
2. एक लम्बी लकड़ी अथवा लकड़ी के तख्ते का उपयोग कर पीड़ित व्यक्ति को विद्युत तारों से मुक्त करना चाहिए।
3. जिन स्थानों पर तार से चिपकने के कारण घाव हो गए हों, वहाँ पर बरनॉल या कोई अन्य ऐसा ही मरहम लगाना चाहिए ।
4. घावों को स्वच्छ कपड़े से ढक देना चाहिए।
5. श्वास रुकने की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को कृत्रिम श्वास देना चाहिए।
6. रोगी को पीने के लिए गरम पानी, दूध, चाय अथवा कॉफी देनी चाहिए।
7. पीड़ित व्यक्ति के लिए दुर्घटना का सदमा घातक हो सकता है; अतः उसे धैर्य बँधाते रहना चाहिए।
8. तत्काल चिकित्सक से सम्पर्क करना चाहिए।
In simple words: झुलसना गर्म तरल से होता है, जबकि जलना सूखी गर्मी या आग से। दोनों गंभीर हो सकते हैं। जलने के प्रकार शारीरिक लक्षणों (लालिमा, फफोले, ऊतक क्षति) और स्रोत (आग, अम्ल, क्षार, बिजली) पर आधारित होते हैं। उपचार में तुरंत प्रभावित क्षेत्र को ठंडा करना, वस्त्र हटाना, घावों को साफ करना, मरहम लगाना और गंभीर मामलों में डॉक्टर से संपर्क करना शामिल है, साथ ही रोगी को ढांढस बंधाना।

🎯 Exam Tip: जलने और झुलसने में अंतर स्पष्ट करें और प्रत्येक प्रकार के जलने के लिए विशिष्ट प्राथमिक उपचारों को बिंदुवार समझाएं, जो मूल्यांकन में उच्च अंक दिलाएगा।

 

Question 3. रक्त-स्राव कितने प्रकार का होता है? रक्त-स्राव रोकने के लिए आप क्या प्राथमिक उपचार करेंगी?
Answer: रक्त-साव के कारण एवं प्रकार
तीव्र धार वाले औजारों (चाकू, ब्लेड, आरी आदि) से कट जाना अथवा खरोंच लग जाना रक्त-स्राव के सामान्य कारण हैं। दुर्घटनाओं के कारण होने वाले गहरे घाव तीव्र, एवं अधिक रक्तस्राव के कारण होते हैं। मानव शरीर में रक्त प्रवाह रक्त-वाहिनियों द्वारा होता है; अतः रक्त-प्रवाह का मूल कारण उपर्युक्त वर्णित दुर्घटनाओं के कारण रक्तवाहिनियों को फट या कट जाना होता है। रक्त-स्राव प्रायः दो प्रकार का होता है
(क) बाह्य अंगों से रक्तस्रावं, (ख) आन्तरिक अंगों से रक्त-स्राव ।

(क) बाह्य अंगों से रक्त-स्रावः
दुर्घटना के फलस्वरूप कई बार बाह्य अंगों में घाव बन जाते हैं। इन स्थानों पर धमनी अथवा शिरा के कट जाने से तीव्र रक्तस्राव होने लगता है। इसे भली प्रकार से समझने के लिए धमनी व शिरा के फटने से होने वाले रक्त-स्राव का अन्तर जानना आवश्यक है।

धमनी से होने वाला रक्तस्त्रावः धमनी के कटने अथवा फटने पर अत्यन्त चमकीले लाल रंग का रक्त निकलता है। यदि प्रभावित धमनी हृदय के पास है, तो रक्त रुक-रुक कर हृदय के स्पन्दन के साथ-साथ झटके से बाहर निकलता है। अतः धमनी से होने वाला रक्तस्राव हृदय की ओर से होता है।

दबाव बिन्दुः रक्त-स्राव को रोकने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को मानव शरीर में स्थित रक्त के अधिक दबाव के बिन्दुओं की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। ये संख्या में 6 होते हैं। पहला दबाव बिन्दु श्वास नलिका की बगल में तथा दूसरा कान के ठीक सामने की ओर होता है। तीसरा दबाव बिन्दु जबड़े से लगभग 2.5 सेन्टीमीटर की दूरी पर होता है। चौथा बिन्दु हँसली की हड्डी के भीतरी भाग के पीछे की ओर, पाँचवाँ भुजाओं के अन्दर की ओर तथा छठा जाँध में मूत्राशय के निकट होता है। जब कभी धमनी अथवा शिरा से अधिक रक्तस्राव हो रहा हो, तो रक्तस्राव के निकट के दबाव बिन्दु पर उचित दबाव डालकर रक्तस्राव को कम किया जाता है।

धमनी से होने वाले रक्त-स्राव को रोकने के उपाय
1. घायल व्यक्ति को ठीक प्रकार से लिटा देने पर रक्तस्राव कम हो जाता है।
2. यदि हड्डी नहीं टूटी है, तो घायल अंगों को ऊपर उठा देने से भी रक्तस्राव में कमी आ जाती है।
3. घाव में जिस धमनी से रक्तस्राव हो रहा हो उसके दबाव बिन्दु को भली प्रकार से दबा देना चाहिए।
4. यदि घाव छोटा है तो स्वच्छ अंगूठे से उसे दबाना चाहिए।
5. घाव को दबाने के तुरन्त बाद रुई रखकर पट्टी बाँध देनी चाहिए।
6. यदि घाव में गन्दगी हो, तो उसे चारों ओर से एन्टीसेप्टिक घोल (डिटॉल, सैवलोन व स्प्रिट आदि) द्वारा साफ कर देना चाहिए ।
7. रक्त-स्राव रोकने के लिए टिंचर आयोडीन अथवा फैरिक क्लोराइड का घोल घाव पर छिड़कना चाहिए। फिटकरी को बारीक पीसकर घाव पर लगाने से भी रक्तस्राव को रोका जा सकता है।
8. घाव को स्वच्छ रुई, फलालेन अथवा अन्य कोमल वस्त्र से ढक देना चाहिए।
9. टूर्नाकेट का प्रयोग: यदि रक्तस्राव हाथ या टाँग जैसे अंगों से हो रहा है तो रक्तस्राव रोकने एवं प्रभावपूर्ण ढंग से धमनियों पर दबाव डालने के लिए टूर्नीकेट का प्रयोग किया जाता है। टूर्नीकेट बाँधने के लिए कई मोटी तह वाला कपड़ा अधिक उपयुक्त रहता है। कपड़े की लम्बी परन्तु कम चौड़ी पट्टियों की तह कर लेनी चाहिए। एक मुलायम कपड़े के पैड को दबाव बिन्दु के ऊपर रखकर पट्टी कसकर बाँध देनी चाहिए। टूर्नीकेट को प्रभावित अंग पर दो बार लपेटना चाहिए तथा गाँठ लगा देनी चाहिए। अब लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा गाँठ पर रखकर दोबारा बाँध दें। लकड़ी के टुकड़े को घुमाकर टूर्नीकेट को कसा जा सकता है जिससे धमनी पर दबाव बढ़ जाता है। टूर्नीकेट को बाँधने के लिए रबर की ट्यूब सर्वोत्तम रहती है।

सावधानियाँ: टूर्नीकेट प्रयोग करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए
1. टूर्नीकेट को आवश्यकतानुसार ही कसना चाहिए।
2. इसे प्रत्येक पन्द्रह मिनट के बाद ढीला करते रहना चाहिए, परन्तु पूर्णरूप से हटाना नहीं चाहिए।
3. टूर्नीकेट ढीला करने पर रक्त-स्राव के कम होने का पता लगता है। यदि रक्त-स्राव कम न हो, तो टूर्नीकेट को फिर से कस देना चाहिए।
4. इस बीच रोगी को अस्पताल ले जाने की व्यवस्था का प्रयास करना चाहिए।

शिरा का रक्त-स्राव: शिरा के कटने अथवा फटने पर रक्त-स्राव समान गति से होता है। शिराओं से बहने वाला रक्त अशुद्ध एवं नीलापन लिए हुए गहरे रंग का होता है।

शिराओं से होने वाले रक्तस्राव को रोकने के उपाय
1. घायल अंग को नीचे की ओर झुका देने से रक्त-स्राव में कमी आती है।
2. यदि हड्डी नहीं टूटी है तो घाव को अँगूठे से दबाना चाहिए।
3. घाव की गन्दगी को ऐन्टीसेप्टिक घोल की सहायता से साफ कर घाव को किसी स्वच्छ कपड़े से ढक दें।
4. घाव वाले भाग के ऊपर बर्फ की थैली अथवा ठण्डे पानी से भीगा कपड़ा रखने से रक्तस्राव में कमी आती है।
5. टिंचर आयोडीन एवं फैरिक क्लोराइड प्रयोग करके रक्त-स्राव को कम किया जा सकता है।
6. टूर्नीकेट को सावधानीपूर्वक उपयोग करें।
7. रक्तस्राव बन्द हो जाने के पश्चात् घायल व्यक्ति का कई घण्टे तक ध्यान रखें, क्योंकि थोड़े से झटके से पुनः रक्तस्राव हो सकता है।

