UP Board Solutions Class 9 Hindi Chapter 13 Shivmangal Singh 'Suman'

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Detailed Chapter 13 शिवमंगल सिंह 'सुमन' UP Board Solutions for Class 9 Hindi

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Class 9 Hindi Chapter 13 शिवमंगल सिंह 'सुमन' UP Board Solutions PDF

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. निम्नलिखित पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए तथा काव्यगत सौन्दर्य भी स्पष्ट कीजिए :
Answer:
1. हर क्यारी में पद-चिह्न ................................................................ मचल मचल इठलाती है।
शब्दार्थ-पद-चिह्न = पैरों के चिह्न कसक = पीड़ा। शबनम = ओस किसलय = कोपलें । आभा = सौन्दर्य
सन्दर्भ - प्रस्तुत काव्य-पंक्तियाँ शिवमंगल सिंह 'सुमन' द्वारा रचित 'युगवाणी' कविता से उधृत हैं।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियों में श्रमिक एवं कृषक वर्ग की महत्ता का वर्णन किया गया है।
व्याख्या - सुमन जी श्रमिक एवं कृषक वर्ग को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि मैंने क्यारी-क्यारी यानी खेत-खेत में तुम्हारे पद-चिह्नों को देखा है। तुमने कठिन परिश्रम से जो क्यारियाँ बोयी थीं, उन पर बढ़ती हुई फसल पर आज भी तुम्हारे श्रमयुक्त कदम परिलक्षित हो रहे हैं। फसलों की डालियाँ जो नये-नये पल्लवों से लद गई हैं, प्रतीत होता है कि तुम्हारी मुस्कान इन्हें मिल गयी है। विकास का यही नियम है, जगह-जगह मुस्कान फैल जाती है। प्रत्येक काँटे का व्यक्तित्व भी बड़ा अजीब होता है। इसमें किसी न किसी का दुःख-दर्द कसकता ही है। ओस की बूंदों को देखकर जीवन में प्यास जग जाती है।
प्रत्येक नदी की उठती हुई लहरें मन को डस लेती हैं अर्थात् नदी से उठती हुई लहरें मन पर अपना प्रभाव डालती हैं। जो भी नया अंकुर फूटता है, वह भविष्य में आने वाली अपनी कलियों को अपने में समाहित किये रहता है। अंकुर की आँख विकास का प्रतिरूप है। हर किसलय में, हर पल्लव में जो लाली परिलक्षित होती है, वह और कुछ नहीं, तुम्हारे अधरों की लाली ही मालूम देती है। कलियों को अपना स्वभाव है कि हवा बहने पर वे हिलती-डुलती हैं।
काव्यगत सौन्दर्य
• सुमनजी ने समाज की प्रगति में श्रमिक-कृषक वर्ग के योगदान को रेखांकित किया है।
• भाषा-सरल खड़ी बोली ।
• शब्द शक्ति-लक्षणा ।
• रस-शान्त
• अलंकार- पुनरुक्तिप्रकाश।।
2. अम्बर में उगती सोने-चाँदी ................................................................ मौत कहीं बढ़ जाएगी ।
अथवा क्या उम्र ढलेगी तो ................................................................ मौत कहीं बढ़ जाएगी ।
शब्दार्थ-सिन्धु = समुद्र पावन = पवित्र संघर्ष = लड़ाई लाचारी = बेबशी ।
सन्दर्भ - प्रस्तुत काव्य-पंक्तियाँ शिवमंगल सिंह 'सुमन' द्वारा रचित 'युगवाणी' कविता से उधृत हैं।
प्रसंग - प्रस्तुत पद्मावतरण में सुमनजी ने श्रमिक एवं कृषक वर्ग के परिश्रम से समाज में आयी सम्पन्नता का वर्णन किया है।
व्याख्या - सुमनजी कहते हैं कि आकाश में उगते सूरज, चाँद और सितारे ऐसे मालूम पड़ते हैं जैसे सोने और चाँदी की फसलें उग रही हैं। खेत में ज्वार और बाजरे की फसलें मस्ती में लहरा रही हैं। यह सुन्दर दृश्य मन को प्रभावित कर रहा है। ये मन को नये-नये बिम्ब प्रदान करते हैं। चाँद के उदय होने पर समुद्र में चाँदनी सैकड़ों ज्वार उठा देती है।
सुमनजी कहते हैं कि ऊपर बताये गये प्राकृतिक दृश्य इतने मोहक हैं कि हम अपने को इनसे अलग नहीं कर सकते ये इतने आकर्षक हैं कि मेरे मन को बाँध लेते हैं। फिर भी जीवन में अनगिनत क्रिया-कलाप करने पड़ते हैं। इन क्रिया-कलापों से हम दूर भी नहीं रह सकते प्राकृतिक सौन्दर्य और जीवन के धन्धे को क्या साथ-साथ लेकर चलना संभव है। शरीर और मन का सम्बन्ध अत्यन्त पवित्र होता है। यह पवित्र सम्बन्ध कैसे टूट सकता है? प्रकृति मन को सुख प्रदान करती है और जीवन के धन्धे शरीर के लिए अत्यावश्यक हैं। अतः दोनों का सम्बन्ध बना रहना उचित है।
सुमनजी कुछ गम्भीर मुद्रा में हो जाते हैं और पूछते हैं क्या जब उम्र ढलने लगेगी तो यह सब कुछ, जो आज इतना आकर्षक लग रहा है, ओझल हो जायेगा? क्या उम्र ढलने के साथ-साथ सूरज और चाँद की कान्ति मन्द पड़ जायेगी? जिने सुन्दर दृश्यों को संजोये मैंने जीवन-मृत्यु का स्वर साध लिया है, क्या उनका आकर्षण साँसों को धोखा दे देगा?
