UP Board Solutions Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning Process Laws and Methods

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Class 12 Pedagogy Chapter 18 अर्थ सीखने की प्रक्रिया, नियम और विधियाँ UP Board Solutions PDF

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

Question 1. सीखने का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। सीखने की विशेषताओं का सामान्य विवरण भी प्रस्तुत कीजिए ।
Answer: सीखने का अर्थ व परिभाषा जीवन की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए गते अनुभवों की सहायता से व्यवहार में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया को हम सीखना कहते हैं। वास्तव में, 'सीखना किसी स्थिति के प्रति एक सक्रिय प्रतिक्रिया है। इस प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ही व्यक्ति के व्यवहार में प्रगतिशील परिवर्तन होते हैं। प्रत्येक प्रतिक्रिया एक अनुभव देती है और यह अनुभव व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन लाता है। इस सम्पूर्ण प्रतिक्रिया को ही हम सीखना कहते हैं। सीखने की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं।
(i) वुडवर्थ : (Woodworth) के अनुसार, “नवीन ज्ञान और प्रतिक्रियाओं को करने की प्रक्रिया, सीखने की प्रक्रिया है।”
(ii) गेट्स : व अन्य के अनुसार, “अनुभवों और प्रशिक्षण द्वारा अपने व्यवहारों का संशोधन करना ही सीखना है।”
(iii) स्किनर : (Skinner) के अनुसार, “सीखना व्यवहार में प्रगतिशील सामंजस्य की प्रतिक्रिया”
(iv) क्रॉनबैक : (Cronback) के अनुसार, “सीखना, अनुभव के फलस्वरूप व्यवहार में परिवर्तन द्वारा अभिव्यक्त होता है।"
(v) कॉलविन : (Colvin) के अनुसार, “अनुभव के आधार पर हमारे पूर्व-निर्मित व्यवहार में परिवर्तन की प्रक्रिया ही सीखना है।"
(vi) गिलफोर्ड : (Guilford) के अनुसार, “व्यवहार के कारण, व्यवहार में परिवर्तन ही सीखना”
(vii) जी० डी० बॉज : (G. D. Boaz) के अनुसार, “सीखना एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति विभिन्न आदतों, ज्ञान एवं दृष्टिकोण सामान्य जीवन की माँगों की पूर्ति के लिए अर्जित करता है।
(viii) क्रो व क्रो : (Crow & Crow) के अनुसार, “ज्ञान और अभिवृत्ति की प्राप्ति ही सीखना है।”
(ix) प्रेसी : (Pressy) के अनुसार, “सीखना एक अनुभव है, जिसके द्वारा कार्य में परिवर्तन या समायोजन होता है तथा व्यवहार की गयी विधि प्राप्त होती है।”
(x) हिलगार्ड : (Hilgard) के अनुसार, "सीखना एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कोई प्रक्रिया आरम्भ होती है या सामना की गयी परिस्थिति द्वारा परिवर्तित की जाती है। इसके लिए आवश्यक है कि क्रिया के परिवर्तन की विशेषताओं, मूल-प्रवृत्तियों की प्रक्रिया, परिपक्वता या प्राणी की अस्थायी आवश्यकताओं के आधार पर उस प्रक्रिया को समझाया न जा सके।”
उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि
• सीखने का अर्थ व्यवहार में परिवर्तन है।
• सीखना व्यवहार का संगठन है।
• सीखना नवीन प्रक्रिया की पुष्टि है।
सीखने की प्रमुख विशेषताएँ सीखने की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. सीखना परिवर्तन है : अनुभव जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता रहता है। हर समय व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है और इसके लाभ उठाकर व्यक्ति अपने सीखने की प्रमुख विशेषताएँ व्यवहार में परिवर्तन करता है। अतः सीखना परिवर्तन है।
2. सीखना खोज करना है : मर्सेल (Mursell) के अनुसार, “सीखना उसे तथ्य खोजने और जानने का कार्य है, जिसे व्यक्ति खोजना और जानना चाहता है। वास्तव में, सीखना एक प्रकार से खोज करना है। आज मानव ने जो प्रगति की है, उसको मूल आधार इस प्रकार का सीखना ही है।
3. सीखना जीवन-पर्यन्त चलता है : अनुभव का जीवन में विशेष महत्त्व हैं, और यह जन्म से लेकर मृत्यु तक निरन्तर चलता रहता है। व्यक्ति जीवनभर कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है और यह प्रक्रिया निरन्तर मृत्यु तक चलती ही रहती है।
4. सीखना सक्रिय है : सीखना बिना सक्रियता के सम्भव नहीं है। बालक सक्रिय होकर ही सीखता है।
5. सीखना विकास है : सीखना एक विकास है, जिसका कभी अन्त नहीं होता है। प्रत्येक पल व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखती रहता है, जिसके परिणामस्वरूप उसका मानसिक विकास होता रहता है।
6. सीखना अनुभवों का संगठन है : एक व्यक्ति जैसे-जैसे अपने अनुभवों के आधार पर नवीन बातें सीखता है, वैसे-ही-वैसे वह आवश्यकतानुसार अपने अनुभवों को संगठित करता जाता है।
7. सीखना सार्वभौमिक है : सीखना एक सार्वभौमिक क्रिया है, जो समस्त प्राणियों में पायी जाती है। विकास की श्रेणियों के आधार पर प्राणियों के सीखने में अन्तर होता है। पशु-पक्षी कम सीखते हैं, क्योंकि उनमें अपने अनुभव से लाभ उठाने की क्षमता कम होती है। सीखने की प्रवृत्ति मनुष्य में सबसे अधिक पायी जाती है।
8. सीखना उद्देश्यपूर्ण है : सीखना उद्देश्यपूर्ण होता है। बिना उद्देश्य के सीखना सफल नहीं हो सकता। उद्देश्य की प्रबलता ही सीखने की क्रिया तीव्र करती है।
9. सीखना समायोजन है : सीखकर मनुष्य अपने को वातावरण से समायोजित करता है। इस प्रकार का समायोजन करना ही सीखना है।
In simple words: सीखना जीवनपर्यन्त चलने वाली एक प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति अपने अनुभवों के आधार पर व्यवहार में परिवर्तन लाता है। इसकी प्रमुख विशेषताओं में परिवर्तन, खोज, विकास, सक्रियता, सार्वभौमिकता, उद्देश्यों के प्रति सचेतता और समायोजन शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: सीखने की परिभाषाएँ और प्रमुख विशेषताएँ याद करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये सीधे प्रश्न के रूप में पूछे जा सकते हैं।

 

Question 2. सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए। या सीखने को प्रभावित करने वाले कारकों को बताइए ।
Answer: सीखने को प्रभावित करने वाले कारक सीखने की प्रक्रिया में अनेक बातें सहायक और बाधक होती हैं। यहाँ हम उन कारकों का अध्ययन करेंगे, जिनसे सीखने की क्रिया प्रभावित होती है।
1. वातावरण : वातावरण प्रमुख कारक है, जो सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। यदि कक्षा का वातावरण शोरगुलयुक्त है, तो छात्र अपना ध्यान एकाग्र नहीं कर सकेंगे। परिणामस्वरूप वे ठीक प्रकार से सीख भी नहीं सकेंगे। उसके अतिरिक्त यदि छात्रों के बैठने की व्यवस्था उचित प्रकार से नहीं है, प्रकाश और वायु के आवागमन की भी उचित व्यवस्था नहीं है तो भी छात्र ठीक प्रकार से नहीं सीख सकेंगे। मौसम का प्रभाव भी सीखने पर पड़ता है। अत्यधिक ठण्डक और अत्यधिक गर्मी दोनों ही सीखने में बाधा पहुँचाती हैं।
2. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य : यदि बालकों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक होगा तो वह किसी भी बात को शीघ्रता से सीख जाएगा। शारीरिक और मानसिक दृष्टि से पिछड़े बालक प्रायः पढ़ने-लिखने में कमजोर रहते हैं और वे बहुत देर से सीख पाते हैं।
3. सीखने का समय : बालक अधिक समय तक किसी विषय पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकती, क्योंकि अधिक समय तक ध्यान केन्द्रित करने में उनमें थकावट आ जाती है और उनका ध्यान इधर-उधर भटकने लगता है। दूसरी ओर प्रातःकाल छात्र अधिक स्फूर्ति का अनुभव करते हैं। अतः इस समय उन्हें सीखने में सुगमता होती है। दोपहर अथवा शाम को वह इतना अधिक नहीं सीख पाते। इसी प्रकार विद्यालय के प्रथम घण्टे में जो सीखने की गति होती है, वह अन्त के घण्टों में बहुत कम हो जाती है।
4. विषय-सामग्री : कठिन, नीरस तथा अर्थहीन विषय-सामग्री की अपेक्षा सरल, रोचक तथा अर्थपूर्ण विषय-सामग्री अधिक सुगमता से सीख ली जाती है।
5. सीखने की अवस्था : प्रौढ़ व्यक्तियों की अपेक्षा छोटे पाक से बालक किसी बात को शीघ्र समझ जाते हैं। भाषा और कला के विषय में यह बात मुख्य रूप से लागू होती है, परन्तु कुछ बातें बालकों की । अपेक्षा प्रौढ़ जल्दी समझते हैं ।
6. सीखने की इच्छा : सीखना बहुत कुछ व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। जिस बात को सीखने की बालकों की प्रबल इच्छा होती है, उसे वे प्रत्येक परिस्थिति में सीख लेते हैं। उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें कुछ भी नहीं सिखाया जा सकता है। अतः किसी तथ्य को सीखने के लिए छात्रों की इच्छा को उसके अनुकूल बनाना परम आवश्यक है।
7. सीखने की विधियाँ : सीखने की विधि जितनी ही अधिक सरल, आकर्षक तथा रुचिपूर्ण होगी, उतनी ही सरलता तथा शीघ्रता से बालक सीखेगा।
8. पूर्व अनुभव : बालक जो कुछ भी सीखता है, वह प्रायः अपने पूर्व अनुभव के आधार पर ही सीखता है। यदि सीखने का सम्बन्ध बालक के पूर्व अनुभव से कर दिया जाए तो वह नवीन बात शीघ्रता तथा सरलता से समझ जाएगा।
9. प्रेरणा : सीखने की प्रक्रिया में प्रेरणा की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि बालकों को प्रशंसा तथा प्रतियोगिता के आधार पर सिखाया जाए तो वे सुगमता से सीख जाते हैं। सीखने के लिए बालक को प्रेस्ति करना अति आवश्यक है।
10. संवेगात्मक स्थिति : यदि बालक अत्यधिक क्रोध या भय से ग्रस्त है तो वह ऐसी दशा में कुछ नहीं सीख सकता। संवेगात्मक अस्थिरता सीखने की प्रक्रिया में बाधा डालती है। अतः बालक को संवेगात्मक असन्तुलन या अस्थिरता की दशा में सीखना पूर्णतया असम्भव है।
11. सफलता का ज्ञान : जब बालक को इस बात का ज्ञान हो जाता है कि उसे अपने कार्यों में सफलता मिल रही है तो उसका उत्साह बढ़ जाता है और उसे कार्य को शीघ्र समझे जाता है।
In simple words: सीखने की प्रक्रिया कई कारकों जैसे वातावरण, शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य, सीखने का समय, विषय-सामग्री, सीखने की अवस्था, इच्छा, विधियाँ, पूर्व अनुभव, प्रेरणा, संवेगात्मक स्थिति और सफलता के ज्ञान से प्रभावित होती है। इन सभी कारकों का सीखने की गति और गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है।

