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Detailed Chapter 1 ठोस अवस्था UP Board Solutions for Class 12 Chemistry
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Class 12 Chemistry Chapter 1 ठोस अवस्था UP Board Solutions PDF
UP Board Solutions For Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State (ठोस अवस्था)
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर
Question 1. ठोस कठोर क्यों होते हैं?
Answer: ठोस कठोर होते हैं, क्योंकि इनके अवयवी कण अत्यन्त निविड संकुलित होते हैं। इनमें कोई स्थानान्तरीय गति नहीं होती है तथा ये केवल अपनी माध्य स्थिति के चारों ओर कम्पन कर सकते हैं।
In simple words: ठोसों के अवयवी कण बहुत पास-पास और एक निश्चित स्थान पर होते हैं, जिससे वे केवल अपनी जगह पर कंपन कर सकते हैं, गति नहीं कर पाते, इसलिए वे कठोर होते हैं।
🎯 Exam Tip: ठोसों की कठोरता का मुख्य कारण उनके कणों की निविड संकुलित व्यवस्था और निश्चित माध्य स्थिति में कम्पन करने की क्षमता है।
Question 2. ठोसों का आयतन निश्चित क्यों होता है?
Answer: ठोस के अवयवी कणों की स्थिति नियत होती है तथा वे गति के लिए स्वतन्त्र नहीं होते हैं। इसलिए इनका आयतन निश्चित होता है।
In simple words: ठोसों के कणों की स्थिति स्थिर होती है और वे हिल-डुल नहीं पाते, जिससे उनका आयतन हमेशा एक जैसा रहता है।
🎯 Exam Tip: निश्चित आयतन ठोसों के कणों की नियत स्थिति और गति की अनुपस्थिति पर आधारित होता है।
Question 3. निम्नलिखित को अक्रिस्टलीय तथा क्रिस्टलीय ठोसों में वर्गीकृत कीजिए पॉलियूरिथेन, नैफ्थेलीन, बेन्जोइक अम्ल, टेफ्लॉन, पोटैशियम नाइट्रेट, सेलोफेन, पॉलिवाइर्निल क्लोराइड, रेशा काँच, ताँबा ।
Answer:अक्रिस्टलीय ठोस - पॉलियूरिथेन, टेफ्लॉन, सेलोफेन, पॉलिवाइनिल क्लोराइड, रेशा काँच । क्रिस्टलीय ठोस - नैफ्थेलीन, बेन्जोइक अम्ल, पोटैशियम नाइट्रेट, ताँबा ।
In simple words: अक्रिस्टलीय ठोसों में कणों की व्यवस्था अनियमित होती है (जैसे प्लास्टिक), जबकि क्रिस्टलीय ठोसों में कणों की व्यवस्था नियमित होती है (जैसे नमक)।
🎯 Exam Tip: वर्गीकरण करते समय प्रत्येक पदार्थ की आण्विक संरचना और गलनांक विशेषताओं पर ध्यान दें, जो उनके क्रिस्टलीय या अक्रिस्टलीय प्रकृति को निर्धारित करती हैं।
Question 4. काँच को अतिशीतित द्रव क्यों माना जाता है?
Answer: क्योंकि यह ठोस होते हुए भी द्रवों के कुछ गुण प्रदर्शित करता है। द्रवों के समान इसमें प्रवाहित होने का गुण होता है। इसका यह गुण पुरानी इमारतों के काँच में देखा जा सकता है जो तली पर कुछ मोटा होता है। यह केवल तभी सम्भव है जबकि यह अत्यन्त मन्द गति से द्रवों के समान प्रवाहित हो ।
In simple words: काँच को अतिशीतित द्रव इसलिए कहते हैं क्योंकि यह ठोस दिखने पर भी बहुत धीमी गति से द्रवों की तरह बहने का गुण दिखाता है, जैसे पुरानी खिड़कियों का नीचे से मोटा हो जाना।
🎯 Exam Tip: अतिशीतित द्रव की परिभाषा और काँच के उदाहरण को समझाते समय, पुरानी इमारतों की खिड़कियों के काँच का उल्लेख करना एक प्रभावी तरीका है।
Question 5. एक ठोस के अपवर्तनांक का मान सभी दिशाओं में समान प्रेक्षित होता है। इस ठोस की प्रकृति पर टिप्पणी कीजिए। क्या यह विदलन गुण प्रदर्शित करेगा?
Answer: चूँकि ठोस के अपवर्तनांक का मान सभी दिशाओं में समान है। अतः यह समदेशिक प्रकृति का है। अतः यह अक्रिस्टलीय ठोस है। यह स्वच्छ विदलने गुण प्रदर्शित नहीं करेगा।
In simple words: यदि किसी ठोस का अपवर्तनांक सभी दिशाओं में एक समान है, तो वह अक्रिस्टलीय ठोस है और यह समदेशिक गुण दर्शाता है, इसलिए यह साफ-सुथरा कटता नहीं है।
🎯 Exam Tip: समदेशिक प्रकृति अक्रिस्टलीय ठोसों की पहचान है, जहाँ भौतिक गुण सभी दिशाओं में समान होते हैं, और वे स्वच्छ विदलन नहीं दिखाते हैं।
Question 6. उपस्थित अन्तराआण्विक बलों की प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित ठोसों को विभिन्न संवर्गों में वर्गीकृत कीजिए-पोटैशियम सल्फेट, टिन, बेंजीन, यूरिया, अमोनिया, जल, जिंक सल्फाइड, ग्रेफाइट, रूबिडियम, आर्गन, सिलिकन कार्बाइड ।
Answer:पोटैशियम सल्फेट = आयनिक टिन = धात्विक बेंजीन = आण्विक (अध्रुवीय) यूरिया = आण्विक (ध्रुवीय) अमोनिया = आण्विक (हाइड्रोजन आबन्धित) जल = आण्विक (हाइड्रोजन आबन्धित) जिंक सल्फाइड = आयनिक ग्रेफाइट = सहसंयोजी रूबिडियम = धात्विक आर्गन = आण्विक (अध्रुवीय) सिलिकन कार्बाइड = सहसंयोजी या नेटवर्क ।
In simple words: ठोसों को उनके बीच मौजूद कणों के आकर्षण बलों के आधार पर आयनिक, धात्विक, आण्विक, और सहसंयोजी जैसे विभिन्न प्रकारों में बांटा जाता है।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक ठोस के घटक कणों और उनके बीच के विशिष्ट अंतराआण्विक बलों की पहचान करना वर्गीकरण के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 7. ठोस A, अत्यधिक कठोर तथा ठोस एवं गलित अवस्थाओं में विद्युतरोधी है और अत्यन्त उच्च दाब पर पिघलता है। यह किस प्रकार का ठोस है?
Answer: सहसंयोजी अथवा नेटवर्क ठोस, जैसे- SiC
In simple words: यह एक सहसंयोजी या नेटवर्क ठोस है क्योंकि यह बहुत कठोर है, उच्च तापमान पर पिघलता है, और ठोस व पिघली दोनों अवस्थाओं में बिजली का कुचालक होता है।
🎯 Exam Tip: अत्यंत उच्च गलनांक, अत्यधिक कठोरता और ठोस व गलित दोनों अवस्थाओं में विद्युतरोधी गुण नेटवर्क (सहसंयोजी) ठोसों की विशिष्ट पहचान हैं।
Question 8. आयनिक ठोस गलित अवस्था में विद्युत चालक होते हैं, परन्तु ठोस अवस्था में नहीं। व्याख्या कीजिए।
Answer: गलित अवस्था में आयनिक यौगिक वियोजित होकर मुक्त आयन देते हैं तथा विद्युत चालन करते हैं। ठोस अवस्था में आयन गति करने के लिए मुक्त नहीं होते हैं। अतः ये ठोस अवस्था में विद्युत चालन नहीं करते हैं।
In simple words: आयनिक ठोस पिघलने पर आयन मुक्त हो जाते हैं जिससे वे बिजली का संचालन कर सकते हैं, लेकिन ठोस अवस्था में आयन स्थिर होते हैं और गति नहीं कर पाते, इसलिए वे कुचालक होते हैं।
🎯 Exam Tip: आयनिक ठोसों की चालकता मुक्त आयनों की उपस्थिति पर निर्भर करती है, जो केवल गलित अवस्था या विलयन में संभव है।
Question 9. किस प्रकार के ठोस विद्युत चालक, आघातवर्थ्य और तन्य होते हैं?
Answer: धात्विक ठोस ।
In simple words: धात्विक ठोस बिजली के सुचालक होते हैं और उन्हें पीटकर चादरों में बदला जा सकता है या खींचकर तारों में बनाया जा सकता है।
🎯 Exam Tip: धात्विक ठोसों के ये विशिष्ट गुण, जैसे चालकता, आघातवर्धनीयता और तन्यता, मुक्त इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण होते हैं।
Question 10. 'जालक बिन्द' से क्या तात्पर्य है?
Answer: प्रत्येक जालक बिन्दु ठोस के एक अवयवी कण को प्रदर्शित करता है। अवयवी कण परमाणु, अणु या आयन हो सकते हैं। किसी विशेष क्रिस्टलीय ठोस की आकृति के लिए जालक बिन्दु उत्तरदायी होते हैं।
In simple words: जालक बिन्दु किसी क्रिस्टल में उस स्थान को कहते हैं जहाँ परमाणु, अणु या आयन जैसे कण व्यवस्थित होते हैं, जो क्रिस्टल की पूरी बनावट तय करते हैं।
🎯 Exam Tip: जालक बिन्दु क्रिस्टल जालक की संरचनात्मक इकाई है, जो अवयवी कणों (परमाणु, अणु, या आयन) की नियमित व्यवस्था को दर्शाता है।
Question 11. एकक कोष्ठिका को अभिलक्षणित करने वाले पैरामीटरों के नाम बताइए ।
Answer:1. एकक कोष्ठिका की कोर की विमाएँ (a, b,c) - परस्पर लम्बवत् हो सकती हैं अथवा नहीं। 2. कोरों के मध्य के कोण (α,β तथा γ)
In simple words: एकक कोष्ठिका की पहचान उसकी किनारों की लंबाई (a, b, c) और उन किनारों के बीच के कोणों (α, β, γ) से होती है।
🎯 Exam Tip: एकक कोष्ठिका के छह पैरामीटर (तीन अक्षीय दूरियाँ a, b, c और तीन अक्षीय कोण α, β, γ) क्रिस्टल तंत्रों के वर्गीकरण के लिए मौलिक हैं।
Question 12. निम्नलिखित में विभेद कीजिए -
1. षट्कोणीय और एकनताक्ष एकक कोष्ठिका
2. फलक केन्द्रित तथा अंत्य-केन्द्रित एकक कोष्ठिका।
Answer:1. षट्कोणीय एकक कोष्ठिका में, a = b ≠ c; α = β = 90° तथा γ = 120° एकनताक्ष एकक कोष्ठिका में a ≠ b ≠ c तथा α = γ = 90° तथा β = 90° 2. fcc में अवयवी कण सभी 8 कोनों एवं सभी 6 फलकों के केन्द्रों पर व्यवस्थित होते हैं। अंत्य- केन्द्रित एकक कोष्ठिका में अवयवी कण सभी 8 कोनों तथा दो विपरीत फलकों के केन्द्रों पर स्थित होते हैं।
In simple words: षट्कोणीय और एकनताक्ष एकक कोष्ठिकाएँ उनके किनारों की लंबाई और कोणों के पैटर्न में भिन्न होती हैं, जबकि फलक केंद्रित और अंत्य-केंद्रित एकक कोष्ठिकाएँ कणों की आंतरिक व्यवस्था में भिन्न होती हैं।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक एकक कोष्ठिका के लिए अक्षीय दूरियों (a, b, c) और अक्षीय कोणों (α, β, γ) के विशिष्ट मानों को याद रखना विभेद करने में सहायक होता है। फलक केंद्रित और अंत्य-केंद्रित के लिए कणों की स्थिति महत्वपूर्ण है।
Question 13. स्पष्ट कीजिए कि एक घनीय एकक कोष्ठिका के
1. कोने और
2. अन्तःकेन्द्र पर उपस्थित परमाणु का कितना भाग सन्निकट कोष्ठिका से सहभाजित होता है?
Answer:1. कोने पर उपस्थित परमाणु 8 एकक कोष्ठिकाओं से सहभाजित होता है। अतः एक एकक कोष्ठिका के लिए इसका योगदान 1/8 होता है। 2. अन्तःकेन्द्र पर उपस्थित परमाणु किसी भी अन्य एकक कोष्ठिका द्वारा सहभाजित नहीं होता है।
In simple words: एक घनीय एकक कोष्ठिका के कोने पर मौजूद परमाणु 8 अन्य कोष्ठिकाओं से साझा होता है, इसलिए उसका 1/8 हिस्सा अपनी कोष्ठिका में होता है, जबकि केंद्र में मौजूद परमाणु केवल उसी कोष्ठिका का होता है।
🎯 Exam Tip: कोनों और केन्द्र पर परमाणुओं का योगदान क्रिस्टल की कुल परमाणु संख्या की गणना के लिए आवश्यक है, 1/8वें भाग कोने के लिए और 1 भाग केंद्र के लिए होता है।
Question 14. एक अणु की वर्ग निविड संकुलित परत में द्विविमीय उप-सहसंयोजन संख्या क्या होगी?
Answer: द्विविमीय निविड संकुलित परत में परमाणु 4 सन्निकट परमाणुओं को स्पर्श करता है अतः इसकी उप-सहसंयोजन संख्या 4 होगी ।
In simple words: द्विविमीय वर्ग निविड संकुलित परत में, प्रत्येक परमाणु अपने आसपास के 4 परमाणुओं को छूता है, इसलिए उसकी उप-सहसंयोजन संख्या 4 होती है।
🎯 Exam Tip: उप-सहसंयोजन संख्या निकटतम पड़ोसियों की संख्या को दर्शाती है और संकुलन व्यवस्था (जैसे वर्ग या षट्कोणीय) के आधार पर भिन्न होती है।
Question 15. एक यौगिक षट्कोणीय निविड़ संकुलित संरचना बनाता है। इसके 0.5 मोल में रिक्तियों की संख्या कितनी होगी? उनमें से कितनी रिक्तियाँ चतुष्फलकीय हैं?
Answer:हल यौगिक के 0.5 मोल में परमाणुओं की संख्या = \( 0.5 \times 6.022 \times 10^{23} \) = \( 3.011 \times 10^{23} \) अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या = संकुलन में परमाणुओं की संख्या = \( 3.011 \times 10^{23} \) चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या = 2 x संकुलन में परमाणुओं की संख्या = \( 2 \times 3.011 \times 10^{23} = 6.022 \times 10^{23} \)
In simple words: षट्कोणीय निविड़ संकुलित संरचना में, परमाणुओं की संख्या के बराबर अष्टफलकीय रिक्तियाँ और परमाणुओं की संख्या की दोगुनी चतुष्फलकीय रिक्तियाँ होती हैं; 0.5 मोल परमाणुओं के लिए, क्रमशः \( 3.011 \times 10^{23} \) अष्टफलकीय और \( 6.022 \times 10^{23} \) चतुष्फलकीय रिक्तियाँ होंगी।
🎯 Exam Tip: निविड़ संकुलित संरचनाओं में रिक्तियों की संख्या की गणना के लिए यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि अष्टफलकीय रिक्तियाँ परमाणुओं की संख्या के बराबर होती हैं, और चतुष्फलकीय रिक्तियाँ परमाणुओं की संख्या की दोगुनी होती हैं।
Question 15. (Continued)... रिक्तियों की कुल संख्या = \( (3.011 + 6.022) \times 10^{23} \) = \( 9.033 \times 10^{23} \)
In simple words: षट्कोणीय निविड़ संकुलित संरचना में, परमाणुओं की संख्या के बराबर अष्टफलकीय रिक्तियाँ और परमाणुओं की संख्या की दोगुनी चतुष्फलकीय रिक्तियाँ होती हैं; 0.5 मोल परमाणुओं के लिए, क्रमशः \( 3.011 \times 10^{23} \) अष्टफलकीय और \( 6.022 \times 10^{23} \) चतुष्फलकीय रिक्तियाँ होंगी।
🎯 Exam Tip: निविड़ संकुलित संरचनाओं में रिक्तियों की संख्या की गणना के लिए यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि अष्टफलकीय रिक्तियाँ परमाणुओं की संख्या के बराबर होती हैं, और चतुष्फलकीय रिक्तियाँ परमाणुओं की संख्या की दोगुनी होती हैं।
Question 16. एक यौगिक दो तत्त्वों M तथा N से बना है। तत्त्व N, ccp संरचना बनाता है और M के परमाणु चतुष्फलकीय रिक्तियों के 1/3 भाग को अध्यासित करते हैं। यौगिक का सूत्र क्या है।
Answer:हल माना ccp में N परमाणु = n
चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या = \( 2n \) चूँकि M परमाणु चतुष्फलकीय रिक्तियों का 1/3 भाग घेरते हैं। अतः M परमाणुओं की संख्या = \( \frac{2n}{3} \)
M : N = \( \frac{2n}{3} : n = 2 : 3 \) अतः सूत्र \( M_2N_3 \) होगा।
In simple words: यदि तत्व N ccp संरचना बनाता है और तत्व M चतुष्फलकीय रिक्तियों के 1/3 हिस्से में है, तो यौगिक का सूत्र \( M_2N_3 \) होगा।
🎯 Exam Tip: यौगिक का सूत्र ज्ञात करने के लिए, ccp संरचना में परमाणुओं की संख्या को आधार मानकर चतुष्फलकीय रिक्तियों और उन रिक्तियों में अध्यासित परमाणुओं की संख्या का अनुपात निकालना आवश्यक है।
Question 17. निम्नलिखित में से किस जालक में उच्चतम संकुलन क्षमता है?
1. सरल घनीय,
2. अन्तः केन्द्रित घन और
3. षट्कोणीय निविड संकुलित जालक ।
Answer: संकुलन क्षमताएँ निम्न हैं - 1. सरल घनीय = 52.4%, 2. अन्तः केन्द्रित घनीय = 68%, 3. षट्कोणीय निविड संकुलित = 74% अतः षट्कोणीय निविड संकुलित व्यवस्था में अधिकतम संकुलन क्षमता होती है।
In simple words: षट्कोणीय निविड संकुलित जालक में परमाणुओं को सबसे कुशलता से पैक किया जाता है, जिससे इसकी संकुलन क्षमता (74%) सबसे अधिक होती है।
🎯 Exam Tip: विभिन्न जालक संरचनाओं की संकुलन क्षमता के प्रतिशत मानों को याद रखना इस प्रकार के बहुविकल्पीय प्रश्नों के लिए उपयोगी होता है।
Question 18. एक तत्त्व का मोलर द्रव्यमान \( 2.7 \times 10^{-2} \) kg mol\(^{-1}\) है। यह 405 pm लम्बाई की भुजा वाली घनीय एकक कोष्ठिका बनाता है। यदि उसका घनत्व \( 2.7 \times 10^3 \) kg m\(^{-3}\) हो तो घनीय एकक कोष्ठिका की प्रकृति क्या होगी?