(ख) आन्तरिक अंगों से रक्त-स्राव
दुर्घटना के फलस्वरूप कई बार पीड़ित व्यक्तियों के आन्तरिक अंग (हड्डियों, फेफड़े, आँत, आमाशय व गुर्दे आदि) घायल हो जाते हैं। इस प्रकार के रोगियों के घाव बाहर से नहीं दिखाई पड़ते हैं। तथा रक्तस्राव प्रायः शरीर के अन्दर ही होता रहता है। ऐसे रोगियों के थूक व मलमूत्र के साथ रक्त शरीर के बाहर निकलता है। इस प्रकार के रोगियों में निम्नलिखित लक्षण दिखाई पड़ते हैं
1. घायल व्यक्ति श्वास लेने में कठिनाई होने के कारण तड़पता रहता है।
2. रोगी के होंठ व मुँह का रंग पीला अथवा नीला पड़ जाता है।
3. पीड़ित व्यक्ति दुर्बलता का अनुभव करता है।
4. पीड़ित व्यक्ति बेहोश हो सकता है।
5. नाड़ी की गति धीमी होने लगती है।
6. रोगी को रक्तस्राव के कारण सदमा पहुँच सकता है।

आन्तरिक अंगों से होने वाले रक्तस्राव का उपचार
1. रोगी को तत्काल लिटा देना चाहिए तथा उसे पूर्ण विश्राम देना चाहिए।
2. रोगी को खाने-पीने को कुछ नहीं देना चाहिए।
3. प्यास लगने पर रोगी को चूसने के लिए बर्फ का टुकड़ा देना चाहिए ।
4. रक्त निकलने वाले स्थान पर बर्फ की थैली रखनी चाहिए।
5. रोगी को उसके वस्त्र ढीले कर हवादार स्थान पर लिटाना चाहिए।
6. यदि फ़ैक्चर है तो रोगी के रक्त-स्राव को रोकने का तो प्रयास करना चाहिए, परन्तु उसे हिलाना-डुलाना नहीं चाहिए।
7. घायल व्यक्ति को सांत्वना एवं धैर्य बँधाना एक अति महत्त्वपूर्ण कार्य है।
8. निकट के अस्पताल तक तत्काल सूचना भेजनी अथवा भिजवानी चाहिए।
In simple words: रक्तस्राव शरीर से खून बहने को कहते हैं और यह दो प्रकार का होता है - बाहरी और आंतरिक। बाहरी रक्तस्राव में धमनी या शिरा कटने से खून बहता है, जिसे दबाव, एंटीसेप्टिक और टूर्नीकेट जैसे उपायों से रोका जा सकता है। आंतरिक रक्तस्राव शरीर के अंदर होता है और इसके लक्षण सांस लेने में कठिनाई, पीलापन और सदमा हो सकते हैं, जिसके उपचार में तुरंत आराम देना, बर्फ लगाना और डॉक्टर की मदद लेना शामिल है।

🎯 Exam Tip: रक्तस्राव के प्रकारों (धमनी, शिरा, आंतरिक) का स्पष्ट वर्णन और प्रत्येक के लिए विस्तृत प्राथमिक उपचार के उपाय लिखना सुनिश्चित करें। टूर्नीकेट के उपयोग और सावधानियों को विशेष रूप से उजागर करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. हिस्टीरिया एवं मिरगी रोगों के लक्षणों में क्या अन्तर है? इनके उपचार के उपाय सुझाइए ।
Answer:

लक्षणहिस्टीरियामिरगी
(1)यह मनोविकार सम्बन्धी रोग है।यह एक प्रकार का पैतृक रोग है।
(2)हृदय की धड़कन बढ़ जाती है तथा गरमी एवं बेचैनी अनुभव होती है।बैठे-बैठे या खड़े-खड़े मूर्च्छा आने लगती है।
(3)मांसपेशियों में ऐंठन होने लगती है जिससे हाथ की मुट्ठी तथा दाँत बन्द हो जाते हैं।दौरा पड़ने से पूर्व दाँत कसकर जकड़ जाते हैं, मुँह से झाग निकलने लगते हैं तथा पसीना आता है।
(4)रोगी कभी जोर से हँसता है, कभी रोता है तथा कभी-कभी लगातार हिचकी आती है।आँखें बन्द हो जाती हैं, श्वसन गति धीमी हो जाती है तथा हाथ-पैर झटके से हिलने लगते हैं।
उपचार(1) मूच्छितावस्था के सभी उपचार करने चाहिए।
(2) रोगी का धैर्य बँधाना चाहिए।
(3) रोगी के मानसिक कष्टों का विकल्प ढूँढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
(1) समान
(2) रोगी के मुँह को खोलकर जबड़ों के बीच में चम्मच की डण्डी, पेन्सिल आदि फँसा देने से जीभ कटने का भय नहीं रहता है।
(3) रोगी को स्वच्छ हवा में लिटाकर अमोनिया सुँघाना चाहिए।

In simple words: हिस्टीरिया एक मानसिक विकार है जिसमें बेचैनी, मांसपेशियों में ऐंठन और भावनात्मक उतार-चढ़ाव होते हैं, जबकि मिरगी एक पैतृक रोग है जिसमें अचानक मूर्च्छा, दाँत जकड़ना और शरीर में झटके आते हैं। दोनों के उपचार में प्राथमिक सहायता और रोगी को सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: हिस्टीरिया और मिरगी के लक्षणों और उपचारों को एक तालिका के रूप में प्रस्तुत करने से स्पष्टता बढ़ती है और तुलनात्मक अध्ययन में मदद मिलती है।

 

Question 2. दम घुटने से क्या अभिप्राय है? इस अवस्था में क्या प्राथमिक चिकित्सा करनी चाहिए?
Answer: दम घुटना-बन्द स्थान तथा दूषित वायु में प्रायः व्यक्ति का दम घुटने लगता है तथा वह बेचैनी का अनुभव करता है। दम घुटने पर मरणान्तक स्थिति प्रायः धुएँ में उपस्थित कार्बन मोनोऑक्साइड गैस के कारण होती है। दम घुटने की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति सामान्यतः सिर दर्द, जी मिचलाना, धुंधला दिखाई देना तथा दुर्बलता का अनुभव करता है। समय पर उपयुक्त चिकित्सा सहायतान मिलने पर पीड़ित व्यक्ति मूर्च्छित होकर मर भी सकता है। प्राथमिक उपचार-निम्नलिखित उपायों को अपनाकर दम घुटने जैसी घातक स्थिति पर एक सीमा तक नियन्त्रण किया जा सकता है
1. दम घुटने की स्थिति से बचने के लिए सोते समय कमरे की खिड़कियाँ व रोशनदान खुले रखें तथा कभी भी बन्द कमरे में अँगीठी अथवा धुआँ उत्पन्न करने वाली अन्य किसी सामग्री का उपयोग नकरें।
2. पीड़ित व्यक्ति को तुरन्त हवादार स्थान पर ले जाना चाहिए।
3. यदि पीड़ित व्यक्ति की श्वास गति अवरुद्ध हो रही हो, तो तत्काल उसे कृत्रिम श्वास दें। शीघ्रातिशीघ्र पीड़ित व्यक्ति के लिए ऑक्सीजन गैस की व्यवस्था करें ।
4. यदि पीड़ित व्यक्ति की हृदय गति रुक गइ हो, तो उसकी वक्ष अस्थि के मध्य भाग के ऊपर प्रति मिनट लगभग 60 बार कृत्रिम हृदय स्पन्दन की क्रिया करें।
In simple words: दम घुटना तब होता है जब शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, अक्सर बंद या दूषित हवा के कारण। इससे सिरदर्द, मतली और बेहोशी हो सकती है। प्राथमिक उपचार में तुरंत हवादार जगह पर ले जाना, कृत्रिम श्वास देना और हृदय गति रुकने पर CPR करना शामिल है।

🎯 Exam Tip: दम घुटने की परिभाषा के साथ उसके कारणों और प्राथमिक उपचार के चरणों को स्पष्ट रूप से लिखें। कृत्रिम श्वसन और CPR के महत्व को उजागर करें।

 

Question 3. नाक से रक्त-स्राव किन परिस्थितियों में हो सकता है? नाक से रक्त-स्राव रोकने के कुछ कारगर उपाय सुझाइए ।
या
नाक के रक्त-स्राव को रोकने के लिए आप क्या उपाय करेंगी?