सुमनजी पुनः कहते हैं कि मैं जिस दिन स्वप्नों एवं अपनी कल्पनाओं का मूल्यांकन करने बैठेंगा, उस दिन मेरे संघर्षों पर जाला चढ़ जायेगा, मेरा संघर्ष थक जायेगा और जिस दिन विवशता मुझ पर तरस दिखाएगी अर्थात् जिस दिन मैं मजबूरी का गुलाम बन जाऊँगा, उस दिन जीवन की अपेक्षा मृत्यु का पलड़ा भारी होगा, उस दिन मृत्यु मुझे पकड़ लेगी।
काव्यगत सौन्दर्य
• सुमनजी ने जीवन और मृत्यु की यथार्थता का चित्रण किया है।
• भाषा-खड़ी बोली ।
• शब्द शक्ति-लक्षणा ।
• रस-शान्त
• शैली-गीत
3. इन सबसे बढ़कर मूक ................................................................ प्रतिध्वनि बतलाते हो ।
शब्दार्थ-पथ = रास्ता, मार्ग पथराई = पत्थर-सी । अकारथ = व्यर्थ मूक = गूंगा । बेबसी = लाचारी । आजादी = स्वतन्त्रता ।
सन्दर्भ - प्रस्तुत पद्मावतरण शिवमंगल सिंह 'सुमन' द्वारा रचित 'युगवाणी' कविता से उधृत है। प्रसंग-इन पंक्तियों में सुमनजी ने निर्बल व्यक्तियों के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट की है।
व्याख्या - कवि कहता है कि मेरा मन प्राकृतिक सुन्दरता को देखने में नहीं लगा रह सकता। मैं दुःख से तड़पते हुए उन व्यक्तियों को अधिक महत्त्व देता हूँ जो कि अन्न के अभाव में भूख से व्याकुल होकर पथरा गये हैं। उनकी पथराई आँखें आनेजाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने पास बुलाती हैं। वही आँखें आज मुझे भी अपने नजदीक बुला रही हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनकी चिन्ता ईश्वर को भी नहीं है। ऐसा मालूम होता है कि इन्हें बनाने के बाद ईश्वर इन्हें उसी प्रकार भूल गया है, जैसे कि उसने इन्हें बनाया ही न हो। सचमुच धर्म की ध्वजा इन दीन-हीन प्राणियों की हड़ियों पर ही फहराती है क्योंकि ये लोग अन्याय और अनीति के विरुद्ध आवाज तक नहीं उठा पाते हैं।
सुमनजी का कहना है कि यदि मैं ऐसे व्यक्तियों को भुला देता हूँ तो मेरा मानव शरीर धारण करना बेकार है। ऐसी स्थिति में मेरा शरीर मिट्टी का लोथड़ा मात्र रह जायेगा। यदि मेरी आँखें इन लोगों के कष्टों को देखकर सहानुभूति से द्रवित नहीं होती हैं तो इन आँखों का कोई मूल्य नहीं है। आँसू तो दया और करुणा के प्रतीक हैं, अतः जब तक इन आँखों से करुणा का जल नहीं प्रवाहित होता है, तब तक इनका होना और न होना बराबर है। यदि मैं निर्बल वर्ग को भुला देता हूँ तो मेरा जन्म लेना व्यर्थ है और मेरा जीवित रहना भी मरे हुए व्यक्ति के समान ही है। अभिप्राय यह है कि मानव को मानव के प्रति सहानुभूति, दया, करुणा-जैसी मानवीय भावनाओं को अपने हृदय में रखना चाहिए।
सुमनजी कहते हैं कि मैं स्पष्ट रूप से अवलोकन कर रहा हूँ कि तुम श्रमिक वर्ग की उपेक्षा कर रहे हो। अब इन्हें मीठी-मीठी बातों द्वारा बहलाना छोड़ दो। अब तुम्हारा यह दर्शन चलने वाला नहीं है। निर्धन श्रमिक के मृतप्राय बच्चों पर विवशता चीख-चीख पड़ती है और तुम इसे स्वतन्त्रता की प्रतिध्वनि के रूप में परिभाषित कर उधर से अपना ध्यान हटाना चाहते हो। तुम्हारी यह सोच उपयुक्त नहीं है।
काव्यगत सौन्दर्य
• इन पंक्तियों में सुमनजी ने मानव के प्रति सहानुभूति, करुणा और प्रेम की भावना व्यक्त की है।
• भाषा-साहित्यिक खड़ी बोली,
• गुण- प्रसाद ।
• शब्द शक्ति-लक्षणा ।
• अलंकार-रूपक और अनुप्रास ।
• रस-करुण।
4. यों खेल करोगे तुम कब ................................................................ का अम्बर में घेरा यदि ।
अथवा विश्वास सर्वहारा ................................................................ दरार पड़ जायेगी।
अथवा सदियों की कुर्बानी ................................................................ अम्बर में घेरा यदि ।
शब्दार्थ-असहाय = निर्धन । सर्वहारा = गरीब तबके के लोग । गोंस = फाँस, कील । कुर्बानी = बलिदान अम्बर = आकाश ।
सन्दर्भ - प्रस्तुत काव्य-पंक्तियाँ शिवमंगल सिंह 'सुमन' द्वारा रचित 'युगवाणी' नामक कविता से उधृत हैं।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियों में सुमनजी ने दीन-दुखियों के प्रति शासन की उपेक्षा पर गहरी चोट की है।
व्याख्या - सुमनजी शासक एवं पूँजीपति वर्ग को चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तुम असहायों की मूल समस्याओं का समाधान करने की अपेक्षा इनके साथ खिलवाड़ करोगे तो ठीक नहीं होगा। बहुत लम्बा समय बीत गया, गरीब व्यक्ति को आशारूपी अफीम खिला-खिलाकर कब तक सुलाते रहोगे। जरा याद रखना, मानवीय संवेदनाओं की जो फसल हमने बोयी-जोती है, यदि वह नष्ट हो गयी तो तुम अकेले बचोगे और संसार श्मशान घाट बन जायेगा। ऐसी स्थिति में तुम अकेले क्या करोगे?