Answer:हल घनत्व, \( \rho = \frac{Z \times M}{a^3 \times N_A} \)
या \( Z = \frac{\rho \times a^3 \times N_A}{M} \) यहाँ M (तत्त्व का मोलर द्रव्यमान) = \( 2.7 \times 10^{-2} \) kg mol\(^{-1}\) a (कोर लम्बाई) = 405 pm = \( 405 \times 10^{-12} \) m = \( 4.05 \times 10^{-10} \) m \( \rho \) (घनत्व) = \( 2.7 \times 10^3 \) kg m\(^{-3}\) \( N_A \) (आवोगाद्रो संख्या) = \( 6.022 \times 10^{23} \) mol\(^{-1}\)
\( Z = \frac{(2.7 \times 10^3 \text{ kg m}^{-3})(4.05 \times 10^{-10} \text{ m})^3 (6.022 \times 10^{23} \text{ mol}^{-1})}{2.7 \times 10^{-2} \text{ kg mol}^{-1}} \)
\( = 3.99 \approx 4 \) चूँकि प्रति एकक कोष्ठिका में तत्त्व के चार परमाणु हैं, अतः घनीय एकक कोष्ठिका फलक-केन्द्रित (fcc) या घनीय निविड संकुलित होगी ।
In simple words: दिए गए घनत्व, मोलर द्रव्यमान और कोर की लंबाई का उपयोग करके, हम प्रति एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या (Z) की गणना कर सकते हैं; Z का मान लगभग 4 आता है, जो बताता है कि यह फलक-केंद्रित घनीय (fcc) संरचना है।
🎯 Exam Tip: घनत्व के सूत्र (\( \rho = \frac{Z \times M}{a^3 \times N_A} \)) का उपयोग करके Z का मान ज्ञात करना क्रिस्टल जालक की प्रकृति (जैसे सरल, bcc, fcc) निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण है। इकाइयों का सही परिवर्तन आवश्यक है।
Question 19. जब एक ठोस को गर्म किया जाता है तो किस प्रकार का दोष उत्पन्न हो सकता है? इससे कौन-से भौतिक गुण प्रभावित होते हैं और किस प्रकार?
Answer: रिक्तिका दोष; गर्म करने पर ठोस के कुछ परमाणु अथवा आयन जालक स्थल को पूर्णतः छोड़ देते हैं। परमाणुओं अथवा आयनों के क्रिस्टल को पूर्णतः छोड़ने के कारण पदार्थ का घनत्व कम हो जाता है।
In simple words: ठोस को गर्म करने पर रिक्तिका दोष उत्पन्न होता है, जिसमें कुछ कण जालक से बाहर निकल जाते हैं, जिससे पदार्थ का घनत्व कम हो जाता है।
🎯 Exam Tip: रिक्तिका दोष तापमान बढ़ाने पर उत्पन्न होता है और सीधे तौर पर पदार्थ के घनत्व को कम करता है क्योंकि कण अपनी स्थिति छोड़ देते हैं।
Question 20. निम्नलिखित किस प्रकार का स्टॉइकियोमीट्री दोष दर्शाते हैं?
1. फ्रेंकेल दोष
2. फ्रेंकेल तथा शॉटकी दोष दोनों ।
Answer:1. फ्रेंकेल दोष 2. फ्रेंकेल तथा शॉटकी दोष दोनों ।
In simple words: स्टॉइकियोमीट्री दोष दो प्रकार के होते हैं- फ्रेंकेल दोष, जहाँ आयन अपनी जगह से हटकर अंतराकाशी स्थान में चले जाते हैं, और शॉटकी दोष, जहाँ बराबर संख्या में धनायन और ऋणायन जालक से गायब हो जाते हैं।
🎯 Exam Tip: स्टॉइकियोमीट्री दोषों की पहचान उनके मूल तंत्र (कणों का विस्थापन या अनुपस्थिति) और घनत्व पर उनके प्रभाव के आधार पर की जाती है।
Question 21. समझाइए कि एक उच्च संयोजी धनायन को अशुद्धि की तरह मिलाने पर आयनिक ठोस में रिक्तिकाएँ किस प्रकार प्रविष्ट होती हैं?
Answer: विद्युत उदासीनता बनाए रखने के लिए उच्च संयोजकता वाले धनायन द्वारा निम्न संयोजकता वाले दो या अधिक धनायन प्रतिस्थापित होते हैं। अतः कुछ धनायन रिक्तियाँ जनित होती हैं, जैसे- यदि आयनिक ठोस Na\(^+\) Cl\(^-\) में Sr\(^{2+}\) की अशुद्धि मिलाई जाती है तब दो Na\(^+\) जालक बिन्दु रिक्त हो जाते हैं तथा इनमें से एक Sr\(^{2+}\) आयन द्वारा घिर जाती है तथा अन्य रिक्त रहती हैं।
In simple words: जब उच्च संयोजकता वाले धनायन को अशुद्धि के रूप में मिलाया जाता है, तो क्रिस्टल की विद्युत उदासीनता बनाए रखने के लिए एक से अधिक कम संयोजकता वाले आयन प्रतिस्थापित होते हैं, जिससे धनायनिक रिक्तियाँ बन जाती हैं।
🎯 Exam Tip: अशुद्धि दोष में विद्युत उदासीनता बनाए रखने का सिद्धांत महत्वपूर्ण है; उच्च संयोजी आयन कम संयोजी आयनों की तुलना में अधिक रिक्तियाँ उत्पन्न करते हैं।
Question 22. जिन आयनिक ठोसों में धातु आधिक्य दोष के कारण ऋणायनिक रिक्तिका होती हैं, वे रंगीन होते हैं। उपयुक्त उदाहरण की सहायता से समझाइए ।
Answer: इसको सोडियम क्लोराइड (Na\(^+\) Cl\(^-\)) का उदाहरण लेकर समझा सकते हैं। जब इसके क्रिस्टलों को सोडियम वाष्प की उपस्थिति में गर्म करते हैं तब कुछ Cl\(^-\) आयन अपने जालक स्थलों को छोड़कर सोडियम से संयुक्त होकर NaCl बना लेते हैं। इस अभिक्रिया के होने के लिए सोडियम परमाणु इलेक्ट्रॉन खोकर Na\(^+\) आयन बनाते हैं। ये इलेक्ट्रॉन क्रिस्टल में विसरित होकर Cl\(^-\) आयनों द्वारा जनित ऋणायनिक रिक्तिकाओं को घेर लेते हैं। क्रिस्टल में अब सोडियम का आधिक्य होता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों द्वारा घेरे गए स्थल F- केन्द्र कहलाते हैं। ये क्रिस्टल को पीला रंग प्रदान करते हैं, क्योंकि वे दृश्य प्रकाश की ऊर्जा का अवशोषण करके उत्तेजित हो जाते हैं।
In simple words: धातु आधिक्य दोष वाले आयनिक ठोस, जैसे सोडियम क्लोराइड जब सोडियम वाष्प में गर्म होता है, तो ऋणायनिक रिक्तियों में फंसे इलेक्ट्रॉन (F-केन्द्र) के कारण रंगीन हो जाते हैं, जो प्रकाश अवशोषित कर उत्तेजित होते हैं।
🎯 Exam Tip: F-केन्द्रों की उपस्थिति धातु आधिक्य दोष में रंग उत्पन्न करती है; यह तब होता है जब ऋणायन जालक स्थल से निकलकर इलेक्ट्रॉन द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं।
Question 23. वर्ग 14 के तत्त्व को n- प्रकार के अर्द्धचालक में उपयुक्त अशुद्धि द्वारा अपमिश्रित करके रूपान्तरित करना है। यह अशुद्धि किस वर्ग से सम्बन्धित होनी चाहिए?
Answer: अशुद्धि वर्ग 15 से सम्बन्धित होनी चाहिए।
In simple words: वर्ग 14 के तत्व को n-प्रकार का अर्द्धचालक बनाने के लिए, हमें वर्ग 15 के तत्व को अशुद्धि के रूप में मिलाना होगा क्योंकि वर्ग 15 के तत्वों में एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन होता है।
🎯 Exam Tip: n-प्रकार के अर्द्धचालकों में, डोपेंट (अशुद्धि) के पास मूल तत्व की तुलना में अधिक संयोजी इलेक्ट्रॉन होने चाहिए, ताकि अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन चालकता में योगदान दे सकें।
Question 24. किस प्रकार के पदार्थों से अच्छे स्थायी चुम्बक बनाए जा सकते हैं- लौहचुम्बकीय अथवा फेरीचुम्बकीय? अपने उत्तर का औचित्य बताइए।
Answer: लौहचुम्बकीय पदार्थ श्रेष्ठ स्थायी चुम्बक बनाते हैं क्योंकि इनमें धातु आयन छोटे क्षेत्रों में व्यवस्थित होते हैं, जिन्हें डोमेन कहते हैं। प्रत्येक डोमेन सूक्ष्म चुम्बक के रूप में कार्य करता है। ये डोमेन अनियमित रूप में व्यवस्थित होते हैं। जब इन पर चुम्बकीय क्षेत्र आरोपित किया जाता है तब वे चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में व्यवस्थित हो जाते हैं तथा प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र बनाते हैं। बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र के हटा लेने पर भी डोमेन व्यवस्थित रहते हैं। इस प्रकार लौहचुम्बकीय पदार्थ स्थायी चुम्बक में परिवर्तित हो जाता है।
In simple words: लौहचुम्बकीय पदार्थ अच्छे स्थायी चुम्बक बनाते हैं क्योंकि उनके भीतर के चुंबकीय डोमेन बाहरी चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव में संरेखित हो जाते हैं और क्षेत्र हटाने के बाद भी संरेखित रहते हैं, जिससे एक स्थायी चुंबकत्व उत्पन्न होता है।
🎯 Exam Tip: स्थायी चुम्बक बनाने के लिए लौहचुम्बकीय पदार्थों का उपयोग किया जाता है क्योंकि उनमें डोमेन संरचना होती है, जो बाहरी क्षेत्र हटाने के बाद भी संरेखित रहती है, जिससे प्रबल और स्थायी चुम्बकत्व आता है।
अतिरिक्त अभ्यास
Question 1. 'अक्रिस्टलीय पद को परिभाषित कीजिए। अक्रिस्टलीय ठोसों के कुछ उदाहरण दीजिए।
Answer: ऐसे ठोस जिनका निश्चित ज्यामितीय आकार या विन्यास नहीं होता है अर्थात् इनके अवयवी कण निश्चित क्रम में व्यवस्थित नहीं होते हैं, अक्रिस्टलीय ठोस (amorphous solids) कहलाते हैं। इनका कोई निश्चित गलनांक नहीं होता है तथा ये समदैशिक (isotropic) होते हैं; जैसे, प्लास्टिक, काँच आदि ।
In simple words: अक्रिस्टलीय ठोस वे होते हैं जिनके कण अनियमित रूप से व्यवस्थित होते हैं, उनका कोई निश्चित आकार या गलनांक नहीं होता, और वे सभी दिशाओं में समान गुण दर्शाते हैं, जैसे प्लास्टिक और काँच।
🎯 Exam Tip: अक्रिस्टलीय ठोसों की पहचान उनकी अनियमित कण व्यवस्था, अनिश्चित गलनांक और समदैशिक प्रकृति से होती है।
Question 2. काँच, क्वार्टज जैसे ठोस से किस प्रकार भिन्न है? किन परिस्थितियों में क्वार्टज को काँच में रूपान्तरित किया जा सकता है?
Answer: काँच अक्रिस्टलीय ठोस है। इसमें अवयवी कणों (SiO\(_{\text{4}}\) चतुष्क) की केवल लघु परासी व्यवस्था होती है। दूसरी ओर क्वार्ट्ज में अवयवी कणों (SiO\(_{\text{4}}\) चतुष्क) की लघु और दीर्घ (दोनों) परासी व्यवस्थाएँ होती हैं। दूसरे शब्दों में, क्वार्ज क्रिस्टलीय होता है। क्वार्ट्ज़ को पिघलाकर उसे शीघ्रता से ठंडा करने पर काँच प्राप्त होता है।
In simple words: काँच अक्रिस्टलीय होता है जिसमें लघु-परासी व्यवस्था होती है, जबकि क्वार्ट्ज क्रिस्टलीय होता है जिसमें लघु और दीर्घ-परासी दोनों व्यवस्थाएँ होती हैं; क्वार्ट्ज को तेजी से ठंडा करने पर काँच में बदला जा सकता है।
🎯 Exam Tip: क्रिस्टलीय और अक्रिस्टलीय ठोसों के बीच मुख्य अंतर उनकी कण व्यवस्था की परास (लघु-परासी बनाम दीर्घ-परासी) में होता है; तेजी से शीतलन अक्रिस्टलीय रूप में परिवर्तित कर सकता है।
Question 3. निम्नलिखित ठोसों का वर्गीकरण आयनिक, धात्विक, आण्विक, सहसंयोजक या अक्रिस्टलीय में कीजिए ।
1. टेट्राफॉस्फोरस डेकॉक्साइड (P\(_{\text{4}}\)O\(_{\text{10}}\))
2. अमोनियम फॉस्फेट ((NH\(_{\text{4}}\))\(_{\text{3}}\) PO\(_{\text{4}}\))
3. SiC
4. I\(_{\text{2}}\)
5. P\(_{\text{4}}\)
6. प्लास्टिक
7. ग्रेफाइट
8. पीतल
9. Rb
10. LiBr
11. Si
Answer:1. आयनिक (Ionic) : अमोनियम फॉस्फेट ((NH\(_{\text{4}}\))\(_{\text{3}}\) PO\(_{\text{4}}\)), LiBr 2. धात्विक (Metallic) : पीतल, Rb 3. आण्विक (Molecular) : टेट्राफॉस्फोरस डेकॉक्साइड (P\(_{\text{4}}\)O\(_{\text{10}}\)), I\(_{\text{2}}\), P\(_{\text{4}}\) 4. सहसंयोजक (Covalent) : ग्रेफाइट, SiC, Si 5. अक्रिस्टलीय (Amorphous) : प्लास्टिक
In simple words: ठोसों को उनके बंधन के प्रकार (आयनिक, धात्विक, आण्विक, सहसंयोजक) या कणों की व्यवस्था (अक्रिस्टलीय) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
🎯 Exam Tip: वर्गीकरण करते समय, प्रत्येक पदार्थ के रासायनिक बंधन के प्रकार और उसकी संरचनात्मक विशेषताओं (जैसे आयन, धातु, अणु, नेटवर्क) पर ध्यान दें।
Question 4.
1. उपसहसंयोजन संख्या का क्या अर्थ है?
2. निम्नलिखित में परमाणुओं की उपसहसंयोजन संख्या क्या है?
1. एक घनीय निविड संकुलित संरचना
2. एक अन्तःकेन्द्रित घनीय संरचना।
Answer:1. उप-सहसंयोजन संख्या - यदि परमाणुओं को गोलों के रूप में प्रदर्शित किया जाए, तब किसी विशेष गोले के सन्निकट उपस्थित अन्य गोलों की संख्या उसकी उप-सहसंयोजन संख्या कहलाती है। आयनिक क्रिस्टलों में किसी आयन के चारों ओर उपस्थित विपरीत आवेशित गोलों की संख्या उसकी उप-सहसंयोजन संख्या कहलाती है।। 2. एक घनीय निविड संकुलित संरचना में उपसहसंयोजन संख्या 12 होती है। 3. एक अन्तःकेन्द्रित घनीय संरचना में उपसहसंयोजन संख्या 8 होती है।
In simple words: उप-सहसंयोजन संख्या यह बताती है कि किसी परमाणु को क्रिस्टल में कितने निकटतम पड़ोसी परमाणु छू रहे हैं। घनीय निविड संकुलन में यह संख्या 12 और अन्तःकेन्द्रित घनीय संरचना में 8 होती है।
🎯 Exam Tip: उप-सहसंयोजन संख्या क्रिस्टल संरचना के लिए एक महत्वपूर्ण पैरामीटर है, जो पैकिंग दक्षता और कणों के बीच अंतःक्रियाओं को इंगित करता है।
Question 5. यदि आपको किसी अज्ञात धातु का घनत्व एवं एकक कोष्ठिका की विमाएँ ज्ञात हैं तो क्या आप उसके परमाण्विक द्रव्यमान की गणना कर सकते हैं? स्पष्ट कीजिए।
Answer: परमाण्विक द्रव्यमान, \( M = \frac{\rho \times a^3 \times N_A}{Z} \) किसी अज्ञात धातु का घनत्व एवं एकक कोष्ठिका की विमाएँ ज्ञात होने पर उपर्युक्त सूत्र की सहायता से उसके परमाण्विक द्रव्यमान की गणना की जा सकती है।
In simple words: हाँ, यदि हमें किसी धातु का घनत्व, एकक कोष्ठिका की विमाएँ (जैसे 'a'), और अवोगाद्रो संख्या (N\(_{\text{A}}\)) पता हो, तो हम 'Z' (प्रति एकक कोष्ठिका परमाणुओं की संख्या) का उपयोग करके उसका परमाण्विक द्रव्यमान ज्ञात कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: घनत्व के सूत्र (\( \rho = \frac{Z \times M}{a^3 \times N_A} \)) को याद रखना मोलर द्रव्यमान, घनत्व या Z की गणना के लिए महत्वपूर्ण है, बशर्ते अन्य सभी मान ज्ञात हों।
Question 6. 'किसी क्रिस्टल की स्थिरता उसके गलनांक के परिमाण द्वारा प्रकट होती है।' टिप्पणी कीजिए। किसी आँकड़ा पुस्तक से जल, एथिल ऐल्कोहॉल, डाइएथिल ईथर तथा मेथेन के गलनांक एकत्र करें। इन अणुओं के मध्य अन्तराआण्विक बलों के बारे में आप क्या कह सकते हैं?
Answer: किसी पदार्थ का गलनांक जितना उच्च होता है उसके अवयवी कणों के मध्य आकर्षण बल उतना ही अधिक होता है और पदार्थ भी उतना ही अधिक स्थायी होता है। जल, एथिल ऐल्कोहॉल, डाइएथिल ईथर और मेथेन के गलनांक क्रमशः 273 K, 155.7 K, 156.8 K और 90.5 K हैं। जल और एथिल ऐल्कोहॉल में अंतराआण्विक बल हाइड्रोजन आबंधन होते हैं। जल के अणुओं के मध्य हाइड्रोजन आबंधन एथिल ऐल्कोहॉल के अणुओं की तुलना में प्रबल होता है जोकि उनके गलनांकों से भी स्पष्ट होता है। डाइएथिल ईथर के अणुओं के बीच द्विध्रुव-द्विध्रुव आकर्षण होता है तथा मेथेन अणुओं के मध्य यह दुर्बल वाण्डरवाल्स बल होता है जो कि इनके गलनांकों से स्पष्ट है।
In simple words: क्रिस्टल की स्थिरता उसके गलनांक से पता चलती है- जितना उच्च गलनांक, उतने प्रबल अंतराआण्विक बल। जल (273 K) में हाइड्रोजन बंधन एथिल ऐल्कोहॉल (155.7 K) से मजबूत होता है, जबकि डाइएथिल ईथर (156.8 K) में द्विध्रुव-द्विध्रुव और मेथेन (90.5 K) में कमजोर वांडरवाल्स बल होते हैं।
🎯 Exam Tip: पदार्थ का गलनांक उसके अवयवी कणों के बीच मौजूद अंतराआण्विक बलों की प्रबलता का सीधा संकेतक है; प्रबल बल उच्च गलनांक और अधिक स्थिरता दर्शाते हैं।
Question 7. निम्नलिखित युगलों के पदों (शब्दों) में कैसे विभेद करोगे?
