UP Board Solutions Class 12 Civics Chapter 3 Politics of Planned Development

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Class 12 Civics Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति UP Board Solutions PDF

 

Question 1. ‘बॉम्बे प्लान’ के बारे में निम्नलिखित में कौन-सा बयान सही नहीं है-
(a) यह भारत के आर्थिक भविष्य का एक ब्लू-प्रिण्ट था।
(b) इसमें उद्योगों के ऊपर राज्य के स्वामित्व का समर्थन किया गया था।
(c) इसकी रचना कुछ अग्रणी उद्योगपतियों ने की थी।
(d) इसमें नियोजन के विचार का पुरजोर समर्थन किया गया था।
Answer: (b) इसमें उद्योगों के ऊपर राज्य के स्वामित्व का समर्थन किया गया था।
In simple words: बॉम्बे प्लान देश के बड़े उद्योगपतियों द्वारा तैयार किया गया था, इसलिए वे उद्योगों पर सरकार का पूरा नियंत्रण (स्वामित्व) नहीं चाहते थे, बल्कि वे चाहते थे कि सरकार केवल बुनियादी ढांचा तैयार करने में मदद करे।

🎯 Exam Tip: बॉम्बे प्लान से जुड़े प्रश्नों में यह याद रखें कि यह 1944 में उद्योगपतियों के एक समूह द्वारा तैयार किया गया था, जो नियोजित अर्थव्यवस्था के पक्ष में थे लेकिन पूर्ण सरकारी स्वामित्व के खिलाफ थे।

 

Question 2. भारत ने शुरुआती दौर में विकास की जो नीति अपनाई उसमें निम्नलिखित में से कौन-सा विचार शामिल नहीं था-
(a) नियोजन
(b) उदारीकरण
(c) सहकारी खेती
(d) आत्मनिर्भरता
Answer: (b) उदारीकरण
In simple words: आजादी के तुरंत बाद भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को बाहरी दुनिया के लिए नहीं खोला था (उदारीकरण नहीं अपनाया था)। उदारीकरण की नीति बहुत बाद में, साल 1991 में अपनाई गई थी।

🎯 Exam Tip: शुरुआती दौर की नीतियों में नियोजन, आत्मनिर्भरता और सहकारी खेती मुख्य थीं। उदारीकरण (Liberalisation) को 1991 के आर्थिक सुधारों के साथ जोड़ा जाता है, इसे शुरुआती नीतियों में न चुनें।

 

Question 3. भारत में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का विचार ग्रहण किया गया था-
(i) बॉम्बे प्लान से
(ii) सोवियत खेमे के देशों के अनुभवों से
(iii) समाज के बारे में गांधीवादी विचार से
(iv) किसान संगठनों की माँगों से
(a) सिर्फ (ii) और (iv)
(b) सिर्फ (i) और (ii)
(c) सिर्फ (iv) और (iii)
(d) उपर्युक्त सभी विकल्प
Answer: (d) उपर्युक्त सभी विकल्प
In simple words: भारत ने अपनी योजना प्रणाली किसी एक जगह से नहीं ली, बल्कि इसमें उद्योगपतियों के बॉम्बे प्लान, सोवियत संघ के विकास, गांधीजी के विचारों और किसानों की मांगों सभी का असर था।

🎯 Exam Tip: भारत की नियोजित अर्थव्यवस्था एक मिश्रित दृष्टिकोण थी, इसलिए इसमें समाज के सभी वर्गों और वैश्विक अनुभवों का प्रभाव शामिल था।

 

Question 4. निम्नलिखित का मेल करें-

कॉलम अकॉलम ब
(क) चरणसिंह(i) औद्योगिकीकरण
(ख) पी० सी० महालनोबिस(ii) जोनिंग
(ग) बिहार का अकाल(iii) किसान
(घ) वर्गीज कुरियन(iv) सहकारी डेयरी

Answer:
कॉलम असही मिलान (कॉलम ब)
(क) चरणसिंह(iii) किसान
(ख) पी० सी० महालनोबिस(i) औद्योगिकीकरण
(ग) बिहार का अकाल(ii) जोनिंग
(घ) वर्गीज कुरियन(iv) सहकारी डेयरी
In simple words: चौधरी चरण सिंह किसानों के नेता थे, पी. सी. महालनोबिस ने उद्योगों के विकास का खाका खींचा, बिहार के अकाल के समय 'जोनिंग' (खाद्यान्न व्यापार पर रोक) लागू थी, और वर्गीज कुरियन को दूध की सहकारी डेयरी (अमुल) के लिए जाना जाता है।

🎯 Exam Tip: मिलान वाले प्रश्नों में वर्गीज कुरियन (श्वेत क्रांति/डेयरी) और पी. सी. महालनोबिस (द्वितीय पंचवर्षीय योजना/औद्योगिकीकरण) जैसे प्रसिद्ध नामों को पहले मिलाकर बाकी विकल्पों को आसानी से हल करें।

 

Question 5. आजादी के समय विकास के सवाल पर प्रमुख मतभेद क्या थे? क्या इन मतभेदों को सुलझा लिया गया?
Answer: आजादी के समय विकास के सवाल पर प्रमुख मतभेद निम्नांकित थे:
(i) कृषि बनाम उद्योग: एक बड़ा मतभेद यह था कि भारत को कृषि के विकास पर अधिक ध्यान देना चाहिए या भारी उद्योगों की स्थापना पर। चौधरी चरण सिंह जैसे नेताओं का मानना था कि कृषि को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जबकि योजनाकारों का ध्यान औद्योगिकीकरण पर था।
(ii) निजी क्षेत्र बनाम सार्वजनिक क्षेत्र: कुछ लोग पूंजीवादी मॉडल के पक्ष में थे जहाँ निजी उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए, जबकि अन्य समाजवादी मॉडल चाहते थे जहाँ मुख्य उद्योगों पर राज्य का नियंत्रण हो।
इन मतभेदों को पूरी तरह से तो नहीं सुलझाया जा सका, लेकिन एक मध्यम मार्ग अपनाते हुए 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' का मॉडल स्वीकार किया गया जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को सह-अस्तित्व की अनुमति दी गई। यह निर्णय देश के समग्र विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ।
In simple words: आजादी के समय मुख्य विवाद इस बात पर था कि पहले खेती का विकास किया जाए या बड़े कारखाने लगाए जाएं, और देश में सरकारी नियंत्रण हो या निजी कंपनियों को छूट मिले। अंत में दोनों का मिला-जुला रूप (मिश्रित अर्थव्यवस्था) अपनाया गया।

🎯 Exam Tip: इस उत्तर में 'कृषि बनाम उद्योग' और 'निजी बनाम सार्वजनिक क्षेत्र' जैसे मुख्य बिंदुओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करें और अंत में 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' का उल्लेख अवश्य करें।

विकास और नियोजन (Development and Planning)

(1) विकास का अर्थ समाज के प्रत्येक वर्ग हेतु अलग-अलग होता है। कुछ अर्थशास्त्री तथा रक्षा व पर्यावरण विशेषज्ञों का मत था कि पश्चिमी देशों की तरह पूँजीवाद व उदारवाद को महत्त्व दिया जाए जबकि अन्य लोग विकास के सोवियत मॉडल का समर्थन कर रहे थे। पूँजीवादी मॉडल औद्योगिकीकरण का समर्थक था जबकि साम्यवादी मॉडल कृषिगत विकास एवं ग्रामीण क्षेत्र की गरीबी को दूर करने पर बल देता था।

(2) विकास के क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि हो तथा सामाजिक न्याय भी मिले इसे सुनिश्चित करने के लिए सरकार कौन-सी भूमिका निभाए? इस सवाल पर मतभेद थे।

(3) कुछ लोग औद्योगिकीकरण को विकास का सही रास्ता मानते थे जबकि कुछ अन्य लोग यह मानते थे कि कृषि का विकास करके ग्रामीण क्षेत्र की गरीबी दूर करना ही विकास का प्रमुख मानदण्ड होना चाहिए।

(4) कुछ अर्थशास्त्री केन्द्रीय नियोजन के पक्ष में थे जबकि कुछ अन्य विकेन्द्रित नियोजन को विकास के लिए आवश्यक मानते थे।

(5) कुछ राज्य सरकारों ने केन्द्रीयकृत नियोजन के विपरीत अपना अलग ही विकास मॉडल अपनाया; जैसे-केरल राज्य में ‘केरल मॉडल’ के अन्तर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि सुधार, कारगर खाद्य वितरण तथा गरीबी उन्मूलन पर बल दिया गया।

इस तरह भारत ने साम्यवादी मॉडल व पूँजीवादी मॉडल को न अपनाकर इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण बातों को लेकर अपने देश में इन्हें मिले-जुले रूप में लागू किया। भारत ने इस समस्या का हल आपसी बातचीत एवं सहमति से बीच का रास्ता अपनाते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाकर किया। इस प्रकार भारत ने विकास से संबंधित अधिकांश मतभेदों को सुलझा दिया लेकिन कुछ मतभेद आज भी प्रासंगिक हैं; जैसे—भारत जैसी अर्थव्यवस्था में कृषि और उद्योग के बीच किस क्षेत्र में ज्यादा संसाधन लगाए जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र व सार्वजनिक क्षेत्र को कितनी मात्रा में हिस्सेदारी दी जाए, इस पर भी मतभेद हैं।