Answer: नाक से रक्त-स्राव: नाक अथवा खोपड़ी पर आघात लगने से अथवा अधिक गर्मी से नसीर फूट जाने पर नाक से रक्तस्राव हुआ करता है। कई बार उपयुक्त उपचार देर से उपलब्ध होने पर नाक से होने वाला रक्तस्रावे घातक सिद्ध होता है।

प्राथमिक उपचारः
1. रोगी को सीधा बैठाकर मुँह से श्वास दिलाना चाहिए।
2. रोगी की नाक व गर्दन के पीछे बर्फ की थैली धीरे-धीरे फिराएँ तथा बर्फ चूसने को दें।
3. रोगी के पैरों को कुछ समय तक गरम पानी में रखने से शरीर के निचले भागों में रक्त प्रवाह अधिक होता है, जिससे नाक से होने वाले रक्तस्राव में कुछ कमी आती है।
4. रोगी की नाक को अँगूठे एवं उँगली के बीच में दबा लें। इस प्रकार लगभग पाँच मिनट तक दबाए रखने से रक्त-स्राव प्रायः रुक जाता है।
5. यदि खोपड़ी के पास चोट हो अथवा रक्तस्राव न रुक रहा हो तो रोगी को तत्काल अस्पताल पहुँचाने की व्यवस्था करें।
In simple words: नाक से रक्तस्राव सिर पर चोट या अत्यधिक गर्मी के कारण हो सकता है। इसे रोकने के लिए व्यक्ति को सीधा बिठाकर, नाक और गर्दन पर बर्फ लगाकर, पैर गर्म पानी में रखकर और नाक को दबाकर प्राथमिक उपचार दिया जाता है। यदि रक्तस्राव न रुके तो तुरंत अस्पताल जाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: नाक से रक्तस्राव के कारणों के साथ उसके प्राथमिक उपचार के बिंदुओं को क्रमबद्ध तरीके से लिखें। तात्कालिक उपायों पर जोर दें।

 

Question 4. घाव कितने प्रकार के होते हैं? इनका उपचार आप किस प्रकार करेंगी?
Answer: घाव के प्रकार साधारणतः घाव निम्नलिखित चार प्रकार के होते हैं
(क) कुचले हुए घावेः हथौड़े, ईंट, पत्थर आदि वस्तुओं की चोट के कारण उँगलियाँ आदि कुचलकर नीली पड़ जाती हैं। इस प्रकार के घावों से रक्तस्राव कम, परन्तु पीड़ा अधिक होती है।
(ख) कटे धाव: तेज धार वाले औजारों (चाकू, ब्लेड, छुरी व काँच आदि) से कई बार शरीर के विभिन्न भागों के कटने से इस प्रकार के घाव बनते हैं। अधिक गहरे होने पर धमनी अथवा शिरा के कट जाने से इस प्रकार के घावों से रक्तस्राव अधिक हुआ करता है।
(ग) फटे हुएघावः ये घाव सामान्यतः मशीनों, जानवरों के सींगों तथा पंजों आदि के द्वारा होते हैं। इनके किनारे कटे-फटे तथा टेढ़े-मेढ़े होते हैं। इनसे रक्त-स्राव अधिक नहीं होता, परन्तु शरीर में विष फैलने का भय अधिक रहता है।
(घ) गोली का घावः इस प्रकार के घाव प्रायः नुकीली वस्तुओं (सुई, काँटे, बल्लम व गोली आदि) के लगने से होते हैं। ऐसे घावों में टिटेनस होने की अधिक आशंका रहती है।

घावों के सामान्य उपचार उपर्युक्त वर्णित घावों के प्राथमिक उपचार के लिए निम्नलिखित उपाय उपयोगी सिद्ध होते हैं
1. कुचले हुए घाव को निःसंक्रामक घोल से धोकर बर्फ के पानी में भीगी हुई पट्टी बाँधने से लाभ होता है। पीने के लिए ग्लूकोज देने पर पीड़ित व्यक्ति राहत अनुभव करता है।
2. कटे हुए घाव को नि:संक्रामक घोल से साफ कर रक्तस्राव रोकने के प्रयास करने चाहिए। इसके लिए टिंचर आयोडीन, पिसी हुई फिटकरी अथवा टूर्नीकेट का प्रयोग करना चाहिए।
3. फटे हुए घावों को निःसंक्रामक घोल से साफ करना चाहिए। अब इस पर सल्फोनेमाइड पाउडर छिड़क कर पट्टी बाँधनी चाहिए। रक्तस्राव होने की स्थिति में उसे रोकने के उपर्युक्त वर्णित उपाय करने चाहिए ।
4. गोली के घाव वाले व्यक्ति के घाव को नि:संक्रामक द्वारा साफ कर रक्तस्राव रोकने के उपाय करने चाहिए तथा रोगी को तत्काल अस्पताल भिजवाने की व्यवस्था करनी चाहिए।
In simple words: घाव चार प्रकार के होते हैं: कुचले हुए, कटे हुए, फटे हुए और नुकीली वस्तु (जैसे गोली) से लगे घाव। प्रत्येक प्रकार के घाव का प्राथमिक उपचार अलग होता है, जिसमें घाव को साफ करना, रक्तस्राव रोकना और संक्रमण से बचाना प्रमुख है, गंभीर मामलों में तुरंत डॉक्टरी सहायता लेनी चाहिए।

🎯 Exam Tip: घावों के विभिन्न प्रकारों का स्पष्ट वर्णन करें और प्रत्येक के लिए विशिष्ट प्राथमिक उपचार के तरीकों को समझाएं, साथ ही संक्रमण की रोकथाम के महत्व पर बल दें।

 

Question 5. विष खा लेने पर क्या उपचार करेंगी?
Answer: विष खाए व्यक्ति की प्राथमिक चिकित्सा-विष का सेवन किए व्यक्ति को तत्काल निम्नलिखित प्राथमिक चिकित्सा मिलनी चाहिए.
1. रोगी के आस-पास विष की शीशी अथवा पुड़िया की खोज करें जिससे कि विष के प्रकार का पता चल सके तथा उसके अनुसार उपचार प्रारम्भ किया जा सके।
2. रोगी को वमन कराना चाहिए, परन्तु क्षारक विष के रोगी को वमन कराना हानिकारक होता है, उसे क्षार प्रतिरोधक का सेवन कराना चाहिए।
3. यदि विष अम्लीय है तो रोगी को चूने का पानी, खड़िया मिट्टी अथवा मैग्नीशियम का घोल देना चाहिए।
4. निद्राकारी विष के उपचार में रोगी को सोने नहीं देना चाहिए। इसके लिए उसे तेज चाय अथवा कॉफी पिलानी चाहिए।
5. रोगी को गुदा द्वारा नमक का पानी चढ़ाना चाहिए।
6. रोगी को तत्काल चिकित्सालय पहुँचाना चाहिए। चिकित्सालय ले जाते समय विष की खाली शीशी अथवा रोगी के वमन को शीशी में रखकर अवश्य ले जाना चाहिए ताकि विष की शीघ्र पहचान हो । सके तथा उपयुक्त विष प्रतिरोधक रोगी को दिया जा सके।
7. विष से बचने के लिए घर में कभी भी अनावश्यक औषधियाँ एवं रासायनिक पदार्थ नहीं रखने चाहिए तथा सभी औषधियों एवं रासायनिक पदार्थों को सावधानीपूर्वक नामांकित करके रखना चाहिए।
8. सभी औषधियाँ एवं रासायनिक पदार्थ बच्चों की पहुँच से सदैव दूर रहने चाहिए।
In simple words: विष खा लेने पर सबसे पहले विष का प्रकार जानने की कोशिश करें। फिर, यदि संभव हो तो उल्टी कराएँ (क्षार विष में नहीं), और विष के प्रकार के अनुसार प्रतिरोधक (जैसे चूने का पानी) दें। रोगी को तुरंत अस्पताल ले जाएँ और विष का नमूना साथ ले जाना न भूलें। भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए घर में दवाइयों को सुरक्षित रखें।

🎯 Exam Tip: विषपान की स्थिति में विष के प्रकार की पहचान, तत्काल वमन (यदि उपयुक्त हो) और अस्पताल ले जाने की प्रक्रिया को स्पष्ट करें। सावधानियों को भी शामिल करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. धमनी व शिरा के रक्त-स्राव में क्या अन्तर है? या धमनी एवं शिरा में क्या अन्तर है? समझाइए ।
Answer:

