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Step-by-Step UP Board Solutions: Class 12 Sahityik Hindi सामाजिक निबंध
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सामाजिक निबंध Answers & Solutions for Class 12 Sahityik Hindi (UP Board)
Question 1. बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ
Answer: संकेत बिन्दु प्रस्तावना, अभियान की आवश्यकता, कन्या भ्रूण-हत्या के कारण, अभियान का लक्ष्य, उपसंहार प्रस्तावना “मैं माताओं से पूछना चाहता हूँ कि बेटी नहीं पैदा होगी तो बहू कहाँ से लाओगी? हम जो चाहते हैं समाज भी वही चाहता है। हम चाहते हैं कि बहू. पढ़ी-लिखी मिले लेकिन बेटियों को पढ़ाने के लिए तैयार नहीं होते। आखिर यह दोहरापन कब तक चलेगा? यदि हम बेटी को पढ़ा नहीं सकते तो शिक्षित बहू की उम्मीद करना बेईमानी है। जिस धरती पर मानवता का सन्देश दिया गया हो, वहाँ बेटियों की हत्या दुःख देती है। यह अल्ताफ हुसैन हाली की धरती है। हाली ने कहा था, “माओं, बहनों, बेटियों दुनिया की जन्नत तुमसे है। ये उद्गार हैं भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के जो 22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत शहर से 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' अभियान की शुरूआत कर चुके हैं। यह अभियान केन्द्र सरकार के महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रमों में से एक है।
अभियान की आवश्यकता अब प्रश्न उठता है कि इस अभियान की जरूरत क्यों पड़ी? जाहिर है इसके पीछे कन्या भ्रूण-हत्या के कारण देश में तेजी से घटता लिंगानुपात है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या मात्र 940 है। 0-6 वर्ष के आयु वर्ग का लिंगानुपात तो केवल 914 ही है। इस आयु वर्ग में सर्वाधिक चिंताजनक स्थिति हरियाणा (830), पंजाब (846), जम्मू-कश्मीर (859), राजस्थान (888), चण्डीगढ़ (867) और राजधानी दिल्ली (866) की है। संयुक्त राष्ट्र संघ की माने तो भारत में अनुमानित तौर पर प्रतिदिन 2000 अजन्मी कन्याओं की हत्या कर दी जाती है।
कन्या भ्रूण-हत्या के कारण भारतीय संस्कृति में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' कहकर स्त्रियों की महत्ता बताई गई है, परन्तु वर्तमान समय में भारत के लोग इसे भूल चुके हैं। पुत्र को पुत्री की अपेक्षा श्रेष्ठ समझना तथा पुत्री को बोझ मानते हुए उसकी उपेक्षा करने की मानसिकता की परिणति यह हुई है कि पुत्री को पैदा होते ही मार दिया जाता है। आधुनिक दौर में तो चिकित्सा के क्षेत्र में हुई तकनीकी उन्नति ने तो इस कार्य को और भी सरल बना दिया है अर्थात् अब गर्भ में कन्या भ्रूण होने की स्थिति में उसे प्रसव पूर्व ही मार दिया जाता है। यह हमारे पितृसत्तात्मक समाज का कटु सत्य है कि स्त्री को केवल एक 'वस्तु' समझा जाता है। और एक मनुष्य के रूप में उसे सदा कम करके आँको जाता है। आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक कार्यों में उसकी उपयोगिता नहीं के बराबर समझी जाती है। माता-पिता पुत्र को अपनी सत्ति के रूप में देखते हैं, परन्तु पुत्री उनके लिए बोझ होती है। यही कारण है कि भारत में कन्या भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति हावी है।
कन्या भ्रूण-हत्या से समाज में लिंग अनुपात में असन्तुलन उत्पन्न हो गया है। पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में तो अविवाहित युवकों की संख्या बहुत बढ़ गई है। इन राज्यों में विवाह के लिए लड़कियाँ दूसरे राज्यों से लाई जाने लगी हैं। सुनने में तो यह भी आया है कि हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में तो लड़कियों की कमी के कारण एक ही स्त्री से एक से अधिक पुरुष विवाह कर रहे हैं।
अभियान का लक्ष्य समाज से कन्या भ्रूण हत्या की कुप्रवृत्ति को मिटाने के लिए केन्द्र सरकार ने 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' अभियान की शुरूआत की है। इस कार्यक्रम के तहत भारत सरकार ने लड़कियों को बचाने, उनकी सुरक्षा करने और उन्हें शिक्षित करने के लिए निम्न बाल लिंगानुपात वाले 100 जिलों में इस कुरीति को समाप्त करने का लक्ष्य रखा है। यह कार्यक्रम महिला एवं बाल विकास मन्त्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय और मानव संसाधन विकास मन्त्रालय की संयुक्त पहल है।
लिंगानुपात को सन्तुलित करने के लिए अब तक कई सरकारी अभियान चलाए जा चुके हैं, परन्तु उनके कोई उत्साहजनक परिणाम सामने नहीं आए हैं। वास्तव में, | सत्य तो यह है कि इस सन्दर्भ में सरकार तब तक विशेष कुछ नहीं कर सकती है जब तक समाज अपनी मानसिकता न बदले। जब तक हम और आप ही बेटियों के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, तब तक एक सन्तुलित समाज की संरचना असम्भव है। बेटियाँ समाज, परिवार और देश का गौरव होती हैं और इतिहास साक्षी है कि उन्होंने बार-बार इस बात को सत्य सिद्ध किया है। अतः हमें कन्या-भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति को त्यागकर बेटियों को उनका अधिकार देना होगा।
हर लड़ाई जीत कर दिखाऊँगी। मैं अग्नि में जलकर भी जी जाऊँगी चन्द लोगों की पुकार सुन ली। मेरी पुकार न सुनी मैं बोझ नहीं भविष्य हैं। बेटा नहीं पर बेटी हूँ”
In simple words: यह निबंध 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' अभियान के महत्व पर प्रकाश डालता है, जो कन्या भ्रूण-हत्या और गिरते लिंगानुपात जैसी समस्याओं को दूर करने तथा बेटियों को शिक्षित व सशक्त बनाने का प्रयास करता है। यह समाज की मानसिकता बदलने और बेटियों को उनका अधिकार दिलाने की आवश्यकता पर जोर देता है।
🎯 Exam Tip: इस निबंध में अभियान की पृष्ठभूमि, आवश्यकता, लक्ष्य और कन्या भ्रूण-हत्या के कारणों का स्पष्ट उल्लेख महत्वपूर्ण है। समाज पर इसके प्रभाव और समाधानों पर ध्यान दें।
Question 2. जो चढ़ गए राष्ट्रवेदी पर
Answer: प्रस्वावना “जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।” मैथिलीशरण गुप्त की इन काव्य पंक्तियों का अर्थ यह है कि देश-प्रेम के अभाव में मनुष्य जीवित प्राणी नहीं, बल्कि पत्थर के ही समान कहा जाएगा। हम जिस देश या समाज में जन्म लेते हैं, उसकी उन्नति में समुचित सहयोग देना हमारा परम् कर्तव्य बनता है। स्वदेश के प्रति यही कर्तव्य-भावना, इसके प्रति प्रेम अर्थात् | स्वदेश-प्रेम ही देशभक्ति का मूल स्रोत है।
कोई भी देश साधारण एवं निष्ण भूमि का केवल ऐसा टुकड़ा नहीं होता, जिसे मानचित्र द्वारा दर्शाया जाता हैं। देश का निर्माण उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले लोगों एवं उनके सांस्कृतिक पहलुओं से होता है। लोग अपनी पृथक् सांस्कृतिक पहचान एवं अपने जीवन-मूल्यों को बनाए रखने के लिए ही अपने देश की सीमाओं से बँधकर इसके लिए अपने प्राण न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं। यही कारण है कि देश-प्रेम की भावना देश की उन्नति का परिचायक होती है।
स्वदेश प्रेमः एक उच्च भावना वास्तव में देश-प्रेम की भावना मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ भावना है। इसके सामने किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत लाभ का कोई महत्त्व नहीं होता। यह एक ऐसा पवित्र व सात्विक भाव है, जो मनुष्य को निरन्तर त्याग की प्रेरणा देता है, इसलिए कहा गया है-"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। मानव की हार्दिक अभिलाषा रहती है कि जिस देश में उसका जन्म हुआ, जहाँ के अन्न-जल से उसके शरीर का पोषण हुआ एवं जहाँ के लोगों ने उसे अपना प्रेम एवं सहयोग देकर उसके व्यक्तित्व को निखारा, उसके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन वह सदा करता रहे। यही कारण है। कि मनुष्य जहाँ रहता है, अनेक कठिनाइयों के बावजूद उसके प्रति उसका मोह कभी खत्म नहीं होता, जैसा कि कवि रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी कविता में कहा है। विषुवत् रेखा का वासी जो जीता है नित हाँफ-हॉफ कर, रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर । हिमवासी जो हिम में तम में जी लेता है कॉप-कापकर, वह भी अपनी मातृभूमि पर कर देता है प्राण निछावर ।”