 

Question 6. पहली पंचवर्षीय योजना का किस चीज पर सबसे ज्यादा जोर था? दूसरी पंचवर्षीय योजना पहली से किन अर्थों में अलग थी?
Answer: पहली पंचवर्षीय योजना में देश में लोगों को गरीबी के जाल से निकालने का प्रयास किया गया और इस योजना में ज्यादा जोर कृषि क्षेत्र पर दिया गया। इसी योजना में बाँध और सिंचाई के क्षेत्र में निवेश किया गया। विभाजन के कारण कृषि क्षेत्र को गहरी मार लगी थी और इस क्षेत्र पर तुरन्त ध्यान देना आवश्यक था। भाखड़ा-नांगल जैसी विशाल परियोजनाओं के लिए बड़ी धनराशि आवंटित की गई। इस योजना में माना गया था कि देश में भूमि के वितरण का जो ढर्रा मौजूद है उससे कृषि के विकास को सबसे बड़ी बाधा पहुँचती है। इस योजना में भूमि सुधार पर जोर दिया गया और इसे देश के विकास की बुनियादी चीज माना गया। भारत की इस शुरुआती पहल ने कृषि क्षेत्र को एक मजबूत आधार प्रदान किया।

दोनों योजनाओं में अन्तर:
1. पहली पंचवर्षीय योजना एवं दूसरी पंचवर्षीय योजना में प्रमुख अन्तर यह था कि जहाँ पहली पंचवर्षीय योजना में कृषि क्षेत्र पर अधिक बल दिया गया, वहीं दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों के विकास पर अधिक जोर दिया गया।
2. पहली पंचवर्षीय योजना का मूल मन्त्र था—धीरज, जबकि दूसरी पंचवर्षीय योजना तेज संरचनात्मक परिवर्तन पर बल देती थी।
In simple words: The First Five-Year Plan focused mainly on agriculture, irrigation, and land reforms to lift people out of poverty. In contrast, the Second Five-Year Plan shifted its focus toward heavy industries and rapid structural changes to boost the economy.

🎯 Exam Tip: Clearly highlight the contrast between the agricultural focus of the First Plan and the industrial focus of the Second Plan using bullet points to score maximum marks.

 

Question 7. हरित क्रान्ति क्या थी? हरित क्रान्ति के दो सकारात्मक और दो नकारात्मक परिणामों का उल्लेख करें।
Answer: हरित क्रान्ति का अर्थ— "हरित क्रान्ति से अभिप्राय कृषिगत उत्पादन की तकनीक को सुधारने तथा कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि करने से है।" हरित क्रान्ति के तीन बुनियादी तत्त्व निम्नलिखित थे:
1. कृषि का निरन्तर विस्तार,
2. दोहरी फसल का उद्देश्य,
3. उन्नत किस्म के बीजों (HYV seeds) का प्रयोग।

हरित क्रान्ति के दो सकारात्मक परिणाम:
1. खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता: भारत में गेहूँ और चावल के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई, जिससे देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन गया।
2. किसानों की आय में वृद्धि: आधुनिक तकनीकों और बेहतर बीजों के उपयोग से किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ।

हरित क्रान्ति के दो नकारात्मक परिणाम:
1. क्षेत्रीय असमानता: हरित क्रान्ति का लाभ मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे कुछ ही राज्यों तक सीमित रहा, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ा।
2. पर्यावरणीय नुकसान: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता प्रभावित हुई और भूजल स्तर में गिरावट आई।
In simple words: The Green Revolution was a major effort to increase food production in India using modern farming methods and high-yielding seeds. While it made India self-sufficient in food, it also created regional inequalities and caused environmental issues due to chemical overuse.

🎯 Exam Tip: When explaining the Green Revolution, always define its core meaning first, and then list exactly two positive and two negative impacts clearly under separate subheadings.

3. अच्छे बीजों का प्रयोग।
इस तरह हरित क्रांति का अर्थ है-सिंचित और असंचित कृषि क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाली किस्मों को आधुनिक कृषि पद्धति से उगाकर उत्पादन बढ़ाना।

हरित क्रांति के दो सकारात्मक परिणाम

1. हरित क्रांति में धनी किसानों और बड़े भू-स्वामियों को सबसे ज्यादा लाभ हुआ। हरित क्रांति से खेतिहर पैदावार में सामान्य किस्म का इजाफा हुआ (ज्यादातर गेहूँ की पैदावार बढ़ी) और देश में खाद्यान्न की उपलब्धता में वृद्धि हुई।
2. हरित क्रांति के कारण कृषि में मँझोले दर्जे के किसानों यानी मध्यम श्रेणी के भू-स्वामित्व वाले किसानों को लाभ हुआ। इन्हें बदलावों से फायदा हुआ था और देश के अनेक हिस्सों में यह प्रभावशाली बनकर उभरे।

हरित क्रांति के नकारात्मक परिणाम

1. इस क्रांति से गरीब किसानों और भू-स्वामियों के बीच का अन्तर मुखर हो उठा। इससे देश के विभिन्न हिस्सों में वामपंथी संगठनों के लिए गरीब किसानों को लामबन्द करने के लिहाज से अनुकूल परिस्थितियाँ बन गईं।
2. इससे समाज के विभिन्न वर्गों और देश के अलग-अलग इलाकों के बीच ध्रुवीकरण तेज हुआ जबकि बाकी इलाके खेती के मामले में पिछड़े रहे।

 

Question 8. दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान औद्योगिक विकास बनाम कृषि विकास का विवाद चला था। इस विवाद में क्या-क्या तर्क दिए गए थे?
Answer: दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान यह विवाद उत्पन्न हुआ कि किस क्षेत्र के विकास पर अधिक जोर दिया जाए, कृषि क्षेत्र के विकास पर या औद्योगिक विकास पर। इस विवाद के सम्बन्ध में विभिन्न तर्क दिए गए-
(1) कृषि क्षेत्र का विकास करने वाले विद्वानों का यह तर्क था कि इससे देश आत्मनिर्भर बनेगा तथा किसानों की दशा में सुधार होगा, जबकि औद्योगिक विकास का समर्थन करने वालों का यह तर्क था कि औद्योगिक विकास से देश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तथा देश में बुनियादी सुविधाएं बढ़ेंगी। यह विवाद भारत के आर्थिक नियोजन के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।
(2) अनेक लोगों का मानना था कि दूसरी पंचवर्षीय योजना में कृषि के विकास की रणनीति का अभाव था और इस योजना के दौरान उद्योगों पर जोर देने के कारण खेती और ग्रामीण इलाकों को चोट पहुंचेगी।
(3) कई अन्य लोगों का सोचना था कि औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर को तेज किए बगैर गरीबी के मकड़जाल से मुक्ति नहीं मिल सकती। इन लोगों का तर्क था कि भारतीय अर्थव्यवस्था के नियोजन में खाद्यान्न के उत्पादन को बढ़ाने तथा भूमि-सुधार और ग्रामीण निर्धनों के बीच संसाधनों के बँटवारे के लिए अनेक कानून बनाए गए, लेकिन औद्योगिक विकास की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए।
(4) जे० सी० कुमारप्पा जैसे गांधीवादी अर्थशास्त्रियों ने एक वैकल्पिक योजना का खाका प्रस्तुत किया जिससे ग्रामीण औद्योगीकरण पर ज्यादा जोर दिया गया। इसी प्रकार चौधरी चरणसिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था के नियोजन में कृषि को केन्द्र में रखने की बात बड़े सुविचारित और दमदार ढंग से उठायी।
In simple words: दूसरी पंचवर्षीय योजना में इस बात पर बहस थी कि खेती को बढ़ावा दिया जाए या उद्योगों को। कुछ लोगों का मानना था कि खेती से देश आत्मनिर्भर बनेगा, जबकि दूसरों का मानना था कि उद्योगों से रोजगार और आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी।

🎯 Exam Tip: उत्तर लिखते समय कृषि और उद्योग दोनों पक्षों के मुख्य विचारकों (जैसे जे. सी. कुमारप्पा और चौधरी चरण सिंह) के नाम और उनके तर्कों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करें।

 

Question 9. “अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका पर जोर देकर भारतीय नीति-निर्माताओं ने गलती की। अगर शुरुआत से ही निजी क्षेत्र को खुली छूट दी जाती तो भारत का विकास कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से होता।” इस विचार के पक्ष या विपक्ष में अपने तर्क दीजिए।
Answer: अर्थव्यवस्था के मिश्रित या मिले-जुले मॉडल की आलोचना दक्षिणपंथी तथा वामपंथी दोनों खेमों में हुई। आलोचकों का मत था कि योजनाकारों ने निजी क्षेत्र को पर्याप्त जगह नहीं दी है। विशाल सार्वजनिक क्षेत्र ने ताकतवर निजी स्वार्थों को खड़ा किया है तथा इन स्वार्थपूर्ण हितों ने निवेश के लिए लाइसेंस व परमिट की प्रणाली खड़ी करके निजी पूँजी का मार्ग अवरुद्ध किया है। इस प्रकार की सरकारी नीतियों ने देश के औद्योगिक विकास की गति को काफी हद तक धीमा कर दिया। निजी क्षेत्र के पक्ष में तर्क इस प्रकार हैं-
In simple words: आलोचकों का मानना था कि सरकार ने निजी उद्योगों को आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त छूट नहीं दी। लाइसेंस और परमिट राज के कारण निजी निवेश और देश का विकास प्रभावित हुआ।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में निजी क्षेत्र के पक्ष और विपक्ष दोनों के तर्कों को संतुलित रूप से प्रस्तुत करें और 'लाइसेंस-परमिट राज' जैसे महत्वपूर्ण शब्दों का प्रयोग अवश्य करें।