धमनीशिरा
1. धमनियाँ हृदय से रक्त लेकर शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचाती हैं।1. शिराएँ शरीर के विभिन्न अंगों से रक्त वापस हृदय तक पहुँचाती हैं।
2. ये शुद्ध रक्त की वाहक हैं।2. ये अशुद्ध रक्त की वाहक हैं।
3. धमनी के कटने पर अत्यन्त चमकीले लाल रंग का रक्त निकलता है।3. शिरा के कटने पर नीलापन लिए हुए गहरे रंग का रक्त निकलता है।
4. धमनी से होने वाला रक्त-स्राव रुक-रुक कर झटके से बाहर निकलता है।4. शिरा से होने वाला रक्त-स्राव समान गति से होता है।
5. धमनी से होने वाला रक्त-स्राव हृदय की ओर से होता है।5. शिरा से होने वाला रक्त-स्राव हृदय की ओर से नहीं होता है।

In simple words: धमनियाँ हृदय से शरीर तक शुद्ध, चमकीले लाल रक्त को झटके से ले जाती हैं, जबकि शिराएँ शरीर से हृदय तक अशुद्ध, गहरे नीले रक्त को समान गति से वापस लाती हैं। यह रक्त परिसंचरण प्रणाली के दो मुख्य घटक हैं जिनमें रक्त के प्रवाह की दिशा और प्रकृति में अंतर होता है।

🎯 Exam Tip: धमनी और शिरा के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से तालिकाबद्ध करें, जिसमें रक्त का रंग, प्रवाह की गति और दिशा मुख्य बिंदु हों।

 

Question 7. लू लगने के लक्षण एवं उपचार बताइए ।
Answer: लक्षण-ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की तेज किरणों से गरम होकर बहने वाली वायु लू कहलाती है। इसके अधिक समय तक निरन्तर सम्पर्क में आने पर प्रायः व्यक्ति रोगी हो जाते हैं। इस स्थिति को 'लू लगना' कहा जाता है। लू से पीड़ित व्यक्तियों में सामान्यतः रोग के निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं
1. सिर में दर्द होता है तथा चक्कर आते हैं।
2. प्यास बहुत लगती है तथा सारे शरीर में खुश्की आ जाती है।
3. चेहरा लाल हो जाता है तथा नाड़ी की गति तीव्र हो जाती है।
4. श्वास गति बढ़ जाती है।
5. रक्तचाप कम हो जाता है।
6. तेज ज्वर हो जाता है तथा रोगी को मूच्छा आने लगती है।

उपचारः यदि रोगी को समय पर निम्नलिखित उपचार उपलब्ध हो जाएँ तो उसे रोग के घातक परिणामों से बचाया जा सकता है
1. रोगी को तत्काल छायादार ठण्डे स्थान पर ले जाना चाहिए ।
2. रोगी को बार-बार ठण्डे पानी से नहलाना चाहिए।
3. रोगी के सिर पर बर्फ की टोपी रखनी चाहिए।
4. यदि ज्वर पुनः चढ़ता है, तो ठण्डे पानी से स्पन्ज करना चाहिए।
5. रोगी के हाथ-पैर पर मेंहदी अथवा प्याज पीसकर लगाने से लाभ होता है।
6. रोगी को बार-बार कच्चे आम का पन्ना पिलाने से अत्यधिक लाभ होता है।
7. गम्भीर अवस्था में रोगी को तत्काल किसी योग्य चिकित्सक को दिखाना चाहिए।
In simple words: लू गरम हवा के संपर्क में आने से होती है, जिसके लक्षणों में सिरदर्द, प्यास, लाल चेहरा, तेज नब्ज, कम रक्तचाप और बुखार शामिल हैं। उपचार में रोगी को ठंडी जगह पर ले जाना, ठंडा पानी पिलाना, शरीर को ठंडा करना और गंभीर होने पर डॉक्टर से संपर्क करना शामिल है।

🎯 Exam Tip: लू लगने के लक्षण और उसके उपचारों को बिंदुवार और स्पष्ट रूप से समझाएं, प्राथमिक उपचार के महत्व पर विशेष ध्यान दें।

 

Question 8. सदमा पहुँचने से आप क्या समझती हैं? सदमे के लक्षणों एवं प्राथमिक उपचार का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
Answer: सदमा पहुँचना (shock) भी एक ऐसी दुर्घटना है जो आकस्मिक रूप से घटित हो सकती है। गम्भीर रूप से घायल हो जाने अथवा कोई शोक समाचार सुनते ही व्यक्ति सदमे का शिकार हो सकता है। सदमे की स्थिति में व्यक्ति अत्यधिक शिथिल हो जाता है तथा कभी-कभी मूर्च्छित भी हो, जाता है। व्यक्ति के शरीर की सामान्य क्रियाएँ या तो रुक जाती हैं या धीमी पड़ जाती हैं। ऐसा शरीर में रक्त-संचार के अनियमित हो जाने के कारण होता है।

सदमे के लक्षण: सदमे के मुख्य सामान्य लक्षण निम्नलिखित होते हैं
1. सदमाग्रस्त व्यक्ति के मुख पर भय, दुःख अथवा आश्चर्य के भाव स्पष्ट रूप से देखे जा सकते
2. रोगी का चेहरा पीला पड़ जाता है तथा आँखों की पतलियाँ फैल जाती हैं।
3. रोगी का शरीर निष्क्रिय या शिथिल हो जाता है। इसके साथ ही शरीर कुछ ठण्डा भी हो जाती है।
4. सदमाग्रस्त व्यक्ति के माथे पर ठण्डा पसीना आने लगता है।
5. रोगी की नब्ज की गति कभी तेज तथा कभी मन्द होने लगती है अर्थात् नब्ज अनियमित हो जाती
6. व्यक्ति का जी मिचलाने लगता है, उल्टियाँ भी हो सकती हैं। प्यास अधिक लगती है।

उपचार: सदमाग्रस्त व्यक्ति के निम्नलिखित प्राथमिक उपचार किए जाने चाहिए
1. सदमाग्रस्त व्यक्ति को बिना तकिया दिए आराम से लिटा दें ताकि मस्तिष्क की ओर रक्त का उचित संचार हो सके।
2. यदि ठण्ड का मौसम हो, तो रोगी को अधिक ठण्ड से बचाना आवश्यक होता है। यदि मौसम गर्म हो, तो अधिक गर्मी से भी बचाने का उपाय करना चाहिए।
3. यदि व्यक्ति मूच्छित हो गया हो, तो उसकी मूच्छा को दूर करने के उपाय करने चाहिए। इसके लिए अमोनिया भी सुंघाया जा सकता है।
4. रोगी के कुछ सामान्य होने पर गर्म चाय या कॉफी पिलाई जा सकती है।
5. यदि डॉक्टर की सुविधा उपलब्ध हो तो उसे तुरन्त बुला लेना चाहिए।
In simple words: सदमा एक आकस्मिक स्थिति है जिसमें गंभीर चोट या भावनात्मक आघात के कारण शरीर के रक्त संचार में अनियमितता आ जाती है, जिससे व्यक्ति शिथिल और बेहोश हो सकता है। इसके लक्षणों में भय, पीला चेहरा, निष्क्रियता और ठंडी पसीना शामिल हैं। प्राथमिक उपचार में रोगी को आराम से लिटाना, तापमान नियंत्रित करना, बेहोशी दूर करना और तुरंत डॉक्टर को बुलाना शामिल है।

🎯 Exam Tip: सदमे की परिभाषा, उसके शारीरिक लक्षणों और आपातकालीन प्राथमिक उपचार के चरणों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें। रोगी को तुरंत डॉक्टरी सहायता दिलाने की आवश्यकता पर जोर दें।

 

Question 9. आँख में तिनका पड़ जाने पर आप क्या प्राथमिक चिकित्सा करेंगी?
Answer: नेत्र हमारे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इनकी नियमित देखभाल एवं सुरक्षा बहुत आवश्यक है। आँख में यदि धूल के कण अथवा तिनका आदि गिर जाएँ तो निम्नलिखित उपचार करने चाहिए
1. प्रभावित आँख को कभी नहीं मलना चाहिए, क्योंकि इससे आँख घायल हो सकती है।
2. अप्रभावित अथवा दूसरी आँख को हल्के से मलने से लाभ होता है।
3. नाक को जोर से साफ करने से आँसुओं के साथ धूल के कण बाहर निकल जाते हैं।
4. साफ एवं उबालकर ठण्डा किए हुए पानी को आँख धोने के गिलास में डालकर आँख साफ करें।
5. आँखों में एक बूंद रेंडी अथवा जैतून का तेल डालने से आँसुओं के साथ तिनका अथवा धूल के कण बाहर निकल जाते हैं।
6. यदि इतना करने पर आँख साफ न हो सके और पीड़ा बढ़ रही हो, तो तुरन्त नेत्र-चिकित्सक से सम्पर्क करें।
In simple words: आँख में तिनका या धूल जाने पर उसे मलना नहीं चाहिए। दूसरी आँख को मलने, नाक को साफ करने, या उबले पानी या तेल की बूंदों से आँख धोने से कण बाहर निकल सकते हैं। यदि आराम न मिले और दर्द बढ़े तो तुरंत नेत्र-चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