स्वदेश प्रेम की अभिव्यक्ति के प्रकार स्वदेश प्रेम यद्यपि मन की एक भावना है, तथापि इसकी अभिव्यक्ति हमारे क्रिया-कलापों से हो जाती है। देश-प्रेम से ओत-प्रोत व्यक्ति सदा अपने देश के प्रति कर्त्तव्यों के पालन हेतु न केवल तत्पर रहता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसके लिए अपने प्राण न्यौछावर करने से भी पीछे नहीं हटता। 'सच्चा देशभक्त आवश्यकता पड़ने पर अपना तन, मन, धन सब कुछ देश को समर्पित कर देता हैं।
यह स्मरण रहे कि स्वदेश प्रेम को किसी विशेष क्षेत्र एवं सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। हमारे जिस कार्य से देश की उन्नति हो, वही स्वदेश प्रेम की सीमा में आता है। अपने प्रजातन्त्रात्मक देश में, हम अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए ईमानदार एवं देशभक्त जनप्रतिनिधि का चयन कर देश को जाति, सम्प्रदाय तथा प्रान्तीयता की राजनीति से मुक्त कर इसके विकास में सहयोग कर सकते हैं। जाति प्रथा. दहेज प्रथा. अन्धविश्वास, हुआछूत इत्यादि कुरीतियाँ देश के विकास में बाधक हैं। हम इन्हें दूर करने में अपना योगदान कर देश-सेवा का फल प्राप्त कर सकते हैं। अशिक्षा, निर्धनता, बेरोजगारी, व्याभिचार एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़कर हम अपने देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकते हैं। हम समय पर टैक्स का भुगतान कर देश की प्रगति में सहायक हो सकते हैं। इस तरह किसान, मजदूर, शिक्षक, सरकारी कर्मचारी, चिकित्सक, सैनिक और अन्य सभी पेशेवर लोगों के साथ साथ देश के हर नागरिक द्वारा अपने कर्तव्यों का समुचित रूप से पालन करना भी देशभक्ति ही है।
उपसंहार नागरिकों में स्वदेश प्रेम का अभाव राष्ट्रीय एकता में सबसे बड़ी बाधा के रूप में कार्य करता है, जबकि राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति तथा सुव्यवस्था और बाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न भिन्न हो गए, तो हमारी पारस्परिक फूट को देखकर अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा एवं राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है और राष्ट्रीय एकता बनाए रखना तब ही सम्भव है, जब हम देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे।
In simple words: यह निबंध देशप्रेम के महत्व को समझाता है, जिसे मनुष्य की सर्वोच्च भावना माना गया है। इसमें बताया गया है कि सच्चा देशप्रेम न केवल अपने देश की उन्नति में योगदान देने, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपने प्राण न्यौछावर करने से भी पीछे नहीं हटता।
🎯 Exam Tip: देशप्रेम की परिभाषा, इसकी अभिव्यक्ति के विभिन्न प्रकारों और राष्ट्रीय एकता में इसके योगदान का वर्णन करना महत्वपूर्ण है। निबंध में दिए गए काव्य उद्धरणों का उल्लेख अवश्य करें।
Question 3. नारी जीवन का सामजिक स्वरूप
Answer: प्रस्तावना नारी ब्रह्म विद्या है, श्रद्धा है, आदि शक्ति है, सद्गुणों की खान है। और वह सब कुछ है, जो इस प्रकट विश्व में सर्वश्रेष्ठ के रूप में दृष्टिगोचर होता है। नारी वह सनातन शक्ति है, जो अनादि काल से उन सामाजिक दायित्वों का वहन करती आ रही है, जिन्हें पुरुषों का कैंधा सँभाल नहीं पाता। माता के रूप में नारी ममता, करुणा, वात्सल्य, सहदयता जैसे सद्गुणों से युक्त है। 'महादेवी वर्मा के शब्दों में-"स्त्री में माँ का रूप ही सत्य, वात्सल्य ही शिव और ममता ही सुन्दर हैं।" समाज में नारी की स्थिति किसी भी राष्ट्र के निर्माण में उस राष्ट्र की आधी आबादी (स्त्री) की भूमिका की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता। आधी आबादी यदि किसी भी कारण से निष्क्रिय रहती है, तो उस राष्ट्र या समाज की समुचित एवं उल्लेखनीय प्रगति के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन भारतीय समाज में उत्तर वैदिककाल से ही महिलाओं की स्थिति निम्न होती गई और मध्यकाल तक आते-आते समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों ने स्त्रियों की स्थिति ओर भी निम्न स्तर की हो गई है।
समाज सुधार में नारी का योगदान आधुनिकता के आगमन एवं शिक्षा के प्रसार ने महिलाओं की स्थिति में सुधार लाना प्रारम्भ किया, जिसका परिणाम राष्ट्र की समुचित प्रगति के पथ पर उनका निरन्तर अग्रसर होने के रूप में सामने है। आधुनिक युग में स्वाधीनता संग्राम के दौरान रानी लक्ष्मीबाई, विजयालक्ष्मी पण्डित, अरुणा आसफ़ अली, सरोजिनी नायडू, कमला नेहरू, सुचेता कृपलानी, मणिबेन पटेल, अमृत कौर जैसी स्त्रियों ने आगे बढ़कर पूरी क्षमता एवं उत्साह के साथ देश सेवा के कार्यों में भाग लिया। भारत के उत्थान हेतु समर्पित विदेशी नारियों में ऐनी बेसेण्ट, मैडम कामा, सिस्टर निवेदिता आदि से भी यहाँ की नारियों को अत्यधिक प्रेरणा मिली।
राजनैतिक व्यवस्था में नारी का योगदान स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भारतीय स्त्रियों ने सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था में अपनी स्थिति को निरन्तर सुदढ़ किया। 'श्रीमती विजयालक्ष्मी पण्डित' विश्व की पहली महिला थी, जो संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा की अध्यक्षा बनीं। सरोजिनी नायडू स्वतन्त्र भारत में पहली महिला राज्यपाल थी, जबकि सुचेता कृपलानी प्रथम मुख्यमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी द्वारा राष्ट्र को दिए जाने वाले योगदान को भला कौन भूल सकता है, जो लम्बे समय तक भारत की प्रधानमन्त्री रहीं।
विभिन्न क्षेत्रों में नारी का योगदान चिकित्सा का क्षेत्र हो या इंजीनियरिंग का, सिविल सेवा का क्षेत्र हो या बैंक का, पुलिस हो या फौज, विज्ञान हो या व्यवसाय प्रत्येक क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर स्त्रियाँ आज सम्मान के साथ आसीन हैं। किरण बेदी, कल्पना चावला, मीरा नायर, मीरा कुमार, सोनिया गाँधी, सुषमा स्वराज, बहेन्द्री पाल, सन्तोष यादव, सानिया मिर्जा, सायना नेहवाल, पी.टी. ऊषा, कर्णम मल्लेश्वरी, लता मंगेशकर आदि की क्षमता एवं प्रदर्शन को भुलाया नहीं जा सकता। आज नारियाँ पुरुषों के साथ कंधे-से-कैंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं और देश को आगे बढ़ा रही हैं।
राष्ट्र निर्माण में नारी का योगदान राष्ट्र के निर्माण में स्त्रियों का सबसे बड़ा योगदान घर एवं परिवार को सँभालने के रूप में हमेशा रहा है। किसी भी समाज में श्रम विभाजन के अन्तर्गत कुछ सदस्यों का घर एवं बच्चों को संभालना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दायित्व हैं। अधिकांश स्त्रियाँ इस दायित्व का निर्वाह बखूबी करती रही हैं। घर को सँभालने के लिए जिसे कुशलता एवं क्षमता की आवश्यकता होती है, उसका पुरुषों के पास सामान्यतया अभाव होता है, इसलिए स्त्रियों का शिक्षित होना अनिवार्य है। यदि स्त्री शिक्षित नहीं होगी, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकती। एक शिक्षित स्त्री पूरे परिवार को शिक्षित बना देती है।