आर्थिक नीति: पक्ष और विपक्ष में तर्क

(1) अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका पर जोर भारत की आर्थिक नीति बनाने वाले विशेषज्ञों ने भारी गलती कर दी थी। सन् 1990 से ही भारत ने नई आर्थिक नीति को अपना लिया है तथा वह बहुत तेजी से उदारीकरण व वैश्वीकरण की ओर बढ़ रहा है। देश के कई बड़े नेता जो दुनिया में जाने-माने अर्थशास्त्री भी हैं, ये भी निजी क्षेत्र, उदारीकरण तथा सरकारी हिस्सेदारी को यथाशीघ्र सभी व्यवसायों, उद्योगों आदि में समाप्त करना चाहते हैं।

(2) विश्व की दो बड़ी संस्थाओं अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तथा विश्व बैंक से भारत को ऋण और अधिक-से-अधिक निवेश तभी मिल सकते हैं जब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा विदेशी निवेशकों का स्वागत सत्कार हो और उद्योगों के विकास हेतु आन्तरिक सुविधाओं का बड़े पैमाने पर सुधार हो। इसके लिए सरकार पूँजी नहीं जुटा सकती है। यह कार्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और बड़े-बड़े पूंजीपति कर सकते हैं जो बड़े-बड़े जोखिम उठाने हेतु तैयार हैं।

(3) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता में भारत तभी ठहर सकता है जब निजी क्षेत्र में छूट दे दी जाए।

(4) निजी क्षेत्र का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। अतः इसके सभी निर्णय लाभ की मात्रा पर आधारित होते हैं।

(5) अर्जित संपत्ति पर व्यक्ति का स्वयं का अधिकार होता है। वह इसका प्रयोग करने हेतु स्वतन्त्र होता है।

(6) राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम रहता है। सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु वह आर्थिक क्रियाओं में हस्तक्षेप करता है।

(7) प्रत्येक आर्थिक क्षेत्र में व्यक्ति को स्वतन्त्रता होती है।

(8) कीमत यन्त्र, स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करता है। व्यवसाय के क्षेत्र जैसे उत्पादन, उपभोग, वितरण में कीमत यन्त्र ही मार्ग निर्देशित करता है।

(9) इस क्षेत्र हेतु उत्पादन तथा मूल्य निर्धारण में प्रतिस्पर्धा पायी जाती है। माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियाँ ही उत्पादन की मात्रा एवं मूल्य निर्धारित करती हैं।

विपक्ष में तर्क

(1) सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी का समर्थन करने वाले वामपन्थी विचारधारा के समर्थकों का मत है कि भारत को सुदृढ़ कृषि तथा औद्योगिक क्षेत्र में आधार सरकारी वर्चस्व और मिश्रित नीतियों से मिला है। यदि ऐसा नहीं होता तो भारत पिछड़ा ही रह जाता।

(2) भारत में विकसित देशों की तुलना में जनसंख्या अधिक है। यहाँ गरीबी है, बेरोजगारी है। यदि पश्चिमी देशों की होड़ में भारत में सरकारी हिस्से को अर्थव्यवस्था हेतु कम कर दिया जाएगा तो गरीबी फैलेगी तथा बेरोजगारी बढ़ेगी, धन और पूँजी कुछ ही कम्पनियों के हाथों में केन्द्रित हो जाएँगे जिससे आर्थिक विषमता और अधिक बढ़ जाएगी।

(3) हम जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। वह संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों का कृषि उत्पादन में मुकाबला नहीं कर सकता। कुछ देश स्वार्थ के लिए पेटेण्ट प्रणाली को कृषि में लागू करना चाहते हैं तथा जो सहायता राशि भारत सरकार अपने किसानों को देती है वह उसे अपने दबाव द्वारा पूरी तरह खत्म करना चाहते हैं। जबकि भारत सरकार देश के किसानों को हर प्रकार से आर्थिक सहायता देकर अन्य विकासशील देशों को कृषि सहित अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में मात देना चाहती है। (नोट-विद्यार्थी अपने उत्तर के पक्ष या विपक्ष में से एक पर अपने विचार लिख सकते हैं।)

 

निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें:
"आजादी के बाद के आरम्भिक वर्षों में कांग्रेस पार्टी के भीतर दो परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ पनपी। एक तरफ राष्ट्रीय पार्टी कार्यकारिणी ने राज्य के स्वामित्व का समाजवादी सिद्धान्त अपनाया, उत्पादकता को बढ़ाने के साथ-साथ आर्थिक संसाधनों के संकेन्द्रण को रोकने के लिए अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों का नियन्त्रण और नियमन किया। दूसरी तरफ कांग्रेस की राष्ट्रीय सरकार ने निजी निवेश के लिए उदार आर्थिक नीतियां अपनाईं और उसके बढ़ावा के लिए विशेष कदम उठाए। इसे उत्पादन में अधिकतम वृद्धि की अकेली कसौटी पर जायज ठहराया गया।" – फ्रैंकिन फ्रैंकल

 

Question 10. उपर्युक्त अवतरण के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(क) यहाँ लेखक किस अन्तर्विरोध की चर्चा कर रहा है? ऐसे अन्तर्विरोध के राजनीतिक परिणाम क्या होंगे?
(ख) अगर लेखक की बात सही है तो फिर बताएं कि कांग्रेस इस नीति पर क्यों चल रही थी? क्या इसका सम्बन्ध विपक्षी दलों की प्रकृति से था?
(ग) क्या कांग्रेस पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व और प्रान्तीय नेताओं के बीच कोई अन्तर्विरोध था?
Answer:
(क) यहाँ लेखक कांग्रेस पार्टी के भीतर मौजूद वैचारिक अन्तर्विरोध की चर्चा कर रहा है, जहाँ एक तरफ संगठन समाजवादी नीतियों और राज्य के नियन्त्रण का समर्थन कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ सरकार निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए उदार नीतियां अपना रही थी। इस अन्तर्विरोध के राजनीतिक परिणाम यह हुए कि कांग्रेस के भीतर गुटबाजी बढ़ी और अंततः 1969 में पार्टी का ऐतिहासिक विभाजन हो गया।
(ख) कांग्रेस इस दोहरी नीति पर इसलिए चल रही थी क्योंकि वह एक व्यापक सामाजिक और विचारधारात्मक गठबंधन थी, जिसमें दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों विचारधाराओं के लोग शामिल थे। इसका सम्बन्ध विपक्षी दलों की प्रकृति से भी था, क्योंकि उस समय विपक्ष अत्यन्त कमजोर था और कांग्रेस स्वयं में ही सरकार और विपक्ष दोनों की भूमिका निभाते हुए सभी वर्गों को संतुष्ट रखना चाहती थी।
(ग) हाँ, कांग्रेस पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व और प्रान्तीय नेताओं के बीच भी अन्तर्विरोध था। केन्द्रीय नेतृत्व जहाँ समाजवादी सुधारों और भूमि सुधारों को लागू करना चाहता था, वहीं प्रान्तीय नेता (जो अक्सर स्थानीय जमींदारों और प्रभावशाली वर्गों से जुड़े थे) इन नीतियों को जमीनी स्तर पर लागू करने का विरोध या उसमें ढिलाई करते थे।
In simple words: इस प्रश्न में कांग्रेस के अंदर की दो अलग-अलग सोच (समाजवाद और पूंजीवाद) के टकराव को समझाया गया है। कांग्रेस सबको खुश रखने के लिए दोनों तरह की नीतियां अपना रही थी, जिससे पार्टी के अंदर ही मतभेद पैदा हो गए।

🎯 Exam Tip: उत्तर लिखते समय 'विचारधारात्मक गठबंधन' और '1969 का विभाजन' जैसे मुख्य शब्दों का प्रयोग अवश्य करें, इससे परीक्षक पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और पूरे अंक मिलते हैं।

UP Board Class 12 Civics Chapter 3 InText Questions

UP Board Class 12 Civics Chapter 3 पाठा अंतर्गत प्रश्नोत्तर

 