🎯 Exam Tip: आँख में विदेशी वस्तु के लिए प्राथमिक उपचार के चरणों को क्रमबद्ध तरीके से लिखें, जिसमें ‘न मलने’ की सलाह और डॉक्टर से संपर्क करने की अनिवार्यता मुख्य बिंदु हैं।

 

Question 10. डूबे मनुष्य को क्या प्राथमिक चिकित्सा देनी चाहिए? या किसी व्यक्ति के पानी में डूबने पर आप क्या उपचार करेंगी? .
Answer: प्रायः मनुष्य या तो तैरते समय अथवा आत्महत्या का प्रयास करने की स्थिति में पानी में डूबते हैं। डूबते हुए व्यक्ति को तत्काल पानी से बाहर निकालकर निम्नलिखित प्राथमिक चिकित्सा सहायता देनी चाहिए
1. पीड़ित व्यक्ति की नाक, कान, गले तथा मुँह इत्यादि से कीचड़ एवं बालू तत्काल साफ करें।
2. वस्त्र उतार कर रोगी को उल्टा लटकाएँ। ऐसा करने से उसके मुंह से कुछ पानी बाहर निकल जाएगा।
3. अब रोगी को पेट के बल अपनी जाँघ पर लिटाओ। इस प्रकार पेट पर दबाव पड़ने से रोगी का । अधिकांश पानी बाहर निकल जाएगा ।
4. पानी बाहर निकलने के बाद रोगी को कृत्रिम श्वसन प्रदान करें।
5. होश में आने पर रोगी को सांत्वना एवं धैर्य बँधाएँ।
6. यदि रोगी की अवस्था अधिक गम्भीर है तो रोगी को तुरन्त अस्पताल स्थानान्तरित करें।
In simple words: डूबे हुए व्यक्ति को तुरंत पानी से बाहर निकालकर नाक, कान और मुंह से गंदगी साफ करें। फिर उसे उल्टा लटकाकर या जांघ पर पेट के बल लिटाकर फेफड़ों से पानी निकालें। इसके बाद कृत्रिम श्वसन दें, होश आने पर सांत्वना दें और यदि स्थिति गंभीर हो तो तुरंत अस्पताल ले जाएं।

🎯 Exam Tip: डूबे व्यक्ति के प्राथमिक उपचार में, पानी निकालने की प्रक्रिया, कृत्रिम श्वसन का महत्व और रोगी को अस्पताल ले जाने की तात्कालिकता पर विशेष बल दें।

 

Question 11. साँप के काटने पर आप क्या प्राथमिक चिकित्सा करेंगी? या साँप के काटने पर आप क्या उपचार करेंगी?
Answer: साँप के काटने पर प्राथमिक चिकित्सा-यह निश्चित होने पर कि साँप ने काटा है, निम्नलिखित उपचार तुरन्त करने चाहिए
1. काटे हुए स्थान से विष निकालने के लिए किसी तेज धार वाले ब्लेड या चाकू से घाव को और काटना चाहिए और रक्तस्राव होने देना चाहिए।
2. सर्पदंश वाले व्यक्ति को सोने नहीं देना चाहिए।
3. कटे हुए भाग के ऊपर यदि सम्भव हो तो दो या तीन स्थानों पर टूर्नाकेट, कपड़े, सुतली अथवा अन्य किसी डोरी या टाई से कसकर बन्ध लगा देना चाहिए ताकि रुधिर का प्रवाह रुक जाए और विष शरीर में न फैल सके ।
4. दबाकर भी विष निकाला जा सकता है अथवा मुंह से चूसकर अथवा एक छोटे मुँह की बोतल को गर्म करके उस स्थान पर मुँह की ओर से दबाने और बोतल को ठण्डा होने देने से रक्त बोतल में आएगा।
5. कोई सर्प विष-रोधक दवा डॉक्टर की सलाह से देनी चाहिए। टिटेनस प्रतिरोधक इन्जेक्शन भी लगवाना चाहिए।
In simple words: साँप के काटने पर तुरंत कटे हुए स्थान पर चीरा लगाकर खून बहने दें ताकि विष बाहर निकले, पीड़ित को सोने न दें। घाव के ऊपर टूर्नीकेट बाँधकर विष को फैलने से रोकें। विष को चूसकर या बोतल से भी निकाला जा सकता है। अंततः, डॉक्टर की सलाह पर एंटी-वेनम और टिटनेस का इंजेक्शन लेना अति आवश्यक है।

🎯 Exam Tip: साँप के काटने के प्राथमिक उपचार में विष निकालने, टूर्नीकेट बांधने और तत्काल डॉक्टरी सहायता (एंटी-वेनम) की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 12. टिप्पणी लिखिए-बिच्छू द्वारा डंक मारना।
Answer: बिच्छू द्वारा डंक मारना एक सामान्य घरेलू दुर्घटना है। बिच्छू एक विषैला जन्तु है। वास्तव में बिच्छू काटता नहीं है, बल्कि उसकी पूँछ के सिरे पर डंक रहता है। पूँछ के इसी स्थान में एक थैली के अन्दर विष रहता है। जब किसी व्यक्ति के शरीर में यह अपने डंक को चुभोता है, तो साथ-ही-साथ शरीर में विष को भी प्रवेश करा देता है। बिच्छू के डंक मारने से व्यक्ति को बहुत अधिक पीड़ा होती है, परन्तु कुछ असामान्य दशाओं को छोड़कर सामान्य रूप से बिच्छू का डंक मारना घातक सिद्ध नहीं होता। बिच्छू के डंक मारने के कारण उत्पन्न होने वाले मुख्य लक्षण हैं-तीव्र पीड़ा होना, जी मिचलाना तथा उल्टी होना तथा शरीर में एक प्रकार की झनझनाहट होना । विष के अधिक फैल जाने की स्थिति में रक्त परिसंचरण धीमा हो जाता है तथा श्वास-गति तेज हो जाती है। शरीर के जिस भाग में बिच्छू द्वारा डंक मारा जाता है, उसके आस-पास अत्यधिक जलन होती है। बिच्छू के डंक मारने की दशा में प्राथमिक उपचार के लिए विष को पूरे शरीर में फैलने से रोकने के लिए टूर्नीकेट बाँध देना चाहिए। डंक के स्थान पर बर्फ लगाने से पीड़ा कम हो सकती है। इसके साथ-साथ डॉक्टर के परामर्श से दवाओं एवं इंजेक्शन का भी प्रयोग करनी चाहिए।
In simple words: बिच्छू का डंक एक सामान्य घरेलू दुर्घटना है जो तीव्र पीड़ा, मतली और जलन पैदा कर सकती है। इसके उपचार में विष को फैलने से रोकने के लिए टूर्नीकेट का उपयोग करना, डंक वाले स्थान पर बर्फ लगाना और दर्द कम करने के लिए डॉक्टर से परामर्श लेना शामिल है।

🎯 Exam Tip: बिच्छू के डंक के लक्षणों और प्राथमिक उपचार के उपायों को संक्षेप में स्पष्ट करें, जिसमें टूर्नीकेट और डॉक्टर की सलाह का महत्व प्रमुख हो।

 