नारी की महत्ता हमारे यहाँ शास्त्रों में 'मनु महाराज ने कहा है कि 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवताओं का वास होता है और हम मानते हैं कि देवता कार्यसिद्धि में सहायक होते हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि जिस समाज में नारी विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है, वहीं प्रगति की सम्भावनाएँ अत्यधिक बढ़ जाती हैं। हाँ, बी. आर. अम्बेडकर ने भी कहा था- “मैं किसी समुदाय का विकास महिलाओं द्वारा की गई प्रगति से मापता हूँ।” निःसन्देह घर-गृहस्थी का निर्माण हो या राष्ट्र का निर्माण, नारी के योगदान के बिना कोई भी निर्माण पूर्ण नहीं हो सकता। वह माता, बहन, पत्नी, पुत्री एवं मित्र रूपी विविध स्वरूपों में पुरुषों के जीवन के साथ अत्यन्त आत्मिक रूप से सम्बन्धित है। कवि गोपालदास "नीरज' ने मानव जीवन में नारी की महत्ता को इन शब्दों में अभिव्यक्त किया है । “अर्ध सत्य तुम, अर्ध स्वप्न तुम, अर्ध निराशा आशा अर्ध अजित-जित, अर्ध तृप्ति तुम, अर्ध अतृप्ति-पिपासा, आधी काया आग तुम्हारी, आधी काया पानी, अर्धागिनी नारी! तुम जीवन की आधी परिभाषा ।”
नारी समाज का अभिन्न अंग वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में कुल लगभग 40 करोड़ कार्यशील व्यक्ति हैं, जिनमें 12.5 करोड़ से अधिक महिलाएँ हैं। भारत की कुल जनसंख्या में लगभग 39 कार्यशील जनसंख्या है, जिसमें लगभग एक-चौथाई महिलाएँ हैं। कृषि प्रधान देश भारतवर्ष में कृषि कार्य में सक्रिय भूमिका निभाती हुई स्त्रियाँ प्रारम्भ से ही अर्थव्यवस्था का आधार रही है, लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की आर्थिक गतिविधियों को हमेशा से ही उचित रूप से मूल्यांकित नहीं किया गया। महिलाओं के मामलों में संवैधानिक गारण्टी और वास्तविकता के बीच विरोधाभास है।
यद्यपि महिलाओं ने अनेक क्षेत्रों में प्रगति की है, परन्तु उन्हें अभी बहुत कुछ करना शेष है। लिग अनुपात को सन्तुलित किया जाना और सभी आयु-समूहों में महिलाओं की जीवन-शैली में सुधार किया जाना अत्यावश्यक है। आज भी अधिकांश भारतीय नारियों आर्थिक दृष्टि से पुरुषों पर आश्रित बनी हुई हैं। सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं नैतिक दृष्टि से भी उसकी परिस्थिति पुरुषों के समान नहीं है।
उपसंहार भारत में अदालती कानून की अपेक्षा प्रथागत कानूनों को भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। अतः सिर्फ कानूनी प्रावधान ही महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि लोगों की मनोवृत्ति में परिवनि लाने की भी आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की भी है कि भारतीय समाज महिलाओं को उनका उपयुक्त स्थान दिलाने के लिए कटिबद्ध हो। उनकी मेधा एवं ऊर्जा का भरपूर उपयोग हो तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनके साथ समानता का व्यवहार हो, जिससे उन्हें अपने विकास का पूरा अवसर प्राप्त हो सके, क्योंकि ऐसी स्थिति में ही भारतीय समाज में स्त्रियों का योगदान अधिकतम हो सकता है।
In simple words: यह निबंध नारी के सामाजिक स्वरूप और समाज में उसकी भूमिका पर प्रकाश डालता है। यह बताता है कि नारी आदिकाल से ही महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करती आई है, लेकिन मध्यकाल में उसकी स्थिति बिगड़ी। आधुनिक युग में शिक्षा के माध्यम से नारी के योगदान और सशक्तिकरण की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
🎯 Exam Tip: नारी की ऐतिहासिक स्थिति, विभिन्न क्षेत्रों में उसके योगदान, और वर्तमान चुनौतियों का उल्लेख महत्वपूर्ण है। शिक्षा के महत्व और लैंगिक समानता की आवश्यकता पर तार्किक बिंदु प्रस्तुत करें।
Question 4. नशाबन्दी
Answer: प्रस्तावना आज समाज में अनेक विसंगतियाँ व्याप्त हो चुकी हैं, जिनमें से नशाखोरी अर्थात् मादक पदार्थों का सेवन प्रमुख विसंगति दृष्टिगत है। मानव का जीवन दो विपरीत ध्रुवों के बीच गतिमान रहता है। सुख और दुःख, लाभ और हानि, यश और अपयश तथा जीवन और मृत्यु ये कभी अलग न होने वाले दो किनारे हैं।
सुख के समय में आनन्द और उल्लास, हँसी और कोलाहल जीवन में छा जाते हैं, तो दुख में मनुष्य निराश होकर रूदन करता है। नैराश्य के क्षणों में बोझ और दुःख को भुलाने के लिए वह उन मादक द्रव्यों का सहारा लेता है, जो उसे दुःखों की स्मृति से दूर बहा ले जाते हैं। ये मादक द्रव्य ही नशा कहे जाते हैं। मादक द्रव्यों को लेने के लिए आज केवल असफलता और निराशा हो कारण नहीं बने हैं, अपितु रोमांच, पाश्चात्य दुनिया की नकल और नशे का व्यापार करने वाले लोगों की लालची प्रवृत्ति भी इसमें मुख्य सहायक होती है।।
नशाखोरी अर्थात् मादक पदार्थों के सेवन से तात्पर्य नशाखोरी से तात्पर्य है, नशीले पदार्थों का सेवन करना; जैसे- तम्बाकू, गुटखा, पान मसाला खाना तथा शराब आदि पीना मादक पदार्थों का सेवन करना कहलाता है। नशीले पदार्थ वे मादक और उत्तेजक पदार्च होते हैं, जिनका प्रयोग करने से व्यक्ति अपनी स्मृति और संवेदनशीलता अस्थायी रूप में खो देता हैं। नशीले पदार्थ स्नायु तन्त्र को प्रभावित करते हैं और इससे व्यक्ति उचित-अनुचित, भले-बुरे की चेतना खो देता है। उसके अंग-प्रत्यंग शिथिल हो जाते हैं, वाणी लड़खड़ाने लगती है, शरीर में कम्पन होने लगता है। आँखें असामान्य हो नशा किए हुए व्यक्ति को सहजता से पहचाना जाता है। नशीले पदार्थों में आज तम्बाकू भी माना जाता है, क्योंकि इससे शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। लेकिन विशेष रूप से जो नशा आज के युग में व्याप्त है, उसमें चरस, गांजा, भांग, अफीम, स्मैक, हेरोइन जैसी ड्रग्स उल्लेखनीय हैं। शराब भी इसी प्रकार का जहर है, जो आज भी सबसे अधिक प्रचलित है।
विभिन नशीले पदार्थों के सेवन के प्रमुख कारण सुल्फा, गांजा, भांग, धतूरा, अफीम स्मैक, हेरोइन जैसी अनेक मादक (नशीली) वस्तुएँ तथा शराब जैसे नशीले पदार्थों का प्रचलन तो समाज में बहुत पहले से ही था, लेकिन आधुनिक युग में पाश्चात्य संस्कृति से नशे को नए रूप मिले हैं। मारफिन, हेरोइन तथा कोकीन जैसे संवेदी मादक पदार्थ इनके उदाहरण हैं। इस नशे के व्यवसाय के पीछे आज अनेक राष्ट्रों की सरकार का सीधा सम्बन्ध होता है, जिनमें बड़े-बड़े अधिकारी वर्ग भी सम्मिलित होते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर फैले नशे के व्यवसायियों का जाल बहुत ही संगठित होता है। पाश्चात्य देशों में 'हिप्पी वर्ग' का उदय इस नशे के सेवन करने वाले लोगों के रूप में हुआ है। आज के भौतिकवादी जीवन में नशाखोरी के अनेक कारण हैं।
मादक पदार्थों के सेवन अर्थात् नशे के दुष्प्रभाव नशीले पदार्थों का शरीर पर ही नहीं अपितु सामाजिक, आर्थिक एवं पारिवारिक जीवन पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। जैसे कि शराब की लत पारिवारिक, शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक सभी स्तरों पर अपना कु-प्रभाव दिखाती हैं। इससे व्यक्ति के स्नायु संस्थान प्रभावित होते हैं, निर्णय और नियन्त्रण शक्ति कमजोर होती हैं। आमाशय, लीवर और हृदय प्रभावित होते हैं। कुछ लोग शराब पीकर ड्राइविंग करते हैं, जो अत्यन्त हानिकारक है। नशे की लत के कारण लोग बच्चों की परवरिश और शिक्षा का उचित प्रबन्ध नहीं कर पाते हैं। नशे के कारण लज्जा को त्यागकर अनैतिक और असामाजिक कर्मों की ओर भी उन्मुख होते हैं। संवेदी मादक पदार्थ हृदय, मस्तिष्क, श्रवण शक्ति, स्नायु, आँख आदि पर अपना प्रभाव दिखाते हैं और संवेदन क्षमता को अस्थायी रूप में मंद तथा विकृत कर देते हैं। एक बार इस नशे की लत पड़ने पर वे निरूतर इसमें धंसते चले जाते हैं और इसकी माँग बढ़ती ही चली जाती है।