सुमनजी आगे चेतावनी दे रहे हैं कि यदि सर्वहारा (गरीब, निर्धन) वर्ग का विश्वास खो दिया तो पास आती मृत्यु की। गहरी फाँस तुम्हारे जीवन में गड़ जायेगी। बड़े मुश्किल के बाद गरीब जागा है, इसकी जागृति का स्वागत करना चाहिए। यदि बाँध बाँधने के पूर्व ही पानी सूख जाए, तब तो धरती की छाती में दरार पड़ जायेगी। बाँध इसलिए बाँधा जाता है ताकि उसमें पानी इकट्ठा रहे । यदि पानी सूख गया तो बाँध का क्या औचित्य? अतः समय रहते सजग हो जाओ और निर्धन व्यक्ति को उसका अधिकार सौंप दो।
सुमनजी आगे पुनः चेतावनी दे रहे हैं, यदि श्रमिक वर्ग के उत्थान के लिए सदियों से चले आ रहे विचार आन्दोलन का सम्मान न हुआ, उनकी कुर्बानी बेकार चली गयी तो ठीक नहीं होगा। सुबह के जागरण को जमुहाई ले-लेकर खो देना कहाँ की बुद्धिमानी है? पूर्णिमा का उत्सव मनाने की बात सोचते-सोचते ही यदि आकाश में अमावस्या का अँधेरा छा गया तो इतिहास तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा। अतः अँधेरा दूर करके श्रमिक के जीवन में प्रकाश का उत्सव मनाने का प्रयास करो।
काव्यगत सौन्दर्य
• सर्वहारा वर्ग के उत्थान की बात कही गयी है।
• भाषा-खड़ी बोली ।
• शब्द शक्ति-लक्षणा ।
• रस-रौद्र ।
• शैली-भावात्मक, गीत ।
• अलंकार-आशा की अफीम में रूपक ।
5. इतिहास न तुमको माफ करेगा ................................................................ सब छन्दों की रानी है।
अथवा इतिहास न तुमको ................................................................ को मत मन्द करो।
शब्दार्थ-सैलाब = बाढ़, प्रवाह, जल-प्लावन भू = भूलोक । भुवः = भुवलोक । गायत्री = एक वैदिक छन्द । सन्दर्भ-प्रस्तुत पद्म-पंक्तियाँ शिवमंगल सिंह 'सुमन' द्वारा रचित 'युगवाणी' नामक कविता से उद्धृत हैं।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियों में सुमनजी ने मानव समाज के कर्णधारों को समाज कल्याण हेतु प्रोत्साहित किया है।
व्याख्या - सुमनजी का कहना है कि समय परिवर्तनशील है। इसलिए हमें जो भी अवसर प्राप्त हुए हैं उनका सदुपयोग किया जाना चाहिए अन्यथा कीर्ति की जगह अपकीर्ति मिलेगी। यदि हमने समय का सही सदुपयोग नहीं किया तो आने वाला समाज हमारी अकर्मण्यता और कर्तव्यहीनता पर धिक्कारेगा। इस समय का जो भी इतिहास लिखा जायेगा, उसमें किसी भी व्यक्ति को उसकी अकर्मण्यता के लिए क्षमा नहीं किया जायेगा। सत्ता में बैठे लोगों को चेतावनी देते हुए सुमनजी कहते हैं कि तुम्हारी अकर्मण्यता से पूरब में उगने वाले सूरज की लालिमा पर कालिख पुत जायेगी। उसकी महत्ता खत्म हो जायेगी और फिर शताब्दियों तक इस प्रकार की उन्नतिशील घड़ियाँ आयें अथवा न आयें, हमें यह भी मालूम नहीं है। इसलिए हमें अपने समय का उचित उपयोग करना चाहिए।
समय परिवर्तनशील है। अतः इसकी परिवर्तनशीलता को देखते हुए प्रगति के प्रवाह को रोकने का प्रयास मत करो। मालूम नहीं कि इस प्रकार की सुखद वायु में साँस लेने का अवसर मिले या न मिले। इसलिए तुम सभी खिड़की और दरवाजों को खोलकर रखो। जीवन की सुखदायी किरणों का प्रकाश प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचने दो। इस आनन्ददायक घड़ियों का उपयोग मात्र धनी वर्ग तक सीमित न रह जाय । तुम्हें ऐसा प्रयास करना चाहिए, जिससे उन किरणों का प्रकाश आमजन के आँगन तक पहुँच सके । नव-निर्माणरूपी महान यज्ञ की ज्वालाओं को मन्द करने का प्रयास मत करो, अपितु उसको अधिक तीव्र जलने दो।
सुमनजी का कहना है कि आज जो चेतना का प्रभात हुआ है, इसके लिए बहुत पुराने समय से संघर्ष होता रहा है। इस नये प्रभात की अरुणाई की पहचान बहुत पुरानी है। आज नवयुग की चेतना-गायत्री, भूलोक, भुवलोक और स्वर्गलोक की समता की प्रतिष्ठा करने का आह्वान कर रही है, इसका गर्मजोशी से स्वागत करो।
काव्यगत सौन्दर्य
• इन पंक्तियों में सुमनजी की प्रगतिवादी भावना की अभिव्यक्ति हुई है।
• भाषा-ओजपूर्ण खड़ी बोली ।
• शैलीभावात्मक, गीत ।
• शब्द शक्ति-लक्षणा तथा व्यंजना
• रस-वीर एवं अद्भुत
In simple words: कवि ने 'युगवाणी' कविता में विभिन्न पद्यांशों के माध्यम से श्रमिक, कृषक और निर्बल वर्ग के महत्त्व, जीवन की नश्वरता, समाज की उपेक्षा और समय के सदुपयोग पर प्रकाश डाला है।