Question 1. “मैं सोचता था कि यह तो बड़ा सीधा-सादा फ़ॉर्मूला है। सारे फैसलों के साथ मोटी रकम जुड़ी होती है और इसी कारण राजनेता ये फैसले करते हैं।”
Answer: प्रायः देखा गया है कि राजनीतिक फैसलों या निर्णयों के पीछे राजनेताओं के राजनीतिक एवं आर्थिक हित जुड़े हुए होते हैं और इन्हीं को ध्यान में रखते हुए ये लोग निर्णय लेते हैं लेकिन यह सच नहीं है। सारे फैसलों के साथ मोटी रकम नहीं जुड़ी होती। अनेक फैसले जो जनहित में लिए जाते हैं इनसे मोटी रकम का कोई सरोकार नहीं होता। राजनेता जनहित में भी फैसला करते हैं। इसके अतिरिक्त, कई नीतियां केवल समाज कल्याण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाई जाती हैं।
In simple words: राजनीतिक फैसले हमेशा पैसों के लिए नहीं किए जाते। बहुत से निर्णय जनता की भलाई और समाज के विकास के लिए भी लिए जाते हैं।

🎯 Exam Tip: उत्तर लिखते समय स्पष्ट करें कि सभी राजनीतिक निर्णय व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं होते, बल्कि जनहित भी एक मुख्य कारक है।

 

Question 2. क्या आप यह कह रहे हैं कि आधुनिक’ बनने के लिए ‘पश्चिमी’ होना जरूरी नहीं है? क्या यह सम्भव है?
Answer: आधुनिक बनने के लिए पश्चिमी होना जरूरी नहीं है। प्रायः आधुनिकीकरण का सम्बन्ध पाश्चात्यीकरण से माना जाता है लेकिन यह सही नहीं है, क्योंकि आधुनिक होने का अर्थ मूल्यों एवं विचारों में समस्त परिवर्तन से लगाया जाता है और यह परिवर्तन समाज को आगे की ओर ले जाने वाले होने चाहिए। आधुनिकीकरण में परिवर्तन केवल विवेक पर ही नहीं बल्कि सामाजिक मूल्यों पर भी आधारित होते हैं। इसमें वस्तुतः समाज के मूल्य साध्य और लक्ष्य भी निर्धारित करते हैं कि कौन-सा परिवर्तन अच्छा है और कौन-सा बुरा है; कौन-सा परिवर्तन आगे की ओर ले जाने वाला है और कौन-सा अधोगति में पहुँचाने वाला है। पाश्चात्यीकरण भौतिकवाद है। अनेक बार इसके भौतिकवाद में उपयोगितावाद का अभाव होने से यह मात्र आडम्बरी, दिखावटी और शुष्क बनकर रह जाता है। इसमें परिवर्तन होते हैं परन्तु उनमें मूल्यों या साध्यों का सर्वथा अभाव रहता है। पाश्चात्यीकरण मूल्य मुक्तता पर बल देता है, इसका न कोई क्रम होता है और न कोई दिशा। इस प्रकार आधुनिक बनने के लिए पश्चिमी होना जरूरी नहीं है। भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों को बनाए रखते हुए भी प्रगतिशील विचारों को अपनाना ही वास्तविक आधुनिकता है।
In simple words: आधुनिक होने का मतलब पश्चिमी पहनावा या रहन-सहन अपनाना नहीं है। इसका असली मतलब अपनी सोच को बेहतर बनाना और समाज को आगे ले जाना है।

🎯 Exam Tip: आधुनिकीकरण और पाश्चात्यीकरण के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझाएं ताकि पूरे अंक मिल सकें।

 

Question 3. अरे! मैं तो भूमि सुधारों को मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने की तकनीक समझता था।
Answer: भूमि सुधार का तात्पर्य मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने की तकनीक तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके अन्तर्गत अनेक तत्त्वों को सम्मिलित किया जाता है-
1. जमींदारी एवं जागीरदारी व्यवस्था को समाप्त करना।
2. जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को एक-साथ करके कृषिगत कार्य को अधिक सुविधाजनक बनाना।
3. बेकार एवं बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने हेतु व्यवस्था करना।
4. भू-जल के निकास की उचित व्यवस्था करना।
5. कृषिगत भू-जोतों की उचित व्यवस्था करना। इन सुधारों का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनके अधिकार देना और कृषि उत्पादकता को बढ़ाना है।
In simple words: भूमि सुधार का मतलब सिर्फ मिट्टी ठीक करना नहीं है। इसमें खेती की जमीन के मालिकाना हक को सुधारना और किसानों की मदद करना भी शामिल है।

🎯 Exam Tip: भूमि सुधार के अंतर्गत आने वाले सभी पांचों बिंदुओं को क्रमानुसार लिखें ताकि उत्तर पूर्ण और प्रभावशाली लगे।

 

Question 1. हरित क्रान्ति क्या है? हरित क्रान्ति के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलू बताइए। अथवा हरित क्रान्ति किसे कहते हैं? इसकी सफलता के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालिए।
Answer: हरित क्रान्ति का अर्थ हरित क्रान्ति से अभिप्राय कृषि उत्पादन में होने वाली उस भारी वृद्धि से है जो कृषि की नई नीति अपनाने के कारण हुई है। जे० जी० हाटर के शब्दों में, “हरित क्रान्ति शब्द 1968 में होने वाले उन आश्चर्यजनक परिवर्तनों के लिए प्रयोग में लाया जाता है जो भारत के खाद्यान्न उत्पादन में हुए थे तथा अब भी जारी हैं।”

भारत में सन् 1967-68 में नई कृषि नीति अपनाने से कृषि उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई थी जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा। इसने ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खोले। हरित क्रान्ति की पद्धति के मुख्य रूप से तीन तत्त्व थे:
• कृषि का निरन्तर विस्तार करना।
• दोहरी फसलों का उत्पादन करना।
• अधिक उत्पादन हेतु अच्छे बीजों का प्रयोग किया जाए।

हरित क्रान्ति के सकारात्मक प्रभाव अथवा हरित क्रान्ति की सफलता के विभिन्न पक्ष भारत में हरित क्रान्ति के सकारात्मक परिणाम सामने आए, जो इस प्रकार हैं:
1. उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई—हरित क्रान्ति का सबसे अधिक प्रभाव कृषिगत उत्पादन की मात्रा पर पड़ा। इससे भारत में रिकॉर्ड पैदावार हुई। सन् 1978-79 में भारत में लगभग 131 मिलियन टन गेहूँ का उत्पादन हुआ तथा जो देश गेहूँ का आयात करता था, वह अब गेहूँ को निर्यात करने की स्थिति में आ गया।
2. औद्योगिक विकास को बढ़ावा—हरित क्रान्ति के कारण भारत में न केवल कृषि क्षेत्र को फायदा हुआ बल्कि इसने औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा दिया। हरित क्रान्ति में अच्छे बीजों, अधिक पानी, खाद तथा कृत्रिम यन्त्रों की आवश्यकता थी, जिसके लिए उद्योग लगाए गए। इससे लोगों को रोजगार भी प्राप्त हुआ।
3. बुनियादी ढाँचे का विकास—हरित क्रान्ति की एक सफलता यह रही कि इसके परिणामस्वरूप भारत में बुनियादी ढाँचे में उत्साहजनक विकास देखने को मिला।
4. राजनीतिक स्तर में बढ़ोतरी—भारत में हरित क्रान्ति का एक सकारात्मक प्रभाव यह पड़ा कि भारत की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत छवि बन गई। हरित क्रान्ति के परिणामस्वरूप भारत खाद्यान्न क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो गया, जिससे भारत को अमेरिका पर खाद्यान्न के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ा और इसका प्रभाव सन् 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में देखा गया।
In simple words: हरित क्रांति का मतलब खेती के नए तरीकों, अच्छे बीजों और खादों का उपयोग करके फसलों की पैदावार को बहुत तेजी से बढ़ाना है। इससे भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बना और उसे दूसरे देशों से अनाज नहीं मांगना पड़ा।

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति की परिभाषा के साथ जे० जी० हाटर के कथन को उद्धृत करने और इसके सकारात्मक प्रभावों को बिंदुवार (point-wise) लिखने से उत्तर अधिक प्रभावशाली बनता है और पूरे अंक मिलते हैं।

हरित क्रांति के प्रभाव (क्रमशः)

5. विदेशों में भारतीय किसानों की माँग: भारत की हरित क्रांति से कई देश इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने भारतीय किसानों को अपने देश में बसाने के लिए प्रोत्साहित किया। कनाडा जैसे देश ने भारत सरकार से किसानों की माँग की जिसके कारण पंजाब व हरियाणा से कई किसान कनाडा में जाकर बस गए।

 

6. जल विद्युत शक्ति को बढ़ावा: बाँधों द्वारा संचित किए गए पानी का जलविद्युत शक्ति के उत्पादन में प्रयोग किया गया।

 

7. किसानों में संगठनात्मक एकता जाग्रत हुई: अधिकांश भारतीय किसान निरक्षर हैं, उनमें संगठनात्मक एकता का अभाव था। लेकिन हरित क्रांति (1967-68) के बाद जब उनकी दशा सुधरने लगी तो उनमें संगठनात्मक एकता की भावना का विकास होने लगा। भारतीय किसान यूनियन किसानों की इसी संगठनात्मक भावना का प्रतीक है। आज किसान पहले से अधिक संगठित हैं। किसानों की इस संगठनात्मक एकता के पीछे हरित क्रांति का ही हाथ है।

