UP Board Solutions Class 11 Hindi Chapter 3 Surdas

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Chapter Solutions: Class 11 Hindi (UP Board) - Chapter 3 सूरदास

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Class 11 Hindi Chapter 3 सूरदास UP Board Solutions PDF

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

Question 1. सूरदास का जीवन-परिचय लिखिए।
या
सूरदास की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
या
सूरदास का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए तथा साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
Answer: जीवन-परिचय - महाकवि सूरदास हिन्दी-साहित्याकाश के सूर्य माने गये हैं। वे ब्रजभाषा के कवियों में बेजोड़ माने जाते हैं। अष्टछाप के कवियों के तो वे सिरमौर थे ही, कृष्णभक्त कवियों में भी उनकी समता का कोई दूसरा कवि दिखाई नहीं पड़ता। इनके जन्मकाल के विषय में मतभेद हैं। भारतीय विद्वानों की यह परम्परा रही है कि वे अपने नाम से नहीं, अपितु अपने काम से अमर होना चाहते हैं। यही कारण रहा है जिसके चलते भारतीय साहित्यकारों के जन्म से जुड़े हुए प्रसंग सदैव विवादास्पद रहे हैं। सूरदास जी का जन्म वैशाख शुक्ल षष्ठी, संवत् 1535 (सन् 1478 ई०) को मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता (रेणुका क्षेत्र) ग्राम में हुआ। कुछ विद्वान् इनका जन्म दिल्ली के निकट सीही नामक ग्राम में हुआ मानते हैं। ये सारस्वत ब्राह्मण रामदास के पुत्र थे। इनकी माता के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। ये जन्मान्ध थे या बाद में नेत्रहीन हुए, इस सम्बन्ध में भी विवाद हैं। इन्होंने प्रकृति के नाना व्यापारों, मानव-स्वभाव एवं चेष्टाओं आदि का जैसा सूक्ष्म व हृदयग्राही वर्णन किया है, उससे यह जान पड़ता है कि ये बाद में नेत्रहीन हुए। आरम्भ से ही इनमें भगवद्भक्ति स्फुरित हुई । मथुरा के निकट गऊघाट पर ये भगवान् के विनय के पद गाते हुए निवास करते थे। यहीं इनकी महाप्रभु वल्लभाचार्य से भेंट हुई, जिन्होंने इनके सरस पद सुनकर इन्हें अपना शिष्य बनाया और गोवर्धन पर स्थित श्रीनाथजी के मन्दिर का मुख्य कीर्तनिया नियुक्त किया। यहीं इन्होंने श्रीमद्भागवत् में वर्णित कृष्णचरित्र का ललित पदों में गायन किया। महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की भक्ति-सम्प्रदाय 'पुष्टिमार्ग कहलाता है। एकमात्र भगवान् की कृपा पर ही निर्भरता को सिद्धान्तरूप में गृहीत करने के कारण यह पुष्टि सम्प्रदाय' कहलाता है। गुरु के प्रति इनकी अगाध श्रद्धा थी। अन्त समय में इन्होंने अपने दीक्षागुरु महाप्रभु वल्लभाचार्य जी का स्मरण निम्नलिखित शब्दों में किया
भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो।
श्रीबल्लभ-नखचन्द्र-प्रभा बिनु सब जग माँझ अँधेरो ॥
श्री वल्लभाचार्य जी की मृत्यु के उपरान्त उनके पुत्र गोस्वामी बिट्ठलनाथ जी ने पुष्टिमार्ग के आठ सर्वश्रेष्ठ कवि एवं गायकों को लेकर अष्टछाप की स्थापना की। सूरदास का इनमें सबसे प्रमुख स्थान था। गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में इनकी मृत्यु संवत् 1640 (सन् 1583 ई०) में हुई। कहते हैं कि मृत्यु के समय इन्होंने यह पद गाकर प्राण त्यागे-'खंजन नैन रूप रस माते ।'
कृतियाँ - सूरदास की कीर्ति का मुख्य आधार उनका 'सूरसागर' ग्रन्थ है। इसके अतिरिक्त 'सूरसारावली' और 'साहित्य लहरी' भी उनकी रचनाएँ मानी जाती हैं, यद्यपि कतिपय विद्वानों ने इनकी प्रामाणिकता में सन्देह प्रकट किया है। 'सूरसागर' में श्रीमद्भागवत' के दशम स्कन्ध की कृष्णलीलाओं का विविध भाव-भंगिमाओं में गायन किया गया है।
In simple words: सूरदास हिंदी साहित्य के महान कवि थे, जिन्होंने ब्रजभाषा में भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं और प्रेम का अद्भुत वर्णन किया। वे अष्टछाप के प्रमुख कवि थे और अपने काव्य में वात्सल्य और श्रृंगार रस को सर्वोच्च स्थान दिया।

🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय लिखते समय जन्म, मृत्यु, गुरु, रचनाएँ और काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये अंक निर्धारण के मुख्य बिंदु होते हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ

भगवान् के लोकरंजक रूप का चित्रण - सूरदास ने भगवान् के लोकरंजक (संसार को आनन्दित करने वाले) रूप को लेकर उनकी लीलाओं का गायन किया है। तुलसी के समान उनका उद्देश्य संसार को उपदेश देना नहीं, अपितु उसे कृष्ण की मनोहारिणी लीलाओं के रस में डुबोना था। वल्लभाचार्य जी के शिष्य बनने से पहले। सूर विनय के पद गाया करते थे, जिनमें दास्य भाव की प्रधानता थी। इनमें अपनी दीनता और भगवान् की महत्ता : का वर्णन रहता था ।
(क) मो सम कौन कुटिल खल कामी ।
(ख) हरि मैं सब पतितन को राऊ । किन्तु पुष्टिमार्ग में दीक्षित होने के उपरान्त सूर ने विनय के पद गाने के स्थान पर कृष्ण की बाल्यावस्था और किशोरावस्था की लीलाओं को बड़ा हृदयहारी गायन किया।

वात्सल्य वर्णन सूरदास का काव्य-क्षेत्र मुख्य रूप से वात्सल्य और श्रृंगार, इन दो रसों तक ही सिमटकर रह गया। पर इस सीमित क्षेत्र में भी सूरदास की प्रतिभा ने जो कमाल किया, वह बेजोड़ है। इन क्षेत्रों का कोना-कोना वे झाँक आये कि काव्यशास्त्र के पंडितों को वात्सल्य को एक स्वतन्त्र रस की मान्यता देनी ही पड़ी ।

(1) वात्सल्य का संयोग पक्ष - वात्सल्य रस का जैसा सरस और विशद वर्णन सूर ने किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। पुत्र को पालने में झुलाना और उसे लोरियाँ गाकर सुलाना मातृजीवन की सहज अभिलाषा होती है। इसके अतिरिक्त बालक की बाह्य चेष्टाओं और क्रियाओं, उनकी मनोवैज्ञानिक चपलताओं का सुन्दर अंकन तथा माता-पिता को उन पर बलिहारी होना आदि के चित्रण द्वारा उन्होंने वात्सल्य के संयोग पक्ष को परिपुष्ट किया है। इसका संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है
कबहुँ पलक हरि मूंद लेते हैं, कबहुँ अधर फरकावै ॥

(2) वात्सल्य का वियोग पक्ष - वात्सल्य के वियोग-पक्ष के अन्तर्गत कृष्ण के मथुरा चले जाने पर उनके प्रति नन्द-यशोदा के हृदयस्पर्शी उद्गार सूरदास ने बड़ी मार्मिकता से वर्णित किये हैं
तुम तो टेब जानतिहि है हो, तऊ मोहिं कहि आवै ।
प्रात उठत मेरे लाल-लद्वैतहिं, माखन रोटी भावै ॥
वात्सल्य में सूर की इस असाधारण और अद्वितीय सफलता के रहस्य का उद्घाटन करते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि, “सूर वस्तुतः वयः-प्राप्त शिशु थे। कदाचित् इसी कारण अपनी बन्द आँखों से सूर जो देख और दिखा सके, उसका शतांश भी खुली आँखों वाले न देख सके ।”

श्रृंगार वर्णन

वात्सल्य के समान ही श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों पर सूर को समान अधिकार है। इस सम्बन्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं, “श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का इतना प्रचुर विस्तार और किसी कवि में नहीं मिलता।' इन दोनों पक्षों का संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है

