UP Board Solutions Class 12 Sahityik Hindi Padya Chapter 10 Maine Aahuti Bankar Dekha Hiroshima

Step-by-Step Textbook Solutions for Class 12 Sahityik Hindi Chapter 10 मैंने आहुति बनकर देखा हिरोशिमा

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मैंने आहुति बनकर देखा / हिरोशिमा – जीवन/साहित्यिक परिचय

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर देना होता हैं। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' का जन्म वर्ष 1911 में हुआ था। इनके पिता पण्डित हीरानन्द शास्त्री पंजाब के करतारपुर (तत्कालीन जालन्धर जिला) के निवासी और वत्स गोत्रीय सारस्वत ब्राह्मण थे। अज्ञेय का जीवन एवं व्यक्तित्व बचपन से ही अन्तर्मुखी एवं आत्मकेन्द्रित होने लगा था। भारत की स्वाधीनता की लड़ाई एवं क्रान्तिकारी आन्दोलन में भाग लेने के कारण इन्हें 4 वर्षों तक जेल में तथा 2 वर्षों तक घर में नजरबन्द रखा गया। इन्होंने बी.एस.सी. करने के बाद अंग्रेजी, हिन्दी एवं संस्कृत का गहन स्वाध्याय किया। सैनिक', 'विशाल भारत', 'प्रतीक' और अंग्रेजी त्रैमासिक 'वा' का सम्पादन किया। इन्होंने समाचार साप्ताहिक 'दिनमान' और 'नया भती' पत्रों का भी सम्पादन किया। तकालीन प्रगतिवादी काव्य का ही एक रुप 'प्रयोगवाद' काव्यान्दोलन के रूप में प्रतिफलित हुआ । इसका प्रवर्तन 'तार सप्तक' के माध्यम से 'अज्ञेय' ने किया। तार सप्तक की भूमिका इस नए आन्दोलन का घोषणा-पत्र सिद्ध हुई। हिन्दी के इस महान् विभूति का स्वर्गवास 4 अप्रैल, 1987 को हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ

अज्ञेय प्रयोगशील नूतन परम्परा के ध्वज वाहक होने के साथ साथ अपने पीछे अनेक कवियों को लेकर चलते हैं, जो उन्हीं के समान नवीन विषयों एवं नवीन शिष्य के समर्थक हैं। अज्ञेय उन रचनाकारों में से हैं जिन्होंने आधुनिक हिन्दी साहित्य को एक नया आयाम, नया सम्मान एवं नया गौरव प्रदान किया। हिन्दी साहित्य को आधुनिक बनाने का श्रेय अज्ञेय को जाता है। अज्ञेय का कवि, साहित्यकार, गद्यकार, सम्पादक, पत्रकार सभी रूपों में महत्वपूर्ण स्थान है।

कृतियाँ

'अज्ञेय' ने साहित्य के गद्य एवं पद्म दोनों विधाओं में लेखन कार्य किए।
1. कविता संग्रह भग्नदूत, चिन्ता, इत्यलम्, हरी घास पर क्षणभर, बावरा अहेरी, इन्द्र धनुष रौंदे हुए थे, आँगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, अरी ओं करुणामय प्रभामय ।
2. अंग्रेजी काव्य-कृति 'प्रिजन डेज एण्ड अदर पोयम्स'
3. निबन्ध संग्रह सब रंग और कुछ राग, आत्मनेपद, लिखि कागद कोरे आदि ।
4. आलोचना हिन्दी साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य, त्रिशंकु आदि ।
5. उपन्यास शेखर : एक जीवनी (दो भाग), नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी आदि ।
6. कहानी संग्रह विपथगा, परम्परा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, तेरे ये प्रतिरूप, अमर वल्लरी आदि ।
7. यात्रा साहित्य अरे यायावर! रहेगा याद, एक बूंद सहसा उछली ।