1. षट्कोणीय निविड संकुलन एवं घनीय निविड संकुलन
2. क्रिस्टल जालक एवं एकक कोष्ठिका
3. चतुष्फलकीय रिक्ति एवं अष्टफलकीय रिक्ति ।
Answer:1. षट्कोणीय निविड संकुलन एवं घनीय निविड संकुलन (Hexagonal Close Packing and Cubic Close Packing) ये दोनों त्रिविमीय निविड संकुलित संरचनाएँ द्विविम-षट्कोणीय निविड संकुलित परतों को एक-दूसरे पर रखकर जनित की जा सकती हैं। षट्कोणीय निविड संकुलन - जब तृतीय परत को द्वितीय परत पर रखा जाता है, तब उत्पन्न एक सम्भावना के अन्तर्गत द्वितीय परत की चतुष्फलकीय रिक्तियों को तृतीय परत के गोलों द्वारा आच्छादित किया जा सकता है। इस स्थिति में तृतीय परत के गोले प्रथम परत के गोलों के साथ पूर्णतः संरेखित होते हैं। इस प्रकार गोलों का पैटर्न एकान्तर परतों में पुनरावृत्त होता है। इस पैटर्न को प्रायः ABAB- पैटर्न लिखा जाता है। इस संरचना को षट्कोणीय निविड संकुलित (hcp) संरचना कहते हैं (चित्र-1)। इस प्रकार की परमाणुओं की व्यवस्था कई धातुओं; जैसे-मैग्नीशियम और जिंक में पायी जाती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र (चित्र 1) षट्कोणीय और घनीय निविड संकुलन की व्यवस्था को दर्शाता है। इसमें (a) षट्कोणीय और घनीय निविड संकुलन का खंडित दृश्य है, जो गोलों की परतों के संकुलन को दिखाता है। (b) प्रत्येक स्थिति में चार परतें स्तंभ के रूप में व्यवस्थित हैं, और (c) संकुलन की ज्यामिति का प्रदर्शन है, जहाँ hcp और fcc संरचनाओं को भी दर्शाया गया है। यह दिखाता है कि कैसे परमाणुओं की परतें एक-दूसरे पर व्यवस्थित होकर विभिन्न संकुलन संरचनाएं बनाती हैं। घनीय निविड संकुलन - इसके लिए तीसरी परत दूसरी परत के ऊपर इस प्रकार रखते हैं कि उसके गोले अष्टफलकीय रिक्तियों को आच्छादित करते हों। इस प्रकार से रखने पर तीसरी परत के गोले प्रथम अथवा द्वितीय किसी भी परत के साथ संरेखित नहीं होते । इस व्यवस्था को 'C' प्रकार का कहा जाता है। केवल चौथी परत रखने पर उसके गोले प्रथम परत के गोलों के साथ संरेखित होते हैं। जैसा चित्र-1 व 2 में दिखाया गया है। इस प्रकार के पैटर्न को प्रायः ABCABC- लिखा जाता है। इस संरचना को घनीय निविड संकुलित संरचना (ccp) अथवा फलक-केन्द्रित घनीय (fcc) संरचना कहा जाता है। धातु; जैसे- ताँबा तथा चाँदी इस संरचना में क्रिस्टलीकृत होते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र (चित्र 2) अष्टफलकीय रिक्तियों के आच्छादन से बनने वाली ABCABC- परतों की व्यवस्था को दर्शाता है। भाग (a) परतों के क्रम को दिखाता है जहाँ अष्टफलकीय रिक्तियाँ ढकी होती हैं, जबकि भाग (b) इस व्यवस्था से निर्मित होने वाली घनीय निविड़ संकुलित (ccp) या फलक-केन्द्रित घनीय (fcc) संरचना का एक अंश प्रदर्शित करता है। यह क्रिस्टलीय पैकिंग के मूलभूत तत्वों को स्पष्ट करता है। उपर्युक्त दोनों प्रकार के निविड़ संकुलन अति उच्च क्षमता वाले होते हैं और क्रिस्टल का 74% स्थान सम्पूरित रहता है। इन दोनों में प्रत्येक गोला बारह गोलों के सम्पर्क में रहता है। इस प्रकार इन दोनों संरचनाओं में उपसहसंयोजन संख्या 12 है। 2. क्रिस्टल जालक एवं एकक कोष्ठिका (Crystal Lattice and Unit Cell) क्रिस्टल जालक - क्रिस्टलीय ठोसों का मुख्य अभिलक्षण अवयवी कणों का नियमित और पुनरावृत्त पैटर्न है। यदि क्रिस्टल में अवयवी कणों की त्रिविमीय व्यवस्था को आरेख के रूप में निरूपित किया जाए, जिसमें प्रत्येक बिन्दु को चित्रित किया गया हो तो व्यवस्था को क्रिस्टल जालक कहते हैं। इस प्रकार, “द्विकस्थान (space) में बिन्दुओं की नियमित त्रिविमीय व्यवस्था को क्रिस्टल जालक कहते हैं।”
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र (चित्र 3) एक क्रिस्टल जालक के एक भाग को और उसकी एकक कोष्ठिका को दर्शाता है। इसमें क्रिस्टल जालक की नियमित त्रि-आयामी व्यवस्था और उस जालक के सबसे छोटे दोहराए जाने वाले इकाई - एकक कोष्ठिका को स्पष्ट रूप से चित्रित किया गया है, जिससे छात्र क्रिस्टल संरचना की मौलिक इकाई को समझ सकें। क्रिस्टल जालक के एक भाग को चित्र-3 में दिखाया गया है। केवल 14 त्रिविमीय जालक सम्भव हैं। एकक कोष्ठिका - एकक कोष्ठिका क्रिस्टल जालक का लघुतम भाग है (चित्र-3)। जब इसे विभिन्न दिशाओं में पुनरावृत्त किया जाता है तो पूर्ण जालक की उत्पत्ति होती है। 3. चतुष्फलकीय रिक्ति एवं अष्टफलकीय रिक्ति (Tetrahedral Void and Octahedral Void) चतुष्फलकीय रिक्ति - ये रिक्तियाँ चार गोलों द्वारा घिरी रहती हैं जो एक नियमित चतुष्फलक के शीर्ष पर स्थित होते हैं। इस प्रकार जब भी द्वितीय परत का एक गोला प्रथम परत की रिक्ति के ऊपर होता है, तब एक चतुष्फलकीय रिक्ति बनती है। इन रिक्तियों को चतुष्फलकीय रिक्तियाँ इसलिए कहा जाता है। क्योंकि जब इन चार गोलों के केन्द्रों को मिलाया जाता है, तब एक चतुष्फलक बनता है। चित्र-4 में इन्हें 'T' से अंकित किया गया है। ऐसी एक रिक्ति को अलग से चित्र-5 में दिखाया गया है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र (चित्र 4) निविड संकुलित गोलों की दो परतों के एक स्तंभ और उनमें जनित होने वाली रिक्तियों को दर्शाता है। इसमें 'T' से चतुष्फलकीय रिक्तियों और 'O' से अष्टफलकीय रिक्तियों को अंकित किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि गोलों की पैकिंग के दौरान ये रिक्त स्थान कैसे बनते हैं। अष्टफलकीय रिक्ति - ये रिक्तियाँ सम्पर्क में स्थित तीन गोलों द्वारा संलग्नित रहती हैं। इस प्रकार द्वितीय परत की त्रिकोणीय रिक्तियाँ प्रथम परते की त्रिकोणीय रिक्तियों के ऊपर होती हैं और इनकी त्रिकोणीय आकृतियाँ अतिव्यापित नहीं होतीं। उनमें से एक में त्रिकोण का शीर्ष ऊर्ध्वमुखी और दूसरे में अधोमुखी होता है। इन रिक्तियों को चित्र-4 में 'O' से अंकित किया गया है। ऐसी रिक्तियाँ छह गोलों से घिरी होती हैं। ऐसी एक रिक्ति को अलग से चित्र- 5 में दिखाया गया है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र (चित्र 5) चतुष्फलकीय और अष्टफलकीय रिक्तियों की ज्यामितीय आकृतियों को स्पष्ट करता है। भाग (a) ऊपरी दृश्य दिखाता है, भाग (b) खंडित पार्श्व दृश्य प्रस्तुत करता है, और भाग (c) रिक्ति का ज्यामितीय आकार दर्शाता है, जिससे छात्र इन रिक्तियों के त्रि-आयामी रूप को बेहतर ढंग से समझ सकें।
In simple words: षट्कोणीय निविड संकुलन और घनीय निविड संकुलन, क्रिस्टल जालक और एकक कोष्ठिका, तथा चतुष्फलकीय रिक्ति और अष्टफलकीय रिक्ति ये सभी ठोसों की संरचना और कणों की व्यवस्था को समझने के लिए महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं, जिनमें उनकी पैकिंग व्यवस्था, मौलिक इकाई और रिक्त स्थानों का वर्णन किया जाता है।
🎯 Exam Tip: इन सभी अवधारणाओं के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझना और उनके उदाहरणों व आरेखीय प्रतिनिधित्वों को जानना क्रिस्टलीय ठोसों की संरचना को समझने के लिए आवश्यक है।
Question 8. निम्नलिखित जालकों में से प्रत्येक की एकक कोष्ठिका में कितने जालक बिन्दु होते हैं?
1. फलक-केन्द्रित घनीय,
2. फलक-केन्द्रित चतुष्कोणीय,
3. अन्तःकेन्द्रित ।
Answer:1. फलक-केन्द्रित घनीय संरचना (fcc) में जालक बिन्दु = 8 (कोनों पर) + 6 (फलक केन्द्र पर) = 14 2. फलक-केन्द्रित चतुष्कोणीय संरचना में जालक बिन्दु = 8 (कोनों पर) + 6 (फलक केन्द्र पर) = 14 3. अन्तःकेन्द्रित घनीय (bcc) संरचना में जालक बिन्दु = 8 (कोनों पर) + 1 (अन्तःकेन्द्र पर) = 9
In simple words: फलक-केंद्रित घनीय और चतुष्कोणीय संरचनाओं में कुल 14 जालक बिंदु होते हैं (कोनों और फलक केंद्रों को मिलाकर), जबकि अन्तःकेंद्रित घनीय संरचना में 9 जालक बिंदु होते हैं (कोनों और केंद्र को मिलाकर)।
🎯 Exam Tip: विभिन्न एकक कोष्ठिकाओं में जालक बिंदुओं की संख्या की गणना के लिए कोने, फलक केंद्र और अंतःकेंद्र पर कणों के योगदान को सही ढंग से जोड़ना महत्वपूर्ण है।
Question 9. समझाइए -
1. धात्विक एवं आयनिक क्रिस्टलों में समानता एवं विभेद का आधार ।
2. आयनिक ठोस कठोर एवं भंगुर होते हैं।
Answer:1. समानताएँ (Similarities) - (1) आयनिक तथा धात्विक दोनों क्रिस्टलों में स्थिर विद्युत आकर्षण बल विद्यमान होता है। आयनिक क्रिस्टलों में यह विपरीत आवेशयुक्त आयनों के मध्य होता है। धातुओं में यह संयोजी इलेक्ट्रॉनों तथा करनैल (kernels) के मध्य होता है। इसी कारण से इन दोनों के गलनांक उच्च होते हैं। (2) दोनों स्थितियों में बन्ध अदैशिक (non-directional) होता है। विभेद (Differences) - (1) आयनिक क्रिस्टलों में आयन गति के लिए स्वतन्त्र नहीं होते हैं। अतः ये ठोस अवस्था में विद्युत का चालन नहीं करते। ये ऐसा केवल गलित अवस्था या जलीय विलयन में करते हैं। धातुओं में संयोजी इलेक्ट्रॉन बँधे नहीं होते, अपितु मुक्त रहते हैं। अतः ये ठोस अवस्था में भी विद्युत का चालन करते हैं। (2) आयनिक बन्ध स्थिर विद्युत आकर्षण के कारण प्रबल होते हैं। धात्विक बन्ध दुर्बल भी हो सकता है। या प्रबल भी, यह संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या तथा करनैल के आकार पर निर्भर करता है। 2. आयनिक क्रिस्टल कठोर होते हैं क्योंकि इनमें विपरीत आवेशयुक्त आयनों के मध्य प्रबल स्थिर विद्युत आकर्षण बल उपस्थित होता है। ये भंगुर होते हैं क्योंकि आयनिक बन्ध अदिशात्मक होता है।
In simple words: धात्विक और आयनिक क्रिस्टलों में प्रबल आकर्षण बल होते हैं और उच्च गलनांक होते हैं, लेकिन आयनिक ठोस ठोस अवस्था में अचालक होते हैं जबकि धात्विक ठोस सुचालक होते हैं। आयनिक ठोस कठोर और भंगुर होते हैं क्योंकि उनके आयनों के बीच मजबूत स्थिर विद्युत बल होते हैं।
🎯 Exam Tip: धात्विक और आयनिक क्रिस्टलों की तुलना करते समय, उनके बंधन के प्रकार, चालकता, गलनांक और यांत्रिक गुणों पर ध्यान दें, जो उनके अंतराआण्विक बलों पर निर्भर करते हैं।
Question 10. निम्नलिखित के लिए धातु के क्रिस्टल में संकुलन क्षमता की गणना कीजिए ।
1. सरल घनीय,
2. अन्तः केन्द्रित घनीय,
3. फलक-केन्द्रित घनीय।
(यह मानते हुए कि परमाणु एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं।)**
Answer:1. सरल घनीय जालक में संकुलन क्षमता (Packing Efficiency in Simple Cubic Lattice) सरल घनीय जालक में परमाणु केवल घन के कोनों पर उपस्थित होते हैं। घन के किनारों (कोरों) पर कण एक-दूसरे के सम्पर्क में होते हैं (चित्र-6)। इसलिए घन के कोर अथवा भुजा की लम्बाई 'a' और प्रत्येक कण का अर्द्धव्यास r निम्नलिखित प्रकार से सम्बन्धित होता है -
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र (चित्र 6) सरल घनीय एकक कोष्ठिका को दर्शाता है, जहाँ घन के कोर की दिशा में गोले एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं। यह व्यवस्था यह स्पष्ट करती है कि किस प्रकार एक सरल घनीय संरचना में परमाणु पैक होते हैं, जिससे पैकिंग दक्षता की गणना में सहायता मिलती है। \( a = 2r \) घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन = \( a^3 = (2r)^3 = 8r^3 \) चूँकि सरल घनीय एकक कोष्ठिका में केवल 1 परमाणु होता है। अतः अध्यासित दिक्स्थान का आयतन = \( \frac{4}{3} \pi r^3 \)
संकुलन क्षमता \( = \frac{\text{एक परमाणु का आयतन}}{\text{घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन}} \times 100 \)
\( = \frac{\frac{4}{3} \pi r^3}{8r^3} \times 100 \)
\( = \frac{\pi}{6} \times 100 \)
\( = \frac{22}{7 \times 6} \times 100 \)
\( = 52.38\% \approx 52.4\% \) 2. अन्तः केन्द्रित घनीय जालक में संकुलन क्षमता (Packing Efficiency in Body-centred Cubic Lattice) संलग्न चित्र से यह स्पष्ट है कि केन्द्र पर स्थित परमाणु विकर्ण पर व्यवस्थित अन्य दो परमाणुओं के सम्पर्क में है। \( \triangle EFD \) में, \( b^2 = a^2 + a^2 = 2a^2 \)
\( b = \sqrt{2}a \) अब \( \triangle AFD \) में, \( c^2 = a^2 + b^2 = a^2 + 2a^2 = 3a^2 \)
\( c = \sqrt{3}a \) काय विकर्ण \( 4r \) की लम्बाई \( \sqrt{3}a \) के बराबर है, जहाँ r गोले (परमाणु) का अर्द्धव्यास है क्योंकि विकर्ण पर उपस्थित तीनों गोले एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं। अतः \( \sqrt{3}a = 4r \)
\( a = \frac{4r}{\sqrt{3}} \) अतः यह भी लिख सकते हैं कि \( r = \frac{\sqrt{3}a}{4} \)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र (चित्र 7) अन्तःकेन्द्रित घनीय एकक कोष्ठिका को दर्शाता है। इसमें काय विकर्ण पर उपस्थित गोलों को ठोस परिसीमा द्वारा दर्शाया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि केंद्र पर स्थित परमाणु कैसे अन्य दो कोनों के परमाणुओं के साथ संपर्क में होता है, जो bcc संरचना की पैकिंग दक्षता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। इस प्रकार की संरचना में परमाणुओं की कुल संख्या 2 है तथा उनका आयतन \( 2 \times \left(\frac{4}{3}\right) \pi r^3 \) है। घन का आयतन \( a^3 = \left(\frac{4r}{\sqrt{3}}\right)^3 \) के बराबर होगा अथवा \( a^3 = \frac{64r^3}{3\sqrt{3}} \)
संकुलन क्षमता \( = \frac{\text{एकक कोष्ठिका में दो गोलों द्वारा अध्यासित आयतन}}{\text{एकक कोष्ठिका का कुल आयतन}} \times 100 \)
\( = \frac{2 \times (\frac{4}{3})\pi r^3}{(\frac{4r}{\sqrt{3}})^3} \times 100 \)
\( = \frac{2 \times \frac{4}{3} \pi r^3}{\frac{64r^3}{3\sqrt{3}}} \times 100 \)
\( = \frac{8\pi r^3}{3} \times \frac{3\sqrt{3}}{64r^3} \times 100 \)
\( = \frac{\pi \sqrt{3}}{8} \times 100 \)
\( = \frac{22 \times 1.732}{7 \times 8} \times 100 \)
\( = \frac{38.104}{56} \times 100 \approx 68\% \) 3. फलक-केन्द्रित घनीय जालक में संकुलन क्षमता (Packing Efficiency in Face-centred Cubic Lattice) संलग्न चित्र से, \( \triangle ABC \) में, \( AC^2 = b^2 = BC^2 + AB^2 \) \( = a^2 + a^2 = 2a^2 \)
या \( b = \sqrt{2}a \) यदि गोले का अर्द्धव्यास \( r \) हो तो \( b = 4r = \sqrt{2}a \) या \( a = \frac{4r}{\sqrt{2}} = 2\sqrt{2}r \) या \( r = \frac{a}{2\sqrt{2}} \)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र (चित्र 8) फलक-केन्द्रित घनीय एकक कोष्ठिका को दर्शाता है। इसमें घनीय संरचना के फलक केंद्र पर परमाणुओं की व्यवस्था को प्रमुखता से दिखाया गया है, जो इस संरचना में कणों के पैकिंग और संकुलन दक्षता को समझने में मदद करता है। इस प्रकार की संरचना में परमाणुओं की कुल संख्या चार होती है तथा उनका आयतन \( 4 \times \frac{4}{3} \pi r^3 \) है।
संकुलन क्षमता \( = \frac{\text{एकक कोष्ठिका में चारों गोलों द्वारा अध्यासित आयतन}}{\text{एकक कोष्ठिका का कुल आयतन}} \times 100 \)
\( = \frac{4 \times \frac{4}{3} \pi r^3}{(2\sqrt{2}r)^3} \times 100 \)
\( = \frac{\frac{16}{3} \pi r^3}{16\sqrt{2}r^3} \times 100 \)
\( = \frac{\pi}{3\sqrt{2}} \times 100 \)
\( = \frac{22}{7 \times 3 \times 1.414} \times 100 \)
\( = \frac{2200}{29.694} \approx 74\% \)
In simple words: सरल घनीय की संकुलन क्षमता 52.4%, अन्तःकेंद्रित घनीय की 68% और फलक-केंद्रित घनीय की 74% होती है, जो यह दर्शाती है कि फलक-केंद्रित घनीय संरचना सबसे कुशल पैकिंग है।
🎯 Exam Tip: संकुलन क्षमता की गणना में, प्रत्येक क्रिस्टल संरचना के लिए प्रति एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या (Z), कोर की लंबाई (a), और परमाणु त्रिज्या (r) के बीच के संबंध को सही ढंग से लागू करना महत्वपूर्ण है।
Question 11. चाँदी का क्रिस्टलीकरण fcc जालक में होता है। यदि इसकी कोष्ठिका के कोरों की लम्बाई \( 4.07 \times 10^{-8} \) cm तथा घनत्व \( 10.5 \) g cm\(^{-3}\) हो तो चाँदी का परमाण्विक द्रव्यमान ज्ञात कीजिए।
Answer:हल fcc जालक के लिए \( Z = 4 \) कोर की लम्बाई, \( a = 4.077 \times 10^{-8} \) cm, घनत्व \( \rho = 10.5 \) g cm\(^{-3}\) घनत्व, \( \rho = \frac{Z \times M}{N_A \times a^3} \)
या \( M = \frac{\rho \times N_A \times a^3}{Z} \)
या \( M = \frac{10.5 \text{ g cm}^{-3} \times 6.02 \times 10^{23} \text{ mol}^{-1} \times (4.077 \times 10^{-8} \text{ cm})^3}{4} \)
\( = 107.14 \) g mol\(^{-1}\) अतः चाँदी का परमाण्विक द्रव्यमान = \( 107.14 \) g mol\(^{-1}\) होगा ।
In simple words: चाँदी के fcc जालक में उसके घनत्व, कोर की लंबाई, और अवोगाद्रो संख्या का उपयोग करके, हम उसका परमाण्विक द्रव्यमान लगभग \( 107.14 \) g mol\(^{-1}\) ज्ञात कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: परमाण्विक द्रव्यमान की गणना के लिए घनत्व सूत्र का सही अनुप्रयोग और इकाइयों का उचित रूपांतरण महत्वपूर्ण है; fcc जालक के लिए \( Z=4 \) का मान याद रखें।
Question 12. एक घनीय ठोस दो तत्वों P एवं Q से बना है। घन के कोनों पर Q परमाणु एवं अन्तःकेन्द्र पर P परमाणु स्थित हैं। इस यौगिक का सूत्र क्या है? P एवं Q की उपसहसंयोजन संख्या क्या है?