(1) संयोग पक्ष - वृन्दावन में कृष्ण और गोपियों का सम्पूर्ण जीवन क्रीड़ामय है, जो संयोग श्रृंगार के ही अन्तर्गत आता है। इसमें कृष्ण और राधा के अंग-प्रत्यंग की शोभा को अनेकानेक पदों में अत्यन्त चमत्कारपूर्ण वर्णन करने के बाद सूर वृन्दावन की करील-कुंजों, सुन्दर लताओं, हरे-भरे कछारों के बीच खिली हुई चाँदनी और कोकिल-कूजन के उद्दीपक परिवेश में कृष्ण, राधा और गोपिकाओं की विभिन्न क्रीड़ाएँ चित्रित करते हैं। कृष्ण और राधा का परिचय पारस्परिक आकर्षण से आरम्भ होकर संलाप से घनिष्ठ होता है
बूझत स्याम, कौन तू, गौरी ?
कहाँ रहति, काकी तू बेटी, देखी नाहिं कबहुँ ब्रज-खोरी।”
"काहे को हम ब्रज तन आवति? खेलति रहति अपनी पौरी ।
सुनति रहति श्रवनन नँद-ढोंटा, करत रहत माखन दधि चोरी ॥"
“तुम्हरो कहा चोरि हम लैहें? खेलन चल संग मिलि जोरी ।
सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि बातन भुरई राधिका भोरी ॥"

(2) वियोग पक्ष - सूर ने जिस कौशल और पूर्णता से संयोग का चित्राधार खड़ा किया है, उससे कहीं अधिक मार्मिकता से वियोग के चित्र भी उकेरे हैं; क्योंकि प्रेम की साधना वस्तुतः विरह की साधना है। सूर ने स्वयं कहा है। कि विरह प्रेम को पुष्ट करता है "ऊधौ, विरही प्रेम करै”। इस रस के कुछ छींटे द्रष्टव्य हैं.
(i) पिया बिनु नागिनी काली रात।
(ii) उर में माखनचोर गड़े ।
इनमें गोपिकाओं के अनन्य (एकनिष्ठ) प्रेम, राधिका की विरह-वेदना के मार्मिक चित्र दिखाई पड़ते हैं। प्रेम की प्रगाढ़ता से ऐसा विरह उत्पन्न होता है, जिसका अनुभव भी कोई संवेदनशील रसमग्न हृदय ही कर सकता है। उपर्युक्त के अतिरिक्त प्रकृति-चित्रण तथा प्रेम की अलौकिकता का चित्रण सूरदास के काव्य की अन्यतम भावपक्षीय विशेषताएँ हैं।

प्रकृति-चित्रण - सूरदास के काव्य में प्रकृति का प्रयोग कहीं पृष्ठभूमि रूप में, कहीं उद्दीपन रूप में और कहीं अलंकारों के रूप में किया गया है। गोपियों के विरह-वर्णन में प्रकृति का प्रयोग सर्वाधिक मात्रा में किया गया है; यथा
कोउ माई बरजो री या चंदहि ।
अति ही क्रोध करत है हम पर, कुमुदिनि कुल अनन्दहि ॥

प्रेम की अलौकिकता - राधा-कृष्ण व गोपी-कृष्ण प्रेम में सूर ने प्रेम की अलौकिकता प्रदर्शित की है। उद्धव गोपियों को निराकार ब्रह्म का सन्देश देते हैं; परन्तु वे किसी भी प्रकार उद्धव के दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होतीं। गोपियाँ अपने तर्कों से उद्धव को परास्त कर देती हैं और श्रीकृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम का परिचय देती हैं।

कलापक्ष की विशेषताएँ

भाषा - सूर का सम्पूर्ण काव्य ब्रजभाषा में है। उनकी भाषा में सरसता, कोमलता और प्रवाहमयता सर्वत्र विद्यमान है। सूर की ब्रजभाषा ब्रज की ठेठ चलती बोली न होकर कुछ साहित्यिकता लिये हुए है, जिसमें दूसरे प्रदेशों के कुछ प्रचलित शब्दों के साथ-साथ अपभ्रंश के शब्द भी मिश्रित हैं। चलती ब्रजभाषा के 'जाको', 'वाको', 'तासों जैसे रूपों के समान ही 'जेहि', 'तेहि जैसे पुराने रूपों का प्रयोग भी मिलता है। 'गोड़', 'आपन', 'हमार' आदि पूरबी प्रयोग भी बराबर पाये जाते हैं। कुछ पंजाबी प्रयोग भी मौजूद हैं; जैसे-'महँगी' के अर्थ में 'प्यारी' शब्द । यद्यपि बहुत कम किन्तु कहीं-कहीं गरीब नवाज जैसे उर्दू शब्द का भी प्रयोग हुआ है।

