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Detailed Chapter 3 मूल्य निर्धारण का सिद्धांत UP Board Solutions for Class 12 Economics
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Class 12 Economics Chapter 3 मूल्य निर्धारण का सिद्धांत Textbook Solutions with Answers
Up Board Solutions For Class 12 Economics Chapter 3 Theory Of Price Determination
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)
Question 1. “किसी वस्तु का बाजार मूल्य माँग व पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है।” रेखाचित्र सहित व्याख्या कीजिए। या “जिस प्रकार हम इस बात पर विवाद कर सकते हैं कि कागज के एक टुकड़े को कैंची का ऊपर वाला या नीचे वाला फलक काटता है, उसी प्रकार हम इस बात पर भी विवाद कर सकते हैं कि मूल्य का निर्धारण तुष्टिगुण द्वारा होता है या उत्पादन लागत द्वारा ।” मार्शल के इस कथन की व्याख्या कीजिए । या रेखाचित्र द्वारा कीमत-निर्धारण के सामान्य सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। उत्तरः किसी वस्तु का मूल्य मुद्रा में निर्धारित करने के विषय में विभिन्न अर्थशास्त्रियों में मतभेद रहा है। परम्परावादी अर्थशास्त्री प्रो० एडम स्मिथ, रिकाड, माल्थस व मिल आदि मूल्य के निर्धारण में उत्पादन लागत को तथा ऑस्ट्रियन अर्थशास्त्री प्रो० जेवेन्स, मैन्जर तथा वालरस आदि तुष्टिगुण को अधिक महत्त्व प्रदान करते थे; परन्तु प्रो० मार्शल ने मूल्य के निर्धारण में समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया तथा मूल्य के निर्धारण का सामान्य सिद्धान्त, जिसे माँग और पूर्ति का नियम (Law of Demand and Supply) या आधुनिक सिद्धान्त (Modern Theory) कहते हैं, प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त के अनुसार, 'मूल्य के निर्धारण' में माँग (तुष्टिगुण) और पूर्ति (उत्पादन लागत) दोनों ही शक्तियों का हाथ होता है। इन दोनों के परस्पर प्रभाव द्वारा कीमत का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है। जहाँ दोनों की सापेक्ष स्थिति समान होती है अर्थात् जहाँ माँग और पूर्ति मात्रा के बराबर होती हैं। इस बिन्दु को सन्तुलन बिन्दु कहते हैं। इस बिन्दु पर जो कीमत निश्चित होती है उसे सन्तुलित कीमत (Equilibrium Price) कहते हैं।
1. माँग पक्ष की व्याख्या – किसी वस्तु की कीमत के निर्धारण में माँग पक्ष से सम्बन्धित दो प्रश्न उठते हैं
• क्रेता किसी वस्तु के लिए कीमत क्यों देता है?
• क्रेता किसी वस्तु के लिए अधिक-से-अधिक कितनी कीमत दे सकता है?
क्रेता की वस्तु के उपयोग से आवश्यकता की पूर्ति होती है, इसी कारण वह वस्तु के लिए कीमत देने को तैयार रहता है। वस्तु की आवश्यकता जितनी अधिक तीव्र होती है, क्रेता उसके लिए उतनी ही अधिक कीमत देने के लिए तत्पर रहता है, क्योंकि उसे वस्तु से उतना ही अधिक तुष्टिगुण मिलता है। क्रेता किसी वस्तु की अधिक-से-अधिक कितनी कीमत देने को तैयार हो जाएगा, यह आवश्यकता की तीव्रता पर निर्भर करता है; परन्तु सीमान्त तुष्टिगुण ह्रास नियम के अनुसार, किसी वस्तु की अधिकाधिक इकाइयों से मिलने वाला तुष्टिगुण क्रमशः घटता जाता है। अतः कोई भी क्रेता किसी वस्तु की अधिक-से-अधिक सीमान्त तुष्टिगुण के बराबर कीमत दे सकता है। क्रेता वस्तु की जितनी भी इकाइयाँ खरीदता है वे रूप और गुण में समान होती हैं; अतः वह वस्तु की प्रत्येक इकाई के लिए एक ही अर्थात् सीमान्त तुष्टिगुण के बराबर कीमत देता है। इस प्रकार किसी वस्तु की माँग तथा कीमत, सीमान्त तुष्टिगुण द्वारा निश्चित होती है। यह क्रेता द्वारा दी जाने वाली मूल्य की अधिकतम सीमा होती है।
2. पूर्ति पक्ष की व्याख्या – माँग पक्ष की भाँति ही पूर्ति के विषय में भी दो प्रश्न उठते हैं
• विक्रेता अपनी वस्तु के लिए कीमत क्यों माँगता है ?