🎯 Exam Tip: सीखने को प्रभावित करने वाले कारकों को समझना शैक्षिक सुधार और प्रभावी शिक्षण रणनीतियों को विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण है। विभिन्न कारकों और उनके प्रभावों पर ध्यान दें।

 

Question 3. थॉर्नडाइक के सीखने के नियम क्या हैं? पावलोव के प्रयोग द्वारा सम्बन्ध प्रत्यावर्तन, का सिद्धान्त समझाइए । या प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखने की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। या अधिगम के प्रयास एवं भूल सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
Answer: प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखना इस विधि या सिद्धान्त के प्रतिपादक थॉर्नडाइक हैं और मैक्डूगल ने इसका समर्थन किया है। थॉर्नडाइक के अनुसार जब हम किसी कार्य को सीखते हैं तो हमारे सामने एक विशेष उद्दीपक (Stimulus) होता है। यह उद्दीपक हमें एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया (Response) करने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार उद्दीपक और प्रतिक्रिया के सम्बन्ध की स्थापना हो जाती है। थॉर्नडाइक ने इसे उद्दीपक-क्रिया-सम्बन्ध बताया है।
उनके अनुसार उद्दीपक-प्रतिक्रिया सम्बन्ध के परिणामस्वरूप जब हम भविष्य के उसी उद्दीपक का पुनः अनुभव करते हैं, तब हम उससे सम्बन्धित उस प्रकार की प्रतिक्रिया करते हैं। यही हमारे सीखने का आधार है। थॉर्नडाइक के अनुसार, “सीखना, सम्बन्ध स्थापित करना है। सम्बन्ध स्थापित करने का कार्य मस्तिष्क करता है।
1. थॉर्नडाइक : थॉर्नडाइक के इस सिद्धान्त का सार यह है कि जब हम किसी नवीन बात को सीखते हैं, तो हम तत्काल ही उसे नहीं सीख पाते, वरन् हमें उस बात को सीखने के लिए अनेक प्रयास करने पड़ते हैं और इन प्रयासों के दौरान हम कई त्रुटियाँ भी कर सकते हैं। धीरे-धीरे हमारी त्रुटियों में कमी होती जाती है और हम तथाकथित बात को सीख जाते हैं। उदाहरण के लिए-जब एक बालक प्रारम्भ में पढ़ना-लिखना सीखता है तो आरम्भ में तो एक अक्षर भी ठीक प्रकार से नहीं लिख पाता और न ही वह शब्दों का सही उच्चारण ही कर पाता है, लेकिन ज्यों-ज्यों वह प्रयास करता है, उसकी त्रुटियों या भूलों में कमी आती जाती है और अन्ततः वह अक्षरों का लिखना और शब्दों का सही उच्चारण करना सीख जाता है। इस विधि से मनुष्य और पशु ही अधिक सीखते हैं। थॉर्नडाइक, मैक्डूगल आदि मनोवैज्ञानिकों ने पशुओं पर भी प्रयोग करके इसका सत्यापन किया
2. थॉर्नडाइक का प्रयोग : थॉर्नडाइक ने प्रयास एवं त्रुटि या भूल एवं प्रयत्न विधि का सत्यापन करने के लिए एक बिल्ली पर प्रयोग किया। उसने एक भूखी बिल्ली को पिंजरे में बन्द कर दिया। इस पिंजरे में एक बटन लगा था जिसके दबाने पर पिंजरे का दरवाजा झटके के साथ खुल जाता था। उसने पिंजरे के बाहर कुछ भोजन रख दिया। भूखी बिल्ली के लिए भोजन उद्दीपक था। अतः भोजन को देखकर बिल्ली में प्रतिक्रिया हुई।
उसने अनेक प्रकार से निकलने का प्रयास किया। अचानक उसका पंजा बटन पर पड़ गया। पिंजरे का दरवाजा झटके के साथ खुल गया और उसने बाहर आकर भोजन चट कर लिया। कुछ काल के बाद जब बिल्ली को पुनः पिंजरे में बन्द किया गया तो वह बिना कोई त्रुटि किये बटन दबाकर दरवाजा खोलने लगी। इस प्रकार उद्दीपक तथा प्रतिक्रिया में सम्बन्ध की स्थापना से बिल्ली ने बटन दबाकर दरवाजा खोलना सीखा।
In simple words: थॉर्नडाइक का प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत बताता है कि सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति या पशु विभिन्न प्रयासों से सीखते हैं, जिसमें शुरू में कई गलतियाँ होती हैं जो धीरे-धीरे कम होती जाती हैं। यह सिद्धांत उद्दीपक और प्रतिक्रिया के बीच संबंध स्थापित करने पर आधारित है, जैसा कि बिल्ली पर किए गए प्रयोग से सिद्ध होता है।

🎯 Exam Tip: थॉर्नडाइक के प्रयास एवं त्रुटि सिद्धांत को उदाहरण सहित समझना महत्वपूर्ण है, खासकर उनके बिल्ली पर किए गए प्रयोग को। यह सिद्धांत सीखने के मौलिक तरीकों में से एक है।

 

Question 4. सम्बद्ध प्रत्यावर्तन द्वारा सीखने का प्रयोग सहित वर्णन कीजिए और इसकी शैक्षिक उपयोगिता बताइए। या आई० पी०पावलोव द्वारा किये गये प्रयोग को लिखिए और इसकी सहायता से 'अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धान्त का विवेचन कीजिए। इसकी शैक्षिक उपयोगिता भी लिखिए। या कोहलर द्वारा किये गये किसी एक प्रयोग को लिखिए और इसकी सहायता से अन्तर्दृष्टि से सीखने के सिद्धान्त का विवेचन कीजिए । या अन्तर्दृष्टि अधिगम सिद्धान्त के प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए और इसके शैक्षिक निहितार्थ की भी चर्चा कीजिए। या सूझ द्वारा सीखने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए और शिक्षा में इसकी उपयोगिता बताइए । या सूझ द्वारा सीखने का अर्थ किसी प्रयोग की सहायता से स्पष्ट कीजिए और उसके शैक्षिक निहितार्थ बताइए । या अधिगम के सम्बन्ध में प्रत्यावर्तन सिद्धान्त की विवेचना कीजिए तथा इसके शैक्षिक निहितार्थों पर प्रकाश डालिए। या शिक्षा में अनुबन्धित प्रतिक्रिया की क्या उपयोगिता है? या सीखने के सूझ सिद्धान्त को समझाइए । या सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए और प्रयास तथा त्रटि के सिद्धान्त से इसका अन्तर बताइए ।
Answer: (अ)
सूझ या अन्तर्दृष्टि का सिद्धान्त सूझ के सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक गेस्टाल्टवादी (Gestaltist) हैं। उनके अनुसार पशु और मनुष्य 'सम्बन्ध प्रतिक्रिया' तथा 'प्रयास एवं त्रुटि' से न सीखकर सूझ या अन्तर्दृष्टि (Insight) द्वारा सीखते हैं। उनके मतानुसार सर्वप्रथम प्राणी अपने आस-पास की परिस्थिति के विभिन्न क्षेत्रों में पारस्परिक सम्बन्धों की स्थापना करता है और सम्पूर्ण परिस्थिति को समझने का प्रयास करता है। तत्पश्चात् उसके अनुसार अपनी प्रतिक्रिया करता है। दूसरे शब्दों में, 'सुझ' द्वारा सीखने का तात्पर्य परिस्थिति को पूर्णतया समझकर सीखना है। गुड (Good) के अनुसार, “समझ, यथार्थ स्थिति का आकस्मिक, निश्चित और तत्कालीन ज्ञान है।”
कोहलर का प्रयोग : सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने के लिए कोहलर (Kohler) ने छह वनमानुषों को एक कमरे में बन्द कर दिया। कमरे की छत पर केलों का एक गुच्छा लटका दिया गया तथा कमरे के एक कोने में एक बॉक्स भी रख दिया गया। समस्त वनमानुष केलों को प्राप्त करने के प्रयास करने लगे, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। उनमें से एक वनमानुष इधर-उधर घूमकर बॉक्स के पास पहुँच गया। तत्पश्चात् उसने बॉक्स को पकड़कर खींचा और उसे केलों के नीचे ले जाकर रख दिया तथा बॉक्स के ऊपर खड़े होकर उसने केलों के गुच्छे को उतार कर खा लिया।
इस प्रकार वनमानुष अपनी सूझ के आधार पर सीखते हैं। प्रत्येक कार्य या क्रिया के सीखने में हमें सूझ का प्रयोग करना पड़ता है। विभिन्न समस्याओं का हल भी सूझ के माध्यम से होता है। प्रायः देखा गया है कि किसी ऊँचे स्थान पर रखी मिठाई को बालक वनमानुष की विधि द्वारा ही प्राप्त करते हैं। कोफ्का के अनुसार, “सूझ में व्यक्ति चिन्तन, तर्क तथा कल्पना-शक्ति से विशेष काम लेता है, जिस व्यक्ति में जितनी कल्पना-शक्ति होगी, उतनी ही उसमें सूझ होगी ।” अल्प स्थान में ही एक इंजीनियर अपनी सूझ से विशाल भवन निर्मित कर देता है।
(ब)
सम्बन्ध प्रतिक्रिया का सिद्धान्त जब स्वाभाविक उत्तेजक या उद्दीपक (Stimulus) को देखकर प्रतिक्रिया होती है, तब वह सहज क्रिया (Reflex Action) कहलाती है, परन्तु जब अस्वाभाविक उत्तेजक के कारण प्रतिक्रिया होती है तो उसे सम्बन्ध सहज क्रिया या सम्बन्ध प्रतिक्रिया कहा जाता है। उदाहरण के लिए, थाली में रखे भोजन को देखकर कुत्ते के मुख से लार टपकना एक प्रकार की सहज क्रिया है, परन्तु जब किसी अन्य अस्वाभाविक उत्तेजक के कारण लार टपकने लगे तो यह सम्बन्ध प्रतिक्रिया है। लैडेल (Ledell) के अनुसार, “सम्बन्ध सहज क्रिया में कार्य के प्रति स्वाभाविक उत्तेजक के स्थान पर एक प्रभावहीन उत्तेजक होता है, जो कि स्वाभाविक उत्तेजक से सम्बन्धित किये जाने के कारण प्रभावपूर्ण हो जाता है।
इस प्रकार सम्बन्ध प्रतिक्रिया के सिद्धान्त में अस्वाभाविक उत्तेजक के प्रति स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है।
पावलोव का प्रयोग : पावलोव (Pavlov) रूस का प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक था। उसी ने सम्बन्ध प्रतिक्रिया के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस विषय में उसके द्वारा कुत्ते पर किया गया परीक्षण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह हम सब जानते हैं कि भोजन को देखकर कुत्ते की लार टपकने लगती है। पॉवलोव ने भोजन देते समय घण्टी बजवाई । भोजन और घण्टी की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप कुत्ते के मुख से लार टपकने लगी। इसी प्रकार घण्टी के प्रति कुत्ते की प्रतिक्रिया सम्बन्ध सहज क्रिया कहलाई। इसे निम्नलिखित ढंग से समझाया जा सकता है
भोजन (स्वाभाविक उत्तेजक) - प्रतिक्रिया
\( \implies \) "लार टपकना”
भोजन (स्वाभाविक उत्तेजक), घण्टी बजाना (अस्वाभाविक उत्तेजक) - प्रतिक्रिया
\( \implies \) "लार टपकना”। कुत्ते के समान ही मनुष्य भी 'सम्बन्ध प्रतिक्रिया द्वारा सीखता है। उदाहरण के लिए-हम वुडवर्ड (woodword) द्वारा किया गया परीक्षण प्रस्तुत करते हैं। एक वर्ष के बालक को खरगोश दिखाया गया। बालक खरगोश को देखकर प्रसन्न होकर उसे पकड़ने के लिए लपका। जैसे ही वह खरगोश के निकट आया, एक जोरदार धमाका किया गया। परिणामस्वरूप बालक भयभीत होकर पीछे हट गया। इस प्रयोग को अनेक बार दोहराया गया। बाद में बिना धमाके की आवाज के केवल खरगोश को देखकर ही बालक डरने लगा।
सिद्धान्त का महत्त्व शिक्षा के क्षेत्र में इस सिद्धान्त के महत्त्व से सम्बन्धित निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं
1. पावलोव के अनुसार, “विभिन्न प्रकार की आदतें, जो कि प्रशिक्षण, शिक्षा और अनुशासन पर निर्भर प्रतिक्रिया की श्रृंखला मात्र हैं।”
2. व्यक्ति का प्रत्येक व्यवहार सम्बन्ध प्रतिक्रिया के सिद्धान्त पर आधारित है। हमारी दैनिक आदतें भी इसी सिद्धान्त पर निर्भर करती हैं।
3. इस सिद्धान्त के आधार पर बालकों में अच्छी आदतों का विकास किया जा सकता है।
4. यह सिद्धान्त सीखने की स्वाभाविक विधि पर प्रकाश डालता है।
5. इस सिद्धान्त के द्वारा बालकों को वातावरण के अनुकूल सामंजस्य स्थापित करने की शिक्षा दी जा सकती है।
6. इस सिद्धान्त की सहायता से बालकों के भय सम्बन्धी रोगों का निदान किया जा सकता है।
7. इस सिद्धान्त के द्वारा बालकों की संवेगात्मक अस्थिरता दूर की जा सकती है।
8. यह सिद्धान्त उन बालकों के लिए उपचार प्रस्तुत करता है, जो मानसिक रूप से अस्वस्थ होते हैं।
9. जिन विषयों में चिन्तन की आवश्यकता नहीं पड़ती है, उनके लिए यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है; जैसे- अक्षर विन्यास, सुलेख आदि ।
आलोचना : अनेक मनोवैज्ञानिकों ने निम्नलिखित तर्कों के आधार पर इस सिद्धान्त की आलोचना की है
1. सम्बन्ध प्रतिक्रिया में अस्थायित्व होता है।
2. इस सिद्धान्त को प्रतिष्ठदन मुख्यतया बालकों और पशुओं पर किये गये प्रयोगों के आधार पर किया गया है। वयस्क व्यक्तियों के सम्बन्ध में यह मौन है।
3. यह सिद्धान्त यान्त्रिकता पर अधिक बल देता है और व्यक्ति को केवल एक यन्त्र मानकर चलता है।
In simple words: यह प्रश्न सूझ (Insight) और सम्बन्ध प्रतिक्रिया (Conditioning) दोनों सिद्धांतों का वर्णन करता है। सूझ सिद्धांत (कोहलर) में व्यक्ति परिस्थिति को समग्र रूप से समझकर समस्या का समाधान करते हैं, जबकि सम्बन्ध प्रतिक्रिया सिद्धांत (पावलोव) में एक अस्वाभाविक उत्तेजक स्वाभाविक प्रतिक्रिया से जुड़ जाता है। दोनों सिद्धांतों के शैक्षिक निहितार्थ और अनुप्रयोग भिन्न हैं।