शैली - सूर की शैली गीति-शैली है। ये संगीत के परम मर्मज्ञ थे, इसलिए इनके पद विभिन्न राग-रागिनियों में बँधे हैं। सूर स्वयं महान् गायक थे और गाते-गाते ही पदों की रचना करते चलते थे। फलतः उनके गेय-पदों में असाधारण संगीतात्मकता है, जो उनकी भाषा के माधुर्य के साथ मिलकर हृदय को मोह लेती है।

अलंकार-विधान - सूरदास का अलंकार-विधान अत्यधिक पुष्ट है। उन्होंने श्लेष, यमक, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त, अर्थान्तरन्यास, अन्योक्ति आदि नाना अलंकारों का प्रयोग अतीव कुशलता से किया है। उनके काव्य में अलंकार बड़ी सहजता से स्वतः ही आते चले गये हैं, उनके लिए किसी प्रकार का प्रयास नहीं दिखाई पड़ता । लम्बे-लम्बे सांगरूपकों तक का निर्वाह सूर ने जिस कुशलता से किया है, वह विस्मयकारी है
“सूरदास खल कारी कामरी चढे न दूजौ रंग।”

छन्दविधान - सूर ने अपने काव्य में चौपाई, दोहा, रोला, छप्पय, सवैया, घनाक्षरी आदि विविध प्रकार के परम्परागत छन्दों का प्रयोग किया है।

साहित्य में स्थान - सूरदास के कृतित्व और महत्त्व की अनेक प्रशस्तियों से हिन्दी-साहित्य भरा पड़ा है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है
सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास ।
अब के कवि खद्योत सम, जहँ तहँ करत प्रकास ॥
यदि इसे अतिशयोक्ति भी मानें तो कम-से-कम इतना तो निःसंकोच कहा ही जा सकता है कि तुलसी के समान । व्यापक काव्यक्षेत्र न चुनने पर भी सूर ने अपने सीमित क्षेत्र–वात्सल्य और श्रृंगार का कोई कोना ऐसा न छोड़ा, जो उनके संचरण से अछूता रह गया हो। वे निर्विवाद रूप से वात्सल्य और श्रृंगार रस के सम्राट् हैं।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

Question. निम्नलिखित पद्यांशों के आधार पर उनसे सम्बन्धित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

विनय

मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै । जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पर आवै ।।
कमल-नैन कौ छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै ।।
परम गंग कौ छाँड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै ।।
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यौं करील-फल भावै ।।
सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ।।

Question (i). उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए ।
Answer: यह पद सूरदास के 'सूरसागर' से हमारी पाठ्य-पुस्तक 'काव्यांजलि' में संकलित 'विनय' शीर्षक पदों से उद्धृत है। अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम - विनय ।
कवि का नाम - सूरदास ।
In simple words: इस पद्यांश का शीर्षक 'विनय' है और इसके कवि सूरदास हैं, जो 'सूरसागर' नामक कृति से लिया गया है।

🎯 Exam Tip: कवि और शीर्षक का नाम पद्यांश-आधारित प्रश्नों में अक्सर पूछा जाता है; सही उत्तर के लिए कवि की प्रमुख रचनाओं और उनके अध्यायों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question (ii). रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: रेखांकित अंश की व्याख्या - जहाज पर बैठा हुआ पक्षी बीच समुद्र में दूसरे अच्छे स्थान की खोज में जहाज पर से उड़कर दूर-दूर तक भटकता रहता है, किन्तु उसे सर्वत्र जल-ही-जल दिखाई देता है। उसे कहीं पंजे टिकाने का भी स्थान नहीं मिलता और अन्ततः वह जहाज पर ही लौटकर आ जाता है; क्योंकि वही उसका एकमात्र आश्रय होता है। इसी प्रकार कवि विभिन्न देवी-देवताओं की आराधना द्वारा मोक्ष को प्राप्त करने में असफल होने पर पुनः श्रीकृष्ण की शरण में ही आ गया है। कवि का कथन है कि संसाररूपी सागर में प्रभु का नाम ही जहाज स्वरूप है।
In simple words: कवि कहते हैं कि जिस प्रकार जहाज का पंछी भटककर जहाज पर ही लौट आता है, उसी प्रकार उनका मन श्रीकृष्ण को छोड़कर कहीं और सुख नहीं पाता। संसार रूपी सागर में प्रभु का नाम ही एकमात्र आश्रय है।