 

8. आन्दोलनों व प्रदर्शनों को बढ़ावा मिला: हरित क्रांति से किसानों में चेतना आई है जिससे वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आन्दोलनों व प्रदर्शनों का सहारा लेने लगे हैं। भारतीय किसान यूनियन (BKU) किसानों के हितों की रक्षा करने वाला एक संगठन है। इसके माध्यम से वे अपनी माँगें प्रशासन के समक्ष रखते हैं।

 

इस प्रकार हरित क्रांति ने एक लम्बे समय से सुस्त और निष्क्रिय पड़ी ग्रामीण जनता में नव-चेतना भर दी और इस क्रांति ने न केवल कृषिगत क्षेत्र बल्कि अन्य क्षेत्रों जैसे उद्योग, व्यापार, विद्युत आदि को भी प्रभावित किया।

 

Question 2. नियोजन का अर्थ बताइए तथा उसके महत्त्व की विवेचना कीजिए। अथवा नियोजन से आप क्या समझते हैं? नियोजन की आवश्यकता एवं उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए। अथवा नियोजन का अर्थ, आवश्यकता एवं महत्त्व की व्याख्या कीजिए।
Answer: नियोजन का अर्थ-नियोजन का अर्थ है-उचित रीति से सोच-विचार कर कदम उठाना। अर्थात् इसका अर्थ ‘पूर्वदृष्टि’ या आगे की ओर देखने से है ताकि यह स्पष्ट पता चल जाए कि क्या काम किया जाना है। यह प्रक्रिया हमें भविष्य की अनिश्चितताओं से निपटने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है।

भारतीय योजना आयोग के अनुसार, “नियोजन साधनों के संगठन की एक विधि है जिसके माध्यम से साधनों का अधिकतम लाभप्रद उपयोग निश्चित सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है।”

भारत में नियोजन की आवश्यकता:
वर्तमान युग नियोजन का युग है और विश्व के लगभग सभी देश अपने विकास और उन्नति के लिए आर्थिक नियोजन से जुड़े हुए हैं। भारत ने कई कारणों से नियोजन की आवश्यकता महसूस की—
1. देश की निर्धनता,
2. बेरोजगारी की समस्या,
3. औद्योगीकरण की आवश्यकता,
4. विभाजन से उत्पन्न आर्थिक असन्तुलन तथा अन्य समस्याएँ,
5. सामाजिक तथा आर्थिक विषमताएँ,
6. देश का पिछड़ापन, धीमी गति से विकास, विस्फोटक जनसंख्या आदि। ये सब समस्याएँ एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं अतः इनके निवारण व देश के समुचित विकास के लिए नियोजन ही एकमात्र विकल्प है।

नियोजन के उद्देश्य:
भारत में नियोजन के उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
1. पूर्ण रोजगार: भारत में बेरोजगारी एक अत्यन्त गम्भीर समस्या है। अतः इस समस्या को दूर कर लोगों को पूर्ण रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना नियोजन का प्रमुख उद्देश्य है।
2. गरीबी का उन्मूलन: निर्धनता की समस्या का निवारण दीर्घकालीन योजनाओं के माध्यम से ही किया जा सकता है। व्यक्ति की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति व जीविकोपार्जन के साधन उपलब्ध कराना नियोजन का दूसरा प्रमुख उद्देश्य है।
In simple words: नियोजन का सरल अर्थ है किसी भी काम को करने से पहले उसके बारे में अच्छी तरह सोच-विचार कर योजना बनाना। इससे हम अपने संसाधनों का सही उपयोग कर पाते हैं और देश का विकास तेजी से होता है।

🎯 Exam Tip: नियोजन की परिभाषा लिखते समय योजना आयोग (Planning Commission) की परिभाषा को उद्धृत करना और इसके मुख्य उद्देश्यों को बिंदुवार (point-wise) लिखना पूरे अंक प्राप्त करने में मदद करता है।

 

Question 3. भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका एवं महत्त्व का विवेचन कीजिए।
Answer: भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका एवं महत्त्व—भारत एक विकासशील देश है जिसमें मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया है। इस दृष्टि से यहाँ सार्वजनिक उद्यमों का विशेष महत्त्व है। इनकी बढ़ती हुई भूमिका को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है:
1. समाजवादी समाज की स्थापना-आर्थिक असमानता को कम करके समाजवादी समाज की स्थापना के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम महत्त्वपूर्ण हैं।
2. सन्तुलित आर्थिक विकास में सहायक-भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन पाया जाता है। यहाँ एक ओर ऐसे राज्य हैं जो आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हैं; जैसे-पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात आदि; वहीं दूसरी ओर कुछ राज्य पिछड़े हुए हैं; जैसे—बिहार, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश आदि। इन पिछड़े हुए क्षेत्रों के विकास तथा इनको अन्य विकसित राज्यों के समकक्ष लाने के लिए सरकारी उद्यमों की स्थापना की जाती है। ये सार्वजनिक उद्यम पिछड़े क्षेत्रों में तीव्र विकास और पिछड़े तथा सम्पन्न राज्यों के बीच खाई को पाटने में सहायक हैं।
3. सामरिक (सुरक्षा) उद्योगों के लिए महत्त्वपूर्ण-नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि सैनिकों व शस्त्रागारों में श्रेष्ठ किस्म के शस्त्र हों, अतः विश्वसनीय हथियारों के निर्माण को निजी क्षेत्र को नहीं सौंपा जा सकता। इसलिए यह आवश्यक है कि प्रतिरक्षा उद्योगों पर सार्वजनिक नियन्त्रण होना चाहिए।
4. लोक-कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण-कुछ मूलभूत जन उपयोगी सेवाएँ जैसे पानी, बिजली, परिवहन, स्वास्थ्य सुविधा और शिक्षा आदि को सार्वजनिक क्षेत्र के लिए रखा जाना चाहिए क्योंकि निजी क्षेत्र इन सेवाओं में भी लक्ष्य की तलाश करता है। सार्वजनिक क्षेत्र इन सेवाओं को न्यूनतम कीमत पर जनता को उपलब्ध करवाता है। यह देश के नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारने में मदद करता है।
5. अर्थव्यवस्था पर नियन्त्रण-अर्थव्यवस्था को उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए तथा इसको नियमित रखने के लिए सरकारी नियन्त्रण आवश्यक है।
In simple words: भारत में सार्वजनिक क्षेत्र देश के विकास, पिछड़े क्षेत्रों की मदद करने, सुरक्षा बनाए रखने और लोगों को सस्ती बुनियादी सुविधाएँ देने के लिए बहुत ज़रूरी है।

🎯 Exam Tip: उत्तर लिखते समय सभी मुख्य बिंदुओं को स्पष्ट शीर्षकों (headings) के साथ लिखें और महत्वपूर्ण शब्दों को रेखांकित (underline) करें ताकि पूरे अंक मिल सकें।

सार्वजनिक क्षेत्र का महत्त्व

  • 6. विदेशी सहायता: अल्पविकसित देशों में आन्तरिक साधन कम पड़ जाते हैं। अतः आर्थिक विकास के लिए बाहरी देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसी स्थिति में विदेशी सहायता सार्वजनिक क्षेत्रों को ही मिलती है। इसलिए विदेशी सहायता की प्राप्ति के लिए भी सार्वजनिक क्षेत्र महत्त्वपूर्ण हैं।
  • 7. प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा: सार्वजनिक क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों का जनहित में विवेकपूर्ण ढंग से विदोहन सम्भव होता है।
  • 8. रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना: बेरोजगारी को दूर करने में सहायता प्रदान करता है। बड़े-बड़े उद्यमों में रोजगार के अवसर पैदा करना सार्वजनिक क्षेत्र के महत्त्व को प्रकट करता है।
  • 9. निर्यात को प्रोत्साहन: सार्वजनिक क्षेत्र देश के निर्यात को बढ़ाने में बहुत सहायक सिद्ध हुआ है।
  • 10. सहायक उद्योगों का विकास: सार्वजनिक क्षेत्र ने सहायक उद्योगों के विकास में सहायता प्रदान की है जिससे इन उद्योगों में लगे लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ है।
  • 11. निजी क्षेत्र के दोषों को दूर करने में सहायक: निजी क्षेत्र व्यक्तिगत लाभ पर आधारित होते हैं। लाभ कमाने के लिए निजी क्षेत्र प्रतिस्पर्धा को उत्पन्न करते हैं। इस प्रतिस्पर्धा में अन्ततः उपभोक्ता अर्थात् सामान्यजन को नुकसान होता है। सार्वजनिक क्षेत्र जनकल्याण की दृष्टि से काम करता है। यह निजी क्षेत्र की लूट प्रवृत्ति को कम करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

इस प्रकार भारत में मिश्रित स्वरूप वाली अर्थव्यवस्था ने सार्वजनिक उद्यमों में अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत आधार-स्तम्भ के रूप में कार्य किया है।

 

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

 