इस माँग को पूरा करने के लिए वह अपराधी कार्यों में भी भाग लेने लगता हैं। अनेक घर और परिवार इस भयावह नशे से उजड़ गए हैं और कई युवक जीवन से ही हाथ धो बैठते हैं। इन युवकों का प्रयोग अनेक असामाजिक संगठन भी करते हैं। आज के आतंकवाद फैलाने में, विनाशकारी हथियारों की खरीदारी में भी इनका हाथ रहता है। बड़े पैमाने पर ये हत्याएँ, लूट-पाट, आगजनी तथा दंगे-फसाद करवाकर राष्ट्र की एकता के लिए गम्भीर चुनौती उत्पन्न करते हैं।
नशा मुक्ति के उपाय इन दुष्प्रवृत्ति को रोकने के लिए सरकार और जनता दोनों को सक्रिय सहयोग ही सफल हो सकता है। सरकार में भ्रष्ट लोगों और अधिकारियों, जो इस अपराध में भागीदार होते हैं, को यदि कड़ी सजा दी जाए, तो जनता के लिए यह एक उदाहरण और भय का कारण बन जाएगा। बड़े से बड़े गिरोह और व्यापारियों को भी कड़े दण्ड दिए जाने आवश्यक हैं। कठोर कानून बनाना और कठोरता से उनका पालन करना भी नितान्त आवश्यक हैं। दोषी व्यक्ति को किसी भी रूप में चाहे वह कोई भी हो, क्षमा नहीं करना चाहिए। संचार माध्यम, टी.वी., सिनेमा, पत्र-पत्रिकाएँ आदि भी इसके प्रति जनमत तैयार कर सकते हैं और लोगों की मानसिकता बदल सकते हैं। इसके लिए अनेक समाज सेवी संस्थाएँ, जो सरकार और गैर-सरकारी रूप में कार्य करती हैं, महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। इस नशे में प्रवृत्त लोगों को, सहानुभूति और प्यार के द्वारा ही सही धीरे-धीरे रास्ते पर लाया जा सकता है। उनकी मनः स्थिति को बदलना और उन्हें सबल बनाकर तथा नशा विरोधी केन्द्रों में उनकी चिकित्सा करवाकर उन्हें नया जीवन दिया जा सकता है।
उपसंहार भारत जैसे विकासशील देशों में इस प्रकार की प्रवृत्ति देशघाती होती है। और इससे युवाशक्ति को रचनात्मक कार्यों के प्रति प्रोत्साहित करना कठिन हो जाता है। अतः परिवार, देश और समाज सभी के सहयोग से ऐसे दिशाहीन युवकों को सुमार्ग पर लाया जा सकता है। इसके लिए विद्यालयों में इस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए, ताकि इस आत्मघाती प्रवृत्ति से युवा पीढ़ी को परिचित कराया जाए और इसके विनाश को सम्मुख रखकर उन्हें इससे दूर रहने के लिए * प्रेरित किया जा सके। व्यक्ति, समाज, सरकार और अधिकारियों के सहयोग से ही यह सम्भव हो सकता हैं।
In simple words: यह निबंध नशाखोरी की समस्या, उसके कारणों, दुष्प्रभावों और नशा मुक्ति के उपायों पर केंद्रित है। यह बताता है कि नशाखोरी व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित करती है, और इसे रोकने के लिए सरकार व समाज दोनों के सक्रिय सहयोग की आवश्यकता है।
🎯 Exam Tip: नशाखोरी की परिभाषा, उसके व्यापक कारणों (सामाजिक, मनोवैज्ञानिक), शरीर और समाज पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का विस्तृत वर्णन करें। नशा मुक्ति के लिए सुझाए गए सरकारी और सामुदायिक प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 5. समाज में विधवाओं की समस्या
Answer: संकेत बिन्दु भूमिका, भारत में विधवाओं की स्थिति, विधवाओं की सामाजिक-आर्थिक समस्याएं, सरकार व समाज की जिम्मेदारी, उपसंहार । भूमिका 23 जून को विश्व विधवा दिवस का आयोजन किया जाता है। यह दिवस विश्व की उन करोड़ों विधवाओं के गरीबी और अन्याय के पोषक कारणों को दूर करने की दिशा में साझा प्रयास का द्योतक है। 23 जून के इस अवसर पर विश्व के कई लोग यह मानते हैं कि विधवा होने के बाद भी सामाजिक व आर्थिक चुनौतियाँ विकासशील तथा अल्पविकसित देशों में एक अदृश्य आपदा सरीखी स्थिति का निर्माण करती हैं।
भारत में विधवाओं की स्थिति 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में भी लगभग 5.6 करोड़ महिलाएँ वैधव्य का जीवन व्यतीत कर रही हैं। माना जाता है कि, भारत में औसत आयु प्रत्याशा में वृद्धि, इसका एक प्रमुख कारण है तथा आमतौर पर विवाह के दौरान स्त्री पुरुष में 4-5 वर्ष का अन्तराल होता है। अतः इस कारण से भी विधवाओं की संख्या में वृद्धि हो रही है। भारत में यह संख्या दक्षिण भारतीय राज्यों में तलनात्मक रूप से ज्यादा है, जिन्होंने मृत्यु दर को कम करने में अच्छी सफलता पाई है।
आज भारत के कई गाँवों में जीवन यापन कर रही विधवा महिलाएँ सामाजिक एवं आर्थिक मोर्चे पर जूझ रही हैं, जो इनकी स्थिति का चित्र खींचती पंक्तियाँ हैं। जिन्दगी की शतरंज पर हर मोहरे से पिट जाएगी वो? हाय कैसी ये दुर्गति ये कैसा अभिशाप है। हाय रे विधवा गरीबी ही तेरा श्राप है'....
विधवाओं की सामाजिक-आर्थिक समस्याएँ सामाजिक क्रियाकलापों में उनकी सहभागिता एक विवाहित महिला की सहभागिता से भिन्न होती है। विधवा महिला को विवाहित महिला की अपेक्षा सामाजिक व धार्मिक कार्यक्रमों के कई सारे अनुष्ठानों से वंचित रहना पड़ता हैं, विधवा होने के कारण उनके सम्मान में भी कमी आती है, क्योंकि दुर्भाग्य है कि कई गाँवों में जीवित पति के सम्मान से महिला का सम्मान जोड़ा जाता है।
विधवा होने की मार आर्थिक मोर्चे पर भी पड़ती है, यहाँ परिवार की रोजी-रोटी | चलाने की मुख्य जिम्मेदारी उन्हीं पर आ जाती हैं। ऐसे में आश्रितों की संख्या ज्यादा होने से उन्हें कृषक, खेतिहर मजदूर या मजदूर के रूप में दीर्घावधि समय तक काम करना पड़ता है। पुरुष के न होने के कारण सरकार प्रदत्त कई सामाजिक योजनाओं जनधन, पेंशन आदि के लिए गाँव से 5-6 किमी पैदल जाने में उन्हें बहुत समस्या आती है। नतीजतन कई बार तो वे इन सबसे वंचित भी रहती हैं। ये महिलाएँ प्राकृतिक संसाधनों; जैसे-जल, जंगल आदि पर भी अपने अधिकारों से वंचित रहती हैं।
ऐसे में आश्चर्य नहीं कि कई विधवा महिलाएँ मन्दिरों की सीड़ियों के किनारे बैठ हाथ पसारे दिनभर भीख माँगती हैं और उसी से अपना पेट भरती हैं। इसके बाद नई सुबह से फिर जिन्दगी जीने के लिए जद्दोजहद शुरू हो जाती है। आमदनी का दूसरा माध्यम सरकार द्वारा दी जा रही हैं 2000 की पेंशन के रूप में है, लेकिन इसका लाभ न के बराबर महिलाओं को मिल पता हैं।
इन विधवाओं को आश्रमों में सुबह-शाम कीर्तन करने के बदले में भी कुछ खाने को मिल जाता है।
सरकार व समाज की जिम्मेदारी गरीबी, बुढापा व विधवापन का दुःख किसी भी जीते जागते इनसान को तोड़ने के लिए बहुत है, ऐसे में परिवार व समाज की जिम्मेदारी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विधवाओं की समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया जाए। सरकारी योजनाओं में उनके हितों का ध्यान रखने हेतु ग्राम पंचायतों को विशेष रूप से स्वास्थ्य, पेयजल, बैंकिंग, पेंशन आदि सेवाएँ समय पर उनके दरवाजे पर उपलब्ध हों।
नियमित स्वास्थ्य चेकअप, राशन व्यवस्था में वृद्ध विधवा महिलाओं के लिए कैल्सियम युक्त आटा, उनके इलाज के लिए सस्ते सब्सिडाइज्ड फूड कार्ड की व्यवस्था जरूरी है, क्योंकि ऐसी विधवाओं के लिए किसी प्रकार का स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध नहीं है। यह आज एक सामाजिक समस्या बन चुकी हैं।
उपसंहार एक अच्छे समाज और देश के लिए उसकी नींव अर्थात् परिवार का अच्छा और मजबूत होना बहुत ही आवश्यक है, आज यही नींव खोखली और कमजोर होती जा रही है। ऐसे में केवल इस दिन तक न सिमटकर हमें व्यापक रूप से इस समस्या का अध्ययन और समाधान खोजने की जरूरत है ताकि वृन्दावन के कृष्ण भजनों की गूंज में विधवा महिलाओं और उनके आश्रितों की दयनीय स्थिति की गूंज न दब जाए।
In simple words: यह निबंध समाज में विधवाओं द्वारा सामना की जाने वाली समस्याओं का वर्णन करता है, जिसमें गरीबी, सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ और अधिकारों से वंचित होना शामिल है। यह विधवाओं की स्थिति में सुधार के लिए सरकारी योजनाओं और सामाजिक जिम्मेदारी पर जोर देता है।