🎯 Exam Tip: रेखांकित अंश की व्याख्या करते समय मूल भाव को स्पष्ट करें, प्रतीकों का अर्थ समझाएँ और कवि के मर्म को सरल शब्दों में व्यक्त करें।

 

Question (iii). सूरदास किसकी भक्ति में परम सुख का अनुभव करते हैं?
Answer: सूरदास भगवान कृष्ण की भक्ति में परम सुख का अनुभव करते हैं।
In simple words: सूरदास का मन केवल भगवान कृष्ण की भक्ति में ही सच्चा सुख और शांति पाता है, अन्य किसी देवी-देवता में नहीं।

🎯 Exam Tip: ऐसे सीधे प्रश्नों के उत्तर में मुख्य बिंदु को स्पष्ट और संक्षिप्त रूप से लिखें, जिससे सीधा और सटीक उत्तर मिले।

 

Question (iv). जहाज का पक्षी किसे कहा गया है?
Answer: सूरदास को मन के जहाज का पंक्षी कहा गया है।
In simple words: इस पद में, कवि ने अपने मन को जहाज पर बैठे उस पक्षी के समान बताया है जो कहीं और आश्रय न पाकर वापस जहाज पर ही लौट आता है।

🎯 Exam Tip: उपमा या प्रतीक वाले प्रश्नों में, यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि किस वस्तु को किस से तुलना की गई है, और इसका निहितार्थ क्या है।

 

Question (v). सूरदास ने भगवान कृष्ण की भक्ति को त्यागकर अन्य देवताओं की भक्ति करने को क्या बताया है?
Answer: सूरदास ने भगवान कृष्ण की भक्ति को त्यागकर अन्य देवताओं की भक्ति करने को मूर्खता बताया है।
In simple words: सूरदास के अनुसार, कृष्ण भक्ति को छोड़कर किसी और की भक्ति करना वैसा ही है जैसे प्यासा व्यक्ति गंगा जल छोड़कर कुआँ खोदना या कामधेनु गाय छोड़कर बकरी दुहना, यानी यह एक व्यर्थ प्रयास है।

🎯 Exam Tip: कवि के विचारों या दृष्टिकोण को व्यक्त करने वाले प्रश्नों में, कवि की भावनाओं और उसके तर्क को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।

वात्सल्य

हरि जू की बाल-छवि कहौं बरनि । सकल सुख की सींव, कोटि-मनोज-शोभा-हरनि ।। भुज भुजंग, सरोज नैननि, बदन बिधु जित लरनि । रहे बिवरनि, सलिल, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि ।। मंजु मेचक मृदुल तनु, अनुहरत भूषन भरनि । मनहुँ सुभग सिंगार-सिसु-तरु, फयौ अद्भुत फरनि ।। चलत पद-प्रतिबिंब मनि आँगन घुटुरुवनि करनि । जलज-संपुट-सुभग-छबि भरि लेति उर जनु धरनि ।। पुन्य फल अनुभवति सुतहिं बिलोकि कै नँद-घरनि ।
सूरे प्रभु की उर बसी किलकनि ललित लरखरनि ।।

Question (i). उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
Answer: यह पद सूरदास के ‘सूरसागर' से हमारी पाठ्य-पुस्तक 'काव्यांजलि' में संकलित ‘वात्सल्य' शीर्षक से उधृत है। अर्थात् निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम - वात्सल्य।
कवि का नाम - सूरदास ।।
In simple words: इस पद्यांश का शीर्षक 'वात्सल्य' है और इसके रचयिता महाकवि सूरदास हैं, जो उनके प्रसिद्ध ग्रंथ 'सूरसागर' से उद्धृत है।

🎯 Exam Tip: पद्यांश के संदर्भ को समझने के लिए उसके शीर्षक और कवि के नाम को जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह काव्य के मूल विषयवस्तु को समझने में सहायक होता है।

 