🎯 Exam Tip: सूझ और सम्बन्ध प्रतिक्रिया सिद्धांतों, उनके प्रतिपादकों (कोहलर और पावलोव) के प्रयोगों, और उनके शैक्षिक निहितार्थों को विस्तार से जानें। दोनों के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. सीखने की प्रक्रिया के मुख्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
Answer: सीखने की प्रक्रिया सरल नहीं होती है। इसलिए इसे आसानी से समझना सम्भव नहीं है। विश्लेषण करने पर सीखने की प्रक्रिया में निम्नलिखित तत्त्व मिलते हैं
1. उत्तेजना-अनुक्रिया : सीखना अर्जित होता है। इस दृष्टि से व्यक्ति को अपने पर्यावरण में कुछ उत्तेजना अवश्य मिलती है और उसके प्रति अनुक्रिया होती है। इस प्रकार सीखने की प्रक्रिया में उत्तेजना तथा अनुक्रिया होती है।
2. उद्देश्य और लक्ष्य : सीखना एक सोद्देश्य प्रक्रिया है। जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा समाज में सम्मान आदि पाने के उद्देश्य से व्यक्ति सीखता है।
3. अभिप्रेरणा : सीखना अर्जित अवश्य होता है, परन्तु इसके लिए कुछ-न-कुछ अभिप्रेरण होना चाहिए। छात्र सीखने के लिए प्रयत्न इसलिए करता है कि उसे परीक्षा पास करने पर नौकरी और सम्मान मिल सकता है।
4. प्रत्यक्षीकरण : सीखने में प्रत्यक्षीकरण होना आवश्यक है। यदि छात्र को अपने लक्ष्य एवं प्रयत्न के परिणाम स्पष्ट दिखलाई देने लगते हैं तो सीखना सरल और सफल भी होता है और छात्र उसमें लगा रहता है।
5. पुनर्बलन : पुनर्बलन की क्रिया से व्यक्ति सीखने के लिए बाध्य हो जाता है और उसे बल भी प्राप्त होता है। छात्र को शिक्षक का आदेश, दूसरों की प्रतिस्पर्धा, सामाजिक प्रतिष्ठा आदि से शक्ति मिलती है।
6. एकीकरण : सीखने में व्यक्ति को अपने ध्यान को विभिन्न वस्तुओं में एकीकृत करना पड़ता है। और किसी प्रयोजन के साथ उनको ग्रन्थित करना पड़ता है, जिससे सफलता मिलती है।
7. साहचर्य : सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति अपने पूर्व अनुभव ज्ञान से नये अनुभव ज्ञान का साहचर्य कर लेता है। हरबर्ट ने अपने प्रशिक्षण में इसे अपनाया है।
8. अनुकूलन : सीखने की प्रक्रिया में अनुकूलन एक आवश्यक तत्त्व होता है। छात्र की प्रकृति का सीखने की सामग्री के साथ अनुकूलन होना चाहिए, अन्यथा सीखना सम्भव नहीं होगा। छात्र की क्षमता सीखने की सामग्री को भी अपने अनुकूल बना लेती है, यदि छात्र प्रयत्न करता है।
9. संपरिवर्तन : सीखने की प्रक्रिया के फलस्वरूप संपरिवर्तन होता है और मूल व्यवहार शिष्ट एवं परिमार्जित हो जाते हैं।
In simple words: सीखने की प्रक्रिया में उत्तेजना-अनुक्रिया, उद्देश्य, अभिप्रेरणा, प्रत्यक्षीकरण, पुनर्बलन, एकीकरण, साहचर्य, अनुकूलन और संपरिवर्तन जैसे मुख्य तत्त्व शामिल होते हैं, जो सीखने की गति और प्रभावशीलता को निर्धारित करते हैं।

🎯 Exam Tip: सीखने के प्रत्येक मुख्य तत्त्व को उदाहरणों सहित समझें। यह प्रश्न प्रक्रिया-आधारित समझ पर केंद्रित है और विभिन्न चरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. परिपक्वता तथा सीखने में क्या सम्बन्ध है ?
Answer: हमें बात है कि सीखना, व्यवहारे परिवर्तन या व्यवहार अर्जन की एक प्रक्रिया है। किसी व्यक्ति का व्यवहार परिवर्तन या तो परिपक्वता के कारण होता है या किसी नयी बात को ग्रहण करने के कारण। परिवर्तन की प्रक्रिया में नयी-नयी क्रियाएँ और व्यवहार प्रदर्शित तथा विकसित होते रहते हैं। परिपक्वता शारीरिक विकास की प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत बढ़ती हुई आयु के साथ, शरीर व स्नायुमण्डल का विकास, सीखने की सामर्थ्य को जन्म देता है।
स्पष्टतः सीखने के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आता है। परिपक्वता की प्रक्रिया सीखने से पूर्व की स्थिति है तथा यह सीखने का आधार है। परिपक्वता के अभाव में किसी क्रिया को सीखना न केवल दुष्कर अपितु असम्भव है। वस्तुतः परिपक्वता किसी व्यवहार को अर्जित करने (सीखने) की एक पूर्व आवश्यकता है।
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि मानव के विकास की प्रक्रिया में परिपक्वता और सीखना दोनों की सशक्त भूमिका है। यदि परिपक्वता के अभाव में सीखना सम्भव नहीं है तो सीखने के अभाव में व्यक्ति की परिपक्वता भी निरर्थक है। समुचित परिपक्वता ग्रहण कर यदि कोई मनुष्य व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन के लिए उपयोगी व्यवहार या क्रियाएँ सीखता है तो इसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझा जाएगा। इस भाँति परिपक्वता और सीखने में गहरा सम्बन्ध है।
In simple words: परिपक्वता और सीखना दोनों मानव व्यवहार और विकास के लिए आवश्यक हैं। परिपक्वता एक जैविक प्रक्रिया है जो सीखने की क्षमता को जन्म देती है, जबकि सीखना अनुभवों के माध्यम से व्यवहार में परिवर्तन है। परिपक्वता सीखने के लिए एक पूर्व-आवश्यकता है, और दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

🎯 Exam Tip: परिपक्वता और सीखने के बीच के अंतर और सह-संबंध को स्पष्ट रूप से समझें। उदाहरणों के साथ यह स्पष्ट करें कि कैसे परिपक्वता सीखने को संभव बनाती है।

 

Question 3. परिपक्वता तथा सीखने में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: परिपक्वता तथा सीखने में अन्तर को निम्नलिखित तालिका के माध्यम से दर्शाया जा सकता है।

