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Detailed Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति UP Board Solutions for Class 11 Geography
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Class 11 Geography Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति UP Board Solutions PDF
UP Board Solutions For Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 5 Natural Vegetation (प्राकृतिक वनस्पति)
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
Question 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए
(i) चन्दन वन किस तरह के वन के उदाहरण हैं?
(क) सदाबहार वन
(ख) डेल्टाई वन
(ग) पर्णपाती वन
(घ) कॉटेदार वन
Answer: (ग) पर्णपाती वन।
In simple words: चंदन के वन पर्णपाती वनों का उदाहरण हैं, जो एक विशेष प्रकार के उष्णकटिबंधीय वन होते हैं। ये अपनी पत्तियाँ साल में एक बार गिराते हैं।
🎯 Exam Tip: पर्णपाती वनों की विशेषताओं और उनके उदाहरणों पर ध्यान दें, क्योंकि यह अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है।
Question. (ii) प्रोजेक्ट टाइगर निम्नलिखित में से किस उद्देश्य से शुरू किया गया है?
(क) बाघ मारने के लिए।
(ख) बाघ को शिकार से बचाने के लिए।
(ग) बाघ को चिड़ियाघर में डालने के लिए
(घ) बाघ पर फिल्म बनाने के लिए
Answer: (ख) बाघ को शिकार से बचाने के लिए।
In simple words: प्रोजेक्ट टाइगर का मुख्य उद्देश्य बाघों को शिकारियों से बचाना और उनकी घटती जनसंख्या को स्थिर करना है।
🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट टाइगर की स्थापना वर्ष और उसके प्रमुख उद्देश्यों को याद रखें, यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में आ सकता है।
Question. (iii) नन्दादेवी जीवमंण्डल निचय निम्नलिखित में से किस प्रान्त में स्थित है?
(क) बिहार।
(ख) उत्तरांचल
(ग) उत्तर प्रदेश
(घ) उड़ीसा
Answer: (ख) उत्तरांचल (उत्तराखण्ड)।
In simple words: नंदादेवी बायोस्फीयर रिजर्व भारत के उत्तरांचल (उत्तराखंड) राज्य में स्थित एक महत्त्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्र है।
🎯 Exam Tip: भारत के प्रमुख जीवमंडल निचय और उनके स्थानों को याद रखना मानचित्र आधारित और बहुविकल्पीय प्रश्नों के लिए उपयोगी है।
Question. (iv) निम्नलिखित में से कितने जीवमण्डल निचय आई०यू०सी०एन० द्वारा मान्यता प्राप्त हैं?
(क) एक
(ख) तीन।
(ग) दो
(घ) चार
Answer: (घ) चार।
In simple words: भारत में कुल 14 जीवमंडल निचय हैं, जिनमें से चार को IUCN (अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ) द्वारा मान्यता प्राप्त है।
🎯 Exam Tip: मान्यता प्राप्त जीवमंडल निचय की संख्या और उनके नाम अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।
Question. (v) वन नीति के अनुसार वर्तमान में निम्नलिखित में से कितना प्रतिशत क्षेत्र वनों के अधीन होना चाहिए?
(क) 33
(ख) 55
(ग) 44
(घ) 22
Answer: (क) 33.
In simple words: राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 33 प्रतिशत वनों के अधीन होना चाहिए ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय वन नीति के प्रमुख लक्ष्यों और प्रतिशत लक्ष्यों को याद रखना पर्यावरण और भूगोल से संबंधित प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें-
(i) प्राकृतिक वनस्पति क्या है? जलवायु की किन परिस्थितियों में उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन उगते हैं?
Answer: जो पौधे जंगल में प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं फलते-फूलते हैं या विकसित होते हैं, प्राकृतिक वनस्पति कहलाते हैं। उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन आर्द्र प्रदेशों में पाए जाते हैं, जहाँ वार्षिक वर्षा 200 सेमी से अधिक होती है और औसत वार्षिक तापमान 22° सेल्सियस से अधिक रहता है। भारत में इन वनों का विस्तार लगभग 46 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मिलता है।
In simple words: प्राकृतिक वनस्पति वे पौधे हैं जो बिना मानवीय हस्तक्षेप के उगते हैं। उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ भारी वर्षा (200 सेमी से अधिक) और उच्च तापमान (22°C से अधिक) होता है।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक वनस्पति की परिभाषा और उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों के लिए आवश्यक जलवायु परिस्थितियों को स्पष्ट रूप से समझें।
Question. (ii) जलवायु की कौन-सी परिस्थितियाँ सदाबहार वन उगने के लिए अनुकूल हैं?
Answer: 20° सेग्रे से अधिक तापमान तथा 150 से 200 सेमी वर्षा वाले उष्ण आर्द्र जलवायु प्रदेशों की परिस्थितियाँ सदाबहार वनों के लिए अनुकूल मानी जाती हैं।
In simple words: सदाबहार वनों के विकास के लिए उच्च तापमान (20°C से अधिक) और पर्याप्त वर्षा (150-200 सेमी) वाली उष्ण आर्द्र जलवायु आदर्श होती है।
🎯 Exam Tip: सदाबहार वनों के लिए सटीक तापमान और वर्षा की मात्रा याद रखें; यह तथ्यात्मक प्रश्न के लिए महत्वपूर्ण है।
Question. (iii) सामाजिक वानिकी से आपका क्या अभिप्राय है?
Answer: सामाजिक वानिकी, पर्यावरणीय सुरक्षा तथा ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक, आर्थिक विकास से सम्बन्धित है। इसके द्वारा ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की बंजर एवं ऊसर भूमि पर वनारोपण करके उसके द्वारा आर्थिक आय और सामाजिक विकास का प्रयास किया जाता है।
In simple words: सामाजिक वानिकी एक कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य बंजर भूमि पर पेड़ लगाकर पर्यावरण की रक्षा करना और ग्रामीण-शहरी समुदायों की आय बढ़ाना है।
🎯 Exam Tip: सामाजिक वानिकी की अवधारणा और उसके दोहरे उद्देश्यों (पर्यावरण और सामाजिक-आर्थिक) पर ध्यान दें।
Question. (iv) जीवमण्डल निचय को परिभाषित करें। वन क्षेत्र और वन आवरण में क्या अन्तर है?
Answer: जीवमण्डल निचय विशेष प्रकार के भौतिक (स्थलीय) और तटीय पारिस्थितिक क्षेत्र हैं। इनको यूनेस्को के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय पहचान का मानक प्राप्त है। ये आरक्षित क्षेत्र वन्य-जीव और वनों की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए बनाए गए हैं। वन क्षेत्र वह क्षेत्र है जो राजस्व विभाग के द्वारा वनों के लिए निर्धारित होता है, जबकि वास्तविक वन आवरण वह क्षेत्र है जो वास्तव में वनों से ढका हुआ है।
In simple words: जीवमंडल निचय यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त संरक्षित पारिस्थितिक क्षेत्र हैं, जो वन्यजीव और वनों की रक्षा करते हैं। वन क्षेत्र राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कानूनी सीमा है, जबकि वन आवरण वास्तव में पेड़ों से ढका हुआ भौगोलिक क्षेत्र है।
🎯 Exam Tip: जीवमंडल निचय की परिभाषा और 'वन क्षेत्र' तथा 'वन आवरण' के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें, क्योंकि ये अवधारणाएँ अक्सर भ्रमित करती हैं।
Question 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दें
(i) वन संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
Answer: वनों का मानवीय विकास एवं जीव जगत के पोषण में महत्त्वपूर्ण योगदान है। इसलिए वनों के संरक्षण को महत्त्वपूर्ण माना जाता है, फलस्वरूप भारत सरकार ने पूरे देश के लिए वन संरक्षण नीति, 1952 में लागू की जिसे 1988 में संशोधित किया, अब नई वन्य-जीवन कार्ययोजना (2002-2016) स्वीकृत की गई है। अतः वन नीति द्वारा देश की सरकार ने वनों के संरक्षण हेतु निम्नलिखित कदम उठाए हैं
1. नई वन नीति के अनुसार सरकार सतत पोषणीय वन प्रबन्धन पर बल देती है जिससे एक ओर वन। संसाधनों का संरक्षण व विकास किया जाए और दूसरी ओर वनों से स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।
2. देश में 33 प्रतिशत भाग पर वन लगाना, जो वर्तमान राष्ट्रीय स्तर से 6 प्रतिशत अधिक है।
3. पर्यावरण असन्तुलन समाप्त करने के लिए वन लगाने पर बल देना।
4. देश की प्राकृतिक धरोहर जैवविविधता तथा आनुवंशिक पुल का संरक्षण करना।
5. पेड़ लगाने को बढ़ावा देना तथा पेड़ों की कटाई रोकने के लिए जन-आन्दोलन चलाना, जिसमें महिलाएँ भी शामिल हों।
6. सामाजिक वानिकी कार्यक्रम चलाना, जिससे ऊसर भूमि का उपयोग वनों को उगाने के लिए किया जा सके।
In simple words: भारत सरकार ने वनों के संरक्षण के लिए 1952 में वन संरक्षण नीति लागू की, जिसे 1988 में संशोधित किया गया और 2002-2016 की वन्य-जीवन कार्ययोजना स्वीकृत की गई। इन नीतियों के तहत सतत वन प्रबंधन, 33% वन क्षेत्र का लक्ष्य, जैवविविधता का संरक्षण, जन-आंदोलन और सामाजिक वानिकी जैसे कदम उठाए गए हैं।
🎯 Exam Tip: वन संरक्षण की प्रमुख सरकारी नीतियों, उनके लक्ष्यों और अपनाए गए विशिष्ट कदमों को याद रखें, खासकर राष्ट्रीय वन नीति के प्रतिशत लक्ष्य को।
Question. (ii) वन और वन्य जीव संरक्षण में लोगों की भागेदारी कैसे महत्त्वपूर्ण है?