Question 1. भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
Answer: भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं:
1. कार्यकुशलता का अभाव-सार्वजनिक क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर लाल फीताशाही और अफसरशाही पायी जाती है। यही कारण है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कार्यकुशलता निजी क्षेत्र से कम रह जाती है।
2. अनुशासनहीनता-सार्वजनिक क्षेत्र में प्रबन्ध की कमी के कारण प्रशासन में अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
3. प्रतिस्पर्धा का अभाव-स्वस्थ प्रतिस्पर्धा वस्तुओं की गुणवत्ता में सुधार के लिए आवश्यक है लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र में एकाधिकार के कारण वस्तुओं की कीमतें तो बढ़ा दी जाती हैं लेकिन गुणवत्ता नहीं।
4. लाभ का अंश बहुत कम-सार्वजनिक उद्यमों के पिछले सभी आँकड़े देखने में यह तथ्य उजागर हुआ है कि रेलवे, डाक-तार व अन्य कई सार्वजनिक प्रतिष्ठान भारी घाटे में चल रहे हैं। इनकी लाभ प्रत्याशा बहुत ही निम्न रही है। इसके अतिरिक्त, इन उद्यमों में वित्तीय नियंत्रण की भी भारी कमी देखी गई है।
In simple words: भारत में सरकारी कंपनियों (सार्वजनिक क्षेत्र) में लालफीताशाही, अनुशासन की कमी, प्रतियोगिता न होने और लगातार घाटे में चलने जैसी कई बड़ी समस्याएं हैं।

🎯 Exam Tip: उत्तर लिखते समय चारों मुख्य बिंदुओं (कार्यकुशलता का अभाव, अनुशासनहीनता, प्रतिस्पर्धा का अभाव, कम लाभ) को हेडिंग के साथ स्पष्ट रूप से लिखें ताकि पूरे अंक मिल सकें।

 

Question 2. मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल के दोषों का उल्लेख कीजिए।
Answer: मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल के दोष-भारत में अपनाए गए विकास के मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल के दोषों का दक्षिणपन्थी और वामपन्थी दोनों खेमों ने उल्लेख किया है:
1. योजनाकारों ने निजी क्षेत्र को पर्याप्त जगह नहीं दी है और न ही निजी क्षेत्र की वृद्धि के लिए कोई उपाय किया गया है।
2. विशाल सार्वजनिक क्षेत्र ने ताकतवर निहित स्वार्थों को खड़ा किया है और इन हितों ने निवेश के लिए लाइसेंसों तथा परमिट की प्रणाली खड़ी करके निजी पूँजी की राह में रोड़े अटकाए हैं।
3. सरकार ने अपने नियन्त्रण में जरूरत से ज्यादा चीजें रखीं। इससे भ्रष्टाचार और अकुशलता बढ़ी है। इस व्यवस्था ने आर्थिक विकास की गति को भी धीमा कर दिया।
In simple words: मिश्रित अर्थव्यवस्था में सरकार ने निजी क्षेत्र को आगे बढ़ने का पूरा मौका नहीं दिया और जरूरत से ज्यादा नियंत्रण रखा, जिससे भ्रष्टाचार बढ़ा और विकास की राह में बाधाएं आईं।

🎯 Exam Tip: दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों पक्षों के विचारों को ध्यान में रखकर लाइसेंस राज और सरकारी नियंत्रण के प्रभावों का उल्लेख अवश्य करें।

 

Question 3. योजना आयोग का गठन किन कारणों से किया गया था? क्या वह अपने गठन के उद्देश्य में सफल रहा?
Answer: योजना आयोग का गठन 15 मार्च, 1950 को भारत में आर्थिक विकास को गति देने के लिए किया गया था। इसका गठन निम्नलिखित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया गया था:
1. पूर्ण रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना,
2. गरीबी का उन्मूलन करना,
3. सामाजिक समानता की स्थापना करना,
4. उपलब्ध संसाधनों का उचित प्रयोग करना,
5. सन्तुलित क्षेत्रीय विकास करना, तथा
6. राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाना।
लेकिन योजना आयोग अपने गठन के उद्देश्यों में पूर्णतः सफल नहीं हुआ है। वह अपने उद्देश्यों में आंशिक रूप से ही सफल हुआ है। बेरोजगारी की समस्या अभी भी बनी हुई है। देश में गरीबी विद्यमान है; गरीब और गरीब हुआ है तथा अमीर और अमीर बना है। अतः सामाजिक असमानता कम होने के स्थान पर बढ़ी है। देश में क्षेत्रीय विकास सन्तुलित न होकर असन्तुलित हुआ है। देश के सर्वांगीण विकास के लिए इन लक्ष्यों को प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक था।
In simple words: योजना आयोग का गठन देश से गरीबी हटाने, सबको रोजगार देने और विकास करने के लिए किया गया था। हालांकि, यह अपने सभी लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया और अमीर-गरीब के बीच की दूरी बनी रही।

🎯 Exam Tip: योजना आयोग के गठन की तारीख (15 मार्च, 1950) और इसके मुख्य उद्देश्यों को बिंदुओं में लिखना न भूलें, इससे पूरे अंक मिलते हैं।

 

Question 4. हरित क्रान्ति के विषय में कौन-कौन सी आशंकाएँ थीं? क्या यह आशंकाएँ सच निकलीं?
Answer: सामान्यतः हरित क्रान्ति के विषय में दो भ्रान्तियाँ (आशंकाएँ) थीं:
(1) हरित क्रान्ति से अमीरों तथा गरीबों में विषमता बढ़ जाएगी क्योंकि बड़े जमींदार ही इच्छित अनुदानों का क्रय कर सकेंगे और उन्हें ही हरित क्रान्ति का लाभ मिलेगा तथा वे और अधिक धनी हो जाएँगे। निर्धनों को हरित क्रान्ति से कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा।
(2) उन्नत बीज वाली फसलों पर जीव-जन्तु आक्रमण करेंगे।
दोनों भ्रान्तियाँ सच नहीं हुई हैं क्योंकि सरकार ने छोटे किसानों को निम्न ब्याज दर पर ऋणों की व्यवस्था की और रासायनिक खादों पर आर्थिक सहायता दी ताकि वे उन्नत बीज तथा रासायनिक खाद सरलता से खरीद सकें और उनका उपयोग कर सकें। जीव-जन्तुओं के आक्रमणों को भारत सरकार द्वारा स्थापित अनुसन्धान संस्थाओं की सेवाओं से कम कर दिया गया। सरकार के इन प्रयासों से कृषि उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई।
In simple words: शुरुआत में डर था कि हरित क्रांति से केवल अमीर किसानों को फायदा होगा और कीड़े फसलों को नष्ट कर देंगे। लेकिन सरकार ने छोटे किसानों को सस्ती दरों पर लोन और खाद देकर इस डर को गलत साबित कर दिया।

🎯 Exam Tip: हरित क्रांति की दोनों आशंकाओं और उनके समाधानों को अलग-अलग स्पष्ट रूप से लिखने से उत्तर अधिक प्रभावी बनता है।

 

Question 5. मिश्रित अर्थव्यवस्था का अर्थ एवं विशेषताएँ बताइए।
Answer: मिश्रित अर्थव्यवस्था का अर्थ - भारत के विकास के लिए पूँजीवादी मॉडल और समाजवादी मॉडल दोनों ही मॉडल की कुछ एक बातों को ले लिया और उन्हें अपने देश में मिले-जुले रूप में लागू किया। इसी कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था कहा जाता है। यह मॉडल निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों के सह-अस्तित्व को बढ़ावा देता है।
मिश्रित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. इसमें खेती, किसानी, व्यापार और उद्योगों का एक बड़ा भाग निजी क्षेत्र के हाथों में रहा।
2. राज्य ने अपने हाथ में भारी उद्योग रखे और उसने आधारभूत ढाँचा प्रदान किया।
3. राज्य में व्यापार का नियमन किया तथा कृषि क्षेत्र में कुछ बड़े हस्तक्षेप किए।
In simple words: मिश्रित अर्थव्यवस्था का मतलब है जिसमें सरकारी और प्राइवेट दोनों क्षेत्र मिलकर काम करते हैं। भारत ने विकास के लिए इसी व्यवस्था को अपनाया ताकि सबको समान अवसर मिल सकें।

🎯 Exam Tip: मिश्रित अर्थव्यवस्था की परिभाषा के साथ इसकी तीनों मुख्य विशेषताओं को क्रमवार लिखना अच्छे अंक दिलाने में मदद करता है।

 

Question 6. भारत में नियोजन की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
Answer: सामान्यतः प्रशासकीय कार्यों के उद्देश्यों को निर्धारित करना तथा उनकी प्राप्ति के साधनों पर सुनियोजित ढंग से विचार करना नियोजन है। भारत में नियोजन की आवश्यकता मुख्यतः निम्नलिखित कारणों से अनुभव की जाती है:
1. नियोजन के द्वारा आर्थिक तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न अंगों में समन्वय स्थापित करके समाज की उन्नति की जा सकती है।
2. नियोजन द्वारा सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की स्थापना की जा सकती है। देश के सीमित संसाधनों का सही उपयोग करने के लिए यह प्रक्रिया बेहद जरूरी है।
In simple words: नियोजन का मतलब है किसी काम को योजना बनाकर करना। भारत में गरीबी दूर करने और समाज के सभी लोगों को न्याय दिलाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना जरूरी था।