क्रसं०परिपक्वता (Maturation)सीखना (Learning)
1.परिपक्वता एक जन्मजात और स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह स्वतः संचालित होती है।सीखना एक अर्जित प्रक्रिया है। यह व्यक्ति के अर्जित व्यवहार से सम्बन्ध रखती है।
2.विकास के क्रम में परिपक्वता सीखने से पूर्व की प्रक्रिया है।सीखने की प्रक्रिया परिपक्वता पर आधारित है। यह परिपक्वता के बाद प्रारम्भ होती है।
3.परिपक्वता पर अभ्यास का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।सीखने की क्रियाएँ अभ्यास द्वारा विकसित होती हैं। ये अभ्यास से पुष्ट व स्थायी बनती हैं।
4.परिपक्वता एक प्राकृतिक, शारीरिक एवं मानसिक स्थिति है जो प्रेरणा से प्रभावित नहीं होती।सीखना एक प्रतिक्रिया है जिस पर प्रेरणा का गहरा प्रभाव पड़ता है।
5.परिपक्वता की वजह से शरीर में अनेक रासायनिक परिवर्तन आते हैं।सीखने की वजह से व्यक्ति की मानसिक क्षमता का विकास होता है।
6.परिपक्वता एक आन्तरिक क्रिया है। व्यक्ति को इस क्रिया की चेतना का ज्ञान नहीं होता है।सीखना एक सचेतन क्रिया है जिसे व्यक्ति जानबूझकर करता है।
7.परिपक्वता के कारण व्यक्ति में प्रजातीय लक्षणों तथा क्रियाओं का जन्म होता है।सीखने की प्रक्रिया व्यक्तिगत विशिष्ट लक्षणों तथा क्रियाओं को उत्पन्न करती है।
8.परिपक्वता से सिर्फ शारीरिक व्यवहार का विकास होता है।सीखने के माध्यम से शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक व्यवहार का विकास होता है।
9.परिपक्वता पर वातावरण का प्रभाव नहीं पड़ता है।सीखना वातावरण से प्रभावित होता है।
10.व्यक्ति एक निश्चित अवस्था तक शारीरिक-मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाता है।सीखने की क्रियाएँ किसी निश्चित अवस्था तक सीमित नहीं हैं ये तो जीवन भर चलती रहती हैं।

In simple words: परिपक्वता और सीखना दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं: परिपक्वता एक जन्मजात, स्वाभाविक और आंतरिक प्रक्रिया है जो शारीरिक-मानसिक विकास से जुड़ी है, जबकि सीखना एक अर्जित, सचेत प्रक्रिया है जो अनुभव, प्रशिक्षण और प्रेरणा से प्रभावित होती है और व्यवहार में परिवर्तन लाती है।

🎯 Exam Tip: इस तालिका को अच्छी तरह से याद करें क्योंकि यह परिपक्वता और सीखने के बीच के मुख्य अंतरों को स्पष्ट करती है, जो परीक्षा में तुलनात्मक प्रश्नों के लिए उपयोगी है।

 

Question 4. थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के नियमों की विवेचना कीजिए। उपयुक्त उदाहों सहित अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए। या थॉर्नडाईक के सीखने के मुख्य नियमों का वर्णन कीजिए।
Answer: सीखने के नियमों को सर्वप्रथम व्यवस्थित ढंग से थॉर्नडाइक ने प्रस्तुत किया था, इसीलिए इन्हें थॉर्नडाइक के सीखने के नियमों के रूप में जाना जाता है। थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के मुख्य नियम तीन हैं
1. सीखने का तत्परता का नियम्
2. सीखने का अभ्यास का नियम तथा
3. सीखने का प्रभाव का नियम ।
सीखने का तत्परता को नियम थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित तत्परता का नियम बताता है कि जब कोई भी व्यक्ति सीखने के लिए मानसिक रूप से तत्पर होता है (अर्थात् तैयार रहता है) तो सीखने की क्रिया सरलता और शीघ्रता से सम्पन्न होती है। व्यक्ति जिसे समय किसी कार्य को सीखने की धुन में रहता है तो वह सीखने में आनन्द का अनुभव करता है। बांलक में किसी नवीन ज्ञानं या क्रिया को सीखने की तत्परता तभी आती है जब उसमें रुचि होती है और उसके अन्दर सीखने के लिए प्रेरणा उत्पन्न कर दी जाए।
अतः शिक्षक को पाठ शुरू करने से पूर्व बालक की रुचि और जिज्ञासा पर ध्यान देना चाहिए तथा उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। कुछ विद्यार्थियों की किसी विशेष विषय में रुचि नहीं होती जिसकी वजह से तत्परता के नियम की अवहेलना हो सकती है। तत्परता का नियम कुछ निष्कर्षों को महत्त्व देता हैं। प्रथम, इस नियम के अनुसार सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहने की दशा में विद्यार्थी को अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता और सीखने की प्रक्रिया सन्तोषजनक रहती है।
द्वितीय, यदि व्यक्ति सीखने के लिए विवश नहीं है और पूर्णरूप से भी तत्पर है तो सीखने में अत्यधिक सन्तुष्टि प्राप्त होगी । तृतीय, सीखने के लिए बलपूर्वक विवश किये जाने पर अरुचि के कारण कार्य असन्तोषजनक होगा। इस भाँति कहा जा सकता है कि “जब कोई बन्धन किसी कार्य को करने के लिए नहीं होता है तो वह प्रक्रिया आनन्द देती है। और जब सीखने की इच्छा नहीं होती तो व्यक्ति सीखने को तैयार नहीं होता तथा उसे बाध्य किया जाता है, तब क्रोध उत्पन्न होता है।”
In simple words: थॉर्नडाइक के सीखने के तीन मुख्य नियम हैं: तत्परता का नियम (सीखने की तैयारी), अभ्यास का नियम (दोहराव से सीखना) और प्रभाव का नियम (सकारात्मक परिणामों से सीखना)। तत्परता का नियम कहता है कि सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार होना आवश्यक है, जिससे सीखने की प्रक्रिया अधिक आसान और संतोषजनक बनती है।

🎯 Exam Tip: थॉर्नडाइक के तीनों नियमों को उनके निहितार्थों और शैक्षिक महत्व के साथ याद रखें। प्रत्येक नियम का एक स्पष्ट उदाहरण तैयार करें।

 

Question 5. थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के 'अभ्यास के नियम का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए ।
Answer: थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने का दूसरा मुख्य नियम है-अभ्यास का नियम । इसे उपयोग-अनुपयोग का नियम (Law of Use-Disuse) भी कहते हैं। थॉर्नडाइक का विचार है कि अन्य बातें समान रहने पर सीखने की प्रक्रिया में अभ्यास के द्वारा शक्ति में वृद्धि होती है, जबकि अभ्यास की कमी स्थिति और प्रतिक्रिया के सम्बन्ध को कमजोर बना देती है।
हमारी बहुत-सी प्रतिक्रियाओं में उपयोग तथा अनुपयोग के नियम साथ-साथ कार्य करते हैं। हम स्वतन्त्र भाव से उन्हीं उपयोगी क्रियाओं को दोहराते हैं जिनसे हमें आनन्द मिलता है तथा उन अनुपयोगी क्रियाओं को नहीं दोहराते जिनसे हमें दुःख होता है।
अभ्यास के नियम से स्पष्ट है कि जिस काम को जितना अधिक दोहराया जाएगा, जितनी ही उसकी पुनरावृत्ति की जाएगी, उतनी ही दृढ़ता से वह हमारे मन में बैठ जाता है और उसके करने में उतनी ही कुशलता आ जाती है। गायन, खेल, कविता, पहाड़े तथा गणित आदि से सम्बन्धित नियम सिखाने के उपरान्त बालकों को उनका अभ्यास अवश्य करा देना चाहिए ।
In simple words: थॉर्नडाइक का अभ्यास का नियम (उपयोग-अनुपयोग का नियम) कहता है कि किसी कार्य को बार-बार दोहराने से सीखने की प्रक्रिया मजबूत होती है और उसमें कुशलता आती है, जबकि अभ्यास की कमी से सीख कमजोर पड़ जाती है। यह नियम व्यवहार को दोहराने और उसमें सुधार करने के महत्व पर जोर देता है।

🎯 Exam Tip: अभ्यास के नियम का अर्थ और इसके उपयोग-अनुपयोग पहलू को समझें। यह नियम शिक्षा में दोहराव और अभ्यास की भूमिका को स्पष्ट करता है।

 

Question 6. थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के प्रभाव के नियम का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए ।
Answer: थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने का तीसरा मुख्य नियम है प्रभाव का नियम (Law of effect) । प्रभाव के नियम को सन्तोष और असन्तोष का नियम भी कह्ते हैं। थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित इस नियम में प्रभावे से तात्पर्य ‘परिणाम' से है। जिन कार्यों का परिणाम व्यक्ति को सन्तोष प्रदान करता है। तथा उसे सुखद अनुभव देता है-उन कार्यों को मनुष्य सरलता से एवं शीघ्र ही सीख जाता है। इसके विपरीत जिन कार्यों का परिणाम असन्तोषजनक तथा दुःखद अनुभव वाला होता है, उन्हें व्यक्ति भुला, देना चाहता है और बार-बार दोहराना नहीं चाहता।
इसी सन्दर्भ में जिस कार्य को करने से व्यक्ति को प्रशंसा एवं पुरस्कार मिले यानि जिस कार्य का अच्छा प्रभाव (परिणाम) निकले, उसे बालक शीघ्रतापूर्वक सीख जाता है। इसी कारण से शिक्षा में दण्ड एवं पुरस्कार को बहुत अधिक महत्त्व है। बुरा कार्य करने पर बालक दण्ड पाता है किन्तु अच्छे कार्य के लिए उसे पुरस्कृत किया जाता है। प्रभाव का नियम विद्यालय तथा परिवार में पर्याप्त रूप से प्रयोग किया जाता है।
In simple words: थॉर्नडाइक का प्रभाव का नियम (सन्तोष और असन्तोष का नियम) कहता है कि यदि किसी क्रिया का परिणाम व्यक्ति के लिए सन्तोषजनक या सुखद हो, तो वह क्रिया शीघ्रता से सीख ली जाती है और दोहराई जाती है। इसके विपरीत, यदि परिणाम असन्तोषजनक या दुःखद हो, तो उस क्रिया को भुला दिया जाता है।

🎯 Exam Tip: प्रभाव के नियम को दंड और पुरस्कार के उदाहरणों से समझें। यह नियम सकारात्मक और नकारात्मक पुनर्बलन के माध्यम से सीखने के महत्व को दर्शाता है।

 

Question 7. सीखने के पठार से आप क्या समझते हैं।
Answer: जब बालक किसी क्रिया को सीखता है तो उसके सीखने की गति सदा एक-सी नहीं रहती, उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। सीखते समय कुछ काल तक तो ऐसा लगता है कि उस क्रिया को सीखने में पर्याप्त प्रगति हो रही है, परन्तु कुछ काल के पश्चात् ऐसा ज्ञान होने लगता है कि मानो सीखने की प्रगति में बाधा आ गयी है। सीखने में इस प्रकार की अवस्था को ही पठार कहते हैं।
दूसरे शब्दों में, सीखने की प्रक्रिया के बीच में प्रगति का रुक जाना पठार कहलाता है। इस प्रकार का अवरोध प्रायः संगीत, चित्रकला, टंकण आदि सीखने में आता है। रॉस (Ross) के अनुसार, “सीखने की प्रक्रिया की एक प्रमुख विशेषता पठार है। पठार उस अवधि की ओर संकेत करते हैं, जब सीखने की प्रक्रिया में कोई प्रगति नहीं होती है।”
In simple words: सीखने का पठार वह अवस्था है जब सीखने की गति अस्थायी रूप से रुक जाती है या उसमें कोई प्रगति नहीं दिखती है, भले ही व्यक्ति प्रयास कर रहा हो। यह सीखने की प्रक्रिया में आने वाली एक सामान्य रुकावट है।

🎯 Exam Tip: सीखने के पठार की परिभाषा और उसके सामान्य उदाहरणों को याद रखें। यह अवधारणा सीखने की प्रक्रिया को समझने में मदद करती है।

 