Question 13. टिप्पणी लिखिए-पागल कुत्ते द्वारा काटना।
Answer: कभी-कभी कुत्ते पागल हो जाते हैं। यह पागलपन रेबीज नामक विषाणु के संक्रमण के परिणामस्वरूप होता है। पागल कुत्ते अकारण ही राह चलते व्यक्ति को काट लेते हैं। पागल कुत्ते द्वारा काटा जाना बहुत हानिकारक होता है। पागल कुत्ते की पहचान बड़ी सरलता से की जा सकती है। उसकी पूँछ हमेशा टाँगों के बीच में झुकी रहती है और उसके मुख की आकृति भयानक हो जाती है। पागल कुत्ते के मुँह से सफेद रंग की झाग निकलती रहती है तथा वह अकारण ही भौंकता रहता है। पागल कुत्ते की । लार में रेबीज नामक विषाणु व्याप्त हो जाते हैं। जब यह कुत्ता किसी व्यक्ति को काट लेता है, तब कुत्ते की लार के माध्यम से ये विषाणु व्यक्ति के रक्त में मिल जाते हैं। ये विषाणु व्यक्ति के मस्तिष्क में पहुँचकर व्यक्ति को रोगग्रस्त कर देते हैं। रेबीज के संक्रमण के परिणामस्वरूप होने वाले रोग को हाइड्रोफोबिया कहते हैं। एक बार हाइड्रोफोबिया हो जाने पर उसका कोई उपचार नहीं है तथा रोगी की शीघ्र ही अनिवार्य रूप से मृत्यु हो जाती है।
In simple words: पागल कुत्ते का काटना रेबीज नामक विषाणु के कारण होता है, जो कुत्ते की लार में होता है और काटने पर व्यक्ति में फैल जाता है। रेबीज संक्रमण से हाइड्रोफोबिया हो सकता है, जो एक घातक रोग है जिसका कोई इलाज नहीं है। पागल कुत्ते के लक्षणों में असामान्य भौंकना, झाग निकलना और भयानक मुख-आकृति शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: पागल कुत्ते के काटने और रेबीज के संबंध को स्पष्ट करें, जिसमें हाइड्रोफोबिया की गंभीरता और कुत्ते के लक्षणों का वर्णन आवश्यक है।

 

Question 14. पागल कुत्ते द्वारा काटे जाने पर आप क्या प्राथमिक उपचार करेंगी? हाइड्रोफोबिया के लक्षण भी लिखिए ।
Answer: पागल कुत्ते द्वारा काटे जाने पर प्राथमिक चिकित्सा-यदि किसी व्यक्ति को पागल कुत्ता, बन्दर, गीदड़ या लोमड़ी आदि कोई भी पशु काट लेता है, तो उस दशा में हाइड्रोफोबिया नामक रोग के हो जाने की आशंका रहती है। इस स्थिति में निम्नलिखित प्राथमिक उपचार अवश्य किया जाना चाहिए.
1. पागल कुत्ते द्वारा काटे जाने पर घाव को साबुन से पानी द्वारा खूब अच्छी तरह धोना चाहिए। भली-भाँति धोने के उपरान्त घाव पर कार्बोलिक एसिड लगाना चाहिए। इस घाव को खुला रखना चाहिए। अर्थात् पट्टी नहीं बाँधनी चाहिए ।
2. कुत्ते द्वारा काटे गए व्यक्ति को टिटेनस से बचाव का टीका अवश्य लगवा देना चाहिए।
3. उपर्युक्त प्राथमिक उपचार के उपरान्त चिकित्सक के परामर्श के अनुसार व्यक्ति को हाइड्रोफोबिया से बचाव के टीके भी अवश्य लगाए जाने चाहिए। पारम्परिक रूप से हाइड्रोफोबिया से बचाव के 14 टीके लगते थे, जो कि व्यक्ति के पेट में लगाए जाते थे तथा काफी कष्टदायक होते थे। अब हाइड्रोफोबिया से बचाव के कुछ आधुनिक टीके तैयार कर लिए गए हैं जो बाँह में लगते हैं तथा कम कष्टकारी होते हैं। ये केवल पाँच टीके ही लगाए जाते हैं।

हाइड्रोफोबिया के लक्षण: रेबीज विषाणु के संक्रमण के परिणामस्वरूप होने वाले हाइड्रोफोबिया नामक रोग के मुख्य लक्षण निम्नलिखित होते हैं
(i) हाइड्रोफोबिया की दशा में रोगी के गले में तीव्र पीड़ा होती है, गले की मांसपेशियाँ निष्क्रिय होने लगती हैं, कुछ भी खाने-पीने में कठिनाई होती है तथा किसी वस्तु को निगलना असम्भव हो जाता है।
(ii) रोगी व्यक्ति पानी भी नहीं पी पाता तथा कभी-कभी इस दशा में उसे पानी से भय भी लगने लगता है।
In simple words: पागल कुत्ते के काटने पर घाव को साबुन से अच्छी तरह धोना, कार्बोलिक एसिड लगाना और खुला रखना चाहिए। टिटनेस और हाइड्रोफोबिया के टीके लगवाना अनिवार्य है, आजकल हाइड्रोफोबिया के पाँच टीके भुजा में लगाए जाते हैं। हाइड्रोफोबिया के लक्षणों में गले में तेज दर्द, निगलने में कठिनाई और पानी से डर लगना शामिल है।

🎯 Exam Tip: पागल कुत्ते के काटने पर तत्काल प्राथमिक उपचार के साथ-साथ हाइड्रोफोबिया के आधुनिक टीके और उसके विशिष्ट लक्षणों का विस्तृत वर्णन करें।

 

Question 15. टिप्पणी लिखिए-कीट (ब) द्वारा डंक मारना।
Answer: शहद की मक्खी, बरें अथवा कुछ अन्य कीटों द्वारा डंक मारने पर व्यक्ति को असहनीय पीड़ा होती है। इन कीटों के शरीर के पिछले भाग में डंक तथा उससे पहले विष की थैली होती है। ये कीट जब व्यक्ति को डंक मारते हैं, तो प्रायः उनका डंक टूट कर व्यक्ति के शरीर में ही रह जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए डंक मारने के उपचार के लिए सर्वप्रथम डंक को निकालने का कार्य किया जाना चाहिए । इसके लिए किसी खोखली नली या चाबी से उस स्थान को दबाने अथवा रगड़ने पर डंक निकल जाता है। काटे गए स्थान पर स्प्रिट लगानी चाहिए। इसके उपरान्त खाने का सोडा गीला करके डंक के स्थान पर मलना चाहिए। इससे बरों का विष निष्क्रिय हो जाता है। यदि कीट अधिक विषैला हो तथा विष के फैलने के लक्षण दिखाई दें तो रक्त प्रवाह को बन्ध लगा कर रोकना चाहिए। यदि स्थिति गम्भीर प्रतीत हो तो तुरन्त चिकित्सक से सम्पर्क करना चाहिए ।
In simple words: कीटों के डंक मारने से तेज दर्द होता है, और कई बार डंक शरीर में रह जाता है। प्राथमिक उपचार में डंक को सावधानी से निकालना, स्प्रिट और बेकिंग सोडा का उपयोग करना शामिल है ताकि विष निष्क्रिय हो जाए। यदि विष फैलने के लक्षण दिखें या स्थिति गंभीर हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

🎯 Exam Tip: कीट के डंक के प्राथमिक उपचार में डंक निकालने, विष को निष्क्रिय करने के उपायों और गंभीर स्थिति में चिकित्सक से परामर्श की अनिवार्यता पर जोर दें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नः

 

Question 1. सामान्य रूप से घटित होने वाली दुर्घटनाओं के मुख्य कारण क्या होते हैं?
Answer: सामान्य रूप से घटित होने वाली दुर्घटनाओं के मुख्य कारण लापरवाही या असावधानी तथा अज्ञानता होते हैं।
In simple words: सामान्य दुर्घटनाएँ मुख्य रूप से लोगों की लापरवाही, असावधानी या किसी चीज के बारे में पूरी जानकारी न होने के कारण होती हैं।

🎯 Exam Tip: उत्तर में लापरवाही, असावधानी और अज्ञानता जैसे प्रमुख कारणों का उल्लेख करें।

 

Question 2. सामान्य रूप से घटित होने वाली मुख्य घरेलू दुर्घटनाएँ कौन-कौन सी होती हैं?
Answer: सामान्य रूप से घटित होने वाली मुख्य घरेलू दुर्घटनाएँ हैं – जलना या झुलसना, चोट लगना तथा रक्तस्राव होना, लू या गर्मी लग जाना, पानी में डूब ज रा, साँप, बिच्छू या बरों द्वारा डंक मार देना, कुत्ते/बन्दर आदि पशुओं द्वारा काटा जाना, बच्चों द्वारा आँख, नाक या कान में कोई वस्तु हँसा लेना, दम घुटना, बेहोशी या दौरा पड़ना या आकस्मिक हृदय का दौरा पड़ना आदि ।
In simple words: घर में आमतौर पर होने वाली दुर्घटनाओं में जलना, चोट लगना, खून बहना, लू लगना, डूबना, कीट या जानवर का काटना, बच्चों के अंगों में कुछ फंसना, दम घुटना या बेहोशी शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: प्रमुख घरेलू दुर्घटनाओं की एक सूची दें जो सामान्यतः घटित होती हैं।

 