• विक्रेता अपनी वस्तु के लिए कम-से-कम कितनी कीमत ले सकता है ?
वस्तुओं के उत्पादन में कुछ-न-कुछ व्यय अवश्य करना पड़ता है। इसलिए विक्रेता अपनी वस्तु के लिए कीमत माँगता है। कोई भी उत्पादक अपना माल हानि पर अर्थात् उत्पादन व्यय से कम कीमत पर नहीं बेचना चाहता। वह हर सम्भव प्रयास करता है कि उसे अधिकाधिक कीमत मिले, परन्तु किसी भी दशा में वह उत्पादन लागत व्यय से कम कीमत पर अपना माल बेचने के लिए तैयार नहीं होता। उत्पादन लागत से तात्पर्य ।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र चावल की माँग और पूर्ति को दर्शाता है। इसमें X-अक्ष पर चावल की माँग व पूर्ति की मात्रा (क्विटलों में) और Y-अक्ष पर चावल का मूल्य प्रति क्विटल (Rs. में) दिखाया गया है। माँग वक्र नीचे की ओर ढलान वाला है, जबकि पूर्ति वक्र ऊपर की ओर ढलान वाला है, और ये दोनों वक्र एक-दूसरे को 'संतुलन बिन्दु' पर काटते हैं।
सीमान्त लागत (Marginal Cost) से है। अतः वस्तु का निम्नतम पूर्ति मूल्य, वस्तु की सीमान्त लागत के बराबर चावल की माँग व पूर्ति की मात्राएँ (क्विटलों में) होगा। यह वस्तु की कीमत की न्यूनतम सीमा होती है। इस कीमत से कम पर विक्रेता अपनी वस्तु बेचने के लिए तैयार नहीं हो सकता।
3. माँग और पूर्ति का सन्तुलन – मॉग पक्ष अथवा क्रेताओं की दृष्टि से किसी वस्तु की कीमत सीमान्त तुष्टिगुण से अधिक नहीं हो सकती। किसी भी दशा में वे सीमान्त तुष्टिगुण से अधिक कीमत देने के लिए तैयार नहीं होते। दूसरी ओर विक्रेता अथवा पूर्ति पक्ष अपनी वस्तु की न्यूनतम कीमत सीमान्त उत्पादन लागत व्यय से कम लेने को तैयार नहीं होते हैं। अतः कीमत दोनों सीमाओं (अधिकतम और न्यूनतम) के बीच माँग और पूर्ति की सापेक्ष शक्तियों के प्रभाव के अनुसार निर्धारित होती है अर्थात् कीमत माँग और पूर्ति की शक्तियों द्वारा सीमान्त तुष्टिगुण द्वारा निर्धारित अधिकतम और सीमान्त लागत व्यय द्वारा निर्धारित न्यूनतम सीमा के बीच कहीं पर निश्चित होगी। क्रेता कम-से-कम कीमत देना चाहेगा और विक्रेता अधिक-से-अधिक कीमत प्राप्त करना चाहेगा। इस क्रम में जिस पक्ष की स्थिति सुदृढ़ होगी, कीमत उसके पक्ष में होगी। इस स्थिति में कीमत ऊपर-नीचे होती रहेगी और अन्त में यह उस बिन्दु पर निश्चित होगी जहाँ माँग और पूर्ति की मात्राएँ बराबर होंगी। यही स्थिति साम्य अथवा सन्तुलन की स्थिति कहलाती है।
इस प्रकार बाजार में कीमत गेंद की तरह इधर-उधर लुढकती रहेगी, परन्तु अन्त में वह सन्तुलन बिन्दु पर ही निर्धारित होगी। इस प्रकार पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में साम्य की स्थिति में – कीमत = सीमान्त तुष्टिगुण = सीमान्त लागत।
उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वस्तु के मूल्य के निर्धारण में माँग और पूर्ति दोनों का ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनमें से कोई एक, दूसरे की सहायता के बिना स्वयं मूल्य निर्धारित नहीं कर सकता। मूल्य-निर्धारण में माँग व पूर्ति के सापेक्षिक महत्त्व को स्पष्ट करते हुए प्रो० मार्शल ने बताया है कि जिस प्रकार हम इस बात पर विवाद कर सकते हैं कि कागज के एक टुकड़े को कैंची को ऊपर वाला या नीचे वाला फलक काटता है, उसी प्रकार हम इस बात पर भी विवाद कर सकते हैं कि मूल्य का निर्धारण तुष्टिगुण द्वारा होता है या उत्पादन लागत द्वारा।”
प्रो० मार्शल के अनुसार, मूल्य-निर्धारण का सामान्य सिद्धान्त यह बताता है कि वस्तु का मूल्य सीमान्त तुष्टिगुण तथा सीमान्त उत्पादन व्यय के बीच में माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा उस स्थान पर निर्धारित होता है जहाँ वस्तु की पूर्ति उसकी माँग के बराबर होती है। कीमत-निर्धारण के उपर्युक्त सिद्धान्त को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। किसी समय बाजार में चावल की माँग एवं पूर्ति को निम्नलिखित तालिका में दर्शाया गया है माँग और पर्ति तालिकाचावल की माँग की मात्रा चावल का मूल्य प्रति क्विटल (Rs. में) वस्तु की पूर्ति की मात्रा (क्विंटल में) 500 1,200 1,300 700 1,000 1,000 900 800 900 1,000 600 700 1,300 400 500
रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
इस रेखाचित्र में अ ब रेखा पर चावल की माँग एवं पूर्ति और अ स रेखा पर चावल की कीमत दिखायी गयी है। उपर्युक्त तालिका में दिये गये आँकड़ों के आधार पर माँग और पूर्ति वक्र खींचे गये हैं। म म' माँग वक्र और प प पूर्ति वक्र हैं। ये दोनों वक्र एक-दूसरे को स बिन्दु पर काटते हैं। यही सन्तुलन बिन्दु है, क्योंकि इस बिन्दु पर माँग और पूर्ति की मात्राएँ बराबर हैं। कीमत के क' के बराबर है।
In simple words: किसी वस्तु का बाजार मूल्य उसकी माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है। यह निर्धारण उस बिंदु पर होता है जहाँ माँग और पूर्ति की मात्रा बराबर हो जाती है, जिसे संतुलन बिंदु कहते हैं। मार्शल के अनुसार, यह संतुलन बिंदु वस्तु के सीमान्त तुष्टिगुण और सीमान्त उत्पादन लागत के बीच कहीं पर होता है।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न का उत्तर देते समय माँग और पूर्ति के सिद्धान्तों की स्पष्ट व्याख्या, रेखाचित्र का सटीक अंकन, और तालिका का सही विश्लेषण महत्वपूर्ण हैं।
लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)
Question 1. माँग, मूल्य व पूर्ति की पारस्परिक निर्भरता यो सम्बन्ध को समझाइए ।
Answer: माँग, मूल्य और पूर्ति के सम्बन्ध को निम्नवत् स्पष्ट किया जा सकता है
1. मूल्य, माँग व पूर्ति पर निर्भर रहता है – जिस प्रकार कागज काटने के लिए कैंची के दोनों फलकों का उपयोग आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार कीमत (मूल्य) के निर्धारण में माँग और पूर्ति दोनों की ही आवश्यकता होती है। उनके परस्पर प्रभाव द्वारा मूल्य का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जहाँ पर दोनों की सापेक्ष स्थिति एक-सी होती है अर्थात् जहाँ पर माँग और पूर्ति दोनों ही मात्रा में बराबर होती हैं। इस प्रकार कहा जाता है कि मूल्य की स्थिति माँग व पूर्ति पर निर्भर करती है।
2. मॉग, मूल्य व पूर्ति पर – माँग और मूल्य में घनिष्ठ सम्बन्ध है। किसी वस्तु को खरीदने और व्यय करने की तत्परता (Willingness) पर मूल्य का बड़ा प्रभाव पड़ता है। कोई व्यक्ति वस्तु की कितनी मात्रा खरीदेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वस्तु का बाजार में कितना मूल्य है। जब हम कहते हैं कि बाजार में गेहूं की माँग एक हजार क्विटल है तो हमें इसके साथ यह भी बताना चाहिए कि यह माँग किस मूल्य पर है। माँग और मूल्य के घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण ही यह कहा जाता है कि माँग से अभिप्राय वस्तु की उस मात्रा से है जो किसी निश्चित समय में किसी एक विशेष कीमत पर खरीदी जाएगी। इस प्रकार बिना मूल्य के माँग अर्थहीन है।
माँग, पूर्ति पर भी निर्भर रहती है। माँग और पूर्ति में घनिष्ठ सम्बन्ध है। कोई व्यक्ति वस्तु की कितनी मात्रा खरीदेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वस्तु की बाजार में कितनी पूर्ति है। बिना पूर्ति के माँग का कोई अर्थ नहीं होता। जब हम कहते हैं कि बाजार में गेहूं की माँग एक हजार क्विटल है तो हमें उसके साथ यह भी बताना चाहिए कि इस मूल्य पर वस्तु की कितनी पूर्ति है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वस्तु की माँग, मूल्य व वस्तु की पूर्ति पर निर्भर रहती है कि वस्तु कितनी मात्रा में खरीदी जाएगी ।