Question (ii). रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: रेखांकित अंश की व्याख्या - सूरदास जी कहते हैं कि मैं कृष्ण की बाल-शोभा का वर्णन करता हूँ। वह शोभा करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को भी हरने वाली (अर्थात् उससे भी बढ़कर) है और समस्त सुखों की सीमा है (अर्थात् सुखों की जो ऊँची-से-ऊँची.कल्पना की जा सकती है, वह उस सौन्दर्य को देखकर प्राप्त होती है)। नन्द-पत्नी यशोदा अपने पुत्र कृष्ण को देखकर अनुभव करती हैं कि उनके अनन्त पुण्यों के फलस्वरूप ही ऐसा बालक उन्हें मिला है। सूरदास जी कहते हैं कि मेरे हृदय में तो प्रभु की मोहक किलकारियाँ और उनका लड़खड़ाकर चलना बस गया है।
In simple words: कवि श्रीकृष्ण की बाल-छवि का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उनकी सुंदरता करोड़ों कामदेवों को लज्जित करती है और सभी सुखों की पराकाष्ठा है। माता यशोदा अपने पुत्र को देखकर अपने अनंत पुण्यों का फल अनुभव करती हैं, और कवि के हृदय में कृष्ण की किलकारियाँ और बाल-लीलाएँ बस गई हैं।

🎯 Exam Tip: व्याख्या करते समय केवल शाब्दिक अर्थ न बताकर, कवि की भावना और निहितार्थ को भी स्पष्ट करें, तथा काव्य सौंदर्य पर भी ध्यान दें।

 

Question (iii). सूरदास ने किनकी शोभा को करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य को हरने वाली बताया है?
Answer: सूरदास ने श्रीकृष्ण की मनोहारी बाल शोभा को करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को हरने वाली बताया है।
In simple words: सूरदास ने भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की अनुपम सुंदरता को करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य से भी बढ़कर और उन्हें मोहित करने वाला बताया है।

🎯 Exam Tip: सीधे उत्तर वाले प्रश्नों में, विशिष्ट नामों और विशेषताओं का सही उल्लेख करना महत्वपूर्ण है ताकि पूर्ण अंक प्राप्त हो सकें।

 

Question (iv). नन्द-पत्नी यशोदा पुत्र कृष्ण को देखकर कैसा अनुभव करती हैं?
Answer: नन्द-पत्नी यशोदा पुत्र कृष्ण को देखकर अनुभव करती हैं कि उनके अनन्त पुण्यों के फलस्वरूप ही ऐसा बालक उन्हें मिला है।
In simple words: माता यशोदा अपने पुत्र कृष्ण को देखकर अत्यधिक प्रसन्न और धन्य महसूस करती हैं, उन्हें लगता है कि कृष्ण का मिलना उनके अनगिनत पुण्यों का फल है।

🎯 Exam Tip: पात्रों की भावनाओं या अनुभूतियों से संबंधित प्रश्नों में, उनके भावनात्मक स्थिति को सटीक रूप से वर्णित करना चाहिए।

 

Question (v). 'मनहुँ सुभग सिंगार-सिसु-तरु, फयौ अद्भुत फरनि ।' पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
Answer: उत्प्रेक्षा और अनुप्रास अलंकार ।
In simple words: इस पंक्ति में 'मनहुँ' शब्द के प्रयोग से 'उत्प्रेक्षा अलंकार' है, जहाँ श्रीकृष्ण के बाल रूप को सुंदर श्रृंगार रूपी शिशु-वृक्ष के अद्भुत फल के समान माना गया है, और वर्णों की आवृत्ति से 'अनुप्रास अलंकार' भी है।

🎯 Exam Tip: अलंकार की पहचान के लिए, पंक्ति में प्रयुक्त शब्दों, उनकी ध्वनि और अर्थ के साथ-साथ अलंकार के विशिष्ट पहचान चिह्नों (जैसे 'मनु', 'मानो', 'जनु' आदि) पर ध्यान दें।

भ्रमर-गीत

Question 1: हमारें हरि हारिल की लकरी ।।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी ।।
जागत-सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्हु-कान्ह जकरी ।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी ।।
सु तौ व्याधि हमकौं ले आए, देखी सुनी ने करी ।
यह तौ सूर तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी ।।