Question 8. सीखने के पठार के उत्पन्न होने के कारणों को स्पष्ट कीजिए ।
Answer: सीखने में पठारों के आने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं
1. जब शारीरिक क्षमता कम हो जाती है, तब सीखने में पठार बन जाता है।
2. जब उत्साह कम हो जाता है, तब उसके सीखने की प्रगति में अवरोध हो जाता है।
3. जब बालकों का ध्यान इधर-उधर भटकने लगता है, तब पठार बनने लगते हैं।
4. लगातार कार्य करते रहने से थकान उत्पन्न हो जाती है और पठार बन्ने लगते हैं।
5. सीखने की विधि में निरन्तर परिवर्तन करते रहने से भी पठार बन जाते हैं।
6. दूषित वातावरण भी पठारों के बनने का एक प्रमुख कारण है।
7. जब बालक सम्पूर्ण कार्य पर ध्यान न देकर उसके एक भाग पर ही ध्यान देने लगता है, तब उसके सीखने में पठार आ जाता है।
8. जब कोई क्रिया आरम्भ में सरल होती है, परन्तु बाद में कठिन तथा जटिल हो जाती है, तब सीखने में पठार आ जाता है।
9. सीखने की अनुचित विधि भी पठारों का कारण होती है। जब प्रभावहीन विधियों का प्रयोग किया जाता है, तब सीखने में पठार पैदा होने लगते हैं।
10. जब पुरानी आदतों को नयी आदतों में संघर्ष प्रारम्भ हो जाता है, तब भी सीखने में पठार बन जाते हैं।
11. रायबर्न (Ryburm) के अनुसार, “प्रत्येक व्यक्ति में अधिकतम कुशलता होती है, जिससे आगे वह अग्रसर नहीं हो सकता। यही शारीरिक सीमा कहलाती है। जब व्यक्ति इस सीमा पर पहुँच जाता है, तब उसके सीखने के पठार बन जाते हैं।”
In simple words: सीखने के पठार शारीरिक क्षमता में कमी, उत्साह का अभाव, ध्यान भटकना, थकान, गलत शिक्षण विधि, दूषित वातावरण, कार्य की जटिलता, पुरानी आदतों का संघर्ष और व्यक्तिगत कुशलता की सीमा जैसे कई कारणों से उत्पन्न होते हैं।

🎯 Exam Tip: सीखने के पठार के कारणों की सूची को याद रखें। कारणों को समझना छात्रों के सीखने में आने वाली चुनौतियों को पहचानने में मदद करता है।

 

Question 9. सीखने के पठार के निराकरण के उपायों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: पठार सीखने वाले व्यक्ति की प्रगति में बाधा डालकर उसके समय को नष्ट करते हैं। ऐसी दशा में उनके निराकरण पर विचार करना अत्यन्त आवश्यक है।
पठारों के निराकरण के लिए। निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है
1. शिक्षक का कर्तव्य है कि जब बालक सीखने में उत्साह को प्रदर्शन न कर रहे हों, तो उन्हें उचित तरीके से सीखने के लिए प्रेरित किया जाए।
2. पठार का कारण विषय को कठिन व गहन होना भी है। अतः विषय को यथासम्भव सरल बनाकर प्रस्तुत किया जाए।
3. कार्य को सीखने की उचित विधि अपनायी जाए।
4. सीखने की क्रिया के बीच में विषयान्तर न किया जाए।
5. सीखने के लिए उचित वातावरण सृजन किया जाए।
6. सीखने वाले बालकों के वैयक्तिक भेद या क्षमताओं पर ध्यान दिया जाए तथा उसी के अनुसार उन्हें प्रेरणा तथा विश्राम दिया जाए।
7. जब एक विधि से बालकों की सीखने की प्रगति रुक जाए तो शिक्षक को उसी के अनुकूल नवीन विधि का प्रयोग करना चाहिए।
8. किसी प्रबल प्रेरक को अपनाकर भी सीखने के पठार का निराकरण किया जा सकता है। प्रेरण एक ऐसा कारक है जो सीखने को गति प्रदान कर सकता है।
In simple words: सीखने के पठारों को दूर करने के लिए छात्रों को प्रेरित करना, विषय-वस्तु को सरल बनाना, सही शिक्षण विधि का उपयोग करना, उचित वातावरण प्रदान करना, छात्रों की व्यक्तिगत क्षमताओं का ध्यान रखना, और यदि आवश्यक हो तो नई शिक्षण विधियों का प्रयोग करना आवश्यक है।

🎯 Exam Tip: पठार के निराकरण के उपायों को समझें। ये उपाय शिक्षकों और छात्रों दोनों के लिए सीखने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं।

 

Question 10. सीखने के अनुकरण के सिद्धान्त का सामान्य परिचय दीजिए ।
Answer: 1. अनुकरण के सिद्धान्त का तात्पर्य है : 'अन्य व्यक्तियों के कार्यों को देखकर वैसा ही करके, सीखना ।' दूसरे शब्दों में, हम अनेक बातें अनुकरण के द्वारा सीखते हैं। जब व्यक्ति एक-दूसरे का अनुकरण करके सीखता है तो उसे अनुकरण का सिद्धान्त कहते हैं। बालक अनेक बातें अनुकरण के द्वारा ही सीखता है। बोलना, चलना तथा अनेक बातें अनुकरण के द्वारा ही सीखी जाती हैं।
2. हेगार्टी : (Hagarty) ने बन्दरों पर प्रयोग करके यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अनुकरण द्वारी सीखना, प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखने की अपेक्षा उच्चकोटि का है, परन्तु थॉर्नडाइक के इस सिद्धान्त की कटु आलोचना की है। उनके अनुसार इसका प्रयोग सभी प्रकार के पशुओं पर नहीं किया जा सकता है।
3. सिद्धान्त का महत्त्व : शिक्षा के क्षेत्र में इस सिद्धान्त का महत्त्व इस प्रकार है।
• रचनात्मक कार्यों को सीखने के लिए यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है।
• बालकों में अनुकरण की प्रवृत्ति तीव्र होती है। अतः अनुकरण द्वारा उन्हें अच्छी-अच्छी बातें सिखायी जा सकती हैं।
• चेतन-मन से किया गया अनुकरण अच्छी आदतों के निर्माण में सहायक होता है।
• यह सिद्धान्त बालकों के बौद्धिक विकास में सहायक है।
• शिक्षकों तथा अभिभावकों के आदर्श चरित्र का अनुकरण करके बालक अपने चरित्र का निर्माण करते हैं।
• मन्दबुद्धि बालकों की शिक्षा में यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है।
In simple words: अनुकरण का सिद्धांत बताता है कि व्यक्ति दूसरों के व्यवहार को देखकर और उसकी नकल करके सीखता है। यह बच्चों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है और रचनात्मक कार्यों, अच्छी आदतों के निर्माण और बौद्धिक विकास में सहायक होता है, हालांकि इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं।

🎯 Exam Tip: अनुकरण के सिद्धांत की परिभाषा, हेगार्टी के विचारों और शिक्षा में इसके महत्व को ध्यान में रखें। यह सिद्धांत सामाजिक सीखने के लिए एक आधार प्रदान करता है।

 

Question 11. सीखने के 'अन्तसँझ सिद्धान्त को परिभाषित कीजिए!
Answer: गैस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, प्राणी अपनी सूझ या अन्तर्दृष्टि (Insight) के द्वारा ही सीख पाता है और सूझ के अभाव में वह सीखने में असफल रहता है। उविकास की प्रक्रिया के अन्तर्गत सूझ निम्न स्तर के प्राणियों से उच्च स्तर के प्राणियों की ओर वृद्धि करती है। चूहे, बिल्ली, कुत्ते की अपेक्षा वनमानुष में तथा इने सबसे ज्यादा मनुष्य में सूझ पायी जाती है। सूझ के कारण ही उच्च स्तर के प्राणी जटिल कार्य करने में समर्थ होते हैं।
गैस्टाल्टवादियों का कहना है कि सीखने की प्रक्रिया प्रयत्न एवं भूल अथवा सम्बद्ध प्रत्यावर्तन के अनुसार न होकर सूझ द्वारा होती है। इस विचारधारा के प्रवर्तके कोहलर (Kohler) तथा कोफ्का (Koffika) थे। सूझ या अन्तर्दृष्टि मनुष्य जैसे विकसित प्राणी का प्रमुख लक्षण है। मानव के निकटवर्ती विकसित प्राणियों तथा वनमानुष और चिम्पैन्जी में भी सूझ की क्षमता निहित होती है। कोहलर तथा कोफ्का के अनुसार हमारा सीखना सूझ के द्वारा होता है और सीखने की लगभग सभी प्रतिक्रियाओं में सूझ की आवश्यकता पड़ती है।
इस सिद्धान्त की प्रमुख विशेषता यह है कि सीखने की प्रत्येक क्रिया का कुछ-न-कुछ उद्देश्य अवश्य होता है तथा सीखने के समस्त प्रयास लक्ष्य द्वारा निर्देशित होते हैं। लक्ष्य में विविध बाधाएँ उत्पन्न होने पर सूझ की आवश्यकता होती है। प्रत्येक बाधा व्यक्ति को नवीन परिस्थिति से अवगत कराती है और वह उस परिस्थिति के विभिन्न अंगों में परस्पर सम्बन्ध स्थापित करता है उन्हें समझने की कोशिश करता है।
तत्पश्चात् व्यक्ति समूची परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उसके अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। किसी परिस्थिति विशेष को समझकर उसके अनुसार प्रतिक्रिया करना ही व्यक्ति की सूझ का द्योतक है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति जो व्यवहार सीखता है, उसे सूझ या अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखना (Learning by Insight) कहते हैं।
In simple words: सूझ या अंतर्दृष्टि का सिद्धांत बताता है कि सीखना केवल प्रयासों और त्रुटियों का परिणाम नहीं है, बल्कि परिस्थिति को समग्र रूप से समझने और समस्या का अचानक हल खोजने की क्षमता है। यह सिद्धांत विशेष रूप से उच्चतर प्राणियों और जटिल कार्यों के सीखने में महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: सूझ सिद्धांत की परिभाषा, इसके प्रतिपादकों (कोहलर, कोफ्का) और मुख्य विशेषताओं को याद रखें। यह सिद्धांत जटिल समस्याओं के समाधान में व्यक्ति की संज्ञानात्मक भूमिका पर जोर देता है।

 

Question 12. सीखने की प्रयत्न (प्रयास) एवं भूल (त्रुटि) विधि तथा सूझ विधि के अन्तर को स्पष्ट कीजिए ।
Answer: सीखने की प्रयत्न एवं भूल विधि तथा सूझ विधि का अन्तर निम्नलिखित तालिका में वर्णित हैं।

क्रसं०प्रयत्न (प्रयास) एवं भूल (त्रुटि) विधिसूझ विधि
1.प्रयत्न एवं भूल विधि का प्रयोग सामान्यतः कोई भी कर सकता है।सूझ विधि का प्रयोग करने के लिए उच्च बौद्धिक स्तर की आवश्यकता होती है।
2.इस विधि में व्यक्ति लक्ष्य की ओर उन्मुख रहता है।सूझ में अचेतन क्रियाएँ निरुद्देश्य रहती हैं जबकि अचेतन मन अधिक काम करता है।
3.प्रयत्न एवं भूल द्वारा सीखने की सफलता परिश्रम पर निर्भर करती है।सूझ प्राणियों को प्रकृति की देन है।
4.इसमें शारीरिक कुशलता पर अधिक जोर दिया जाता है।इसके अन्तर्गत मस्तिष्क का अधिक प्रयोग किया जाता है।
5.यह प्रक्रिया संवेदी प्रेरक समायोजन पर निर्भर है।यह प्रक्रिया प्रत्यक्षीकरण पर निर्भर है।
6.हर किसी नवीन समस्या के बारे में नये सिरे से प्रयास करना पड़ता है।सामान्यीकरण तथा विभेदीकरण दोनों की उपस्थिति के कारण प्रशिक्षण के स्थानान्तरण की सम्भावना रहती है।
7.पर्याप्त प्रयासों के बावजूद सफलता मिलती है।इसमें एकाएक सफलता मिल जाती है।