🎯 Exam Tip: नियोजन की परिभाषा और इसकी आवश्यकता के दोनों बिंदुओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करें।

 

Question 7. भारत में नियोजन के महत्त्व एवं उपयोगिता का वर्णन कीजिए।
Answer: भारत में नियोजन के महत्त्व एवं उपयोगिता के सम्बन्ध में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं:
1. नियोजन में आर्थिक विकास का दायित्व राज्य ग्रहण कर लेता है तथा एक सामूहिक गतिविधि के रूप में योजनाओं के माध्यम से आर्थिक विकास का प्रारम्भ तथा उसका निर्देशन करता है।
2. आधुनिक लोक-कल्याणकारी राज्य में आर्थिक संसाधनों के समानतापूर्ण वितरण में नियोजन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
3. नियोजन खुले बाजार वाली अर्थव्यवस्थाओं में अस्थिरता की संभावनाओं को दूर करने में सहायक है।
4. विदेशी व्यापार की दृष्टि से भी नियोजन उपयोगी है। नियोजन से विदेशी व्यापार को अपने देश के हितों की शर्तों पर किया जा सकता है।
5. प्रभावी नियोजन द्वारा अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। नियोजन देश के समग्र और संतुलित विकास का मुख्य आधार है।
In simple words: नियोजन देश के विकास के लिए बहुत जरूरी है। यह सरकार को सही तरीके से संसाधनों का उपयोग करने, गरीबी दूर करने और व्यापार को बेहतर बनाने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: नियोजन के महत्त्व को लिखते समय इसके मुख्य बिंदुओं जैसे आर्थिक विकास, संसाधनों का समान वितरण और विदेशी व्यापार को स्पष्ट रूप से रेखांकित करें।

 

Question 8. भारत में योजना आयोग की स्थापना किस प्रकार हुई? इसके कार्यों के दायरे का उल्लेख कीजिए।
Answer: योजना आयोग की स्थापना सन् 1950 में भारत सरकार ने एक सीधे-सादे प्रस्ताव के द्वारा की। योजना आयोग एक सलाहकारी भूमिका निभाता है। इसकी सिफारिशें तभी प्रभावी होती हैं, जब मन्त्रिमण्डल उन्हें मंजूरी प्रदान करे। यह आयोग देश के आर्थिक विकास का मुख्य मार्गदर्शक रहा है।

योजना आयोग के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
1. देश के भौतिक संसाधनों और जनशक्ति का अनुमान लगाना तथा राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुसार उन संसाधनों की वृद्धि की संभावनाओं का पता लगाना।
2. देश के संसाधनों के सन्तुलित उपयोग के लिए अत्यन्त प्रभावकारी योजना बनाना।
3. योजना की क्रियान्वयन के चरणों का निर्धारण करना तथा उनके लिए संसाधनों का नियमन करना।

नोट: वर्तमान में योजना आयोग के स्थान पर ‘नीति आयोग’ कार्यरत है। योजना आयोग को समाप्त कर दिया गया है।
In simple words: योजना आयोग की स्थापना 1950 में सरकार के एक प्रस्ताव द्वारा हुई थी। इसका मुख्य काम देश के संसाधनों का सही अनुमान लगाना और उनके संतुलित उपयोग के लिए योजनाएं बनाना था, जिसकी जगह अब नीति आयोग ने ले ली है।

🎯 Exam Tip: योजना आयोग के कार्यों को लिखते समय तीनों बिंदुओं को क्रमानुसार लिखें और वर्तमान में इसके स्थान पर 'नीति आयोग' के कार्यरत होने की बात अवश्य लिखें।

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

 

Question 1. नियोजन से क्या अभिप्राय है?
Answer: नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है। यह कार्यों को क्रमबद्ध रूप से सम्पादित करने की एक मानसिक पूर्व प्रवृत्ति है। यह कार्य करने से पहले सोचना है तथा अनुमानों के स्थान पर तथ्यों को ध्यान में रखकर काम करना है। यह भविष्य की रूपरेखा तैयार करने में मदद करता है।
In simple words: नियोजन का मतलब है किसी भी काम को करने से पहले उसके बारे में सोच-समझकर एक सही योजना बनाना ताकि काम बिना किसी गलती के पूरा हो सके।

🎯 Exam Tip: नियोजन की परिभाषा में 'बौद्धिक प्रक्रिया' और 'तथ्यों को ध्यान में रखना' जैसे मुख्य शब्दों का प्रयोग अवश्य करें।

 

Question 2. स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था किस प्रकार की थी?
Answer: स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत पिछड़ी हुई थी। इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था थी। अंग्रेजों ने भारतीय संसाधनों का इतना बुरी तरह शोषण किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह खराब हो गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीन, अर्द्धसामन्ती तथा असन्तुलित अर्थव्यवस्था थी। इस कारण देश में गरीबी और भुखमरी बहुत अधिक थी।
In simple words: आजादी के समय भारत की अर्थव्यवस्था बहुत कमजोर और पिछड़ी हुई थी क्योंकि अंग्रेजों ने हमारे देश के संसाधनों का बहुत शोषण किया था।

🎯 Exam Tip: भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति को दर्शाने के लिए 'औपनिवेशिक', 'गतिहीन' और 'अर्द्धसामन्ती' जैसे विशेषणों का प्रयोग करें।

 

Question 3. भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की कोई दो समस्याएँ बताइए।
Answer: भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की दो प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं:
1. अकुशल प्रबंधन और लालफीताशाही के कारण निर्णयों में अत्यधिक देरी होना।
2. कई सार्वजनिक उपक्रमों का लगातार घाटे में चलना और उनकी कम उत्पादकता होना। ये समस्याएँ देश के आर्थिक विकास की गति को धीमा करती हैं।
In simple words: सरकारी कंपनियों (सार्वजनिक क्षेत्र) की दो बड़ी समस्याएं हैं - काम में देरी होना और कई कंपनियों का लगातार नुकसान में चलना।

🎯 Exam Tip: सार्वजनिक क्षेत्र की समस्याओं में 'लालफीताशाही' और 'वित्तीय घाटा' जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं को स्पष्ट रूप से लिखें।

 

प्रश्न 4. सार्वजनिक क्षेत्र की कोई दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: सार्वजनिक क्षेत्र की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. सार्वजनिक क्षेत्र एक व्यापक धारणा है जिसमें सरकार की समस्त आर्थिक तथा व्यावसायिक गतिविधियाँ शामिल की जाती हैं। यह देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
2. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर पूर्ण रूप से राष्ट्रीय नियन्त्रण होता है और सार्वजनिक क्षेत्र में एकाधिकार की प्रवृत्ति पायी जाती है।
In simple words: सार्वजनिक क्षेत्र का मतलब है सरकारी नियंत्रण वाले उद्योग। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसमें सरकार का पूरा नियंत्रण होता है और यह समाज के कल्याण के लिए काम करता है।

🎯 Exam Tip: मुख्य विशेषताओं को लिखते समय 'सरकारी नियंत्रण' और 'व्यापक धारणा' जैसे महत्वपूर्ण शब्दों को रेखांकित (underline) अवश्य करें।

 

प्रश्न 5. भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की उत्पत्ति के कोई चार कारण बताइए।
उत्तर: भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की उत्पत्ति के चार प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. राज्य में जनता के कल्याण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की स्थापना।
2. बहु-उद्देशीय परियोजनाएँ सार्वजनिक क्षेत्र में ही स्थापित की जा सकती हैं क्योंकि इनमें भारी निवेश की आवश्यकता होती है।
3. समाजवादी समाज की स्थापना करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र को अपनाना अति आवश्यक है।
4. क्षेत्रीय आर्थिक असमानता सार्वजनिक क्षेत्र के उदय का महत्त्वपूर्ण कारण है।
In simple words: भारत में सरकारी उद्योगों को शुरू करने के मुख्य कारण थे - लोगों का कल्याण करना, बड़ी योजनाएं चलाना, समाज में समानता लाना और पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना।

🎯 Exam Tip: चारों कारणों को स्पष्ट रूप से नंबर डालकर लिखें ताकि परीक्षक को प्रत्येक बिंदु आसानी से दिखाई दे।

 

प्रश्न 6. पी ० सी ० महालनोबिस कौन थे?
उत्तर: पी ० सी ० महालनोबिस अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के विख्यात वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद थे। इन्होंने सन् 1931 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना की थी। वे दूसरी पंचवर्षीय योजना के योजनाकार थे तथा तीव्र औद्योगिकीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र की सक्रिय भूमिका के समर्थक थे। भारतीय सांख्यिकी के विकास में उनका योगदान अतुलनीय है।
In simple words: पी. सी. महालनोबिस एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक और गणितज्ञ थे। उन्होंने भारत की दूसरी पंचवर्षीय योजना बनाई थी और देश में उद्योगों को बढ़ावा देने की वकालत की थी।

