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Detailed Chapter 8 आकर्षण-शक्ति UP Board Solutions for Class 11 Physics
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Class 11 Physics Chapter 8 आकर्षण-शक्ति UP Board Solutions PDF
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 8 Gravitation (गुरुत्वाकर्षण)
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर
Question 1. निम्नलिखित के उत्तर दीजिए (a) आप किसी आवेश का वैद्युत बलों से परिरक्षण उस आवेश को किसी खोखले चालक के भीतर रखकर कर सकते हैं। क्या आप किसी पिण्ड का परिरक्षण, निकट में रखे पदार्थ के गुरुत्वीय प्रभाव से, उसे खोखले गोले में रखकर अथवा किसी अन्य साधनों द्वारा कर सकते हैं? (b) पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाले छोटे अन्तरिक्षयान में बैठा कोई अन्तरिक्ष यात्री गुरुत्व बल का संसूचन नहीं कर सकता। यदि पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाला अन्तरिक्ष स्टेशन आकार में बड़ा है, तब क्या वह गुरुत्व बल के संसूचन की आशा कर सकता है? (c) यदि आप पृथ्वी पर सूर्य के कारण गुरुत्वीय बल की तुलना पृथ्वी पर चन्द्रमा के कारण गुरुत्व बल से करें, तो आप यह पाएँगे कि सूर्य का खिंचाव चन्द्रमा के खिंचाव की तुलना में अधिक है (इसकी जाँच आप स्वयं आगामी अभ्यासों में दिए गए आँकड़ों की सहायता से कर सकते हैं) तथापि चन्द्रमा के खिंचाव का ज्वारीय प्रभाव सूर्य के ज्वारीय प्रभाव से अधिक है। क्यों?
Answer: (a) गुरुत्वीय प्रभाव से किसी पिण्ड का परिरक्षण किसी भी प्रकार से अथवा साधन से नहीं किया जा सकता।
(b) हाँ, यदि अन्तरिक्ष स्टेशन पर्याप्त रूप में बड़ा है तो यात्री उस स्टेशन के कारण गुरुत्व बल का संसूचन कर सकता है।
(c) किसी ग्रह के कारण ज्वारीय प्रभाव दूरी के घन के व्युत्क्रमानुपाती होता है; अतः यह गुरुत्वीय बल से मुक्त है। चूंकि सूर्य की पृथ्वी से दूरी, चन्द्रमा की पृथ्वी से दूरी की तुलना में बहुत अधिक है; अतः चन्द्रमा के कारण ज्वारीय प्रभाव अधिक होता है।
In simple words:
(a) गुरुत्वाकर्षण को किसी भी तरह से ढालना संभव नहीं है।
(b) हाँ, बड़े अंतरिक्ष स्टेशन में बैठे यात्री गुरुत्वाकर्षण महसूस कर सकते हैं क्योंकि स्टेशन के अंदर गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में भिन्नता हो सकती है।
(c) ज्वारीय प्रभाव दूरी के घन के व्युत्क्रमानुपाती होता है, और चूंकि चंद्रमा पृथ्वी के बहुत करीब है, इसका ज्वारीय प्रभाव सूर्य की तुलना में अधिक होता है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वाकर्षण परिरक्षण की अवधारणा विद्युत परिरक्षण से भिन्न है। ज्वारीय बल और गुरुत्वाकर्षण बल की दूरी पर निर्भरता को समझें।
Question 2. सही विकल्प का चयन कीजिए (a) बढ़ती तुंगता के साथ गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता-घटता है।
(b) बढ़ती गहराई के साथ (पृथ्वी को एकसमान घनत्व का गोला मानकर) गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता-घटता है।
(c) गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के द्रव्यमान-पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता।
(d) पृथ्वी के केन्द्र से r2, तथा r1 दूरियों के दो बिन्दुओं के बीच स्थितिज ऊर्जा- अन्तर के लिए सूत्र - G Mm (1-r2 -1-r1) सूत्र mg (r2 - r1) से अधिक-कम यथार्थ है।
Answer: (a) घटता है।
(b) घटता है ।
(c) पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता ।
(d) अधिक यथार्थ है।
In simple words:
(a) ऊंचाई बढ़ने पर गुरुत्वाकर्षण त्वरण घटता है।
(b) पृथ्वी की गहराई में जाने पर भी यह घटता है।
(c) गुरुत्वाकर्षण त्वरण वस्तु के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता।
(d) स्थितिज ऊर्जा के लिए गुरुत्वाकर्षण सूत्र \( -G M m (\frac{1}{r_2} - \frac{1}{r_1}) \) ज्यादा सटीक है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वाकर्षण त्वरण (g) ऊंचाई और गहराई दोनों के साथ बदलता है, जबकि यह वस्तु के द्रव्यमान से स्वतंत्र होता है। गुरुत्वाकर्षण स्थितिज ऊर्जा का सूत्र हमेशा गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध किए गए कार्य का प्रतिनिधित्व करता है।
Question 3. मान लीजिए एक ऐसा ग्रह है जो सूर्य के परितः पृथ्वी की तुलना में दोगुनी चाल से गति करता है, तब पृथ्वी की कक्षा की तुलना में इसका कक्षीय आमाप क्या है?
Answer: हल- माना पृथ्वी का परिक्रमण काल = \( T_E \)
तब ग्रह का परिक्रमण काल \( T_p = \frac { { T }_{ E } }{ 2 } \) (दिया है)
माना इनके कक्षीय आमाप क्रमशः \( R_E \) तथा \( R_p \) हैं,
\( T^2 \propto R^3 \) से,
\( \frac{T_p^2}{T_E^2} = \frac{R_p^3}{R_E^3} \)
\( \frac{R_p}{R_E} = \left(\frac{T_p}{T_E}\right)^{2/3} \)
अर्थात् ग्रह का आमाप पृथ्वी के आमाप से
\( R_p = R_E \left(\frac{1}{2}\right)^{2/3} = 0.631 R_E \)
0.631 गुना छोटा है।
In simple words: यदि कोई ग्रह पृथ्वी की तुलना में दोगुनी गति से सूर्य के चारों ओर घूमता है, तो केप्लर के तीसरे नियम के अनुसार, उसकी कक्षीय त्रिज्या पृथ्वी की त्रिज्या के 0.631 गुना होगी।
🎯 Exam Tip: केप्लर के तीसरे नियम \( T^2 \propto R^3 \) का उपयोग करें और ध्यान दें कि कक्षीय चाल दोगुनी होने का अर्थ है परिक्रमण काल आधा हो गया है।
Question 4. बृहस्पति के एक उपग्रह, आयो (Io) की कक्षीय अवधि 1.769 दिन तथा कक्षा की त्रिज्या 4.22×108 m है। यह दर्शाइए कि बृहस्पति का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 गुना है।
Answer: हल- बृहस्पति के उपग्रह का परिक्रमण काल
\( T = 2\pi \sqrt{\frac{r^3}{GM_J}} \) [जहाँ \( M_J \) = बृहस्पति (Jupiter) का द्रव्यमान]
दोनों पक्षों का वर्ग करने पर,
\( T^2 = \frac{4\pi^2 r^3}{GM_J} \)
\( M_J = \frac{4\pi^2 r^3}{T^2 G} \quad ...(1) \)
यहाँ कक्षा की त्रिज्या, \( r = 4.22 \times 10^8 \) मीटर
कक्षीय अवधि अर्थात् परिक्रमण काल
\( T = 1.769 \) दिन \( = 1.769 \times 24 \times 60 \times 60 \) सेकण्ड
\( = 1.53 \times 10^5 \) सेकण्ड
\( M_J = \frac{4 \times (3.14)^2 (4.22 \times 10^8)^3}{(1.53 \times 10^5)^2 \times (6.67 \times 10^{-11})} \) किग्रा
\( = 1.90 \times 10^{27} \) किग्रा
परन्तु सूर्य का द्रव्यमान \( M_S = 1.99 \times 10^{30} \) किग्रा
\( \frac{M_J}{M_S} = \frac{1.90 \times 10^{27} \text{ किग्रा}}{1.99 \times 10^{30} \text{ किग्रा}} = \frac{1}{10^3} = \frac{1}{1000} \)
अर्थात्
\( M_J = \left(\frac{1}{1000}\right) M_S \) (यही सिद्ध करना था)
In simple words: केप्लर के तीसरे नियम और गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक का उपयोग करके, बृहस्पति के उपग्रह आयो की कक्षीय अवधि और त्रिज्या से बृहस्पति का द्रव्यमान \( 1.90 \times 10^{27} \) किग्रा ज्ञात किया जा सकता है, जो सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 गुना है।
🎯 Exam Tip: ग्रहों के द्रव्यमान की गणना के लिए उपग्रहों की कक्षीय गति और केप्लर के तीसरे नियम के अनुप्रयोग को समझें। इकाइयों को S.I. प्रणाली में परिवर्तित करना महत्वपूर्ण है।
Question 5. मान लीजिए कि हमारी आकाशगंगा में एक सौर द्रव्यमान के 2.5×1011 तारे हैं। मंदाकिनीय केन्द्र से 50,000ly दूरी पर स्थित कोई तारा अपनी एक परिक्रमा पूरी करने में कितना समय लेगा? आकाशगंगा का व्यास 105 ly लीजिए ।
Answer: हल- प्रश्नानुसार, तारा आकाशगंगा के परितः \( R = 50,000 \) ly त्रिज्या के वृत्तीय पथ पर घूमती है। आकाशगंगा का द्रव्यमान \( M = 2.5 \times 10^{11} \times \) सौर द्रव्यमान
\( = 2.5 \times 10^{11} \times 2 \times 10^{30} \text{ kg} = 5.0 \times 10^{41} \text{ kg} \)
जबकि
\( R = 50,000 \text{ ly} = 5 \times 10^4 \times 9.46 \times 10^{15} \text{ m} \)
\( = 4.73 \times 10^{20} \text{ m} \)
\( T^2 = \frac{4\pi^2 R^3}{GM} \) से,
\( T = 2\pi \sqrt{\frac{R^3}{GM}} \)
\( = 2 \times 3.14 \times \sqrt{\frac{(4.73 \times 10^{20})^3}{6.67 \times 10^{-11} \times 5.0 \times 10^{41}}} \)
\( = 1.12 \times 10^{16} \text{ s} \)
In simple words: आकाशगंगा के केंद्र के चारों ओर एक तारे के परिक्रमण काल की गणना केप्लर के तीसरे नियम का उपयोग करके की जाती है, जिसमें आकाशगंगा के कुल द्रव्यमान और तारे की केंद्र से दूरी का उपयोग किया जाता है।
🎯 Exam Tip: बड़े खगोलीय पिंडों (जैसे आकाशगंगा) के लिए केप्लर के तीसरे नियम को लागू करते समय, द्रव्यमान और दूरियों को S.I. इकाइयों में सही ढंग से परिवर्तित करना सुनिश्चित करें।
Question 6. सही विकल्प का चयन कीजिए- (a) यदि स्थितिज ऊर्जा का शून्य अनन्त पर है तो कक्षा में परिक्रमा करते किसी उपग्रह की कुल ऊर्जा इसकी गतिज-स्थितिज ऊर्जा का ऋणात्मक है। (b) कक्षा में परिक्रमा करने वाले किसी उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने | के लिए आवश्यक ऊर्जा समान ऊँचाई (जितनी उपग्रह की है) के किसी स्थिर पिण्ड को | पृथ्वी के प्रभाव से बाहर प्रक्षेपित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा से अधिक-कम होती है।
Answer: उत्तर- (a) गतिज ऊर्जा का ऋणात्मक है।
(b) कम होती है।
In simple words:
(a) यदि स्थितिज ऊर्जा को अनंत पर शून्य माना जाए, तो परिक्रमा करते उपग्रह की कुल ऊर्जा उसकी गतिज ऊर्जा के ऋणात्मक के बराबर होती है।
(b) किसी स्थिर वस्तु को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा, उपग्रह को बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा से कम होती है।
🎯 Exam Tip: उपग्रह की कुल ऊर्जा (गतिज + स्थितिज) हमेशा नकारात्मक होती है, जो इसे बंधे हुए सिस्टम में इंगित करती है। पलायन ऊर्जा की तुलना करते समय, ध्यान दें कि स्थिर पिण्ड को प्रारंभिक गतिज ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती।
Question 7. क्या किसी पिण्ड की पृथ्वी से पलायन चाल (a) पिण्ड के द्रव्यमान,
(b) प्रक्षेपण बिन्दु की अवस्थिति,
(c) प्रक्षेपण की दिशा,
(d) पिण्ड के प्रमोचन की अवस्थिति की ऊँचाई पर निर्भर करती है?
Answer: उत्तर- (a) नहीं, (b) नहीं, (c) नहीं, (d) हाँ, निर्भर करती है।
In simple words: किसी वस्तु की पृथ्वी से पलायन चाल उसके द्रव्यमान, प्रक्षेपण बिंदु की अवस्थिति, और प्रक्षेपण की दिशा पर निर्भर नहीं करती, लेकिन यह वस्तु को लॉन्च करने की ऊंचाई पर निर्भर करती है।
🎯 Exam Tip: पलायन वेग की परिभाषा में द्रव्यमान, स्थान और दिशा से स्वतंत्रता को याद रखें, जबकि ऊंचाई से इसका संबंध महत्वपूर्ण है।
Question 8. कोई धूमकेतु सूर्य की परिक्रमा अत्यधिक दीर्घवृत्तीय कक्षा में कर रहा है। क्या अपनी कक्षा में धूमकेतु की शुरू से अन्त तक (a) रैखिक चाल, (b) कोणीय चाल, (c) कोणीय संवेग, (d) गतिज ऊर्जा, (e) स्थितिज ऊर्जा, (f) कुल ऊर्जा नियत रहती है? सूर्य के अति निकट आने पर धूमकेतु के द्रव्यमान में ह्रास को नगण्य मानिए।
Answer: उत्तर- (a) नहीं, (b) नहीं,
(c) हाँ, कोणीय संवेग नियत रहता है,
(d) नहीं, (e) नहीं,
(f) हाँ, कुल ऊर्जा नियत रहती है।
In simple words: दीर्घवृत्तीय कक्षा में धूमकेतु की रैखिक चाल, कोणीय चाल, गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा बदलती रहती है, लेकिन उसका कोणीय संवेग और कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है, बशर्ते कोई बाहरी बल कार्य न कर रहा हो।
🎯 Exam Tip: किसी भी बंद गुरुत्वाकर्षण प्रणाली में कोणीय संवेग और कुल यांत्रिक ऊर्जा (गतिज + स्थितिज) संरक्षित रहती है, जबकि गतिज और स्थितिज ऊर्जा अलग-अलग बदल सकती हैं।
Question 9. निम्नलिखित में से कौन-से लक्षण अन्तरिक्ष में अन्तरिक्ष यात्री के लिए दुःखदायी हो सकते हैं? (a) पैरों में सूजन, (b) चेहरे पर सूजन, (c) सिरदर्द, (d) दिविन्यास समस्या ।
Answer: उत्तर- (b), (c) तथा (d)।
In simple words: अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण अंतरिक्ष यात्रियों को चेहरे पर सूजन, सिरदर्द और दिविन्यास समस्या (संतुलन खोना) जैसे शारीरिक प्रभाव अनुभव हो सकते हैं।
🎯 Exam Tip: अंतरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी (सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण) के मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को समझें, विशेष रूप से तरल पदार्थों के वितरण और आंतरिक कान के संतुलन प्रणाली पर।
Question 10. एकसमान द्रव्यमान घनत्व के अर्द्धगोलीय खोलों द्वारा परिभाषित ढोल के पृष्ठ के केन्द्र पर गुरुत्वीय तीव्रता की दिशा [देखिए चित्र-8.1] (i) a, (ii) b, (iii) c, (iv) 0 में किस तीर द्वारा दर्शाई जाएगी?
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक अर्धगोलीय खोल को दर्शाता है जिसके केंद्र पर गुरुत्वाकर्षण तीव्रता की दिशा को विभिन्न तीरों (a, b, c, d) द्वारा इंगित किया गया है। केंद्र में 'P' बिंदु है और बाहर की ओर तीर लगे हैं।
Answer: उत्तर- यदि हमे गोले को पूरा कर दें तो केन्द्र पर नेट तीव्रता शून्य होगी। इसका यह अर्थ है कि केन्द्र पर दोनों अर्द्धगोलों के कारण तीव्रताएँ परस्पर विपरीत तथा बराबर होंगी। अतः दिशा (iii) c द्वारा प्रदर्शित होगी ।
In simple words: एक अर्धगोलीय खोल के केंद्र पर गुरुत्वीय तीव्रता की दिशा केंद्र से बाहर की ओर, सीधे सतह के लंबवत होगी, जो चित्र में तीर 'c' द्वारा दर्शाई गई है, क्योंकि यदि गोला पूर्ण होता तो केंद्र पर नेट तीव्रता शून्य होती।
🎯 Exam Tip: सममित आकृतियों (जैसे पूर्ण गोला) में गुरुत्वीय क्षेत्र के गुणों को याद रखें; केंद्र पर तीव्रता शून्य होती है। आधे गोले के लिए, तीव्रता असंतुलित गुरुत्वाकर्षण बलों के कारण एक निश्चित दिशा में होती है।
Question 11. उपर्युक्त समस्या में किसी यादृच्छिक बिन्दु P पर गुरुत्वीय तीव्रता किस तीर (i) d, (ii) e, (iii) f, (iv) g द्वारा व्यक्त की जाएगी?