3. पूर्ति, मूल्य व माँग पर – किसी वस्तु का उत्पादन कितनी मात्रा में किया जाए, यह वस्तु की माँग पर निर्भर करता है। उपभोक्ताओं की रुचि, फैशन तथा आय पर वस्तु की माँग निर्भर रहती है। लोग जितनी अधिक वस्तुओं की माँग करेंगे, वस्तु का मूल्य उतना ही अधिक होगा; अतः उत्पादक लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से वस्तुओं का अधिक उत्पादन करेंगे जिसके कारण वस्तुओं की पूर्ति बढ़ेगी। कीन्स का रोजगार सिद्धान्त प्रभावपूर्ण माँग सिद्धान्त पर आधारित है। माँग जितनी अधिक होगी, वस्तुओं का उत्पादन या पूर्ति उतनी ही अधिक होगी। इस प्रकार माँग पूर्ति को प्रभावित करती है। पूर्ति और मूल्य का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। किसी वस्तु की पूर्ति साधारणतया कीमत पर निर्भर होती है। कीमत बढ़ने पर पूर्ति भी बढ़ जाती है और कीमत घटने पर पूर्ति भी घट जाती है। अर्थशास्त्र में पूर्ति का अभिप्राय वस्तु की उस मात्रा से होता है जो किसी समय एक मूल्य-विशेष पर बिकने आती है। अंतः बिना मूल्य का उल्लेख किये पूर्ति का कोई अर्थ नहीं होता। इस प्रकार स्पष्ट है कि वस्तु की पूर्ति वस्तु की मॉग व मूल्य पर निर्भर होती रहती है।
In simple words: माँग, मूल्य और पूर्ति तीनों आपस में गहराई से जुड़े हैं। वस्तु का मूल्य माँग और पूर्ति के संतुलन से निर्धारित होता है। वहीं, वस्तु की माँग उसके मूल्य और बाजार में उपलब्ध पूर्ति से प्रभावित होती है, जबकि पूर्ति उपभोक्ताओं की माँग और वस्तु के मूल्य पर निर्भर करती है।
🎯 Exam Tip: माँग, मूल्य और पूर्ति की पारस्परिक निर्भरता को समझाते हुए प्रत्येक तत्व की भूमिका को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें। उदाहरणों का प्रयोग आपके उत्तर को अधिक प्रभावी बना सकता है।
Question 2. सामान्य मूल्य की परिभाषा तथा विशेषताएँ लिखिए।
Answer: अर्थशास्त्र में सामान्य मूल्य से आशय है किसी वस्तु का वह मूल्य जो वस्तु की माँग व पूर्ति की स्थायी शक्तियों द्वारा दीर्घकाल में निश्चित होता है। यह माँग व पूर्ति के स्थायी साम्य का परिणाम होता है। यह मूल्य दीर्घकाल तक रहता है; अतः यह मूल्य स्थिर रहता है तथा लागत मूल्य के बराबर होता है।
परिभाषा – मार्शल के अनुसार, “किसी निश्चित वस्तु का सामान्य मूल्य वह है जो कि अधिक शक्तियों द्वारा दीर्घकाल में निर्धारित होता है। इस मूल्य पर माँग की अपेक्षा पूर्ति का अधिक प्रभाव होता है, क्योंकि दीर्घकाल में पूर्ति में परिवर्तन लाया जा सकता है।
सामान्य मूल्य के निम्नलिखित लक्षण या विशेषताएँ हैं
1. यह दीर्घकाल में होता है – माँग और पूर्ति के सन्तुलन का परिणाम दीर्घकाल में होने के कारण इसे दीर्घकालीन मूल्य कहते हैं।
2. सामान्य मूल्य के निर्धारण में पूर्ति का अधिक महत्त्व होता है – इस पर माँग की अपेक्षा पूर्ति का अधिक प्रभाव हैं, क्योंकि दीर्घकाल में पूर्ति को माँग के अनुसार घटाया-बढ़ाया जा सकता है।
3. मॉग व पूर्ति के सन्तुलन का स्थायी परिणाम होता है – दीर्घकाल में पूर्ति को माँग के साथ समन्वय का पूरा समय मिल जाता है। इस कारण यह माँग व पूर्ति के स्थायी साम्य का परिणाम होता है।
4. यह सीमान्त व औसत लागत के बराबर होता है – दीर्घकाल में समयावधि इतनी लम्बी होती है कि सीमान्त लागत औसत लागत के बराबर हो जाती है। अतः सामान्य मूल्य सीमान्त व औसत दोनों लागतों के बराबर होता है।
5. यह काल्पनिक होता है - यह व्यावहारिक जीवन में सम्भव नहीं होता है। यह केवल काल्पनिक होता है।
6. यह मूल्य स्थिर रहता है – इसके मूल्य में बाजार मूल्य की तरह परिवर्तन नहीं होते। यह स्थायी रहता है।
7. सामान्य मूल्य धुरी के समान होता है - इस मूल्य के चारों ओर बाजार मूल्य चक्कर काटा करता है। अतः यह धुरी के समान होता है।
In simple words: सामान्य मूल्य वह दीर्घकालिक मूल्य है जो किसी वस्तु की माँग और पूर्ति की स्थायी शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है। यह लागत मूल्य के बराबर, स्थिर और काल्पनिक होता है, और बाजार मूल्य इसके चारों ओर घूमता रहता है।
