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Detailed Chapter 11 दूत वाक्यम UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi
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Class 12 Sahityik Hindi Chapter 11 दूत वाक्यम UP Board Solutions PDF
गद्यांशों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद
गद्यांश 1.
काञ्चुकीयः-भो भो; प्रतीहाराधिकृताः ! महाराजो दुर्योधनः समाज्ञापयति- अद्य सर्वैः पार्थिवैः सह मन्त्रयितुम् इच्छामि! तदाहूयन्तां सर्वे राजानः इति । (परिक्रम्य अवलोक्य) अये! अयं महाराजो दुर्योधनः इत एवाभिवर्तते । (ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टो दुर्योधनः)
काञ्चुकीयः-जयतु महाराजः! महाराजशासनात् समानीत सर्व राजमण्डलम्।
दुर्योधनः-सम्यक कृतम् ! प्रविश त्वम् अवरोधम्।
काञ्चुकीयः-यदाज्ञापयति महाराजः । (निष्क्रान्तः, पुनः प्रविश्य)
काञ्चुकीयः-जयतु महाराजः एष खलु पाण्डवस्कन्धावारात् दौत्येनागतः पुरुषोत्तमः नारायणः ।।
दुर्योधनः मा तावद् भोः बादरायण! किं किं कंसभृत्यो दामोदरस्तय नारायणः । स गोपालकस्तव पुरुषोत्तमः ब्रार्हद्रथापहृतविजयकीर्तिभोगः तव पुरुषोत्तमः ।
अहो! पार्थिवासन्नमाश्रितस्य भृत्यजनस्य समुदाचारः । क एष दूतः प्राप्तः।
सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत दिग्दर्शिका' के 'दूतवाक्यम्' नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद
कांचुकीय-हे पहरेदारों! महाराज दुर्योधन आज्ञा देते हैं, “मैं आज सभी राजाओं के साथ मन्त्रणा (विचार-विमर्श करना चाहता हूँ, इसलिए सभी राजाओं को बुलाओ।” (घूमकर देखते हुए) “अरे! ये महाराज दुर्योधन तो इधर ही आ रहे हैं।” (तब जैसा कि निर्दिष्ट किया गया, दुर्योधन प्रवेश करता है)
कांचुकीय-महाराज की जय हो । महाराज की आज्ञा के अनुसार सम्पूर्ण राजमण्डल को बुला लिया गया है।
दुर्योधन-अच्छा किया । तुम रनिवास में जाओ ।
कांचुकीय-जैसी आज्ञा महाराज । (निकलकर पुनः प्रवेश करता है)
कांघुकीय-महाराज की जय हो । निश्चय ही पाण्डव शिविर से दूतरूप में पुरुषोत्तम नारायण श्रीकृष्ण पधारे हैं।।
गद्यांश 2.
भो भोः राजानः !
दौत्येनागतस्य केशवस्य किं युक्तम् । किमाहुर्भवन्तः 'अर्घ्यप्रदानेन पूजयितव्यः केशवः' इति । न में रोचते । ग्रहणे अत्र अस्य हितं पश्यामि ।
अपि च योऽत्र केशवस्य प्रत्युत्थास्यति स मया द्वादशसुवर्णभारेण दण्ड्यः
तदप्रमत्ता भवन्तु भवन्तः । कोऽत्र भोः ।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद हे राजाओ ! दूतरूप में आए केशव के लिए क्या उचित है? आप लोगों का क्या कहना है? अर्घ्य अर्पित कर केशव को पूजना चाहिए। मुझे यह नहीं भाता। यहीं उसे पकड़ लेने (बन्दी बना लेने) में ही मुझे हित दिखता है। और, जो भी यहाँ केशव की ओर से खड़ा होगा, उसे मैं बारह स्वर्ण मुद्राओं से दण्डित करूँगा। अतः आप सब सावधान रहें । अरे! यहाँ कौन है?
गद्यांश 3
काञ्चुकीयः अथ किम् अथ किम् । प्रवेष्टुमर्हति पदमनाभः ।
वासुदेव (प्रविश्य स्वगतम्) कथं कथं मां दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः सर्वे क्षत्रियाः । (प्रकाशम्) अलमले सम्भ्रमेण, स्वैरमासतां भवन्तः।
दुर्योधनः कथं कथं केशवं दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः सर्वे क्षत्रियाः । अलम् अलम् सम्भमेण । स्मरणीयः पूर्वमाश्रावितो दण्डः । ननु अहम् आज्ञप्ता ।
वासुदेवः-भोः सुयोधन! कि भणसि ।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद
कांचुकीय-निश्चय ही, निश्चय ही । श्रीकृष्ण! आप प्रवेश के अधिकारी हैं।
वासुदेव (प्रवेश करके मन-ही-मन में क्यों, मुझे देखकर सभी क्षत्रिय क्यों घबराए हुए हैं? (प्रकट रूप में) घबराएँ नहीं, आप सब निश्चिन्त होकर बैठें।
दुर्योधन-क्या, क्या, सभी क्षत्रिय केशव को देखकर घबरा उठे हैं। मत घबराएँ। पूर्व में सुनाए गए दण्ड को स्मरण रखें। निःसन्देह, मैं माझा देने वाला हैं।
वासुदेव हे दुर्योधन! क्या कहते हो?