Answer: उत्तर- (ii) e द्वारा प्रदर्शित होगी ।
In simple words: उपर्युक्त अर्धगोलीय खोल की समस्या में, किसी यादृच्छिक बिंदु P पर गुरुत्वीय तीव्रता तीर 'e' द्वारा दर्शाई जाएगी, जो केंद्र की ओर और खोल के अंदर की ओर इंगित करती है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय तीव्रता हमेशा उस बल की दिशा में होती है जो एक इकाई द्रव्यमान पर लगेगा, और यह बल हमेशा द्रव्यमान के केंद्र की ओर निर्देशित होता है।
Question 12. पृथ्वी से किसी रॉकेट को सूर्य की ओर दागा गया है। पृथ्वी के केन्द्र से किस दूरी पर रॉकेट | पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है? सूर्य का द्रव्यमान = 2×1030 kg, पृथ्वी का द्रव्यमान = 6×1024 kg | अन्य ग्रहों आदि के प्रभावों की उपेक्षा कीजिए (कक्षीय त्रिज्या = 1.5×1011 m)।
Answer: हल- माना पृथ्वी के केन्द्र से x मीटर की दूरी पर रॉकेट पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है। इस क्षण रॉकेट की सूर्य से दूरी \( = (r - x) \) मीटर
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पृथ्वी और सूर्य के बीच एक रॉकेट की स्थिति को दर्शाता है। पृथ्वी (द्रव्यमान Me) और सूर्य (द्रव्यमान M) के बीच की कुल दूरी 'r' है। 'P' रॉकेट की स्थिति है, जो पृथ्वी के केंद्र से 'x' दूरी पर है, और सूर्य से \( (r-x) \) दूरी पर है।
जहाँ r = सूर्य तथा पृथ्वी के बीच की दूरी अर्थात् पृथ्वी की कक्षीय त्रिज्या \( = 1.5 \times 10^{11} \) मीटर यह तब भी सम्भव है जबकि
पृथ्वी द्वारा रॉकेट पर आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल = सूर्य द्वारा रॉकेट पर आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल
अर्थात् \( \frac{GM_e m}{x^2} = \frac{GM m}{(r-x)^2} \) (जहाँ m = रॉकेट का द्रव्यमान; \( M_e \) = पृथ्वी का द्रव्यमान)
\( M_e = 6 \times 10^{24} \) किग्रा तथा \( M_S = \) सूर्य का द्रव्यमान \( = 2 \times 10^{30} \) किग्रा)
अतः \( \frac{(r-x)^2}{x^2} = \frac{M_S}{M_e} = \frac{2 \times 10^{30} \text{ किग्रा}}{6 \times 10^{24} \text{ किग्रा}} = \frac{1}{3} \times 10^6 \)
\( \frac{r-x}{x} = \sqrt{\frac{1}{3} \times 10^6} = \frac{10^3}{\sqrt{3}} = \frac{1000}{1.732} = 577.37 \)
अथवा \( r - x = 577.37x \)
या \( 578.37x = r \)
\( x = \frac{r}{578.37} = \frac{1.5 \times 10^{11} \text{ मी}}{578.37} = 2.593 \times 10^8 \text{ मीटर} = 2.6 \times 10^8 \text{ मीटर} \)
In simple words: रॉकेट पर पृथ्वी और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को रद्द कर देंगे, जब रॉकेट पृथ्वी के केंद्र से लगभग \( 2.6 \times 10^8 \) मीटर की दूरी पर होगा।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वाकर्षण शून्य बिंदु ज्ञात करने के लिए दोनों पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बलों को बराबर करें। दूरियों और द्रव्यमानों को सही इकाइयों में व्यक्त करें।
Question 13. आप सूर्य को कैसे तोलेंगे, अर्थात् उसके द्रव्यमान का आकलन कैसे करेंगे? सूर्य के परितः पृथ्वी की कक्षा की औसत त्रिज्या 1.5×108 km है।।
Answer: हल- पृथ्वी के परितः उपग्रह के परिक्रमण काल के सूत्र \( T=2\pi \sqrt { \frac { { r }^{ 3 } }{ { GM }_{e} }} \), के अनुरूप सूर्य के परितः पृथ्वी का परिक्रमण काल
\( T=2\pi \sqrt { \frac { { r }^{ 3 } }{ { GM }_{ S } } } \) (जहाँ \( M_S \) = सूर्य का द्रव्यमान)
In simple words: सूर्य के द्रव्यमान का आकलन करने के लिए, केप्लर के ग्रहों की गति के तीसरे नियम का उपयोग करते हैं, जो किसी ग्रह के परिक्रमण काल, उसकी कक्षीय त्रिज्या और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक से संबंधित है।
🎯 Exam Tip: केप्लर के तीसरे नियम को सही ढंग से लागू करें और सभी मात्राओं को S.I. इकाइयों में परिवर्तित करना सुनिश्चित करें।
Question 14. एक शनि-वर्ष एक पृथ्वी-वर्ष का 29.5 गुना है। यदि पृथ्वी सूर्य से 1.5×108 km दूरी पर है, तो शनि सूर्य से कितनी दूरी पर है?
Answer: हल- पृथ्वी की सूर्य से दूरी \( R_{SE} = 1.5 \times 10^8 \) km
माना पृथ्वी का परिक्रमण काल \( = T_E \)
तब शनि का परिक्रमण काल \( T_S = 29.5 T_E \)
शनि की सूर्य से दूरी \( R_{SS} = ? \)
परिक्रमण कालों के नियम से,
\( \left(\frac{T_S}{T_E}\right)^2 = \left(\frac{R_{SS}}{R_{SE}}\right)^3 \)
अतः
\( \frac{R_{SS}}{R_{SE}} = \left(\frac{T_S}{T_E}\right)^{2/3} \)
\( R_{SS} = R_{SE} \times \left(\frac{T_S}{T_E}\right)^{2/3} \)
\( = 1.5 \times 10^8 \times (29.5)^{2/3} \) km
\( = 1.5 \times 10^8 \times 9.55 \) km \( = 1.43 \times 10^9 \) km
अतः शनि की सूर्य से दूरी \( 1.43 \times 10^9 \) km है।
In simple words: केप्लर के तीसरे नियम का उपयोग करके, यदि पृथ्वी की सूर्य से दूरी और शनि का परिक्रमण काल दिया गया हो, तो शनि की सूर्य से दूरी की गणना की जा सकती है, जो लगभग \( 1.43 \times 10^9 \) km आती है।
🎯 Exam Tip: केप्लर के तीसरे नियम \( T^2 \propto R^3 \) का उपयोग करें। अनुपात को सही ढंग से गणना करें।
Question 15. पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 63N है। पृथ्वी की त्रिज्या की आधी ऊँचाई पर पृथ्वी के कारण इस वस्तु पर गुरुत्वीय बल कितना है?
Answer: हल- यदि पृथ्वी तल पर गुरुत्वीय त्वरण g हो, तो पृथ्वी तल से h ऊँचाई पर गुरुत्वीय त्वरण \( g' = g { \left( 1+\frac { h }{ { R }_{ e } } \right) }^{ -2 } \)
यदि वस्तु का द्रव्यमान m हो तो दोनों पक्षों में m से गुणा करने पर, \( m{ g }^{ ' }=\frac { mg }{ { \left( 1+\frac { h }{ { R }_{ e } } \right) }^{ 2 } } \) (जहाँ \( R_e \) = पृथ्वी की त्रिज्या) यहाँ mg = पृथ्वी के पृष्ठ पर वस्तु का भार = 63 न्यूटन \( mg' \) = पृथ्वी तल से h ऊँचाई पर वस्तु का भार अर्थात् पृथ्वी के कारण वस्तु पर गुरुत्वीय बल \( F_g \) तथा \( h = R_e/2 \)
\( F_g = \frac{63N}{\left(1+\frac{R_e/2}{R_e}\right)^2} = \frac{63 N}{(1+\frac{1}{2})^2} = \frac{63 N}{(3/2)^2} = \frac{63N}{9/4} = \left(\frac{63 \times 4}{9}\right) N = 28 N \)
In simple words: किसी वस्तु का गुरुत्वाकर्षण बल ऊंचाई के साथ घटता है। पृथ्वी की त्रिज्या की आधी ऊंचाई पर, बल मूल मान का 4/9 गुना हो जाएगा, जिससे 28N बल प्राप्त होगा।
🎯 Exam Tip: ऊंचाई के साथ गुरुत्वाकर्षण त्वरण में परिवर्तन के सूत्र \( g' = g (R_e / (R_e+h))^2 \) का उपयोग करें और ध्यान दें कि बल सीधे त्वरण के समानुपाती होता है।
Question 16. यह मानते हुए कि पृथ्वी एकसमान घनत्व का एक गोला है तथा इसके पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 250 N है, यह ज्ञात कीजिए कि पृथ्वी के केन्द्र की ओर आधी दूरी पर इस वस्तु का भार क्या होगा?
Answer: हल- पृथ्वी तल से h गहराई पर गुरुत्वीय त्वरण \( { g }^{ ' }=g\left( 1-\frac { h }{ { R }_{ e } } \right) \) (जहाँ \( R_e \) = पृथ्वी की त्रिज्या)
यहाँ पृथ्वी के पृष्ठ पर वस्तु का भार \( mg = 250 \) N
\( h = R_e/2 \) (जहाँ \( R_e \) = पृथ्वी की त्रिज्या) \( mg' \) = इस गहराई पर वस्तु का भार \( W' \)
\( \therefore W' = 250N \left(1-\frac { \frac { { R }_{ e } }{ 2 } }{ { R }_{ e } } \right) = \left( 250\times \frac { 1 }{ 2} \right) N = 125 \) N
In simple words: पृथ्वी की सतह के नीचे गहराई में जाने पर गुरुत्वाकर्षण बल रैखिक रूप से घटता है। पृथ्वी के केंद्र की ओर आधी दूरी पर, वस्तु का भार अपनी सतह के भार का आधा रह जाएगा, जो 125N होगा।
🎯 Exam Tip: गहराई के साथ गुरुत्वाकर्षण त्वरण में परिवर्तन के सूत्र \( g' = g (1-h/R_e) \) का उपयोग करें। ध्यान दें कि बल सीधे त्वरण के समानुपाती होता है।
Question 17. पृथ्वी के पृष्ठ से ऊर्ध्वाधरतः ऊपर की ओर कोई रॉकेट 5 km s⁻¹ की चाल से दागा जाता है। पृथ्वी पर वापस लौटने से पूर्व यह रॉकेट पृथ्वी से कितनी दूरी तक जाएगा? पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0×1024 kg; पृथ्वी की माध्य त्रिज्या = 6.4×106 m तथा G = 6.67×10-11 N-m²/kg-2.
Answer: हल- माना रॉकेट का द्रव्यमान = m; पृथ्वी से ऊर्ध्वाधरतः ऊपर की ओर रॉकेट का प्रक्षेप्य वेग \( v = 5 \) किमी-से\(^{-1} = 5 \times 10^3 \) मी-से\(^{-1} \)
माना रॉकेट पृथ्वी पर वापस लौटने से पूर्व पृथ्वी से अधिकतम दूरी H ऊँचाई तक जाता है। अतः इस ऊँचाई पर रॉकेट का वेग शून्य हो जाता है।
ऊर्जा संरक्षण सिद्धान्त से पृथ्वी तल से महत्तम ऊँचाई पर पहुँचने पररॉकेट की गतिज ऊर्जा में कमी = उसकी गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि –
\( \frac{1}{2} mv^2 - 0 = -\frac{GM_e m}{R_e+H} - \left(-\frac{GM_e m}{R_e}\right) \)
अथवा
\( \frac{1}{2} mv^2 = GM_e m \left(\frac{1}{R_e} - \frac{1}{R_e+H}\right) = GM_e m \left(\frac{R_e+H-R_e}{R_e(R_e+H)}\right) \)
अथवा
\( \frac{1}{2} mv^2 = \frac{GM_e mH}{R_e(R_e+H)} \)
अथवा \( v^2 = \frac{2GM_e H}{R_e^2 + R_e H} \)
वज्रगुणन करके सरल करने पर, \( H = \frac{R_e^2 v^2}{2GM_e - R_e v^2} \)
इस सूत्र में ज्ञात मान रखने पर,
\( H = \frac{(6.4 \times 10^6)^2 (5 \times 10^3)^2}{2 \times (6.67 \times 10^{-11}) \times (6.0 \times 10^{24}) - (6.4 \times 10^6) (5 \times 10^3)^2} \) मीटर
\( = 1.6 \times 10^6 \) मीटर \( = 1600 \times 10^3 \) मीटर \( = 1600 \) किमी
In simple words: ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत का उपयोग करके, हम रॉकेट द्वारा पृथ्वी की सतह से तय की गई अधिकतम ऊंचाई की गणना कर सकते हैं। गतिज ऊर्जा में कमी स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि के बराबर होती है।
🎯 Exam Tip: पलायन वेग से कम वेग पर प्रक्षेपित रॉकेट के लिए अधिकतम ऊंचाई की गणना करते समय ऊर्जा संरक्षण के नियम का उपयोग करें। सही इकाइयों का उपयोग करें।
Question 18. पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी प्रक्षेप्य की पलायन चाल 11.2 kms⁻¹ है। किसी वस्तु को इस चाल की तीन गुनी चाल से प्रक्षेपित किया जाता है। पृथ्वी से अत्यधिक दूर जाने पर इस वस्तु की चाल क्या होगी? सूर्य तथा अन्य ग्रहों की उपस्थिति की उपेक्षा कीजिए ।
Answer: हल- पृथ्वी के पृष्ठ पर पलायन चाल \( \nu_e = \sqrt { \frac { 2G M_e }{ R_e } } \quad ...(1) \)
यहाँ पृथ्वी के पृष्ठ पर वस्तु का प्रक्षेप्य वेग \( v = 3\nu_e \);
माना पृथ्वी से अत्यधिक दूर (अनन्त पर) चाल \( = \nu_f \)
ऊर्जा संरक्षण के सिद्धान्त से, पृथ्वी तल पर कुल ऊर्जा = अनन्त पर कुल ऊर्जा
अर्थात् पृथ्वी तल पर (गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा) = अनन्त पर (गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा)
\( \frac{1}{2} mv^2 + \left(-\frac{GM_e m}{R_e}\right) = \frac{1}{2} m\nu_f^2 + \left(-\frac{GM_e m}{\infty}\right) \)
अथवा
\( \frac{1}{2} m(3\nu_e)^2 - \frac{GM_e m}{R_e} = \frac{1}{2} m\nu_f^2 \)
परन्तु समीकरण (1) से, \( \frac{GM_e}{R_e} = \nu_e^2 \)
\( \frac{1}{2} m (9\nu_e^2) - m\nu_e^2 = \frac{1}{2} m\nu_f^2 \)
\( 9\nu_e^2 - 2\nu_e^2 = \nu_f^2 \)
\( 7\nu_e^2 = \nu_f^2 \)
या \( \nu_f = \nu_e \sqrt{7} \)
\( \nu_e = 11.2 \) किमी/सेकण्ड
\( \nu_f = 11.2 \) किमी/सेकण्ड \( \times \sqrt{7} \)
\( = 11.2 \times 2.645 \) किमी/सेकण्ड
\( = 29.624 \) किमी/सेकण्ड
In simple words: ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत का उपयोग करके, हम पृथ्वी से अत्यधिक दूर जाने पर वस्तु की अंतिम चाल की गणना कर सकते हैं। यदि इसे पलायन चाल के तीन गुना वेग से प्रक्षेपित किया जाता है, तो इसकी अंतिम चाल पलायन चाल के \( \sqrt{7} \) गुना होगी।
🎯 Exam Tip: पलायन वेग की अवधारणा को समझें और ऊर्जा संरक्षण के नियम का उपयोग करके यह निर्धारित करें कि वस्तु अनंत पर कितनी गतिज ऊर्जा के साथ यात्रा करेगी।
Question 19. कोई उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से 400 km ऊँचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। इस उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने में कितनी ऊर्जा खर्च होगी? उपग्रह का द्रव्यमान = 200 kg; पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0×1024 kg; पृथ्वी की त्रिज्या = 6.4×106 m तथा G = 6.67×10-11 N m² kg-2.
Answer: हल- पृथ्वी के परितः उपग्रह की कक्षा की त्रिज्या \( r = R_e + h \)
\( r = 6.4 \times 10^6 \) मीटर \( + 400 \times 10^3 \) मीटर
\( = 68 \times 10^5 \) मीटर \( = 6.8 \times 10^6 \) मीटर
अतः इस कक्षा में घूमते हुए उपग्रह की कुल ऊर्जा
\( E=-\left( \frac { { GM }_{ e }m }{ 2r } \right) \)
(जहाँ m = उपग्रह का द्रव्यमान, \( M_e \) = पृथ्वी का द्रव्यमान)
पृथ्वी के. गुरुत्वीय प्रभाव से उपग्रह को बाहर निकालने के लिए इसको दी जाने वाली आवश्यक ऊर्जा
\( E_B = -E = +\frac{GM_e m}{2r} \)
(चूँकि बाहर निकलने पर उपग्रह की कुल ऊर्जा = शून्य)
ज्ञात मान रखने पर,
आवश्यक ऊर्जा (बन्धन ऊर्जा)
\( E_B = \frac{(6.67 \times 10^{-11}) (6.0 \times 10^{24}) \times 200}{2 \times 6.8 \times 10^6} \) जूल
\( = 5.89 \times 10^9 \) जूल
In simple words: उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा उसकी बंधन ऊर्जा के बराबर होती है, जो उसकी कुल नकारात्मक ऊर्जा का धनात्मक मान होता है।
🎯 Exam Tip: कुल ऊर्जा (E) और बंधन ऊर्जा (EB) के बीच संबंध को समझें, जहाँ EB = -E होता है। r की सही गणना \( R_e + h \) के रूप में करें।
Question 20. दो तारे, जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान (2×1030 kg) के बराबर है, एक-दूसरे की ओर सम्मुख टक्कर के लिए आ रहे हैं। जब वे 109 km दूरी पर हैं तब इनकी चाल उपेक्षणीय है। ये तारे किस चाल से टकराएँगे? प्रत्येक तारे की त्रिज्या 104 km है। यह मानिए कि टकराने के पूर्व तक तारों में कोई विरूपण नहीं होता (G के ज्ञात मान का उपयोग कीजिए)।
Answer: हल- दिया है, प्रत्येक तारे को द्रव्यमान (माना) \( M = 2 \times 10^{30} \) किग्रा तथा तारों के बीच प्रारम्भिक दूरी (माना) \( r_1 = 10^9 \) किमी \( = 10^{12} \) मी ।
तारों की प्रारम्भिक कुल ऊर्जा \( E_i \) = प्रारम्भिक गतिज ऊर्जा + प्रारम्भिक स्थितिज ऊर्जा
\( =0+\left[ -\frac { GMM }{ { r }_{ 1 } } \right] =-\left[ \frac { { GM }^{ 2 } }{ {r}_{1}} \right] \)
जब दोनों तारे परस्पर टकराते हैं, तो उनके बीच की दूरी \( r_2 = 2 \times \) तारे की त्रिज्या \( = 2R \) यदि तारों का ठीक टकराने से पूर्व वेग v हो अर्थात् वे v चाल से टकराते हैं, तो तारों की कुल अन्तिम ऊर्जा \( E_f \) = अन्तिम गतिज ऊर्जा + अन्तिम स्थितिज ऊर्जा
\( E_f = 2 \times \left(\frac{1}{2} Mv^2\right) + \left(-\frac{GMM}{2R}\right) = Mv^2 - \frac{GM^2}{2R} \)
• ऊर्जा संरक्षण सिद्धान्त से, \( E_i = E_f \)
\( -\frac{GM^2}{r_1} = Mv^2 - \frac{GM^2}{2R} \)
अथवा
\( -\frac{GM}{r_1} = v^2 - \frac{GM}{2R} \)
अथवा \( v^2 = GM \left( \frac{1}{2R} - \frac{1}{r_1} \right) \)
अब ज्ञात मान रखने पर,
\( v^2 = (6.67 \times 10^{-11}) (2 \times 10^{30}) \times \left( \frac{1}{2 \times 10^7} - \frac{1}{10^{12}} \right) \)
\( = 6.67 \times 10^{12} \)
\( v = \sqrt{6.67 \times 10^{12}} \) मी/से \( = 2.58 \times 10^6 \) मी/से
In simple words: ऊर्जा संरक्षण के नियम का उपयोग करके, हम टकराने से ठीक पहले तारों की चाल ज्ञात कर सकते हैं। चूंकि प्रारंभिक गतिज ऊर्जा शून्य है, इसलिए कुल ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा में कमी के बराबर होगी जो गतिज ऊर्जा में बदल जाती है।
🎯 Exam Tip: ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत को लागू करें, प्रारंभिक और अंतिम ऊर्जाओं को सही ढंग से लिखें। टक्कर के समय दूरी \( 2R \) होती है।
Question 21. दो भारी गोले जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 100 kg तथा त्रिज्या 0.10 m है किसी क्षैतिज मेज पर एक-दूसरे से 1.0 m दूरी पर स्थित हैं। दोनों गोलों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा । के मध्य बिन्दु पर गुरुत्वीय बल तथा विभव क्या है? क्या इस बिन्दु पर रखा कोई पिण्ड सन्तुलन में होगा? यदि हाँ, तो यह सन्तुलन स्थायी होगा अथवा अस्थायी?