Answer:हल घन में परमाणु Q, 8 कोनों पर स्थित हैं। Q परमाणुओं की संख्या = \( 1/8 \times 8 = 1 \) परमाणु P अन्तः केन्द्र पर स्थित है, अतः P परमाणुओं की संख्या = 1 अतः यौगिक का सूत्र = PQ P तथा Q की उप-सहसंयोजन संख्या = 8
In simple words: यदि Q परमाणु घन के कोनों पर और P परमाणु केंद्र में हैं, तो यौगिक का सूत्र PQ होगा, और उनकी उप-सहसंयोजन संख्या 8 होगी।
🎯 Exam Tip: यौगिक का सूत्र निर्धारित करने के लिए, प्रति एकक कोष्ठिका में प्रत्येक तत्व के परमाणुओं की प्रभावी संख्या की गणना करें; उप-सहसंयोजन संख्या निकटतम पड़ोसियों की संख्या है।
Question 13. नायोबियम का क्रिस्टलीकरण अन्तःकेन्द्रित घनीय संरचना में होता है। यदि इसका घनत्व 8.55 g cm-3 हो तो इसके परमाण्विक द्रव्यमान 93u का प्रयोग करके परमाणु त्रिज्या की गणना कीजिए।
Answer:हल अन्तः केन्द्रित घनीय संरचना (bcc) में Z = 2, घनत्व p = 8.55 g cm-3, परमाण्विक द्रव्यमान, M = 92.9 g mol-1 सूत्र का प्रयोग करने पर, घनत्व, p = \( \frac{Z \times M}{N_A \times a^3} \) या \( a^3 = \frac{Z \times M}{N_A \times p} \) अतः \( a^3 = \frac{2 \times 92.9g \ mol^{-1}}{6.02 \times 10^{23} \ mol^{-1} \times 8.55 \ g \ cm^{-3}} \)
\( = 36.1 \times 10^{-24} \ cm^3 \) \( \therefore a = (36.1 \times 10^{-24} \ cm^3)^{1/3} = 3.3 \times 10^{-8} \ cm \) bcc एकक कोष्ठिका के लिए, विकर्ण = 4 x नायोबियम परमाणु की त्रिज्या \( \sqrt{3}a = 4 \times \) नायोबियम परमाणु की त्रिज्या \( = 1.43 \times 10^{-8} \ cm \)
In simple words: The problem involves calculating the atomic radius of Niobium, which crystallizes in a body-centered cubic (bcc) structure. We use the density formula and properties of a bcc unit cell to find the lattice constant 'a' and then the atomic radius using the diagonal relationship.
🎯 Exam Tip: Remember the formula for density of a unit cell and the relationship between lattice constant 'a' and atomic radius 'r' for bcc structures (`\(\sqrt{3}a = 4r\)`) for accurate calculations.
Question 14. यदि अष्टफलकीय रिक्ति की त्रिज्या हो तथा निविड संकुलन में परमाणुओं की त्रिज्या हो तो r एवं R में सम्बन्ध स्थापित कीजिए ।
Answer:हल अष्टफलकीय रिक्ति में स्थित गोला चित्र 9 में छायांकित वृत्त द्वारा प्रदर्शित है। रिक्ति के ऊपर तथा नीचे उपस्थित गोले चित्र-9 में प्रदर्शित नहीं हैं। अब चूंकि ABC एक समकोण त्रिभुज है, अतः पाइथागोरस सिद्धान्त लागू करने पर, \( AC^2 = AB^2 + BC^2 \) \( (2R)^2 = (R + r)^2 + (R + r)^2 \) \( = 2(R + r)^2 \) \( 4R^2 = 2(R + r)^2 \) \( (\sqrt{2}R)^2 = (R + r)^2 \)
\( \sqrt{2}R = R + r \)
\( r = \sqrt{2}R - R \)
\( r = (\sqrt{2} - 1)R \)
\( r = (1.414 - 1)R \)
\( r = 0.414 \ R \)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक अष्टफलकीय रिक्ति को दर्शाता है, जिसमें एक छोटा गोला (त्रिज्या 'r') तीन बड़े गोलों (त्रिज्या 'R') द्वारा घिरा हुआ है। यह संरचना रिक्ति के ऊपर और नीचे स्थित गोलों को नहीं दिखाती है, बल्कि तीन पड़ोसी बड़े गोलों के बीच की रिक्ति को एक समकोण त्रिभुज के रूप में दर्शाती है।
In simple words: This derivation shows the relationship between the radius of an octahedral void (r) and the radius of the atoms (R) forming the close-packed structure. By applying the Pythagorean theorem to the geometry of the void, we find that the void radius is approximately 0.414 times the atomic radius.
🎯 Exam Tip: Understanding the geometric arrangement of atoms and voids in close-packed structures is crucial. Practice deriving these radius ratios for both tetrahedral and octahedral voids.
Question 15. कॉपर fcc जालक के रूप में क्रिस्टलीकृत होता है जिसके कोर की लम्बाई 3.61 x 10-8 cm है। यह दर्शाइए कि गणना किए गए घनत्व के मान तथा मापे गए घनत्व 8.92 g cm-3 में समानता है।
Answer:हल fcc जालक में Z = 4, कोर की लम्बाई, a = 3.61 x 10-8 cm, घनत्व p = ? कॉपर का परमाण्विक द्रव्यमान, M = 63.5 g mol-1 घनत्व, \( p = \frac{Z \times M}{N_A \times a^3} \) \( p = \frac{4 \times 63.5g \ mol^{-1}}{6.02 \times 10^{23} \ mol^{-1} \times (3.61 \times 10^{-8} \ cm)^3} \) \( = 8.97 \ g \ cm^{-3} \) अतः घनत्व का गणनात्मक मान 8.97 g cm-3 तथा मापे गये घनत्व का मान 8.92 g cm-3 लगभग समान हैं।
In simple words: We calculated the theoretical density of copper using its face-centered cubic (fcc) structure, atomic mass, and edge length. The calculated value (8.97 g cm-3) is very close to the experimentally measured density (8.92 g cm-3), confirming the fcc structure.
🎯 Exam Tip: Be precise with units and scientific notation when performing density calculations. Knowing the 'Z' value (number of atoms per unit cell) for common structures like fcc is essential.
Question 16. विश्लेषण द्वारा ज्ञात हुआ कि निकिल ऑक्साइड का सूत्र Ni0.98 O1.00 है। निकिल आयनों का कितना अंश Ni2+ और Ni3+ के रूप में विद्यमान है?
Answer:हल Ni0.98 O1.00 नॉन- स्टॉइकियोमीटी यौगिक है। Ni आयन तथा ऑक्साइड आयनों का संघटन 98 : 100 है। माना Ni में x Ni2+ आयन तथा (98 – x) Ni3+ आयन हैं। Ni2+ तथा Ni3+ पर उपस्थित धनावेश ऑक्साइड आयनों पर उपस्थित ऋणावेश के बराबर होगा, अतः \( x \times 2 + (98 - x) \times 3 = 100 \times 2 \) \( 2x + 294 - 3x = 200 \)
\( -x = 200 - 294 \)
\( -x = -94 \)
\( \therefore x = 94 \) अत: 98 Ni आयनों में 94 Ni2+ आयन तथा 4 Ni3+ आयन होंगे।
\( \therefore \text{Ni}^{2+} \text{ आयनों का प्रतिशत} = \frac{94}{98} \times 100 = 96\% \)
\( \text{Ni}^{3+} \text{ आयनों का प्रतिशत} = 4\% \)
In simple words: Given the non-stoichiometric formula Ni0.98 O1.00, we determined the percentage of Ni2+ and Ni3+ ions. By assuming 'x' for Ni2+ and (98-x) for Ni3+, and balancing the total positive charge with the negative charge from oxygen, we found that 96% of nickel is Ni2+ and 4% is Ni3+.
🎯 Exam Tip: For non-stoichiometric compounds, always balance the total positive and negative charges to find the proportion of different oxidation states of the metal ions.
Question 17. अर्द्धचालक क्या होते हैं? दो मुख्य अर्द्धचालकों का वर्णन कीजिए एवं उनकी चालकता क्रियाविधि में विभेद कीजिए ।
Answer:उत्तर अर्द्धचालक (Semiconductors) - वे ठोस जिनकी चालकता 10-6 से 104 ohm-1 m-1 तक के मध्यवर्ती परास में होती है, अर्द्धचालक कहलाते हैं। अर्द्धचालकों में संयोजक बैण्ड एवं चालक बैण्ड के मध्य ऊर्जा- अन्तराल कम होता है। अतः कुछ इलेक्ट्रॉन चालक बैण्ड में लाँघ सकते हैं और अल्प- चालकता प्रदर्शित कर सकते हैं। ताप बढ़ने के साथ अर्द्धचालकों में विद्युत- चालकता बढ़ती है, क्योंकि अधिक संख्या में इलेक्ट्रॉन चालक बैण्ड में देखे जा सकते हैं। सिलिकन एवं जर्मेनियम जैसे पदार्थ इस प्रकार का व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। इनमें उचित अशुद्धि को उपयुक्त मात्रा में मिलाने से इनकी चालकता बढ़ जाती है। इस आधार पर दो प्रकार के अर्द्धचालक तथा उनकी चालकता- क्रियाविधि का वर्णन निम्नवत् है -
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक अर्द्धचालक के ऊर्जा बैण्ड संरचना को दर्शाता है। इसमें संयोजक बैण्ड (Valence band) और चालक बैण्ड (Conduction band) के बीच एक छोटा ऊर्जा अंतराल (Energy gap) दिखाया गया है। यह छोटा अंतराल इलेक्ट्रॉनों को संयोजक बैण्ड से चालक बैण्ड में जाने की अनुमति देता है, जिससे अर्द्धचालकता उत्पन्न होती है। (i) n- प्रकार के अर्द्धचालक (n-type semiconductors) - सिलिकन तथा जर्मेनियम आवर्त सारणी के वर्ग 14 से सम्बन्धित हैं और प्रत्येक में चार संयोजक इलेक्ट्रॉन हैं। क्रिस्टलों में इनका प्रत्येक परमाणु अपने निकटस्थ परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बन्ध बनाता है [चित्र-11 (a)]। जब वर्ग 15 के तत्व; जैसे- P अथवा As, जिनमें पाँच संयोजक इलेक्ट्रॉन होते हैं, को अपमिश्रित किया जाता है तो ये सिलिकन अथवा जर्मेनियम के क्रिस्टल में कुछ जालक स्थलों में आ जाते हैं [चित्र-11 (b)]। P अथवा As के पाँच में से चार इलेक्ट्रॉनों का उपयोग चार सन्निकट सिलिकन परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बन्ध बनाने में होता है। पाँचवाँ अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन विस्थानित (delocalised) हो जाता है। यह विस्थानित इलेक्ट्रॉन अपमिश्रित सिलिकन (अथवा जर्मेनियम) की चालकता में वृद्धि करता है। यहाँ चालकता में वृद्धि ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन के कारण होती है, अतः इलेक्ट्रॉन-धनी अशुद्धि से अपमिश्रित सिलिकन को n-प्रकार का अर्द्धचालक कहा जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र n-प्रकार और p-प्रकार के अर्द्धचालकों के निर्माण को दर्शाता है। (a) एक विशुद्ध क्रिस्टल में परमाणुओं के बीच सहसंयोजक बंधों को दिखाता है। (b) n-प्रकार के अर्द्धचालक में, एक अशुद्धि परमाणु (जैसे As) एक अतिरिक्त गतिशील इलेक्ट्रॉन प्रदान करता है। (c) p-प्रकार के अर्द्धचालक में, एक अशुद्धि परमाणु (जैसे B) एक धनात्मक छिद्र (इलेक्ट्रॉन की कमी) बनाता है। (ii) p- प्रकार के अर्द्धचालक (p-type semiconductors) - सिलिकन अथवा जर्मेनियम को वर्ग 13 के तत्वों; जैसे- B, Al अथवा Ga के साथ भी अपमिश्रित किया जा सकता है जिनमें केवल तीन संयोजक इलेक्ट्रॉन होते हैं। वह स्थान जहाँ चौथा इलेक्ट्रॉन नहीं होता, इलेक्ट्रॉन रिक्ति या इलेक्ट्रॉन छिद्र कहलाता है [चित्र-11 (c)]। निकटवर्ती परमाणु से इलेक्ट्रॉन आकर इलेक्ट्रॉन छिद्र को भर सकता है, परन्तु ऐसा करने पर वह अपने मूल स्थान पर इलेक्ट्रॉन छिद्र छोड़ जाता है। यदि ऐसा हो तो यह प्रतीत होगा जैसे कि इलेक्ट्रॉन छिद्र जिस इलेक्ट्रॉन द्वारा यह भरा गया है, उसके विपरीत दिशा में चल रहा है। विद्युत क्षेत्र के प्रभाव में इलेक्ट्रॉन, इलेक्ट्रॉन छिद्रों में से धनावेशित प्लेट की ओर चलेंगे, परन्तु ऐसा प्रतीत होगा; जैसे इलेक्ट्रॉन छिद्र धनावेशित हैं और ऋणावेशित प्लेट की ओर चल रहे हैं। इस प्रकार के अर्द्धचालकों को p- प्रकार के अर्द्धचालक कहते हैं।
In simple words: Semiconductors are materials with intermediate conductivity. They come in two main types: n-type, where conductivity is due to excess electrons from doping with group 15 elements, and p-type, where conductivity is due to electron holes created by doping with group 13 elements.
🎯 Exam Tip: Doping is a critical concept for semiconductors. Remember that n-type semiconductors have free electrons as charge carriers, while p-type semiconductors have holes as charge carriers. Also, be able to describe the energy band diagrams for conductors, insulators, and semiconductors.
Question 18.नॉनस्टॉइकियोमीट्री क्यूप्प्रस ऑक्साइड, Cu2O प्रयोगशाला में बनाया जा सकता है। इसमें कॉपर तथा ऑक्सीजन का अनुपात 2 : 1 से कुछ कम है। क्या आप इस तथ्य की व्याख्या कर सकते हैं कि यह पदार्थ p- प्रकार का अर्द्धचालक है?
Answer:उत्तर Cu2O में Cu तथा O का 2 : 1 से कम अनुपात यह प्रदर्शित करता है कि इसमें धनायनिक रिक्ति के कारण धातु न्यूनता (metal deficiency) है। धातु न्यून यौगिक धनायन छिद्रों के द्वारा विद्युत चालन करते हैं। अतः p- प्रकार के अर्द्धचालक (p- type semiconductors) होते हैं।
In simple words: Cu2O having a copper to oxygen ratio slightly less than 2:1 indicates metal deficiency, meaning there are cation vacancies. These vacancies act as electron holes, allowing the compound to conduct electricity via these holes, thus making it a p-type semiconductor.
🎯 Exam Tip: Metal deficiency defects often lead to p-type semiconductor behavior. Understand that cation vacancies can be compensated by higher oxidation states of the metal ions to maintain electrical neutrality, leading to hole conduction.
Question 19.फेरिक ऑक्साइड में ऑक्साइड आयन के षट्कोणीय निविड़ संकुलन में क्रिस्टलीकृत होता है जिसकी तीन अष्टफलकीय रिक्तियों में से दो पर फेरिक आयन उपस्थित होते हैं। फेरिक ऑक्साइड का सूत्र ज्ञात कीजिए।
Answer:हल माना निविड संकुलित संरचना में ऑक्साइड (O2-) आयनों की संख्या = x
\( \therefore \) अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या = x
\( \therefore \) इन रिक्तियों का 2/3 भाग फेरिक आयनों (Fe3+) द्वारा भरा है। अतः उपस्थित Fe3+ आयनों की संख्या \( = \frac{2}{3} \times x = \frac{2x}{3} \) \( \text{Fe}^{3+} : \text{O}^{2-} = \frac{2x}{3} : x = 2 : 3 \) अतः फेरिक ऑक्साइड का सूत्र Fe2O3 होगा ।
In simple words: In ferric oxide, oxide ions form a hexagonal close-packed (hcp) structure. Since two-thirds of the octahedral voids are occupied by ferric (Fe3+) ions, the ratio of Fe3+ to O2- ions is 2:3, leading to the formula Fe2O3.
🎯 Exam Tip: For compounds forming close-packed structures, remember that the number of octahedral voids is equal to the number of packed atoms, and the number of tetrahedral voids is twice that. Use this to determine the formula based on void occupancy.
Question 20.निम्नलिखित को p-प्रकार या n-प्रकार के अर्द्धचालकों में वर्गीकृत कीजिए -
1. In से डोपित Ge,
2. Si से डोपित B
Answer:उत्तर 1. p- प्रकार का अर्द्धचालक, 2. p- प्रकार का अर्द्ध-चालक ।
In simple words: Doping germanium with Indium (Group 13) or silicon with Boron (Group 13) creates electron holes, making them p-type semiconductors.
🎯 Exam Tip: Doping a Group 14 element (like Ge or Si) with a Group 13 element creates p-type semiconductors due to electron deficiency, while doping with a Group 15 element creates n-type semiconductors due to excess electrons.
Question 21.सोना (परमाणु त्रिज्या= 0.144 nm) फलक-केन्द्रित एकक कोष्ठिका में क्रिस्टलीकृत होता है। इसकी कोष्ठिका के कोर की लम्बाई ज्ञात कीजिए।
Answer:हल fcc संरचना के लिए यदि r परमाणु की त्रिज्या हो तो फलक विकर्ण = 4r यदि कोष्ठिका की कोर की लम्बाई a हो तो फलक विकर्ण = \( \sqrt{2}a \) अतः \( \sqrt{2}a = 4r \)
\( \therefore a = \frac{4}{\sqrt{2}} \times 0.144 \) \( 0.407 \ nm \)
In simple words: For gold, which crystallizes in a face-centered cubic (fcc) structure, the relationship between the edge length 'a' and the atomic radius 'r' is \(a = \frac{4r}{\sqrt{2}}\). Using the given atomic radius, we calculated the edge length of its unit cell.
🎯 Exam Tip: Remember the relationship between edge length (a) and atomic radius (r) for different cubic structures. For fcc, it's \(a = \frac{4r}{\sqrt{2}}\) or \(2\sqrt{2}r\).
Question 22.बैण्ड सिद्धान्त के आधार पर
1. चालक एवं रोधी
2. चालक एवं अर्द्धचालक में क्या अन्तर होता है?
Answer:उत्तर 1. चालक एवं रोधी में अन्तर (Difference between conductor and insulator) - अचालक अथवा रोधी में संयोजक बैण्ड तथा चालक बैण्ड के मध्य ऊर्जा-अन्तर बहुत अधिक होता है, जबकि चालक में ऊर्जा-अन्तर अत्यन्त कम होता है या संयोजक बैण्ड तथा चालक बैण्ड के बीच अतिव्यापन होता है। 2. चालक एवं अर्द्धचालक में अन्तर (Difference between conductor and semiconductor) - चालक में संयोजक बैण्ड तथा चालक बैण्ड के बीच ऊर्जा-अन्तर अत्यन्त कम होता है। अथवा अतिव्यापन होता है, जबकि अर्द्धचालकों में ऊर्जा अन्तर सदैव कम ही होता है, कभी भी अतिव्यापन नहीं होता।
In simple words: Conductors have overlapping or very small energy gaps between valence and conduction bands, allowing free electron flow. Insulators have large energy gaps, preventing electron flow. Semiconductors have small but distinct energy gaps, allowing limited electron flow, which increases with temperature.
🎯 Exam Tip: The magnitude of the energy gap between the valence band and the conduction band is the key differentiator for conductors, semiconductors, and insulators. Understand how this gap affects electron mobility and conductivity.
