UP Board Solutions Class 12 Sahityik Hindi Padya Chapter 9 Pururava Urvashi Abhinav Manushya

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Class 12 Sahityik Hindi Chapter 9 पुरुरवा उर्वशी अभिनव मनुष्या UP Board Solutions PDF

पुरूरवा / उर्वशी / अभिनव-मनुष्य – जीवन/साहित्यिक परिचय

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर देना होता है। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ

राष्ट्रीय भावनाओं के ओजस्वी कवि रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव में 30 सितम्बर, वर्ष 1908 को हुआ था। वर्ष 1932 में पटना कॉलेज से बी.ए. किया और फिर एक स्कूल में अध्यापक हो गए। वर्ष 1950 में इन्हें मुजफ्फरपुर के स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिन्दी विभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वर्ष 1952 में इन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया।

वर्ष 1972 में इन्हें 'ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। 24 अप्रैल, 1974 को हिन्दी काव्य गगन का यह दिनकर हमेशा के लिए अस्त हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ

रामधारी सिंह 'दिनकर' छायावादोत्तर काल एवं प्रगतिवादी कवियों में सर्वश्रेष्ठ कवि थे। दिनकर जी ने राष्ट्रप्रेम, लोकप्रेम आदि विभिन्न विषयों पर काव्य रचना की। उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की। एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को औजस्वी और प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया। ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमती हैं।

कृतियाँ

दिनकर जी ने काव्य एवं गद्य दोनों क्षेत्रों में सशक्त साहित्य का सृजन किया। इनकी प्रमुख काव्य रचनाओं में रेणुका, रसवन्ती, हुँकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, नील कुसुम, चक्रवाल, सामधेनी, सीपी और शंख, हारे को हरिनाम आदि शामिल हैं। 'संस्कृति के चार अध्याय' आलोचनात्मक गद्य रचना है।

काव्यगत विशेषताएँ

भाव पक्ष

1. राष्ट्रीयता का स्वर राष्ट्रीय चेतना के कवि दिनकर जी राष्ट्रीयता को सबसे बड़ा धर्म समझते हैं। इनकी कृतियाँ त्याग, बलिदान एवं राष्ट्रप्रेम की भावना से परिपूर्ण हैं। दिनकर जी ने भारत के कण-कण को जगाने का प्रयास किया। इनमें दय एवं बुद्धि का अद्भुत समन्वय था। इसी कारण इनका कवि रूप जितना सजग है, विचारक रूप उतना ही प्रखर है।
2. प्रगतिशीलता दिनकर जी ने अपने समय के प्रगतिशील दृष्टिकोण को अपनाया। इन्होंने उजड़ते खलिहानों, जर्जरकाय कृषकों और शोषित मजदूरों के कार्मिक चित्र अंकित किए हैं। दिनकर जी की 'हिमालय', 'ताण्डव', 'बोधिसत्व', 'कस्मै दैवाय', 'पाटलिपुत्र की गंगा' आदि रचनाएँ प्रगतिवादी विचारधारा पर आधारित
3. प्रेम एवं सौन्दर्य ओज एवं क्रान्तिकारिता के कवि होते हुए भी दिनकर जी के अन्दर एक सुकुमार कल्पनाओं का कवि भी विद्यमान है। इनके द्वारा रचित काव्य ग्रन्थ 'रसंवन्ती' तो प्रेम एवं श्रृंगार की खान है।
4. रस-निरूपण दिनकर जी के काव्य का मूल स्वर ओज हैं। अतः ये मुख्यतः वीर रस के कवि हैं। श्रृंगार रस का भी इनके काव्यों में सुन्दर परिपाक हुआ है। वीर रस के सहायक के रूप में रीढ़ रस, जन सामान्य की व्यथा के चित्रण में करुण ररा और वैराग्य प्रधान स्थलों पर शान्त रस का भी प्रयोग मिलता है।