काव्यगत विशेषताएँ

भाव पक्ष

1. मानवतावादी दृष्टिकोण इनका दृष्टिकोण मानवतावादी था। इन्होंने अपने सूक्ष्म कलात्मक बोध, व्यापक जीवन अनुभूति, समृद्ध कल्पना-शक्ति तथा सहज लेकिन संवेतमयी अभिव्यंजना द्वारा भावनाओं के नूतन एवं अनछुए रूपों को प्रकट किया।
2. व्यक्ति की निजता को महत्त्व अज्ञेय ने समष्टि को महत्वपूर्ण मानते हुए भी व्यक्ति की निजता या महत्ता को अखण्डित बनाए रखा। व्यक्ति के मन की गरिमा को इन्होंने फिर से स्थापित किया। ये निरन्तर व्यक्ति के मन के विकास की यात्रा को महत्त्वपूर्ण मानकर चलते रहे।
3. रहस्यानुभूति अज्ञेय ने संसार की सभी वस्तुओं को ईश्वर की देन माना है तथा कवि ने प्रकृति की विराट सत्ता के प्रति अपना सर्वस्व अर्पित किया है। इस प्रकार अज्ञेय की रचनाओं में रहस्यवादी अनुभूति की प्रधानता दृष्टिगोचर होती है।
4. प्रकृति चित्रण अज्ञेय की रचनाओं में प्रकृति के विविध चित्र मिलते हैं, उनके काव्य में प्रकृति कभी अलिम्बन बनकर चित्रित होती है, तो कभी उद्दीपन बनकर । अज्ञेय ने प्रकृति का मानवीकरण करके उसे प्राणी की भाँति अपने काव्य में प्रस्तुत किया है। प्रकृति मनुष्य की ही तरह व्यवहार करती दृष्टिगोचर होती है।

कला पक्ष

1. नवीन काव्यधारा का प्रवर्तन इन्होंने मानवीय एवं प्राकृतिक जगत के स्पन्दनों को बोलचाल की भाषा में तथा वार्तालाप एवं स्वगत शैली में व्यक्त किया। इन्होंने परम्परागत आलंकारिकता एवं लाक्षणिकता के आतंक से काव्यशिल्प को मुक्त कर नवीन काव्यधारा का प्रवर्तन किया।
2. भाषा इनके काव्य में भाषा के तीन स्तर मिलते हैं
• संस्कृत की परिनिष्ठित शब्दावली
• ग्राम्य एवं देशज शब्दों का प्रयोग
• बोलचाल एवं व्यावहारिक भाषा
3. शैली इनके काव्य में विविध काव्य शैलियाँ; जैसे - छायावादी लाक्षणिक शैली, भावात्मक शैली, प्रयोगवादी सपाट शैली, व्यंग्यात्मक शैली, प्रतीकात्मक शैली एवं बिम्बात्मक शैली विद्यमान हैं।
4. प्रतीक एवं बिम्ब अज्ञेय जी के काव्य में प्रतीक एवं बिम्ब योजना दर्शनीय है। इन्होंने ब) राजीव एवं हृदयहारी बिम्ब प्रस्तुत किए तथा सार्थक प्रतीकों का प्रयोग किया।
5. अलंकार एवं छन्द इनके काव्य में उपमा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंलकार है। इसके साथ-साथ रूपक, उल्लेख, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण, विशेषण-विपर्यय अंलकार भी प्रयुक्त हुए हैं। इन्होंने मुक्त छन्दों का खुलकर प्रयोग किया है। इसके अलावा गीतिका, बरवै, हरिगीतिका, मालिनी, शिखरिणी आदि छन्दों का भी प्रयोग किया है।

हिन्दी साहित्य में स्थान

अज्ञेय जी नई कविता के कर्णधार माने जाते हैं। ये प्रत्यक्ष का यथावत् चित्रण करने वाले सर्वप्रथम साहित्यकार थे। देश और समाज के प्रति इनके मन में अपार वेदना थी। 'नई कविता' के जनक के रूप में इन्हें सदा याद किया जाता रहेगा।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्म भाग से दो पट्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

मैंने आहुति बनकर देखा

 