🎯 Exam Tip: सामान्य मूल्य की परिभाषा के साथ उसकी विशेषताओं को बिन्दुवार स्पष्ट करें, क्योंकि यह दीर्घकाल में स्थिर संतुलन को दर्शाता है।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)
Question 1. बाजार मूल्य एवं सामान्य मूल्य में अन्तर बताइए।
Answer: बाजार मूल्य एवं सामान्य मूल्य में अन्तर
| क्र० सं० | बाजार मूल्य | सामान्य मूल्य |
| 1. | अल्पकालीन मूल्य होता है। | दीर्घकालीन मूल्य होता है। |
| 2. | इसमें परिवर्तन होते रहते हैं। | यह अस्थायी होता है। |
| 3. | यह माँग व पूर्ति के अस्थायी प्रभाव का परिणाम होता है। | यह माँग और पूर्ति के स्थायी साम्य का परिणाम होता है। |
| 4. | यह वास्तविक जीवन में पाया जाता है। | यह काल्पनिक होता है। |
| 5. | यह पुनरुत्पादनीय और अपुनरुत्पादनीय दोनों प्रकार की वस्तुओं का होता है। | यह केवल पुनरुत्पादनीय वस्तुओं का होता है। |
| 6. | यह सामान्य मूल्य के चारों ओर चक्कर काटता रहता है। | यह मूल्य धुरी के समान होता है और स्थिर रहता है। |
| 7. | यह लागत मूल्य से ऊँचा-नीचा होता रहता है। | यह सीमान्त व औसत, दोनों लागतों के बराबर होता है। |
| 8. | इस पर माँग का व्यापक प्रभाव होता है। | इस पर पूर्ति का अधिक प्रभाव होता है। |
In simple words: बाजार मूल्य अल्पकालिक होता है और माँग-पूर्ति के अस्थायी प्रभावों से बदलता रहता है, जबकि सामान्य मूल्य दीर्घकालिक होता है, स्थिर रहता है, और माँग-पूर्ति के स्थायी संतुलन से निर्धारित होता है।
🎯 Exam Tip: बाजार मूल्य और सामान्य मूल्य के बीच के अंतर को तालिका के रूप में प्रस्तुत करना अधिक प्रभावी होता है, जिससे तुलना स्पष्ट और समझने में आसान हो जाती है।
Question 2. बाजार और सामान्य मूल्य में क्या सम्बन्ध है ?
Answer: बाजार मूल्य की प्रवृत्ति सदैव सामान्य मूल्य के बराबर होने की होती है। बाजार मूल्य सामान्य मूल्य के चारों ओर चक्कर काटता रहता है। यह अधिक समय तक सामान्य मूल्य से बहुत नीचा या ऊँचा नहीं रह सकता। सामान्य मूल्य लागत मूल्य के बराबर होता है, किन्तु बाजार मूल्य घटता-बढ़ता रहता है। इतना होते हुए बाजार मूल्य की प्रवृत्ति सदा सामान्य मूल्य की ओर बढ़ने लगती है। यदि बाजार मूल्य सामान्य मूल्य से अधिक ऊँचा हो जाता है तो उत्पादकों को असाधारण लाभ होने लगेगा और वे इस वस्तु का उत्पादन बढ़ाएँगे। दूसरे उत्पादक भी इस वस्तु का उत्पादन करने लगेंगे। वस्तु की पूर्ति माँग के बराबर हो जाएगी और मूल्य गिरकर सामान्य मूल्य के बराबर हो जाएगा।
इसी प्रकार, यदि माँग कम हो जाने के कारण किसी वस्तु का बाजार मूल्य सामान्य मूल्य से नीचा होता है तो उत्पादकों को हानि होने लगेगी। वे इस वस्तु का उत्पादन कम कर देंगे तथा कुछ अन्य उत्पादक भी इसका उत्पादन बन्द कर देंगे। इस प्रकार वस्तु की पूर्ति कम होकर माँग के अनुसार हो जाएगी और बाजार मूल्य सामान्य मूल्य के बराबर हो जाएगा। इस प्रकार मूल्य बार-बार सामान्य मूल्य के बराबर होता रहता है।
In simple words: बाजार मूल्य हमेशा सामान्य मूल्य की ओर झुकता रहता है और उसके इर्द-गिर्द घूमता है। जब बाजार मूल्य सामान्य मूल्य से ऊपर जाता है, तो आपूर्ति बढ़ती है और मूल्य नीचे आता है, और जब यह नीचे जाता है, तो आपूर्ति घटती है और मूल्य ऊपर आता है, जिससे यह सामान्य मूल्य पर लौट आता है।
🎯 Exam Tip: बाजार मूल्य और सामान्य मूल्य के बीच के संबंध को स्पष्ट करते समय, दोनों मूल्यों के विचलन और अभिसरण के कारणों को उदाहरण सहित समझाएँ।
निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)
Question 1. “मूल्य के निर्धारण में उत्पादन लागत का अधिक महत्त्व रहता है। यह मत किन अर्थशास्त्रियों का है ?