Answer: हल- प्रत्येक गोले का द्रव्यमान इसके केन्द्र पर निहित माना जा सकता है। अतः \( r = 1.0 \) मीटर तथा \( m_A = m_B = 100 \) किग्रा
दोनों गोलों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा के मध्य बिन्दु M की प्रत्येक गोले के केन्द्र से
दूरी \( r_A = r_B = \frac{1.0 \text{ मा}}{2} = 0.5 \) मीटर
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र दो गोलों (A और B) को दर्शाता है, जिनके केंद्र \( C_A \) और \( C_B \) हैं और उनके द्रव्यमान \( M_A \) और \( M_B \) हैं। उनके बीच की कुल दूरी 1.0 मीटर है। बिंदु M उनके केंद्र को मिलाने वाली रेखा का मध्य बिंदु है।
गोले A के कारण बिन्दु M पर गुरुत्वीय बल क्षेत्र (गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता) –
\( |I_A| = I_A = \frac{G m_A}{r_A^2} \) [दिशा M से \( C_A \) की दिशा में] ...(1)
गोले B के कारण बिन्दु M पर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता -
\( |I_B| = I_B = \frac{G m_B}{r_B^2} \) [दिशा M से \( C_B \) की दिशा में] ...(2)
यहाँ \( m_A = m_B \) तथा \( r_A = r_B \), अतः समीकरण (1) तथा समीकरण (2) से स्पष्ट है कि
\( |I_A| = |I_B| \). इसके साथ-साथ यह भी स्पष्ट है कि \( I_A \) तथा \( I_B \) दोनों परस्पर विपरीत दिशा में हैं।
अतः ये एक-दूसरे को निरस्त कर देगी। इसलिए M पर परिणामी गुरुत्व क्षेत्र की तीव्रता = शून्य । परन्तु गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता की परिभाषा से यह M बिन्दु पर रखे एकांक द्रव्यमान पर लगने वाले गुरुत्वीय बल को व्यक्त करेगी। इसलिए गोले के मध्य बिन्दु M पर रखे किसी भी पिण्ड पर गुरुत्वीय बल शून्य होगा। गोले A के कारण बिन्दु M पर गुरुत्वीय विभव
\( V_A = -G\frac{m_A}{r_A} = -G\left(\frac{100}{0.5}\right) \) जूल/किग्रा \( = -200G \) जूल/किग्रा
गोले B के कारण बिन्दु M पर गुरुत्वीय विभव
\( V_B = -G\frac{m_B}{r_B} = -G\left(\frac{100}{0.5}\right) \) जूल/किग्रा \( = -200G \) जूल/किग्रा
बिन्दु M पर परिणामी गुरुत्वीय विभव \( V = V_A + V_B \)
\( = [(-200G) + (-200G)] \) जूल/किग्रा
\( = -400G \) जूल/किग्रा
\( = -400 \times 6.67 \times 10^{-11} \) जूल/किग्रा
\( = -2.668 \times 10^{-8} \) जूल/किग्रा
\( \approx -2.67 \times 10^{-8} \) जूल/किग्रा
चूँकि ऊपर सिद्ध किया जा चुका है
कि मध्य बिन्दु M पर रखे किसी भी पिण्ड पर परिणामी गुरुत्वीय बल = शून्य अतः मध्य बिन्दु M पर रखा पिण्ड सन्तुलन में होगा।। अब यदि पिण्ड को थोड़ा-सा मध्य बिन्दु से किसी भी गोले की ओर विस्थापित कर दिया जाये तो वह एक नेट गुरुत्वीय बल के कारण इस बिन्दु से दूर विस्थापित होता चला जायेगा। अतः पिण्ड का सन्तुलन अस्थायी है।
In simple words: दोनों गोलों के मध्य बिंदु पर गुरुत्वीय बल शून्य होगा क्योंकि बल विपरीत दिशा में बराबर होते हैं, लेकिन विभव गैर-शून्य और नकारात्मक होता है। संतुलन अस्थायी होगा, क्योंकि थोड़ी-सी भी विस्थापन वस्तु को केंद्र से दूर धकेल देगा।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता और गुरुत्वीय विभव के बीच के अंतर को समझें। संतुलन की स्थिरता निर्धारित करने के लिए छोटे विस्थापन के बाद बल की दिशा का विश्लेषण करें।
अतिरिक्त अभ्यास
Question 22. जैसा कि आपने इस अध्याय में सीखा है कि कोई तुल्यकाली उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से लगभग 36,000 km ऊँचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इस उपग्रह के निर्धारित स्थल पर पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण विभव क्या है? (अनन्त पर स्थितिज ऊर्जा शून्य लीजिए) पृथ्वी का द्रव्यमान= 6.0×1024 kg, पृथ्वी की त्रिज्या= 6400 km.
Answer: हल- दिया है : पृथ्वी की त्रिज्या \( R_e = 6400 \) km \( = 6.4 \times 10^6 \) m,
पृथ्वी तल से ऊँचाई \( h = 360 \times 10^6 \) m,
पृथ्वी का द्रव्यमान \( M_e = 6.0 \times 10^{24} \) kg
उपग्रह के निर्धारित स्थल पर गुरुत्वीय विभव ।
\( V = -\frac{GM_e}{R_e+h} \)
\( = -\frac{6.67 \times 10^{-11} \times 6.0 \times 10^{24}}{(6.4 \times 10^6 + 360 \times 10^6)} \)
\( = -9.4 \times 10^6 \) J kg\(^{-1} \)
In simple words: भू-स्थिर उपग्रह की ऊंचाई पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण विभव की गणना करने के लिए, गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक, पृथ्वी के द्रव्यमान और उपग्रह की पृथ्वी के केंद्र से कुल दूरी का उपयोग करते हैं।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वाकर्षण विभव के सूत्र \( V = -GM / r \) का उपयोग करें, जहाँ r पृथ्वी के केंद्र से उपग्रह की कुल दूरी \( (R_e+h) \) है।
Question 23. सूर्य के द्रव्यमान से 2.5 गुने द्रव्यमान का कोई तारा 12 km आमाप से निपात होकर 1.2 परिक्रमण प्रति सेकण्ड से घूर्णन कर रहा है (इसी प्रकार के संहत तारे को न्यूट्रॉन तारा कहते हैं। कुछ प्रेक्षित तारकीय पिण्ड, जिन्हें पल्सार कहते हैं, इसी श्रेणी में आते हैं)। इसके विषुवत वृत्त पर रखा कोई पिण्ड, गुरुत्व बल के कारण, क्या इसके पृष्ठ से चिपका रहेगा? (सूर्य का द्रव्यमान = 2×1030 kg)
Answer: हल- घूर्णन करते तारे की विषुवतं तल पर रखे पिण्ड पर निम्न दो बल कार्य करते हैं
(i) गुरुत्वीय बल \( F_G = mg \) (अन्दर की ओर)
(ii) अपकेन्द्र बल \( F_e = m\omega^2 R \)
अब तारे पर गुरुत्वीय त्वरण \( g = \frac{GM}{R^2} \)
\( g = \frac{G(2.5M_S)}{R^2} \)
परन्तु यहाँ सूर्य का द्रव्यमान \( M_S = 2 \times 10^{30} \) किग्रा
तथा तारे की त्रिज्या \( R = 12 \) किमी \( = 12 \times 10^3 \) मीटर
\( g = \frac{(6.67 \times 10^{-11}) (2.5 \times 2 \times 10^{30})}{(12 \times 10^3)^2} \) मी/से\(^2 \)
\( = 2.3 \times 10^{12} \) मी/से\(^2 \)
अतः गुरुत्वीय बल \( F_G = m \times g = m \times 2.3 \times 10^{12} \) न्यूटन
तारे पर अपकेन्द्र बल \( F_e = m\omega^2 R = m (2\pi n)^2 R = 4\pi^2 n^2 mR \)
\( = 4 \times (3.14)^2 \times (1.2)^2 \times m \times (12 \times 10^3) \) न्यूटन
\( = 6.8 \times 10^5 m \) न्यूटन
In simple words: एक न्यूट्रॉन तारे के विषुवत वृत्त पर कोई पिण्ड चिपका रहेगा या नहीं, यह गुरुत्वाकर्षण बल और अपकेन्द्र बल के बीच के संतुलन पर निर्भर करता है। गुरुत्वाकर्षण बल अपकेन्द्र बल से बहुत अधिक होने के कारण पिण्ड तारे से चिपका रहेगा।
🎯 Exam Tip: घूर्णन करते पिंडों पर काम करने वाले बलों (गुरुत्वाकर्षण और अपकेन्द्र) की गणना करें। चिपकने के लिए गुरुत्वाकर्षण बल अपकेन्द्र बल से अधिक होना चाहिए।
Question 24. कोई अन्तरिक्षयान मंगल पर ठहरा हुआ है। इस अन्तरिक्षयान पर कितनी ऊर्जा खर्च की जाए कि इसे सौरमण्डल से बाहर धकेला जा सके। अन्तरिक्षयान का द्रव्यमान = 1000 kg; सूर्य का द्रव्यमान = 2×1030 kg; मंगल का द्रव्यमान = 6.4×1023 kg; मंगल की त्रिज्या = 3395 km; मंगल की कक्षा की त्रिज्यां = 228×108 km तथा G = 6.67×10-11 N m² kg-2.
Answer: हल- दिया है : यान का द्रव्यमान \( m = 1000 \) kg \( = 10^3 \) kg
सूर्य का द्रव्यमान \( M_S = 2 \times 10^{30} \) kg,
मंगल का द्रव्यमान \( M_M = 6.4 \times 10^{23} \) kg
मंगल की त्रिज्या \( R = 3395 \) km \( = 3395 \times 10^6 \) m,
मंगल की कक्षा की त्रिज्या \( r = 2.28 \times 10^{11} \) m
यान मंगल की सतह पर है; अतः इसकी सूर्य से दूरी \( r_m \) के बराबर होगी ।
सूर्य के कारण यान की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा \( = -\frac { { GM }_{ S }m }{ r } \)
तथा मंगल के कारण यान की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा \( = -\frac { { GM }_{ M }m }{ R } \)
यान की कुल ऊर्जा \( = -Gm\left( \frac { { M }_{ S } }{ r } +\frac { { M }_{ M } }{ R } \right) \) [.. गतिज ऊर्जा = 0]
माना इस यान पर K ऊर्जा खर्च की जाती है, जिसे पाकर यह सौरमण्डल से बाहर चला जाता है। सौरमण्डल से बाहर, सूर्य तथा मंगल के सापेक्ष इसकी कुल ऊर्जा शून्य हो जाएगी। ऊर्जा संरक्षण के नियम से,
\( K - Gm \left( \frac{M_S}{r} + \frac{M_M}{R} \right) = 0 \)
अभीष्ट ऊर्जा \( K = + Gm \left( \frac{M_S}{r} + \frac{M_M}{R} \right) \)
\( = 6.67 \times 10^{-11} \times 10^3 \left( \frac{2.0 \times 10^{30}}{2.28 \times 10^{11}} + \frac{6.4 \times 10^{23}}{3.395 \times 10^6} \right) \)
\( = 6.67 \times 10^{-8} \times 10^{17} [87.72 + 1.88] \)
\( = 5.97 \times 10^{11} \) J
In simple words: अंतरिक्षयान को सौरमंडल से बाहर धकेलने के लिए आवश्यक ऊर्जा उसकी बंधन ऊर्जा के बराबर होती है, जो सूर्य और मंगल दोनों के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में उसकी कुल स्थितिज ऊर्जा के परिमाण के बराबर होती है।
🎯 Exam Tip: कुल ऊर्जा की गणना करें, जिसमें सूर्य और मंगल दोनों के कारण स्थितिज ऊर्जा शामिल हो। सौरमंडल से बाहर धकेलने का अर्थ है कि कुल ऊर्जा को शून्य करना है, इसलिए आवश्यक ऊर्जा कुल प्रारंभिक ऊर्जा का धनात्मक मान होगी।
Question 25. किसी रॉकेट को मंगल ग्रह के पृष्ठ से 2 kms⁻¹ की चाल से ऊध्वाधर ऊपर दागा जाता है। यदि मंगल के वातावरणीय प्रतिरोध के कारण इसकी 20% आरम्भिक ऊर्जा नष्ट हो जाती है, तब मंगल के पृष्ठ पर वापस लौटने से पूर्व यह रॉकेट मंगल से कितनी दूरी तक जाएगा? मंगल का द्रव्यमान = 6.4×1023 kg; मंगल की त्रिज्या = 3395 km तथा G = 6.67×10-11 N m² kg-2.