Question 23.उचित उदाहरणों द्वारा निम्नलिखित पदों को परिभाषित कीजिए
1. शॉट्की दोष
2. फेंकेल दोष
3. अन्तराकाशी
4. F-केन्द्र ।
Answer:उत्तर 1. शॉट्की दोष (Schottky defect) - यह आधारभूत रूप से आयनिक ठोसों का रिक्तिका दोष है। जब एक परमाणु अथवा आयन अपनी सामान्य (वास्तविक) स्थिति से लुप्त हो जाता है तो एक जालक रिक्तता निर्मित हो जाती है; इसे शॉट्की दोष कहते हैं। विद्युत उदासीनता को बनाए रखने के लिए लुप्त होने वाले धनायनों और ऋणायनों की संख्या बराबर होती है। शॉट्की दोष उन आयनिक पदार्थों द्वारा दिखाया जाता है जिनमें धनायन और ऋणायन लगभग समान आकार के होते हैं। उदाहरण के लिए - NaCl, KCl, CsCl और AgBr शॉट्की दोष दिखाते हैं। 2. फ्रेंकेल दोष (Frenkel defect) - यह दोष आयनिक ठोसों द्वारा दिखाया जाता है। लघुतर आयन (साधारणतया धनायन) अपने वास्तविक स्थान से विस्थापित होकर अन्तराकाश में चला जाता है। यह वास्तविक स्थान पर रिक्तिका दोष और नए स्थान पर अन्तराकाशी दोष उत्पन्न करता है। फ्रेंकेल दोष को विस्थापन दोष भी कहते हैं। यह ठोस के घनत्व को परिवर्तित नहीं करता। फ्रेंकेल दोष उन आयनिक पदार्थ द्वारा दिखाया जाता है जिनमें आयनों के आकार में अधिक अन्तर होता है। उदाहरण के लिए- ZnS, AgCl, AgBr और AgI में यह दोष Zn2+ और Ag+ आयन के लघु आकार के कारण होता है। 3. अन्तराकाशी दोष (Interstitial defect) - जब कुछ अवयवी कण (परमाणु अथवा अणु) अन्तराकोशी स्थल पर पाए जाते हैं तब उत्पन्न दोष अन्तराकाशी दोष कहलाता है। यह दोष पदार्थ के घनत्व को बढ़ाता है। अन्तराकाशी दोष अनआयनिक ठोसों में पाया जाता है। आयनिक ठोसों में सदैव विद्युत उदासीनता बनी रहनी चाहिए। इससे इनमें यह दोष दिखाई नहीं देता है। 4. F-केन्द्र (F-centre) - जब क्षारकीय हैलाइड; जैसे- NaCl को क्षार धातु (जैसे- सोडियम) की वाष्प के वातावरण में गर्म किया जाता है तो सोडियम परमाणु क्रिस्टल की सतह पर जम जाते हैं। Cl- आयन क्रिस्टल की सतह में विसरित हो जाते हैं और Na+ आयनों के साथ जुडकर NaCl देते हैं। Na+ आयन बनाने के लिए Na परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन निकल जाता है। निर्मुक्त इलेक्ट्रॉन विसरित होकर क्रिस्टल के ऋणायनिक स्थान को अध्यासित करते हैं, परिणामस्वरूप अब क्रिस्टल में सोडियम का आधिक्य होता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों द्वारा भरी जाने वाली इन ऋणायनिक रिक्तिकाओं को F-केन्द्र कहते हैं। ये NaCl क्रिस्टलों को पीला रंग प्रदान करते हैं। यह रंग इन इलेक्ट्रॉनों द्वारा क्रिस्टल पर पड़ने वाले प्रकाश से ऊर्जा अवशोषित करके उत्तेजित होने के परिणामस्वरूप दिखता है।
In simple words: Schottky defect involves missing equal numbers of cations and anions, maintaining neutrality and decreasing density. Frenkel defect occurs when a smaller ion moves to an interstitial site, creating a vacancy and an interstitial defect, maintaining density. Interstitial defect involves extra particles in interstitial spaces, increasing density. F-centre is an anion vacancy occupied by an electron, causing color in ionic crystals.
🎯 Exam Tip: For point defects, remember the key characteristics: impact on density, electrical neutrality, and typical examples for each type. F-centres are important for explaining color in alkali halide crystals.
Question 24.ऐलुमिनियम घनीय निविड संकुलित संरचना में क्रिस्टलीकृत होता है। इसका धात्विक अर्द्धव्यास 125 pm है।
1. एकक कोष्ठिका के कोर की लम्बाई ज्ञात कीजिए।
2. 1.0 cm³ ऐलुमिनियम में कितनी एकक कोष्ठिकाएँ होंगी?
Answer:हल घनीय निविड संकुलित संरचना में fcc संरचना होती है। अतः फलक विकर्ण \( a\sqrt{2} = 4r \) 1. ऐलुमिनियम की एकक कोष्ठिका की कोर की लम्बाई \( a = \frac{4}{\sqrt{2}} \times 125 \text{ pm} \) \( = 353.5 \text{ pm} \) 2. Al के 1 cm³ में एकक कोष्ठिकाओं की संख्या
In simple words: For Aluminum in an fcc structure, we first calculated the edge length 'a' using the given atomic radius and the relationship \(a = \frac{4r}{\sqrt{2}}\). Then, to find the number of unit cells in 1.0 cm³, we would typically calculate the volume of one unit cell and divide the total volume by it.
🎯 Exam Tip: Always remember the relationship between atomic radius and edge length for different crystal systems (e.g., fcc: \(a = 2\sqrt{2}r\)). To find the number of unit cells, calculate the volume of a single unit cell (\(a^3\)) and divide the total given volume by it.
Question 25. यदि NaCl को SrCl2 के 10-3 मोल % से डोपित किया जाए तो धनायनों की रिक्तियों का सान्द्रण क्या होगा?
Answer:हल -NaCl को 10-3 mol % SrCl2 में डोपित किया गया है।
\( \therefore \) NaCl के 100 mol SrCl2 के 10-3 mol में डोपित हैं।
\( \therefore \) NaCl का 1 mol डोपित होगा \( = \frac{10^{-3}}{100} \text{ mol} = 10^{-5} \text{ mol} \) में प्रत्येक Sr2+ आयन एक धनायन रिक्तिका जनित करता है।
\( \therefore \) धनायन रिक्तियों की संख्या \( = 10^{-5} \text{ mol / mol NaCl} \) \( = 10^{-5} \times 6.02 \times 10^{23} \text{ mol}^{-1} = 6.02 \times 10^{18} \text{ mol}^{-1} \)
In simple words: When NaCl is doped with 10-3 mol % SrCl2, each Sr2+ ion replaces two Na+ ions but occupies only one site, creating one cation vacancy. The concentration of these vacancies is directly proportional to the amount of SrCl2 doped, resulting in \(6.02 \times 10^{18}\) cation vacancies per mole of NaCl.
🎯 Exam Tip: When a higher valence impurity is doped into an ionic crystal, maintain electrical neutrality. For every Sr2+ ion replacing Na+, one Na+ site is occupied, and another Na+ site remains vacant, thus creating a cation vacancy.
Question 26.निम्नलिखित को उचित उदाहरणों से समझाइए -
1. लौहचुम्बकत्व
2. अनुचुम्बकत्व
3. फेरीचुम्बकत्व
4. प्रतिलौहचुम्बकत्व
5. 12 - 16 और 13 - 15 वर्गों के यौगिक ।
Answer:उत्तर 1. लौहचुम्बकत्व (Ferromagnetism) - कुछ पदार्थ; जैसे-लोहा, कोबाल्ट, निकिल, गैडोलिनियम और CrO2 बहुत प्रबलता से चुम्बकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे पदार्थों को लौहचुम्बकीय पदार्थ कहा जाता है। प्रबल आकर्षणों के अतिरिक्त ये स्थायी रूप से चुम्बकित किए जा सकते हैं। ठोस अवस्था में लौहचुम्बकीय पदार्थों के धातु आयन छोटे खण्डों में एकसाथ समूहित हो जाते हैं, इन्हें डोमेन कहा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक डोमेन एक छोटे चुम्बक की भाँति व्यवहार करता है। लौहचुम्बकीय पदार्थ के अचुम्बकीय टुकड़े में डोमेन अनियमित रूप से अभिविन्यसित होते हैं और उनकी चुम्बकीय आघूर्ण निरस्त हो जाता है। पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर सभी डोमेन चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में अभिविन्यसित हो जाते हैं [चित्र-12 (a)] और प्रबल चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न होती है। चुम्बकीय क्षेत्र को हटा लेने पर भी डोमेनों का क्रम बना रहता है और लौहचुम्बकीय पदार्थ स्थायी चुम्बक बन जाते हैं। चुम्बकीय पदार्थों की यह प्रवृत्ति लौहचुम्बकत्व कहलाती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र चुम्बकीय आघूर्णों के व्यवस्थित संरेखण को दर्शाता है। (a) लौहचुम्बकीय पदार्थ में सभी डोमेन एक ही दिशा में संरेखित होते हैं, जिससे प्रबल चुम्बकत्व उत्पन्न होता है। (b) प्रतिलौहचुम्बकीय पदार्थ में, डोमेन समान और विपरीत दिशाओं में संरेखित होते हैं, जिससे कुल चुम्बकीय आघूर्ण शून्य हो जाता है। (c) फेरीचुम्बकीय पदार्थ में, डोमेन विपरीत दिशाओं में असमान रूप से संरेखित होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप शुद्ध चुम्बकीय आघूर्ण होता है। 2. अनुचुम्बकत्व (Paramagnetism) - वे पदार्थ जो चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा आकर्षित होते हैं, अनुचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। इन पदार्थों की यह प्रवृत्ति अनुचुम्बकत्व कहलाती है। अनुचुम्बकीय पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र की ओर दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं। ये चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में ही चुम्बकित हो जाते हैं तथा चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में अपना चुम्बकत्व खो देते हैं। अनुचुम्बकत्व का कारण एक अथवा अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति है, जो कि चुम्बकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं। O2, Cu2+, Fe3+, Cr3+ ऐसे पदार्थों के कुछ उदाहरण हैं। 3. फेरीचुम्बकत्व (Ferrimagnetism) - जब पदार्थ में डोमेनों के चुम्बकीय आघूर्णों का संरेखण समान्तर एवं प्रतिसमान्तर दिशाओं में असमान होता है, तब पदार्थ में फेरीचुम्बकत्व देखा जाता है। [चित्र-12 (c)]। ये लोहचुम्बकत्व की तुलना में चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं। Fe3O4 (मैग्नेटाइट) और फेराइट जैसे MgFe2O4, ZnFe2O4, ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं। ये पदार्थ गर्म करने पर फेरीचुम्बकत्व खो देते हैं और अनुचुम्बकीय बन जाते हैं। 4. प्रतिलौहचुम्बकत्व (Antiferromagnetism) - प्रतिलौहचुम्बकत्व प्रदर्शित करने वाले पदार्थ जैसे MnO में डोमेन संरचना लोहचुम्बकीय पदार्थ के समान होती है, परन्तु उनके डोमेन एक-दूसरे के विपरीत अभिविन्यसित होते हैं तथा एक- दूसरे के चुम्बकीय आघूर्ण को निरस्त कर देते हैं [चित्र-12 (b)]। जब चुम्बकीय आघूर्ण इस प्रकार अभिविन्यासित होते हैं कि नेट चुम्बकीय आघूर्ण शून्य हो जाता है, तब चुम्बकत्व प्रतिलौहचुम्बकत्व कहलाता है। 5. 12 - 16 और 13-15 वर्गों के यौगिक (Compounds of group 12-16 and 13-15) - वर्ग 12 के तत्वों और वर्ग 16 के तत्वों से बने यौगिक 12 - 16 वर्गों के यौगिक कहलाते हैं; जैसे- ZnS, HgTe आदि । वर्ग 13 के तत्वों और वर्ग 15 के तत्वों से बने यौगिक 13 - 15 वर्गों के यौगिक कहलाते हैं; जैसे- GaAs, AlP आदि ।
In simple words: This question explains various magnetic properties of materials. Ferromagnetism shows strong attraction and permanent magnetization due to parallel domain alignment. Paramagnetism shows weak attraction due to unpaired electrons. Ferrimagnetism has unequal anti-parallel domain alignment, leading to a net magnetic moment. Antiferromagnetism has equal and opposite anti-parallel domain alignment, resulting in zero net magnetic moment. Compounds from Groups 12-16 and 13-15 are typically mixed semiconductors.
🎯 Exam Tip: Understanding domain theory is key to distinguishing ferromagnetic, ferrimagnetic, and antiferromagnetic materials. For semiconductors, remember the specific group combinations that lead to compound semiconductors and their applications.
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1.एक विशेष ठोस अति कठोर है तथा इसका गलनांक अति उच्च है। ठोस अवस्था में यह अचालक है तथा प्रगलन पर यह
विद्युत चालक हो जाता है। ठोस है।
(i) धात्विक
(ii) आण्विक
(iii) नेटवर्क
(iv) आयनिक
Answer: (iv) आयनिक
In simple words: Ionic solids are characterized by being very hard, having high melting points, being insulators in solid form, and becoming electrical conductors when molten or in solution due to mobile ions.
🎯 Exam Tip: The combination of high hardness, high melting point, insulating solid, and conducting melt is a hallmark of ionic compounds. Metallic solids conduct in solid state, and network solids are typically insulators even when molten (or decompose).
Question 2.किस प्रकार के ठोस विद्युत चालक, आघातवर्धनीय और तन्य होते हैं?
(i) आणिवक
(ii) आयनिक
(iii) धात्विक
(iv) सहसंयोजक
Answer: (iii) धात्विक
In simple words: Metallic solids possess free electrons that allow them to conduct electricity, and their metallic bonding allows for malleability (can be hammered into sheets) and ductility (can be drawn into wires).
🎯 Exam Tip: Electrical conductivity, malleability, and ductility are characteristic properties of metals, which are due to the presence of a "sea" of delocalized electrons.
Question 3.ठोस Aएक अति कठोर ठोस तथा गलित अवस्था में विद्युतरोधी है और बहुत उच्च ताप पर पिघलता है। यह किस प्रकार
का ठोस है?
(i) आण्विक
(ii) आयनिक
(iii) धात्विक
(iv) सहसंयोजक
Answer: (iv) सहसंयोजक
In simple words: Covalent or network solids are very hard, have extremely high melting points, and are insulators in both solid and molten states (or decompose before melting). Examples include diamond and SiC.
🎯 Exam Tip: The key differentiator here is "विद्युतरोधी है" (is an insulator) in the molten state. Ionic solids conduct in molten state. This points to a giant covalent network structure.
Question 4.ग्रेफाइट है -
(i) आयनिक ठोस
(ii) धात्विक ठोस
(iii) सहसंयोजी ठोस
(iv) आण्विक ठोस
Answer: (iii) सहसंयोजी ठोस
In simple words: Graphite is a covalent solid with a layered structure, where carbon atoms are covalently bonded within layers, making it a giant molecule, yet it can conduct electricity due to delocalized electrons between layers.
🎯 Exam Tip: Graphite is a classic example of a covalent network solid that, unusually, conducts electricity. Its layered structure and sp2 hybridization are responsible for these properties.
Question 5.निम्न में से कौन-सा सहसंयोजक क्रिस्टल है?
(i) रॉक साल्ट
(ii) बर्फ
(iii) क्वार्ट्ज
(iv) शुष्क बर्फ
Answer: (iii) क्वार्ट्ज
In simple words: Quartz (SiO2) is a covalent crystal where silicon and oxygen atoms are linked in a continuous network of strong covalent bonds. Rock salt is ionic, and ice and dry ice are molecular solids.
🎯 Exam Tip: Identify covalent crystals by looking for non-metal atoms forming extensive networks through strong covalent bonds, often resulting in hard, high-melting solids.
Question 6.प्लास्टिक है -
(i) आयनिक ठोस
(ii) धात्विक ठोस
(iii) सहसंयोजी ठोस
(iv) इनमें से कोई नहीं
Answer: (iv) इनमें से कोई नहीं
In simple words: Plastic is an amorphous solid, which does not fit into the categories of ionic, metallic, or covalent solids because it lacks a long-range ordered crystal structure.
🎯 Exam Tip: Remember that plastics are typical examples of amorphous solids, characterized by a lack of long-range order in their constituent particles.
Question 7.सोडियम क्लोराइड क्रिस्टल की संरचना है -
(i) फलक केन्द्रित घनीय
(ii) मोनोक्लीनिक
(iii) ऑर्थोरोम्बिक
(iv) चतुष्कोणीय
Answer: (i) फलक केन्द्रित घनीय
In simple words: Sodium chloride (NaCl) crystallizes in a face-centered cubic (fcc) lattice structure, where both Na+ and Cl- ions occupy fcc positions.
🎯 Exam Tip: Sodium chloride's rock salt structure is a classic example of an fcc lattice with alternating cations and anions occupying the lattice points and octahedral voids.
Question 8.फलक केन्द्रित घनीय जालक में एक एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या होगी -
(i) 2
(ii) 3
(iii) 4
(iv) 5
Answer: (iii) 4
In simple words: In a face-centered cubic (fcc) unit cell, there are 8 atoms at the corners (each contributing 1/8) and 6 atoms at the face centers (each contributing 1/2), resulting in a total of 4 atoms per unit cell.
🎯 Exam Tip: Memorize the number of atoms per unit cell (Z) for common cubic lattices: Simple cubic (1), Body-centered cubic (2), and Face-centered cubic (4).
Question 9.58.5 g NaCl में एकक कोष्ठिकाओं की लगभग संख्या होगी -
(i) 1.5 x 1023
(ii) 6 x 1023
(iii) 3 x 1022
(iv) 0.5 x 1024
Answer: (i) 1.5 x 1023
In simple words: Given that 58.5 g of NaCl (Molar mass = 58.5 g/mol) is 1 mole, and an NaCl unit cell (fcc) contains 4 formula units, we calculate the total number of formula units and divide by 4 to find the number of unit cells.
🎯 Exam Tip: Remember that 1 mole contains Avogadro's number of formula units/atoms. For NaCl (fcc structure), there are 4 formula units per unit cell. Divide Avogadro's number by 4 to get the number of unit cells in one mole.
Question 10.Zn अपनी गलित अवस्था से ठोस अवस्था में परिवर्तित होता है जिसकी संरचना hcp प्रकार की है। समीपस्थ परमाणुओं
की संख्या होगी -
(i) 6
(ii) 8
(iii) 12
(iv) 4
Answer: (iii) 12
In simple words: In a hexagonal close-packed (hcp) structure, each atom is surrounded by 12 nearest neighbors - 6 in its own layer, 3 in the layer above, and 3 in the layer below.
🎯 Exam Tip: The coordination number for both hexagonal close-packed (hcp) and cubic close-packed (ccp/fcc) structures is 12, indicating maximum packing efficiency.
Question 11.एक ठोस AB, जिसकी संरचना NaCl प्रकार की है, में A परमाणु घनीय एकक कोष्ठिका के सभी कोनों को घेरते हैं। यदि
एक अक्ष के सभी फलक केन्द्रित परमाणु निष्कासित हो जायें तो ठोस की स्टॉइकियोमीट्री होगी -
(i) AB2
(ii) A2B
(iii) A4B3
(iv) A3B4
Answer: (iv) A3B4
In simple words: In an NaCl-type structure, A atoms are at corners and face centers, and B atoms are at edge centers and body center. If all face-centered atoms along one axis are removed, the count of A atoms changes, leading to a new stoichiometry of A3B4.
🎯 Exam Tip: For stoichiometry problems involving defects, carefully calculate the number of remaining atoms of each type based on their positions and contributions to the unit cell. Remember an fcc cell has 8 corners, 6 faces, 12 edges, and 1 body center.
Question 12.एक एकक कोष्ठिका जिसमें परमाणुओं की संख्या 2 है तथा जो ABC ABC..... संकुलन क्रम प्रदर्शित करती है, में
चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या होगी -
(i) Z
(ii) 2Z
(iii) Z/2
(iv) Z/4
Answer: (ii) 2Z
In simple words: In any close-packed structure (like ABCABC, which is fcc), the number of tetrahedral voids is always twice the number of atoms (Z) present in the unit cell.