गद्यांश 4
वासुदेवः-भोः सुयोधन! किं न जानासि अर्जुनस्य पराक्रमम् ।
दुर्योधनः न जानामि ।
वासुदेवः-भोः श्रूयताम्, एकेनैव अर्जुनेन तदा विराटनगरे भीमादयो निर्जिताः । अपि च चित्रसेनेन नभस्तलं नीयमानस्त्वं फाल्गुनेनैव मोचितः ।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।।
अनुवाद
वासुदेव-हे दुर्योधन! क्या अर्जुन के पराक्रम को नहीं जानते?
दुर्योधन-नहीं जानता ।
वासुदेव-हे दुर्योधन सुनो! विराट्नगर में अर्जुन ने अकेले ही भीष्म आदि को जीता था तथा अर्जुन ने ही तुम्हें आकाश में ले जाते हुए चित्रसेन से छुड़ाया था।
गद्यांश 5
वासुदेवः-भोः कुरुकुलकलङ्कभूत!
दुर्योधनः-भोः गोपालक!
वासुदेवः-भोः सुयोधन ! ननु क्षिपसि माम् ।।
दुर्योधनः आः अनात्मज्ञस्त्वम् । अहं कथयामि यद् भवविधैः सह न भाषे ।
वासुदेवःभोः शठ! त्वदर्थात् अयं कुरुवंशः अचिरान्नाशमेष्यति । भो भो राजानः! गच्छामस्तावत्।।
दुर्योधनः कथं यास्यति किल केशवः । भोः दुःशासन! दूतसमुदाचारमतिक्रान्तः केशवः बध्यताम् । मातुल! बध्यतामयं केशवः । कथं पराङ्मुखः पतति । भवतु अहमेव पाशैर्बध्नामि (उपसर्पति) ।।
वासुदेवः कथं बद्धकामो मां किल सुयोधनः । भवतु, सुयोधनस्य सामर्थ्य पश्यामि (विश्वरूपमास्थितः) ।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद
वासुदेव-है कुरुवंश के कलंक!
दुर्योधन-हे ग्वाले! वासुदेव-है दुर्योधन! मुझ पर आक्षेप करते हो।
दुर्योधन-अरे, तू स्वयं से अनभिज्ञ है। मैं कह देता हूँ कि तुझ जैसों से मैं नहीं बोलता ।
वासुदेव-हे मूर्ख! तेरे कारण यह कुरुवंश शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। हे, हे राजाओ! हम जाते हैं।
दुर्योधन-केशव भला कैसे चला जाएगा। हे दुःशासन! दूत की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले केशव को बाँध दो। मामा! इस केशव को बाँध दो। अरे आप उल्टे मुँह क्यों गिर रहे हैं? अच्छा, इसे मैं ही बन्धन से बाँधता हूँ (समीप जाता है)।
वासुदेव-क्या, दुर्योधन मुझे बाँधना चाहता है? अच्छा, देखें दुर्योधन की सामर्थ्य (विरारूप धारण करते हैं।
गद्यांश 6
आः तिष्ठ इदानीम्। कथं न दृष्टः केशवः? अहो क्लस्यत्वं केशवस्य । आः तिष्ठ इदानीम् कथं न दृष्टः केशवः ! अहो दीर्घत्वं केशवस्या कथं न दृष्टः केशवः! अयं केशवः । कथं सर्वत्र शालायां कैशवा एव केशवाः दृश्यन्ते! किम् इदानीं करिष्ये! भवतु, दृष्टम् । भो राजानः! एकेन एकः केशवः बध्यताम्। कथं स्वयमेव पाशैर्बद्धाः पतन्ति राजानः । (निष्क्रान्ताः सर्वे) ।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।।
अनुवाद अरे! अब ठहर! क्यों नहीं दिख रहा कैशव? अरे ! केशव की सूक्ष्मता! अरे! अब ठहर । केशव क्यों नहीं दिख रहा? अरे! केशव की विशालता। क्यों नहीं दिख रहा केशव? यह है केशव! क्या इस सभा में सर्वत्र केशव-ही-केशव दिख रहा है? अब मैं क्या करूं? अच्छा, समझा है राजाओं! (आप में से) प्रत्येक एक केशव को बाँधे । क्या बन्धन में बँधे राजागण स्वयं ही गिर रहे हैं! (सभी निकलते हैं)
श्लोकों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद
श्लोक 1
ग्रहणमुपगते तु वासुदेवे हृतनयना इव पाण्डवा भवेयुः । गतिमतिरहितेषु पाण्डवेषु, क्षितिरखिलापि भवेन्ममासपत्ना।।
सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक 'संस्कृत दिग्दर्शिका' के 'दूतवाक्यम् पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद वासुदेव को बन्दी बना लेने से पाण्डव नेत्रहीन हो जाएँगे। पाण्डवों के गतिविहीन एवं मतिविहीन हो जाने पर मेरे लिए सम्पूर्ण पृथ्वी शत्रु-रहित हो जाएगी।