Answer: परम्परावादी अर्थशास्त्री प्रो० एडम स्मिथ, रिकाड, माल्थस व मिल आदि अर्थशास्त्रियों का मत है कि मूल्य-निर्धारण में उत्पादन लागत का अधिक महत्त्व रहता है।
In simple words: यह मत परम्परावादी अर्थशास्त्रियों का है जो मानते हैं कि वस्तु की उत्पादन लागत उसके मूल्य को निर्धारित करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
🎯 Exam Tip: इस प्रकार के प्रश्नों में अर्थशास्त्री के नाम और उनके प्रमुख विचारों को सटीक रूप से याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 2. “मूल्य के निर्धारण में तुष्टिगुण अर्थात माँग पक्ष का अधिक महत्त्व रहता है। यह मत किन अर्थशास्त्रियों का था ?
Answer: ऑस्ट्रियन अर्थशास्त्री प्रो० जेवेन्स, मैन्जर तथा वालरस आदि मूल्य के निर्धारण में तुष्टिगुण को अधिक महत्त्व प्रदान करते थे।
In simple words: यह मत ऑस्ट्रियन अर्थशास्त्रियों का है, जो मानते हैं कि किसी वस्तु का मूल्य उसकी उपयोगिता या तुष्टिगुण पर निर्भर करता है, जिसे उपभोक्ता महसूस करता है।
🎯 Exam Tip: विभिन्न आर्थिक विचारों को उनके प्रतिपादक अर्थशास्त्रियों के साथ सही ढंग से जोड़ना सुनिश्चित करें।
Question 3. प्रो० मार्शल के अनुसार मूल्य-निर्धारण का सामान्य सिद्धान्त क्या है ?
Answer: प्रो० मार्शल के अनुसार मूल्य-निर्धारण का सामान्य सिद्धान्त यह बताता है कि, “वस्तु का मूल्य सीमान्त तुष्टिगुण तथा सीमान्त उत्पादन लागत के बीच में माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा उस स्थान पर निर्धारित होता है, जहाँ वस्तु की पूर्ति उसकी माँग के बराबर होती है।”
In simple words: मार्शल के अनुसार, वस्तु का मूल्य माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों के संतुलन से निर्धारित होता है, जहाँ वस्तु की सीमांत उपयोगिता और सीमांत उत्पादन लागत बराबर होती है।
🎯 Exam Tip: मार्शल के मूल्य निर्धारण सिद्धान्त में माँग और पूर्ति दोनों के सापेक्षिक महत्त्व पर जोर दें।
Question 4. बाजार मूल्य की सामान्य प्रवृत्ति क्या होती है ?
Answer: बाजार मूल्य की प्रवृत्ति सदैव सामान्य मूल्य के बराबर होने की होती है। बाजार मूल्य सामान्य मूल्य के चारों ओर चक्कर काटता रहता है।
In simple words: बाजार मूल्य की प्रवृत्ति होती है कि वह हमेशा सामान्य मूल्य की ओर वापस आए और उसके आसपास घूमता रहे, क्योंकि यह दीर्घकालिक संतुलन बिंदु होता है।
🎯 Exam Tip: बाजार मूल्य के 'धुरी' या 'चक्कर काटने' के गुण पर ध्यान दें, जो सामान्य मूल्य के साथ उसके सम्बन्ध को दर्शाता है।
Question 5. बाजार मूल्य की दो विशेषताएँ बताइए।
Answer:
1. बाजार मूल्य माँग वे पूर्ति के अस्थायी प्रभाव का परिणाम होता है।
2. यह लागत मूल्य से ऊँचा-नीचा होता रहता है।
In simple words: बाजार मूल्य अल्पकालिक होता है, माँग और पूर्ति के क्षणिक प्रभावों से बदलता है, और इसकी कीमत उत्पादन लागत से ऊपर-नीचे होती रहती है।
🎯 Exam Tip: बाजार मूल्य की अस्थायी और परिवर्तनशील प्रकृति पर प्रकाश डालना महत्वपूर्ण है।
Question 6. किस प्रकार के बाजार में कीमत के निर्धारण में माँग का प्रभाव अधिक होता है ?