Answer: हल- रॉकेट का मंगल के पृष्ठ से प्रक्षेप्य वेग \( v = 20 \) किमी-से\(^{-1} \)
\( = 2 \times 10^3 \) मी-से\(^{-1} \)
रॉकेट की आरम्भिक ऊर्जा \( E_i \) = गतिज ऊर्जा \( = \frac { 1 }{ 2 } m { \nu }^{ 2 } \)
परन्तु 20% आरम्भिक ऊर्जा नष्ट हो जाती है।
अतः केवल वह अवशेष गतिज ऊर्जा जो स्थितिज ऊर्जा में रूपान्तरित होती है \( = E_i \) का 80%
\( = \frac{1}{2} mv^2 \) का \( \frac{80}{100} = \frac{2}{5} mv^2 \)
इसलिए ऊर्जा संरक्षण के नियम से,
रूपान्तरित गतिज ऊर्जा = स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि
अर्थात्
\( \frac{2}{5} mv^2 = -\frac{GMm}{R+H} - \left(-\frac{GMm}{R}\right) \)
जहाँ \( M = \) मंगल का द्रव्यमान \( = 6.4 \times 10^{23} \) किग्रा, \( R = \) इसकी त्रिज्या \( = 3395 \) किमी
\( = 3395 \times 10^3 \) मीटर तथा \( H = \) मंगल से रॉकेट के पहुँचने की अधिकतम ऊँचाई
अर्थात् दूरी
\( \frac{2}{5} v^2 = GM \left( \frac{1}{R} - \frac{1}{R+H} \right) = GM \frac{(R+H)-R}{R(R+H)} = \frac{GMH}{R(R+H)} \)
या \( v^2 = \frac{5GMH}{2R(R+H)} \)
या \( 2v^2 R^2 + 2v^2 RH = 5GMH \)
अथवा \( H(5GM - 2v^2 R) = 2v^2 R^2 \)
\( H = \frac{2v^2 R^2}{5GM - 2v^2 R} \)
ज्ञात मान रखने पर,
\( H = \frac{2 \times (2.0 \times 10^3)^2 (3395 \times 10^3)^2}{5 \times 6.67 \times 10^{-11} \times 6.4 \times 10^{23} - 2 \times (2.0 \times 10^3)^2 \times 3395 \times 10^3} \) मी
\( = 0.4949 \times 10^6 \) मीटर \( = 494.9 \times 10^3 \) मीटर \( = 495 \) किमी
In simple words: ऊर्जा संरक्षण का उपयोग करके, हम रॉकेट द्वारा मंगल ग्रह से प्राप्त अधिकतम ऊंचाई की गणना कर सकते हैं। गतिज ऊर्जा के एक हिस्से का नुकसान स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि में परिवर्तित हो जाता है।
🎯 Exam Tip: प्रारंभिक गतिज ऊर्जा के नुकसान को सही ढंग से शामिल करें। ऊर्जा संरक्षण के नियम का उपयोग करके गतिज ऊर्जा को स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तित करें।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
ब-विकल्पीय प्रश्न
Question 1. कैपलर के द्वितीय नियम के अनुसार सूर्य को किसी ग्रह से मिलाने वाली रेखा समान समय, अन्तरालों में समान क्षेत्रफल तय करती है। यह परिणाम किसके संरक्षण पर आधारित है? (i) रेखीय संवेग (ii) कोणीय संवेग (iii) ऊर्जा (iv) आवेश
Answer: उत्तर- (ii) कोणीय संवेग ।
In simple words: केप्लर का द्वितीय नियम (समान क्षेत्रफल का नियम) कोणीय संवेग के संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है, क्योंकि ग्रह पर कार्य करने वाला गुरुत्वाकर्षण बल केंद्रीय होता है।
🎯 Exam Tip: केप्लर के नियमों को याद रखें और उन्हें संबंधित संरक्षण सिद्धांतों से जोड़ें। दूसरा नियम कोणीय संवेग संरक्षण से संबंधित है।
Question 2. ग्रहों की गति से सम्बन्धित कैपलर का तृतीय नियम है. (i) \( T \propto r \) (ii) \( T \propto r^2 \)
(iii) \( T \propto r^3 \)
(iv) \( T \propto r^{3/2} \)
Answer: उत्तर- (iv) \( T \propto r^{3/2} \)
In simple words: केप्लर का तीसरा नियम बताता है कि किसी ग्रह के परिक्रमण काल का वर्ग उसकी कक्षीय त्रिज्या के घन के समानुपाती होता है, जिसका अर्थ है कि \( T \propto r^{3/2} \)।
🎯 Exam Tip: केप्लर के तीसरे नियम के गणितीय संबंध को याद रखें, \( T^2 \propto r^3 \), जिसे \( T \propto r^{3/2} \) के रूप में भी लिखा जा सकता है।
Question 3. ग्रहों की गति में निम्न में से कौन-सी भौतिक राशि संकलित रहती है? (i) गतिज ऊर्जा (ii) स्थितिज ऊर्जा (iii) रेखीय ऊर्जा (iv) कोणीय संवेग
Answer: उत्तर- (iv) कोणीय संवेग
In simple words: ग्रहों की गति में उनका कोणीय संवेग संरक्षित रहता है, क्योंकि उन पर सूर्य द्वारा लगाया गया गुरुत्वाकर्षण बल एक केंद्रीय बल होता है।
🎯 Exam Tip: केंद्रीय बल के तहत गति में कोणीय संवेग का संरक्षण एक महत्वपूर्ण अवधारणा है।
Question 4. एक ग्रह सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगा रहा है जैसा कि चित्र 8.4 में दर्शाया गया है। ग्रह का अधिकतम वेग होगा
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र सूर्य के चारों ओर एक दीर्घवृत्तीय कक्षा में घूमते हुए ग्रह को दर्शाता है। कक्षा पर चार बिंदु A, B, C, D इंगित किए गए हैं, जहाँ सूर्य एक फोकस पर स्थित है।
Answer: उत्तर- (ii) B पर ।
In simple words: केप्लर के दूसरे नियम के अनुसार, जब ग्रह सूर्य के सबसे करीब होता है (बिंदु B), तो उसकी गति सबसे तेज होती है ताकि समान समय में समान क्षेत्रफल तय किया जा सके।
🎯 Exam Tip: केप्लर के दूसरे नियम (समान क्षेत्रफल का नियम) को याद रखें, जो बताता है कि जब ग्रह सूर्य के सबसे करीब होता है तो उसकी गति अधिकतम होती है।
Question 5. यदि पृथ्वी व सूर्य के बीच की दूरी वर्तमान दूरी की आधी होती है, तो एक वर्ष में दिनों की संख्या होगी (i) 64.5 (ii) 129 (iii) 182.5 (iv) 730
Answer: उत्तर- (ii) 129 दिन
In simple words: केप्लर के तीसरे नियम का उपयोग करते हुए, यदि पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी आधी हो जाए, तो परिक्रमण काल कम हो जाएगा, जिससे वर्ष में दिनों की संख्या लगभग 129 दिन होगी।
🎯 Exam Tip: केप्लर के तीसरे नियम \( T^2 \propto r^3 \) का उपयोग करें। यदि \( r \) आधा हो जाता है, तो \( T \) कितना बदलता है इसकी गणना करें। \( T' = T / (2\sqrt{2}) \approx T/2.828 \). 365 / 2.828 = 129.2 दिन।
Question 6. यदि पृथ्वी का द्रव्यमान \( M_e \), तथा त्रिज्या \( R_e \) है, तो गुरुत्वीय त्वरण g तथा गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक G में अनुपात है। (i) \( \frac { { { R }^{ 2 } }_{ e } }{ { M }_{ e } } \) (ii) \( \frac { { M }_{ e } }{ { { R }^{ 2 } }_{ e } } \) (iii)\( { M }_{ e }{ { R }^{ 2 } }_{ e } \) (iv)\( \frac { {M}_{ e } }{ { R }_{e} } \)
Answer: उत्तर- (ii) \( \frac { { M }_{ e } }{ { { R }^{ 2 } }_{ e } } \)
In simple words: गुरुत्वीय त्वरण (g) और गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक (G) के बीच का संबंध \( g = GM_e/R_e^2 \) है, इसलिए उनका अनुपात \( g/G = M_e/R_e^2 \) होगा।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वाकर्षण त्वरण g के लिए मूल सूत्र \( g = GM_e/R_e^2 \) को याद रखें और फिर G के साथ अनुपात की गणना करें।
Question 7. पृथ्वी की त्रिज्या 6400 किमी तथा पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण 10 मी/से² है। यदि h ऊँचाई पर गुरुत्वीय त्वरण 2.5 मी/से² हो, तो h का मान होगा। (i) 3200 किमी. (ii) 6400 किमी (iii) 9600 किमी (iv) 12800 किमी
Answer: उत्तर- (ii) 6400 किमी
In simple words: ऊंचाई के साथ गुरुत्वाकर्षण त्वरण में परिवर्तन के सूत्र का उपयोग करके, हम उस ऊंचाई की गणना कर सकते हैं जहाँ गुरुत्वीय त्वरण 2.5 मी/से² हो जाता है, जो पृथ्वी की त्रिज्या के बराबर है।
🎯 Exam Tip: ऊंचाई के साथ गुरुत्वाकर्षण त्वरण में परिवर्तन के सूत्र \( g' = g (R_e / (R_e+h))^2 \) का उपयोग करें। दिए गए मानों को प्रतिस्थापित करें और h के लिए हल करें।
Question 8. \( g_e \) तथा \( g_p \), क्रमशः पृथ्वी तल पर तथा अन्य ग्रह के तल पर गुरुत्वीय त्वरण हैं। ग्रह का द्रव्यमान व त्रिज्या दोनों पृथ्वी की तुलना में दोगुने हैं, तब
(i) \( g_e = g_p \)
(ii) \( g_p = 2g_p \)
(iii) \( g_p = 2g_e \)
(iv)\( { g }_{ p }=\frac { { g }_{ e } }{ \sqrt { 2 } } \)
Answer: उत्तर- (iii) \( g_p = 2g_e \)
In simple words: यदि किसी ग्रह का द्रव्यमान और त्रिज्या पृथ्वी की तुलना में दोगुनी हो, तो उस ग्रह पर गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण का दोगुना होगा, क्योंकि g \( \propto M/R^2 \) होता है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वाकर्षण त्वरण के लिए सूत्र \( g = GM/R^2 \) का उपयोग करें और \( M \) तथा \( R \) के दोगुना होने पर g में परिवर्तन का अनुपात ज्ञात करें।
Question 9. किसी पिण्ड का पलायन वेग उसके (i) द्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती होता है । (ii) द्रव्यमान के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होता है। (iii) द्रव्यमान के व्युत्क्रमानुपाती होता है। (iv) द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।
Answer: उत्तर- (iv) द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।
In simple words: किसी वस्तु का पलायन वेग उस वस्तु के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है, यह केवल ग्रह के द्रव्यमान और त्रिज्या पर निर्भर करता है जिससे वह पलायन कर रहा है।
🎯 Exam Tip: पलायन वेग के सूत्र \( v_e = \sqrt{2GM/R} \) को याद रखें, जिसमें पलायन करने वाली वस्तु का द्रव्यमान शामिल नहीं होता है।
Question 10. संचार उपग्रह INISAT-II B का पृथ्वी के परितः परिक्रमण काल है। (i) 12 घण्टे (ii) 24 घण्टे (iii) 48 घण्टे (iv) 30 दिन
Answer: उत्तर- (ii) 24 घण्टे ।
In simple words: संचार उपग्रह, जिन्हें भू-स्थिर उपग्रह भी कहा जाता है, पृथ्वी के परितः 24 घंटे में एक परिक्रमा पूरी करते हैं, ताकि वे पृथ्वी के सापेक्ष एक ही स्थिति में रहें।
🎯 Exam Tip: भू-स्थिर (तुल्यकाली) उपग्रहों के परिक्रमण काल को याद रखें, जो पृथ्वी के घूर्णन काल के बराबर होता है।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. किसी उपग्रह को ग्रह के परितः घूमने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल कहाँ से प्राप्त होता है?
Answer: उत्तर- उपग्रह तथा ग्रह के बीच लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल से ।
In simple words: उपग्रह को ग्रह के चारों ओर घूमने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल ग्रह और उपग्रह के बीच लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल से मिलता है।
🎯 Exam Tip: अभिकेन्द्र बल की अवधारणा और गुरुत्वाकर्षण बल कैसे केंद्रीय बल के रूप में कार्य करता है, इसे समझें।
Question 2. g तथा G में क्या सम्बन्ध होता है?
Answer: उत्तर- \( g = GM_e/R_e^2 \)
जहाँ \( M_e \). व \( R_e \) क्रमशः पृथ्वी के द्रव्यमान तथा त्रिज्या एवं G = सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक ।
In simple words: गुरुत्वीय त्वरण (g), सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक (G), पृथ्वी के द्रव्यमान (\( M_e \)) और पृथ्वी की त्रिज्या (\( R_e \)) से संबंधित है, \( g = GM_e/R_e^2 \)) सूत्र द्वारा।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय त्वरण g और सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक G के बीच के संबंध सूत्र को याद रखें।
Question 3. पृथ्वी तल पर 'g' का मान कहाँ अधिकतम तथा कहाँ न्यूनतम होता है?
Answer: उत्तर- g का मान ध्रुवों पर अधिकतम तथा भूमध्य रेखा पर न्यूनतम होता है।
In simple words: पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण (g) का मान ध्रुवों पर अधिकतम और भूमध्य रेखा पर न्यूनतम होता है, क्योंकि पृथ्वी ध्रुवों पर थोड़ी चपटी होती है।
🎯 Exam Tip: पृथ्वी के आकार (ध्रुवों पर चपटापन) और उसके घूर्णन के कारण g में भिन्नता को समझें।
Question 4, पृथ्वी के केन्द्र पर 'g' का मान कितना होता है?
Answer: उत्तर- शून्य ।
In simple words: पृथ्वी के केंद्र पर गुरुत्वीय त्वरण (g) का मान शून्य होता है, क्योंकि केंद्र पर सभी दिशाओं से बराबर और विपरीत गुरुत्वाकर्षण बल कार्य करते हैं।
🎯 Exam Tip: एक समान गोले के केंद्र पर गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की तीव्रता के शून्य होने की अवधारणा को याद रखें।
Question 5. भूमध्य रेखा पर g' का मान ध्रुवों की अपेक्षा कम होता है, क्यों?
Answer: उत्तर- (i) ध्रुवों पर पृथ्वी चपटी है (अर्थात् पृथ्वी का भूमध्य रेखीय व्यासं, उसके ध्रुवीय व्यास की अपेक्षा अधिक होता है।) (ii) पृथ्वी अपनी अक्ष के परितः घूर्णन करती है।
In simple words: भूमध्य रेखा पर गुरुत्वीय त्वरण (g) ध्रुवों की तुलना में कम होता है क्योंकि पृथ्वी ध्रुवों पर चपटी है (भूमध्य रेखा पर त्रिज्या अधिक है) और पृथ्वी के घूर्णन के कारण भूमध्य रेखा पर अपकेन्द्रीय बल गुरुत्वाकर्षण के विपरीत कार्य करता है।
🎯 Exam Tip: पृथ्वी के आकार (भूमध्य रेखा पर अधिक त्रिज्या) और घूर्णन (अपकेन्द्रीय बल) दोनों के प्रभाव को याद रखें जो g के मान को प्रभावित करते हैं।
Question 6. 'g' के मान पर कौन-कौन से कारक प्रभाव डालते हैं?
Answer: उत्तर- g के मान पर निम्नलिखित तीन कारक प्रभाव डालते हैं
(i) पृथ्वी पर अक्षांशीय स्थिति,
(ii) पृथ्वी तल से ऊँचाई तथा
(iii) पृथ्वी तल से गहराई ।
In simple words: गुरुत्वीय त्वरण (g) पृथ्वी पर स्थान की अक्षांशीय स्थिति, पृथ्वी की सतह से ऊंचाई और पृथ्वी की सतह के नीचे गहराई जैसे कारकों से प्रभावित होता है।
🎯 Exam Tip: g के मान में भिन्नता के कारणों को याद रखें: अक्षांश (घूर्णन और आकार), ऊंचाई और गहराई।
Question 7. पृथ्वी सतह से h ऊँचाई पर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता एवं गुरुत्वीय विभव से सम्बन्धित समीकरण लिखिए।
Answer: उत्तर- गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता \( I_G = \frac { { GM }_{ e } }{ { \left( { R }_{ e }+h \right) }^{ 2 }} \) न्यूटन/किग्रा
गुरुत्वीय विभवे \( V_G = -\frac { { GM }_{ e } }{ { \left( { R}_{ e }+h \right) } } \) जहाँ \( R_e \) = पृथ्वी की त्रिज्या अतः
\( V_G = -I_G (R_e + h) \)
In simple words: पृथ्वी की सतह से h ऊंचाई पर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है, जबकि गुरुत्वीय विभव दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होता है, और दोनों नकारात्मक होते हैं।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय तीव्रता और विभव के लिए सूत्र याद रखें। ध्यान दें कि तीव्रता एक सदिश राशि है जबकि विभव एक अदिश राशि है, और \( V = -I \cdot r \) संबंध।
Question 8. G का मात्रक लिखिए। इसे सार्वत्रिक नियतांक क्यों कहते हैं?
Answer: उत्तर- G का मात्रक न्यूटन-मीटर²/किग्रा² है। चूंकि G का मान कणों की प्रकृति, माध्यम, समय, ताप । आदि पर निर्भर नहीं करता है, इसलिए इसे सार्वत्रिक नियतांक कहते हैं।
In simple words: G का मात्रक न्यूटन-मीटर²/किग्रा² है और इसे सार्वत्रिक नियतांक कहा जाता है क्योंकि इसका मान कणों की प्रकृति, माध्यम, समय या तापमान जैसी किसी भी भौतिक स्थिति पर निर्भर नहीं करता है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक (G) के S.I. मात्रक और इसके सार्वत्रिक प्रकृति को याद रखें।
Question 9. भूमध्य रेखा पर किसी वस्तु का भार ध्रुवों पर भार की तुलना में कम क्यों होता है?
Answer: उत्तर-चूंकि ध्रुवों की अपेक्षा भूमध्य रेखा पर g का मान कम होता है तथा भार \( W = mg \), अतः ध्रुवों की 'अपेक्षा भूमध्य रेखा पर वस्तु का भार कम होता है।
In simple words: भूमध्य रेखा पर गुरुत्वीय त्वरण (g) ध्रुवों की तुलना में कम होता है क्योंकि पृथ्वी की घूर्णन गति और भूमध्य रेखा पर अधिक त्रिज्या के कारण होता है, जिससे \( W = mg \) सूत्र के अनुसार वस्तु का भार भूमध्य रेखा पर कम हो जाता है।
🎯 Exam Tip: भूमध्य रेखा और ध्रुवों पर g के मान में अंतर के कारणों (पृथ्वी का आकार और घूर्णन) को याद रखें और इसे भार (W=mg) से जोड़ें।
Question 10. गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता की परिभाषा दीजिए।
Answer: उत्तर- गुरुत्वीय क्षेत्र के अन्तर्गत किसी बिन्दु पर एकांक द्रव्यमान पर कार्य करने वाला गुरुत्वाकर्षण बेल उस बिन्दु पर 'गुरुत्वीय क्षेत्र की तीक्रेता' कहलाती है।
In simple words: गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता किसी बिंदु पर एकांक द्रव्यमान पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता की परिभाषा को बल प्रति इकाई द्रव्यमान के रूप में याद रखें, यह एक सदिश राशि है।
Question 11. पृथ्वी की सतह के एक स्थान पर स्थित 25 किग्रा के एक पिण्ड पर 250 न्यूटन का बल लग रहा है। उस स्थान पर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता का क्या मान है' –
Answer: हल- \( I_G = \frac { F }{ m } =\frac { 250 }{ 25 } =10 \) न्यूटन/किग्रा।
In simple words: गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता बल प्रति इकाई द्रव्यमान के बराबर होती है, इसलिए 250 न्यूटन बल को 25 किग्रा द्रव्यमान से विभाजित करने पर 10 न्यूटन/किग्रा की तीव्रता प्राप्त होगी।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता (I) के सूत्र \( I = F/m \) का उपयोग करें और सही इकाइयों (न्यूटन/किग्रा) का ध्यान रखें।
Question 12. पृथ्वी तल पर गुरुत्वीय त्वरण \( g = 10.0 \) मी/से² तथा पृथ्वी की त्रिज्या \( R = 6.4 \times 10^6 \) मी है। पृथ्वी के केन्द्र से 2R दूरी पर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए ।
Answer: हल- पृथ्वी के केन्द्र से प्रक्षेपण बिन्दु की दूरी, \( r = 2R \) मी
गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता
\( I_G = \frac{GM_e}{r^2} = \frac{gR^2}{r^2} \)
\( = 10 \left(\frac{R}{2R}\right)^2 = 10 \frac{1}{4} = 2.5 \) न्यूटन /किग्रा
In simple words: गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है। यदि दूरी दोगुनी हो जाती है, तो तीव्रता एक-चौथाई हो जाएगी, जिससे 2.5 न्यूटन/किग्रा की तीव्रता प्राप्त होगी।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय तीव्रता \( I_G = g (R_e/r)^2 \) के सूत्र का उपयोग करें, जहाँ r पृथ्वी के केंद्र से दूरी है।
Question 13. गुरुत्वीय त्वरण से क्या तात्पर्य है?