In simple words: प्रयास एवं त्रुटि विधि में व्यक्ति बार-बार प्रयास करके और गलतियों को सुधार कर सीखता है, जो परिश्रम और शारीरिक कुशलता पर निर्भर करता है। सूझ विधि में व्यक्ति परिस्थिति को समझकर अचानक समाधान खोज लेता है, जो उच्च बौद्धिक स्तर और मानसिक प्रक्रिया पर आधारित होती है।

🎯 Exam Tip: प्रयास एवं त्रुटि विधि और सूझ विधि के बीच के अंतरों को तालिका के रूप में याद रखना तुलनात्मक प्रश्नों के लिए बहुत उपयोगी है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. सीखना किसे कहते हैं?
Answer: व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले ऐच्छिक परिवर्तन को सीखना कह सकते हैं। सीखने की प्रक्रिया को सम्बन्ध नयी क्रियाओं से होता है तथा इस क्रिया द्वारा सीखी गयी बातों का अन्य बातों पर भी प्रभाव पड़ता है। सीखने की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में एक प्रकार की परिपक्वता भी आती है। इन्हीं तथ्यों को गिलफोर्ड ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “हम इस शब्द की परिभाषा विस्तृत रूप में यह कहकर कर सकते हैं कि सीखना व्यवहार के परिणामस्वरूप, व्यवहार में कोई भी परिवर्तन है।”
In simple words: सीखना व्यवहार में अनुभवों और प्रशिक्षण के परिणामस्वरूप होने वाला अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन है, जिसमें व्यक्ति नई क्रियाएँ सीखता है और अपने व्यवहार को संशोधित करता है।

🎯 Exam Tip: सीखने की परिभाषा को विभिन्न मनोवैज्ञानिकों के दृष्टिकोण से याद रखें, विशेषकर गिलफोर्ड की परिभाषा को।

 

Question 2. सीखने की प्रक्रिया पर व्यक्ति के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य का क्या प्रभाव प्रड़ता है?
Answer: सीखने की तीव्रता व्यक्ति के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य अच्छा न होने पर ज्ञानेन्द्रियाँ ठीक काम नहीं कर पातीं, व्यक्ति रुचि लेकर कार्य नहीं करता और जल्दी ही थक जाता है। जो व्यक्ति देखने, सुनने, बोलने आदि क्रियाओं में निर्बल होते हैं, वे सीखने में पर्याप्त उन्नति नहीं कर पाते। वस्तुतः सीखने की प्रक्रिया का भौतिक और शारीरिक आधार स्नायु संस्थान है।
स्नायु संस्थान के अन्तर्गत मस्तिष्क और स्नायु आते हैं जिनके कार्य करने की शक्ति पर सीखने की प्रक्रिया निर्भर करती है। मस्तिष्क और स्नायु की शक्ति, व्यक्ति के स्वास्थ्य पर निर्भर है। स्पष्टतः सीखने की क्रिया शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के सीधे रूप में प्रभावित होती है।
In simple words: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का सीखने पर सीधा प्रभाव पड़ता है; स्वस्थ व्यक्ति तेजी से सीखते हैं, जबकि अस्वस्थ या कमजोर व्यक्ति सीखने में धीमे होते हैं क्योंकि उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ और मानसिक क्षमताएँ प्रभावित होती हैं।

🎯 Exam Tip: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को समझें क्योंकि यह सीखने की प्रक्रिया के लिए एक मूलभूत शर्त है।

 

Question 3. सीखने में प्रेरणा का क्या योगदान है?
Answer: सीखने में प्रेरणा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सीखने में उन्नति लाने की दृष्टि से उसे प्रेरणायुक्त एवं प्रयोजनशील बना देना चाहिए। प्रेरणायुक्त व्यवहार उत्साह के कारण सीखने की प्रक्रिया को तीव्र कर देता है। अतः शीघ्र प्रेरणा से सीखने की गति में तीव्रता आती है। प्रेरणा का सम्बन्ध लक्ष्य या प्रयोजन । से है। यदि सीखने का लक्ष्य अच्छा है तो व्यक्ति उसे शीघ्र सीखने के लिए प्रेरित होता है। अतएव सीखने की प्रक्रिया को त्वरित करने के लिए उसे उद्देश्यपूर्ण एवं प्रेरणायुक्त कर देना उचित है।
In simple words: प्रेरणा सीखने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह छात्रों में उत्साह और लक्ष्य प्राप्ति की इच्छा उत्पन्न करती है, जिससे सीखने की गति तीव्र और प्रभावी हो जाती है।

🎯 Exam Tip: प्रेरणा के महत्व को समझने के लिए इसके शैक्षिक निहितार्थों और सीखने की प्रक्रिया पर इसके सकारात्मक प्रभावों पर ध्यान दें।

 

Question 4. प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखने के महत्व को स्पष्ट कीजिए। या थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने की विधि की शैक्षिक उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए ।
Answer: थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के सिद्धान्त एवं विधि का विशेष शैक्षिक महत्त्व है। इस विधि के महत्त्व का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।
1. इस सिद्धान्त को अपनाकर बालक को परिश्रमी बनाया जा सकता है।
2. यह सिद्धान्त बालकों में धैर्य का पाठ पढ़ाता है।
3. मन्दबुद्धि के बालकों के लिए यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है।
4. इस सिद्धान्त के आधार पर बालक जो कुछ भी सीखता है, वह उसके मस्तिष्क में स्थायी हो जाता है।
5. गणित और विज्ञान जैसे विषयों के लिए इसका प्रयोग सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
6. इस सिद्धान्त के आधार पर सीखने से बालक विभिन्न समस्याओं का समाधान करना सीखते हैं।
In simple words: प्रयास एवं त्रुटि सिद्धांत बालकों को परिश्रमी, धैर्यवान और समस्याओं का समाधान करने वाला बनाता है। यह मंदबुद्धि बच्चों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है और गणित व विज्ञान जैसे विषयों में सीखने को स्थायी बनाता है।

🎯 Exam Tip: थॉर्नडाइक के प्रयास एवं त्रुटि सिद्धांत की शैक्षिक उपयोगिता को याद रखें, खासकर यह कि यह कैसे परिश्रम और समस्या-समाधान कौशल को बढ़ावा देता है।

 

Question 5. सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त के शैक्षिक महत्त्व का उल्लेख कीजिए ।
Answer: शिक्षा में 'सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त का निम्नलिखित कारणों से विशेष महत्त्व है।
1. यह सिद्धान्त बालकों की कल्पना-शक्ति और तर्क-शक्ति का विकास करता है।
2. विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए इस सिद्धान्तं का प्रयोग प्रभावशाली तरीके से किया जा सकता है।
3. यह सिद्धान्त बालकों को स्वयं ज्ञान को खोजने के लिए प्रेरित करता है।
4. गणित के शिक्षण में भी इस सिद्धान्त का प्रयोग विशेष उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
5. ड्रेवर (Drever) के अनुसार, यह सिद्धान्त बालकों को निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति में उचित व्यवहार की चेतना प्रदान करता है।
In simple words: सूझ द्वारा सीखने का सिद्धांत बालकों में कल्पना, तर्कशक्ति और समस्या-समाधान कौशल को विकसित करता है। यह उन्हें स्वयं ज्ञान खोजने और गणित जैसे विषयों में लक्ष्य-उन्मुख व्यवहार के लिए प्रेरित करता है, जिससे प्रभावी शिक्षण संभव होता है।

🎯 Exam Tip: सूझ सिद्धांत के शैक्षिक महत्व को विशेष रूप से समझें, क्योंकि यह संज्ञानात्मक विकास और समस्या-समाधान क्षमताओं को बढ़ाता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. सीखने से क्या आशय है?
Answer: व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन को सीखना माना जाता है।
In simple words: सीखना व्यक्ति के व्यवहार में आने वाले किसी भी परिवर्तन को संदर्भित करता है जो अनुभव या प्रशिक्षण के परिणामस्वरूप होता है।

🎯 Exam Tip: सीखने की सरल और सीधी परिभाषा याद रखें। यह अवधारणा का मूल आधार है।

 

Question 2. सीखने की स्किनर द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
Answer: “सीखना व्यवहार में प्रगतिशील सामंजस्य की प्रक्रिया है।”
In simple words: स्किनर के अनुसार, सीखना एक ऐसी प्रक्रिया है जहाँ व्यक्ति अपने व्यवहार को लगातार पर्यावरण के साथ बेहतर ढंग से समायोजित करता है।

🎯 Exam Tip: स्किनर की परिभाषा को सटीकता से याद करें, क्योंकि यह व्यवहारवाद से संबंधित है।

 

Question 3. सीखने की प्रक्रिया की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
Answer:
1. सीखना व्यवहार में होने वाला परिवर्तन है
2. सीखने की प्रक्रिया जीवनपर्यन्त चलती है
3. सीखना सक्रिय होता है तथा
4. सीखना अनुभवों का संगठन है।
In simple words: सीखने की मुख्य विशेषताओं में यह शामिल है कि यह व्यवहार में परिवर्तन लाता है, जीवन भर चलता रहता है, एक सक्रिय प्रक्रिया है, और अनुभवों का संगठन करता है।

🎯 Exam Tip: सीखने की प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में याद रखना इस अवधारणा की बुनियादी समझ के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
Answer: सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक हैं
1. वातावरण
2. शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य
3. सीखने की इच्छा तथा
4. प्रबल प्रेरणा ।
In simple words: सीखने को प्रभावित करने वाले चार प्रमुख कारक हैं - वातावरण, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, सीखने की तीव्र इच्छा और मजबूत प्रेरणा, जो सीखने की दक्षता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।

🎯 Exam Tip: सीखने को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों की पहचान करना और उन्हें याद रखना शैक्षिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. सीखने के मुख्य नियम किसने प्रतिपादित किये हैं।
Answer: सीखने के मुख्य नियम थॉर्नडाइक ने प्रतिपादित किये हैं।
In simple words: सीखने के तीन मुख्य नियम (तत्परता, अभ्यास और प्रभाव का नियम) एडवर्ड थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित किए गए थे।

🎯 Exam Tip: थॉर्नडाइक का नाम और उनके सीखने के मुख्य नियम सीधे प्रश्न के रूप में अक्सर पूछे जाते हैं।

 

Question 19. “हम झरके सीखते हैं।” यह किसने कहा है?
Answer: थॉर्नडाइक ने।
In simple words: This quote attributes the idea of 'learning by bursts' or sudden insights to Thorndike, indicating his view on how learning can sometimes occur in rapid, discontinuous leaps rather than just gradual progression.

🎯 Exam Tip: Direct quotes and their authors are frequently tested. Memorize key psychologists and their associated theories or famous statements.