कला पक्ष

1. भाषा दिनकर जी भाषा के मर्मज्ञ हैं। इनकी भाषा सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक है, जिसमें सर्वत्र भावानुकूलता का गुण पाया जाता है। इनकी भाषा प्रायः संस्कृत की तत्सम शब्दावली से युक्त है, परन्तु विषय के अनुरूप इन्होंने न केवल तद्भव अपितु उर्दू, बांग्ला और अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग किया है।
2. शैली ओज एवं प्रसाद इनकी शैली के प्रधान गुण हैं। प्रबन्ध और मुक्तक दोनों ही काव्य शैलियों में इन्होंने अपनी रचनाएँ सफलतापूर्वक प्रस्तुत की हैं। मुक्तक में गीत मुक्तक एवं पात्य मुक्तक दोनों का ही समन्वय हैं।
3. छन्द परम्परागत छन्दों में दिनकर जी के प्रिय छन्द हैं गीतिका, सार, सरसी, हरिगीतिका, रोला, रूपमाला आदि। नए छन्दों में अतुकान्त मुक्तक, चतुष्पदी आदि का प्रयोग दिखाई पड़ता है। प्रीति इनका स्वनिर्मित छन्द है, जिसको प्रयोग 'रसवन्ती' में किया गया है। कहीं-कहीं लावनी, बहर, गजल जैसे लोक प्रचलित छन्दै भौं प्रयुक्त हुए हैं।
4. अलंकार अलंकारों का प्रयोग इनके काव्य में चमत्कार-प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि कविता की व्यंजन शक्ति बढ़ाने के लिए या काव्य की शोभा बढ़ाने के लिए किया गया है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त, व्यतिरेक, उल्लेख, मानवीकरण आदि अलंकारों का प्रयोग इनके काव्य में स्वाभाविक रूप में हुआ है।

हिन्दी साहित्य में स्थान

रामधारी सिंह 'दिनकर' की गणना आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ कवियों में की जाती है। विशेष रूप से राष्ट्रीय चेतना एवं जागृति उत्पन्न करने वाले कवियों में इनका विशिष्ट स्थान है। ये भारतीय संस्कृति के रक्षक, क्रान्तिकारी चिन्तक, अपने युग का प्रतिनिधित्व करने वाले हिन्दी के गौरव हैं, जिन्हें पाकर हिन्दी साहित्य वास्तव में धन्य हो गया।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्म भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे ।

पुरूरवा

 

Question 1. सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं, काँपता है कुण्डली मारे समय का व्याल, मेरी बाँह में मारुत, गरुड़ गजराज का बल है। मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं । अन्ध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ, बादलों के सीस पर स्यन्दन चलाता हूँ।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) नायक अपना परिचय देते हुए क्या कहता है?
Answer: नायक अपने बल, शक्ति और सामर्थ्य का उल्लेख करते हुए उर्वशी से कहता है कि उसके बल के समक्ष सिंह भी नहीं टिकते, पर्वत व समय रूपी सर्प भी भयभीत हो उठते हैं। उसकी बाहों में पवन, गरुड़ व हाथी जितना बल है। वह सूर्य के समान प्रकाशवान हैं, जो अन्धकार को मिटाता है। वह निर्बाध गति से कहीं भी आ-जा सकता है।
(ii) “म मानव की विजय का तुर्य हूँ मैं” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer: पुरूरवा अपनी सामर्थ्य का प्रदर्शन करते हुए उर्वशी से कहता है कि वह मरणशील व्यक्ति में भी विजय का शंखनाद कर सकता है अर्थात् वह मरणशील व्यक्तियों में भी उत्साह, जोश एवं उमंग का संचार कर सकता है।
(iii) पुरुरवा स्वयं की तुलना किससे करता है?
Answer: पुरूरवा स्वयं की तुलना विश्व को प्रकाशित करने वाले सूर्य से करते हुए कहता है कि वह मानव जीवन में छाए घोर अन्धकार को दूर करने वाली प्रचण्ड अग्नि के समान है।
(iv) पद्यांश के शिल्प-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए ।
Answer: काव्यांश में कवि ने तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली का प्रयोग किया है। प्रबन्धात्मक शैली का प्रयोग करते हुए कवि ने लक्षणा शब्द-शक्ति में कय को प्रस्तुत किया है। पुरुरवा की शक्ति का वर्णन करने के लिए वीर रस का प्रयोग किया गया है। अनुप्रास, उपमा, रूपक व अतिशयोक्ति अलंकारों का प्रयोग करके काव्य में सौन्दर्य बढ़ गया है।
(v) प्रस्तुत पद्यांश के कवि व कविता का नामोल्लेख कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश राष्ट्रवादी कवि रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित कविता 'पुरूरवा' से उद्धृत किया गया है।
In simple words: In this poem, Pururava describes his immense power and valor, likening himself to the sun and a powerful fire, capable of overcoming any challenge and bringing light. He asserts his ability to conquer time and nature.

🎯 Exam Tip: Focus on identifying the central theme of valor and self-assertion. Pay attention to the poetic devices used to emphasize strength and control over nature. Scoring depends on a clear explanation of Pururava's divine attributes and human potential.