Answer: पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण स्वतन्त्रतापूर्वक पृथ्वी की ओर गिरती हुई वस्तु में उत्पन्न त्वरण गुरुत्वीय त्वरण कहलाता है।
In simple words: गुरुत्वीय त्वरण वह त्वरण है जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण किसी वस्तु में उत्पन्न होता है जब वह स्वतंत्र रूप से गिरती है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय त्वरण 'g' एक सदिश राशि है और इसकी दिशा हमेशा पृथ्वी के केंद्र की ओर होती है।
Question 14. पृथ्वी तल से कितना नीचे जाने पर गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी तल पर गुरुत्वीय त्वरण का (i) आधा रह जायेगा, (ii) चौथाई रह जायेगा।
Answer: हल- पृथ्वी तल से नीचे जाने पर गुरुत्वीय त्वरण \( { g }^{ I }=g\left( 1-\frac { h }{ {R}_{e} } \right) \)
(i) \( g' = g/2 \)
अतः \( \frac { g }{ 2 } =g\left( 1-\frac { h }{ 6400 } \right) \)
अथवा \( \frac { 1 }{ 2 } =1-\frac { h }{ 6400 } \)
\( \implies \frac { h }{ 6400 } =1-\frac { 1 }{ 2 } =\frac { 1 }{ 2 } \)
\( \implies h = 3200 \) किमी
(ii) इसी प्रकार \( g' = g/4 \)
अतः \( \frac { g }{ 4 } =g\left( 1-\frac { h }{ 6400 } \right) \)
\( \implies \frac { 1 }{ 4 } =1-\frac { h }{ 6400 } \)
\( \implies \frac { h }{ 6400 } =1-\frac { 1 }{ 4 } =\frac { 3 }{ 4 } \)
\( \implies h = 4800 \) किमी
In simple words: गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी की सतह से गहराई में जाने पर कम होता जाता है। यह गणना दिखाती है कि पृथ्वी की त्रिज्या के सापेक्ष कितनी गहराई पर यह आधा या चौथाई हो जाएगा।
🎯 Exam Tip: गहराई के साथ गुरुत्वीय त्वरण के सूत्र \( g' = g(1 - h/R_e) \) को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीधे ऐसे प्रश्नों को हल करने में मदद करता है।
Question 15. क्या पलायन वेग का मान पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर करता है?
Answer: नहीं।
In simple words: पलायन वेग वस्तु के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है, यह केवल ग्रह के द्रव्यमान और त्रिज्या पर निर्भर करता है जिससे वस्तु को प्रक्षेपित किया जा रहा है।
🎯 Exam Tip: पलायन वेग की परिभाषा और सूत्र को स्पष्ट रूप से समझें ताकि द्रव्यमान निर्भरता पर आधारित भ्रम से बचा जा सके।
Question 16. पृथ्वी तल पर पलायन वेग का मान कितना होता है?
Answer: 11.2 किमी/सेकण्ड ।
In simple words: पृथ्वी की सतह से पलायन करने के लिए किसी वस्तु को कम से कम 11.2 किमी प्रति सेकंड की गति से फेंकना पड़ता है।
🎯 Exam Tip: पृथ्वी के पलायन वेग का संख्यात्मक मान एक मूलभूत स्थिरांक है जिसे याद रखना चाहिए।
Question 17. पृथ्वी के समीप परिक्रमा करने वाले कृत्रिम उपग्रह के कक्षीय वेग एवं पलायन वेग में सम्बन्ध लिखिए।
Answer: \( { \nu }_{ e }={ { \nu } }_{ O }\sqrt { 2 } \)
In simple words: पलायन वेग कक्षीय वेग का \(\sqrt{2}\) गुना होता है, जिसका अर्थ है कि पलायन करने के लिए कक्षीय गति से अधिक वेग की आवश्यकता होती है।
🎯 Exam Tip: इस संबंध का उपयोग विभिन्न स्थितियों में पलायन और कक्षीय वेगों के बीच त्वरित रूपांतरण के लिए किया जा सकता है।
Question 18. पृथ्वी के पृष्ठ से पलायन वेग 11 किमी/से है। किसी दूसरे ग्रह की त्रिज्या पृथ्वी की अपेक्षा दोगुनी है तथा उसका द्रव्यमान पृथ्वी की अपेक्षा 2.88 गुना अधिक है। इस ग्रह से पलायन वेग कितना होगा?
Answer: हल-
\( { v }_{ p } = { v }_{ e } \times \sqrt { \frac { { M }_{ p } }{ { M }_{ e } } \times \frac { { R }_{ e } }{ { R }_{ p } } } \)
\( = { v }_{ e } \times \sqrt { \frac { 2.88 { M }_{ e } }{ { M }_{ e } } \times \frac { { R }_{ e } }{ 2 { R }_{ e } } } \)
\( = 11.0 \times \sqrt { 2.88 \times \frac { 1 }{ 2 } } = 11.0 \times \sqrt { 1.44 } \)
\( = 11.0 \times 1.2 = 13.2 \) किमी/से
In simple words: पलायन वेग ग्रह के द्रव्यमान और त्रिज्या पर निर्भर करता है। यदि किसी अन्य ग्रह का द्रव्यमान अधिक और त्रिज्या अधिक हो, तो उसका पलायन वेग पृथ्वी से भिन्न होगा।
🎯 Exam Tip: पलायन वेग के सूत्र को विभिन्न ग्रहों के लिए लागू करते समय द्रव्यमान और त्रिज्या के अनुपातों को सही ढंग से प्रतिस्थापित करना सुनिश्चित करें।
Question 19. पृथ्वी तल से किसी पिण्ड का पलायन वेग 11.2 किमी/से है। यदि किसी अन्य ग्रह की त्रिज्या पृथ्वी की त्रिज्या की 1/3 तथा द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 1/4 हो तो उस ग्रह से पलायन वेग कितना होगा?
Answer: हल-
\( { v }_{ p } = { v }_{ e } \sqrt { \frac { 2G{ M }_{ p }/{ R }_{ p } }{ 2G{ M }_{ e }/{ R }_{ e } } } \)
\( = { v }_{ e } \sqrt { \frac { { M }_{ p } }{ { M }_{ e } } \times \frac { { R }_{ e } }{ { R }_{ p } } } \)
\( = { v }_{ e } \sqrt { \frac { { M }_{ e }/4 }{ { M }_{ e } } \times \frac { { R }_{ e } }{ { R }_{ e }/3 } } \)
\( = { v }_{ e } \sqrt { \frac { 1 }{ 4 } \times 3 } \)
\( = { v }_{ e } \frac { \sqrt { 3 } }{ 2 } \)
\( = \frac { 11.2 \times 1.732 }{ 2 } \)
\( = 9.699 \) किमी/से
In simple words: पलायन वेग ग्रह के द्रव्यमान और त्रिज्या के वर्गमूल के समानुपाती होता है। एक छोटे और कम द्रव्यमान वाले ग्रह का पलायन वेग पृथ्वी से कम होगा।
🎯 Exam Tip: पलायन वेग के सूत्र में अनुपातों को सावधानी से हल करें, खासकर जब भिन्नात्मक मानों का उपयोग कर रहे हों।
Question 20. पृथ्वी के परितः वृत्ताकार कक्षा में घूमते हुए कृत्रिम उपग्रह के परिक्रमण काल का सूत्र प्रयुक्त संकेतांकों का अर्थ बताते हुए लिखिए।
Answer: \( T=2\pi \sqrt { \frac {{ r }^{ 3 } }{ { GM }_{ e } } } \)
\( r = (R_e+h) \)
जहाँ, \( T \) = परिक्रमण काल
\( G \) = सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक
\( r \) = कक्षा की त्रिज्या (पृथ्वी के केंद्र से उपग्रह की दूरी)
\( R_e \) = पृथ्वी की त्रिज्या
\( M_e \) = पृथ्वी का द्रव्यमान
In simple words: यह सूत्र दर्शाता है कि उपग्रह का परिक्रमण काल उसकी कक्षा की त्रिज्या, पृथ्वी के द्रव्यमान और गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: इस सूत्र के प्रत्येक पद को याद रखें और समझें, क्योंकि यह उपग्रहों की गति से संबंधित गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 21. एक उपग्रह पृथ्वी-तल के समीप एक कक्षा में परिक्रमण कर रहा है। पृथ्वी की त्रिज्या \( 6.4 \times 10^6 \) मीटर मानते हुए, उपग्रह की कक्षीय चाल तथा परिक्रमण काल ज्ञात कीजिए। (\( g=9.8 \) मी/से²)
Answer: हल-
\( v_o = \sqrt{gR_e} \)
\( = \sqrt{9.8 \times 6.4 \times 10^6} \) मी/से
\( = 7.92 \times 10^3 \) मी/से = \( 7.92 \) किमी/से
\( T = 2\pi \sqrt{\frac{R_e}{g}} \)
\( = 2 \times 3.14 \sqrt{\frac{6.4 \times 10^6}{9.8}} \) सेकण्ड
\( = 5075 \) सेकण्ड
In simple words: पृथ्वी के निकट कक्षा में घूमते उपग्रह की गतिज ऊर्जा और परिक्रमण काल को पृथ्वी के गुरुत्वीय त्वरण और त्रिज्या का उपयोग करके परिकलित किया जा सकता है।
🎯 Exam Tip: पृथ्वी के निकट उपग्रहों के लिए कक्षीय वेग और परिक्रमण काल के सूत्र को याद रखना और उचित इकाइयों के साथ गणना करना महत्वपूर्ण है।
Question 22. समझाइए कि तुल्पकाली उपग्रह क्या होता है। इसकी उपयोगिता क्या है?
Answer: जिस उपग्रह का पृथ्वी के परितः परिक्रमण काल 24 घण्टे होता है उसे तुल्यकाली उपग्रह कहते हैं। यह पृथ्वी के सापेक्ष सदैव स्थिर दिखायी देता है, अतः इसको भू-स्थिर उपग्रह भी कहते हैं। इसका उपयोग दूरसंचार में किया जाता है।
In simple words: तुल्यकाली उपग्रह वह होता है जो पृथ्वी के चारों ओर 24 घंटे में एक परिक्रमा पूरी करता है, जिससे वह पृथ्वी के किसी विशेष स्थान से स्थिर दिखाई देता है और दूरसंचार के लिए उपयोगी होता है।
🎯 Exam Tip: तुल्यकाली उपग्रहों की विशेषताएँ और उनके अनुप्रयोग, जैसे दूरसंचार, महत्वपूर्ण हैं।
Question 23. पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे अन्तरिक्ष यान में बैठे मनुष्य का भार कितना होता है?
Answer: शून्य ।
In simple words: अंतरिक्ष यान में बैठे मनुष्य भारहीनता का अनुभव करते हैं क्योंकि वे और यान दोनों पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के अधीन स्वतंत्र रूप से गिर रहे होते हैं।
🎯 Exam Tip: भारहीनता की अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझें, यह अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि निरंतर मुक्त पतन की स्थिति है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. कैपलर के ग्रहों की गति सम्बन्धी नियम लिखिए। या ग्रहों के गति सम्बन्धी कैपलर के नियमों का उल्लेख कीजिए।
Answer: कैपलर के ग्रहों की गति सम्बन्धी नियम:
(i) सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घ-वृत्ताकार कक्षाओं (elliptical orbits) में चक्कर लगाते हैं तथा सूर्य, उन कक्षाओं के एक फोकस पर स्थित होता है।
(ii) सूर्य तथा किसी ग्रह को मिलाने वाली रेखा बराबर समय-अन्तराल में बराबर क्षेत्रफल पार (sweep) करती है, अर्थात् प्रत्येक ग्रह की क्षेत्रीय चाल (areal speed) नियत रहती है। अतः जब ग्रह सूर्य के समीप होता है, तो उसकी चाल अधिकतम होती है तथा जब दूर होता है, तो उसकी चाल न्यूनतम होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एक दीर्घवृत्तीय कक्षा में सूर्य के चारों ओर एक ग्रह की गति को दर्शाता है। इसमें दिखाया गया है कि सूर्य एक फोकस पर स्थित है और ग्रह की गति के दौरान समान समय अंतरालों में समान क्षेत्रफल (जैसे SAB और SCD) तय किया जाता है।
(iii) सूर्य के चारों ओर किसी भी ग्रह के परिक्रमण काल का वर्ग उसकी दीर्घवृत्तीय कक्षा के अर्द्ध-दीर्घ अक्ष (semi-major axis) के घन के अनुक्रमानुपाती होता है।
अतः 'यदि किसी ग्रह का सूर्य के चारों ओर परिक्रमण काल \( T \) तथा उसकी दीर्घवृत्तीय कक्षा की अर्द्ध-दीर्घ अक्ष \( a \) हो तो तृतीय नियम के अनुसार \( T^2 \propto a^3 \) अथवा \( T^2/a^3 = \) नियतांक अर्थात् सभी ग्रहों के लिए \( T^2/a^3 \) का मान नियत रहता है।
In simple words: कैपलर के नियम ग्रहों की सूर्य के चारों ओर गति का वर्णन करते हैं: कक्षाएँ दीर्घवृत्ताकार होती हैं, समान समय में समान क्षेत्रफल तय होते हैं, और परिक्रमण काल का वर्ग अर्ध-दीर्घ अक्ष के घन के समानुपाती होता है।
🎯 Exam Tip: कैपलर के तीनों नियमों को उनकी स्पष्टता और ग्रहों की गति को समझने के लिए याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर उनके गणितीय संबंधों के साथ।
Question 2. ग्रहों की गति सम्बन्धी कैपलर के नियमों से सिद्ध कीजिए कि किसी ग्रह पर लगने वाला बल सूर्य से उसकी दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
Answer: कैपलर के नियमों से न्यूटन के निष्कर्ष- न्यूटन ने पाया कि अधिकांश ग्रहों (बुध व प्लूटो को छोड़कर) की सूर्य के चारों ओर की कक्षाएँ लगभग वृत्ताकार हैं। कैपलर के द्वितीय नियम के अनुसार, किसी ग्रह की क्षेत्रीय चाल नियत रहती है। अतः वृत्ताकार कक्षा में ग्रह की रेखीय चाल (v) नियत होगी। चूंकि यह वृत्ताकार पथ पर चल रहा है; अतः ग्रह पर केन्द्र (सूर्य) की ओर अभिकेन्द्र बल \( F \) लगता है तथा \( F = mv^2/r \), जहाँ \( m \) ग्रह का द्रव्यमान, \( v \) ग्रह की रेखीय चाल तथा \( r \) वृत्ताकार कक्षा की त्रिज्या है। यदि ग्रह का परिक्रमण काल \( T \) है, तो
\( v = \frac { \text{एक चक्कर में तय की गई रेखीय दूरी} }{ \text{परिक्रमण काल} } = \frac { 2\pi r }{ T } \)
\( F = m \frac { (2\pi r)^2 }{ rT^2 } = m \frac { 4\pi^2 r^2 }{ rT^2 } = \frac { 4\pi^2 mr }{ T^2 } \)
परन्तु कैपलर के तीसरे नियम के अनुसार, \( T^2 = Kr^3 \)
अतः \( F = \frac { 4\pi^2 mr }{ Kr^3 } = \frac { 4\pi^2 m }{ Kr^2 } \)
अथवा \( F \propto \frac { m }{ r^2 } \)
इस प्रकार कैपलर के नियमों के आधार पर न्यूटन ने निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:
1. ग्रह पर एक अभिकेन्द्र बल (\( F \)) कार्य करता है जिसकी दिशा सूर्य की ओर होती है।
2. यह बल ग्रह की सूर्य से औसत दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है (\( F \propto 1/r^2 \))।
3. यह बल ग्रह के द्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती होता है (\( F \propto m \))।
इन निष्कर्षों के साथ-साथ न्यूटन ने यह बताया कि कैपलर के नियम केवल सूर्य एवं ग्रह के बीच ही सत्य नहीं हैं, अपितु ब्रह्माण्ड में स्थित किन्हीं भी दो पिण्डों के लिए भी सत्य हैं।
In simple words: कैपलर के नियमों का उपयोग करके, हम यह सिद्ध कर सकते हैं कि किसी ग्रह पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल सूर्य से उसकी दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है, जो न्यूटन के सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम का आधार है।
🎯 Exam Tip: अभिकेन्द्र बल के सूत्र को कैपलर के तीसरे नियम के साथ मिलाकर गुरुत्वाकर्षण बल के व्युत्क्रम वर्ग नियम को व्युत्पन्न करना एक महत्वपूर्ण अवधारणा है।
Question 3. न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम लिखिए तथा इसके आधार पर G की परिभाषा दीजिए।