Question (i). उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
Answer: प्रस्तुत पद महाकवि सूरदास के 'सूरसागर' से हमारी पाठ्य-पुस्तक 'काव्यांजलि' में संकलित 'भ्रमर-गीत' शीर्षक काव्यांश से लिया गया है। अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम - भ्रमर-गीत ।
कवि को नाम - सूरदास ।
In simple words: यह पद्यांश सूरदास के 'सूरसागर' के 'भ्रमर-गीत' खंड से लिया गया है, जिसमें गोपियाँ उद्धव से कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति व्यक्त करती हैं।

🎯 Exam Tip: 'भ्रमर-गीत' प्रसंग सूरदास के काव्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है; इसलिए, इस खंड से जुड़े पद्यांशों के कवि और शीर्षक को याद रखना अत्यंत आवश्यक है।

 

Question (ii). रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: रेखांकित अंश की व्याख्या - सूरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार हारिल पक्षी को वह लकड़ी अत्यधिक प्रिय होती है, जिसे वह दृढ़ता से पकड़े रहता है, उसी प्रकार गोपियों को भी श्रीकृष्ण हारिल की लकड़ी के समान प्रिय हैं। गोपियों रूपी हारिल पक्षियों ने श्रीकृष्णरूपी लकड़ी को अपने तन-मन में बसा रखा है। वे एक क्षण के लिए श्रीकृष्ण को अपने मन से दूर करना नहीं चाहतीं।
In simple words: गोपियाँ कहती हैं कि जिस तरह हारिल पक्षी लकड़ी को नहीं छोड़ता, उसी तरह उन्होंने भी मन, वचन और कर्म से नंद के नंदन श्रीकृष्ण को अपने हृदय में दृढ़ता से बसा लिया है और एक पल के लिए भी उन्हें भूल नहीं पातीं।

🎯 Exam Tip: रेखांकित अंश की व्याख्या में, प्रतीकात्मक अर्थों को स्पष्ट करना चाहिए, जैसे यहाँ हारिल पक्षी और लकड़ी के माध्यम से गोपियों की अटूट भक्ति को दर्शाया गया है।

 

Question (iii). गोपियों ने श्रीकृष्ण को किसके समान प्रिय बताया है?
Answer: गोपियों ने श्रीकृष्ण को हारिल पक्षी की लकड़ी के समान प्रिय बताया है।
In simple words: गोपियाँ श्रीकृष्ण को उस लकड़ी के समान अनमोल मानती हैं जिसे हारिल पक्षी कभी नहीं छोड़ता, जो उनकी अनन्य भक्ति का प्रतीक है।

🎯 Exam Tip: ऐसे तुलनात्मक प्रश्नों में, उपमा के आधार और उसके भावनात्मक महत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाएं।

 

Question (iv). गोपियाँ दिन-रात जागते-सोते किसकी रट लगाती रहती हैं?
Answer: गोपियाँ दिन-रात जागते-सोते कृष्ण-कृष्ण की रट लगाती रहती हैं।
In simple words: गोपियाँ हर पल, चाहे वे जाग रही हों या सो रही हों, केवल कृष्ण का नाम ही जपती रहती हैं, जो उनकी गहरी आसक्ति और प्रेम को दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: किसी पात्र की क्रियाओं या आदतों से जुड़े प्रश्नों के उत्तर में, उस क्रिया के पीछे की भावना या कारण को भी संक्षेप में बताएँ।

 

Question (v). उद्धव की योग-चर्चा गोपिकाओं को किसकी तरह अरुचिकर लगती है?
Answer: उद्धव की योग-चर्चा गोपिकाओं को कड़वी ककड़ी की तरह अरुचिकर लगती है।
In simple words: गोपियों को उद्धव द्वारा दिया गया योग का संदेश बिलकुल भी पसंद नहीं आता, वे इसे कड़वी ककड़ी के समान अरुचिकर और अप्रिय मानती हैं।

🎯 Exam Tip: काव्य में किसी तुलना या उपमा का वर्णन करते समय, तुलना की गई वस्तु और उसके प्रभाव को स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 2: कहत कत परदेसी की बात । मंदिर अरध अवधि बदि हमसौं, हरि अहार चलि जात ।।
ससि रिपु बरष, सूर रिपु जुग बर, हर-रिपु कीन्हौं घात ।
मघ पंचक लै गयौ साँवरौ, तातै अति अकुलाते ।।
नखत, बेद, ग्रह, जोरि, अर्ध करि, सोइ बनत अब खात ।
सूरदास बस भई बिरह के, कर मी पछितात।।