श्लोक 2
प्राप्तः किलाद्य वचनादिह पाण्डवानां दौत्येन भृत्य इव कृष्णमतिः स कृष्णः। श्रोतुं सखे! त्वमपि सज्जय कर्ण कर्णी नारीमृदूनि वचनानि युधिष्ठिरस्य ।।।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।।
अनुवाद निश्चय ही पाण्डवों के कहने पर कुटिल बुद्धि वाला कृष्ण आज दूत रूप में सेवक सदृश यहीं आया है। हे कर्ण युद्धितिर के नारी के सदृश कोमल वचन सुनने के लिए तुम भी अपने कानों को तैयार कर लो।।
श्लोक 3
दुष्टवादी गुणद्वेषी शठः स्वजननिर्दयः।।
सुयोधनो हि मां दृष्ट्वा नैव कार्य करिष्यति ।।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।।
अनुवाद बुरे वचन बोलने वाला, गुणों से द्वेष रखने वाला, दुष्ट और स्वजनों के प्रति निर्दयीं दुर्योधन मुझे देखकर कार्य नहीं करेगा।
श्लोक 4
अनुभूतं मददुःखं सम्पूर्णः सुम्यः स च ।
अस्माकपि धर्म्य यद् दायाचं तद् विभज्यताम्।।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।।
अनुवाद वासुदेव सब कुशलतापूर्वक हैं। आपके राज्य की कुशलता और शरीर के स्वास्थ्य को पूछकर निवेदन करते हैं हमने अत्यधिक कष्ट भोग लिया है। अब वह शर्त भी पूरी हो गई है। अतः धर्म के अनुसार जो भी देने योग्य हो, वह बाँट दीजिए ।
श्लोक 5
राज्यं नाम नृपात्मजैस्सहृदयैर्जित्वा रिपून् भुज्यते ।
तल्लोके न तु याच्यते न च पुनर्दीना वा दीयते।।
काङ्क्षा चेन्नृपतित्वमाप्तुमचिरात् कुर्वन्तु ते साहसम् ।।
स्वैरं वा प्रविशन्तु शान्तमतिभिर्जुण्टं शुमायाश्रमत्।।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद सह्दय राजकुमारों के द्वारा राज्य तो शत्रुओं को जीतकर भौगा जाता है। वह न तो लोक (संसार) में माँगा जाता है तथा न ही किसी निर्धन व्यक्ति को प्रदान किया जाता है। यदि उन्हें (पाण्डवों को) राज़ पाने की चाह हो तो साहस करें, अन्यथा शान्ति हेतु शान्त चित्त वाले तपस्वियों से युक्त आश्रम में प्रवेश करें ।
श्लोक 6
कर्तव्यो भ्रातृषु स्नेहो विस्मर्तव्या गुणेतराः।।
सम्बन्धो बन्धुभिः श्रेयान् लोकयोरुभयोरपि ।।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद भाइयों से स्नेह करना कर्तव्य है। उनके अवगुणों को भुला देना चाहिए। भाइयों से मेल-मिलाप रखना दोनों ही लोकों में मंगलकारी होता है।
श्लोक 7
दातुमर्हसि मद्वाक्याद् राज्यार्द्ध धृतराष्ट्रज ।
अन्यथा सागरान्तां ग हरिष्यन्ति हि पाण्डवाः।।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद हे धृतराष्ट्रकुमार! तुम्हें मेरे कथन के अनुसार राज्य का आधा भाग दे देना चाहिए अन्यथा पाण्डव (निश्चय ही) समुद्र के अन्त तक की धरती तुमसे छीन लेंगे ।
श्लोक 8
प्रहरति यदि युद्धे मारुतो भीमरूपी
प्रहरति यदि साक्षात्पर्थरूपेण शक्रः ।।
परुषवचनदक्ष! त्वद्वचोभिर्न दास्ये
तृणमपि पितृभुक्ते वीर्यगुप्ते स्वराज्ये ।।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद कटुवचन बोलने में दक्ष हे कृष्ण! यदि युद्ध में स्वयं वायु देव भी भीम रूप में प्रहार करें तथा साक्षात् इन्द्र भी अर्जुन रूप में प्रहार करें, तो भी मैं तुम्हारे कहने से पिता द्वारा भोगे गए, पराक्रम से संरक्षित अपने राज्य का तिनका भी नहीं दूंगा।।
श्लोक 9
सृञ्जसि यदि सुमन्ताद् देवमायाः स्वमायाः
प्रहरसि यदि वा त्वं दुर्निवारैस्सुरास्त्रैः ।