 

Question 20. थॉर्नडाइक के अभ्यास के नियम के कितने उपनियम हैं ?
Answer: थॉर्नडाइक के अभ्यास के नियम के तीन उपनियम हैं
(i) पुनरावृत्ति का नियम
(ii) नवीनता का नियम तथा
(iii) अनुपयोग का नियम ।
In simple words: Thorndike's Law of Exercise, which states that connections are strengthened with practice and weakened without it, has three sub-laws: the law of use (repetition), the law of disuse (lack of use), and the law of recency (novelty), emphasizing how practice and freshness influence learning.

🎯 Exam Tip: Understanding the sub-laws provides a deeper insight into Thorndike's theory of learning and how practice impacts retention.

 

Question 21. “व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही सीखना है।” यह परिभाषा किसने दी है?
Answer: गिलफोर्ड ने।
In simple words: This definition by Guilford highlights that learning is essentially a modification of behavior, brought about by prior behaviors or experiences.

🎯 Exam Tip: Linking specific definitions to their authors is crucial for scoring in objective and short-answer questions.

 

Question 22. सीखने की प्रक्रिया में उस दशा को क्या कहते हैं, जब व्यक्ति की सीखने की दर स्थिर हो जाती है?
Answer: सीखने का पठार।
In simple words: A 'plateau in learning' refers to a period during the learning process where there is no noticeable improvement or increase in the rate of learning, despite continued effort.

🎯 Exam Tip: Recognize and define key psychological terms accurately. Understanding 'learning plateau' helps in identifying challenges in the learning process.

 

Question 23. अधिगम में चिम्पैंजी पर किसने प्रयोग किया?
Answer: कोहलर ने।
In simple words: Wolfgang Köhler conducted significant experiments on chimpanzees, particularly Sultan, to study insight learning, demonstrating how problem-solving can occur through sudden understanding rather than trial and error.

🎯 Exam Tip: Associate prominent psychologists with their key experiments and the animals used, as these are common factual questions.

 

Question 24. सीखने का प्रमुख कारक क्या है?
Answer: सीखने का प्रमुख कारक “अनुकरण” है।
In simple words: Imitation, or अनुकरण, is a fundamental factor in learning, especially in early development, where individuals learn by observing and mimicking the actions of others.

🎯 Exam Tip: Identifying primary factors for learning, such as imitation, is essential for a holistic understanding of educational psychology.

 

Question 25. सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले चार प्रमुख शारीरिक कारकों का उल्लेख कीजिए।
Answer: सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले मुख्य शारीरिक कारक हैं
(i) आयु एवं परिपक्वता
(ii) लिंग-भेद
(iii) स्वास्थ्य तथा
(iv) संवेगात्मक स्थिति ।
In simple words: Physical factors like age, maturity, gender, overall health, and emotional state significantly influence an individual's capacity and readiness to learn.

🎯 Exam Tip: Listing and briefly explaining factors that affect learning demonstrates a comprehensive understanding of the topic.

 

Question 26. सीखने तथा परिपक्वता में क्या सम्बन्ध है?
Answer: परिपक्वता सीखने के लिए अनिवार्य शर्त है।
In simple words: Maturity is a prerequisite for learning; an individual must be physically and mentally developed enough to grasp new concepts or skills effectively.

🎯 Exam Tip: Understanding the relationship between maturity and learning is crucial, as it impacts teaching strategies and developmental readiness for educational tasks.

 

Question 27. अभिप्रेरणा का सीखने पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer: अभिप्रेरणा से सीखने की प्रक्रिया सुचारु एवं सरल हो जाती है।
In simple words: Motivation makes the learning process smoother and easier because a motivated learner is more engaged, persistent, and receptive to new information and skills.

🎯 Exam Tip: Emphasize the positive impact of motivation on learning efficiency and ease, a key concept in educational psychology.

 

Question 28. सीखने के तत्परता के नियम से क्या अभिप्राय है?
Answer: सीखने के तत्परता के नियम के अनुसार कुछ भी सीखने के लिए व्यक्ति को सर्वप्रथम मानसिक रूप से तैयार होना अनिवार्य है। इस नियम के अनुसार तैयारी या तत्परता सदैव सीखने में सहायक होते हैं।
In simple words: Thorndike's Law of Readiness states that learning is most effective when the learner is mentally and physically prepared to learn; readiness always facilitates the learning process.

🎯 Exam Tip: This law underscores the importance of a learner's state of mind and preparation before introducing new material.

 

Question 29. सीखने के लिए मनुष्यों द्वारा सर्वाधिक किस विधि को अपनाया जाता है?
Answer: अनुकरण विधि ।
In simple words: Humans predominantly learn through imitation, where they observe and replicate the actions and behaviors of others, especially during developmental stages.

🎯 Exam Tip: Highlight imitation as a primary learning method for humans, especially in acquiring language and social skills.

 

Question 30. सीखने की कौन-सी विधि ऐसी है, जिसे प्रमुख रूप से केवल मनुष्यों द्वारा ही अपनाया जाता है?
Answer: सूझ अथवा अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखने की विधि ।
In simple words: Insight learning, characterized by a sudden understanding of the solution to a problem, is primarily adopted and used by humans due to their higher cognitive abilities.

🎯 Exam Tip: Differentiate learning methods by their applicability to different species, noting insight learning as a distinct human cognitive trait.

 

Question 31. सीखने की कौन-सी विधि ऐसी है जिसे मनुष्य तथा पशु समान रूप से अपनाते हैं?
Answer: प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखना
In simple words: Trial and error learning, where both humans and animals attempt various responses until a successful one is found, is a common method shared across species.

🎯 Exam Tip: Recognize trial and error as a universal learning strategy, often preceding more complex forms of learning.

 

Question 32. सूझ द्वारा सीखने की विधि को दर्शाने के लिए किस मनोवैज्ञानिक ने महत्त्वपूर्ण प्रयोग किया था तथा उसने यह प्रयोग किस पशु पर किया था?
Answer: सूझ द्वारा सीखने की विधि को दर्शाने के लिए कोहलर नामक मनोवैज्ञानिक ने वनमानुष पर महत्त्वपूर्ण प्रयोग किया था।
In simple words: Wolfgang Köhler conducted his famous experiments on chimpanzees, demonstrating insight learning where the animal suddenly understood how to solve a problem without prior trial and error.

🎯 Exam Tip: Key experiments and their associated animals and psychologists are common knowledge points in pedagogy exams.

 

Question 33. कोहलर ने अपना प्रयोग किस पर किया?
Answer: कोहलर ने अपना प्रयोग चिम्पैंजी (वनमानुष) पर किया था।
In simple words: Köhler's primary subjects for his insight learning experiments were chimpanzees, most notably Sultan, observed in Tenerife.

🎯 Exam Tip: Direct recall of which psychologist used which animal in their experiments is a common assessment point.

 

Question 34. सम्बद्ध-प्रत्यावर्तन द्वारा सीखने की विधि को सर्वप्रथम किसने दर्शाया था?
Answer: रूस के प्रसिद्ध शरीरशास्त्री पावलोव ने।
In simple words: Ivan Pavlov, a renowned Russian physiologist, pioneered the concept of classical conditioning, also known as associated-reflex learning, through his experiments with dogs.

🎯 Exam Tip: Pavlov's name is synonymous with classical conditioning; knowing this connection is fundamental to learning theories.

 

Question 35. पावलोव ने अपना महत्त्वपूर्ण प्रयोग किस पशु पर किया था?
Answer: कुत्ते पर।
In simple words: Pavlov's groundbreaking work on conditioned reflexes, which established the principles of classical conditioning, famously involved experiments with dogs.

🎯 Exam Tip: Associating Pavlov with his dog experiments is a basic but essential piece of information in the history of psychology.

 

Question 36. निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य
(i) सीखने की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं होता।
(ii) सीखने की प्रक्रिया केवल शैक्षिक-काल में ही होती है।
(iii) सीखने की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती रहती है।
(iv) प्रेरणा का सीखने की प्रक्रिया पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
(v) परिपक्वता का सीखने की प्रक्रिया से कोई सम्बन्ध नहीं है।
Answer:
(i) असत्य
(ii) असत्य
(iii) सत्य
(iv) सत्य
(v) असत्य
In simple words: Learning inherently involves changes in behavior, is a continuous lifelong process, and is significantly influenced by motivation, while maturity is a fundamental prerequisite for effective learning.

🎯 Exam Tip: For true/false questions, carefully read each statement and relate it to the core principles of learning and development. Misconceptions are often tested.

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. “सीखना व्यवहार के परिणामस्वरूप व्यवहार में कोई परिवर्तन है।” यह परिभाषा किसने दी है?
(a) वुडवर्थ ने
(b) चार्ल्स स्किनर ने
(c) कॉलविन ने
(d) गिलफोर्ड ने
Answer: (d) गिलफोर्ड ने
In simple words: This definition, attributed to Guilford, emphasizes that learning is fundamentally a change in an individual's behavior resulting from their experiences and interactions.

🎯 Exam Tip: Accurately matching definitions with their authors is a common type of question in psychology and pedagogy exams.

 

Question 2. सम्बद्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं
(a) कोहलर
(b) स्किनर
(c) पावलोव
(d) थॉर्नडाइक
Answer: (c) पावलोव
In simple words: Ivan Pavlov is recognized as the founder of the conditioned reflex theory, which explains how associations are formed between stimuli and responses through classical conditioning.

🎯 Exam Tip: Knowing the founders of major psychological theories is a fundamental requirement for success in this subject.

 

Question 3. बिल्लियों पर प्रयोग किसने किया ?
(a) थॉर्नडाइक ने
(b) स्किनर ने।
(c) कोहलर ने
(d) टरमन ने
Answer: (a) थॉर्नडाइक ने
In simple words: Edward Thorndike conducted his famous puzzle box experiments with cats to study trial and error learning, observing how they learned to escape by repeatedly trying different actions.

🎯 Exam Tip: Linking specific animal experiments to their respective psychologists is essential for factual recall.

 

Question 4. नवीन अनुबन्धन सिद्धान्त के प्रवर्तक हैं
(a) पावलोव
(b) थॉर्नडाइक
(c) कोhलर
(d) चार्ल्स स्किनर
Answer: (d) चार्ल्स स्किनर
In simple words: B.F. Skinner is credited with the development of operant conditioning, which is often referred to as 'नवीन अनुबन्धन' or new conditioning, focusing on how consequences modify voluntary behaviors.

🎯 Exam Tip: Distinguish between classical (Pavlov) and operant (Skinner) conditioning, as their founders and principles are distinct.

 

Question 5. प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया ?
(a) कोहलर ने
(b) थॉर्नडाइक ने
(c) टरमन ने
(d) स्किनर ने
Answer: (b) थॉर्नडाइक ने
In simple words: Edward Thorndike proposed the theory of trial and error learning, where an organism learns by making random attempts, gradually eliminating incorrect responses until the correct solution is discovered.

🎯 Exam Tip: Thorndike's name is intrinsically linked with the "Trial and Error" theory; this is a core concept in learning theories.

 

Question 6. प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखना ही
(a) सूझ का सिद्धान्त है
(b) सम्बन्ध प्रतिक्रिया को सिद्धान्त है
(c) अनुकरण का सिद्धान्त है
(d) उद्दीपक प्रतिक्रिया का सिद्धान्त है
Answer: (d) उद्दीपक प्रतिक्रिया का सिद्धान्त है
In simple words: Trial and error learning, proposed by Thorndike, essentially falls under the stimulus-response (S-R) theory, where learning occurs through the formation of connections between specific stimuli and appropriate responses.