🎯 Exam Tip: इस व्यापक प्रश्न के उत्तर में प्रत्येक पद्यांश का विस्तृत संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या और काव्यगत सौन्दर्य बिंदुवार प्रस्तुत करना आवश्यक है। प्रत्येक भाग में कवि के संदेश को स्पष्ट रूप से उजागर करें।

शिवमंगल सिंह 'सुमन' (स्मरणीय तथ्य)

जन्म - 5 अगस्त, सन् 1915 ई०
मृत्यु - 27 नवम्बर, सन् 2002 ई०
जन्म - स्थान-ग्राम-झगरपुर, जनपद-उन्नाव, उ०प्र०
अध्यापन कार्य - उज्जैन, मध्य प्रदेश
रचनाएँ - मिट्टी की बारात, हिल्लोल, जीवन के गान
पुरस्कार - 1958 - (देव पुरस्कार), 1974-(सोवियत-भूमि नेहरू पुरस्कार), 1974-(साहित्य अकादमी पुरस्कार), 1974–(पद्मश्री), 1993-(शिखर सम्मान), 1993-' भारत भारती' पुरस्कार, 1999–पद्म भूषण ।

 

Question 2. शिवमंगल सिंह 'सुमन' का जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
Answer:

जीवन - परिचय - डॉ० शिवमंगल सिंह 'सुमन' का जन्म 5 अगस्त, सन् 1915 ई० (संवत् 1972 श्रावण मास शुक्ल पक्ष नागपंचमी) को ग्राम झगरपुर, जिला उन्नाव (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। आपके पिता का नाम ठाकुर साहब बख्श सिंह था। परिहार वंश में जन्मे सुमन जी का विवर्द्धन गहरवाड़ वंशीय माता के दूध द्वारा हुआ। उनके पितामह ठाकुर बलराज सिंह जी स्वयं रीवा सेना में कर्नल थे तथा प्रपितामह ठाकुर चन्द्रिका सिंह जी को सन् 1857 ई० की क्रान्ति में सक्रिय भाग लेने एवं वीरगति प्राप्त होने का गौरव प्राप्त था।
सुमन जी ने अधिकांश रूप से रीवा, ग्वालियर आदि स्थानों में रहकर आरम्भिक शिक्षा से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा प्राप्त की है। तत्पश्चात् सन् 1940 ई० में उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से परास्नातक (हिन्दी) की उपाधि प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन् 1942 ई० में उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। सन् 1948 ई० में माधव कॉलेज उज्जैन में हिन्दी विभागाध्यक्ष बने, दो वर्षों के पश्चात् 1950 ई० में उनको 'हिन्दी गीतिकाव्य का उद्भव-विकास और हिन्दी साहित्य में उसकी परम्परा' शोध प्रबन्ध पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने डी० लिट् की उपाधि प्रदान की। आपने सन् 1954-56 तक होल्कर कॉलेज इन्दौर में हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद पर भी सुचारु रूप से कार्य किया। सन् 1956-61 ई० तक नेपाल स्थित भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक और सूचना विभाग का कार्यभार आपको सौंपा गया।
सन् 1961-68 तक माधव कॉलेज उज्जैन में वे प्राचार्य के पद पर कार्य करते रहे। इन आठ वर्षों के बीच सन् 1964 ई० में वे विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में कला संकाय के डीन तथा व्यावसायिक संगठन, शिक्षण समिति एवं प्रबन्धकारिणी सभा के सदस्य भी रहे। सन् 1968-70 ई० तक सुमन जी विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में कुलपति के पद पर आसीन रहे।
डॉ० शिवमंगल सिंह 'सुमन' को सन् 1958 ई० में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उनके काव्य संग्रह 'विश्वास बढ़ता ही गया' पर 'देव' पुरस्कार प्राप्त हुआ। सन् 1964 ई० में 'पर आँखें नहीं भरी' काव्य संग्रह पर 'नवीन' पुरस्कार से सम्मानित किये गये। आपको सन् 1973 ई० में मध्य प्रदेश राजकीय उत्सव में सम्मानित किया गया। जनवरी, सन् 1974 में भारत सरकार द्वारा उन्हें 'पद्मश्री' की उपाधि से विभूषित किया गया। भागलपुर विश्वविद्यालय बिहार द्वारा 20 मई, सन् 1973 ई० को डी०लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। नवम्बर, सन् 1974 ई० को उन्हें 'सोवियत-भूमि नेहरू पुस्कार' प्रदान किया गया। 26 फरवरी, 1973 ई० को 'मिट्टी की बारात' नामक काव्य संग्रह पर 'सुमन जी' को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपने अक्टूबर, सन् 1974 ई० को नागपुर विश्वविद्यालय, महाराष्ट्र में दीक्षान्त भाषण दिया। पुन: 24 अप्रैल, 1977 ई० को राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में पंचम दिनकर स्मृति व्याख्यानमाला के अन्तर्गत भाषण के लिए आपको आमंत्रित किया गया। सन् 1975 ई० में राष्ट्रकुल विश्वविद्यालय परिषद् के लन्दन विश्वविद्यालय स्थित मुख्यालय में कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य के रूप में उनकी नियुक्ति की गई। 17-18 जनवरी, सन् 1977 ई० को भारतीय विश्वविद्यालय परिषद् कोयम्बटूर (तमिलनाडु) में हुए बावनवें वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता की । पुनः 15-16 जनवरी, सन् 1978 ई० को सौराष्ट्र विश्वविद्यालय, राजकोट में भारतीय विश्वविद्यालय परिषद् के तिरपनवें अधिवेशन की अध्यक्षता की। 27 नवम्बर, 2002 ई० को शिवमंगल सिंह 'सुमन' का 87 वर्ष की अवस्था में जनपद उज्जैन (म०प्र०) में निधन हो गया।

रचनाएँ - सुमन जी की रचनाएँ निम्नलिखित हैं
(1) हिल्लोल - यह सुमन जी के प्रेम-गीतों का प्रथम काव्य-संग्रह है। इसमें हृदय की कोमल भावनाओं को चित्रित किया गया है।
(2) जीवन के गान, प्रलय सृजन, विश्वास बढ़ता ही गया - इन सभी संग्रहों की कविताओं में क्रान्तिकारी भावनाएँ व्याप्त हैं। इन कविताओं में पीड़ित मानवता के प्रति सहानुभूति तथा पूँजीवाद के प्रति आक्रोश है।
(3) विन्ध्य हिमालय - इसमें देश-प्रेम तथा राष्ट्रीयता की कविताएँ हैं।
(4) पर आँखें नहीं भरीं - यह प्रेमगीतों का संग्रह है।
(5) मिट्टी की बारात - इस पर सुमन जी को अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ है।
डॉ० 'सुमन' जी प्रगतिवादी कवि के रूप में हमारे समक्ष अपनी काव्य रचनाओं के माध्यम से उपस्थित होते हैं। आपकी कविताओं में दलित, पीड़ित, शोषित एवं वंचित श्रमिक वर्ग को समर्थन किया गया है, साथ ही सामान्य रूप से पूँजीपति वर्ग तथा उनके अत्याचारों का खण्डन भी अपनी रचनाओं के माध्यम से किया है। सामयिक समस्याओं का विवेचन उनकी कविताओं का प्रमुख अंग रहा है। आपकी कविताओं में आस्था और विश्वास का स्वर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। आपने समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं तथा वर्ण जातिगत विषमताओं एवं भाग्यवादी विचारधारा को खण्डन भी किया है।
In simple words: डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' एक प्रमुख प्रगतिवादी कवि थे जिन्होंने अपने जीवनकाल में विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक पदों पर कार्य किया, और उनकी रचनाएँ प्रेम, क्रांति, राष्ट्रप्रेम तथा सामाजिक न्याय पर आधारित हैं, जिनके लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

🎯 Exam Tip: जीवन परिचय लिखते समय जन्म, शिक्षा, प्रमुख कार्य, रचनाएँ और प्राप्त पुरस्कारों का क्रमबद्ध उल्लेख करना तथा भाषा-शैली का संक्षिप्त विवरण देना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. शिवमंगल सिंह 'सुमन' के जीवन-वृत्त एवं भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
Answer:

जीवन - वृत्त: डॉ० शिवमंगल सिंह 'सुमन' का जन्म 5 अगस्त, सन् 1915 ई० को ग्राम झगरपुर, जिला उन्नाव (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से परास्नातक (हिन्दी) और डी० लिट् की उपाधियाँ प्राप्त कीं। उन्होंने माधव कॉलेज, उज्जैन में विभागाध्यक्ष और विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में कुलपति के पदों पर कार्य किया। 27 नवम्बर, 2002 ई० को उनका निधन हो गया। उन्हें 'देव' पुरस्कार, 'सोवियत-भूमि नेहरू पुरस्कार', 'साहित्य अकादमी पुरस्कार', 'पद्मश्री', 'शिखर सम्मान', 'भारत भारती' पुरस्कार और 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया गया था।
भाषा - शैली: सुमन जी की भाषा जनजीवन के समीप सरल तथा व्यावहारिक भाषा है। छायावादी रचनाओं की भाषा अलंकरण, दृढ़ता, अस्पष्टता, वयवीयता आदि आपकी रचनाओं में नहीं है। इसके विपरीत स्पष्टता और सरलता है। जनसाधारण में प्रस्तुत होने वाली भाषा का प्रयोग हुआ है। भाषा में उर्दू शब्दों को पर्याप्त प्रश्रय मिला है।
सुमन जी ने अनेक नये शब्दों का निर्माण भी किया है, जिन्हें हम तीन भागों में बाँट सकते हैं- (क) नवीन-सन्धि, शब्द, (ख) सरल सामाजिक योजना तथा (ग) देशज शब्द । भाषा को प्रभविष्णु बनाने के लिए सुमन जी ने पुनरुक्ति को अपनाया है।
शैली - सुमन जी की शैली में ओज और प्रसाद गुणों की प्रधानता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में लाक्षणिकता का भी प्रयोग किया है। सुमन जी की कविताओं की अभिव्यक्ति सौन्दर्य की एक विशेषता काव्यवाद का निर्वहन भी है। इसके अन्तर्गत जीवन की वर्तमान समस्याओं का पौराणिक घटनाओं से साम्य स्थापित किया है। आपकी कविताओं में प्रतीक विधान भी दर्शनीय है। सुमन जी की कविताओं में अलंकारों की समास योजना नहीं है। अनायास ही जो अलंकार आपकी कविताओं में आ गये हैं, ये भावोत्कर्ष में सहायक हुए हैं।
हिन्दी साहित्य में स्थान - 'सुमन' जी भारतीय माटी की वह गन्ध हैं, जिसमें जीवन रस-आनन्द सर्वत्र महकता रहता है। जिस प्रकार पृथ्वी की अभिव्यक्ति वनस्पतियों द्वारा होती है उसी प्रकार वनस्पतियों के रस से जीवित मानव प्राणी की अभिव्यक्ति उसकी कलात्मकता और वैज्ञानिकता में होती है। 'सुमन' जी भारतीय संस्कृति के अभिव्यक्ता हैं। प्रकृति के रूप, रस, गन्ध आदि के चितेरे भी हैं। जीवन रस की मादकता के गायक हैं। जनसामान्य के दुःख-दर्द से द्रवित होने वाले मानव और परम्परागत गौरव गरिमा के संरक्षक हैं। उनके इन्हीं विशिष्ट रूपों को काव्य में पहचाना गया है। एक युग विशेष की मानसिकता की झाँकी उनके काव्य के गुणों से परिपूर्ण एवं प्रभावशाली है। अंत में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि 'सुमन' जी का हिन्दी साहित्य में अपना एक विशिष्ट स्थान है। वे हिन्दी साहित्य को ऐसी निधि प्रदान कर गये हैं जो कभी भी नष्ट नहीं हो सकती। शरीर तो नश्वर है लेकिन वैचारिक शरीर शाश्वत रूप से जीवित रहता है। सुमन जी अपनी कृतियों के माध्यम से हिन्दी साहित्य के प्रेमियों के मानस पटल पर सदैव नित-नवीन रूप में मुस्कराते रहेंगे ।
In simple words: शिवमंगल सिंह 'सुमन' का जीवन-वृत्त उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों और विभिन्न सम्मानों से भरा है, जबकि उनकी भाषा-शैली सरल, व्यावहारिक, ओजपूर्ण और प्रगतिवादी विचारधारा से ओत-प्रोत है।

🎯 Exam Tip: जीवन-वृत्त में जन्म, शिक्षा, प्रमुख पदों और सम्मानों का उल्लेख करें, जबकि भाषा-शैली में उनकी भाषा की सरलता, उर्दू शब्दों का प्रयोग, तथा शैली के ओज और प्रसाद गुणों को स्पष्ट करें।

 

Question 4. शिवमंगल सिंह 'सुमन' की साहित्यिक विशेषताएँ एवं भाषा-शैली का उल्लेख कीजिए।
Answer:

साहित्यिक विशेषताएँ: डॉ० 'सुमन' जी प्रगतिवादी कवि के रूप में हमारे समक्ष अपनी काव्य रचनाओं के माध्यम से उपस्थित होते हैं। आपकी कविताओं में दलित, पीड़ित, शोषित एवं वंचित श्रमिक वर्ग को समर्थन किया गया है, साथ ही सामान्य रूप से पूँजीपति वर्ग तथा उनके अत्याचारों का खण्डन भी अपनी रचनाओं के माध्यम से किया है। सामयिक समस्याओं का विवेचन उनकी कविताओं का प्रमुख अंग रहा है। आपकी कविताओं में आस्था और विश्वास का स्वर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। आपने समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं तथा वर्ण जातिगत विषमताओं एवं भाग्यवादी विचारधारा को खण्डन भी किया है।
भाषा - शैली: सुमन जी की भाषा जनजीवन के समीप सरल तथा व्यावहारिक भाषा है। छायावादी रचनाओं की भाषा अलंकरण, दृढ़ता, अस्पष्टता, वयवीयता आदि आपकी रचनाओं में नहीं है। इसके विपरीत स्पष्टता और सरलता है। जनसाधारण में प्रस्तुत होने वाली भाषा का प्रयोग हुआ है। भाषा में उर्दू शब्दों को पर्याप्त प्रश्रय मिला है।
सुमन जी ने अनेक नये शब्दों का निर्माण भी किया है, जिन्हें हम तीन भागों में बाँट सकते हैं- (क) नवीन-सन्धि, शब्द, (ख) सरल सामाजिक योजना तथा (ग) देशज शब्द । भाषा को प्रभविष्णु बनाने के लिए सुमन जी ने पुनरुक्ति को अपनाया है।
शैली - सुमन जी की शैली में ओज और प्रसाद गुणों की प्रधानता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में लाक्षणिकता का भी प्रयोग किया है। सुमन जी की कविताओं की अभिव्यक्ति सौन्दर्य की एक विशेषता काव्यवाद का निर्वहन भी है। इसके अन्तर्गत जीवन की वर्तमान समस्याओं का पौराणिक घटनाओं से साम्य स्थापित किया है। आपकी कविताओं में प्रतीक विधान भी दर्शनीय है। सुमन जी की कविताओं में अलंकारों की समास योजना नहीं है। अनायास ही जो अलंकार आपकी कविताओं में आ गये हैं, ये भावोत्कर्ष में सहायक हुए हैं।
In simple words: शिवमंगल सिंह 'सुमन' की साहित्यिक विशेषताएँ प्रगतिवादी विचारधारा, दलित-पीड़ित वर्ग का समर्थन और सामाजिक कुरीतियों का खंडन हैं, जबकि उनकी भाषा-शैली सरल, व्यावहारिक, ओजपूर्ण और जनसामान्य के लिए सुबोधगम्य है।

🎯 Exam Tip: साहित्यिक विशेषताओं में कवि की विचारधारा, प्रमुख विषय-वस्तु और सामाजिक सरोकारों पर ध्यान केंद्रित करें, जबकि भाषा-शैली में भाषा की प्रकृति, उर्दू शब्दों के प्रयोग और शैलीगत गुणों का वर्णन करें।

 

Question 5. शिवमंगल सिंह 'सुमन' का जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्यिक योगदान का उल्लेख कीजिए ।
Answer:

जीवन - परिचय: डॉ० शिवमंगल सिंह 'सुमन' का जन्म 5 अगस्त, सन् 1915 ई० को ग्राम झगरपुर, जिला उन्नाव (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। आपके पिता का नाम ठाकुर साहब बख्श सिंह था। परिहार वंश में जन्मे सुमन जी का विवर्द्धन गहरवाड़ वंशीय माता के दूध द्वारा हुआ। उनके पितामह ठाकुर बलराज सिंह जी स्वयं रीवा सेना में कर्नल थे तथा प्रपितामह ठाकुर चन्द्रिका सिंह जी को सन् 1857 ई० की क्रान्ति में सक्रिय भाग लेने एवं वीरगति प्राप्त होने का गौरव प्राप्त था।
सुमन जी ने अधिकांश रूप से रीवा, ग्वालियर आदि स्थानों में रहकर आरम्भिक शिक्षा से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा प्राप्त की है। तत्पश्चात् सन् 1940 ई० में उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से परास्नातक (हिन्दी) की उपाधि प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन् 1942 ई० में उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। सन् 1948 ई० में माधव कॉलेज उज्जैन में हिन्दी विभागाध्यक्ष बने, दो वर्षों के पश्चात् 1950 ई० में उनको 'हिन्दी गीतिकाव्य का उद्भव-विकास और हिन्दी साहित्य में उसकी परम्परा' शोध प्रबन्ध पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने डी० लिट् की उपाधि प्रदान की। आपने सन् 1954-56 तक होल्कर कॉलेज इन्दौर में हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद पर भी सुचारु रूप से कार्य किया। सन् 1956-61 ई० तक नेपाल स्थित भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक और सूचना विभाग का कार्यभार आपको सौंपा गया।
सन् 1961-68 तक माधव कॉलेज उज्जैन में वे प्राचार्य के पद पर कार्य करते रहे। इन आठ वर्षों के बीच सन् 1964 ई० में वे विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में कला संकाय के डीन तथा व्यावसायिक संगठन, शिक्षण समिति एवं प्रबन्धकारिणी सभा के सदस्य भी रहे। सन् 1968-70 ई० तक सुमन जी विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में कुलपति के पद पर आसीन रहे।
डॉ० शिवमंगल सिंह 'सुमन' को सन् 1958 ई० में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उनके काव्य संग्रह 'विश्वास बढ़ता ही गया' पर 'देव' पुरस्कार प्राप्त हुआ। सन् 1964 ई० में 'पर आँखें नहीं भरी' काव्य संग्रह पर 'नवीन' पुरस्कार से सम्मानित किये गये। आपको सन् 1973 ई० में मध्य प्रदेश राजकीय उत्सव में सम्मानित किया गया। जनवरी, सन् 1974 में भारत सरकार द्वारा उन्हें 'पद्मश्री' की उपाधि से विभूषित किया गया। भागलपुर विश्वविद्यालय बिहार द्वारा 20 मई, सन् 1973 ई० को डी०लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। नवम्बर, सन् 1974 ई० को उन्हें 'सोवियत-भूमि नेहरू पुस्कार' प्रदान किया गया। 26 फरवरी, 1973 ई० को 'मिट्टी की बारात' नामक काव्य संग्रह पर 'सुमन जी' को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपने अक्टूबर, सन् 1974 ई० को नागपुर विश्वविद्यालय, महाराष्ट्र में दीक्षान्त भाषण दिया। पुन: 24 अप्रैल, 1977 ई० को राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में पंचम दिनकर स्मृति व्याख्यानमाला के अन्तर्गत भाषण के लिए आपको आमंत्रित किया गया। सन् 1975 ई० में राष्ट्रकुल विश्वविद्यालय परिषद् के लन्दन विश्वविद्यालय स्थित मुख्यालय में कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य के रूप में उनकी नियुक्ति की गई। 17-18 जनवरी, सन् 1977 ई० को भारतीय विश्वविद्यालय परिषद् कोयम्बटूर (तमिलनाडु) में हुए बावनवें वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता की । पुनः 15-16 जनवरी, सन् 1978 ई० को सौराष्ट्र विश्वविद्यालय, राजकोट में भारतीय विश्वविद्यालय परिषद् के तिरपनवें अधिवेशन की अध्यक्षता की। 27 नवम्बर, 2002 ई० को शिवमंगल सिंह 'सुमन' का 87 वर्ष की अवस्था में जनपद उज्जैन (म०प्र०) में निधन हो गया।

साहित्यिक योगदान: डॉ० 'सुमन' जी प्रगतिवादी कवि के रूप में हमारे समक्ष अपनी काव्य रचनाओं के माध्यम से उपस्थित होते हैं। आपकी कविताओं में दलित, पीड़ित, शोषित एवं वंचित श्रमिक वर्ग को समर्थन किया गया है, साथ ही सामान्य रूप से पूँजीपति वर्ग तथा उनके अत्याचारों का खण्डन भी अपनी रचनाओं के माध्यम से किया है। सामयिक समस्याओं का विवेचन उनकी कविताओं का प्रमुख अंग रहा है। आपकी कविताओं में आस्था और विश्वास का स्वर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। आपने समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं तथा वर्ण जातिगत विषमताओं एवं भाग्यवादी विचारधारा को खण्डन भी किया है। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- हिल्लोल, जीवन के गान, प्रलय सृजन, विश्वास बढ़ता ही गया, विन्ध्य हिमालय, पर आँखें नहीं भरीं, मिट्टी की बारात आदि।
In simple words: शिवमंगल सिंह 'सुमन' का जीवन शैक्षणिक और सम्मानों से भरा रहा, और उनका साहित्यिक योगदान प्रगतिवादी विचारधारा, सामाजिक न्याय व शोषितों के समर्थन पर केंद्रित उनकी कविताओं में परिलक्षित होता है।

🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय और साहित्यिक योगदान को स्पष्ट करते हुए कवि के जन्म, शिक्षा, महत्वपूर्ण पदों, प्रमुख रचनाओं और उनकी कविताओं के मूल संदेश को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. 'युगवाणी' कविता के माध्यम से कवि क्या सन्देश देना चाहता है?
Answer: प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि ने मानवता के कल्याण की कामना की है तथा यह आग्रह किया है कि राष्ट्र के विकास का कार्य अवरुद्ध नहीं होना चाहिए अर्थात् राष्ट्र के विकास के लिए हमें निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए।
In simple words: कवि 'युगवाणी' के माध्यम से मानवता के कल्याण और राष्ट्र के अविरल विकास के लिए निरंतर प्रयास का संदेश देना चाहता है।

🎯 Exam Tip: कवि के संदेश को स्पष्ट और संक्षिप्त भाषा में लिखें, जिसमें कविता का मुख्य विषय शामिल हो।

 

Question 2. 'युगवाणी' कविता की भाषागत विशेषताएँ लिखिए।'
Answer: 'सुमन' जी की भाषा जनजीवन के समीप सरल तथा व्यावहारिक भाषा है। छायावादी रचनाओं की भाषा अलंकरण, दृढ़ता, अस्पष्टता आदि आपकी रचनाओं में नहीं है। इसके विपरीत स्पष्टता और सरलता है । 'युगवाणी' कविता में जनसाधारण में प्रस्तुत होने वाली भाषा का प्रयोग हुआ है। भाषा में उर्दू शब्दों को पर्याप्त प्रश्रय मिला है। सुमनजी ने अनेक नये शब्दों का निर्माण भी किया है, जिन्हें हम तीन भागों में बाँट सकते हैं—
• नवीन सन्धि शब्द
• सरल सामाजिक योजना
• देशज शब्द भाषा को प्रभविष्णु बनाने के लिए सुमनजी ने पुनरुक्ति को अपनाया है।
In simple words: 'युगवाणी' कविता की भाषा सरल, व्यावहारिक, सीधी और जनसाधारण के लिए सुगम है, जिसमें उर्दू शब्दों का प्रयोग और नए शब्दों का निर्माण भी देखा जा सकता है।