🎯 Exam Tip: उत्तर में 'दूसरी पंचवर्षीय योजना' और '1931 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान' का उल्लेख करना न भूलें, यह बहुत महत्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 7. जे० पी ० कुमारप्पा कौन थे?
उत्तर: जे० पी ० कुमारप्पा का जन्म सन् 1892 में हुआ था। इनका वास्तविक नाम जे० सी ० कॉर्नेलियस था। ये महात्मा गांधी के अनुयायी थे और उनके विचारों से गहराई से प्रभावित थे। इनकी कृति ‘इकोनॉमी ऑफ परमानेंस’ को बड़ी ख्याति मिली। योजना आयोग के सदस्य के रूप में भी इनको ख्याति प्राप्त हुई।
In simple words: जे. पी. कुमारप्पा गांधीजी के विचारों को मानने वाले एक अर्थशास्त्री थे। उन्होंने पर्यावरण और ग्रामीण विकास पर आधारित आर्थिक नीतियां बनाने पर जोर दिया था।

🎯 Exam Tip: उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'इकोनॉमी ऑफ परमानेंस' का नाम उत्तर में जरूर लिखें, इसे काले पेन से हाइलाइट कर सकते हैं।

 

प्रश्न 8. उड़ीसा में पोस्को लौह-इस्पात संयंत्र की स्थापना का वहाँ के आदिवासियों ने क्यों विरोध किया था?
उत्तर: आदिवासियों को इस बात का डर था कि यदि यहाँ उद्योगों की स्थापना हो गयी तो उन्हें अपने घर-बार से विस्थापित होना पड़ेगा तथा आजीविका छिन जाएगी। विस्थापन के बाद पुनर्वास की उचित व्यवस्था न होने की चिंता भी उनके विरोध का एक बड़ा कारण थी।
In simple words: उड़ीसा के आदिवासियों को डर था कि फैक्ट्री बनने से उनकी जमीन और घर छिन जाएंगे और वे बेघर हो जाएंगे, जिससे उनकी कमाई का साधन भी खत्म हो जाएगा।

🎯 Exam Tip: इस उत्तर में 'विस्थापन' (displacement) और 'आजीविका' (livelihood) जैसे मुख्य शब्दों का प्रयोग अवश्य करें।

 

प्रश्न 9. विकास की प्रक्रिया में किन बातों को शामिल किया जाता था?
उत्तर: विकास की बात आते ही लोग ‘पश्चिम’ का हवाला देते थे कि ‘विकास’ का पैमाना ‘पश्चिमी’ देश हैं। विकास का अर्थ था अधिक-से-अधिक आधुनिक होना और आधुनिक होने का अर्थ था, पश्चिमी औद्योगिक देशों की तरह होना। विकास के लिए प्रत्येक देश को पश्चिमी देशों की तरह आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से गुजरना होगा। आधुनिकीकरण को संवृद्धि, भौतिक प्रगति और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि का पर्यायवाची माना जाता था। इस दृष्टिकोण में पारंपरिक मूल्यों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता था।
In simple words: पहले विकास का मतलब पश्चिमी देशों की तरह आधुनिक और औद्योगिक बनना माना जाता था। इसमें विज्ञान, तकनीक और भौतिक सुख-सुविधाओं की तरक्की को ही असली विकास समझा जाता था।

🎯 Exam Tip: 'पश्चिमीकरण', 'आधुनिकीकरण' और 'वैज्ञानिक तर्कबुद्धि' जैसे शब्दों का प्रयोग करके आप इस उत्तर में पूरे अंक प्राप्त कर सकते हैं।

 

प्रश्न 10. योजना आयोग के प्रस्ताव में किन नीतियों को अमल में लाने की बात कही गयी?
उत्तर: योजना आयोग के प्रस्ताव में निम्नलिखित नीतियों को अमल में लाने की बात कही गयी:
1. स्त्री और पुरुष सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों का बराबर-बराबर अधिकार हो।
2. समुदाय के भौतिक संसाधनों की मिल्कियत और नियन्त्रण को इस तरह बाँटा जाएगा कि उससे सर्वसामान्य की भलाई हो। इन नीतियों का मुख्य उद्देश्य समाज में आर्थिक न्याय और समानता स्थापित करना था।
In simple words: योजना आयोग ने कहा कि सभी महिलाओं और पुरुषों को कमाने के बराबर मौके मिलने चाहिए और देश के संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए जिससे सबका भला हो।

🎯 Exam Tip: दोनों बिंदुओं को स्पष्ट रूप से लिखें। यह प्रश्न सीधे भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों से जुड़ा है, इसलिए समानता और जन-कल्याण पर ध्यान दें।

Question 11. ‘बॉम्बे प्लान’ किसे कहा जाता था?
Answer: भारत में सन् 1944 में उद्योगपतियों का एक वर्ग एकजुट हुआ। इस समूह ने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया। इसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है। ‘बॉम्बे प्लान’ की मंशा थी कि सरकार औद्योगिक और अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए। यह योजना देश के आर्थिक विकास को गति देने के लिए बनाई गई थी।
In simple words: In 1944, a group of big businessmen in India came together and made a plan called the 'Bombay Plan' to help the government develop the country's economy and industries.

🎯 Exam Tip: Remember the year 1944 and that it was a joint proposal by major industrialists for state-led economic development.

 

Question 12. दूसरी पंचवर्षीय योजना के प्रमुख उद्देश्य बताइए।
Answer: दूसरी पंचवर्षीय योजना के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
1. जनसाधारण के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने हेतु राष्ट्रीय आय में 25% की वृद्धि करना।
2. भारत में समाजवादी व्यवस्था के अनुरूप समाज बनाने के लिए उचित व्यवस्था को प्रोन्नत करना।
3. आधारभूत उद्योगों को प्राथमिकता देकर तीव्र औद्योगिकीकरण करना। इस योजना का मुख्य ध्यान भारी उद्योगों के विकास पर केंद्रित था।
In simple words: The second five-year plan aimed to increase national income by 25%, build a socialist society, and quickly set up heavy industries to boost the economy.

🎯 Exam Tip: Clearly list all three objectives, highlighting 'rapid industrialization' and '25% increase in national income' as key goals.

 

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर (Multiple Choice Questions)

 

Question 1. भारत में योजना आयोग का गठन किया गया
(a) 1950 ई० में
(b) 1951 ई० में
(c) 1952 ई० में
(d) 1953 ई० में
Answer: (a) 1950 ई० में
In simple words: The Planning Commission of India was set up in March 1950 to help plan the country's economic growth.

🎯 Exam Tip: Memorize the exact year 1950 for the establishment of the Planning Commission, as it is a frequently asked objective question.

 

Question 2. पहली पंचवर्षीय योजना की अवधि है-
(a) 1951-56
(b) 1952-57
(c) 1947-52
(d) 1955-60
Answer: (a) 1951-56
In simple words: India's first five-year plan started in 1951 and ended in 1956, focusing mainly on agriculture.

🎯 Exam Tip: Five-year plans always span five years; remembering that the first one started in 1951 makes it easy to calculate the end year as 1956.

 

Question 3. स्वतंत्रता के बाद भारत में किस आर्थिक प्रणाली को अपनाया गया-
(a) पूँजीवादी अर्थव्यवस्था
(b) समाजवादी अर्थव्यवस्था
(c) मिश्रित अर्थव्यवस्था
(d) इनमें से कोई नहीं (None of the options)
Answer: (c) मिश्रित अर्थव्यवस्था
In simple words: India chose a mixed economy, which means both private businesses and government-run industries work together.

🎯 Exam Tip: 'Mixed economy' (मिश्रित अर्थव्यवस्था) is a key term representing India's unique path combining elements of both capitalism and socialism.

 

Question 4. मिश्रित अर्थव्यवस्था प्रमुख रूप से है-
(a) पूँजीवादी अर्थव्यवस्था
(b) साम्यवादी अर्थव्यवस्था
(c) निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों का उत्पादन में सहयोग
(d) कृषि एवं उद्योगों पर आधारित अर्थव्यवस्था
Answer: (c) निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों का उत्पादन में सहयोग
In simple words: A mixed economy is where private companies (private sector) and government companies (public sector) work together to produce goods.

🎯 Exam Tip: Look for options that mention the co-existence or cooperation of both private (निजी) and public (सार्वजनिक) sectors.

 

Question 5. पहली पंचवर्षीय योजना में सार्वजनिक बल किस पर दिया गया-
(a) कृषि
(b) उद्योग
(c) पर्यटन
(d) यातायात एवं संचार
Answer: (a) कृषि
In simple words: The first five-year plan focused mostly on agriculture because India needed to grow more food for its people after independence.

🎯 Exam Tip: Associate the First Plan with Agriculture (कृषि) and the Second Plan with Heavy Industries (उद्योग) to avoid confusion.

 

Question 6. भारत की किस पंचवर्षीय योजना में प्रति व्यक्ति आय में सर्वाधिक वृद्धि रही-
(a) पहली में
(b) दूसरी में
(c) तीसरी में
(d) None of the options
Answer: (a) पहली में
In simple words: The first five-year plan saw the highest growth rate in per capita income because of successful agricultural reforms and good weather.

🎯 Exam Tip: Remember that the first plan was highly successful and achieved the highest growth rate in per capita income compared to the target.

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