 

Question 2. पर, न जानें बात क्या है! इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है, सिंह से बाँहें मिला कर खेल सकता है, फूल के आगे वही असहाय हो जाता, शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता। विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से, जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से ।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में नायक आश्चर्यचकित क्यों है?
Answer: प्रस्तुत पद्यांश में नायक इस तथ्य के विषय में सोचकर आश्चर्यचकित है कि जो पुरुष रणभूमि में इन्द्र के वज्र का सामना कर सकता है, जो शेर से युद्ध करने से भी नहीं घबराता, वह आखिरकार क्यों कोमल, सरल व मृदुल नारी के समक्ष नतमस्तक हो जाता है।
(ii) पद्यांश में नारी के किस गुण को उद्घाटित किया गया है?
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में कवि ने नारी के कोमल होने के उपरान्त भी कठोर, बलशाली व शक्ति सम्पन्न पुरुष को स्वयं के आगे नतमस्तक कर देने के गुण को उद्घाटित किया है। कवि कहता है कि जो पुरुष अपने बल एवं सामर्थ्य से सम्पूर्ण जगत पर शासन करता है, उसी पुरुष पर नारी अपने सौंदर्य से शासन करती हैं।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
Answer: प्रस्तुत पद्मांश के द्वारा कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि कोमलता व रूप सौन्दर्य का आकर्षण कठोर-से-कठोर हृदय के व्यक्ति को भी अपने मोहपाश में बाँध लेता है और उसके समक्ष व्यक्ति विवश होकर कुछ नहीं कर पाता।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में कवि ने तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली का प्रयोग किया है। भाषा सहज, प्रवाहमयी व प्रभावोत्पादक है। पद्यांश की शैली प्रबन्धात्मक है। अर्थात् प्रत्येक पद कथ्य को आगे बढ़ाने में सहायक है।
(v) इन्द्र' व 'सिंह' शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
Answer:

शब्दपर्यायवाची शब्द
इन्द्रसुरपति, देवराज
सिंहशार्दुल, मृगराज

In simple words: This poem highlights the paradox of male strength-a powerful warrior who can face gods and beasts, yet becomes helpless before the gentle charm and smile of a beautiful woman. It explores how feminine beauty can conquer even the strongest men.

🎯 Exam Tip: When analyzing this poem, focus on the contrast between masculine might and feminine allure. Explain how the poet uses vivid imagery to show the unexpected power of beauty. Marks are awarded for clear identification of the central idea and analysis of the contrasting elements.

उर्वशी

 

Question 3. कामना-वह्नि की शिखा मुक्त मैं अनवरुद्ध मैं अप्रतिहत, मैं दुर्निवार; मैं सदा घूमती फिरती हूँ पवनान्दोलित वारिद-तरंग पर समासीन नीहार-आवरण में अम्बर के आर-पार, उड़ते मेघों को दौड़ बाहुओं में भरती, स्वप्नों की प्रतिमाओं का आलिंगन करती। विस्तीर्ण सिन्धु के बीच शून्य, एकान्त द्वीप, यह मेरा उर। देवालय में देवता नहीं, केवल मैं हूँ। मेरी प्रतिमा को घेर उठ रही अगुरु-गन्ध, बज रहा अर्चना में मेरी मेरा नूपुर । भू-नभ का सब संगीत नाद मेरे निस्सीम प्रणय का है, सारी कविता जयगान एक मेरी त्रयलोक-विजय का है।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) उर्वशी स्वयं को कहाँ-कहाँ विद्यमान बताती हैं?
Answer: उर्वशी स्वयं के विषय में बताती है कि वह सदैव इधर-उधर विचरती रहती है। वह देवताओं के रूप में मन्दिरों में विद्यमान है, वह मन्दिरों में बजने वाले मुँघरूओं में विद्यमान है, वह धरती और आकाश में चारों ओर उठने वाले संगीत के स्वरों में विद्यमान है अर्थात् वह पृथ्वी के कण-कण में विद्यमान है।
(ii) “विस्तीर्ण सिन्धु के बीच शुन्य, एकान्त द्वीप, यह मेरा उर” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer: कवि प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से उर्वशी के मनोभावों को प्रकट करते हुए कहता है कि इस संसार रूपीं विशाल सागर में वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमती रहती है, किन्तु उसके हृदय में शून्यता है, अकेलापन है। वह सबके बीच होकर भी सबसे अकेली हैं।
(iii) पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से उर्वशी ने पुरूरवा को अपने गुणों अर्थात् सम्पूर्ण जगत में नारी की व्यापकता व प्रत्येक वस्तु में उसकी विद्यमानता के गुणों से अवगत कराते हुए नारी की व्यापकती एवं शक्ति सम्पन्नता का वर्णन किया है।
(iv) पद्यांश की अलंकार-योजना पर प्रकाश डालिए।
Answer: अलंकार किसी पट्यांश के शिल्प एवं भाव पक्ष में चमत्कार उत्पन्न कर देते हैं। प्रस्तुत पद्मशि में कवि ने 'कामना-वहनि की शिखा' में रूपक अलंकार, ‘स्वपनों की प्रतिमाओं का आलिंगन' में मानवीकरण अलंकार, 'देवालय में देवता नहीं' में 'द' वर्ण आवृति के कारण अनुप्रास अलंकार आदि का प्रयोग किया है।
(v) प्रस्तुत पद्यांश के कवि वे शीर्षक का नामोल्लेख कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश राष्ट्रवादी कवि रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित कविता 'उर्वशी' से उद्धृत किया गया है।
In simple words: Urvashi describes herself as a free, unstoppable force, existing everywhere and encompassing all elements. She reveals a deep sense of solitude despite her pervasive presence, emphasizing that her being is a testament to eternal love and triumph across all realms.