🎯 Exam Tip: भाषागत विशेषताओं में भाषा की सरलता, उर्दू शब्दों का प्रभाव और नए शब्दों के निर्माण जैसे बिंदुओं को स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 3. शिवमंगल सिंह 'सुमन' द्वारा रचित 'युगवाणी' कविता का सारांश संक्षेप में लिखिए ।
Answer: कवि श्रमिक एवं कृषक वर्ग को सम्बोधित करते हुए कहता है कि मैंने क्यारी-क्यारी में तुम्हारे ही पदचिह्नों के दर्शन किये हैं। तुमने परिश्रमपूर्वक जो क्यारियाँ बोयी थीं, उन पर बढ़ती हुई फसल में आज भी तुम्हारे श्रमशील कदम झाँकते दिखाई दे रहे हैं । विकास का यही नियम है, जगह-जगह मुस्कान बिखर जाती है। इतना कठिन परिश्रम करने पर भी सर्वहारा वर्ग परेशान है। कवि शासक एवं पूँजीपति वर्ग को चेतावनी देता है कि यदि तुम असहायों की मूल समस्या का समाधान करने की अपेक्षा इनके साथ खिलवाड़ करोगे तो तुम्हें समय कभी माफ नहीं करेगा। तुम्हारा अस्तित्व स्वयं खतरे में पड़ जायेगा।
In simple words: 'युगवाणी' कविता श्रमिकों और कृषकों के कठिन परिश्रम को रेखांकित करती है, शासक वर्ग को चेतावनी देती है कि निर्धन वर्ग की उपेक्षा करने पर उन्हें इतिहास माफ नहीं करेगा, और सामाजिक न्याय की आवश्यकता पर बल देती है।

🎯 Exam Tip: सारांश लिखते समय कविता के मुख्य विचारों और कवि द्वारा दिए गए संदेश को संक्षेप में प्रस्तुत करें।

 

Question 4. कवि ने प्रस्तुत कविता के माध्यम से किन वास्तविकताओं के प्रति आगाह किया है?
Answer: कवि ने कविता के माध्यम से स्पष्ट किया है कि शासक वर्ग दीन-दुखियों की उपेक्षा कर रहा है और उन पर प्रहार कर रहा है। आज के युग में श्रमिक वर्ग शोषित एवं परेशान है।
In simple words: कवि ने इस कविता के माध्यम से शासक वर्ग द्वारा दीन-दुखियों की उपेक्षा और श्रमिक वर्ग के शोषण जैसी सामाजिक वास्तविकताओं के प्रति सचेत किया है।

🎯 Exam Tip: वास्तविकताओं का उल्लेख करते समय कवि द्वारा उठाए गए प्रमुख सामाजिक मुद्दों और उनके प्रति चेतावनी को स्पष्ट करें।

 

Question 5. 'युगवाणी' कविता में कवि ने शासकों को क्या परामर्श दिया है?
Answer: कवि शासक एवं पूँजीपति वर्ग को चेतावनी देता है कि यदि तुम असहायों की मूल समस्या का समाधान करने की अपेक्षा इनके साथ खिलवाड़ करोगे तो ठीक नहीं होगा। बहुत समय बीत गया, निर्धन को आशारूपी अफीम खिला-खिलाकर अब भी सुला देना चाहते हो । याद रखना, मानवीय संवेदनाओं की जो फसल हमने बोयी-जोती है, यदि वह नष्ट हो गयी तो तुम अकेले रह जाओगे और यदि संसार श्मशान बन गया तो तुम उसमें रहकर अकेले गीत गाओगे?
In simple words: कवि शासकों को परामर्श देता है कि वे असहायों की समस्याओं का समाधान करें, शोषण बंद करें, और मानवीय संवेदनाओं का सम्मान करें, अन्यथा उन्हें गंभीर परिणामों का सामना करना होगा।

🎯 Exam Tip: कवि द्वारा दिए गए परामर्श को चेतावनी के रूप में प्रस्तुत करें, जिसमें उनके निष्क्रियता के संभावित परिणामों का उल्लेख हो।

 

Question 6. “युगवाणी' कविता में कवि ने किसके इतिहास को माफ न करने को कहा है?
Answer: कवि ने शासक एवं पूँजीपति वर्ग के इतिहास को कभी न माफ करने की बात कही है क्योंकि शासक एवं पूँजीपति वर्ग श्रमिकों का शोषण करते हैं।
In simple words: कवि ने शासक और पूँजीपति वर्ग के उस इतिहास को माफ न करने को कहा है, जिसमें उन्होंने श्रमिकों का शोषण किया है।

🎯 Exam Tip: प्रश्न के मूल उत्तर पर ध्यान केंद्रित करें और सीधे तौर पर बताएं कि कवि किसे माफ न करने की बात कर रहा है और क्यों।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. शिवमंगल सिंह 'सुमन' किस काल के कवि हैं?
Answer: शिवमंगल सिंह 'सुमन' आधुनिक काल (प्रगतिवादी युग) के कवि हैं।
In simple words: शिवमंगल सिंह 'सुमन' आधुनिक काल के प्रगतिवादी युग के कवि हैं।

🎯 Exam Tip: कवि का काल और युग स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 2. शिवमंगल सिंह 'सुमन' किस धारा के कवि हैं?
Answer: शिवमंगल सिंह 'सुमन' प्रगतिवादी धारा के कवि हैं।
In simple words: शिवमंगल सिंह 'सुमन' प्रगतिवादी धारा के प्रमुख कवि हैं।

🎯 Exam Tip: कवि की साहित्यिक धारा का नाम सही-सही उल्लेख करें।

 

Question 3. शिवमंगल सिंह 'सुमन' की रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
Answer: 'सुमन' जी की चर्चित रचनाएँ हैं-हिल्लोल, जीवन के गान, प्रलय सृजन, विश्वास बढ़ता ही गया, विन्ध्य हिमालय, पर आँखें नहीं भरी, मिट्टी की बारात आदि ।
In simple words: 'हिल्लोल', 'जीवन के गान', 'प्रलय सृजन', 'विश्वास बढ़ता ही गया', 'विन्ध्य हिमालय', 'पर आँखें नहीं भरी', और 'मिट्टी की बारात' शिवमंगल सिंह 'सुमन' की प्रमुख रचनाएँ हैं।