Answer: वन और वन्य जीव संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों द्वारा ही सम्भव नहीं है। स्वयंसेवी संस्थाएँ और जनसमुदाय का सहयोग इसके लिए अत्यन्त आवश्यक और महत्त्वपूर्ण है। भारत में वन्य प्राणियों के बचाव की परम्परा बहुत पुरानी है। हमारे धर्मग्रन्थों में इसका व्यापक उल्लेख मिलता है। इतना ही नहीं, पंचतन्त्र, जंगल बुक इत्यादि की कहानियाँ हमारे वन्य प्राणियों के प्रति प्रेम का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
सरकार द्वारा वैधानिक प्रयासों के अन्तर्गत बनाए गए विभिन्न अधिनियम तथा परियोजनाएँ (बाघ परियोजना, हाथी परियोजना आदि) वन्य-जीव एवं वन संरक्षण के लिए मुख्य प्रयास हैं। फिर भी वन्य प्राणी संरक्षण का दायरा अत्यन्त व्यापक है और इसमें मानव-कल्याण की असीम सम्भावनाएँ निहित हैं। फलस्वरूप इस लक्ष्य को तभी प्राप्त किया जा सकता है जब हर व्यक्ति इसका महत्त्व समझे और अपना योगदान दे। अतः लोगों की सहभागिता द्वारा ही वनों और जीवों का संरक्षण हो सकता है और तभी यह प्राकृतिक धरोहर सुरक्षित रह सकती है।
उत्तराखण्ड का चिपको आन्दोलने वन और वन्य जीवों के संरक्षण का विश्वप्रसिद्ध आन्दोलन है, जो जनसमुदाय की इस क्षेत्र में भागीदारी का उत्तम उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।
In simple words: वन और वन्यजीव संरक्षण के लिए लोगों की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। चिपको आंदोलन जैसे सामुदायिक प्रयास दर्शाते हैं कि जब लोग संरक्षण के महत्व को समझते हैं और योगदान करते हैं, तभी यह प्राकृतिक धरोहर सुरक्षित रह सकती है।
🎯 Exam Tip: सामुदायिक भागीदारी के महत्व को उदाहरणों (जैसे चिपको आंदोलन) के साथ समझाएँ, यह निबंध-शैली के प्रश्नों में उच्च अंक दिलाएगा।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. जलवायु, मिट्टी आदि तत्त्वों के आधार पर वनों को विभाजित किया गया है
(क) चार भागों में
(ख) पाँच भागों में
(ग) तीन भागों में
(घ) दो भागों में
Answer: (ख) पाँच भागों में।
In simple words: जलवायु और मिट्टी जैसे कारकों के आधार पर वनों को पाँच मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है।
🎯 Exam Tip: वनों के वर्गीकरण के आधार और उनकी संख्या को याद रखें; यह आधारभूत जानकारी है।
Question 2. भारत में 'वन-महोत्सव के जन्मदाता माने जाते हैं
(क) सुन्दरलाल बहुगुणा।
(ख) आचार्य विनोबा भावे :
(ग) मेधा पाटेकर।
(घ) डॉ० कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी
Answer: (घ) डॉ० कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी।
In simple words: डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी को भारत में 'वन-महोत्सव' कार्यक्रम की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है।
🎯 Exam Tip: वन-महोत्सव और इससे जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व का नाम याद रखें, यह सामान्य ज्ञान का प्रश्न हो सकता है।
Question 3. वन सहायक हैं
(क) वायु एवं जल-प्रदूषण रोकने में
(ख) भूमि का क्षरण रोकने में
(ग) (क) और (ख) दोनों में।
(घ) इनमें से किसी में नहीं।
Answer: (ग) (क) और (ख) दोनों में।
In simple words: वन वायु और जल प्रदूषण को कम करने के साथ-साथ मिट्टी के कटाव को रोकने में भी सहायक होते हैं।
🎯 Exam Tip: वनों के पर्यावरणीय लाभों (जैसे प्रदूषण नियंत्रण, मृदा संरक्षण) को समझें; यह वनों के महत्व से जुड़े प्रश्नों के लिए उपयोगी है।
Question 4. निम्नलिखित वनों में से कौन-सा भारत में सर्वाधिक विस्तार में फैला है?
(क) उष्ण कटिबन्धीय पतझड़ वाले वन
(ख) उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन
(ग) ज्वारीय वन
(घ) काँटेदार वन
Answer: (ख) उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन।
In simple words: भारत में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों का विस्तार सबसे अधिक है, जो देश के बड़े हिस्से में फैले हुए हैं।
🎯 Exam Tip: भारत में विभिन्न प्रकार के वनों के वितरण और उनके सापेक्षिक विस्तार को जानें, यह क्षेत्रीय भूगोल के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 5. आर्थिक दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण वन कौन-से हैं?
(क) मानसूनी
(ख) पर्वतीय
(ग) उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती
(घ) ज्वारीय
Answer: (ग) उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती।
In simple words: उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन, जिन्हें मानसूनी वन भी कहा जाता है, अपनी लकड़ी और अन्य उत्पादों के कारण आर्थिक रूप से सबसे मूल्यवान होते हैं।
🎯 Exam Tip: विभिन्न वन प्रकारों के आर्थिक महत्व को समझें, विशेषकर उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों के उत्पादों पर ध्यान दें।
Question 6. डेल्टाई वनों का मुख्य वृक्ष है
(क) चन्दने
(ख) पाइन
(ग) सुन्दरी
(घ) सिल्वर फर
Answer: (ग) सुन्दरी।
In simple words: डेल्टाई वनों, विशेषकर सुंदरबन में, सुन्दरी वृक्ष सबसे प्रमुख और विशिष्ट प्रजाति है।
🎯 Exam Tip: विशिष्ट वन प्रकारों (जैसे डेल्टाई वन) और उनसे जुड़े प्रमुख वृक्षों के नामों को याद रखें।
Question 7. 'सुन्दरवन कहाँ पाया जाता है?