🎯 Exam Tip: For close-packed structures (hcp and ccp), if 'Z' is the number of atoms, then the number of octahedral voids is 'Z', and the number of tetrahedral voids is '2Z'. This is a fundamental relationship.
Question 13.सोडियम क्लोराइड क्रिस्टल में Na+ आयन की समन्वय संख्या है -
(i) 6
(ii) 8
(iii) 4
(iv) 1
Answer: (i) 6
In simple words: In the rock salt (NaCl) structure, each Na+ ion is surrounded by 6 Cl- ions, and each Cl- ion is surrounded by 6 Na+ ions. Thus, the coordination number for both ions is 6.
🎯 Exam Tip: The coordination number in an ionic crystal like NaCl is critical. For the rock salt structure, the coordination number is always 6:6.
Question 14.एक धातु फलक केन्द्रित घनीय जालक में क्रिस्टलित होता है। एकक कोष्ठिका की कोर की लम्बाई 408 pm है। धातु
परमाणु का व्यास है
(i) 288 pm
(ii) 408 pm
(iii) 144 pm
(iv) 204 pm
Answer: (i) 288 pm
In simple words: For a face-centered cubic (fcc) lattice, the relationship between the edge length 'a' and the atomic radius 'r' is \(4r = a\sqrt{2}\). Given the edge length, we can calculate the atomic radius and then double it to find the diameter.
🎯 Exam Tip: Always remember the relationship between atomic radius (r) and edge length (a) for fcc structures: \(4r = a\sqrt{2}\). The diameter is \(2r\). Be careful with the factor of \(\sqrt{2}\) in calculations.
Question 15.सरल घन में उपस्थित परमाणुओं द्वारा घेरे गये कुल आयतन का प्रभाव है -
(i) \( \frac{\pi}{4} \)
(ii) \( \frac{\pi}{6} \)
(iii) \( \frac{\pi}{3\sqrt{2}} \)
(iv) \( \frac{\pi}{4\sqrt{2}} \)
Answer: (ii) \( \frac{\pi}{6} \)
In simple words: In a simple cubic unit cell, there is 1 atom. The volume of this atom is \(\frac{4}{3}\pi r^3\). Since for a simple cubic cell, \(a=2r\), the volume of the unit cell is \(a^3 = (2r)^3 = 8r^3\). The packing efficiency (volume occupied by atoms / total volume of unit cell) is \(\frac{\frac{4}{3}\pi r^3}{8r^3} = \frac{\pi}{6}\).
🎯 Exam Tip: Recall that for a simple cubic unit cell, atoms touch along the edges, so \(a = 2r\). The packing fraction is the ratio of the volume of atoms in the unit cell to the total volume of the unit cell.
Question 16.एक ठोस यौगिक XY की NaCl संरचना है। यदि धनायन की त्रिज्या 100 pm है तो ऋणायन (Y-) की त्रिज्या होगी -
(i) 275.1 pm
(ii) 322.5 pm
(iii) 241.5 pm
(iv) 165.7 pm
Answer: (iii) 241.5 pm
In simple words: For an NaCl-type structure, the radius ratio (\(r_+/r_-\)) for ideal packing is approximately 0.414 to 0.732. However, for a perfect NaCl structure, the sum of cation and anion radii is equal to half the edge length, or often, the anions touch along the face diagonal, while the cation fits in the octahedral void. Given the options, we need to find the one that fits within the stable radius ratio range for coordination number 6. Without an edge length or specific coordination requirement, we cannot assume face diagonal touch. We'd expect the cation to fit in the octahedral void, so \(r_+/r_- = 0.414\). \(r_- = r_+/0.414 = 100/0.414 = 241.5\) pm.
🎯 Exam Tip: For NaCl structure (coordination number 6), the ideal radius ratio for fitting an ion in an octahedral void is 0.414. If the cation radius is given, you can estimate the anion radius using this ratio.
Question 17.फ्रेंकेल दोष के कारण आयनिक क्रिस्टल का घनत्व -
(i) घटता है।
(ii) बढ़ता है।
(iii) परिवर्तित होता है।
(iv) अपरिवर्तित रहता है।
Answer: (iv) अपरिवर्तित रहता है।
In simple words: A Frenkel defect involves an ion moving from its lattice site to an interstitial position within the crystal. Since no ions leave or enter the crystal, the overall mass and volume remain constant, meaning the density does not change.
🎯 Exam Tip: Remember that Frenkel defects are "dislocation defects" where ions simply move within the crystal. Schottky defects, on the other hand, involve missing ions, leading to a decrease in density.
Question 18.फ्रेंकेल तथा शॉटकी दोष होते हैं -
(i) नाभिकीय दोष
(ii) क्रिस्टल दोष
(iii) परमाणु दोष
(iv) अणु दोष
Answer: (ii) क्रिस्टल दोष
In simple words: Both Frenkel and Schottky defects are types of point defects, which are imperfections or irregularities at a point in the crystal lattice, hence classified as crystal defects.
🎯 Exam Tip: Point defects (like Schottky and Frenkel) are localized imperfections affecting only a few atoms or ions in the crystal. They are fundamental to understanding the properties of solids.
Question 19.शॉटकी दोष किसके जालक की अपूर्णताएँ परिभाषित करता है?
(i) गैस की
(ii) प्लाज्मा की
(iii) द्रव की
(iv) ठोस की
Answer: (iv) ठोस की
In simple words: Schottky defects are specific types of point defects that occur in solid crystals, where an equal number of cations and anions are missing from their lattice sites, leading to vacancies.
🎯 Exam Tip: Defects like Schottky and Frenkel are characteristic of crystalline solids and are used to explain deviations from ideal crystal structures in solid-state chemistry.
Question 20.Fe3O4 का क्रिस्टल है -
(i) प्रतिचुम्बकीय
(ii) लौहचुम्बकीय
(iii) अनुचुम्बकीय
(iv) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ii) लौहचुम्बकीय
In simple words: Fe3O4 (magnetite) is a classic example of a ferromagnetic substance, meaning it is strongly attracted to a magnetic field and can retain its magnetism even after the external field is removed.
🎯 Exam Tip: Fe3O4 is actually a ferrimagnetic substance, but among the given options, ferromagnetic is the closest and most commonly associated strong magnetic behavior. Ferrimagnetism is a type of magnetism where magnetic moments of atoms are anti-parallel but unequal, resulting in a net magnetic moment, similar to ferromagnetism in external behavior.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. क्रिस्टलीय ठोस क्या हैं?
Answer:उत्तर वे ठोस जिनमें घटक कणों की दीर्घ परास व्यवस्था होती है, क्रिस्टलीय ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ - चाँदी, ताँबा, सोडियम क्लोराइड आदि ।
In simple words: Crystalline solids have a highly ordered arrangement of their constituent particles (atoms, ions, or molecules) extending over a long range, forming a regular, repeating pattern.
🎯 Exam Tip: Long-range order is the defining characteristic of crystalline solids. Be sure to provide at least one clear example.
Question 2. अक्रिस्टलीय ठोस को परिभाषित कीजिए।
Answer:उत्तर एक ठोस अक्रिस्टलीय कहलाता है, जब इसके अवयवी कणों की लघु परास व्यवस्था होती है।
In simple words: Amorphous solids are substances where the constituent particles are arranged in a short-range, disordered pattern, lacking the long-range order of crystalline solids.
🎯 Exam Tip: The key feature of amorphous solids is their short-range order, differentiating them from crystalline solids which have long-range order.
Question 3. आण्विक ठोस से आप क्या समझते हैं?
Answer:उत्तर जिन ठोसों के क्रिस्टल जालक सरल विविक्त अणुओं से बने होते हैं, वे आण्विक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ- आयोडीन, सल्फर, सफेद फास्फोरस आदि ।
In simple words: Molecular solids are composed of discrete molecules held together by weak intermolecular forces like van der Waals forces or hydrogen bonds.
🎯 Exam Tip: Molecular solids typically have low melting points and are soft because the intermolecular forces holding the molecules together are weak, not strong covalent or ionic bonds.
Question 4. आयनिक ठोस की परिभाषा दीजिए ।
Answer:उत्तर जिन ठोसों के क्रिस्टल जालक धनायनों और ऋणायनों से बने होते हैं, वे आयनिक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ- सोडियम क्लोराइड, धातु ऑक्साइड, धातु सल्फाइड आदि ।
In simple words: Ionic solids are crystalline solids made up of positively charged cations and negatively charged anions, arranged in a regular three-dimensional lattice and held together by strong electrostatic forces.
🎯 Exam Tip: Strong electrostatic attraction between oppositely charged ions is the defining characteristic of ionic solids, leading to high melting points and hardness.
Question 5. धात्विक ठोस को स्पष्ट कीजिए ।
Answer:उत्तर जो ठोस धातुओं के गुण प्रकट करते हैं, धात्विक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ - सोना, चाँदी, ताँबा आदि ।
In simple words: Metallic solids consist of positive metal ions (kernels) immersed in a "sea" of delocalized electrons. These free electrons are responsible for their characteristic properties like electrical conductivity, malleability, and luster.
🎯 Exam Tip: The "electron sea" model is fundamental to explaining the properties of metallic solids, particularly their excellent electrical and thermal conductivity.
Question 6. सह-संयोजक ठोस से क्या अभिप्राय है?
Answer:उत्तर जिन ठोसों के क्रिस्टल जालक परमाणुओं से बने होते हैं, वे सह-संयोजक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-हीरा, ग्रेफाइट, सिलिका आदि ।
In simple words: Covalent solids, also known as network solids, are crystalline solids where constituent atoms are held together by a continuous network of strong covalent bonds throughout the entire crystal.
🎯 Exam Tip: These solids are typically very hard, have high melting points, and are insulators due to the strong directional covalent bonds forming a rigid network.
Question 7. सोडियम क्लोराइड का टुकड़ा सोडियम धातु से कठोर होता है। क्यों?
Answer:उत्तर NaCl (सोडियम क्लोराइड) में Na+ तथा Cl- के मध्य आयनिक बन्ध होता है जिसके कारण ये अपेक्षाकृत कठोर होते हैं। सोडियम धातु में धात्विक बन्ध होता है जो आयनिक बन्ध की तुलना में कमजोर होता है, इसलिए सोडियम धातु NaCl की तुलना में नर्म होता है।
In simple words: Sodium chloride is an ionic solid with strong electrostatic forces holding Na+ and Cl- ions together in a rigid lattice, making it hard. Sodium metal, however, has weaker metallic bonds due to delocalized electrons, making it softer compared to NaCl.
🎯 Exam Tip: The strength of chemical bonds directly relates to the hardness of a solid. Ionic bonds are generally stronger and more directional than metallic bonds, leading to greater hardness in ionic compounds compared to their constituent metals.
Question 8. रॉक साल्ट प्रकार की संरचना में प्रत्येक आयन की उपसहसंयोजन संख्या क्या होती है?
Answer:उत्तर रॉक साल्ट प्रकार की संरचना में प्रत्येक आयन की उपसहसंयोजन संख्या 6 होती है।
In simple words: In the rock salt (NaCl) structure, each cation is surrounded by six anions, and each anion is surrounded by six cations, resulting in a coordination number of 6 for both.
🎯 Exam Tip: The rock salt structure is a common ionic crystal structure. Always remember that the coordination number for both cation and anion in this structure is 6.
Question 9. आयनिक क्रिस्टलों में 12 उप-सहसंयोजन संख्या क्यों नहीं पायी जाती है?
Answer:उत्तर घनीय रिक्तिको के निर्माण के लिए त्रिज्या अनुपात परास 0.732 से 1.0 होता है। अतः उप-सहसंयोजन संख्या 8 से अधिक नहीं हो सकती है।
In simple words: A coordination number of 12 implies a very high packing density (like hcp or ccp). In ionic crystals, the relative sizes of cations and anions (radius ratio) restrict how many ions can surround another, typically limiting coordination numbers to 8 or less for stability to avoid repulsive forces.
🎯 Exam Tip: The radius ratio rule dictates the coordination number in ionic crystals. For a stable structure, the cation must fit snugly into the void formed by the anions without causing excessive repulsion. A coordination number of 12 would require a very large cation relative to the anion, which is rare and unstable for ionic bonding.
Question 10.क्या किसी दिये गये तत्त्व के षट्कोणीय निविड संकुलन तथा घनीय निविड संकुलन संरचना के घनत्व समान हो सकते हैं? समझाइए ।
Answer:उत्तर दोनों प्रकार की संरचना में घेरा गया कुल आयतन समान (74%) होता है एवं दोनों संरचनाओं में उप-सहसंयोजन संख्या 12 होती है। अतः दोनों संरचनाओं में घनत्व समान होंगे।
In simple words: Yes, both hexagonal close-packed (hcp) and cubic close-packed (ccp) structures have the same packing efficiency (74%) and coordination number (12). This means that for a given element, if it crystallizes in either hcp or ccp, its density will be the same.
🎯 Exam Tip: Hcp and ccp are both highly efficient close-packed structures with identical packing efficiency and coordination numbers, leading to the same density for a given element. The difference lies in the stacking sequence of layers (ABABAB... for hcp, ABCABC... for ccp).
Question 11.एक क्रिस्टलीय ठोस में ऑक्साइड आयन घनीय निविड संकुलन संरचना में व्यवस्थित है। धनायन A समान रूप से अष्टफलकीय तथा चतुष्फलकीय रिक्तियों में वितरित है। यदि सभी अष्टफलकीय रिक्तियाँ भरी हों तब ठोस का सूत्र क्या है?
Answer:उत्तर ऑक्साइड आयनों की घनीय निविड संकुलन संरचना में प्रति एकक कोष्ठिका 4 ऑक्साइड आयन होने चाहिए। प्रत्येक ऑक्साइड आयन 2 चतुष्फलकीय रिक्तियों तथा एक अष्टफलकीय रिक्तियों से सम्बन्धित होता है। अतः 4 अष्टफलकीय तथा 8 चतुष्फलकीय रिक्तियाँ होनी चाहिए। चूंकि सभी अष्टफलकीय रिक्तियाँ A द्वारा घेरी जाती हैं। अतः अष्टफलेकीय रिक्तियों में 4 धनायन A होंगे तथा समान संख्या में धनायन A चतुष्फलकीय रिक्तियों में होंगे। अतः 4 ऑक्साइड आयन तथा 8 धनायन A होंगे। अतः ठोस का सूत्र A8O4, या A2O होगा ।
In simple words: In a cubic close-packed structure, if oxide ions are 'O', there are 4 oxide ions per unit cell. If all 4 octahedral voids (equal to the number of 'O' ions) are filled by 'A' cations, then the number of 'A' cations is also 4. This leads to a formula of A4O4, which simplifies to AO.
🎯 Exam Tip: Remember the fundamental relationship: in a ccp structure, if there are 'N' atoms, there are 'N' octahedral voids and '2N' tetrahedral voids. This allows you to quickly determine stoichiometry based on void occupancy.
Question 12. घनीय निविड संकुलन संरचना युक्त 1 मोल यौगिक में अष्टफलकीय रिक्तियाँ कितनी होंगी?
Answer:उत्तर अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या = संकुलन में परमाणुओं की संख्या = 1 मोल = \( 6.023 \times 10^{23} \)
In simple words: In a cubic close-packed structure, the number of octahedral voids is equal to the number of constituent particles (atoms or ions). Therefore, in 1 mole of a compound with a ccp structure, there will be Avogadro's number (\(6.023 \times 10^{23}\)) of octahedral voids.
🎯 Exam Tip: This is a direct application of the void-to-atom ratio in close-packed structures. The number of octahedral voids always equals the number of packing atoms/ions.
Question 13. संकुलन दक्षता (क्षमता) को परिभाषित कीजिए ।
Answer:उत्तर क्रिस्टल में उपलब्ध कुल स्थान का परमाणुओं द्वारा घेरा हुआ अंश संकुलन दक्षता कहलाता है। यह प्रायः प्रतिशत में व्यक्त की जाती है। यदि किसी क्रिस्टल संरचना की एकक कोष्ठिका में उपस्थित परमाणुओं द्वारा कोष्ठिका का घेरा हुआ, आयतन Voccu और एकक कोष्ठिका का कुल आयतन Vcell है, तो संकुलन क्षमता \( = \frac{V_{occu}}{V_{cell}} \times 100 \)
In simple words: Packing efficiency is the percentage of the total volume of a crystal unit cell that is occupied by the constituent particles (atoms, ions, or molecules), indicating how closely packed they are.
🎯 Exam Tip: Packing efficiency is a dimensionless quantity expressed as a percentage. It reflects how much empty space is present within a given crystal structure.
Question 14. किसी तत्त्व x की परमाणु त्रिज्या 3.6Å है। इसकी एकक कोष्ठिका में सन्निकट पड़ोसी कण की दूरी क्या होगी?
Answer:हल \( d = 2r = 2 \times 3.6 \text{ Å} = 7.2 \text{ Å} \).
In simple words: The distance between nearest neighbor particles in a crystal is equal to their diameter if they are touching. Given the atomic radius, the distance is simply twice the radius.
🎯 Exam Tip: The nearest neighbor distance (d) is usually equivalent to the sum of the radii of two touching atoms. For identical atoms, \(d = 2r\).
Question 15. फ्रेंकेल दोष AgCl क्रिस्टलों के घनत्व को परिवर्तित क्यों नहीं करता है?
Answer:उत्तर चूँकि फ्रेंकेल दोषयुक्त क्रिस्टल में आयनों की संख्या समान रहती है इसलिए यह दोष क्रिस्टलों के घनत्व में कोई परिवर्तन नहीं करता है।
In simple words: Frenkel defect does not change the density of AgCl crystals because it involves the displacement of an ion from its lattice site to an interstitial position within the crystal, meaning no ions are lost from the crystal lattice.
🎯 Exam Tip: The key point for Frenkel defects is that atoms/ions are only relocated within the crystal, not removed, thus preserving the overall mass and volume, and hence density.
Question 16. क्रिस्टलों में कौन-सा बिन्दु दोष सम्बन्धित ठोस के घनत्व को परिवर्तित नहीं करता है?
Answer:उत्तर फेंकेल दोष ।
In simple words: The Frenkel defect is a point defect where an ion moves from its normal lattice site to an interstitial site, thus the total number of ions and the volume of the crystal remain unchanged, leading to no change in density.
🎯 Exam Tip: Differentiate between defects based on their impact on density. Schottky defects decrease density, while Frenkel and interstitial defects (in non-ionic solids) do not change density or increase it, respectively.
Question 17. फ्रेंकेल दोष उपस्थित होने पर भी क्रिस्टल के घनत्व में कोई परिवर्तन नहीं होता है, क्यों?
Answer:उत्तर फ्रेंकेल दोष में धनायन अपने जालक बिन्दुओं से हटकर अन्तराकाशी स्थानों में आ जाते हैं, इसलिए क्रिस्टल के घनत्व में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
In simple words: The density of a crystal remains unchanged with a Frenkel defect because it only involves the relocation of an ion within the crystal lattice from its regular site to an interstitial site, without any change in the total number of ions or the crystal's volume.
🎯 Exam Tip: Emphasize that in a Frenkel defect, the number of constituent particles and the overall volume of the crystal are conserved, which is why density remains constant.
Question 18. शॉटकी तथा फेंकेल दोषों का क्रिस्टल की उदासीनता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer:उत्तर शॉटकी तथा फ्रेंकेल दोष उपस्थित होने पर क्रिस्टल उदासीन (neutral) बने रहते हैं।
In simple words: Both Schottky and Frenkel defects maintain the overall electrical neutrality of the crystal. In Schottky defects, an equal number of cations and anions are missing. In Frenkel defects, the displaced ion retains its charge, and the vacancy and interstitial ion balance each other.
🎯 Exam Tip: Electrical neutrality is a fundamental principle for all intrinsic point defects in ionic crystals. Ensure you explain how this neutrality is maintained for both Schottky and Frenkel defects.