🎯 Exam Tip: प्रमुख रचनाओं के नाम सही और पूरे लिखें।

 

Question 4. शिवमंगल सिंह 'सुमन' की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।
Answer: 'सुमन' जी की भाषा जनजीवन के समीप सरल तथा व्यावहारिक भाषा है । 'सुमन' जी की शैली में ओज और प्रसाद गुणों की प्रधानता है।
In simple words: शिवमंगल सिंह 'सुमन' की भाषा सरल और व्यावहारिक है, जबकि उनकी शैली में ओज और प्रसाद गुण प्रमुख हैं।

🎯 Exam Tip: भाषा की सरलता और शैली के प्रमुख गुणों (ओज, प्रसाद) पर विशेष ध्यान दें।

 

Question 5. 'युगवाणी' कविता का तात्पर्य बताइए ।
Answer: युगवाणी कविता का तात्पर्य है-समयाधारित विचार। समय की माँग है कि राष्ट्र का विकास अनवरत गति से किया जाये ताकि मानवता का कल्याण हो।
In simple words: 'युगवाणी' कविता का अर्थ है समयानुकूल विचार, जो राष्ट्र के निरंतर विकास और मानवता के कल्याण की आवश्यकता पर बल देती है।

🎯 Exam Tip: कविता के शीर्षक के गहरे अर्थ और उसके मुख्य संदेश को संक्षेप में स्पष्ट करें।

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

 

निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए

 

(क) तन का, मन को पावन नाता कैसे तोड़ें?
Answer: कवि ने जीवन और मृत्यु की यथार्थता को रेखांकित करने का प्रयास किया है। भाषा-खड़ी बोली, शब्द शक्तिलक्षणी, शैली-गीत एवं रस-शान्त
In simple words: यह पंक्ति जीवन और मृत्यु के गहरे संबंध को दर्शाती है, जिसकी काव्यगत सौंदर्य खड़ी बोली, लक्षणा शक्ति और शांत रस में निहित है।

🎯 Exam Tip: पंक्ति के भावार्थ के साथ-साथ भाषा, शब्द शक्ति, शैली और रस का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

(ख) इतिहास न तुमको माफ करेगी याद रहे।
Answer: श्रमिक के अभ्युत्थान के लिए कवि ने चेतावनी दी है। भाषा-खड़ी बोली, शब्द शक्ति-लक्षणा, शैली-भावात्मक, गीत एवं रस-रौद्र
In simple words: यह पंक्ति शासक वर्ग को चेतावनी है कि श्रमिकों की उपेक्षा करने पर इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा, जिसका काव्यगत सौंदर्य खड़ी बोली, लक्षणा शक्ति और रौद्र रस में निहित है।

🎯 Exam Tip: यहाँ कवि की चेतावनी के मूल भाव को स्पष्ट करें और उसके साथ काव्यगत तत्वों का विवरण दें।

 

(ग) नव-निर्माण की लपटों को मत मन्द करो।
Answer: यहाँ कवि की प्रगतिवादी भावना व्यक्त हुई है। शब्दशक्ति-लक्षणा तथा व्यंजना, शैली-भावात्मक, गीत अलंकारअनुप्रास एवं भाषा-ओजपूर्ण खड़ी बोली ।
In simple words: इस पंक्ति में कवि नव-निर्माण की प्रगतिवादी भावना को उजागर करते हुए उसे मंद न करने का आह्वान करता है, जिसमें लक्षणा और व्यंजना शब्दशक्ति, भावात्मक शैली और अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।

🎯 Exam Tip: कवि की प्रगतिवादी सोच को केंद्र में रखते हुए शब्द शक्ति, शैली, अलंकार और भाषा के गुणों को समझाएँ।

 

(घ) विश्वास सर्वहारा का तुमने खोया तो आसन्न मौत की गहन गोंस गड़ जायेगी ।
Answer: श्रमिक के अभ्युत्थान के लिए कवि ने चेतावनी दी है। भाषा-खड़ी बोली, शब्द शक्ति-लक्षणा, अलंकार-गहन गोंस गड़ में अनुप्रास अलंकार।।
In simple words: यह पंक्ति श्रमिक वर्ग का विश्वास खोने पर आसन्न विनाश की चेतावनी देती है, जिसमें खड़ी बोली, लक्षणा शब्दशक्ति और अनुप्रास अलंकार का प्रभावी प्रयोग है।

🎯 Exam Tip: चेतावनी के स्वर को पहचानें और श्रमिक वर्ग के विश्वास के महत्व को दर्शाते हुए काव्यगत सौंदर्य का विश्लेषण करें।

 

2. निम्नलिखित शब्द-युग्मों से विशेषण-विशेष्य अलग कीजिए

विशेषणविशेष्य
पदचिह्न
धर्मध्वजा
दुःखदर्द

In simple words: यह प्रश्न दिए गए शब्द-युग्मों में से विशेषण (जो विशेषता बताए) और विशेष्य (जिसकी विशेषता बताई जाए) को अलग करने के लिए है।

🎯 Exam Tip: विशेषण वह शब्द होता है जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताता है, जबकि विशेष्य वह संज्ञा या सर्वनाम होता है जिसकी विशेषता बताई जाती है।

 

1. शिवमंगल सिंह 'सुमन' को प्रगतिवादी कवि कहा जाता है, ऐसे प्रगतिवादी कवियों की सूची बनाइए ।
Answer:

प्रगतिवादी कवि
• सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
• बाबा नागार्जुन
• शिवमंगल सिंह 'सुमन'
• केदारनाथ अग्रवाल
• नरेन्द्र शर्मा
• भगवतीचरण वर्मा
• रामविलास शर्मा
In simple words: प्रगतिवादी कवि वे होते हैं जो समाज के पिछड़े और शोषित वर्ग की आवाज उठाते हैं और सामाजिक असमानताओं पर प्रहार करते हैं, जैसे सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' और बाबा नागार्जुन।

🎯 Exam Tip: प्रगतिवादी कवियों के नामों को सही-सही याद रखें और उनके योगदान को संक्षेप में समझें।

 

2. शिवमंगल सिंह 'सुमन' के पुरस्कारों की सूची बनाइए ।
Answer:

पुरस्कार (वर्ष)
1. देव पुरस्कार (1958)
2. सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार (1974)
3. साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974)
4. पद्मश्री (1974)
5. शिखर सम्मान (1993)
6. भारत भारती पुरस्कार (1993)
7. पद्म भूषण (1999)
In simple words: शिवमंगल सिंह 'सुमन' को उनके साहित्यिक योगदान के लिए 'देव पुरस्कार', 'साहित्य अकादमी पुरस्कार', 'पद्मश्री' और 'पद्म भूषण' सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया था।

🎯 Exam Tip: कवि को प्राप्त सभी महत्वपूर्ण पुरस्कारों के नाम और उनके वर्ष (यदि संभव हो) सही ढंग से सूचीबद्ध करें।

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