(क) गंगा डेल्टा में
(ख) गोदावरी डेल्टा में
(ग) महानदी डेल्टा में
(घ) कावेरी डेल्टा में
Answer: (क) गंगा डेल्टा में।
In simple words: सुंदरवन, जो अपनी मैंग्रोव वनस्पति के लिए प्रसिद्ध है, मुख्य रूप से गंगा नदी के डेल्टा क्षेत्र में स्थित है।
🎯 Exam Tip: सुंदरवन जैसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक स्थलों के भौगोलिक स्थान को सटीक रूप से जानें।
Question 8. 'सुन्दरवन स्थित है
(क) जम्मू एवं कश्मीर में
(ख) केरल में
(ग) अरुणाचल प्रदेश में
(घ) पश्चिम बंगाल में
Answer: (घ) पश्चिम बंगाल में।
In simple words: सुंदरवन भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित एक विशाल मैंग्रोव वन क्षेत्र है।
🎯 Exam Tip: सुंदरवन का स्थान, विशेष रूप से राज्य के संदर्भ में, याद रखें।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश के कितने भू-भाग पर वन होने चाहिए?
Answer: एक-तिहाई।
In simple words: राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार, देश के कुल क्षेत्रफल का एक-तिहाई (33%) हिस्सा वनों से आच्छादित होना चाहिए।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय वन नीति का यह प्रतिशत लक्ष्य अक्सर सीधा प्रश्न के रूप में पूछा जाता है।
Question 2. सुरक्षित वनों से क्या तात्पर्य है?
Answer: वे वन जिन्हें इमारती लकड़ी अथवा वन उत्पादों को प्राप्त करने के लिए सुरक्षित किया गया है।
In simple words: सुरक्षित वन वे जंगल हैं जिन्हें इमारती लकड़ी और अन्य वन उत्पादों के उत्पादन के लिए विशेष रूप से संरक्षित किया गया है।
🎯 Exam Tip: संरक्षित वनों के विभिन्न प्रकारों और उनके उद्देश्यों को समझें।
Question 3. संरक्षित वन किन्हें कहते हैं?
Answer: जिन वनों में सामान्य प्रतिबन्धों के साथ पशुचारण एवं खेती करने की अनुमति दे दी जाती है, उन्हें संरक्षित वन कहते हैं।
In simple words: संरक्षित वन ऐसे जंगल होते हैं जहाँ कुछ शर्तों के साथ पशुओं को चराने और खेती करने की अनुमति होती है, लेकिन मुख्य उद्देश्य वन का संरक्षण होता है।
🎯 Exam Tip: संरक्षित वनों की परिभाषा और उन पर लागू होने वाले सामान्य प्रतिबंधों को याद रखें।
Question 4. वर्तमान में वनों की क्या महत्ता है?
Answer: वन पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिक सन्तुलन को बनाए रखने में सहायक हैं।
In simple words: वर्तमान में वन पर्यावरण को स्थिर रखने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
🎯 Exam Tip: वनों के पर्यावरणीय महत्व को संक्षेप में समझाने के लिए यह बिंदु महत्वपूर्ण है।
Question 5. भारत में सबसे अधिक और सबसे कम वन क्षेत्र कहाँ है?
Answer: भारत में सबसे अधिक वन क्षेत्र अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में (86.93%) और सबसे कम हरियाणा में (3.8%) है।
In simple words: भारत में सबसे अधिक वन क्षेत्र अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में है, जबकि सबसे कम वन क्षेत्र हरियाणा में पाया जाता है।
🎯 Exam Tip: राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में वन क्षेत्र के अधिकतम और न्यूनतम वितरण को याद रखना तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 6. उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वनों के मुख्य वृक्षों के नाम तथा प्रमुख क्षेत्र बताइए।
Answer: इन वनों में रोजवुड, एबोनी और आयरन वुड आदि वृक्ष पाए जाते हैं। भारत में उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन पश्चिमी घाट के पर्वतीय क्षेत्रों पर 450 से 1,370 मीटर की ऊँचाई के मध्य उगते हैं। असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों की पहाड़ियों, पूर्वी हिमालय के तराई क्षेत्र तथा अण्डमान निकोबार द्वीपसमूह में भी इसी प्रकार के वन उगते हैं।
In simple words: उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों के मुख्य वृक्ष रोजवुड, एबोनी और आयरन वुड हैं। ये वन मुख्य रूप से पश्चिमी घाट, उत्तर-पूर्वी राज्यों और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पाए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: सदाबहार वनों के प्रमुख वृक्षों के नाम और उनके वितरण क्षेत्रों को याद रखें।
Question 7. प्राकृतिक वनस्पति का क्या अर्थ है?
Answer: प्राकृतिक वनस्पति से आशय उन पेड़-पौधों, झाड़ियों एवं घासों से है, जो प्राकृतिक रूप से बिना भूमि जोते व बीज बोए स्वयं ही उग आती हैं।
In simple words: प्राकृतिक वनस्पति उन पौधों, झाड़ियों और घासों को कहते हैं जो बिना मानवीय हस्तक्षेप के स्वाभाविक रूप से उगते और बढ़ते हैं।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक वनस्पति की मूल परिभाषा को स्पष्ट रखें।
Question 8. वनों के दो प्रत्यक्ष लाभ बताइए।
Answer: (1) ईंधन एवं इमारती लकड़ियों की प्राप्ति तथा (2) कागज, रबड़, कत्था, बीड़ी, दियासलाई, लुगदी, प्लाई पैकिंग आदि उद्योगों के लिए कच्चे माल की प्राप्ति।
In simple words: वनों से हमें ईंधन और इमारती लकड़ी मिलती है, साथ ही यह कागज, रबड़, कत्था जैसे उद्योगों के लिए कच्चा माल भी प्रदान करते हैं।
🎯 Exam Tip: वनों के प्रत्यक्ष आर्थिक लाभों के दो प्रमुख उदाहरण याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 9. भारत में प्राकृतिक वनस्पति की भिन्नता के क्या कारण हैं?
Answer: भारत में उच्चावच, जलवायु, वर्षा तथा मिट्टियों में पर्याप्त विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। अतः इसी कारण यहाँ प्राकृतिक वनस्पति में भी पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है।
In simple words: भारत में प्राकृतिक वनस्पति की विविधता का मुख्य कारण यहाँ की भौगोलिक भिन्नताएँ हैं, जैसे विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियाँ, जलवायु, वर्षा का स्तर और मिट्टी के प्रकार।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक वनस्पति की विविधता के कारणों को समझें, विशेषकर भौतिक कारकों के प्रभाव पर ध्यान दें।
Question 10. पारितन्त्र का क्या अर्थ है?
Answer: वनस्पति, जीव-जन्तु तथा अन्य सूक्ष्म जीवाणु और भौतिक पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों से बना तन्त्र पारितन्त्र कहलाता है।
In simple words: पारितंत्र एक ऐसा तंत्र है जो पौधों, जानवरों, सूक्ष्मजीवों और उनके भौतिक पर्यावरण के बीच जटिल संबंधों से बनता है।
🎯 Exam Tip: पारितंत्र की परिभाषा को उसके सभी घटकों के साथ याद रखें।
Question 11. प्राकृतिक संसाधनों से क्या अभिप्राय है?
Answer: प्रकृति-प्रदत्त उपहार; जैसे-स्थलाकृतियाँ, मृदा, जल, वायु, प्राकृतिक वनस्पति, सूर्य का प्रकाश, खजिन पदार्थ, जंगली जीव-जन्तु आदि जो मानव की अनेक आवश्यकताएँ पूर्ण करते हैं या उसके लिए उपयोगी अथवा उपयोगिता में किसी प्रकार सहायक होते हैं, प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं।
In simple words: प्राकृतिक संसाधन वे सभी उपहार हैं जो प्रकृति हमें देती है, जैसे जमीन, पानी, हवा और पेड़-पौधे, जो हमारी जरूरतों को पूरा करते हैं या हमारे लिए उपयोगी होते हैं।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक संसाधनों की परिभाषा और उनके विभिन्न उदाहरणों को समझें।
Question 12. सदाबहार तथा पर्णपाती वनों में कोई एक अन्तर बताइए।
Answer: सदाबहार तथा पर्णपाती (पतझड़ी) वनों में अन्तर
| अन्तर का आधार | सदाबहार वन | पर्णपाती (पतझड़ी) वन |
|---|---|---|
| प्रकृति | सदाहाबार वनों के वृक्ष अत्यन्त सघन, लम्बे तथा सदैव हरे-भरे बने रहते हैं। | पर्णपाती वनों के वृक्ष कम घने, अपेक्षाकृत छोटे होते तथा ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। |
In simple words: सदाबहार वन पूरे साल हरे-भरे रहते हैं क्योंकि वे अपनी पत्तियां एक साथ नहीं गिराते, जबकि पर्णपाती वन शुष्क मौसम में अपनी पत्तियां गिरा देते हैं।
🎯 Exam Tip: सदाबहार और पर्णपाती वनों के बीच मुख्य अंतर, विशेषकर उनके पत्तियां गिराने के पैटर्न को याद रखें।
Question 13. भारत के उन राज्यों के नाम बताइए जिनके दो-तिहाई भौगोलिक क्षेत्र वनों से ढके हैं?