Answer: न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम-इस नियम के अनुसार किन्हीं दो द्रव्य-कणों के बीच लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल कणों के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। बल की दिशा दोनों कणों को मिलाने वाली रेखा के साथ होती है।
G की परिभाषा - सूत्र \( F = G \frac { m_1m_2 }{ r^2 } \) से,
यदि \( m_1 = m_2 = 1 \) तथा \( r = 1 \) तो \( G = F \)
अतः “गुरुत्वाकर्षण नियतांक उस पारस्परिक आकर्षण बल के बराबर होता है जो एकांक दूरी पर रखे एकांक द्रव्यमान के दो द्रव्य-कणों के बीच कार्य करता है तथा जिसकी दिशा कणों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश होती है।”
In simple words: न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम बताता है कि दो वस्तुओं के बीच गुरुत्वाकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती और उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक (G) एकांक द्रव्यमान वाली दो वस्तुओं के बीच एकांक दूरी पर लगने वाले बल के बराबर होता है।
🎯 Exam Tip: न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम और 'G' की परिभाषा, उसकी इकाई और विमा को पूरी तरह से समझें, क्योंकि यह गुरुत्वाकर्षण के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है।
Question 4. गुरुत्वीय बन्धन ऊर्जा से क्या तात्पर्य है? एक मनुष्य जिसका भार पृथ्वी की सतह पर W है, यदि वह पृथ्वी की सतह से पृथ्वी की त्रिज्या की 3 गुना ऊँचाई पर जाता है, तो उस स्थान पर उसका भार ज्ञात कीजिए।
Answer: गुरुत्वीय बन्धन ऊर्जा- “पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमण करते हुए किसी पिण्ड अथवा उपग्रह को अपनी कक्षा छोड़कर अनन्त पर चले जाने के लिए आवश्यक ऊर्जा को बन्धन ऊर्जा कहते हैं।” पृथ्वी के समीप परिक्रमण करते हुए उपग्रह की कुल ऊर्जा \( -\frac { 1 }{ 2 } \left( \frac { { GM }_{ e }m }{ { R }_{ e } } \right) \) होती है। अतः उपग्रह को अनन्त पर भेजने के लिए उपग्रह को \( +\frac { 1 }{ 2 } \left(\frac { { GM }_{ e }m }{ { R }_{ e } } \right) \) ऊर्जा देनी होगी जिससे उसकी कुल ऊर्जा \( E \) शून्य हो जाएगी। अतः पृथ्वी के समीप परिक्रमण करते उपग्रह की बन्धन ऊर्जा \( = +\frac { 1 }{ 2 } \left(\frac { { GM }_{ e }m }{ { R }_{ e } } \right) \)
पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण \( g_e = \frac { GM_e }{ R_e^2 } \)
अतः पृथ्वी पर मनुष्य का भार \( W = mg_e = \frac { GM_e m }{ R_e^2 } \) ...(1)
पृथ्वी की सतह से \( h = 3R_e \) ऊँचाई पर गुरुत्वीय त्वरण
\( g_h = \frac { GM_e }{ (R_e+h)^2 } = \frac { GM_e }{ (R_e+3R_e)^2 } = \frac { GM_e }{ 16R_e^2 } \)
अतः इस स्थान पर भार \( W_h = mg_h = \frac { GM_e m }{ 16R_e^2 } \) ...(2)
समी० (1) व (2) से
\( W_h = W/16 \)
In simple words: गुरुत्वीय बंधन ऊर्जा वह ऊर्जा है जो किसी वस्तु को किसी ग्रह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से अनंत तक ले जाने के लिए आवश्यक होती है। पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर वस्तु का भार गुरुत्वीय त्वरण में कमी के कारण घट जाता है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय बंधन ऊर्जा की परिभाषा और ऊंचाई के साथ गुरुत्वीय त्वरण तथा भार में परिवर्तन के सूत्रों को समझें।
Question 5. सूर्य से दो ग्रहों की दूरियाँ क्रमशः \( 10^{11} \) मीटर तथा \( 10^{10} \) मीटर हैं। इनकी चालों का अनुपात ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-
कैपलर के तृतीय नियम के अनुसार, \( T^2 = Kr^3 \)
जहाँ, \( T \) ग्रह का आवर्तकाल तथा \( r \) ग्रह की सूर्य से दूरी है। यदि ग्रहों के आवर्तकाल \( T_1 \) व \( T_2 \) तथा सूर्य से दूरियाँ क्रमशः \( r_1 \) व \( r_2 \) हों, तो
\( \frac { T_1^2 }{ T_2^2 } = \frac { r_1^3 }{ r_2^3 } \)
अथवा \( \frac { T_1 }{ T_2 } = \left( \frac { r_1 }{ r_2 } \right)^{3/2} \) ...(1)
यदि ग्रहों की कक्षाएँ वृत्ताकार हों तथा इनमें ग्रहों की चाल क्रमशः \( v_1 \) व \( v_2 \) हों, तो
\( v_1 = \frac { 2\pi r_1 }{ T_1 } \) तथा \( v_2 = \frac { 2\pi r_2 }{ T_2 } \)
अतः \( \frac { v_1 }{ v_2 } = \frac { r_1/T_1 }{ r_2/T_2 } = \frac { r_1 }{ r_2 } \times \frac { T_2 }{ T_1 } \)
परन्तु समीकरण (1) से
\( \frac { T_2 }{ T_1 } = \left( \frac { r_2 }{ r_1 } \right)^{3/2} \)
अतः \( \frac { v_1 }{ v_2 } = \frac { r_1 }{ r_2 } \times \left( \frac { r_2 }{ r_1 } \right)^{3/2} = \left( \frac { r_1 }{ r_2 } \right)^{1-3/2} = \left( \frac { r_1 }{ r_2 } \right)^{-1/2} = \left( \frac { r_2 }{ r_1 } \right)^{1/2} \)
\( = \left( \frac { 10^{10} }{ 10^{11} } \right)^{1/2} = \left( \frac { 1 }{ 10 } \right)^{1/2} = \frac { 1 }{ \sqrt{10} } \)
अथवा \( v_1 : v_2 = 1:\sqrt{10} \)
In simple words: ग्रहों की कक्षीय चालें उनकी सूर्य से दूरी पर निर्भर करती हैं, जहाँ पास वाले ग्रह तेजी से घूमते हैं और दूर वाले ग्रह धीमे। उनके चालों का अनुपात दूरी के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
🎯 Exam Tip: ग्रहों की कक्षीय चाल और परिक्रमण काल के बीच संबंधों को समझने के लिए कैपलर के नियमों का सही अनुप्रयोग महत्वपूर्ण है।
Question 6. यदि दो ग्रहों की त्रिज्याएँ \( r_1 \) तथा \( r_2 \) हों एवं उनके माध्य घनत्व \( d_1 \) तथा \( d_2 \), हों तो सिद्ध कीजिए कि दोनों ग्रहों पर गुरुत्वीय त्वरणों का अनुपात \( r_1d_1 : r_2d_2 \) होगा।
Answer: हल- चूँकि द्रव्यमान \( M = \) आयतन \( \times \) घनत्व \( = \frac { 4 }{ 3 } \pi { r }^{ 3 }\times d \)
अतः सूत्र \( g = \frac { GM }{ r^2 } \) से,
पहले ग्रह का गुरुत्वीय त्वरण,
\( g_1 = G \frac { \frac { 4 }{ 3 } \pi r_1^3 d_1 }{ r_1^2 } = \frac { 4 }{ 3 } \pi G r_1 d_1 \) ...(1)
इसी प्रकार, दूसरे ग्रह का गुरुत्वीय त्वरण,
\( g_2 = \frac { 4 }{ 3 } \pi G r_2 d_2 \) ...(2)
समी० (1) को समी० (2) से भाग करने पर,
\( \frac { g_1 }{ g_2 } = \frac { \frac { 4 }{ 3 } \pi G r_1 d_1 }{ \frac { 4 }{ 3 } \pi G r_2 d_2 } = \frac { r_1 d_1 }{ r_2 d_2 } \)
\( \implies g_1:g_2 = r_1d_1:r_2d_2 \)
In simple words: यह व्युत्पत्ति दर्शाती है कि किसी ग्रह पर गुरुत्वीय त्वरण उसकी त्रिज्या और माध्य घनत्व के समानुपाती होता है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय त्वरण के सूत्र को द्रव्यमान के घनत्व और त्रिज्या के रूप में व्यक्त करना सीखें, क्योंकि यह अक्सर तुलनात्मक प्रश्नों में उपयोगी होता है।
Question 7. पृथ्वी तल से किस ऊँचाई पर \( g \) का मान वही है जो एक 100 किमी गहरी खाई में है?
Answer: हल- माना पृथ्वी तल से \( h \) ऊँचाई पर होगा।
100 किमी गहरी खाई में \( g \) का मान
\( g' = g\left( 1-\frac { 100 }{ R_e } \right) = g\left( 1-\frac { 100 }{ 6400 } \right) = g\left( 1-\frac { 1 }{ 64 } \right) = g\frac { 63 }{ 64 } \)
अतः \( h \) ऊँचाई पर \( g \) का मान \( g_h = g\frac { 63 }{ 64 } \) होगा।
तब \( g_h = g\left( 1+\frac { h }{ R_e } \right)^{-2} \)
\( g\frac { 63 }{ 64 } = g\left( 1+\frac { h }{ R_e } \right)^{-2} \)
\( \implies \frac { 63 }{ 64 } = \frac { 1 }{ \left( 1+\frac { h }{ R_e } \right)^{2} } \)
\( \implies \left( 1+\frac { h }{ R_e } \right)^{2} = \frac { 64 }{ 63 } \)
\( \implies 1+\frac { h }{ R_e } = \sqrt { \frac { 64 }{ 63 } } = \frac { 8 }{ \sqrt { 63 } } = \frac { 8 }{ 7.937 } \)
\( \implies \frac { h }{ R_e } = \frac { 8 }{ 7.937 } - 1 = 1.00793 - 1 = 0.00793 \)
\( \implies h = R_e \times 0.00793 = 6400 \times 0.00793 = 50.752 \) किमी
In simple words: गुरुत्वीय त्वरण ऊंचाई के साथ घटता है और गहराई के साथ भी घटता है। इस गणना में, हमने वह ऊंचाई ज्ञात की जहाँ गुरुत्वीय त्वरण का मान 100 किमी की गहराई पर गुरुत्वीय त्वरण के बराबर होगा।
🎯 Exam Tip: पृथ्वी की सतह के ऊपर और नीचे गुरुत्वीय त्वरण के लिए अलग-अलग सूत्रों को याद रखना और समस्याओं को हल करने में उनका सही उपयोग करना महत्वपूर्ण है।
Question 8. पृथ्वी की त्रिज्या \( 6.4 \times 10^6 \) मी है। पृथ्वी तल से 800 किमी की ऊँचाई पर गुरुत्वीय विभव तथा गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए । (\( g = 10 \) मी/से²)
Answer: हल-
पृथ्वी के केन्द्र से प्रक्षेपण बिन्दु की दूरी \( r = R_e + h \)
\( r = 6.4 \times 10^6 + 800 \times 10^3 = 6.4 \times 10^6 + 0.8 \times 10^6 = 7.2 \times 10^6 \) मीटर
गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता \( I_G = \frac { GM_e }{ r^2 } = \frac { gR_e^2 }{ r^2 } = g \left( \frac { R_e }{ r } \right)^2 \)
\( = (10 \text{ मी/से}^2) \left( \frac { 6.4 \times 10^6 \text{ मीटर} }{ 7.2 \times 10^6 \text{ मीटर} } \right)^2 \)
\( = 10 \times \left( \frac { 6.4 }{ 7.2 } \right)^2 = 10 \times \left( \frac { 8 }{ 9 } \right)^2 = 10 \times \frac { 64 }{ 81 } = \frac { 640 }{ 81 } \approx 7.90 \) न्यूटन/किग्रा
अतः गुरुत्वीय विभव \( V_G = -\frac { GM_e }{ r } = -\frac { gR_e^2 }{ r } \)
\( = - \frac { (10 \text{ मी/से}^2) (6.4 \times 10^6 \text{ मीटर})^2 }{ 7.2 \times 10^6 \text{ मीटर} } \)
\( = - \frac { 10 \times (6.4)^2 \times 10^{12} }{ 7.2 \times 10^6 } = - \frac { 10 \times 40.96 \times 10^{12} }{ 7.2 \times 10^6 } \)
\( = - \frac { 409.6 \times 10^6 }{ 7.2 } \approx -56.88 \times 10^6 \approx -5.69 \times 10^7 \) जूल/किग्रा
In simple words: किसी ऊंचाई पर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता और विभव की गणना पृथ्वी के द्रव्यमान, त्रिज्या और गुरुत्वीय त्वरण के आधार पर की जाती है। ऊंचाई बढ़ने पर ये मान बदल जाते हैं।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय विभव और तीव्रता के सूत्रों को याद रखें और ध्यान दें कि विभव एक अदिश राशि है जबकि तीव्रता एक सदिश राशि है।
Question 9. पृथ्वी के केन्द्र से उस बिन्दु की दूरी ज्ञात कीजिए जहाँ पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता 2.5 न्यूटन/किग्रा हो । उस बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव की गणना कीजिए । (\( g = 10 \) मी/से², पृथ्वी की त्रिज्या \( R_e = 6.4 \times 10^6 \) मी)
Answer: हल-
गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता \( I = \frac { GM_e }{ r^2 } \)
हम जानते हैं कि \( GM_e = gR_e^2 \)
अतः \( I = \frac { gR_e^2 }{ r^2 } \)
\( \implies r^2 = \frac { gR_e^2 }{ I } = \frac { 10 \times (6.4 \times 10^6)^2 }{ 2.5 } \)
\( r^2 = \frac { 10 }{ 2.5 } \times (6.4 \times 10^6)^2 = 4 \times (6.4 \times 10^6)^2 \)
\( r = \sqrt { 4 \times (6.4 \times 10^6)^2 } = 2 \times 6.4 \times 10^6 = 12.8 \times 10^6 \) मीटर
गुरुत्वीय विभव \( V = -I \times r = -(2.5 \text{ न्यूटन/किग्रा}) \times (12.8 \times 10^6 \text{ मीटर}) \)
\( = -32 \times 10^6 \) जूल/किग्रा
In simple words: गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता और विभव दूरी के साथ बदलते हैं। हम तीव्रता का उपयोग करके दूरी और फिर उस बिंदु पर विभव की गणना कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता और विभव दोनों के लिए सूत्रों का सही उपयोग करें और उनकी इकाइयों का ध्यान रखें।
Question 10. सूर्य से एक ग्रह की दूरी, पृथ्वी की अपेक्षा 4 गुनी है। सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का परिक्रमण काल एक वर्ष है। उस ग्रह का परिक्रमण काल ज्ञात कीजिए।
Answer: हल- माना पृथ्वी से सूर्य की दूरी \( r_1 \) तथा पृथ्वी का सूर्य के परितः परिक्रमण काल \( T_1 = 1 \) वर्ष।
प्रश्नानुसार, ग्रह से सूर्य की दूरी \( r_2 = 4r_1 \) तथा ग्रह का परिक्रमण काल \( T_2 \)।
कैपलर के तृतीय नियम से,
\( \frac { T_2^2 }{ T_1^2 } = \frac { r_2^3 }{ r_1^3 } \)
\( \implies \left( \frac { T_2 }{ T_1 } \right)^2 = \left( \frac { r_2 }{ r_1 } \right)^3 \)
\( \implies \frac { T_2 }{ T_1 } = \left( \frac { r_2 }{ r_1 } \right)^{3/2} \)
अतः \( T_2 = T_1 \left( \frac { 4r_1 }{ r_1 } \right)^{3/2} \)
\( = 1 \text{ वर्ष} \times (4)^{3/2} = 1 \text{ वर्ष} \times (2^2)^{3/2} = 1 \text{ वर्ष} \times 2^3 = 8 \) वर्ष
In simple words: कैपलर का तीसरा नियम बताता है कि परिक्रमण काल का वर्ग ग्रह की औसत दूरी के घन के समानुपाती होता है। इस नियम का उपयोग करके, हम ग्रहों के परिक्रमण कालों की तुलना कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: कैपलर के तीसरे नियम के सूत्र को याद रखें और इसे विभिन्न ग्रहों के लिए तुलनात्मक गणनाओं में लागू करना सीखें।
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
Question 1. गुरुत्वीय त्वरण से क्या तात्पर्य है? पृथ्वी की सतह से \( h \) ऊँचाई पर गुरुत्वीय त्वरण के लिए व्यंजक पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण तथा पृथ्वी की त्रिज्या के पदों में प्राप्त कीजिए। या पृथ्वी तल से ऊपर तथा नीचे जाने पर 'g' के मान में विचरण की विवेचना कीजिए। क्या दोनों परिस्थितियों में \( g \) के घटने की दर समान होगी?