Question 3. लू के रोगी को पीने के लिए क्या देना हितकर रहता है?
Answer: लु के रोगी को कच्चे आम का पन्ना पीने के लिए देना लाभप्रद रहता है।
In simple words: लू लगने पर कच्चे आम का पन्ना पीना फायदेमंद होता है, क्योंकि यह शरीर को ठंडक देता है।

🎯 Exam Tip: लू के उपचार में कच्चे आम के पन्ने के महत्व पर जोर दें।

 

Question 4. लू लगने पर तुरन्त क्या उपचार किया जाना चाहिए?
Answer: रोगी को ठण्डे पानी से नहलाकर प्याज का रस अथवा कच्चे आम का पन्ना को देना चाहिए।
In simple words: लू लगने पर तुरंत व्यक्ति को ठंडे पानी से नहलाना चाहिए और प्याज का रस या कच्चे आम का पन्ना पीने को देना चाहिए ताकि शरीर का तापमान नियंत्रित हो सके।

🎯 Exam Tip: तत्काल ठंडे पानी से नहलाना और प्याज का रस/आम का पन्ना पिलाना प्रमुख प्राथमिक उपचार है।

 

Question 5. डबने वाले व्यक्ति को सर्वप्रथम क्या सहायता देनी चाहिए?
Answer: सर्वप्रथम डूबने वाले व्यक्ति के पेट में भरी अतिरिक्त पानी बाहर निकालना चाहिए तथा फिर यदि आवश्यक हो, तो उसे कृत्रिम श्वसन दिलाना चाहिए।
In simple words: डूबने वाले व्यक्ति को सबसे पहले पानी से बाहर निकालकर उसके पेट से पानी निकालना चाहिए, और यदि आवश्यक हो तो उसे कृत्रिम श्वास देना चाहिए।

🎯 Exam Tip: पानी निकालने और कृत्रिम श्वसन को प्राथमिक उपचार के रूप में हाइलाइट करें।

 

Question 6. बच्चे की नाक में कोई वस्तु फैंसने पर आप क्या करेंगी?
Answer: नसवार, मिर्च व तम्बाकू आदि सुंघाने पर छींक के साथ प्रायः नाक में फैंसी वस्तु बाहर निकल जाती है। ऐसा न होने पर चिकित्सक से सहायता प्राप्त करनी चाहिए।
In simple words: बच्चे की नाक में कुछ फंसने पर नसवार या मिर्च सुंघाकर छींक लाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि वस्तु बाहर निकल जाए। यदि ऐसा न हो तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: छींक लाने के घरेलू उपाय और फिर चिकित्सक से परामर्श की आवश्यकता पर बल दें।

 

Question 7. कटे हुए घावों का क्या प्राथमिक उपचार करोगी?
Answer: कटे हुए घावों को स्वच्छ रुई की सहायता से किसी नि:संक्रामक (एन्टीसेप्टिक) घोल द्वारा साफ कर पट्टी बाँध देनी चाहिए ।
In simple words: कटे हुए घावों को साफ रुई और एंटीसेप्टिक घोल से अच्छी तरह साफ करना चाहिए और फिर पट्टी बांध देनी चाहिए ताकि संक्रमण न हो।

🎯 Exam Tip: घाव को साफ करने और एंटीसेप्टिक के उपयोग को प्राथमिकता दें।

 

Question 8. मूच्छा दूर करने के प्राथमिक उपाय क्या हैं?
Answer: मूर्च्छित व्यक्ति को हवादार स्थान पर लिटाकर उसके मुंह पर ठण्डे पानी के छींटे लगाने चाहिए अथवा उसे अमोनिया हुँघानी चाहिए ।
In simple words: मूर्छित व्यक्ति को हवादार जगह पर लिटाकर उसके चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारने चाहिए या अमोनिया सुंघाना चाहिए ताकि वह होश में आ सके।

🎯 Exam Tip: हवादार स्थान, ठंडे पानी और अमोनिया के उपयोग को मूर्च्छा दूर करने के प्राथमिक उपाय के रूप में बताएं।

 

Question 9. रक्त-स्राव होने पर आप क्या प्राथमिक चिकित्सा करेंगी?
Answer: प्रभावित धमनी के दबाव बिन्दु को भली प्रकार दबाना चाहिए। घाव पर पिसी हुई फिटकरी बुकने, टिंचर आयोडीन अथवा फैरिक-क्लोराइड का घोल छिड़कने से रक्त-स्राव को रोका जा सकता है।
In simple words: रक्तस्राव होने पर सबसे पहले प्रभावित धमनी के दबाव बिन्दु को दबाना चाहिए। खून रोकने के लिए फिटकरी, टिंचर आयोडीन या फैरिक-क्लोराइड का उपयोग किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: रक्तस्राव रोकने के लिए दबाव और उपयुक्त रसायनों के उपयोग पर जोर दें।

 

Question 10. पागल कुत्ते की क्या पहचान है?
Answer: पागल कुत्ते के लक्षण निम्नलिखित हैं
1. यह अकारण भौंकती रहता है।
2. उसके मुंह से झाग निकलते रहते हैं।
3. उसकी पूँछ दोनों टाँगों के बीच झुकी होती है।
In simple words: पागल कुत्ते की पहचान उसके अकारण भौंकने, मुंह से झाग निकलने और पूंछ का दोनों टांगों के बीच झुके होने से की जा सकती है।

🎯 Exam Tip: पागल कुत्ते के विशिष्ट बाहरी लक्षणों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध करें।

 

Question 11. पागल कुत्ते द्वारा काटे गए रोगी के क्या लक्षण हैं?
Answer: पागल कुत्ते द्वारा काटे जाने पर हाइड्रोफोबिया नामक रोग हो जाता है। इस रोग की स्थिति में
1. रोगी को पानी से डर लगता है,
2. भोजन अथवा पेय पदार्थ नहीं निगला जाता तथा
3. गले में दर्द होता है।
In simple words: पागल कुत्ते के काटने पर हाइड्रोफोबिया रोग हो सकता है, जिसके लक्षणों में पानी से डर लगना, खाने-पीने में कठिनाई और गले में दर्द शामिल है।

🎯 Exam Tip: हाइड्रोफोबिया के प्रमुख लक्षणों को संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से बताएं।

 

Question 12. पागल कुत्ते द्वारा काटे जाने पर प्राथमिक उपचार क्या हैं?
Answer: पागल कुत्ते द्वारा काटे जाने पर-
1. घाव को स्प्रिट से धोकर तथा कार्बोलिक अम्ल से जलाकर विष समाप्त कर देना चाहिए,
2. तत्काल अस्पताल जाकर विष निरोधक सुई लगवाएँ तथा
3. पागल कुत्ते की सूचना तुरन्त नगर के स्वास्थ्य अधिकारी को दें।
In simple words: पागल कुत्ते के काटने पर घाव को स्प्रिट से धोकर कार्बोलिक अम्ल से विष को खत्म करना चाहिए, तुरंत एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाना चाहिए और इसकी सूचना स्वास्थ्य अधिकारी को देनी चाहिए।

🎯 Exam Tip: घाव की सफाई, एंटी-रेबीज इंजेक्शन और स्वास्थ्य विभाग को सूचित करना प्राथमिक उपचार के आवश्यक चरण हैं।

 

Question 13. साँप के काटने पर बन्ध क्यों लगाया जाता है?
Answer: साँप के काटने के स्थान से थोड़ा ऊपर कसकर बन्ध लगाया जाता है ताकि रक्त-प्रवाह रुक जाए तथा विष शरीर के अन्य अंगों तक न पहुंचे ।
In simple words: साँप के काटने पर घाव के ऊपर पट्टी या बन्ध इसलिए लगाया जाता है ताकि खून का बहाव रुक जाए और विष शरीर में फैल न सके।

🎯 Exam Tip: बन्ध लगाने का मुख्य उद्देश्य, यानी विष को फैलने से रोकना, स्पष्ट रूप से उल्लेख करें।

 

Question 14. किन अम्लों से शरीर जल जाता है?
Answer: गन्धक, नमक व शोरे के सान्द्र अम्लों से शरीर जल जाता है।
In simple words: शरीर गंधक का अम्ल, नमक का अम्ल और शोरे के सान्द्र अम्लों के संपर्क में आने से जल सकता है।

🎯 Exam Tip: उन विशिष्ट अम्लों के नाम बताएं जो त्वचा को जला सकते हैं।

 