Answer: जहाँ दो-तिहाई भौगोलिक क्षेत्र वनों से ढके हैं, उन राज्यों के नाम हैं- (1) मणिपुर, (2) मेघालय, (3) त्रिपुरा, (4) सिक्किम।
In simple words: मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा और सिक्किम भारत के ऐसे राज्य हैं जहाँ के दो-तिहाई भौगोलिक क्षेत्र पर वन हैं।
🎯 Exam Tip: उच्च वन आवरण वाले राज्यों के नाम याद रखना भौगोलिक जानकारी के लिए उपयोगी है।
Question 14. उन चार राज्यों के नाम बताइए जिनके भौगोलिक क्षेत्रफल में 10 प्रतिशत से भी कम भाग पर वन हैं।
Answer: राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र)।
In simple words: राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली भारत के ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 10 प्रतिशत से भी कम हिस्सा वनों से ढका है।
🎯 Exam Tip: कम वन आवरण वाले राज्यों के नाम याद रखना क्षेत्रीय भूगोल के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 15. उष्ण कटिबन्धीय सदाहरित वनों के वृक्षों के नाम लिखिए।
Answer: रोजवुड, एबोनी और गुरजन आदि उष्ण कटिबन्धीय सदाहरित वनों के वृक्ष हैं।
In simple words: उष्णकटिबंधीय सदाहरित वनों के प्रमुख वृक्षों में रोजवुड, एबोनी और गुरजन शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: विभिन्न वन प्रकारों के विशिष्ट वृक्षों के नाम याद रखें।
Question 16. भारत की वनस्पति में विविधता क्यों है?
Answer: प्राकृतिक वनस्पति और जलवायु दशाओं एवं मृदा में बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। भारत में तापमान, वर्षा और मृदा में पर्याप्त विभिन्नताएँ मिलती हैं, इसलिए यहाँ वनस्पति में भी इतनी विभिन्नताएँ पाई जाती हैं।
In simple words: भारत में प्राकृतिक वनस्पति की विविधता यहाँ की अलग-अलग जलवायु, वर्षा और मिट्टी के प्रकारों के कारण है।
🎯 Exam Tip: भारत की भौगोलिक और जलवायु विविधता का वनस्पति पर पड़ने वाले प्रभाव को समझें।
Question 17. उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार क्न भारत में कहाँ पाए जाते हैं?
Answer: उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन भारत में पश्चिमी, घाट उत्तर-पूर्वी भारत तथा अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में पाए जाते हैं।
In simple words: उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन भारत के पश्चिमी घाट, उत्तर-पूर्वी राज्यों और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में मुख्य रूप से पाए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों के प्रमुख वितरण क्षेत्रों को याद रखें।
Question 18. देवदार के वृक्ष भारत में कहाँ पाए जाते हैं?
Answer: देवदार के वृक्ष भारत में हिमालय पर्वतीय वनों में मिलते हैं।
In simple words: देवदार के वृक्ष मुख्य रूप से भारत के हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों के वनों में पाए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: देवदार जैसे विशिष्ट वृक्षों के निवास स्थान को याद रखें।
Question 19. बिना फूल वाले पौधों के नाम लिखिए।
Answer: बिना फूल वाले पौधों के नाम हैं-फर्न, शैवाल तथा कवक।
In simple words: बिना फूल वाले पौधों में फर्न, शैवाल और कवक शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: पौधों के वर्गीकरण में बिना फूल वाले पौधों के उदाहरणों को याद रखें।
Question 20. पौधों की किस पादप जात को बंगाल का आतंक कहा जाता है?
Answer: जलहायसिन्ध' को बंगाल का आतंक कहा जाता है, क्योंकि यह नदियों-नालों के मुंह पर रुककर जल प्रवाह को अवरुद्ध कर देता है।
In simple words: 'जलहायसिन्ध' (जलकुंभी) को बंगाल का आतंक कहा जाता है क्योंकि यह जलमार्गों को अवरुद्ध कर देती है।
🎯 Exam Tip: 'बंगाल का आतंक' नाम के पीछे के कारण को जानें, यह पर्यावरणीय समस्याओं से संबंधित प्रश्न में आ सकता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. जनजातीय समुदायों के लिए वनों की महत्ता का वर्णन कीजिए।
Answer: जनजातीय समुदायों के लिए वनों का विशेष महत्त्व है। वन इस समुदाय के लिए आवास, रोजी-रोटी और अस्तित्व हैं। ये उन्हें भोजन, फल, खाने लायक वनस्पति, शहद, पौष्टिक जड़े और शिकार के लिए वन्य शिकार प्रदान करते हैं। वन उन्हें घर बनाने का सामान और कला की वस्तुएँ भी देते हैं। इस प्रकार वन जनजातीय समुदाय के लिए जीवन और आर्थिक क्रियाओं के आधार हैं। सामान्यतः यह माना जाता है कि 2001 में भारत के 593 जिलों में से 187 जनजातीय जिले हैं। इनमें देश का 59.8 प्रतिशत वन आवरण पाया जाता है। इससे पता चलता है कि भारत के जनजातीय जिले वन सम्पदा में धनी हैं।
In simple words: वन जनजातीय समुदायों के लिए जीवन का आधार हैं, क्योंकि वे उन्हें भोजन, आश्रय, औषधियाँ और आजीविका प्रदान करते हैं। भारत के कई जनजातीय जिले वनों से समृद्ध हैं, जो उनके जीवनशैली और अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करते हैं।
🎯 Exam Tip: जनजातीय समुदायों और वनों के बीच सहजीवी संबंध को समझाते हुए महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल करें।
Question 2. बाघ परियोजना का क्या महत्त्व है? भारत में कितने बाघ संरक्षण क्षेत्र हैं?