Answer: अति-अल्पकालीन बाजार में पूर्ति निश्चित होने के कारण मूल्य मुख्यतया माँग पर आधारित होता है। अतः अति-अल्पकालीन बाजार में कीमत-निर्धारण में माँग का प्रभाव अधिक होता है।
In simple words: अति-अल्पकालीन बाजार में, जहाँ वस्तु की पूर्ति तुरंत नहीं बदली जा सकती, कीमत का निर्धारण मुख्य रूप से माँग के स्तर पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: समय अवधि और माँग/पूर्ति के सापेक्षिक महत्त्व के बीच के सम्बन्ध को स्पष्ट करें।
Question 7. प्रो० मार्शल ने समय को कितने भागों में बाँटा है ?
Answer: प्रो० मार्शल ने समय को चार भागों में बाँटा है।
In simple words: प्रो. मार्शल ने बाजार में मूल्य निर्धारण के संदर्भ में समय को चार अलग-अलग अवधियों में वर्गीकृत किया है, जो आपूर्ति के समायोजन की क्षमता पर आधारित हैं।
🎯 Exam Tip: इस तरह के तथ्यात्मक प्रश्नों में सीधा और संक्षिप्त उत्तर दें।
Question 8. किसी वस्तु का बाजार मूल्य किन शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है ?
Answer: मॉग और पूर्ति की सापेक्ष शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है।
In simple words: किसी भी वस्तु का बाजार मूल्य उसकी माँग और बाजार में उसकी उपलब्ध पूर्ति की परस्पर क्रिया से तय होता है।
🎯 Exam Tip: माँग और पूर्ति को मूल्य निर्धारण की आधारभूत शक्तियों के रूप में उल्लेख करें।
Question 9. बाजार मूल्य किस प्रकार की वस्तुओं का होता है ?
Answer: केवल भण्डार तक रखी वस्तुओं का अर्थात् जिन वस्तुओं की पूर्ति भण्डार की मात्रा तक बढ़ायी जा सकती है।
In simple words: बाजार मूल्य उन वस्तुओं पर लागू होता है जिनकी आपूर्ति को तुरंत बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता है, यह आमतौर पर मौजूदा स्टॉक पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: बाजार मूल्य का संबंध वस्तुओं की आपूर्ति की अल्पकालिक लोच से होता है।
Question 10. सब्जियों के मूल्य के निर्धारण में किस पक्ष की प्रधानता होती है, माँग पक्ष की या पूर्ति पक्ष की ?
Answer: माँग पक्ष की।
In simple words: सब्जियों के मूल्य निर्धारण में माँग पक्ष की प्रधानता होती है क्योंकि इनकी आपूर्ति अल्पकाल में निश्चित होती है और मूल्य मुख्य रूप से उपभोक्ता की माँग से प्रभावित होता है।
🎯 Exam Tip: शीघ्र खराब होने वाली वस्तुओं और अल्पकालिक आपूर्ति वाली वस्तुओं के लिए माँग पक्ष की प्रधानता को याद रखें।
Question 11. कीमत-निर्धारण में समय कितने प्रकार का होता है ?