🎯 Exam Tip: Understand the underlying principles of each learning theory. Trial and error is a form of S-R learning, not insight or classical conditioning.

 

Question 7. अनुकरण का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया ?
(a) वुडवर्थ ने
(b) हिलगार्ड ने
(c) स्किनर ने
(d) कोहलर ने
Answer: (b) हिलगार्ड ने
In simple words: While many psychologists discussed imitation, Ernest R. Hilgard contributed significantly to theories of learning, including aspects of observational or imitative learning, often within a broader context.

🎯 Exam Tip: Be precise with the attribution of theories, as sometimes multiple theorists discuss a concept but one is primarily associated with its formal development.

 

Question 8. 'करके सीखने की क्रिया से सीखने का कौन-सा नियम सर्वाधिक प्रभावी है ?
(a) तत्परता का नियम
(b) अभ्यास का नियम
(c) प्रभाव का नियम
(d) मनोवृत्त का नियम
Answer: (a) तत्परता का नियम
In simple words: The Law of Readiness, which states that a learner must be prepared to learn, is most effective in 'learning by doing' as it ensures the individual is mentally and physically ready to engage actively.

🎯 Exam Tip: Relate Thorndike's laws of learning to practical teaching methods. Readiness is key for active engagement in 'learning by doing'.

 

Question 9. कोहलर ने सीखने के निम्नलिखित में से किस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया ?
(a) प्रयास एवं त्रुटि' द्वारा सीखने का सिद्धान्त
(b) 'सूझ' द्वारा सीखने का सिद्धान्त
(c) सम्बन्ध प्रत्यावर्तन का सिद्धान्त
(d) अनुकरण का सिद्धान्त
Answer: (b) 'सूझ' द्वारा सीखने का सिद्धान्त
In simple words: Wolfgang Köhler is renowned for his work on insight learning, demonstrating that problem-solving can occur through a sudden cognitive restructuring of the situation rather than gradual trial and error.

🎯 Exam Tip: Clearly distinguish Köhler's insight learning from other theories like trial-and-error (Thorndike) or classical conditioning (Pavlov).

 

Question 10. थॉर्नडाइक के सीखने के नियम हैं
(a) एक
(b) तीन
(c) दो
(d) चार
Answer: (b) तीन
In simple words: Edward Thorndike formulated three primary laws of learning: the Law of Readiness, the Law of Exercise, and the Law of Effect, which are fundamental to his connectionism theory.

🎯 Exam Tip: Knowing the exact number and names of Thorndike's primary laws is a basic factual recall question.

 

Question 11. “अधिगम जिसमें व्यक्ति किसी समाधान या हल की जाँच करता है कि कहाँ गलतियाँ हैं, उनकी पुनः जाँच कर ठीक करता है और तब तक ठीक करता है जब तक सफल नहीं हो जाता।" यह कथन किसकी विशेषता है?
(a) प्रयास और त्रुटि द्वारा सीखना
(b) सूझ द्वारा सीखना
(c) सम्बन्ध प्रतिक्रिया द्वारा सीखना
(d) अनुकरण द्वारा सीखना
Answer: (a) प्रयास और त्रुटि द्वारा सीखना
In simple words: This description perfectly defines trial and error learning, where the learner systematically checks for errors and corrects them, repeating the process until a successful outcome is achieved.

🎯 Exam Tip: Understand the behavioral characteristics of each learning theory to correctly identify them from descriptions.

 

Question 12. अन्तर्दृष्टि या सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त के जनक हैं
(a) मैक्डूगल
(b) कोहलर
(c) थॉर्नडाइक
(d) पावलोव
Answer: (b) कोहलर
In simple words: Wolfgang Köhler, a prominent Gestalt psychologist, is widely recognized as the originator of the insight learning theory, emphasizing sudden understanding in problem-solving.

🎯 Exam Tip: Core principles and their originators are fundamental knowledge for psychology students.

 

Question 13. सीखने के उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धान्त के जनक हैं
या
अधिगम के उद्दीपन-अनुक्रिया सिद्धान्त के प्रतिपादक हैंसीखने के प्रमुख नियमों के प्रतिपादक हैं
(a) कोहलर
(b) स्किनर
(c) थॉर्नडाइक
(d) पावलोव
Answer: (c) थॉर्नडाइक
In simple words: Edward Thorndike is considered the pioneer of the stimulus-response (S-R) theory of learning, also known as connectionism, where learning involves forming connections between specific stimuli and appropriate responses.

🎯 Exam Tip: Thorndike's S-R theory is foundational; ensure you can link him to the concept of connections and the laws of learning.

 

Question 14. प्रारम्भ में बालक किस प्रकार सीखता है ?
(a) परीक्षण द्वारा
(b) सूझ द्वारा
(c) विभेदकरण द्वारा
(d) प्रयत्न एवं त्रुटि द्वारा
Answer: (d) प्रयत्न एवं त्रुटि द्वारा
In simple words: In the initial stages of development, children often learn by trial and error, experimenting with different actions and gradually refining their behavior based on the outcomes.

🎯 Exam Tip: Recognize that early learning in children often involves a basic exploratory process of trial and error before more complex cognitive strategies develop.

 

Question 15. “समस्यात्मक परिस्थिति को समग्र में समझा जाता है और तुरन्त ही हल स्पष्ट रूप से पूर्व-दृष्टि से मन में आ जाता है।” यह कथन किसकी विशेषता है ?
(a) सूझ द्वारा सीखने की
(b) प्रयास एवं भूल द्वारा सीखने की
(c) अनुकरण द्वारा सीखने की
(d) सम्बन्धीकरण द्वारा सीखने की
Answer: (a) सूझ द्वारा सीखने की
In simple words: This statement describes insight learning, where an individual perceives the entire problem situation holistically and then experiences a sudden, clear understanding of the solution.

🎯 Exam Tip: The keywords "समग्र में समझा जाता है" (understood holistically) and "तुरन्त ही हल" (immediate solution) are strong indicators of insight learning.

 

Question 16. अधिगम, जो बिना किसी पूर्व-नियोजन के तर्कहीन, यान्त्रिकीय और बिना किसी क्रम के जहाँ हल आकस्मिक होता है, को जाना जाता है
(a) प्रयास और त्रुटि द्वारा अधिगम
(b) सूझ द्वारा अधिगम
(c) सम्बद्ध प्रत्यावर्तन द्वारा अधिगम
(d) अनुकरण द्वारा अधिगम
Answer: (b) सूझ द्वारा अधिगम
In simple words: This describes insight learning, characterized by a sudden, often unexpected, realization of a solution without a prior systematic or logical sequence of steps.

🎯 Exam Tip: Pay close attention to the nuances in descriptions of learning types, especially distinguishing between sudden "insight" and gradual "trial and error."

 

Question 17. “प्रगतिशील व्यवहार व्यवस्थापन की प्रक्रिया को अधिगम कहते हैं।” यह कथन किसका है?
(a) थॉर्नडाइक
(b) स्किनर
(c) क्रो एवं क्रो
(d) पारीक
Answer: (b) स्किनर
In simple words: B.F. Skinner defined learning as the process of progressively adapting and organizing behavior, reflecting his focus on observable actions and their modification through reinforcement.

🎯 Exam Tip: Direct definitions from key psychologists are high-value points for memorization and recall.

 

Question 18. सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले शारीरिक कारक हैं
(a) आयु एवं परिपक्वता
(b) लिंग-भेद
(c) स्वास्थ्य
(d) ये सभी कारक
Answer: (d) ये सभी कारक
In simple words: Age, maturity, gender, and overall health are all significant physical factors that collectively influence an individual's capacity and efficiency in the learning process.

🎯 Exam Tip: Understand that learning is a complex process influenced by a multitude of factors, including biological ones.

 

Question 19. सीखने के नियम आधारित हैं
(a) उद्दीपक प्रतिक्रिया सिद्धान्त पर
(b) सम्बद्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त पर
(c) सूझ के सिद्धान्त पर
(d) प्रयास और त्रुटि की विधि पर
Answer: (a) उद्दीपक प्रतिक्रिया सिद्धान्त पर
In simple words: Thorndike's laws of learning (readiness, exercise, effect) are fundamentally based on the stimulus-response (S-R) theory, which posits that learning involves forming connections between specific stimuli and responses.

🎯 Exam Tip: Recognize that Thorndike's laws are direct applications of the S-R connectionism model, forming the basis of his theory.

 

Question 20. सूझ द्वारा समस्या का समाधान प्राप्त होता है
(a) एकाएक
(b) समस्या उत्पन्न होने के एक घण्टे बाद
(c) निद्रा के बाद
(d) कभी नहीं।
Answer: (a) एकाएक
In simple words: Insight learning is characterized by a sudden and immediate understanding or realization of the solution to a problem, often described as an "aha!" moment.

🎯 Exam Tip: The hallmark of insight learning is its sudden, "all-at-once" nature, distinguishing it from gradual learning methods.

 

Question 21. कोहलर ने अपना मुख्य प्रयोग किस पर किया था?
(a) कुत्ते पर
(b) बन्दर पर
(c) चिम्पैंजी पर
(d) बिल्ली पर
Answer: (c) चिम्पैंजी पर
In simple words: Wolfgang Köhler's primary experiments demonstrating insight learning involved studying chimpanzees, such as Sultan, in problem-solving situations.

🎯 Exam Tip: Consistently remember the specific animals used by different psychologists in their famous experiments.

 

Question 22. किस विधि द्वारा विषय को सीखने में समय की बचत होती है?
(a) प्रयास एवं त्रुटि विधि द्वारा
(b) सूझ विधि द्वारा ।
(c) सम्बद्ध-प्रत्यावर्तन विधि द्वारा
(d) उपर्युक्त सभी विधियों द्वारा
Answer: (b) सूझ विधि द्वारा
In simple words: Insight learning often saves time because it involves a sudden grasp of the solution, bypassing the lengthy trial-and-error process, leading to a more efficient and direct resolution of the problem.

🎯 Exam Tip: Contrast insight learning with trial-and-error, where insight is generally more efficient in terms of time and effort for complex problems.

 

Question 23. छोटे बच्चे एवं मन्दबुद्धि बालक मुख्य रूप से किस विधि द्वारा कार्य करना सीखते हैं?
(a) सूझ विधि द्वारा
(b) सम्बद्ध-प्रत्यावर्तन विधि द्वारा
(c) प्रयास एवं त्रुटि विधि द्वारा
(d) इन सभी विधियों द्वारा
Answer: (c) प्रयास एवं त्रुटि विधि द्वारा
In simple words: Due to their developing cognitive abilities, young children and individuals with intellectual disabilities primarily learn through trial and error, experimenting with actions and adjusting based on outcomes.

🎯 Exam Tip: Understand the developmental appropriateness of different learning methods. Trial and error is fundamental for learners with less developed cognitive functions.

 

Question 24. सीखने के पठार की दशा में
(a) सीखने की गति घट जाती है।
(b) सीखने की गति बढ़ जाती है।
(c) सीखने की गति में वृद्धि नहीं होती।
(d) सब कुछ भूल जाता है।
Answer: (c) सीखने की गति में वृद्धि नहीं होती।
In simple words: During a learning plateau, the rate of learning does not increase; it stabilizes or stagnates, indicating a temporary halt in progress despite continued effort.

🎯 Exam Tip: Precisely define a learning plateau as a period of no increase in learning rate, rather than a decrease, which is a common misconception.

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