🎯 Exam Tip: विधवाओं की सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का स्पष्ट उल्लेख करें। इन समस्याओं के समाधान हेतु सरकारी और सामुदायिक स्तर पर किए जाने वाले प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 6. स्त्री-शिक्षा/नारी शिक्षा का स्वरूप
Answer: संकेत बिन्दु भूमिका, प्राचीनकाल में नारी-शिक्षा की व्यवस्था, 19वीं शताब्दी में नारी-शिक्षा का स्वरूप, स्त्रियों की शिक्षा के लिए उठाए गए कदम, स्त्री शिक्षा में सुधार की आवश्यकता, उपसंहार।। भूमिका कहा जाता है, यदि एक पुरुष शिक्षित होता है, तो केवल वही शिक्षित होता है, किन्तु यदि एक स्त्री शिक्षित होती है, तो दो परिवार शिक्षित होते हैं। इस कथन से स्त्री-शिक्षा के महत्व का अनुमान लगाया जा सकता है।
समाज में जो परिवर्तन की लहर बह रही है, उसे देखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि हर क्षेत्र में स्त्री को समान अधिकार मिले। यह स्त्री-शिक्षा के बल पर ही सम्भव है, हालाँकि सामाजिक विधानों ने महिलाओं को राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक अधिकार दिए हैं, लेकिन मात्र अधिकार प्राप्त होना, उन्हें इन अधिकारों के लाभ प्राप्त करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। कानून उन्हें चुनाव में वोट देने, चुनाव लड़ने और राजनीतिक पद ग्रहण करने का अधिकार भले ही दे दे, लेकिन यह उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। कानून महिलाओं को पिता की सम्पत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार दे सकता है, पर वह उनको अपने भाइयों से अपना हिस्सा लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। कानून स्त्री को अपना जीवन-साथी चुनने का अधिकार दे सकता है और अपने पति को तलाक देने का अधिकार भी दे सकता है, लेकिन कितनी स्त्रियाँ इन अधिकारों का प्रयोग कर पाती हैं।
इसका कारण है-अशिक्षा । वे जागरूक नहीं हैं और आज भी परम्परागत मूल्यों को अपनाए हुए हैं। साहस की कमी उन्हें साहसिक कदम उठाने से रोकती हैं, इसलिए शिक्षा ही उन्हें उदार एवं व्यापक दृष्टिकोण से सम्पन्न व्यक्तित्व की स्वामिनी बनाएगी तथा उनकी अभिरुचियों, मूल्यों एवं भूमिका विषयक विचारों को बदलेगी ।
प्राचीनकाल में नारी शिक्षा की व्यवस्था यदि हम भारतीय समाज के इतिहास का अध्ययन करें, तो यह द्रष्टव्य होता है कि कुछ अन्धकारमय कालखण्ड को छोड़कर यहाँ सामान्यतया स्त्री की शिक्षा एवं संस्कार को महत्त्व प्रदान किया गया। ऋग्वैदिक काल तथा उपनिषद् काल में नारी-शिक्षा की व्यवस्था थी। उच्च शिक्षा के लिए पुरुषों की भांति स्त्रियाँ भी शैक्षिक अनुशासन के अनुसार ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर शिक्षा ग्रहण करती थीं और पुरुषों के समान ही समाज में प्रतिष्ठित होती थीं। वैदिकयुगीन साहित्य में अनेक विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है।
प्राचीन काल में नारियाँ पुस्तक रचना, शास्त्रार्थ तथा अध्यापन कार्य के रूप में उच्च शिक्षा का उपयोग करती थीं। शास्त्रार्थ में प्रवीण गार्गी और अनुसूइया का नाम जगत में प्रसिद्ध है।
उन दिनों की नारियों को सैनिक शिक्षा भी दी जाती थी। इसके अतिरिक्त, स्त्रियों को ललित कला, नृत्य, संगीत आदि विधाओं की शिक्षा भी दी जाती थी, इसके बाद बौद्ध-युग में भी स्त्री-शिक्षा महत्त्व का विषय रही।
मध्यकाल में मुस्लिम सभ्यता एवं संस्कृति के आगमन के साथ स्त्री शिक्षा का स्तर लगातार गिरता चला गया। पर्दा प्रथा के कारण स्त्री शिक्षा लगभग लुप्तप्राय हो गई, केवल अपवाद रूप में समृद्ध मुसलमान परिवारों की महिलाएँ ही घर पर शिक्षा ग्रहण करती थीं, लेकिन सामान्यतया महिलाओं की स्थिति मध्यकाल में सबसे दयनीय थी। हिन्दू समाज में भी बाल विवाह, सती प्रथा जैसी अनेक कुरीतियों के कारण बहुसंख्यक नारियाँ शिक्षा से वंचित रहीं।
19वीं शताब्दी में नारी शिक्षा का स्वरूप 19वीं शताब्दी में नवजागरण की चेतना पूरे विश्व में व्याप्त थी, इसलिए वैश्विक स्तर पर स्त्री-शिक्षा के सन्दर्भ में उल्लेखनीय प्रगति हुई। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। उसके प्रभाव से भारतीय समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों को समाप्त करने की कोशिशें की गई ।
भारत में तेजी से प्रारम्भ हुए सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों ने कुप्रथाओं को दूर करके स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहित किया। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने लड़कियों की शिक्षा के लिए बंगाल में कई विद्यालय खुलवाए। 1882 ई. के 'भारतीय शिक्षा आयोग' (हण्टर कमीशन) के द्वारा ब्रिटिश भारत सरकार की ओर से शिक्षण-प्रशिक्षण का प्रबन्ध हुआ।
इस आयोग ने स्त्री-शिक्षा के सम्बन्ध में अनेक उत्साहवर्द्धक सुझाव प्रस्तुत किए, लेकिन रूढ़िवादिता के कारण वे अधिक प्रभावी तरीके से कार्यान्वित नहीं हो सके। नारी उच्च शिक्षा की दृष्टि से वर्ष 1916 बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इस समय दिल्ली में लेडी हागि कॉलेज एवं समाज सुधारक डीके कर्वे द्वारा बम्बई में लड़कियों के लिए विश्वविद्यालय खोला गया।
इसी समय मुस्लिम स्त्रियों ने भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पदार्पण किया। स्त्रियों की प्राविधिक शिक्षा में कला, कृषि, वाणिज्य आदि का समावेश हुआ और नारी • सहशिक्षा की ओर अग्रसर हुई ।
स्त्रियों की शिक्षा के लिए उठाए गए कदम स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद स्त्री-शिक्षा सम्बन्धी सुधारवादी कदमों को और भी तीव्रता मिली। स्वतन्त्र भारत में स्त्रियों की शिक्षा में भागीदारी सुनिश्चित करने और उसमें सुधार करने के लिए निम्नलिखित विशिष्ट कदम उठाए गए
1. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के अन्तर्गत सरकार ने स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए स्कूलों में 5% महिला अध्यापिकाओं की नियुक्ति का प्रावधान किया।
2. लड़कियों के लिए गैर-औपचारिक शिक्षा (Non-formal Education) केन्द्रों की संख्या में वृद्धि की गई ।
3. 'महिला समाख्या' (स्त्रियों की समानता के लिए शिक्षा) परियोजना प्रारम्भ की गई, जिसका उद्देश्य प्रत्येक गाँव में महिला संघ के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने के लिए महिलाओं को तैयार करना है।
4. सजग कार्यवाही द्वारा नवोदय विद्यालयों में लड़कियों को प्रवेश 28% तक - सुनिश्चित किया गया है।
5. प्रौढ़-शिक्षा केन्द्रों में स्त्रियों के प्रवेश पर विशेष ध्यान दिया गया है।
6. ग्रामीण प्रकार्यात्मक साक्षरता कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रौद-शिक्षा में नामांकित लोगों में अधिकांश स्त्रियों को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया।
इसके अतिरिक्त, समय-समय पर बनाई गई स्त्री-शिक्षा सम्बन्धी नीतियों में भी महिलाओं की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। उदाहरण के लिए; राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में भी स्त्री-पुरुष समानता के लिए स्त्री-शिक्षा पर बल दिया, जो नवीन मूल्यों को विकसित करेगी। इस नीति में स्त्रियों के विकास के लिए सक्रिय कार्यक्रम बनाने हेतु शैक्षिक संस्थाओं को प्रोत्साहन देने, स्त्रियों की निरक्षरता समाप्त करने, प्रारम्भिक शिक्षा तक स्त्रियों की पहुंच सम्बन्धी बाधाओं को हटाने तथा व्यावसायिक, प्राविधिक एवं पेशेवर शिक्षा पाठ्यक्रमों में लिंग रूढ़ियों के स्थिर रूपों को समाप्त करने के लिए गैर-भेदभाव नीति अपनाने आदि पर जोर दिया गया।
सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों के फलस्वरुप आज स्त्री शिक्षा के स्तर एवं आयाम में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। स्त्रियाँ अपने अधिकारों से परिचित होकर पुरुषों के समकक्ष स्वयं को सिद्ध करने के लिए शिक्षा के महत्त्व की अपरिहार्यता समझने लगी हैं। उन्हें अहसास हो गया है कि प्रगतिशील एवं शिक्षित समुदाय बनने से स्त्री-पुरुष का भेद स्वतः ही मिट जाएगा। इसी आत्मविश्वास का परिणाम है कि आज वे शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों को चुनौती दे रही हैं। वे शिक्षित होकर प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के समकक्ष ही सेवाएँ दे रही हैं, लेकिन यह तो स्त्री शिक्षा को एक ही पहलू है।
स्त्री शिक्षा में सुधार की आवश्यकता वास्तविकता तो यह है कि अभी भी हमें स्त्री-शिक्षा को विस्तार देने की दिशा में बहुत-से प्रयास और करने हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत को केवल 65.46% महिलाएँ शिक्षित हैं। अर्थात् महिलाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग शिक्षा की पहुंच से दूर हैं। सामान्य अनुभव यह बताता है कि स्त्री-शिक्षा के सन्दर्भ में शैक्षिक अवसरों में सर्वाधिक भेदभाव जेण्डर' के आधार पर किया जाता है। शहरी क्षेत्रों में जेण्डर के आधार पर भेदभाव बहुत कम देखने को मिलता है, जिससे वहाँ स्त्री-शिक्षा की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन इस मानसिकता के कारण ग्रामीण परिवेश और निम्न सामाजिक-आर्थिक स्तर से आने वाली लड़कियाँ आज भी शैक्षिक अवसरों से वंचित हैं।
उपसंहार किसी भी स्वस्थ एवं उन्नत समाज और राष्ट्र के लिए 'आधी आबादी' अर्थात् महिलाओं का योगदान परम आवश्यक है, लेकिन वे अपना प्रभावी योगदान तभी दे पाएंगी, जब वे शिक्षित होगी, इसलिए समाज के सभी सदस्यों को स्त्रियों की उन्नति के लिए और उनके माध्यम से राष्ट्र के विकास के लिए स्त्री शिक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। महिलाओं की प्रगति ही समाज और देश की प्रगति का आधार है।
In simple words: यह निबंध स्त्री-शिक्षा के महत्व, प्राचीनकाल से आधुनिक युग तक नारी शिक्षा के विकास, और इसके लिए उठाए गए कदमों पर चर्चा करता है। यह बताता है कि एक शिक्षित स्त्री दो परिवारों को शिक्षित करती है और राष्ट्र के समग्र विकास के लिए नारी शिक्षा अत्यंत आवश्यक है।
🎯 Exam Tip: नारी शिक्षा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (प्राचीन, मध्यकालीन, आधुनिक), इसके महत्व, और सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों (योजनाओं) का विस्तृत विवरण दें। वर्तमान चुनौतियों और भावी सुधारों पर प्रकाश डालें।
Question 7. दहेज प्रथा : एक अभिशाप
Answer: संकेत बिन्तु भूमिका, दहेज प्रथा का स्वरूप, दहेज प्रथा का प्रभाव, दहेज निषेधाज्ञा कानून, आधुनिक भारतीय समाज में दहेज प्रथा, उपसंहार । भूमिका दहेज प्रथा का इतिहास अत्यन्त प्राचीन हैं। दहेज शब्द अरबी भाषा का हिन्दी रूपान्तरण है, जिसका अर्थ होता है-भेंट या सौगात । विवाह के समय कन्यादान में वधू के माता-पिता द्वारा अपनी सम्पत्ति में से कन्या को कुछ धन, वस्त्र, आभूषण आदि देना ही दहेज है। प्राचीन समय में दहेज प्रथा जहाँ वरदान थी, वहीं समय के साथ-साथ स्थिति परिवर्तित हो गई और जो दहेज पहले चरदान था, अब वह अभिशाप बन गया। प्राचीन भारतीय हिन्दू समाज में दहेज की प्रथा का स्वरूप स्वेच्छावादी था। कन्या के पिता अपनी स्वेच्छा व प्रसन्नता से अपनी पुत्री को पत्रम् पुष्पम् फलम् तोयम्' प्रदान करते थे, जो उनके सामर्थ्य के अनुसार दिया गया 'दान' था, जबकि आज दहेज चाहे माता-पिता के सामर्थ्य में हो अथवा न हो, किन्तु उन्हें यह कर्ज लेकर भी जुटाना पड़ता है। घन का प्रयोग इस प्रकार दिखावे में व्यय कर देने से विवाह जैसा पवित्र संस्कार कलुषित बन गया है।
दहेज प्रथा का स्वरूप आज दहेज का स्वरूप पूरी तरह परिवर्तित हो गया है। वर का पिता अपने पुत्र के विवाह में कन्या के पिता की सामर्थ्य-असामर्थ्य, शक्ति-अशक्ति, प्रसन्नता-अप्रसन्नता आदि का विचार किए बिना उससे दहेज के नाम पर धन वसूलता है। दहेज, विवाह बाजार में बिकने वाले वर का वह मूल्य है, जो उसके पिता की सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति को देखकर निश्चित किया जाता है। जिस प्रथा के अन्तर्गत कन्या का पिता अपनी सामर्थ्य से बाहर जाकर, अपना घर बेचकर, अपने शेष परिवार का भविष्य अन्धकार में धकेलकर दहेज देता है, वहाँ दहेज लेने वाले से उसके सम्बन्ध स्नेहपूर्ण कैसे हो सकते हैं! 'मनुस्मृति' में चार पक्ष द्वारा कन्या पक्ष वालों से दहेज लेना राक्षस विवाह के अन्तर्गत रखा गया है, जिसका वर्णन 'मनु' ने इस प्रकार किया है “कन्या प्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्येत ।” इस प्रकार यहाँ कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को धन आदि दिया जाना दानव धर्म बतलाया गया है।
दहेज प्रथा का प्रभाव दहेज प्रथा भारतीय समाज में व्याप्त एक ऐसी कुप्रथा है, जिसके कारण कन्या और उसके परिजन अपने भाग्य को कोसते रहते हैं। माता-पिता द्वारा दहेज की राशि न जुटा पाने पर कितनी कन्याओं को अविवाहित ही जीवन बिताना पड़ता है, तो कितनी ही कन्याएँ अयोग्य या अपने से दोगुनी आयु वाले पुरुषों के साथ ब्याह दी जाती हैं। इस प्रकार, एक ओर दहेज रूपी दानव का सामना करने के लिए कन्या का पिता गलत तरीकों से धन कमाने की बात सोचने लगता है, तो दूसरी ओर कन्या भ्रूण-हत्या जैसे पापों को करने से भी लोग नहीं चूकते। महात्मा गाँधी ने इसे 'हृदयहीन बुराई' कहकर इसके विरुद्ध प्रभावी लोकमत बनाए जाने की वकालत की थी। पण्डित नेहरू ने भी इस कुप्रथा को खुलकर विरोध किया था। राजा राममोहन राय, महर्षि दयानन्द आदि समाजसेवकों ने भी इस घृणित कुप्रथा को उखाड़ फेंकने के लिए लोगों से आह्वान किया था। प्रेमचन्द ने उपन्यास 'कर्मभूमि' के माध्यम से इस कुप्रथा के कुपरिणामों को देशवासियों के सामने रखने का प्रयास किया है।
दहेज निषेधाज्ञा कानून भारत में दहेज निषेधाज्ञा कानून, 1961 और घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के लागू होने के बावजूद दहेज न देने अथवा कम दहेज देने के कारण प्रतिवर्ष लगभग 5,000 बहुओं को मार दिया जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान समय में भारत में लगभग प्रत्येक 100 मिनट में दहेज से सम्बन्धित एक हत्या होती है। अधिकांश दहेज हत्याएँ पति के घर के एकान्त में और परिवार के सदस्यों की मिलीभगत से होती हैं, इसलिए अधिकांश मामलों में अदालते प्रमाण के अभाव में दहेज हत्यारों को दण्डित भी नहीं कर पाती हैं। कभी-कभी पुलिस छानबीन करने में इतनी शिथिल हो जाती है कि न्यायालय भी पुलिस अधिकारियों की कार्यकुशलता और सत्यनिष्ठा पर सन्देह प्रकट करते हैं।
आधुनिक भारतीय समाज में दहेज प्रथा आज आधुनिक युग में दहेज प्रथा मानवजाति के मस्तक पर कलंक है, जिसका कारण धन का लालच, अठी प्रतिष्ठा की भावना, आदर्शवादिता का लोप हो जाना आदि है। सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने की भावना ने दहेज प्रथा के रूप को कलंकित कर दिया है। इस प्रकार दहेज प्रथा की बुराई केवल विवाह तक ही सीमित न रहकर विवाहोपरान्त भी परिवारों को प्रभावित करती है, जो विवाहित जीवन के लिए कष्टप्रदर्द बन जाता है। व्यक्ति जितना सम्पन्न होता है उतनी ही बड़ी वह दहेज की माँग करता है। आज दहेज समाज में प्रतिष्ठा का सूचक बन गया है। आधुनिक भारतीय समाज में आज दहेज प्रथा के फलस्वरूप बेमेल विवाह की समस्या में वृद्धि हो रही है। यही नहीं दहेज जैसे अभिशाप से आत्महत्या के आँकड़े भी बड़े हैं। वधू पक्ष की ओर से दहेज में कमी रह जाने के फलस्वरूप कन्याओं का वैवाहिक जीवन दुःखद हो जाता है।