Answer: पृथ्वी तल से ऊँचाई के साथ 'g' के मान में विचरण
गुरुत्वीय त्वरण- “स्वतन्त्रतापूर्वक पृथ्वी की ओर गिरती हुई किसी वस्तु के वेग में 1 सेकण्ड में होने वाली वृद्धि अर्थात् त्वरण को गुरुत्वीय त्वरण कहते हैं। इसे 'g' से प्रदर्शित करते हैं।
पृथ्वी तल से ऊपर जाने पर ऊँचाई में वृद्धि के साथ-साथ गुरुत्वीय त्वरण का मान घटता जाता है। इस तथ्य को निम्न प्रकार से समझाया जा सकता है:
माना पृथ्वी का द्रव्यमान \( M_e \) है, जिसको इसके केन्द्र \( O \) पर ही निहित माना जा सकता है तथा \( R_e \) इसकी त्रिज्या है। यदि \( m \) द्रव्यमान की वस्तु पृथ्वी तल पर बिन्दु \( A \) पर स्थित है (चित्र 8.6) तो न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियमानुसार वस्तु पर पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल \( F=\frac { { GM }_{ e }m }{ { { R }^{ 2 } }_{ e } } \)
यह बल ही पृथ्वी तल पर इस वस्तु का भार \( mg \) होगा।
अतः \( mg=\frac { { GM }_{ e }m }{ { { R }^{ 2 } }_{ e } } \) ...(i)
(जहाँ \( g = \) पृथ्वी तल पर गुरुत्वीय त्वरण है।)
जब इस वस्तु को पृथ्वी तल से \( h \) ऊँचाई पर स्थित बिन्दु \( P \) पर रखा जायेगा, जहाँ गुरुत्वीय त्वरण \( g' \) हो, तो उपर्युक्त समी० (1) के अनुरूप इस स्थान पर
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पृथ्वी के केंद्र O, त्रिज्या Re, और द्रव्यमान Me को दर्शाता है। बिंदु A पृथ्वी की सतह पर है, जबकि बिंदु P सतह से h ऊँचाई पर स्थित है, जहाँ m द्रव्यमान की वस्तु रखी है। यह ऊंचाई के साथ गुरुत्वाकर्षण बल के परिवर्तन को समझने में मदद करता है।
\( mg'=\frac { GM_e m }{ (R_e+h)^2 } \) ...(ii)
दूरी \( OP = (OA + AP) = (R_e + h) \)
समी० (ii) को समी० (i) से भाग देने पर
\( \frac { g' }{ g } = \frac { R_e^2 }{ (R_e+h)^2 } = \frac { 1 }{ \left( 1+\frac { h }{ R_e } \right)^{2} } \)
अतः \( g' = g \frac { 1 }{ \left( 1+\frac { h }{ R_e } \right)^{2} } \)
अथवा \( g' = g\left( 1+\frac { h }{ R_e } \right)^{-2} \) ...(iii)
उपर्युक्त समी० (iii) से स्पष्ट है कि पृथ्वी तल से ऊपर जाने पर \( h \) के बढ़ने के साथ-साथ गुरुत्वीय त्वरण \( g' < g \) अर्थात् गुरुत्वीय त्वरण का मान घटता जाता है तथा अनन्त पर \( h = \infty \) के लिए यह शून्य हो जाएगा।
पृथ्वी तल से गहराई के साथ 'g' के मान में विचरण “पृथ्वी तल से नीचे जाने पर गहराई में वृद्धि के साथ-साथ गुरुत्वीय त्वरण का मान घटता जाता है।” इस तथ्य को निम्नवत् समझा जा सकता है:
माना \( m \) द्रव्यमान की कोई वस्तु पृथ्वी के अन्दर इसकी सतह से \( h \) गहराई पर स्थित बिन्दु \( P \) पर रखी है (चित्र 8.7) जिसकी पृथ्वी के केन्द्र \( O \) से दूरी \( (R_e-h) \) होगी। इस अवस्था में यदि \( O \) को केन्द्र मानकर एक गोला खींचा जाये जिसकी त्रिज्या \( (R_e-h) \) हो तो वस्तु अन्दर वाले ठोस गोले के तल पर स्थित होगी तथा बाहरी कवच के अन्दर होगी। परन्तु किसी भी खोखले गोल कवच के भीतर स्थित वस्तु पर आकर्षण बल शून्य होता है; अतः केवल अन्दर वाले ठोस गोले के कारण ही वस्तु पर आकर्षण बल कार्य करेगा। अन्दर वाले ठोस गोले का द्रव्यमान \( M_e' = (R_e-h) \) त्रिज्या के गोले का आयतन \( \times \) पृथ्वी का माध्य घनत्व \( = \frac { 4 }{ 3 } \pi { \left( { R }_{ e }-h \right) }^{ 3 }\times \rho \)
अतः न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियमानुसार, अन्दर वाले गोले के कारण वस्तु पर आकर्षण बल
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पृथ्वी को एक गोलाकार कवच के रूप में दिखाता है, जिसमें आंतरिक गोला (त्रिज्या R-h) और बाहरी कवच शामिल है। बिंदु P गहराई h पर स्थित है। यह मॉडल समझाता है कि गहराई में गुरुत्वाकर्षण बल केवल आंतरिक गोले के द्रव्यमान पर निर्भर करता है, बाहरी कवच का कोई प्रभाव नहीं होता।
\( F = \frac { GM_e' m }{ (R_e-h)^2 } = \frac { G \times \frac { 4 }{ 3 } \pi (R_e-h)^3 \rho m }{ (R_e-h)^2 } = \frac { 4 }{ 3 } \pi G (R_e-h) \rho m \)
यह बल वस्तु के भार \( mg' \) के बराबर होना चाहिए, जहाँ \( g' \) पृथ्वी तल से \( h \) गहराई पर स्थित बिन्दु पर गुरुत्वीय त्वरण है।
अतः \( mg' = \frac { 4 }{ 3 } \pi G (R_e-h) \rho m \) ...(1)
अब यदि \( m \) द्रव्यमान की यह वस्तु पृथ्वी के तल पर स्थित हो जहाँ गुरुत्वीय त्वरण \( g \) हो तो उपर्युक्त समी० (1) में \( h = 0 \) रखने पर तथा \( g' = g \) रखने पर,
\( mg = \frac { 4 }{ 3 } \pi G R_e \rho m \) ...(2)
समी० (1) को समी० (2) से भाग देने पर,
\( \frac { g' }{ g } = \frac { R_e-h }{ R_e } \)
अथवा \( g' = g\left( 1-\frac { h }{ R_e } \right) \) ...(3)
अर्थात् \( g' < g \)
अतः जैसे-जैसे हम पृथ्वी तल से नीचे की ओर जाते हैं, \( h \) में वृद्धि के साथ-साथ गुरुत्वीय त्वरण का मान घटता जाता है तथा पृथ्वी के केन्द्र \( O \) पर (जहाँ \( h = R_e \)) इसका मान शून्य हो जाता है। उपर्युक्त दोनों परिस्थितियों में 'g' के घटने की दर समान नहीं होगी, बल्कि पृथ्वी तल से गहराई में जाने की तुलना में तल से ऊँचाई पर जाने पर गुरुत्वीय त्वरण तेजी से घटता है।
In simple words: गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर घटता है क्योंकि दूरी बढ़ती है, और गहराई में जाने पर भी घटता है क्योंकि गुरुत्वाकर्षण बल केवल आंतरिक गोले के द्रव्यमान पर निर्भर करता है। ऊँचाई के साथ \( g \) घटने की दर, गहराई के साथ घटने की दर से तीव्र होती है।
🎯 Exam Tip: ऊँचाई और गहराई के साथ गुरुत्वीय त्वरण के परिवर्तन के सूत्रों को स्पष्ट रूप से समझें और उनकी व्युत्पत्ति का अभ्यास करें। यह परीक्षा में एक सामान्य प्रश्न है।
Question 2. पृथ्वी के केन्द्र से दूरी पर कोई पिण्ड जिसका द्रव्यमान \( m \) है, की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए।
Answer: पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा-माना पृथ्वी तल के बिन्दु \( A \) पर \( m \) द्रव्यमान का एक पिण्ड स्थित है। यदि पृथ्वी का द्रव्यमान \( M_e \) तथा त्रिज्या \( R_e \) हो, तो पृथ्वी द्वारा पिण्ड पर लगा गुरुत्वाकर्षण बल \( { F }_{ A }=G\left( \frac { { M }_{ e }m }{ { { R }^{ 2 } }_{ e } } \right) \)
माना \( A \) से अनन्त तक की दूरी को छोटे-छोटे भागों \( AB, BC, CD, ..... \) में विभाजित किया गया है तथा बिन्दुओं \( B, C, D, ..... \) की पृथ्वी के केन्द्र से दूरियाँ क्रमशः \( R_1, R_2, R_3,...... \) हैं। यदि पिण्ड बिन्दु \( B \) पर हो तो उस पर लगा गुरुत्वाकर्षण बल \( { F }_{ B }=G\left( \frac { { M }_{ e }m }{ { { R }^{ 2 } }_{ 1 } } \right) \)
चूँकि बिन्दु \( A \) व \( B \) बहुत समीप हैं; अतः \( A \) व \( B \) के बीच लगे बल का मान, \( A \) व \( B \) पर लगे बलों के गुणोत्तर माध्य (geometric mean) के बराबर लिया जा सकता है।
अतः \( A \) व \( B \) के बीच माध्य बल
\( F_{AB} = \sqrt { F_A \times F_B } = \sqrt { G\frac{M_e m}{R_e^2} \times G\frac{M_e m}{R_1^2} } = G\frac{M_e m}{R_e R_1} \)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पृथ्वी के केंद्र O से अनंत तक की दूरियों को A, B, C, D, E, F और G बिंदुओं से दर्शाता है, जिनकी दूरियाँ क्रमशः R, R1, R2, R3, R4 हैं। यह खंडों में गुरुत्वाकर्षण बल और कार्य की गणना को समझने में मदद करता है जब एक वस्तु को पृथ्वी की सतह से अनंत तक ले जाया जाता है।
अतः पिण्ड को \( A \) से \( B \) तक ले जाने में गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य
\( W_{AB} = \text{बल} (F_{AB}) \times \text{दूरी} (R_1 - R_e) \)
\( = G\frac{M_e m}{R_e R_1} (R_1 - R_e) = G M_e m \left( \frac{1}{R_e} - \frac{1}{R_1} \right) \) ...(1)
इसी प्रकार पिण्ड को \( B \) से \( C \) तक ले जाने में किया गया कार्य
\( W_{BC} = G M_e m \left( \frac{1}{R_1} - \frac{1}{R_2} \right) \) ...(2)
इसी प्रकार पिण्ड को \( C \) से \( D \) तक ले जाने में किया गया कार्य
\( W_{CD} = G M_e m \left( \frac{1}{R_2} - \frac{1}{R_3} \right) \) ...(3)
इसी प्रकार, \( D \) से \( E \) तक, \( E \) से \( F \) तक, .... आदि भागों के लिए किये गये कार्य के लिए व्यंजक प्राप्त किये जा सकते हैं। अतः पिण्ड को \( A \) से अनन्त तक ले जाने में किया गया कुल कार्य
\( W = W_{AB} + W_{BC} + W_{CD} +.....\infty \)
\( = G M_e m \left[ \left( \frac{1}{R_e} - \frac{1}{R_1} \right) + \left( \frac{1}{R_1} - \frac{1}{R_2} \right) + \left( \frac{1}{R_2} - \frac{1}{R_3} \right) + \left( \frac{1}{R_3} - \frac{1}{R_4} \right) + ..... + \left( \frac{1}{R_n} - \frac{1}{\infty} \right) \right] \)
या \( W = G M_e m \left[ \frac{1}{R_e} - \frac{1}{\infty} \right] \) (बीच के सभी पद परस्पर कट जाते हैं।)
\( W = \frac{GM_e m}{R_e} \)
अतः \( m \) द्रव्यमान के पिण्ड को अनन्त से \( A \) तक लाने में इतना ही कार्य प्राप्त होगा जो ऋणात्मक होगा।
प्राप्त कार्य \( = - \frac { GM_e m }{ R_e } \)
पिण्ड की पृथ्वी तल पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा \( U \) होगी।
अतः \( U = - \frac { GM_e m }{ R_e } \) (प्राप्त कार्य ऋणात्मक होता है।)
पृथ्वी के केन्द्र से \( r \) दूरी पर स्थित \( m \) द्रव्यमान के पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा
\( U = - \frac { GM_e m }{ r } \)
In simple words: गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा वह कार्य है जो किसी वस्तु को अनंत से गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में किसी बिंदु तक लाने में किया जाता है। यह हमेशा ऋणात्मक होती है क्योंकि गुरुत्वाकर्षण बल एक आकर्षक बल है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा के व्यंजक की व्युत्पत्ति को सावधानी से समझें, खासकर जब अनंत से किसी बिंदु तक वस्तु को लाने में किए गए कार्य की गणना करते हैं।
Question 3. गुरुत्वीय त्वरण तथा गुरुत्वाकर्षण नियतांक में सम्बन्ध लिखिए। पृथ्वी तल से कितना (i) नीचे जाने पर (ii) ऊपर जाने पर गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण का आधा रह जायेगा? (\( R_e = 6400 \) किमी)
Answer: 'g' तथा 'G' में सम्बन्ध
माना पृथ्वी का द्रव्यमान \( M_e \) तथा त्रिज्या \( R_e \) है तथा पृथ्वी का कुल द्रव्यमान उसके केन्द्र पर संकेन्द्रित माना जा सकता है। माना \( m \) द्रव्यमान की एक वस्तु पृथ्वी के धरातल से नगण्य ऊँचाई पर स्थित है। अतः इस वस्तु की पृथ्वी के केन्द्र से दूरी \( R_e \) ही मानी जा सकती है। अब, न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम से पृथ्वी द्वारा वस्तु पर लगाया गया आकर्षण बल \( F=\frac { { GM }_{ e }m }{ { { R }^{ 2 } }_{ e } } \) ...(1)
इस बल \( F \) के कारण ही वस्तु में गुरुत्वीय त्वरण उत्पन्न होता है। न्यूटन के गति विषयक द्वितीय नियम के आधार पर बल \( = \) द्रव्यमान \( \times \) त्वरण
\( F = m \times g \) ...(2)
समी० (1) तथा समी० (2) की तुलना करने पर,
\( mg=\frac { { GM }_{ e }m }{ { { R }^{ 2 } }_{ e } } \)
अथवा \( g=\frac { { GM }_{ e } }{ { { R }^{ 2 } }_{ e } } \) ...(3)
समीकरण (3) ही \( g \) तथा \( G \) में सम्बन्ध व्यक्त करती है। चूंकि इस व्यंजक में वस्तु का समान द्रव्यमान \( m \) नहीं आता, अतः गुरुत्वीय त्वरण \( g \) का मान गिरने वाली वस्तु के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता। इसलिए यदि वायु की अनुपस्थिति में भिन्न-भिन्न द्रव्यमान वाली वस्तुओं को समान ऊँचाई से गिराया जाए तो उनमें उत्पन्न त्वरण (\( g \)) समान होने के कारण वे सभी वस्तुएँ पृथ्वी तल पर एक साथ पहुंचेगी। वायु की उपस्थिति में उत्प्लावन प्रभाव व श्यानकर्षण के कारण सभी वस्तुओं के त्वरण भिन्न-भिन्न पाये जाते हैं। इस दशा में भारी वस्तु पृथ्वी-तल पर पहले पहुँचेगी।
(i) पृथ्वी-तल से नीचे जाने पर गुरुत्वीय त्वरण
\( g' = g\left( 1-\frac { h }{ R_e } \right) \)
प्रश्नानुसार, \( g' = g/2 \)
\( \implies \frac { g }{ 2 } =g\left( 1-\frac { h }{ 6400 } \right) \)
अतः \( \frac { 1 }{ 2 } =1-\frac { h }{ 6400 } \)
अथवा \( \frac { h }{ 6400 } =1-\frac { 1 }{ 2 } =\frac { 1 }{ 2 } \)
अतः \( h = 3200 \) किमी
(ii) पृथ्वी-तल से ऊपर जाने पर गुरुत्वीय त्वरण \( g' = g\left( 1+\frac { h }{ R_e } \right)^{-2} \)
प्रश्नानुसार, \( g' = g/2 \)
अतः \( \frac { g }{ 2 } =g\left( 1+\frac { h }{ 6400 } \right)^{-2} \)
\( \implies \frac { 1 }{ 2 } = \left( 1+\frac { h }{ 6400 } \right)^{-2} \)
\( \implies 2 = \left( 1+\frac { h }{ 6400 } \right)^{2} \)
अथवा \( \sqrt{2} = 1+\frac { h }{ 6400 } \)
\( \implies 1.414 = 1+\frac { h }{ 6400 } \)
\( \implies \frac { h }{ 6400 } = 1.414 - 1 = 0.414 \)
अथवा \( h = 6400 \times 0.414 \)
\( = 2649.6 \) किमी \( \approx 2650 \) किमी
In simple words: गुरुत्वीय त्वरण 'g' और गुरुत्वाकर्षण नियतांक 'G' एक सूत्र से जुड़े हैं। पृथ्वी की सतह से ऊपर या नीचे जाने पर 'g' का मान घटता है, लेकिन ऊपर जाने पर यह अधिक तेजी से घटता है।
🎯 Exam Tip: 'g' और 'G' के बीच संबंध, साथ ही ऊंचाई और गहराई के साथ 'g' में परिवर्तन के सूत्रों को समझना, गुरुत्वाकर्षण से संबंधित समस्याओं को हल करने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 4. गुरुत्वीय विभव की परिभाषा दीजिए । पृथ्वी के केन्द्र से \( r \) दूरी पर किसी \( m \) द्रव्यमान के पिण्ड के गुरुत्वीय विभव का सूत्र व्युत्पादित कीजिए।
Answer: गुरुत्वीय विभव (Gravitational potential)-एकांक द्रव्यमान को अनन्त से गुरुत्वीय क्षेत्र के भीतर किसी बिन्दु तक लाने में जितना कार्य होता है, उसे उस बिन्दु पर 'गुरुत्वीय विभव' कहते हैं। चूंकि यह कार्य क्षेत्र द्वारा किया जाता है; अतः गुरुत्वीय विभव सदैव ऋणात्मक होता है। यदि \( m \) किग्रा द्रव्यमान को अनन्त से गुरुत्वीय क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में \( W \) जूल कार्य प्राप्त होता है तो उस बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव \( (-W/m) \) जूल/किग्रा होगा।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक द्रव्यमान M को केंद्र O पर दिखाता है, और A, B, C बिंदु केंद्र से r, r1, r2 दूरी पर स्थित हैं, जो अनंत तक जा रही हैं। यह अनंत से गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में किसी बिंदु तक इकाई द्रव्यमान को लाने में किए गए कार्य के माध्यम से गुरुत्वीय विभव की व्युत्पत्ति को दर्शाता है।
यह एक अदिश राशि है। इसका मात्रक जूल/किग्रा तथा विमा \( [L^2T^{-2}] \) है।
\( M \) द्रव्यमान के कारण \( r \) दूरी पर गुरुत्वीय विभव का व्यंजक- माना कि \( M \) द्रव्यमान का एक पिण्ड बिन्दु \( O \) पर स्थित है। माना पिण्ड के गुरुत्वीय क्षेत्र में बिन्दु \( O \) से \( r \) मीटर दूरी पर स्थित बिन्दु \( A \) पर गुरुत्वीय विभव ज्ञात करना है। इसके लिए हम पहले \( m \) किग्रा द्रव्यमान के एक पिण्ड को \( A \) से अनन्त तक ले जाने में गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध किये गये कार्य की गणना निम्नवत् करेंगे:
\( A \) से अनन्त तक की दूरी को छोटे-छोटे भागों \( AB, BC, CD, ... \) में विभाजित हुआ मान लेते हैं। बिन्दुओं \( B, C, D,... \) की बिन्दु \( O \) से दूरियाँ क्रमशः \( r_1, r_2, r_3,... \) मीटर हैं। बिन्दु \( A \) पर स्थित \( m \) किग्रा द्रव्यमान के पिण्ड पर \( M \) के कारण गुरुत्वाकर्षण बल \( { F }_{ A }=G\left( \frac { Mm } {{r}^{2}}\right) \)
यदि पिण्ड \( B \) पर हो, तब उस पर गुरुत्वाकर्षण बल \( { F }_{ B }=G\left( \frac { Mm }{ { r1 }^{ 2 } } \right) \)
चूँकि \( A \) व \( B \) एक-दूसरे के बहुत निकट हैं; अतः \( A \) व \( B \) के बीच गुरुत्वाकर्षण बल का मान, \( A \) व \( B \) पर लगे बलों के गुणोत्तर माध्य (geometric mean) के बराबर ले सकते हैं।