Answer: भारत में बाघों की घटती संख्या को बढ़ाने के लिए बाघ संरक्षण परियोजना 1973 में प्रारम्भ की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में बाघों की जनसंख्या का स्तर बनाए रखना है जिससे वैज्ञानिक, सौन्दर्यात्मक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक मूल्य बनाए रखे जा सकें। प्रारम्भ में यह परियोजना नौ बाघ निचयों (आरक्षित क्षेत्रों) में शुरू की गई थी और इसमें 16,339 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र शामिल था। अब यह योजना 27 बाघ निचयों में चल रही है और इनका क्षेत्रफल 37,761 वर्ग किलोमीटर है और 17 राज्यों में व्याप्त है।
In simple words: बाघ परियोजना 1973 में बाघों की घटती संख्या को रोकने और उनके संरक्षण के लिए शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य बाघों के वैज्ञानिक, सौंदर्यवादी और पारिस्थितिक मूल्यों को बनाए रखना है। यह परियोजना अब 27 बाघ संरक्षण क्षेत्रों में विस्तारित है।
🎯 Exam Tip: प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत का वर्ष, मुख्य उद्देश्य और वर्तमान में शामिल बाघ संरक्षण क्षेत्रों की संख्या को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 3. ऊँचाई के आधार पर हिमालय के वनस्पति कटिबन्धों का वर्णन कीजिए।
Answer: ऊँचाई के आधार पर हिमालय क्षेत्र में वनस्पति की निम्नलिखित पेटियाँ पाई जाती हैं
1. उष्ण कटिबन्धीय आर्दै पर्णपाती वन-शिवालिक हिमालय की श्रेणियों में उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र पर्णपाती वन उगते हैं। साल यहाँ का मुख्य वृक्ष है। आर्थिक दृष्टिकोण से इसकी लकड़ी बहुत उपयोगी होती है। बाँस भी यहाँ बहुतायत में उगता है।
2. शीतोष्ण कटिबन्धीय चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन-इन्हें 'आर्द्र पर्वतीय वन' भी कहते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में ये वन 1,000 से 2,000 मीटर की ऊँचाई तक मिलते हैं। इन वनों में चेस्टनट, चीड़, ओक, देवदार, बर्च, एल्डर, पोपलर, एल्म, मैपिल तथा सेब के वृक्ष उगते हैं। उत्तर-पूर्वी भागों में जहाँ भारी वर्षा होती है, उपोष्ण कटिबन्धीय चीड़ के वन पाए जाते हैं।
3. शंकुल या कोणधारी वन-हिमालय-पर्वतीय प्रदेश में 1,600 से 3,300 मीटर की ऊँचाई के मध्य चीड़, सीडर, सिल्वर, फर, स्पूस, सनोवर, ओक, मैपिल, बर्च, एल्डर तथा ब्लू पाइन के वृक्षों की प्रधानता है। ये कोमल लकड़ी के वृक्ष हैं, जिनसे कागज, लुगदी, दियासलाई आदि का निर्माण किया जाता है।
4. अल्पाइन वन-हिमालैय-पर्वतीय प्रदेश में 3,600 मीटर से अधिक ऊँचाई पर अल्पाइन वन शंकुल वनों का स्थान ले लेते हैं। इस प्रदेश में निम्न भागों में सिल्वर; फर, बर्च तथा जूनीपर के वृक्ष उगते हैं। इससे अधिक ऊँचाई पर काई एवं लाइकेन ही उगती हैं।
In simple words: हिमालय में ऊँचाई के साथ वनस्पति बदलती रहती है, जिसमें शिवालिक श्रेणियों में उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन, 1000-2000 मीटर पर शीतोष्ण सदाबहार वन, 1600-3300 मीटर पर कोणधारी वन और 3600 मीटर से अधिक ऊँचाई पर अल्पाइन वन शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: हिमालय में ऊँचाई के अनुसार विभिन्न वनस्पति कटिबंधों को उनके प्रमुख वृक्षों और विशेषताओं के साथ याद रखें।
Question 4. भारत में उष्ण कटिबन्धीय वर्षा का वितरण एवं विशेषताएँ बताइए।
Answer: जिन प्रदेशों में उष्णार्द्र जलवायु पाई जाती है, वहाँ वर्षा का औसत 200 सेमी या उससे अधिक रहता है। ऐसी जलवायु में किसी ऋतु विशेष में वृक्ष अपनी पत्तियाँ नहीं गिराते, बल्कि वे सदैव हरे-भरे (सदाबहार) रहते हैं। विषुवरेखीय वनों की भाँति ये वन बहुत सघन होते हैं। इनमें वृक्षों की ऊँचाई 60 मीटर या इससे भी अधिक हो जाती है। भारत में ये वन 4.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर उगे हैं। असम, मेघालय, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, त्रिपुरा, मणिपुर, पश्चिमी घाट, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल के मैदानी भागों तथा अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में इन वनों का विस्तार पाया जाता है। इन वनों में ताड़, महोगनी बाँस, सिनकोना, बेंत, रबड़, रोजवुड, आबनूस आदि वृक्ष उगते हैं।
In simple words: उष्णकटिबंधीय वर्षावन, जहाँ 200 सेमी से अधिक वर्षा और आर्द्र जलवायु होती है, हमेशा हरे-भरे रहते हैं और बहुत घने होते हैं। भारत में ये पश्चिमी घाट, उत्तर-पूर्वी राज्यों और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पाए जाते हैं, जिनमें ताड़, महोगनी और रोजवुड जैसे वृक्ष प्रमुख हैं।
🎯 Exam Tip: उष्णकटिबंधीय वर्षावनों की जलवायु परिस्थितियों, विशेषताओं और भारत में उनके प्रमुख वितरण क्षेत्रों को याद रखें।
Question 5. भारतीय वनों की किन्हीं चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
Answer: भारतीय वनों की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. भारत में जलवायु की विभिन्नता के कारण विविध प्रकार के वन पाये जाते हैं। यहाँ विषुवत्रेखीय सदाबहार वनों से लेकर शुष्क, कॅटीले वन व अल्पाइन (कोमल लकड़ी वाले) वन तक मिलते हैं।
2. भारत में कोमल लकड़ी वाले वनों का क्षेत्र कम पाया जाता है। यहाँ कोमल लकड़ी वाले वन हिमालय के अधिक ऊँचे ढालों पर मिलते हैं, जिन्हें काटकर उपयोग में लाना अत्यन्त कठिन है।
3. भारत के मानसूनी वनों में ग्रीष्म ऋतु से पूर्व वृक्षों की पत्तियाँ नीचे गिर जाती हैं, जिसे पतझड़ कहते हैं।
4. भारत के वनों में विविध प्रकार के वृक्ष मिलते हैं। अतः उनकी कटाई के सम्बन्ध में विशेषीकरण नहीं किया जा सकता।
In simple words: भारतीय वनों में जलवायु विविधता के कारण कई प्रकार के वन पाए जाते हैं। कोमल लकड़ी वाले वन सीमित हैं और हिमालय के ऊँचे ढलानों पर मिलते हैं। मानसूनी वनों में पतझड़ होता है, और विविध वृक्ष प्रजातियों के कारण कटाई में विशेषीकरण मुश्किल है।
🎯 Exam Tip: भारत के वनों की प्रमुख विशेषताओं को बिंदुवार याद रखें, विशेषकर जलवायु और वृक्ष प्रजातियों के संबंध में।
Question 6. वन्य जीवन के संरक्षण की क्या आवश्यकता है?