Question 1. मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरु नन्दन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रान्तर का ओछा फूल बने? मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले? मैं कब कहता हूँ प्यार करूं तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले? मैं कब कहता हूँ विजय करू-मेरा ऊँचा प्रासाद बर्ने? या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने? पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकले करे यह चाह मुझे? नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे?
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश के रचनाकार और रचना का नाम बताइए ।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश के रचनाकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन” अज्ञेय' जी हैं। और रचना 'मैंने आहुति बनकर देखा' है।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि कैसा व्यक्ति वास्तविक जीवन जीता है?
Answer: कवि ने मानव जीवन की सार्थकता बताते हुए स्पष्ट किया है कि दुःख के बीच पीड़ा सहकर अपना मार्ग प्रशस्त करने वाला तथा दूसरों की पीड़ा हरकर उनमें प्रेम का बीज बोने वाली व्यक्ति ही वास्तविक जीवन जीता है।
(iii) “काँटा कठोर हैं, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा हैं।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पंक्ति का आशय यह है कि जिस प्रकार काँटे की श्रेष्ठता उपवन के तच फल में परिवर्तित हो जाने में नहीं, वरन अपने कठोरपन एवं नुकीलेपन में निहित है, उसी प्रकार जीवन की सार्थकता संघर्ष एवं दुःखों से लड़ने में है।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में दुःख को सुख की तरह, असफलता को सफलता की तरह और हार को जीत की तरह स्वीकार कर कार्य-पथ पर अडिग होकर चलने का भाव व्यक्त किया गया है।
(v) अनुकूल और नेतृत्व शब्दों में क्रमशः उपसर्ग एवं प्रत्यय बताइए ।
Answer: अनुकूल - अनु (उपसर्ग), नेतृत्व - त्व (प्रत्यय)।
In simple words: यह पद्यांश जीवन के संघर्षों को स्वीकार करने, कठिनाइयों से न घबराने और अपने मार्ग पर दृढ़ता से चलने का संदेश देता है, जहाँ व्यक्ति की सार्थकता परिस्थितियों के अनुकूल बनने में नहीं, बल्कि चुनौतियों का सामना करने में है।

🎯 Exam Tip: पद्यांश के भावार्थ, अलंकार और व्याकरणिक तत्वों की सही पहचान पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि ये उत्तर की गहराई और सटीकता को बढ़ाते हैं।

 

Question 2. मैं प्रस्तुत हुँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने - फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गतिरोधक शुल बने । अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है— क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसु की माला हैं? वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है - वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन-कारी हाला है। मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया - मैंने आहुति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है! मैं कहता हूँ मैं बढ़ती हूँ मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ। कुचला जाकर भी धूली-सा आँधी-सा और उमड़ता हूँ। मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने! भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने - तेरी पुकार-सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने!
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अपनी कैसी चाह (इच्छा) को व्यक्त किया है?
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में कवि को अपने जनपद की धूल बन जाना स्वीकार है, भले ही उस धूल का प्रत्येक कण उसे जीवन में आगे बढ़ने से रोके और उसके लिए पीड़ादायक ही क्यों न बन जाए। इसके पश्चात् भी वह कष्ट सहकर मातृभूमि की सेवा करने या उसके काम आ जाने की चाह व्यक्त करता है।
(ii) प्रेम की वास्तविक अनुभूति से कैसे लोग अनभिज्ञ रह जाते हैं?
Answer: प्रेम को जीवन के अनुभव का कड़वा प्याला मानने वाले लोग सकारात्मक दृष्टिकोण के नहीं होते, अपितु वे मानसिक रूप से विकृत होते हैं, किन्तु वे लोग भी चेतना विहीन निर्जीव की भाँति ही हैं। जिनके लिए प्रेम की चेतना लुप्त करने वाली मदिरा है, क्योंकि ऐसे लोग प्रेम की वास्तविक अनुभूति से अनभिज्ञ रह जाते हैं।
(iii) कवि ने धूल से क्या प्रेरणा ली है?
Answer: कवि धूल से प्रेरणा लेते हुए कहता है कि जिस प्रकार धूल लोगों के पैरों तले रौदी जाती है, परन्तु वह हार न मानकर उल्टे औंधी के रूप में आकर रौंदने वाले को ही पीड़ा पाँचाने लगती है। उसी प्रकार मैं भी जीवन के संघर्षों से पछाड़ खाकर कभी हार नहीं मानता और आशान्वित व होकर आगे की और बढ़ता चला जाता हैं।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में निहित उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने जीवन में संघर्ष के महत्व पर बल दिया है। यदि हमारे समक्ष कोई जटिल समस्या आ जाए, तो हमें उसका सामना करते हुए उसका समाधान ढूँढना चाहिए। जो लोग इन समस्याओं का सामना करने से घबराते हैं, वास्तव में उनके जीवन को सार्थक नहीं कहा जा सकता।
(v) “इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने ।” प्रस्तुत पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
Answer: प्रस्तुत पंक्ति में 'पग' शब्द की पुनरावृत्ति हुई है, अतः यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
In simple words: कवि इस पद्यांश में मातृभूमि के प्रति समर्पण, प्रेम की सच्ची अनुभूति और जीवन के हर संघर्ष में दृढ़ता से खड़े रहने की प्रेरणा देता है, भले ही मार्ग में कितनी भी बाधाएँ क्यों न आएं।