दहेज सम्बन्धी कुप्रथा का चरमोत्कर्ष यदि दहेज हत्या है, तो इसके अतिरिक्त महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के अन्य स्वरूपों का प्रदर्शन भी सामने आता है, जिसमें पत्नी को पीटना, लैंगिक या अन्य दुर्व्यवहार, मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना आदि शामिल हैं।
उपसंहार भारत की पवित्र धरती पर से दहेज रूपी विष वृक्ष को समूल उखाड़ फेंकने के लिए देश के युवा वर्ग को आगे आना होगा। युवाओं के नेतृत्व में गाँव-गाँव और शहर-शहर में सभाओं का आयोजन करके लोगों को जागरूक करना होगा, ताकि वे दहेज लेने व देने जैसी बुराइयों से बच सके । प्रेस और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इस कुप्रथा को दूर करने में खुलकर सहयोग करने की आवश्यकता है। दहेज प्रथा के नाम पर नारियों पर हो रहे अत्याचार को हमें समाप्त करना होगा।
कवि रमाशंकर यादव 'विद्रोही' ने दहेज प्रथा को समाप्त करने एवं इसके विरुद्ध उठ खड़े होने हेतु जो संकल्प व्यक्त किया है, वह केवल उनका नहीं, बल्कि पूरे | समाज का संकल्प होना चाहिए 'इतिहास में वह पहली औरत कौन थी। जिसे सबसे पहले जलाया गया मैं नहीं जानता लेकिन जो भी रही हो, मेरी माँ रही होगी। मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी। जिसे सबसे अन्त में जलाया जाएगा। मैं नहीं जानता लेकिन जो भी होगी। मेरी बेटी होगी। और यह मैं नहीं होने दूंगा।”
In simple words: यह निबंध दहेज प्रथा को एक सामाजिक अभिशाप के रूप में प्रस्तुत करता है, इसके प्राचीन स्वरूप से लेकर वर्तमान विकृत रूप, दुष्प्रभावों और इसे रोकने के लिए कानूनी व सामाजिक प्रयासों पर चर्चा करता है। यह स्पष्ट करता है कि दहेज प्रथा न केवल विवाहों को कलुषित करती है, बल्कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का भी कारण बनती है।
🎯 Exam Tip: दहेज प्रथा की परिभाषा, इसके ऐतिहासिक विकास, वर्तमान स्वरूप, सामाजिक-आर्थिक प्रभावों और दहेज निषेधाज्ञा कानून का उल्लेख महत्वपूर्ण है। समाज में इस कुप्रथा के उन्मूलन के लिए समाधानों पर जोर दें।
Question 8. भ्रष्टाचार : कारण और निवारण
Answer: संकेत बिन्त अष्टाचार का अर्थ, भ्रष्टाचार के कारण, सरकारी न्याय तन्त्र में शिथिलता, प्रशासन में भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार का समाधान, उपसंहार। भ्रष्टाचार का अर्थ भ्रष्टाचार शब्द 'भ्रष्ट' एवं 'आचार' दो शब्दों से मिलकर बना है। 'भ्रष्ट' का अर्थ है-बिगड़ा हुआ तथा 'आचार' का अर्थ है-आचरण या व्यवहार। इस प्रकार भ्रष्टाचार का अर्थ हुआ-भ्रष्ट आचरण या बिगड़ा हुआ व्यवहार । समाज में विभिन्न स्तरों और क्षेत्रों में कार्यरत् व्यक्तियों से जिस निष्ठा एवं ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है, उसका न होना ही भ्रष्टाचार है।
मोटे तौर पर घूस लेना, पक्षपात करना, सार्वजनिक धन एवं सम्पत्ति का दुरुपयोग करना तथा स्वेच्छानुसार किसी को भी नियम विरुद्ध लाभ या हानि पहुंचाना आदि भ्रष्टाचार कहलाते हैं।
भ्रष्टाचार के कारण भ्रष्टाचार की समस्या से छोटे-बड़े सरकारी तथा गैर-सरकारी सभी व्यक्ति पीड़ित हैं, इसलिए सरकारी संस्थागत एवं व्यक्तिगत स्तर पर इसके कारणों को जानने का प्रयास किया जाना चाहिए।
प्रायः देखा गया है कि राष्ट्रीय आपदा एवं संघर्ष के अवसर पर हमारे जीवन में श्रेष्ठ मूल्यों; जैसे-एकता, त्याग, बलिदान इत्यादि की भावनाएँ विद्यमान रहती हैं। स्वतन्त्रता संघर्ष के समय हमारे समाज में भी नैतिक स्तर ऊँचा था। सभी स्वार्थ एवं वर्गभेद मिटाकर देश के लिए कुछ कर गुजरने को तत्पर थे, किन्तु स्वतन्त्रता के बाद देश के नैतिक और चारित्रिक स्तर में गिरावट आई। उपभोग के साधनों के लिए अधिक-से-अधिक धन की आवश्यकता होती हैं, इसलिए किसी भी प्रकार धन एकत्रित करना ही मनुष्य का उद्देश्य होता गया। विद्यालय और परिवार अपने सदस्यों को नैतिकता सिखाने में असमर्थ हो गए। इसी कारण देश व समाज में भ्रष्ट वातावरण व्याप्त होता गया।
सरकारी न्याय तन्त्र में शिथिलता भ्रष्टाचार में लिप्त होने वाले व्यक्ति को इससे रोकने में या तो नीति ज्ञान सहायक होता है या समाज का दण्ड विधान। यह बात सही है कि जब मनुष्य की आत्मा उचित-अनुचित का निर्णय करने योग्य नहीं रहती तथा जब नीति के बन्धन शिथिल हो जाते हैं, तब दण्ड की कठोरता का डर व्यक्ति को बुराइयों से रोकता है, लेकिन हमारी न्याय पद्धति एवं न्याय व्यवस्था इतनी शिथिल हैं। कि अपराध का निर्णय बहुत विलम्ब से होता है। सरकारी स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने में शक्तिशाली विपक्ष एक सकारात्मक भूमिका निभा सकता हैं। दुभग्य की बात यह है कि हमने लोकतन्त्र की स्थापना तो कर ली, किन्तु अभी तक सशक्त एवं रचनात्मक विपक्ष की महत्ता को नहीं समझ पाए। यदि विपक्ष चाहे, तो वह सरकार के मनमाने आचरण पर अंकुश लगा सकता है।
प्रशासन में भ्रष्टाचार भारत में बहुदलीय लोकतन्त्रीय राज्यव्यवस्था है। अनेक राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दल हर बार चुनावों में अपने उम्मीदवार खड़े करते हैं। उन्हें चुनाव लड़ाने के लिए प्रचुर साधनों एवं धन की आवश्यकता होती है। यह धन दलों को चन्दे द्वारा प्राप्त होता है। चुनावों के लिए चन्दा देकर बड़े-बड़े पूंजीपति किसी दल की सरकार बनने पर उससे अनुचित लाभ उठाते हैं। वे पर्याप्त धन चन्दे में इसलिए देते हैं, ताकि चन्दे में दी गई सम्पत्ति के बदले लाभ उठाया जा सके ।
भ्रष्टाचार का समाधान भ्रष्टाचार को दूर करना आसान काम नहीं है, परन्तु इसे समाप्त किए बिना हमारे देश का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। हमें इसे दूर करना ही होगा। भ्रष्टाचार जैसी समस्या के समाधान के लिए चुनाव पद्धति में भी सुधार लाना आवश्यक है। सफल लोकतन्त्र नागरिकों की जागरूकता पर आश्रित होता है, इसलिए भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए नागरिकों में जागरूकता पैदा करना अत्यन्त आवश्यक है, क्योकि- “यदि बदली नहीं व्यवस्था तो नेतृत्व बदल कर क्या होगा; जब खुद माझी ही पागल हो, पतवार बदलकर क्या होगा?” राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर पर विचार और प्रयास करना आवश्यक है। आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार एक रोग के रूप में व्याप्त है। जब तक सभी नागरिक और सभी दल निहित स्वार्थों और हितों से ऊपर उठकर इस पर विचार नहीं करेंगे, तब तक भ्रष्टाचार जैसी समस्या से मुक्ति सम्भव नहीं है।
उपसंहार यदि प्रशासन और जनता देश से भ्रष्टाचार रूपी दानव को मिटाने के लिए एकजुट होकर कार्य करें तो वह दिन दूर नहीं कि भारत भ्रष्टाचारमुक्त देश बनकर जल्द ही विकसित देशों की श्रेणी में आ खड़ा होगा। हमें मिलकर पह संकल्प लेना होगा कि हम अपने महान् राष्ट्र की प्राचीन संस्कृति को पुनर्जीवित कर देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाएँगे, ताकि हमारा देश फिर से सोने की चिड़िया कहलाए।
In simple words: यह निबंध भ्रष्टाचार के विभिन्न कारणों, जैसे लालच, नैतिकता में गिरावट, और कमजोर न्याय प्रणाली पर प्रकाश डालता है। यह प्रशासन में भ्रष्टाचार के रूपों को उजागर करता है और इसके समाधान के लिए नागरिकों की जागरूकता, चुनाव प्रणाली में सुधार और एक सशक्त विपक्ष की भूमिका को महत्वपूर्ण बताता है।
🎯 Exam Tip: भ्रष्टाचार की परिभाषा, उसके व्यापक कारणों (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक) और प्रशासन व न्याय प्रणाली पर उसके प्रभावों का विस्तृत वर्णन करें। भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए व्यावहारिक समाधानों पर जोर दें।