🎯 Exam Tip: Analyze Urvashi's self-description, focusing on her divine, unbound nature and underlying sense of loneliness. Identify poetic devices like metaphor and personification. Marks are given for illustrating how she personifies universal love and an all-encompassing presence.

अभिनव मनुष्य

 

Question 4. शीश पर आदेश कर अवधार्य, प्रकृति के बस तत्त्व करते हैं मनुज के कार्य। मानते हैं हुक्म मानव का महा वरुणेश, और करता शब्दगुण अम्बर वहन सन्देश । नव्य नर की मुष्टि में विकराल, हैं सिमटते जा रहे प्रत्येक क्षण दिक्काल यह मनुज, जिसका गगन में जा रहा है यान, काँपते जिसके करों को देखकर परमाणु। खोलकर अपना हृदयगिरि, सिन्धु, भू, आकाश, हैं सुना जिसको चुके निज गुह्यतम इतिहास । खुल गए परदे, रहा अब क्या यहाँ अज्ञेय? किन्तु नर को चाहिए नित विघ्न कुछ दुर्जेय; सोचने को और करने को नया संघर्ष; नव्य जय का क्षेत्र, पाने को नया उत्कर्ष।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) कवि को मनुष्य के कार्य कैसे प्रतीत होते हैं?
Answer: कवि को मनुष्य के कार्यों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे उसने प्रकृति के सभी उपादानों को अपने वश में कर लिया है और सभी उसकी इच्छानुसार कार्य कर रहे हों।
(ii) कवि मनुष्य की असीम शक्तियों का वर्णन करने के लिए किन-किन उदाहरणों का उल्लेख करता है?
Answer: कवि मनुष्य की असीम शक्तियों का उदाहरण देने के लिए जलदेवता का उदाहरण देते हुए कहता है कि जलदेवता मनुष्य की माँगों का पालन करते हुए जहाँ जल की आवश्यकता है वहाँ जल की उपस्थिति करा देते हैं, जहाँ जल का अथाह भण्डार हैं वहाँ नदियों पर बाँध बनाकर सूखे मैदान बनाने में सक्षम है। इसके अतिरिक्त रेडियो यन्त्रों व परमाणु शक्तियों का उपयोग भी उसकी असीम शक्तियों का द्योतक है।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में मनुष्य की किस प्रवृत्ति को प्रकट किया गया है?
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में मनुष्य की निरन्तर कुछ नया प्राप्त करने की इच्छा की प्रवृत्ति को प्रकट किया गया है। कवि कहता है कि आधुनिक मनुष्य अपने लिए ऐसे दुर्गम और कठिन मार्ग तथा बाधाओं को आमन्त्रित करता रहता हैं, जिन पर कठिनाई से ही सही, किन्तु सफलता अवश्य प्राप्त की जा
(iv) प्रस्तुत पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने मनुष्य की असीम शक्तियों व निरन्तर संघर्ष करते हुए मानव जीवन को सरल एवं सुगम बनाने की इचछाओं व मानसिकता को उद्घाटित किया है। अपनी इसी इच्छाशक्ति के बल पर उसने विभिन्न प्राकृतिक उपादनों पर नियन्त्रण प्राप्त कर लिया है।
(v) 'भू' व 'सिन्धु' शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
Answer:

शब्दपर्यायवाची शब्द
भूभूमि, पृथ्वी
सिन्धुसमुद्र, जलधि

In simple words: This poem celebrates the 'modern man' as a master of nature, capable of controlling elements and conquering space and time with his intellect and power. Despite his immense achievements, the poet suggests humanity needs to constantly seek new challenges and self-improvement for true progress.