Answer: वन्य जीवन संरक्षण की आवश्यकता निम्नलिखित दो कारणों से होती है
1. प्राकृतिक सन्तुलन में सहायक-वन्य जीवन वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए प्रकृति का अनुपम उपहार हैं, किन्तु वर्तमान समय में अत्यधिक वन दोहन तथा अनियन्त्रित और गैर-कानूनी आखेट के कारण भारत की वन्य जीव-सम्पदा का तेजी से ह्रास हो रहा है। अनेक महत्त्वपूर्ण पशु-पक्षियों की प्रजातियाँ विलोप के कगार पर हैं। प्राकृतिक सन्तुलन बनाये रखने के लिए वन्य जीव संरक्षण की बहुत आवश्यकता है।
2. पर्यावरण प्रदूषण-पर्यावरण प्रदूषण पर प्रभावी रोक लगाने के लिए भी पशुओं एवं वन्य जीवों का संरक्षण आवश्यक है, क्योंकि इनके द्वारा पर्यावरण में उपस्थित बहुत-से प्रदूषित पदार्थों को नष्ट कर दिया जाता है। इसके साथ ही वन्य-जीव पर्यावरण को स्वच्छ बनाये रखने में अपना अमूल्य योगदान देते हैं।
In simple words: वन्य जीवन का संरक्षण प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने और पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण है। अत्यधिक दोहन और अवैध शिकार के कारण कई प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं, जिससे पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ रहा है, और वन्यजीव पर्यावरण को स्वच्छ रखने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: वन्यजीव संरक्षण के कारणों को, विशेषकर प्राकृतिक संतुलन और प्रदूषण नियंत्रण में उनकी भूमिका को समझते हुए याद रखें।
Question 7. राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य जीव अभयारण्य को परिभाषित करते हुए इनमें किसी एक अन्तर का उल्लेख कीजिए।
Answer: राष्ट्रीय उद्यान एक या एक से अधिक पारितन्त्रों वाला वृहत् क्षेत्र होता है। विशिष्ट वैज्ञानिक शिक्षा तथा मनोरंजन के लिए इसमें पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं की प्रजातियों, भू-आकृतिक स्थलों और आवासों को संरक्षित किया गया है। राष्ट्रीय उद्यान की ही भाँति, वन्यजीव अभयारण्य भी वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए स्थापित किये गये हैं।
अभयारण्य एवं राष्ट्रीय उद्यानों में सूक्ष्म अन्तर हैं। अभयारण्य में बिना अनुमति शिकार करना वर्जित है, परन्तु चराई एवं गो-पशुओं का आवागमन नियमित होता है। राष्ट्रीय उद्यानों में शिकार एवं चराई पूर्णतया वर्जित होते हैं। अभयारण्यों में मानवीय क्रियाकलापों की अनुमति होती है, जबकि राष्ट्रीय उद्यानों में मानवीय हस्तक्षेप पूर्णतया वर्जित होता है।
In simple words: राष्ट्रीय उद्यान बड़े संरक्षित क्षेत्र हैं जहाँ पेड़-पौधों, जीवों और भू-आकृतियों का पूर्ण संरक्षण होता है और मानवीय हस्तक्षेप वर्जित होता है। वन्यजीव अभयारण्य भी जीवों की सुरक्षा के लिए होते हैं, लेकिन यहाँ सीमित मानवीय गतिविधियों जैसे चराई की अनुमति हो सकती है, जबकि शिकार हर जगह प्रतिबंधित है।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य की परिभाषाओं और उनके बीच के मुख्य अंतरों, विशेषकर मानवीय गतिविधियों की अनुमति के संबंध में, पर ध्यान दें।
Question 8. भारत में सामाजिक वानिकी के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
Answer: सामाजिक वानिकी ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक विकास का कार्यक्रम ही नहीं है, बल्कि यह पारितन्त्र के सन्तुलन में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। भारत में सामाजिक वानिकी द्वारा ग्रामीण जनसंख्या जलावन लकड़ी, छोटी-छोटी वनोत्पाद और इमारती लकड़ी प्राप्त करके आर्थिक विकास को बढ़ाती है। भारत में यह कार्यक्रम 1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग द्वारा शुरू किया गया था। इसके अन्तर्गत कई प्रकार के महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम चलाए गए हैं।
सामाजिक वानिकी किसानों को अपनी भूमि पर वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित करता है। इस कार्यक्रम द्वारा सड़कों व नहरों के किनारे खाली का वनों के लिए उपयोग होता है तथा बंजर और ऊपर भूमि में सुधार का प्रयास भी किया जाता है।
In simple words: सामाजिक वानिकी एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है जो ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक विकास और पारिस्थितिक संतुलन को बढ़ावा देता है। यह किसानों को वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित करता है और बंजर भूमि का उपयोग करके जलावन लकड़ी व अन्य वन उत्पाद प्रदान कर आर्थिक विकास में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: सामाजिक वानिकी के उद्देश्यों, लाभों और भारत में इसकी शुरुआत के वर्ष को याद रखें।
Question 9. भारत में वन्य प्राणियो की संख्या कम होने के मुख्य कारणों पर प्रकाश डालिए।
Answer: भारत में वन्य प्राणियों की संख्या कम होने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
• औद्योगिकी और तकनीकी विकास के कारण वनों का अत्यधिक दोहन।
• कृषि, मानवीय बस्ती, सड़कों, खदानों, जलाशयों इत्यादि के लिए भूमि से वनों का सफाया किया जाना।
• स्थानीय लोगों का चारे व इमारती लकड़ी की आपूर्ति हेतु वनों पर दबाव।
• पालतू पशुओं के लिए नए चरागाहों की खोज में मानव द्वारा वन्य जीवों और उनके आवासों को नष्ट किया जाना।
• रजवाड़ों और सम्भ्रांत वर्ग द्वारा जंगली जानवरों का शिकार क्रीड़ा या मनोरंजन के लिए किया जाना।
• वनों में आग लगने से वन्य जीवों की मृत्यु होना।
In simple words: भारत में वन्यजीवों की संख्या कम होने के मुख्य कारण वनों का अत्यधिक दोहन, कृषि और शहरीकरण के लिए वनों का विनाश, स्थानीय लोगों और पालतू पशुओं द्वारा वनों पर दबाव, शिकार तथा वनों में लगने वाली आग हैं।
🎯 Exam Tip: वन्यजीवों की घटती संख्या के कारणों को बिंदुवार याद रखें, यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Question 1. भारत में सदाबहार वनों का वितरण एवं उनके आर्थिक महत्त्व का विवरण दीजिए।
या भारत के विभिन्न प्रकार के वनों का वर्णन कीजिए।
या भारत में वनों के विकास का सकारात्मक विवरण दीजिए।
या उष्ण कटिबन्धीय पतझड़ वन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
Answer: भारत में प्राकृतिक वनस्पति का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) प्रकार, (ख) क्षेत्र।
उत्तर – भारत में वनों का वितरण वन राष्ट्र की बहुमूल्य निधि होते हैं, परन्तु मानव इनके महत्त्व को पूरी तरह नहीं समझ पाया है। भारत के विशाल मैदान में तो शायद ही वन देखने को मिलते हैं, किन्तु पर्वतीय क्षेत्रों, समुद्रतटीय मैदानों तथा नदीतटीय भू-भागों में प्राकृतिक वनस्पति अवश्य विकसित हुई है।
भारत में 657.6 लाख हेक्टेयर भूमि (22%) पर वन पाये जाते हैं, जबकि भारतीय सुदूर संवेदन द्वारा लगाये गये नवीनतम अनुमानों के आधार पर देश में केवल 14% क्षेत्रफल पर ही वनों का विस्तार बताया गया है। एक अनुमान के अनुसार वर्तमान समय में देश के भौगोलिक क्षेत्रफल के 19.39% भाग पर वनों का विस्तार पाया जाता है। 1952 ई० में निर्धारित 'राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश के 33.3% क्षेत्र पर वन होने चाहिए। वर्तमान समय में वृक्षारोपण एवं वन-महोत्सव आदि कार्यक्रम इसी दिशा में किये गये प्रयास हैं। देश में वनों का भौगोलिक वितरण बड़ा ही असमान है। भारत के पर्वतीय राज्यों एवं दक्षिणी पठारी राज्यों में वन-क्षेत्र अधिक पाये जाते हैं।