Answer: कीमत-निर्धारण में समय चार प्रकार का होता है।
In simple words: कीमत के निर्धारण में समय की अवधि को चार मुख्य प्रकारों में बांटा गया है, जो आपूर्ति के समायोजन की क्षमता को दर्शाते हैं।
🎯 Exam Tip: समय के इन चार प्रकारों को उनके प्रभावों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (1) अंक)
Question 1. वस्तु के मूल्य-निर्धारण में उत्पादन लागत को महत्त्व प्रदान करने वाले अर्थशास्त्री हैं
(क) प्रो० एडम स्मिथ
(ख) रिकाड
(ग) माल्थस व मिल
(घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: उत्पादन लागत को मूल्य निर्धारण का मुख्य आधार मानने वाले अर्थशास्त्रियों में एडम स्मिथ, रिकार्डो, माल्थस और मिल जैसे परम्परावादी अर्थशास्त्री शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: विभिन्न अर्थशास्त्रीय विचारों और उनके प्रतिपादकों को याद रखें, विशेषकर परम्परावादी और नव-क्लासिकल स्कूल से।
Question 2. वस्तु के मूल्य-निर्धारण में तुष्टिगुण को महत्त्व प्रदान करने वाले अर्थशास्त्री हैं
(क) प्रो० जेवेन्स
(ख) मैन्जर तथा वालरस
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) माल्थस व मिल
Answer: (ग) (क) तथा (ख) दोनों
In simple words: जेवेन्स, मैन्जर और वालरस जैसे अर्थशास्त्री मानते हैं कि किसी वस्तु का मूल्य उसकी तुष्टिगुण (उपयोगिता) पर आधारित होता है, जो उपभोक्ता को उस वस्तु से मिलती है।
🎯 Exam Tip: सीमान्त तुष्टिगुण सिद्धान्त के प्रमुख प्रतिपादकों के नामों को सही ढंग से पहचानें।
Question 3. वस्तु के मूल्य-निर्धारण में समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाने वाले अर्थशास्त्री हैं
(क) प्रो० जेवेन्स
(ख) प्रो० माल्थस
(ग) प्रो० मार्शल
(घ) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ग) प्रो० मार्शल
In simple words: प्रो. मार्शल ने मूल्य निर्धारण में उत्पादन लागत (पूर्ति) और तुष्टिगुण (माँग) दोनों के महत्व को स्वीकार करते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जो 'समन्वयवादी दृष्टिकोण' कहलाता है।
🎯 Exam Tip: मार्शल का समन्वयवादी दृष्टिकोण मूल्य निर्धारण के लिए माँग और पूर्ति दोनों के महत्व को एकीकृत करता है।
Question 4. मार्शल के 'माँग एवं पूर्ति का नियम' को इस नाम से भी पुकारते हैं
(क) माँग का सिद्धान्त
(ख) आधुनिक सिद्धान्त
(ग) सीमान्त लागत का सिद्धान्त
(घ) ये सभी
Answer: (ख) आधुनिक सिद्धान्त
In simple words: मार्शल के माँग एवं पूर्ति के नियम को आधुनिक सिद्धान्त भी कहा जाता है क्योंकि यह मूल्य निर्धारण के समकालीन विचारों का आधार है।
🎯 Exam Tip: मार्शल के सिद्धान्तों के वैकल्पिक नामों और उनके ऐतिहासिक संदर्भ को जानना सहायक होता है।
Question 5. यदि बाजार मूल्य सामान्य से अधिक ऊँचा हो, तो
(क) उत्पादकों को सामान्य हानि होने लगेगी
(ख) उत्पादकों को सामान्य लाभ होने लगेगा
(ग) उत्पादकों को असाधारण लाभ होगा
(घ) उत्पादकों को असाधारण हानि होने लगेगी
Answer: (ग) उत्पादकों को असाधारण लाभ होगा
In simple words: जब बाजार मूल्य सामान्य मूल्य से अधिक होता है, तो उत्पादकों को अपनी लागत से अधिक आय मिलती है, जिससे उन्हें असाधारण या अतिरिक्त लाभ होता है।
🎯 Exam Tip: बाजार मूल्य के सामान्य मूल्य से विचलन के प्रभावों को उत्पादकों के लाभ या हानि के संदर्भ में समझें।
Question 6. कीमत-निर्धारण में समय के महत्त्व को बतलाया था
(क) ए० मार्शल ने
(ख) ए० सी० पीगू ने
(ग) एल० रॉबिन्स ने
(घ) जे० के० मेहता ने
Answer: (क) ए० मार्शल ने
In simple words: ए. मार्शल ने कीमत निर्धारण में समय की अवधारणा को महत्वपूर्ण बताया, विभिन्न समय अवधियों (अति-अल्पकाल, अल्पकाल, दीर्घकाल) में माँग और पूर्ति की भूमिका को स्पष्ट किया।
🎯 Exam Tip: मार्शल का समय के आधार पर बाजार वर्गीकरण अर्थशास्त्र में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है।
Question 7. “एक वस्तु की कीमत के निर्धारण में माँग और पूर्ति दोनों का समान महत्त्व होता है।” यह कथन है
(क) ए० सी० पीगू का
(ख) जे० के० मेहता का
(ग) डेविड रिकार्डों का
(घ) ए० मार्शल का
Answer: (घ) ए० मार्शल का
In simple words: यह कथन प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ए. मार्शल का है, जो यह मानते हैं कि वस्तु का मूल्य निर्धारित करने में माँग और पूर्ति दोनों ही शक्तियाँ समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
🎯 Exam Tip: मार्शल के समन्वयवादी सिद्धान्त को याद रखें जो माँग और पूर्ति दोनों को मूल्य निर्धारण के लिए आवश्यक मानता है।
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