हयगजवृषभाणां पातनाज्जादपों ।
नरपतिगणमध्ये बध्यसे त्वं मुयाद्य ।।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।।
अनुवाद यदि तुम चारों ओर अपनी देवमाया रच दो, यदि तुम अबाध दिव्यास्त्रों से प्रहार करो, घोड़े, हाथियों एवं बैलों को मारने से उत्पन्न घमण्ड वाले, आज मैं इन राजाओं के मध्य तुम्हें बॉधूंगा ।
प्रश्न - उत्तर
प्रश्न-पत्र में संस्कृत दिग्दर्शिका के पाठों (गद्य व पद्य) से चार अतिलघु उत्तरीय प्रश्न दिए जाएंगे, जिनमें से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में लिखने होंगे, प्रत्येक प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।
Question 1. पाण्डवदूतः कः आसीत्
Answer: पाण्डवदूतः श्रीकृष्णः आसीत् ।
In simple words: The messenger of the Pandavas was Shri Krishna.
🎯 Exam Tip: This is a direct factual question, requiring recall of the main characters and their roles. Ensure accurate Sanskrit spelling for full marks.
Question 2. श्रीकृष्ण कस्य समीपे दौत्येन गतः? अथवा श्रीकृष्णः दूतरूपेण कुत्र गतः?
Answer: श्रीकृष्णः दुर्योधनस्य समीपे दौत्येन गतः ।
In simple words: Shri Krishna went to Duryodhana as a messenger.
🎯 Exam Tip: This question tests your knowledge of the central event in the chapter. Remembering the destination and purpose of the messenger is key.
Question 3. वासुदेव कस्य दौत्येन कुत्र गतः?
Answer: वासुदेव युधिष्ठिरस्य दौत्येन दुर्योधनस्य समीपे गतः
In simple words: Vasudeva went to Duryodhana as Yudhishthira's messenger.
🎯 Exam Tip: Be precise about who sent the messenger and who received him to avoid confusion between characters.
Question 4. दुर्योधनः कर्ण किम् अवोचत्?
Answer: दुर्योधनः कर्णम् अवोचत् सखे कर्ण! त्वमपि युधिष्ठिरस्य नारीमृदूनि वचनानि श्रोतुं कणों सज्जय ।
In simple words: Duryodhana told Karna to prepare his ears to hear Yudhishthira's soft, feminine words.
🎯 Exam Tip: This answer reveals Duryodhana's disdain for Yudhishthira's peaceful overtures. Understanding the context of the dialogue is crucial.
Question 5. दुर्योधनः श्रीकृष्णं किम् अपृच्छत् ?
Answer: दुर्योधनः श्रीकृष्णं अपृच्छत् यत् तस्थ भ्रातरः अपि कुशलिनः ?
In simple words: Duryodhana asked Shri Krishna if his brothers (the Pandavas) were well.
🎯 Exam Tip: This simple greeting question can often be overlooked. Pay attention to the initial courtesies or lack thereof between characters.
Question 6. दुर्योधनः कस्य पुत्रः आसीत्?
Answer: दुर्योधनः धृतराष्ट्रस्य पुत्रः आसीत् ।
In simple words: Duryodhana was the son of Dhritarashtra.
🎯 Exam Tip: Basic character identification like lineage is fundamental. Ensure you know the key relationships within the epic story.
Question 7. कः पाण्डवः दूतः अभवत्
Answer: श्रीकृष्णः पाण्डवः दूतः अभवत् ।।
In simple words: Shri Krishna became the messenger for the Pandavas.
🎯 Exam Tip: This question reiterates the primary messenger's role. Consistent recall of this fact is important for understanding the chapter's core theme.
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