भारतीय वनों का वर्गीकरण
वनों के प्रकार प्राकृतिक पर्यावरण के तत्त्वों पर निर्भर करते हैं। वर्षा की मात्रा, मिट्टी के प्रकार, भूगर्भीय संरचना तथा भूमि की बनावट के आधार पर भारतीय वनों का विभाजन प्रस्तुत किया जा सकता है। भौगोलिक आधार पर वनों के प्रथम चार प्रकार वर्षा की मात्रा के आधार पर तथा शेष पाँच प्रकार वर्षा की मात्रा (जलवायु) के अतिरिक्त मिट्टी आदि अन्य तत्त्वों के आधार पर निर्धारित किये जा सकते हैं। इन वनों के वर्गीकरण का विवरण अग्रलिखित है-
1. उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)-ईस प्रकार के वन उन भागों में पाये जाते हैं जहाँ वर्षा का वार्षिक औसत 200 सेमी तथा औसत तापमान 24° सेग्रे के लगभग रहता है। उत्तर में हिमालय की तराई, पूर्वी हिमालय के उप-प्रदेश, दक्षिण में पश्चिमी घाट के ढालों पर महाराष्ट्र से लेकर उत्तरी एवं दक्षिणी ढाल, नीलगिरि, अन्नामलाई, कर्नाटक, केरल तथा अण्डमान निकोबार द्वीप समूह तक इस प्रकार के वनों का विस्तार है। पश्चिमी घाट पर 457 से 1,360 मीटर की ऊँचाई के मध्य तथा असोम में 1,067 मीटर की ऊँचाई तक इन वन का विस्तार मिलता है।
अत्यधिक वर्षा के कारण ये वन सदैव हरे-भरे रहते हैं, परन्तु वर्षा की कमी के कारण ये कभी-कभी अहरित भी हो जाते हैं। इनके वृक्षों की ऊँचाई 30 से 50 मीटर तक होती है। इनमें कठोर लकड़ी के वृक्ष अत्यधिक होते हैं तथा इन्हें काटना भी कठिन होता है। विभिन्न प्रकार की लताओं, झाड़ियों तथा छोटे-छोटे पौधों की अधिकता के कारणं ये वन दुर्गम हो गये हैं। इन वनों में अधिकांशत: रबड़, महोगनी, एबोनी, जंगली आम, नाहर, गुरजन, तुलसर, अमलतास, तून, ताड़, बाँस, सिनकोना, बेंत, रोजवुड आदि के वृक्ष महत्त्वपूर्ण होते हैं। असोम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, पूर्वी घाट, अण्डमान निकोबार द्वीप समूह आदि पर इस प्रकार के वनों का विस्तार पाया जाता है। ये वन आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी हैं।
2. उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती (पतझड़) वन या मानसूनी वन-ये वन अधिकतर उन भागों में उगते हैं जहाँ वर्षा का वार्षिक औसत 100 से 200 सेमी के मध्य रहता है। इन्हें मानसूनी वन भी कहते हैं। ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ में इन वनों के वृक्ष अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं जिससे उनकी नमी नष्ट न हो सके। इन वनों के नीचे सघन झाड़-झंखाड़ आदि नहीं पाये जाते हैं, जिस कारण यहाँ बाँस अधिक पैदा होता है; परन्तु बेंत, ताड़ तथा लताओं का अभाव रहता है। ये वन भारत के चार क्षेत्रों में मिलते हैं (i) उप-हिमालय प्रदेश में पंजाब से लेकर असोम हिमालय तक बाह्य एवं निचले ढालों पर; (ii) पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पश्चिम बंगाल में; (iii) दक्षिणी भारत में पश्चिमी घाट के पूर्व से लेकर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल राज्यों में तथा (iv) दक्षिणी-पूर्वी घाट के ढालों पर।
ये वन व्यापारिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्व रखते हैं। इन वनों का क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किमी है। इन्हें सुरक्षित वनों की श्रेणी में रखा गया है। इन वनों में साल एवं सागौन के वृक्ष महत्त्वपूर्ण हैं जो महाराष्ट्र एवं कर्नाटक राज्यों में अधिक मिलते हैं।
शीशम, चन्दन, पलास, हल्दू, आँवला, शहतूत, बाँस, कत्था आदि अन्य प्रमुख वृक्ष हैं। वार्निश, चमड़ा रँगने आदि के उपयोगी पदार्थ भी इन्हीं वनों से प्राप्त होते हैं।
3. उष्ण कटिबन्धीय शुष्क वन-इस प्रकार के वन उन भागों में उगते हैं जिन भागों में वर्षा का औसत 50 से 100 सेमी तक रहता है। जल के अभाव के कारण ये वृक्ष न तो अधिक ऊँचे ही हो पाते हैं एवं न ही हरे-भरे रहते हैं। इन वृक्षों की ऊँचाई केवल 6 से 9 मीटर तक होती है। इन वृक्षों की जड़े लम्बी एवं मोटी होती हैं ताकि वे भूगर्भ में अधिक गहराई से जल खींच सकें तथा अपने अन्दर संचित रख सकें। इन वनों में अधिकतर नागफनी, रामबॉस, खेजड़ी, बबूल, कीकर, खैर, रीठा, कुमटा, खजूर आदि वृक्ष मुख्य हैं।
उत्तरी भारत में ये वन पूर्वी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दक्षिणी-पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कम उपजाऊ भूमि पर उगते हैं। दक्षिणी भारत के शुष्क भागों में आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र में भी ऐसे ही वन मिलते हैं।
4. मरुस्थलीय एवं अर्द्ध-मरुस्थलीय वन-ये वन उन भागों में उगते हैं जहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेमी से कम होती है। इनके वृक्ष छोटी-छोटी झाड़ियों के रूप में होते हैं जिनकी जड़े लम्बी होती हैं। बबूल यहाँ का प्रमुख वृक्ष है। खेजड़ी, खैर, खजूर, रामबाँस, नागफनी आदि प्रमुख वृक्ष हैं। दक्षिणी-पश्चिमी हरियाणा, पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात तथा कर्नाटक के वृष्टिछाया प्रदेश में इन वनों का विस्तार है।
5. पर्वतीय वन-ऊँचाई एवं वर्षा के अनुसार ये वन भिन्नता लिये होते हैं। पश्चिमी हिमालय क्षेत्र की अपेक्षा पूर्वी हिमालय प्रदेश में वर्षा अधिक होती है। अतः यहाँ वनों में भी भिन्नता पाया जाना स्वाभाविक है। इस प्रदेश के वनों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है
(i) पूर्वी हिमालय प्रदेश के वन-भारत के उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र में पहाड़ी ढालों पर इन वनों का विस्तार मिलता है। इन क्षेत्रों में वर्षा का औसत 200 सेमी तक रहता है। ऊँचाई के अनुसार वनस्पति में भी भिन्नता मिलती है, परन्तु यह वनस्पति सदाबहार वनों की होती है। इस प्रदेश में 1,200 से 2,400 मीटर ऊँचाई पर उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार के वन मिलते हैं। इन वनों में साल, ओक, लॉरेल, दालचीनी, चन्दन, शीशम, खैर एवं सेमल के वृक्ष मिलते हैं। कहीं-कहीं बाँस भी उग आता है। शीतोष्ण सदाबहार की वनस्पति 2,400 से 3,600 मीटर की ऊंचाई पर मिलती है। यहाँ पर कम ऊँचाई वाले कोणधारी वृक्ष उगते हैं। प्रमुख वृक्षों में ओक, मैपिल, बर्च, एल्डर, लॉरेल, सिल्वर-फर, पाइन, स्पूस, जूनीपर प्रमुख हैं।
(ii) पश्चिमी हिमालय प्रदेश के वन-पश्चिमी हिमालय प्रदेश में वर्षा का प्रभाव वृक्षों के प्रकार पर पड़ता है। यहाँ ऊँचाई के साथ-साथ प्राकृतिक वनस्पति में भी भिन्नता पायी जाती है। इस प्रदेश में 900 मीटर की ऊँचाई तक अर्द्ध-मरुस्थलीय वनस्पति पायी जाती है, जो छोटे-छोटे वृक्ष एवं झाड़ियों के रूप में होती है। 900 से 1,800 मीटर की ऊँचाई तक चीड़, साल, सेमल, ढाक, शीशम, जामुन एवं बेर के वृक्ष उगते हैं। इन वृक्षों पर कम वर्षा एवं निम्नः तापमान का प्रभाव पड़ता है। 1,800 से 3,000 मीटर की ऊँचाई तक सम-शीतोष्ण कोणधारी वन पाये जाते हैं। 2,500 मीटर की ऊँचाई तक चौड़ी पत्ती वाले मिश्रित वन मिलते हैं। इनमें चीड़, देवदार, नीला-पोइन, एल्डर, पोपलर, बर्च, एल्म आदि के वृक्ष महत्त्वपूर्ण हैं। 2,500 मीटर से अधिक ऊँचाई पर सिल्वर-फर एवं येलो-पाइन मुख्य वृक्ष हैं।