Question 19. CaCl2, AgCl क्रिस्टल में मिलाने पर शॉटकी दोष उत्पन्न करता है। व्याख्या कीजिए।
Answer:उत्तर विद्युत उदासीनता बनाए रखने के लिए 2Ag+ आयन 1 Ca2+ द्वारा प्रतिस्थापित होंगे। अतः प्रत्येक Ca2+ आयन के प्रवेश पर जालक स्थल में एक छिद्र उत्पन्न होता है।
In simple words: When CaCl2 is added to AgCl, each Ca2+ ion (divalent) replaces two Ag+ ions (monovalent) to maintain electrical neutrality. One Ag+ site is occupied by Ca2+, and the other Ag+ site becomes a vacant site, thus creating a Schottky defect.
🎯 Exam Tip: This is an example of an impurity defect. When a cation of higher valence is introduced, it replaces multiple lower valence cations to maintain charge balance, leading to the creation of vacancies equal to the difference in positive charges.
Question 20. F- केन्द्र क्या है?
Answer:उत्तर वह स्थान जहाँ ऋणायन रिक्तिका में इलेक्ट्रॉन उपस्थित होता है, F- केन्द्र कहलाता है।
In simple words: An F-centre (Farbzentrum, meaning color center) is a point defect in an ionic crystal where an anion vacancy is occupied by an unpaired electron, responsible for imparting color to the crystal.
🎯 Exam Tip: F-centres are crucial for explaining the color of alkali metal halides when heated in the presence of their metal vapor. The trapped electron absorbs light, causing the crystal to appear colored.
Question 21. रिक्तिका को परिभाषित कीजिए ।
Answer:उत्तर धातु परमाणुओं अथवा आयनों को जब क्रिस्टल में संकुलित किया जाता है, तब इनके मध्य उपस्थित स्थान रिक्तिका कहलाता है।
In simple words: A vacancy (or void) in a crystal lattice is an unoccupied position that should normally be filled by an atom, ion, or molecule, representing a missing particle from its expected site.
🎯 Exam Tip: Vacancies are a type of point defect that can affect the physical and chemical properties of solids, such as density and diffusion rates.
Question 22. एक लवण का नाम लिखिए जिसे AgCl में मिलाकर धनायन रिक्तियाँ उत्पन्न की जा सकती हैं।
Answer:उत्तर CdCl2 अथवा SrCl2
In simple words: Doping AgCl with a salt containing a higher-valent cation, such as CdCl2 (Cd2+) or SrCl2 (Sr2+), will introduce cation vacancies because each Cd2+ or Sr2+ ion will replace two Ag+ ions to maintain electrical neutrality.
🎯 Exam Tip: To create cation vacancies in a monovalent ionic solid like AgCl, you need to dope it with a salt containing a divalent cation. This is a common method for creating impurity defects.
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. 58.5 ग्राम NaCl में इकाई सेलों की संख्या ज्ञात कीजिए।
Answer:
हल
NaCl के मोलों की संख्या = \( \frac{58.5}{58.5} \) = 1 मोल
NaCl की fcc व्यवस्था होती है। इसके एक इकाई सेल में \(4Na^{+}\), \(4Cl^{-}\) होते हैं।
\( \implies \) इकाई सेलों की संख्या = \( \frac{6.023 \times 10^{23}}{4} = 1.506 \times 10^{23} \)
In simple words: 58.5 ग्राम NaCl में 1 मोल होता है। चूंकि NaCl एक fcc संरचना है, जिसमें प्रति इकाई सेल में 4 सूत्र इकाइयाँ होती हैं, इसलिए कुल इकाई सेलों की संख्या आवोगाद्रो संख्या को 4 से विभाजित करके प्राप्त की जाती है।
🎯 Exam Tip: NaCl की इकाई सेल संरचना और मोल अवधारणा को सही ढंग से समझने से ऐसे संख्यात्मक प्रश्नों को हल करने में मदद मिलती है।
Question 2. एक आयनिक ठोस के फलक केन्द्रित घनीय सेल के कोर की लम्बाई 508 pm है। यदि धनायन की त्रिज्या 110 pm हो, तो ऋणायन की त्रिज्या की गणना कीजिए ।
Answer:
हल
दिया गया है, कोर की लम्बाई = 508 pm,
धनायन की त्रिज्या (r⁺)= 110 pm, ऋणायन की त्रिज्या (r¯)= ?
सूत्र कोर की लम्बाई = \(2(r⁺ + r^{-})\) से,
\(508 /2 = r⁺ + r^{-}\)
\(r⁺ + r^{-} = 254\)
\(110 + r^{-} = 254\)
\(r^{-} = 254 - 110\)
\(r^{-} = 144 pm\)
In simple words: फलक केंद्रित घनीय सेल में, कोर की लम्बाई धनायन और ऋणायन की त्रिज्याओं के योग के दोगुने के बराबर होती है। धनायन की त्रिज्या और कोर की लम्बाई का उपयोग करके ऋणायन की त्रिज्या ज्ञात की जा सकती है।
🎯 Exam Tip: आयनिक ठोसों की संरचना में आयनिक त्रिज्या और कोर की लम्बाई के बीच संबंध को समझना महत्वपूर्ण है।
Question 3. चाँदी घनीय संवृत संकुलन (ccp) जालक बनाती है। इसके क्रिस्टल की x – किरण जाँच से ज्ञात हुआ कि इसके एकक सेल के कोर की लम्बाई 408.6 pm है। चाँदी के घनत्व की गणना कीजिए। (चाँदी का परमाणु द्रव्यमान = 107.9)
Answer:
हल
ज्ञात है, Z = 4 (ccp), a = 408.6 pm, \( \rho \) = ?, M = 107.9, \(N_A\) = \(6.023 \times 10^{23}\)
\( \rho = \frac{Z \times M}{a^3 \times N_A \times 10^{-30}} g/cm^3 \)
\( = \frac{4 \times 107.9}{(408.6)^3 \times 6.023 \times 10^{23} \times 10^{-30}} g/cm^3 \)
\( = \frac{431.6}{(408.6)^3 \times 6.023 \times 10^{-7}} = \frac{431.6}{41.087} = 10.504 g/cm^3 \)
In simple words: घनत्व की गणना के लिए, हमें ccp संरचना में प्रति इकाई सेल परमाणुओं की संख्या (Z), मोलर द्रव्यमान (M), कोर की लम्बाई (a) और आवोगाद्रो संख्या (N_A) की आवश्यकता होती है। इन मानों को घनत्व के सूत्र में रखकर गणना की जाती है।
🎯 Exam Tip: क्रिस्टल घनत्व की गणना के सूत्र और इकाई रूपांतरण को सटीकता से याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 4. बैण्ड सिद्धान्त के आधार पर चालक और अर्द्धचालक पदार्थों के विद्युत गुणों को समझाइए ।
Answer:
बैन्ड सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक तत्व में दो प्रकार के बैन्ड उपस्थित होते हैं, संयोजक बैन्ड तथा आगामी उच्च रिक्त बैन्ड (चालकता बैन्ड)। इन दोनों बैन्डों के मध्य की दूरी को ऊर्जा अन्तराल कहते हैं। चालकों (धातुओं) में संयोजकता बैन्ड आंशिक रूप से भरा होता है, या रिक्त चालकता बैन्ड के साथ अतिव्यापन करता है जिससे विद्युत क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन आसानी से प्रवाहित हो सकते हैं और धातुएँ चालकता दर्शाती हैं।
अर्द्धचालकों में ऊर्जा अन्तराल कम होता है। इस कारण कुछ इलेक्ट्रॉन संयोजक बैन्ड से चालकता बैन्ड में चले जाते हैं। इस प्रकार अर्द्धचालक अल्पचालकता दर्शाते हैं। ताप बढ़ने पर अर्द्धचालकों की विद्युत चालकता बढ़ जाती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र बैंड सिद्धांत के आधार पर धातुओं, अचालकों और अर्धचालकों के ऊर्जा बैंड संरचनाओं को दर्शाता है। (a) धातु में, संयोजी बैंड और चालक बैंड अतिव्यापित होते हैं या आंशिक रूप से भरे होते हैं, जिससे उच्च चालकता होती है। (b) अचालक में, संयोजी बैंड और चालक बैंड के बीच एक बड़ा ऊर्जा अंतराल होता है, जिससे इलेक्ट्रॉन प्रवाह नहीं कर पाते और यह विद्युतरोधी होता है। (c) अर्धचालक में, संयोजी बैंड और चालक बैंड के बीच एक छोटा ऊर्जा अंतराल होता है, जिससे कुछ इलेक्ट्रॉन चालकता बैंड में जा सकते हैं, जिससे अल्पचालकता होती है जो तापमान बढ़ने पर बढ़ती है।
In simple words: बैंड सिद्धांत बताता है कि ठोसों में संयोजी और चालक बैंड होते हैं। चालक वे होते हैं जिनमें ये बैंड या तो अतिव्यापित होते हैं या ऊर्जा अंतर बहुत कम होता है, जिससे इलेक्ट्रॉन आसानी से प्रवाहित होते हैं। अर्धचालक वे होते हैं जिनमें ऊर्जा अंतर थोड़ा अधिक होता है, जिससे ताप बढ़ने पर इलेक्ट्रॉन चालक बैंड में जा पाते हैं और चालकता बढ़ती है।
🎯 Exam Tip: चालक, अचालक और अर्द्धचालकों के बीच ऊर्जा बैंड अंतराल के अंतर को समझना इस प्रश्न का मुख्य बिंदु है।
दीर्ध शरीय प्रश्न
Question 1. ठोसों को किस प्रकार वर्गीकृत किया जाता है? प्रत्येक प्रकार के अवयवी कण के बारे में समझाइए तथा उदाहरण भी दीजिए।
Answer:
ठोसों का वर्गीकरण (Classification of Solids) – ठोसों को दो वृहत् प्रकारों- क्रिस्टलीय तथा अक्रिस्टलीय में वर्गीकृत किया जा सकता है। क्रिस्टलीय ठोसों में अवयवी कणों (परमाणु, आयन अथवा अणु) का क्रम सुव्यवस्थित होता है। क्रिस्टलीय ठोस साधारणतः लघु क्रिस्टलों की अत्यधिक संख्या से बना होता है, उनमें प्रत्येक का निश्चित अभिलक्षणिक जयामितीय आकार होता है। इसमें दीर्घ परासी व्यवस्था होती है अर्थात् कणों की व्यवस्था का पैटर्न नियमित होता है जिसकी सम्पूर्ण क्रिस्टल में एक से अन्तराल पर पुनरावृत्ति होती है। सोडियम क्लोराइड और क्वार्ट्ज क्रिस्टलीय ठोसों के विशिष्ट उदाहरण हैं।
अक्रिस्टलीय ठोस (ग्रीक अमोरफोस- आकृति नहीं होना) असमाकृति के कणों से बने होते हैं। इन ठोसों में अवयवी कणों (परमाणुओं, अणुओं अथवा आयनों) की व्यवस्था केवल लघु परासी व्यवस्था होती है। ऐसी व्यवस्था में नियमित और आवर्ती पुनरावृत्त पैटर्न केवल अल्प दूरियों तक देखा जाता है। ऐसे भाग बिखरे होते । हैं और इनके बीच व्यवस्था-क्रम अनियमित होते हैं। क्वार्ट्ज (क्रिस्टलीय) और क्वार्ट्ज काँच (अक्रिस्टलीय) की संरचनाएँ क्रमशः चित्र-14 (a) और (b) में दर्शाई गई हैं।
यद्यपि दोनों संरचनाएँ लगभग समरूप हैं, फिर भी अक्रिस्टलीय क्वार्ट्ज काँचे में दीर्घ परासी व्यवस्था नहीं है।
अक्रिस्टलीय ठोसों की संरचना द्रवों के सदृश होती है। अवयवी कणों की व्यवस्था में अन्तर के कारण दोनों प्रकार के ठोसों के गुण भिन्न होते हैं।
अधिकतर ठोस पदार्थ (तत्त्व तथा यौगिक) क्रिस्टलीय प्रकृति के होते हैं। उदाहरण के लिए – सभी धात्विक तत्व; जैसे- लोहा, ताँबा और चाँदी; अधात्विक तत्व; जैसे-सल्फर, फॉस्फोरस और आयोडीन एवं यौगिक; जैसे सोडियम क्लोराइड, जिंक सल्फाइड और नैफ्थेलोन क्रिस्टलीय ठोस हैं। काँच, रबर और प्लास्टिक
अक्रिस्टलीय ठोसों के विशिष्ट उदाहरण हैं। कुछ पदार्थ विभिन्न स्थितियों में भिन्न- भिन्न संरचनात्मक व्यवस्थाएँ प्राप्त करते हैं। ये व्यवस्थाएँ बहुरूप (polymorph) कहलाती हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र (a) क्वार्ट्ज और (b) क्वार्ट्ज काँच की द्विविमीय संरचना को दर्शाता है। चित्र (a) में, कणों की व्यवस्था नियमित और दीर्घ परासी है, जो क्रिस्टलीय प्रकृति को दर्शाती है। चित्र (b) में, कणों की व्यवस्था अनियमित और केवल लघु परासी है, जो अक्रिस्टलीय प्रकृति को दर्शाती है।
उदाहरणार्थ – डायमण्ड तथा ग्रेफाइट कार्बन के दो भिन्न बहुरूप हैं। इन भिन्न संरचनाओं के गुण; जैसे-गलनांक, घनत्व आदि भिन्न-भिन्न होते हैं। उदाहरणार्थ- ग्रेफाइट कोमल तथा विद्युत का अच्छा चालक होता है, जबकि डायमण्ड कठोर तथा विद्युत का दुर्बल चालक होता है। क्रिस्टलीय ठोसों को उनमें परिचालित अन्तराआण्विक बलों की प्रकृति के आधार पर चार वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है। इनका वर्णन निम्नलिखित है –
(1) आण्विक ठोस (Molecular Solids)
आण्विक ठोसों के अवयवी कण अणु होते हैं। इन्हें निम्नलिखित उपवर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(i) अधुवी आण्विक ठोस (Non-polar molecular solids) – इनके अन्तर्गत वे ठोस आते हैं जो या तो परमाणुओं उदाहरणार्थ – निम्न ताप पर ऑर्गन और हीलियम अथवा अध्रुवी सहसंयोजक बन्धों से बने अणुओं; उदाहरणार्थ – निम्न ताप पर H2, Cl2, और I2 द्वारा बने होते हैं। इन ठोसों में परमाणु अथवा अणु दुर्बल परिक्षेपण बलों अथवा लण्डन बलों द्वारा बँधे रहते हैं। ये ठोस मुलायम और विद्युत के अचालक होते हैं। इनके गलनांक निम्न कोटि के होते हैं और ये सामान्यतः कमरे के ताप और दाब पर द्रव अथवा गैसीय अवस्था में होते हैं।
(ii) ध्रुवीय-आण्विक ठोस (Polar molecular solids) – HCl, SO2 आदि पदार्थों के अणु ध्रुवीय सहसंयोजक बन्धों से बने होते हैं। ऐसे ठोसों में अणु अपेक्षाकृत प्रबल द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाओं (dipole-diple interactions) से एक-दूसरे के साथ बँधे रहते हैं। ये ठोस मुलायम और विद्युत के अचालक होते हैं। इनके गलनांक अध्रुवी आण्विक ठोसों से अधिक होते हैं, फिर भी इनमें से अधिकतर कमरे के ताप और दाब पर गैस अथवा द्रव हैं। ठोस SO2 और ठोस NH3 ऐसे ठोसों के उदाहरण हैं।
(iii) हाइड्रोजन आबन्धित आण्विक ठोस (Hydrogen bonded molecular solids) – ऐसे ठोसों के अणुओं में H और F, O अथवा N परमाणुओं के मध्य ध्रुवीय-सहसंयोजक बन्ध होते हैं। प्रबल हाइड्रोजन आबन्धन ऐसे ठोसों के अणुओं; जैसे-H2O (बर्फ) बंधित करते हैं। ये विद्युत के अचालक हैं। सामान्यतः ये कमरे के ताप और दाब पर वाष्पशील द्रव अथवा मुलायम ठोस होते हैं।
(2) आयनिक ठोस (Ionic Solids) आयनिक ठोसों के अवयवी कण आयन होते हैं। ऐसे ठोसों का निर्माण धनायनों और ऋणायनों के त्रिविमीय विन्यासों में प्रबल कूलॉमी (स्थिर विद्युत) बलों से बँधने पर होता है। ये ठोस कठोर और भंगुर प्रकृति के होते हैं। इनके गलनांक और क्वथनांक उच्च होते हैं। चूंकि इनमें आयन गमन के लिए स्वतन्त्र नहीं होते; अतः ये ठोस अवस्था में विद्युतरोधी होते हैं। यद्यपि गलित अवस्था में अथवा जल में घोलने पर आयन गमन के लिए मुक्त हो जाते हैं और वे विद्युत का संचालन करते हैं।
(3) धात्विक ठोस (Metallic Solids) धातुएँ मुक्त इलेक्ट्रॉनों के समुद्र से घिरे और उनसे जुड़े धनायनों के सुव्यवस्थित संग्रह हैं। ये इलेक्ट्रॉन गतिशील होते हैं और क्रिस्टल में सर्वत्र समरूप से विस्तारित होते हैं। प्रत्येक धात्विक परमाणु इन गतिशील इलेक्ट्रॉनों के समुद्र में एक अथवा अधिक इलेक्ट्रॉनों का योगदान देता है। ये मुक्त और गतिशील इलेक्ट्रॉन, धातुओं की उच्च विद्युत और ऊष्मीय चालकता के लिए उत्तरदायी होते हैं। विद्युत क्षेत्र प्रयुक्त करने पर ये इलेक्ट्रॉन धनायनों के नेटवर्क में सतत प्रवाह करते हैं। इसी प्रकार जब धातु के एक भाग में ऊष्मा संचारित की जाती है तो ऊष्मीय ऊर्जा मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा सर्वत्र एकसमान रूप से विस्तारित हो जाती है। धातुओं की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ कुछ स्थितियों में उनकी चमक और रंग हैं। ये भी उनमें उपस्थित मुक्त इलेक्ट्रॉनों के कारण होती हैं। धातुएँ अत्यधिक आघातवर्धनीय और तन्य होती हैं।
(4) सहसंयोजक अथवा नेटवर्क ठोस (Covalent or Network Solids)
अधात्विक क्रिस्टलीय ठोसों की विस्तृत बहुरूपता (polymorphism) सम्पूर्ण क्रिस्टल में निकटवर्ती परमाणुओं के मध्य सहसंयोजक बन्धों के बनने के कारण होती है। इन्हें विशाल अणु (giant molecule) भी कहा जाता है। सहसंयोजक बन्ध प्रबल और दिशात्मक प्रकृति के होते हैं; इसीलिए परमाणु अपनी स्थितियों पर अति प्रबलता से बँधे रहते हैं। ऐसे ठोस अत्यधिक कठोर और भंगुर होते हैं। इनका गलनांक अत्यन्त उच्च होता है और गलन से पूर्व ये विघटित भी हो सकते हैं। ये विद्युत का संचालन नहीं करते; अतः ये विद्युतरोधी होते हैं। हीरा और सिलिकन कार्बाइड ऐसे ठोसों के विशिष्ट उदाहरण हैं।
ग्रेफाइट मुलायम और विद्युत चालक है। इसके अपवादात्मक गुण इसकी विशिष्ट संरचना के कारण होते हैं। इसमें कार्बन परमाणु विभिन्न परतों में व्यवस्थित होते हैं और प्रत्येक परमाणु उसी परत के तीन निकटवर्ती परमाणुओं से सहसंयोजक बन्धन में होता है। प्रत्येक परमाणु का चौथा संयोजकता इलेक्ट्रॉन अलग परतों के मध्य उपस्थित होता है और यह गमन के लिए मुक्त होता है। यही मुक्त इलेक्ट्रॉन ग्रेफाइट को विद्युत का उत्तम चालक बनाते हैं। विभिन्न परतें एक-दूसरे पर फिसल सकती हैं। ये ग्रेफाइट को मुलायम ठोस और उत्तम ठोस-चिकनाई (Solid lubricant) बनाते हैं।