🎯 Exam Tip: कवि के विचारों और प्रतीकों का गहराई से विश्लेषण करें। अलंकार और उनके प्रभावों को स्पष्ट रूप से समझाना उच्च अंक प्राप्त करने में सहायक होगा।

हिरोशिमा

 

Question 3. एक दिन सहसा सूरज निकला अरे क्षितिज पर नहीं, नगर के चौक; धूप बरसी, पर अन्तरिक्ष से नहीं फटी मिट्टी से। छायाएँ मानव-जन की दिशाहीन, सब ओर पड़ी-वह सूरज नहीं उगा था पूरब में, वह बरसा सहसा बीचो-बीच नगर के; काल-सूर्य के रर्थ के पहियों के ज्यों अरे टूट कर, बिखर गए हों दसों दिशा में! कुछ क्षण का वह उदय-अस्त! केवल एक प्रज्वलित क्षण की दृश्य सोख लेने वाली दोपहरी फिर।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश के रचनाकार और रचना का नाम बताइए।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश के रचनाकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' है तथा यद् पद्यांश 'हिरोशिमा' कविता से उद्घृत हैं।
(ii) प्रस्तुत पद्मांश में किस समय का वर्णन किया गया है?
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में द्वितीय विश्वयुद्ध की उस भीषण तबाही का उल्लेख किया गया है, जब अमेरिका द्वारा हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया गया था।
(iii) हिरोशिमा नगर में परमाणु बम विस्फोट के परिणाम क्या हुए?
Answer: हिरोशिमा नगर के जिस स्थान पर बम गिराया गया था, वहाँ की भूमि बड़े बड़े गड्डों में परिवर्तित हो गई थी, जिसे फटी मिट्टी कहा गया है। वहाँ बहुत अधिक मात्रा में विषैली गैसें निकल रहीं थीं और उनसे निकलने वाले ताप से समस्त प्रकृति मुलस रही थी। विस्फोट के दौरान निकली विकिरणें मान्य के अस्तित्व को मिटा रही थीं।
(iv) “काल-सूर्य के रथ के पहियों के ज्यों अरे टूट कर, बिखर गए हों” पंक्ति से कवि का क्या आशय है?
Answer: परमाणु विस्फोट के पश्चात् सूर्य का उदय प्रतिदिन की तरह पूर्व दिशा से नहीं हुआ था, वरन् उसका उदय अचानक ही हिरोशिमा के मध्य स्थित भूमि से हुआ था। उस सूर्य को देखकर ऐसा आभास हो रहा था जैसे काल अर्थात् मृत्युरूपी सूर्य रथ पर सवार होकर उदित हुआ हो और उसके पहियों के उड़े टूट-टूटकर इधर-उधर दसों दिशाओं में जा बिखरे हों।
(v) 'काल' शब्द के तीन पर्यायवाची शब्द बताइए।
Answer:

शब्दपर्यायवाची शब्द
कालसमय
क्षणवक्त

In simple words: यह पद्यांश हिरोशिमा पर हुए परमाणु बम हमले की भयावहता का वर्णन करता है, जहाँ कृत्रिम 'सूरज' (बम) के उदय ने पल भर में सब कुछ राख कर दिया और मानव निर्मित त्रासदी की भयावहता को उजागर किया।

🎯 Exam Tip: ऐतिहासिक संदर्भों को पद्यांश के अर्थ से जोड़ें। भीषणता का वर्णन करने वाले शब्दों और कवि द्वारा प्रयुक्त प्रतीकों को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. छायाएँ मानव-जन की, नहीं मिटीं लम्बी हो-होकर; मानव ही सब भाप हो गए। छायाएँ तो अभी लिखीं हैं, झुलसे हुए पत्थरों पर उजड़ी सड़कों की गच पर। मानव का रचा हुआ सूरज मानव को भाप बनाकर सोख गया। पत्थर पर लिखी हुई यह जली हुई छाया मानव की साखी है।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(i) प्रस्तुत पट्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पट्यांश के माध्यम से मानव द्वारा विज्ञान का दुरुपयोग किए जाने पर दुःख जताया गया है, ताकि परमाणु बम गिराने जैसी मानव-विनाशी गलती की पुनरावृत्ति न हो पाए।
(ii) कवि ने आकाशीय सूर्य की तुलना मानव निर्मित सुर्य से किस प्रकार की है?
Answer: कवि आकाशीय सूर्य से मानव निर्मित सूर्य की तुलना करते हुए कहता है। कि आकाश का सूर्य हमारे लिए वरदान स्वरूप है, उससे हमें जीवन मिलता है, परन्तु मानव निर्मित सूर्य परमाणु बम अति विध्वंसक है, क्योंकि इसने अपनी विकिरणों से मानव को वाष्प में परिणत कर उसकी जीवन लीला ही समाप्त कर दी।
(iii) “आयाएँ तो अभी लिखीं हैं झुलसे हुए पत्थरों पर” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
Answer: परमाणु विस्फोट के दुष्परिणाम स्वरूप उत्सर्जित विकिरणों ने मानव को जलाकर वाष्य में बदल दिया, किन्तु उनकी छायाएँ लम्बी होकर भी समाप्त नहीं हुई हैं। विकिरणों से झुलसे पत्थरों तथा क्षतिग्रस्त हुई सड़कों की दरारों पर, वे मानवीय छायाएँ आज भी विद्यमान हैं और मौन होकर उस भीषण त्रासदी की कहानी कह रही हैं।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि अत्यन्त मर्माहित क्यों हुआ है?
Answer: प्रस्तुत पट्यांश में मानव जीवन की त्रासदी का वर्णन किया गया है। यहाँ मानव ही मानव के विध्वंस का कारण हैं। मानव के इस दानव रूप को देखकर कवि अत्यन्त मर्माहित हो उठा है।
(v) प्रस्तुत पद्मांश में कौन-सा रस है?
Answer: मानव जाति के विध्वंस के कारण शोक की स्थिति उत्पन्न हुई है। अतः प्रस्तुत पद्मांश में करुण रस है।
In simple words: यह पद्यांश मानव निर्मित विनाशकारी शक्ति (परमाणु बम) के दुष्परिणामों को दर्शाता है, जहाँ मानव शरीर तो भाप बन गए लेकिन उनकी दर्दनाक छायाएँ आज भी पत्थरों पर अंकित होकर त्रासदी की गवाह हैं।

🎯 Exam Tip: कवि की संवेदनशीलता और मानवता के प्रति चिंता को उजागर करें। रस की पहचान करते समय उसके स्थायी भाव और प्रभावों का उल्लेख करें।

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