Question 9. भारतीय किसान की समस्याएँ और समाधान
Answer: संकेत बिन्दु भूमिका, दयनीय स्थिति के कारण, सुधार के सरकारी प्रयास, कृषि सम्बद्ध जानकारियों पर बल, रोजगार गारण्टी योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, उपसंहार । भूमिका कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की धुरी है। देश की कुल श्रम-शक्ति का आधे से अधिक भाग कृषि एवं इससे सम्बन्धित उद्योग-धन्धों से अपनी आजीविका कमाता है। ब्रिटिश काल में भारतीय कृषक अंग्रेजों एवं जमींदारों के जुल्म से परेशान एवं बेहाल थे। स्वतन्त्रता के बाद उनकी स्थिति में काफी सुधार हुआ, किन्तु जिस तरह कृषकों के शहरों की ओर पलायन एवं उनकी आत्महत्या की खबरें सुनने को मिलती हैं, उससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी स्थिति में आज भी अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि कृषक अपने बच्चों को आज कृषक नहीं बनाना चाहता। वर्षों पहले किसी कवि द्वारा कही गई ये पंक्तियां आज भी प्रासंगिक हैं- जेठ हो कि पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है, वसन कहाँ, सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है।”
दयनीय स्थिति के कारण भारतीय कृषक अत्यन्त कठोर जीवन जीते हैं। अधिकतर भारतीय कृषक निरन्तर घटते भू-क्षेत्र के कारण गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। दिन रात खेतों में परिश्रम करने के बाद भी उन्हें तन ढकने के लिए समुचित कपड़ा नसीब नहीं होता। जाड़ा हो या गर्मी, धूप हो या बरसात उन्हें दिन-रात बस खेतों में ही परिश्रम करना पड़ता है।
इसके बावजूद उन्हें फसलों से उचित आय की प्राप्ति नहीं हो पाती। बड़े-बड़े व्यापारी, कृषकों से सस्ते मूल्य पर खरीदे गए खाद्यान्न, सब्जी एवं फलों को बाजारों में ऊंची दरों पर बेच देते हैं। इस तरह कृषकों का श्रम लाभ किसी और को मिल जाता है। और किसान अपनी किस्मत को कोसता है। किसानों की ऐसी दयनीय स्थिति का एक कारण यह भी है कि भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर है और मानसून की अनिश्चितता के कारण प्रायः कृषकों को कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। समय पर सिंचाई नहीं होने के कारण भी उन्हें आशानुरूप फसल की प्राप्ति नहीं हो पाती।।
ऊपर से आवश्यक उपयोगी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के कारण कृषकों की स्थिति और भी दयनीय हो गई है तथा उनके सामने दो वक्त की रोटी की समस्या खड़ी हो गई है। कृषि में श्रमिकों की आवश्यकता सालभर नहीं होती, इसलिए साल के लगभग तीन-चार महीने कृषकों को खाली बैठना पड़ता है। इस कारण भी कृषकों के गाँवों से शहरों की ओर पलायन में वृद्धि हुई है।
सुधार के सरकारी प्रयास देश के विकास में कृषकों के योगदान को देखते हुए, कृषकों और कृषि क्षेत्र के लिए कार्य योजना का सुझाव देने हेतु डॉ. एम. एस, स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 'राष्ट्रीय कृषक आयोग का गठन किया गया था। इसने वर्ष 2006 में अपनी चौथी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें कृषकों के लिए एक विस्तृत नीति के निधरण की संस्तुति की गई। इसमें कहा गया कि सरकार को सभी कृषिगत उपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करना चाहिए तथा यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कृषकों को विशेषतः वर्षा आधारित कृषि वाले क्षेत्रों में न्यूनतम समर्थन मूल्य उचित समय पर प्राप्त हो सके । राष्ट्रीय कृषक आयोग की संस्तुति पर भारत सरकार ने राष्ट्रीय कृषक नीति, 2007 की घोषणा की। इसमें कृषकों के कल्याण एवं कृषि के विकास के लिए कई बातों पर जोर दिया गया है।
कृषि सम्बद्ध जानकारियों पर बल आज से डेढ़-दो दशक पूर्व तक कृषकों को फसलों, खेती के तरीकों एवं आधुनिक कृषि उपकरणों के सम्बन्ध में उचित जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण खेती से उन्हें उचित लाभ नहीं मिल पाता था। इसलिए कृषकों को कृषि सम्बन्धी बातों की जानकारी उपलब्ध करवाने हेतु वर्ष 2004 में किसान कॉल सेण्टर की शुरुआत की गई। कृषि सम्बन्धी कार्यक्रमों का प्रसारण करने वाले 'कृषि चैनल' की भी शुरुआत की गई। केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण विकास बैंक के माध्यम से देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रूरल नॉलेज सेण्टर्स' की भी स्थापना की है।
रोजगार गारण्टी योजना कृषकों को वर्ष के कई महीने खाली बैठना पड़ता है, क्योंकि सालभर उनके पास काम नहीं होता, इसलिए ग्रामीण लोगों को गाँव में ही रोजगार उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी अधिनियम के अन्तर्गत वर्ष 2008 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का शुभारम्भ किया गया। 2 अक्टूबर, 2009 से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम (NREGA) का नाम बदलकर महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम (MNREGA) कर दिया गया है। यह अधिनियम ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक परिवार के एक वयस्क सदस्य को वर्ष में कम-से-कम 100 दिन के ऐसे रोजगार की गारण्टी देता है। इस अधिनियम में इस बात को भी सुनिश्चित किया गया है कि इसके अन्तर्गत 33% लाभ महिलाओं को मिले ।
इस योजना से पहले भी प्रामीण क्षेत्र के लोगों को रोजगार प्रदान करने के लिए कई योजनाएं प्रारम्भ की गई। थीं, किन्तु उनमें भ्रष्टाचार के मामले अत्यधिक उजागर हुए। अतः इससे बचने के लिए रोजगार के इच्छुक व्यक्ति का रोजगार-कार्ड बनाने का प्रावधान किया गया है। कानून द्वारा रोजगार की गारण्टी मिलने के बाद न केवल ग्रामीण विकास को गति मिली है, बल्कि प्रामीणों का शहर की ओर पलायन भी कम हुआ है।
किसान क्रेडिट कार्ड कृषकों को समय-समय पर धन की आवश्यकता पड़ती है। साहूकार से लिए गए ऋण पर उन्हें अत्यधिक व्याज देना पड़ता है। कृषकों की इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, उन्हें साहूकारों के शोषण से बचाने के लिए वर्ष 1998 में किसान क्रेडिट कार्ड' योजना की भी शुरुआत की गई। इस योजना के फलस्वरूप कृषकों के लिए वाणिज्यिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों तथा सहकारी बैंकों से ऋण प्राप्त करना सरल हो गया है।
उपसंहार कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, इसलिए अर्थव्यवस्था में सुधार एवं देश की प्रगति के लिए किसानों की प्रगति आवश्यक है। केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई विभिन्न प्रकार की योजनाओं एवं नई कृषि नीति के फलस्वरूप कृषकों को स्थिति में सुधार हुआ है, किन्तु अभी तक इसमें सन्तोषजनक सफलता प्राप्त नहीं हो सकी है। आशा है, विभिन्न प्रकार के सरकारी प्रयासों एवं योजनाओं के कारण, आने वाले वर्षों में कृषक समृद्ध होकर भारतीय अर्थव्यवस्था को सही अर्थों में प्रगति की राह पर अग्रसर कर सकेंगे।
In simple words: यह निबंध भारतीय किसानों की दयनीय स्थिति, उनके जीवन की कठिनाइयों और कृषि संबंधी समस्याओं का विश्लेषण करता है। यह किसानों की आय, सिंचाई और श्रमिकों की चुनौतियों को उजागर करता है, और सरकारी प्रयासों जैसे कृषि आयोग, किसान क्रेडिट कार्ड, और रोजगार गारंटी योजनाओं के माध्यम से उनके समाधानों पर भी प्रकाश डालता है।
🎯 Exam Tip: भारतीय किसानों की प्रमुख समस्याओं (गरीबी, मानसून पर निर्भरता, कम आय) का विस्तृत वर्णन करें। सरकार द्वारा इन समस्याओं के समाधान हेतु किए गए प्रयासों और योजनाओं (किसान क्रेडिट कार्ड, मनरेगा, किसान कॉल सेंटर) का उल्लेख महत्वपूर्ण है।
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