In simple words: ठोसों को क्रिस्टलीय और अक्रिस्टलीय में बांटा जाता है। क्रिस्टलीय ठोसों में कणों की व्यवस्थित, दीर्घ-परासी व्यवस्था होती है, जबकि अक्रिस्टलीय में अनियमित, लघु-परासी व्यवस्था होती है। क्रिस्टलीय ठोसों को उनके बीच के बलों के आधार पर आण्विक, आयनिक, धात्विक और सहसंयोजक ठोसों में वर्गीकृत किया जाता है।
🎯 Exam Tip: ठोसों के वर्गीकरण को उदाहरणों के साथ अच्छी तरह से याद रखें, विशेषकर क्रिस्टलीय और अक्रिस्टलीय के बीच के अंतर और विभिन्न प्रकार के क्रिस्टलीय ठोसों के गुण।
Question 2. क्रिस्टल तन्त्र के प्रकारों की विस्तृत विवेचना कीजिए। उदाहरण भी दीजिए।
Answer:
क्रिस्टल तन्त्र के प्रकार (Types of Crystal System) – सामान्यतया दो प्रकार की एकक कोष्ठिकाएँ मिलकर विभिन्न क्रिस्टल तन्त्र बनाती हैं। ये एकक कोष्ठिकाएँ निम्नलिखित हैं –
(1) आद्य एकक कोष्ठिकाएँ (Primitive unit cells) – जब अवयवी कण एकक कोष्ठिका के केवल कोनों पर उपस्थित हों तो उसे आद्य एकक कोष्ठिका कहा जाता है।
(2) केन्द्रित एकक कोष्ठिकाएँ (Centred unit cells) – जब एकक कोष्ठिका में एक अथवा अधिक अवयवी कण कोनों के अतिरिक्त अन्य स्थितियों पर भी उपस्थित होते हैं तो उसे केन्द्रित एकक कोष्ठिका कहते हैं। केन्द्रित एकक कोष्ठिकाएँ निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं –
1. अन्तः-केन्द्रित एकक कोष्ठिका (Body-centred unit cells) – ऐसी एकक कोष्ठिका में एक अवयवी कण (परमाणु, अणु अथवा आयन) कोनों में उपस्थित कणों के अतिरिक्त उसके अन्तःकेन्द्र में होता है।
2. फलक-केन्द्रित एकक कोष्ठिका (Face-centred unit cells) – ऐसी एकक कोष्ठिका में कोनों पर उपस्थित अवयवी कणों के अतिरिक्त एक अवयवी कण प्रत्येक फलके के केन्द्र पर भी होता है।
3. अंत्य-केन्द्रित एकक कोष्ठिका (End-centred unit cells) – ऐसी एकक कोष्ठिका में कोनों पर उपस्थित अवयवी कणों के अतिरिक्त एक अवयवी कण किन्हीं दो विपरीत फलकों के केन्द्र में पाया जाता है।
सात क्रिस्टल तन्त्र (Seven Crystal System) – जब क्रिस्टल जालक में एकक कोष्ठिका के जालक स्थल केवल कोनों पर स्थित होते हैं, तब यह सरल अथवा आद्य एकक कोष्ठिका कहलाती है। क्रिस्टलों के सभी प्रकारों में सात प्रकार की सरल अथवा आद्य एकक कोष्ठिकाएँ होती हैं। ये एकक कोष्ठिकाएँ लम्बाई a, b तथा c और कोण \( \alpha \), \( \beta \) तथा \( \gamma \) द्वारा अभिलक्षणित होती हैं। यह सात क्रिस्टल तन्त्र कहलाता है (चित्र-15)। सभी क्रिस्टलों को इनमें से किसी एक के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। ये सात प्रकार अग्रलिखित हैं –
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र क्रिस्टलों में सात प्रकार की एकक कोष्ठिकाओं को दर्शाता है। इसमें घनीय, द्विसमलम्बाक्ष/चतुष्कोणीय, विषमलम्बाक्ष, एकनताक्ष, त्रिसमनताक्ष, त्रिनताक्ष और षट्कोणीय संरचनाएं शामिल हैं, जो उनकी भुजाओं (a, b, c) और अक्षीय कोणों (α, β, γ) के आधार पर अलग-अलग ज्यामितीय विन्यास दिखाती हैं।
(1) घनीय (Cubic) – इसमें तीनों अक्ष समान लम्बाई की एवं परस्पर समकोण पर होती हैं (a = b = c, सभी कोण = 90°)। इस प्रकार की एकक कोष्ठिका से बने क्रिस्टल घनीय क्रिस्टल कहलाते हैं। उदाहरणार्थ- NaCl, KCl, CaF2, ZnS, हीरा, CsSI आदि ।
(2) चतुष्कोणीय या द्विसमलम्बाक्ष (Tetragonal or Dirhombic) – तीनों अक्ष परस्पर समकोण पर होती हैं, परन्तु केवल दो अक्ष समान लम्बाई की होती हैं (a = b ≠ c, सभी कोण = 90°)। इन क्रिस्टलों के उदाहरण SnO2, TiO2, Sn, यूरिया आदि हैं।
(3) विषमलम्बाक्ष (Orthorhombic) – इसमें तीन असमान अक्ष होती हैं जो परस्पर समकोण पर होती हैं (a ≠ b ≠ c, सभी कोण = 90°)। BaSO4, KNO3 आदि इस प्रकार के क्रिस्टलों के उदाहरण हैं।
(4) एकनताक्ष (Monoclinic) – इसमें असमान लम्बाई की तीन अक्ष होती हैं तथा दो कोण 90° के होते हैं (a ≠ b ≠ c, दो कोण = 90° तथा एक कोण ≠ 90°)। कैल्सियम सल्फेट (CaSO4.2H2O), पोटैशियम मैग्नीशियम सल्फेट [K2Mg(SO4)2.6H2O] आदि एकनताक्ष क्रिस्टलों के कुछ उदाहरण हैं।
(5) त्रिसमनताक्ष अथवा त्रिकोणी (Rhombohedral or Trigonal) – इस प्रकार के क्रिस्टलों में तीनों अक्षों की भुजाएँ समान होती हैं। तीनों अन्तराअक्षीय (interfacial) कोण भी समान होते हैं; परन्तु कोणों का मान 90° नहीं होता है। उदाहरणार्थ- कैल्सियम कार्बोनेट (CaCO3), सोडियम नाइट्रेट (NaNO3), क्वार्ट्ज (SiO2), कैल्साइट आदि ।
(6) त्रिनताक्ष (Triclinic) – इस प्रकार के क्रिस्टलों की संरचना में तीनों अक्षों की तीनों भुजाएँ। असमान होती हैं। तीनों कोण भी असमान होते हैं। कोई भी कोण 90° का नहीं होता है (a ≠ b ≠ c, \( \alpha \) ≠ \( \beta \) ≠ \( \gamma \) ≠ 90°)। उदाहरण- कॉपर सल्फेट (CuSO4), पोटैशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7), बोरिक अम्ल (H3BO3) आदि ।
(7) षट्कोणीय (Hexagonal) – दो अक्षों की भुजाएँ (a तथा b) समान और तीसरे अक्ष की भुजा (c) इन दोनों से भिन्न होती है। दो अक्षीय कोण समान एवं 90° के तथा तीसरा कोण 120° का होता है। (d = b # c, दो कोण = 90° तथा एक कोण = 120°) । उदाहरण- कैल्सियम (Ca), जिंक (Zn), मैग्नीशियम (Mg), मर्करी सल्फाइड (HgS), बर्फ, ग्रेफाइट आदि ।
In simple words: क्रिस्टल तंत्र को इकाई सेल के अक्षों की लम्बाई (a, b, c) और अक्षीय कोणों (α, β, γ) के आधार पर सात मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है। इनमें घनीय, चतुष्कोणीय, विषमलम्बाक्ष, एकनताक्ष, त्रिसमनताक्ष, त्रिनताक्ष और षट्कोणीय शामिल हैं, जिनमें प्रत्येक की अपनी विशिष्ट ज्यामिति होती है।
🎯 Exam Tip: सात क्रिस्टल प्रणालियों के अक्षीय मापदंडों और कोणों को उनके उदाहरणों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीधे अंकों को प्रभावित कर सकता है।
Question 3. निविड संकुलित संरचनाओं से आप क्या समझते हैं? एकविमा, द्विविमा तथा त्रिविमा में निविड संकुलन को समझाइए ।
Answer:
निविड संकुलित संरचनाएँ (Close-packed Structures)
ठोसों में अवयवी कण निविड संकुलित होते हैं तथा उनके मध्य न्यूनतम रिक्त स्थान होता है। ये संरचनाएँ निविड संकुलित संरचनाएँ कहलाती हैं (यदि हम अवयवी कणों को समरूप कठोर गोले मानें जो एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं)।
एकविमा में निविड संकुलन (Close Packing in One Dimension) जब कणों को प्रदर्शित करने वाले गोले एक पंक्ति में एक-दूसरे को स्पर्श करते हुए व्यवस्थित किए जाते हैं, तब यह एकविमा में निविड का संकुलन कहलाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एकविमा में गोलों के निविड संकुलन को दर्शाता है। इसमें गोले एक सीधी पंक्ति में एक-दूसरे को स्पर्श करते हुए व्यवस्थित हैं, जो एक-आयामी संकुलन को प्रदर्शित करता है।
द्विविमा में निविड संकुलन (Close Packing in Two Dimension) द्विविमीय निविड संकुलित संरचना निविड संकुलित गोलों की पंक्तियों को एकसाथ व्यवस्थित करके प्राप्त की जा सकती है। इसे निम्नलिखित दो भिन्न प्रकार से किया जा सकता है – (1) प्रथम विधि के अन्तर्गत द्वितीय पंक्ति को प्रथम के सम्पर्क में इस प्रकार रखा जा सकता है कि द्वितीय पंक्ति के गोले प्रथम पंक्ति के गोलों के ठीक ऊपर हों तथा दोनों पंक्तियों के गोले क्षैतिजीय तथा साथ ही ऊध्वाधर रूप से संरेखित हों। यदि प्रथम पंक्ति को 'A' प्रकार की पंक्ति माना जाए तो द्वितीय पंक्ति प्रथम पंक्ति के ठीक समान होने के कारण, वह भी 'A' प्रकार की होगी। इसी प्रकार से अधिक पंक्तियों को रखकर AAA.... प्रकार की व्यवस्था प्राप्त की जा सकती है।
इसे चित्र-17 (a) में दिखाया गया है। स्पष्ट है कि इस व्यवस्था में प्रत्येक गोला चार निकटवर्ती गोलों के सम्पर्क में रहता है। इस प्रकार द्विविमीय उपसहसंयोजन संख्या चार है। साथ ही यदि इन सन्निकट चार गोलों के केन्द्रों को जोड़ा जाए तो एक वर्ग प्राप्त होता है। अतः इस संकुलन को द्विविमा में वर्ग निविड संकुलन (square close packing in two dimension) कहा जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र द्विविमा में निविड संकुलन के दो प्रकार (a) वर्ग निविड संकुलन और (b) षट्कोणीय निविड संकुलन को दर्शाता है। चित्र (a) में, गोले एक सीधी रेखा में व्यवस्थित हैं, जिससे वर्ग बनता है और प्रत्येक गोला चार अन्य गोलों को स्पर्श करता है। चित्र (b) में, गोले एक षट्कोणीय पैटर्न में व्यवस्थित हैं, जिससे प्रत्येक गोला छह अन्य गोलों को स्पर्श करता है।
(2) द्वितीय विधि के अन्तर्गत द्वितीय पंक्ति को प्रथम के ऊपर एकसमान रूप से इस प्रकार रखा जा सकता है कि उसके गोले प्रथम पंक्ति के अवनमनों में भली-भाँति व्यवस्थित हो जाएँ। यदि प्रथम पंक्ति के गोलों की व्यवस्था को 'A' प्रकार कहा जाए तो द्वितीय पंक्ति जो कि भिन्न है, उसे 'B' प्रकार कहा जा सकता है। जब तृतीय पंक्ति को द्वितीय के निकट एकसमान रूप से रखा जाता है तो उसके गोले प्रथम तल के गोलो से संरेखित होते हैं, अतः यह तल भी 'A' प्रकार का है। इसी प्रकार से रखे गए चौथी पंक्ति के गोले द्वितीय पंक्ति ('B' प्रकार) से संरेखित होते हैं, अतः यह व्यवस्था ABAB.... प्रकार की है।
इस व्यवस्था में मुक्त स्थान कम होता है और इसमें संकुलन, वर्ग निविड संकुलन से अधिक दक्ष है। प्रत्येक गोला छह निकटवर्ती गोलों के सम्पर्क में रहता है और द्विविमीय उपसहसंयोजन संख्या छह है। इन छह गोलों के केन्द्र सम-षट्कोण के कोनों पर हैं [चित्र-17 (b)]। इस प्रकार इस संकुलन को द्विविमा में षट्कोणीय निविड संकुलन कहा जाता है। चित्र-17 (b) में स्पष्ट परिलक्षित होता है कि इस तल में कुछ रिक्तियाँ हैं। जो त्रिकोणीय आकृति की हैं। इन्हें त्रिकोणीय रिक्तियाँ कहते हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पंक्ति में त्रिकोण का शीर्ष ऊर्ध्वमुखी और अगली पंक्ति में अधोमुखी होता है।
त्रिविमा में निविड संकुलन (Close Packing in Three Dimension) सभी वास्तविक संरचनाएँ त्रिविम संरचनाएँ होती हैं। इन्हें द्विविमीय परतों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर प्राप्त किया जा सकता है। वर्ग निविड संकुलित तथा षट्कोणीय निविड संकुलित संरचनाओं से त्रिविमीय संरचना निम्नवत् प्राप्त की जा सकती है –
(1) द्विविम वर्ग निविड़ संकुलित परतों से त्रिविम निविड़ संकुलन (Three dimensional close packing from two dimensional square close packed layers) – इसके अन्तर्गत द्वितीय परत को प्रथम परत के ऊपर इस प्रकार रखा जाता है कि ऊपरी परत के गोले प्रथम परत के गोलों के ठीक ऊपर रहें। इस व्यवस्था में दोनों परतों के गोले पूर्णतया क्षैतिज तथा साथ ही ऊध्वाधर रूप से सीध में होते हैं (चित्र-18), इसी प्रकार से हम और परतों को एक-दूसरे के ऊपर रख सकते हैं। यदि प्रथम परत के गोलों की व्यवस्था को 'A' प्रकार कहा जाए तो सभी परतों में समान व्यवस्था होती है। इस प्रकार इस जालक में AAA.... प्रकार का पैटर्न है। इस प्रकार उत्पन्न होने वाला जालक सरल घनीय जालक (simple cubic lattice) और उसकी एकक कोष्ठिका आद्य- घनीय एकक कोष्ठिका (primitive-cubic unit cell) है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र AAA... व्यवस्था से बनने वाले सरल घनीय जालक को दर्शाता है। इसमें गोलों की परतें एक-दूसरे के ठीक ऊपर व्यवस्थित हैं, जिससे एक सरल घनीय संरचना बनती है। सभी परतें समान हैं (A प्रकार), जो त्रिविम वर्ग निविड़ संकुलन को प्रदर्शित करती हैं।
(2) द्विविम-षट्कोणीय निविड संकुलित परतों से त्रिविम निविड संकुलन (Three dimensional close packing from two dimensional-hexagonal close packed layers) – इसमें परतों को एक-दूसरे पर रखकर त्रिविमीय निविड संकुलित संरचना निम्नलिखित प्रकार से प्राप्त की जा सकती है -
(i) द्वितीय परंत को प्रथम परत के ऊपर रखना (Placing the second layer on the first layer) – एक द्विविम-षट्कोणीय निविड संकुलित परत 'A' पर समान परत इस प्रकार रखते हैं कि द्वितीय परत के गोले प्रथम परत के अवनमनों में आ जाएँ। चूंकि दो परतों के गोले भिन्न प्रकार से संरेखित हैं, अतः द्वितीय परत को हम B परत कहते हैं। यह चित्र-19 में देखा जा सकता है कि प्रथम परत की सभी त्रिकोणीय रिक्तियाँ द्वितीय परत के गोलों से आवृत नहीं हैं। इससे अलग-अलग व्यवस्थाओं की उत्पत्ति होती है। जब भी द्वितीय परत का एक गोला प्रथम परत की रिक्ति के ऊपर होता है, तब एक चतुष्फलकीय रिक्ति बनती है। चित्र-19 में इन्हें 'T' से दर्शाया गया है।
अन्य स्थानों पर द्वितीय परत की त्रिकोणीय रिक्तियाँ प्रथम परत की त्रिकोणीय रिक्तियों के ऊपर हैं और इनकी त्रिकोणीय आकृतियाँ अतिव्यापित नहीं होती हैं। उनमें से एक में त्रिकोण का शीर्ष ऊर्ध्वमुखी और दूसरे में अधोमुखी होता है। इन रिक्तियों को चित्र-19 में 'O' से दर्शाया गया है। ये रिक्तियाँ छह गोलों से घिरी होती हैं तथा इन्हें अष्टफलकीय रिक्तियाँ कहा जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र निविड संकुलित गोलों की दो परतों से बनने वाले एक स्तम्भ और उनमें जनित होने वाली रिक्तियों को दर्शाता है। इसमें T चतुष्फलकीय रिक्ति और O अष्टफलकीय रिक्ति को इंगित करता है, जिससे छात्र इन रिक्ति स्थानों की पहचान कर सकते हैं।
(ii) तृतीय परत को द्वितीय परत पर रखना (Placing the third layer on the second layer) – इस स्थिति में दो सम्भावनाएँ होती हैं –
(क) द्वितीय परत की चतुष्फलकीय रिक्तियों को तृतीय परत के गोलों द्वारा आच्छादित किया जा सकता है। इस स्थिति में तृतीय परत के गोले प्रथम परत के गोलों के साथ पूर्णतः संरेखित होते हैं। इस प्रकार गोलों का पैटर्न एकान्तर परतों में
पुनरावृत्त होता है। इस पैटर्न को प्राय: ABAB... पैटर्न लिखा जाता है तथा इस संरचना को षट्कोणीय निविड संकुलित (hcp) संरचना कहते हैं। अनेक धातुओं; जैसे- मैग्नीशियम और जिंक में परमाणुओं की व्यवस्था hcp प्रकार की होती है।
(ख) तृतीय परत को द्वितीय परत पर इस प्रकार रखा जा सकता है कि गोले अष्टफलकीय रिक्तियों को आच्छादित करते हों। इस प्रकार से रखने पर तृतीय परत के गोले प्रथम अथवा द्वितीय किसी भी परत के साथ संरेखित नहीं होते। इस व्यवस्था को 'C' प्रकार कहा जाता है। केवल चौथी परत रखने पर उसके गोले प्रथम परत के गोलों के साथ संरेखित होते हैं। इस प्रकार के पैटर्न को प्राय: ABCABC.... लिखा जाता है। इस संरचना को घनीय निविड संकुलित संरचना (ccp) अथवा फलक-केन्द्रित घनीय (fcc) संरचना कहा जाता है। कुछ धातुएँ जैसे ताँबा तथा चाँदी इस संरचना में क्रिस्टलीकृत होते हैं।
In simple words: निविड संकुलित संरचनाएँ वे होती हैं जिनमें अवयवी कण न्यूनतम रिक्त स्थान के साथ व्यवस्थित होते हैं। इन्हें एकविमा (एक पंक्ति), द्विविमा (दो प्रकार: वर्ग और षट्कोणीय) और त्रिविमा (तीन प्रकार: सरल घनीय, षट्कोणीय निविड संकुलित और घनीय निविड संकुलित) में समझा जा सकता है, जो कणों की व्यवस्था पर आधारित होता है।
🎯 Exam Tip: एकविमा, द्विविमा और त्रिविमा में निविड संकुलन के विभिन्न प्रकारों और उनके पैटर्न (जैसे AAA, ABAB, ABCABC) को समझना और याद रखना महत्वपूर्ण है। रिक्तियों और उनके प्रकारों को भी ध्यान में रखें।
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