अतः \( A \) व \( B \) के बीच माध्य बल \( F_{AB} = \sqrt { F_A \times F_B } = \sqrt { G\frac{Mm}{r^2} \times G\frac{Mm}{r_1^2} } = G\frac{Mm}{rr_1} \)
पिण्ड को \( A \) से \( B \) तक ले जाने में गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध किया गया कार्य
\( W_{AB} = \text{बल} (F_{AB}) \times \text{दूरी} (r_1 - r) \)
\( = G\frac{Mm}{rr_1} (r_1 - r) = GMm \left( \frac{1}{r} - \frac{1}{r_1} \right) \) ...(1)
इसी प्रकार पिण्ड को \( B \) से \( C \) तक ले जाने में किया गया कार्य
\( W_{BC} = GMm \left( \frac{1}{r_1} - \frac{1}{r_2} \right) \) ...(2)
इसी प्रकार पिण्ड को \( C \) से \( D \) तक ले जाने में किया गया कार्य
\( W_{CD} = GMm \left( \frac{1}{r_2} - \frac{1}{r_3} \right) \) ...(3)
इस प्रकार पिण्ड को \( A \) से अनन्त तक ले जाने में किया गया कार्य
\( W = W_{AB} + W_{BC} + W_{CD} + ...\infty \)
\( = GMm \left[ \left( \frac{1}{r} - \frac{1}{r_1} \right) + \left( \frac{1}{r_1} - \frac{1}{r_2} \right) + \left( \frac{1}{r_2} - \frac{1}{r_3} \right) + ... \right] \)
या \( W = GMm \left[ \frac{1}{r} - \frac{1}{\infty} \right] \) (बीच के सभी पद कट जाते हैं।)
\( W = \frac{GMm}{r} \)
अतः \( m \) द्रव्यमान के पिण्ड को अनन्त से \( A \) तक लाने में इतना ही कार्य प्राप्त होगा जो ऋणात्मक होगा।
प्राप्त कार्य \( = -\frac{GMm}{r} \)
\( A \) पर गुरुत्वीय विभव \( V_G = \frac{\text{प्राप्त कार्य}}{\text{द्रव्यमान m}} = -\frac{GMm/r}{m} \)
या \( V_G = -\frac{GM}{r} \)
In simple words: गुरुत्वीय विभव अनंत से इकाई द्रव्यमान को गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में किसी बिंदु तक लाने में किए गए कार्य को दर्शाता है। यह हमेशा ऋणात्मक होता है और केंद्रीय द्रव्यमान और दूरी पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय विभव की परिभाषा और इसके सूत्र \( V = -GM/r \) की व्युत्पत्ति को अच्छी तरह समझें, क्योंकि यह गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में ऊर्जा विश्लेषण का आधार है।
Question 5. पृथ्वी तल से किसी ऊँचाई में स्थित बिन्दु पर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता का मान 2.5 न्यूटन/किग्रा है। उस बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव की गणना कीजिए । (\( g=100 \) मी/से² तथा पृथ्वी की त्रिज्या \( R = 6.4 \times 10^6 \) मी)
Answer: हल-
गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता \( I=\left( \frac { GM }{ { r }^{ 2 } } \right) \) ...(1)
तथा गुरुत्वीय विभव \( V=-\left(\frac { GM }{ { r } } \right) \) ...(2)
समी० (1) व समी० (2) से,
\( V = -I \times r \)
परन्तु समी० (1) से \( r = \sqrt{\frac{GM}{I}} \)
हम जानते हैं कि \( GM = gR^2 \)
तो, \( r = \sqrt{\frac{gR^2}{I}} = R\sqrt{\frac{g}{I}} \)
\( = 6.4 \times 10^6 \sqrt{\frac{100}{2.5}} \) मीटर
\( = 6.4 \times 10^6 \sqrt{40} \) मीटर
\( = 6.4 \times 10^6 \times 6.324 \) मीटर
\( = 40.47 \times 10^6 \) मीटर
अब, \( V = -I \times r = -(2.5 \text{ न्यूटन/किग्रा}) \times (40.47 \times 10^6 \text{ मीटर}) \)
\( = -101.175 \times 10^6 \approx -1.01 \times 10^8 \) जूल/किग्रा
In simple words: गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता और विभव संबंधित राशियाँ हैं। तीव्रता ज्ञात होने पर, हम उस बिंदु से ग्रह के केंद्र तक की दूरी ज्ञात कर सकते हैं, और फिर विभव की गणना कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता (\( I \)) और गुरुत्वीय विभव (\( V \)) के बीच संबंध \( V = -Ir \) का उपयोग ऐसे प्रश्नों को हल करने के लिए करें, जहाँ एक राशि ज्ञात हो और दूसरी परिकलित करनी हो।
Question 6. पृथ्वी के पृष्ठ से किसी पिण्ड के पलायन वेग के व्यंजक का निगमन कीजिए। पृथ्वी के पृष्ठ के समीप किसी उपग्रह की कक्षीय चाल तथा पलायन वेग में सम्बन्ध भी बताइए।
Answer: पलायन वेग- वह न्यूनतम वेग जिससे किसी वस्तु को पृथ्वी तल से फेंकने पर वह पृथ्वी के आकर्षण क्षेत्र से बाहर निकल जाये; अर्थात् वापस लौटकर पृथ्वी पर न आ सके, पलायन वेग कहलाता है। इसे \( v_e \) से व्यक्त करते हैं।
पलायन वेग के लिए व्यंजक-अनन्त पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा शून्य मानने पर, पृथ्वी तल पर स्थित m द्रव्यमान के पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा \( U=-\left(\frac{G M_e m}{R_e}\right) \)
जहाँ \( M_e \) पृथ्वी का द्रव्यमान तथा \( R_e \) पृथ्वी की त्रिज्या है।
अतः m द्रव्यमान के पिण्ड को पृथ्वी तल से अनन्त तक ले जाने के लिए \( G M_e m / R_e \) कार्य करना पड़ता है। अतः यदि पिण्ड m को इतने वेग से फेंके कि उसकी गतिज ऊर्जा, कार्य \( G M_e m / R_e \), के बराबर हो तो वह पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र के बाहर चला जाएगा; अर्थात् अनन्त पर चला जाएगा अर्थात् पृथ्वी से सदैव के लिए पलायन कर जाएगा। यही पलायन ऊर्जा होगी।
अतः पलायन ऊर्जा \( =+\left(\frac{G M_e m}{R_e}\right) \)...(1)
इस दशा में पिण्ड को दिया गया वेग ही पिण्ड को पलायन वेग \( v_e \) होगा। अतः पिण्ड की गतिज ऊर्जा \( \frac{1}{2} m v_e^2 \) होगी।
अतः पिण्ड की गतिज ऊर्जा \( \frac{1}{2} m v_e^2 \) होगी।
अतः \( \frac{1}{2} m v_e^2=\frac{G M_e m}{R_e} \)
अथवा \( v_e=\sqrt{\frac{2 G M_e}{R_e}} \)...(2)
परन्तु पृथ्वी तल पर गुरुत्वीय त्वरण \( g=\frac{G M_e}{R_e^2} \) अथवा \( G M_e=g R_e^2 \)
यह मान समी० (2) में रखने पर,
\( v_e=\sqrt{\frac{2 g R_e^2}{R_e}} \)
अथवा पलायन वेग \( v_e=\sqrt{2 g R_e} \)...(3)
उपर्युक्त समी० (2) तथा (3) पृथ्वी तल से किसी पिण्ड के पलायन वेग के लिए अभीष्ट व्यंजक के दो विभिन्न रूप हैं। चूंकि इन सूत्रों में पिण्ड का द्रव्यमान m तथा प्रक्षेपण कोण \( \theta \) नहीं आता है; अतः पलायन वेग \( v_e \) का मान फेंके गये पिण्ड के द्रव्यमान तथा प्रक्षेपण कोण पर निर्भर नहीं करता है। अतः
पृथ्वी पर प्रत्येक पिण्ड के लिए पलायन वेग का मान एक ही होता है; चाहे उसका द्रव्यमान कुछ भी हो और वह क्षैतिज के साथ किसी भी कोण पर प्रक्षेपित किया जाये।
यह ग्रह की त्रिज्या एवं ग्रह के गुरुत्वीय त्वरण पर निर्भर करता है।
यदि किसी कृत्रिम उपग्रह को पलायन वेग के बराबर वेग से क्षैतिज दिशा में प्रक्षेपित किया जाए तो उसका पथ परवलयाकार होगा।
पलायन वेग तथा कक्षीय वेग-पलायन वेग किसी पिण्ड को पृथ्वी तल से दिया गया वह वेग है। जिससे फेंके जाने पर पिण्ड पृथ्वी तल से सदैव के लिए पलायन कर जाये; अर्थात् अनन्त पर चला जाये, जबकि कक्षीय वेग किसी पिण्ड को पृथ्वी तल से कुछ ऊँचाई पर ले जाकर दिया गया वह क्षैतिज वेग है। जिससे कि पिण्डे पृथ्वी के चारों ओर वृत्ताकार कक्षा में परिक्रमण करने लगे।
कक्षीय चाल तथा पलायन वेग में सम्बन्ध-पृथ्वी के पृष्ठ के निकट किसी उपग्रह की कक्षीय चाल
\( v_o = \sqrt{g R_e} \) तथा पलायन वेग \( v_e = \sqrt{2 g R_e} \) होता है।
अतः
\( \frac{v_o}{v_e} = \frac{\sqrt{g R_e}}{\sqrt{2 g R_e}} = \frac{1}{\sqrt{2}} \)
\( v_e = \sqrt{2} v_o \)
In simple words: पलायन वेग वह न्यूनतम वेग है जिससे किसी वस्तु को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकालने के लिए प्रक्षेपित किया जाता है। कक्षीय वेग वह वेग है जिससे कोई उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर एक निश्चित कक्षा में परिक्रमा करता है। पलायन वेग कक्षीय वेग का \( \sqrt{2} \) गुना होता है।
🎯 Exam Tip: पलायन वेग और कक्षीय वेग की परिभाषाएँ तथा उनके सूत्रों का निगमन अक्सर पूछा जाता है। उनके बीच के संबंध को स्पष्ट करना भी महत्वपूर्ण है।
Question 7. पृथ्वी की सतह से h ऊँचाई पर किसी कृत्रिम उपग्रह की कक्षीय चाल के लिए व्यंजक स्थापित कीजिए। दर्शाइए कि उपग्रह का वेग उसके द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है। या, उपग्रहों की कक्षीय चाल के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए।
Answer: जिस तरह विभिन्न ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं, उसी तरह कुछ आकाशीय पिण्ड इन ग्रहों (planets) के चारों ओर भी चक्कर लगाते हैं। इन पिण्डों को उपग्रह (satellites) कहते हैं; जैसे चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर वृत्तीय कक्षा में चक्कर लगाता है। अतः पृथ्वी एक ग्रह तथा चन्द्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है। उपग्रह की कक्षीय चाल-पृथ्वी के चारों ओर वृत्तीय कक्षा जिसकी त्रिज्या r है, में कक्षीय चाल \( v_o \), से परिक्रमण कर रहे उपग्रह (द्रव्यमान m) पर एक अभिकेन्द्र बल \( (m v_o^2 / r) \) लगता है जो पृथ्वी द्वारा उपग्रह पर लगाये गये गुरुत्वाकर्षण बल \( (G M_e m / r^2) \) से प्राप्त होता है, जहाँ \( M_e \) पृथ्वी का द्रव्यमान है।
अतः
\( G \frac{M_e m}{r^2} = \frac{m v_o^2}{r} \)
या
\( v_o^2 = \frac{G M_e}{r} \)
या \( v_o = \sqrt{\frac{G M_e}{r}} \)...(1)
यदि उपग्रह पृथ्वी तल से h ऊँचाई पर है तो पृथ्वी के केन्द्र से उपग्रह की दूरी \( r = R_e+h \)
जहाँ \( R_e \) पृथ्वी की त्रिज्या है। r का यह मान समी० (1) में रखने पर,
\( v_o = \sqrt{\frac{G M_e}{(R_e+h)}} \)...(2)
परन्तु \( g=\frac{G M_e}{R_e^2} \)
अतः \( G M_e = g R_e^2 \)
या \( v_o = \sqrt{\frac{g R_e^2}{(R_e+h)}} \)
\( v_o = R_e \sqrt{\frac{g}{(R_e+h)}} \)...(3)
स्पष्ट है कि कक्षीय चाल उपग्रह के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करती है। यह केवल उसकी पृथ्वी तल से ऊँचाई पर निर्भर करती है।
यदि उपग्रह पृथ्वी तल के अति समीप है; अर्थात् \( h \ll R_e \), तब h को \( R_e \) की तुलना में नगण्य मान सकते हैं।
अतः समी० (3) से
\( v_o = \sqrt{(g R_e)} \)
\( = \sqrt{(9.8 \times 6.37 \times 10^6)} \)
\( = 8 \times 10^3 \) मी/से = 8 किमी/से
उपग्रह की कक्षीय चाल (वेग) के उपर्युक्त सूत्रों में उपग्रह का द्रव्यमान नहीं आता है, अतः इससे सिद्ध होता है कि उपग्रह की कक्षीय चाल (वेग) उसके द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करती है। अतः भिन्न-भिन्न द्रव्यमान के दो कृत्रिम उपग्रह एक ही कक्षा में साथ-साथ एक ही कक्षीय चाल से परिभ्रमण करेंगे।
In simple words: उपग्रह की कक्षीय चाल वह गति है जिससे वह किसी ग्रह के चारों ओर एक निश्चित कक्षा में घूमता है। यह चाल उपग्रह के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करती है, बल्कि ग्रह के द्रव्यमान, उसकी त्रिज्या और उपग्रह की ऊँचाई पर निर्भर करती है।
🎯 Exam Tip: कक्षीय चाल के व्यंजक का निगमन करते समय अभिकेन्द्र बल को गुरुत्वाकर्षण बल के बराबर रखना महत्वपूर्ण है। सूत्र में उपग्रह का द्रव्यमान न होने का अर्थ समझाना आवश्यक है।
Question 8. पृथ्वी तल से h ऊँचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे कृत्रिम उपग्रह के परिक्रमण काल के | लिए सूत्र स्थापित कीजिए। या किसी उपग्रह के परिक्रमण काल का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
Answer: कृत्रिम उपग्रह का परिक्रमण काल-यदि कृत्रिम उपग्रह की वृत्तीय कक्षा की त्रिज्या r हो, जहाँ \( r = R_e+h \) (जिसमें \( R_e \) = पृथ्वी की त्रिज्या तथा h = पृथ्वी तल से कृत्रिम उपग्रह की ऊँचाई) तो उपग्रह का परिक्रमण काल अर्थात् पृथ्वी के चारों ओर एक चक्कर पूरा करने में लगा समय
\( T=\frac{2 \pi r}{v_o} = \frac{2 \pi (R_e+h)}{v_o} \)
जहाँ उपग्रह की कक्षीय चाल, \( v_o = \sqrt{\frac{G M_e}{(R_e+h)}} \)
[जिसमें \( M_e \) = पृथ्वी का द्रव्यमान तथा G = सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक]
\( T=\frac{2 \pi (R_e+h)}{\left\{G M_e /(R_e+h)\right\}^{1 / 2}} = 2 \pi \sqrt{\frac{(R_e+h)^3}{G M_e}} \)...(1)
परन्तु \( G M_e = g R_e^2 \).
\( T = 2 \pi \sqrt{\frac{(R_e+h)^3}{g R_e^2}} \)...(2)
उपर्युक्त समी० (1) तथा (2) परिक्रमण काल के अभीष्ट सूत्र हैं।
In simple words: किसी उपग्रह का परिक्रमण काल वह समय है जो उसे किसी ग्रह के चारों ओर एक पूरा चक्कर लगाने में लगता है। यह ग्रह के द्रव्यमान, उसकी त्रिज्या और उपग्रह की कक्षा की ऊँचाई पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: परिक्रमण काल के सूत्र का निगमन करते समय कक्षीय चाल के व्यंजक का उपयोग करें और ध्यान दें कि \( r = R_e+h \) है। गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक G और गुरुत्वीय त्वरण g के पदों में सूत्र देना महत्वपूर्ण है।
Question 9. पृथ्वी के समीप परिक्रमा करने वाले उपग्रह की सम्पूर्ण ऊर्जा के लिए सूत्र स्थापित कीजिए। इसको मान ऋणात्मक क्यों होता है?
Answer: पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करता हुआ उपग्रह पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र में रहता है, इसलिए उपग्रह में स्थितिज ऊर्जा होती है तथा उपग्रह की गति के कारण इसमें गतिज ऊर्जा होती है। इस प्रकार पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करते हुए उपग्रह की स्थितिज एवं गतिज ऊर्जाओं का योग ही इसकी कुल ऊर्जा होती है। अनन्त पर किसी पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा शून्य मानते हुए पृथ्वी तल पर स्थित m द्रव्यमान के पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा
निम्नलिखित सूत्र से व्यक्त की जाती है \( U_e=-\left(\frac{G M_e m}{R_e}\right) \) (जहाँ \( M_e \) = पृथ्वी का द्रव्यमान तथा \( R_e \) = पृथ्वी की त्रिज्या)
यदि कोई कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी तल के समीप ही पृथ्वी की परिक्रमा वृत्तीय कक्षा में कर रहा हो तो उसकी कक्षीय त्रिज्या r को \( R_e \) के बराबर मान सकते हैं। तब यदि उपग्रह का द्रव्यमान m हो तो उसकी गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा \( U = U_e \) ही होगी
\( U=-\left(\frac{G M_e m}{R_e}\right) \)...(1)
यदि उपग्रह की कक्षीय चाल \( v_o \) हो तो उपग्रह की गतिज ऊर्जा \( K=\frac{1}{2} m v_o^2 \)
परन्तु \( v_o=\sqrt{\frac{G M_e}{r}} = \sqrt{\frac{G M_e}{R_e}} \) (r = \( R_e \) लेते हुए)
उपग्रह की गतिज ऊर्जा \( K=\frac{1}{2} m \times \frac{G M_e}{R_e} = \frac{1}{2}\left(\frac{G M_e m}{R_e}\right) \)...(2)
अतः उपग्रह की कुल ऊर्जा \( E = U+K \)
\( E = -\left(\frac{G M_e m}{R_e}\right) + \frac{1}{2}\left(\frac{G M_e m}{R_e}\right) \)
या
\( E = -\frac{1}{2}\left(\frac{G M_e m}{R_e}\right) \)...(3)
उपग्रह की कुल ऊर्जा के सूत्र में ऋणात्मक चिह्न इस तथ्य का प्रतीक है कि उपग्रह की कुल ऊर्जा ऋणात्मक है। इसका एक विशेष अर्थ है। अनन्त पर \( (r = \infty) \) उपग्रह की गतिज ऊर्जा व स्थितिज ऊर्जा दोनों ही शून्य हैं; अतः अनन्त पर उपग्रह की कुल ऊर्जा शून्य है। परन्तु गतिज ऊर्जा ऋणात्मक नहीं हो सकती। तब कुल ऊर्जा ऋणात्मक होने का अर्थ है कि उपग्रह को अनन्त पर भेजने के लिए अर्थात् कुल ऊर्जा शून्य करने के लिए हमें उपग्रह को ऊर्जा देनी पड़ेगी। जब तक परिक्रमण करते उपग्रह को अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त नहीं होगी तब तक वह अपनी कक्षा नहीं छोड़ेगा अर्थात् बन्द कक्षा में ही परिक्रमण करता रहेगा, अर्थात् उपग्रह पृथ्वी से बद्ध (bound) रहेगा।
In simple words: उपग्रह की सम्पूर्ण ऊर्जा, उसकी गतिज और स्थितिज ऊर्जा का योग होती है। इसका मान ऋणात्मक होता है, जिसका अर्थ है कि उपग्रह गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा ग्रह से बंधा हुआ है और उसे कक्षा से बाहर निकालने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होगी।
🎯 Exam Tip: उपग्रह की कुल ऊर्जा ऋणात्मक क्यों होती है, यह अवधारणात्मक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है। गतिज और स्थितिज ऊर्जा के सूत्रों को सही ढंग से निगमित करना और उनके योग को दर्शाना महत्वपूर्ण है।
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