🎯 Exam Tip: Focus on the concept of 'Abhinav Manushya' (Modern Man) as a force controlling nature and advancing science. Highlight the poet's message about continuous struggle and self-transcendence. Ensure your explanation covers both the achievements and the philosophical quest for further evolution.

 

Question 5. यह मनुज, ब्रह्माण्ड का सबसे सुरम्य प्रकाश, कुछ छिपा सकते न जिससे भूमि या आकाश । यह मनुज, जिसकी शिखा उद्दाम, कर रहे जिसको चराचर भक्तियुक्त प्रणाम । यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार, ज्ञान का, विज्ञान का, आलोक का आगार । 'व्योम से पाताल तक सब कुछ इसे है ज्ञेय', पर न यह परिचय मनुज का, यह न उसका श्रेय । श्रेय उसका बुद्धि पर चैतन्य उर की जीत; श्रेय मानव की असीमित मानवों से प्रीत । एक नर से दूसरे के बीच का व्यवधान तोड़ दे जो, बस, वही ज्ञानी, वही विद्वान्, और मानव भी वही ।। सावधान, मनुष्य! यदि विज्ञान है तलवार, तो इसे दे फेंक, तजकर मोह, स्मृति के पार । हो चुका है सिद्ध, है तू शिशु अभी अज्ञान; फूल काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान। खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार, काट लेगा अंग, तीखी हैं बड़ी यह धार ।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश में कवि मनुष्य को सृष्टि का सर्वाधिक ज्ञानवान प्राणी स्वीकारते हुए कहता है कि उसने अपनी सामर्थ्य से सृष्टि से सम्बन्धित ज्ञान को प्राप्त किया है, लेकिन मनुष्य को उसके नकारात्मक व विनाशकारी परिमाणों के प्रति सचेत रहने के लिए भी कहता है।
(ii) कवि के अनुसार कौन-सा मनुष्य ज्ञानी है?
Answer: कवि के अनुसार वहीं मनुष्य ज्ञानी एवं विद्वान् है, जो मनुष्यों के बीच में बढ़ती हुई दूरी को मिटा दे। वास्तव में वहीं मनुष्य श्रेष्ठ है, जो स्वयं को एकाकी न समझे, अपितु सम्पूर्ण पृथ्वी को अपना परिवार समझे ।
(iii) मनुष्य को आविष्कारों के प्रति क्यों सचेत रहना आवश्यक है?
Answer: कवि के अनुसार मनुष्य द्वारा किए गए आविष्कार तलवार से खेलने के समान हैं, जो मानव समुदाय के हित में नहीं है। मनुष्य द्वारा किए गए आविष्कारों के कारण वातावरण में विनाश की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई हैं। अतः उसे अपने आविष्कारों के प्रति सचेत रहना चाहिए।
(iv) कवि मनुष्य की तुलना अज्ञानी शिशु से क्यों करता है?
Answer: कवि मनुष्य के वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रति अत्यधिक मोह व उसके परिणामों के प्रति सचेत न होने के कारण उसे अज्ञानी शिशु कहता है। उसका मानना है कि विज्ञान के आविष्कार फूलों के संग लगे हुए काँटों के समान हैं। अतः मनुष्य को इनका अनावश्यक उपयोग नहीं करना चाहिए।
(v) 'व्योम' व 'ज्ञेय' शब्दों के विलोमार्थक शब्द लिखिए।
Answer:

शब्दविलोमार्थक शब्द
व्योमपाताल
ज्ञेयअज्ञेय

In simple words: The poem describes humanity as the most brilliant creation, a beacon of knowledge and science. However, it warns against the destructive potential of uncontrolled scientific progress, urging humans to prioritize emotional wisdom and unity over mere intellectual achievements, lest they act like an ignorant child with a dangerous tool.

🎯 Exam Tip: Focus on the dual nature of humanity's power-its capacity for knowledge and creation versus its potential for destruction. Emphasize the poet's call for wisdom, compassion, and unity to guide scientific advancements. Marks are awarded for a balanced understanding of human potential and the cautionary message regarding misuse of power.

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