Question (i). उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट ।
Answer: शीर्षक का नाम - भ्रमर-गीत ।
कवि को नाम - सूरदास ।
In simple words: यह पद्यांश सूरदास के 'सूरसागर' के 'भ्रमर-गीत' खंड से उद्धृत है, जिसमें गोपियाँ श्रीकृष्ण के विरह में अपनी व्यथा व्यक्त करती हैं।

🎯 Exam Tip: कवि और शीर्षक के नामों को याद करने के लिए, हर पद्यांश को पढ़ते समय उन्हें दोहराएँ और मुख्य प्रसंगों से जोड़कर याद रखें।

 

Question (ii). रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Answer: रेखांकित अंश की व्याख्या - श्रीकृष्ण ने हम से वादा किया था कि वे एक पखवाड़े के अन्दर (अर्द्ध मन्दिर) अर्थात् आधे महीने में (15 दिन के अन्दर) ही लौटकर आएँगे। परन्तु हरि अर्थात् सिंह, सिंह अहार = सिंह का भोजन = मांस = एक महीना बीत गया है परन्तु वे नहीं लौटे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने वचन देकर उसे निभाया नहीं है, क्योंकि ये परदेसी विश्वास के योग्य नहीं होते। उनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है। इसलिए परदेसियों की बात ही हमसे मत करो।।
In simple words: गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि कृष्ण ने हमसे आधे महीने में लौटने का वादा किया था, लेकिन अब एक महीना बीत चुका है, और वे नहीं लौटे हैं। वे कहती हैं कि परदेसी लोग भरोसे के लायक नहीं होते, उनकी कथनी और करनी में फर्क होता है, इसलिए उनकी बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

🎯 Exam Tip: व्याख्या में, संख्यात्मक और प्रतीकात्मक अर्थों को स्पष्ट रूप से समझाएँ, जैसे 'अर्ध मंदिर' का अर्थ पखवाड़ा और 'हरि अहार' का अर्थ एक महीना है।

 

Question (iii). श्रीकृष्ण गोपिकाओं से कितने दिन में लौट आने का वादा करके मथरा गए थे?
Answer: श्रीकृष्ण गोपिकाओं से एक पखवाड़ा अर्थात् पन्द्रह दिन में लौट आने का वादा करके गए थे।
In simple words: श्रीकृष्ण ने गोपियों से वादा किया था कि वे मथुरा से पंद्रह दिनों के भीतर वापस लौट आएंगे।

🎯 Exam Tip: कथा-आधारित प्रश्नों में, घटना के विशिष्ट विवरणों (जैसे समय अवधि या स्थान) को सटीक रूप से याद रखना और प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है।

 

Question (iv). श्रीकृष्ण के वियोग में गोपियों को एक-एक दिन और एक-एकरांत किसके समान प्रतीत होते हैं?
Answer: श्रीकृष्ण के वियोग में गोपिकाओं को एक-एक दिन बरसों के समान और एक-एक रात युगों के समान प्रतीत हो रहे हैं।
In simple words: श्रीकृष्ण के वियोग में गोपियों को समय अत्यंत लंबा लगता है, जहाँ एक दिन वर्षों के बराबर और एक रात युगों जितनी लंबी प्रतीत होती है।

🎯 Exam Tip: विरह-वर्णन से संबंधित प्रश्नों में, समय की अवधारणा के अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण को पहचानें और समझाएँ, क्योंकि यह विरह की तीव्रता को दर्शाता है।

 

Question (v). गोपियाँ किस कारण और अधिक व्याकुलता का अनुभव करती हैं?
Answer: गोपियाँ अपने चित्त को श्रीकृष्ण के साथ चले जाने के कारण और अधिक व्याकुलता का अनुभव कर रही हैं।
In simple words: गोपियाँ इसलिए अधिक व्याकुल हैं क्योंकि श्रीकृष्ण के चले जाने के साथ उनका मन भी उनके साथ चला गया है, जिससे वे विरह की पीड़ा को और गहराई से महसूस कर रही हैं।

🎯 Exam Tip: भावनाओं के कारणों से संबंधित प्रश्नों में, मुख्य भावनात्मक कारक (जैसे यहाँ 'मन का साथ चले जाना') को पहचानें और उसके प्रभाव को स्पष्ट करें।

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