Question 15. खपच्चियों का प्रयोग कब किया जाना चाहिए?
Answer: दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के अस्थि-भंग वाले अंग के दोनों ओर खपच्चियाँ बाँधना लाभप्रद रहता है, परन्तु कोमल अंगों (पसलियाँ, गर्दन आदि) की अस्थि भंग होने पर खपच्चियाँ प्रयोग में नहीं लाइ जाती हैं।
In simple words: खपच्चियों का उपयोग हड्डी टूटने पर घायल अंग को स्थिर करने के लिए किया जाता है, लेकिन पसली या गर्दन जैसे कोमल अंगों में टूटी हड्डी के लिए इनका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

🎯 Exam Tip: खपच्चियों के उपयोग का उद्देश्य (अस्थि भंग में स्थिरता) और उनके प्रयोग की सीमाएं (कोमल अंगों में नहीं) स्पष्ट करें।

 

Question 16. टूर्नीकेट क्या है? इसका क्या काम है? या टूर्नीकेट से आप क्या समझती हैं?
Answer: निरन्तर हो रहे रक्त-स्राव को रोकने के लिए कपड़ों की पट्टियों से बने पैड द्वारा सम्बन्धित धमनियों पर दबाव डाला जाता है। मुलायम कपड़े का यह पैड टूर्नीकट कहलाता है तथा इसे बाँधकर रक्त-स्राव को रोका जाता है।
In simple words: टूर्नीकेट एक प्रकार का पैड है जो कपड़ों की पट्टियों से बना होता है, जिसे अत्यधिक रक्तस्राव को रोकने के लिए घायल अंग की धमनियों पर कसकर बांधा जाता है। इसका मुख्य काम रक्त प्रवाह को रोककर खून बहने से बचाना है।

🎯 Exam Tip: टूर्नीकेट की परिभाषा और रक्तस्राव रोकने में उसकी भूमिका को स्पष्ट रूप से समझाएं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

Question 1. सामान्य दुर्घटनाएँ घटित होती हैं
(क) दैवी कृपा से
(ख) भाग्यवश
(ग) लापरवाही तथा अज्ञानतावश
(घ) अज्ञात कारणों से
Answer: (ग) लापरवाही तथा अज्ञानतावश
In simple words: Most common accidents occur due to a lack of caution, attention, or general awareness.

🎯 Exam Tip: Understanding the common causes of accidents, like negligence or lack of knowledge, is key to preventing them.

 

Question 2. पागल कुत्ते के काटने से होने वाला रोग है
(क) हिस्टीरिया
(ख) मिरगी
(ग) रक्तस्राव
(घ) हाइड्रोफोबिया
Answer: (घ) हाइड्रोफोबिया
In simple words: The disease caused by the bite of a rabid dog is known as hydrophobia, characterized by a fear of water.

🎯 Exam Tip: Recognizing the symptoms of rabies (hydrophobia) and knowing immediate first aid are critical for survival after a rabid animal bite.

 

Question 3. क्षार से जल जाने पर ज़ले हुए भाग पर लगाना चाहिए
(क) बरनॉल
(ख) डिटॉल
(ग) प्याज का रस
(घ) नीबू का रस
Answer: (घ) नीबू का रस
In simple words: When skin is burned by alkali, applying lemon juice helps neutralize the alkali's effect.

🎯 Exam Tip: Always remember to use an acidic substance, like lemon juice or vinegar, to neutralize alkali burns effectively.

 

Question 4. अम्ल से जल जाने पर लगाना चाहिए
(क) नींबू का रस
(ख) सिरका
(ग) खाने : का सोडा
(घ) कुछ भी नहीं।
Answer: (ग) खाने : का सोडा
In simple words: In case of an acid burn, baking soda (sodium bicarbonate) solution should be applied to neutralize the acid.

🎯 Exam Tip: For acid burns, a basic solution like baking soda is the correct immediate neutralizing agent to apply.

 

Question 5. जले हुए व्यक्ति को पीने के लिए देना चाहिए
(क) मदा
(ख) मदद्यरहित पेय
(ग) दोनों ही
(घ) दोनों ही नहीं।
Answer: (ख) मदद्यरहित पेय
In simple words: A person with burns should be given non-alcoholic beverages to prevent dehydration and support recovery.

🎯 Exam Tip: Providing non-alcoholic fluids to burn victims is important for hydration and overall support, avoiding anything that might further complicate their condition.

 

Question 6. हाथ या टाँग के घाव से होने वाले रक्त-स्राव को रोकने का सर्वोत्तम उपाय है
(क) टूर्नीकेट का प्रयोग
(ख) स्प्रिट का प्रयोग
(ग) खपच्चियों का प्रयोग
(घ) इनमें से कोई नहीं।
Answer: (क) टूर्नीकेट का प्रयोग
In simple words: For severe bleeding from a limb, a tourniquet is the most effective way to stop blood flow by applying pressure.

🎯 Exam Tip: Understanding the correct application of a tourniquet is vital for controlling severe bleeding from an extremity, but it should be used cautiously.

 

Question 7. आन्तरिक रक्तस्राव को कम करने के लिए क्या प्राथमिक उपचार किया जाता है?
(क) बर्फ की थैली रखना
(ख) गीले कपड़े में लपेटना
(ग) टूर्नीकेट का प्रयोग करना।
(घ) कोई उपचार नहीं।
Answer: (क) बर्फ की थैली रखना
In simple words: Applying an ice pack to the affected area can help reduce internal bleeding by constricting blood vessels.

🎯 Exam Tip: Cold compression with an ice pack is a standard initial treatment for internal bleeding to minimize swelling and blood flow.

 

Question 8. जलने पर रोगी का उपचार है
(क) डिटॉल लगाना
(ख) पिसी आलू लगाना
(ग) पिसा नमक लगाना
(घ) गर्म तेल ।
Answer: (ख) पिसा आलू लगाना
In simple words: Applying grated potato to a burn can provide a cooling and soothing effect, helping to alleviate pain.

🎯 Exam Tip: While not a definitive medical treatment, applying natural cool compresses like grated potato can offer temporary relief for minor burns.

 

Question 9. किस रक्त-नलिका के कट जाने से लगातार रक्त बहता है?
(क) शिरा
(ख) नाड़ी
(ग) तन्तु
(घ) धमनी ।
Answer: (क) शिरा
In simple words: If a vein (शिरा) is cut, blood flows continuously and steadily, often appearing dark red.

🎯 Exam Tip: Distinguishing between arterial (pulsating, bright red) and venous (continuous, dark red) bleeding is crucial for appropriate first aid response.

 

Question 10. सर्प के काटने पर काटे हुए स्थान पर लगाते हैं
(क) बरनॉल
(ख) लाल मिर्च
(ग) पोटैशियम परमैंगनेट
(घ) नौसादर ।
Answer: (ग) पोटैशियम परमैंगनेट
In simple words: Potassium permanganate can be applied to a snakebite to help disinfect the wound and potentially neutralize some venom locally.

🎯 Exam Tip: While potassium permanganate may be used for disinfection, immediate medical attention and antivenom are paramount for snakebites.

 

Question 11. डिटॉल का मुख्य कार्य है
(क) जलन को दूर करना
(ख) घाव को कीटाणु रहित करना
(ग) मूच्छा दूर करना
(घ) रक्त-स्राव बन्द करना ।
Answer: (ख) घाव को कीटाणु रहित करना
In simple words: Dettol primarily functions as an antiseptic to clean wounds and prevent infection by killing germs.

🎯 Exam Tip: Dettol is an essential antiseptic for cleaning cuts and wounds, helping to prevent bacterial infection in first aid.

 

Question 12. मिरगी या हिस्टीरिया के कारण मूच्छा आने पर प्रथम उपचार है
(क) रोगी के मानसिक कष्ट को दूर करना
(ख) पुराना जूता सुंघाना
(ग) रोगी को शुद्ध वायु में लिटा देना
(घ) पीली मिट्टी हुँघाना ।
Answer: (ग) रोगी को शुद्ध वायु में लिटा देना
In simple words: The first step when someone faints due to epilepsy or hysteria is to lay them down in an open, airy space to ensure they receive fresh air.

🎯 Exam Tip: Ensuring an open airway and access to fresh air is a fundamental first aid principle for any unconscious individual.

 

Question 13. नाक से रक्त-स्त्राव होने पर
(क) जूता सुंघाना चाहिए
(ख) पीली मिट्टी सुंघा देनी चाहिए
(ग) कुर्सी पर बैठाकर सिर पीछे की ओर झुका देना चाहिए
(घ) घायल को उल्टा लिटा देना चाहिए।
Answer: (ग) कुर्सी पर बैठाकर सिर पीछे की ओर झुका देना चाहिए
In simple words: To stop a nosebleed, sit upright, lean your head slightly forward, and pinch the soft part of your nose to apply pressure.

🎯 Exam Tip: Leaning forward while sitting helps prevent blood from flowing down the throat, which is the correct first aid for nosebleeds.

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