हिमालय पर्वतीय प्रदेश में 2,400 मीटर से अधिक ऊँचाई पर अल्पाइन वन मिलते हैं। इन्हें कोणधारी वन कहा जा सकता है। ये वन 3,600 मीटर की ऊँचाई तक अधिक मिलते हैं। ओक, मैपिल, सिल्वर-फर, पाइन, जूनीपर आदि इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं। पश्चिमी हिमालय प्रदेश की अपेक्षा पूर्वी हिमालय प्रदेश में इन वनों का विस्तार अधिक है। 3,600 से 4,800 मीटर की ऊँचाई तक टुण्ड्रा वनस्पति, छोटी-छोटी झाड़ियाँ एवं काई उगती है। इससे अधिक ऊँचाई पर सदैव हिमावरण रहता है अर्थात् 4,800 मीटर की ऊँचाई पर हिमालय प्रदेश में स्थायी हिम रेखा है।
6. ज्वारीय वन-नदियों के डेल्टाई क्षेत्रों में एक विशेष प्रकार की वनस्पति उगती है जिनमें मैनग्रोव एवं सुन्दरी वृक्षों की प्रधानता होती है। ये वन सदाबहारी होते हैं। सागरीय जल की लवणता का प्रभाव इन वनों पर अधिक पड़ता है, क्योंकि इनकी छाल नमकीन एवं लकड़ी कठोर होती है। जिसकी नावें बनाई जाती हैं तथा छाल का उपयोग चमड़ा रँगने में किया जाता है। ताड़, नारियल, फोनिक्स, गोरेन, नीपा एवं केसूरिना (झाऊ) अन्य प्रमुख वृक्ष हैं। भारत में ये वन गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा आदि नदियों के डेल्टाओं में उगते हैं।
वनों का राष्ट्र के आर्थिक विकास में महत्व
वन राष्ट्र की अमूल्य निधि होते हैं। प्रकृति द्वारा प्रदत्त निःशुल्क प्राकृतिक उपहारों में वन सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में, “उगता हुआ वृक्ष प्रगतिशील राष्ट्र का जीवन प्रतीक है।” वन महोत्सव के जन्मदाता डॉ० के० एम० मुन्शी ने वृक्षों की उपयोगिता को इन शब्दों में व्यक्त किया है-“वृक्षों का अर्थ है जल, जल का अर्थ है रोटी और रोटी ही जीवन है।” वृक्षों के महत्त्व को देखते हुए ही भारत सरकार ने 1950 ई० में वन-महोत्सव कार्यक्रम लागू किया था। वनों के आर्थिक महत्त्व को अग्रलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है
(अ) वनों से प्रत्यक्ष लाभ-वनों के प्रत्यक्ष लाभों को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है
1. प्रधान उपजे-वनों की मुख्य उपज लकड़ी है। वनों से प्राप्त होने वाली आय का लगभग 75% भाग लकड़ी से ही प्राप्त होता है। भारतीय वनों से प्रति वर्ष लगभग 25 करोड़ की लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं। देवदार, सागौन, शीशम, चीड़, पाइन तथा साल के वृक्षों से उत्तम, कोमल तथा टिकाऊ लकड़ियाँ मिलती हैं, जिनसे विविध प्रकार को फर्नीचर बनाया जाता है। चन्दन वृक्ष की लकड़ी से सुगन्धित तेल निकाला जाता है। गंगा डेल्टा में सुन्दरी वृक्षों की लकड़ी से टिकाऊ एवं मजबूत नावें बनाई जाती हैं। भारत में प्रति वर्ष 108 लाख घन मीटर औद्योगिक लकड़ी (15 लाख घन मीटर शंकु वृक्षी और 93 लाख घन मीटर चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों की) प्राप्त की जाती है। भारतीय वनों से प्रति वर्ष 490 लाख टन ईंधन की लकड़ी का उत्पादन होता है, जबकि माँग 1,330 लाख घन मीटर लकड़ी की रहती है।
2. गौण उपजों-लकड़ी के अतिरिक्त वनों से अन्य अनेक ऐसे पदार्थ भी प्राप्त होते हैं जो आर्थिक दृष्टि से बहुत उपयोगी होते हैं तथा जिनका उपयोग उद्योग-धन्धों के कच्चे माल के रूप में किया जाता है। वनों से निम्नलिखित गौण उपजे प्राप्त होती हैं।
(i) लाख-लाख वनों की महत्त्वपूर्ण उपज है। लाख के उत्पादन में भारत का विश्व में प्रथम – स्थान है। यहाँ विश्व का लगभग 75% लाख उत्पन्न किया जाता है। भारत में प्रति वर्ष Rs. 11 करोड़ मूल्य के लाख उत्पादन में से लगभग 90 प्रतिशत का निर्यात कर दिया जाता है, जिससे प्रति वर्ष Rs. 10 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। बिहार राज्य भारत का 50 प्रतिशत लाख उत्पन्न करता है। लाख उत्पादन में दूसरा स्थान मध्य प्रदेश का है।
(ii) गोंद-अनेक वृक्षों के तने चिपचिपा रस छोड़ते हैं, जो सूखकर गोंद बन जाता है। यह मुख्यतः बबूल, चीड़, नीम, पीपल, खेजड़ा, कीकर तथा साल के वृक्षों से प्राप्त होता है।
(iii) कत्था-खैर वृक्षों की लकड़ी को पानी में उबालकर तथा सुखाकर कत्था प्राप्त किया जाता है। खैर के वृक्ष उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में अधिक पाये जाते हैं।
(iv) चमड़ा रँगने तथा पकाने के पदार्थ-वनों के अनेक वृक्षों की छालें चमड़ा पकाने तथा रँगने में प्रयुक्त की जाती हैं। बबूल, सुन्दरी, खैर, हरड़, बहेड़ा, आँवला आदि वृक्षों की छालें तथा पत्तियाँ चमड़ा कमाने एवं रँगने में प्रयुक्त की जाती हैं।
(v) अन्य पदार्थ-वनों से प्राप्त अन्य गौण उपजों में रबड़, रीठा, तेल, ओषधियाँ, घास, सिनकोना आदि महत्त्वपूर्ण हैं, जिनका उपयोग विभिन्न उद्योग-धन्धों में किया जाता है। वनों में रहने वाले पशु-पक्षियों से मांस, चमड़ा, हड्डी तथा पंख भी प्राप्त होते हैं। वनों में उगी हुई हरी घास पशुओं के लिए उत्तम चरागाह का काम देती है। वनों से सरकार को राष्ट्रीय आय प्राप्त होती है तथा अनेक लोगों की जीविका भी चलती है।
(ब) वनों से अप्रत्यक्ष लाभ-वनों से निम्नलिखित अप्रत्यक्ष लाभ भी प्राप्त होते हैं
1. वन जलवायु को सम रखने में सहायक होते हैं तथा वर्षा कराने में भी योगदान देते हैं, क्योंकि इनसे। वायुमण्डल को नमी प्राप्त होती है।
2. वृक्ष पर्यावरण को शुद्ध करते हैं। ये वायुमण्डल की कार्बन डाइऑक्साइड गैस को ऑक्सीजन में बदल देते हैं। इस प्रकार वनों से वायु प्रदूषण कम हो जाता है।
3. वन बाढ़ों के प्रकोप को रोकने में सहायक होते हैं, क्योंकि वृक्षों की जड़ों से जल का प्रवाह मन्द पड़ जाता है।
4. वन मरुस्थल के प्रसार को रोकते हैं। वृक्षों से वायु की गति मन्द हो जाती है तथा तीव्र आँधियों से। होने वाली हानि भी कम हो जाती है।
5. वनों से भूमि-क्षरण तथा कटाव रुकता है, क्योंकि वृक्षों की जड़े वर्षा के जल की गति को मन्द करे। देती हैं तथा मिट्टी को पकड़कर रखती हैं।
6. वनों में रेशम के कीड़े तथा मधुमक्खी पालने का कार्य सुविधापूर्वक किया जाता है।
7. वन देश के प्राकृतिक सौन्दर्य में भी वृद्धि करते हैं। वृक्षों की हरियाली नेत्रों को बहुत भली प्रतीत। होती है।
8. वनों के वृक्षों से गिरी हुई पत्तियाँ भूमि में मिलकर उसकी उर्वरा शक्ति को बढ़ा देती हैं। इससे मिट्टी में जीवांशों की मात्रा में भी वृद्धि होती है।
9. वन पशु-पक्षियों के लिए शरणस्थली होते हैं, जिनसे हमें अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।
10. वन मिट्टी में दब जाने पर कालान्तर में कोयले तथा खनिज तेल का निर्माण करते हैं।
11. वनों की जड़ों द्वारा भूमि में जल का रिसाव अधिक होता है। इससे भूमिगत जल का भण्डार बढ़ता है।
भारत में प्राचीन काल से वनों का विस्तार पर्याप्त मात्रा में था, परन्तु जनसंख्या के दबाव के बढ़ने के फलस्वरूप आवास, कृषि तथा उद्योगों की स्थापना के लिए वनों को बुरी तरह काट डाला गया। वन-क्षेत्रों का अभाव हो जाने से पर्यावरण असन्तुलन के अनेक दुष्प्रभाव प्रकट होने लगे हैं। वर्तमान में हमारी सरकार ने इस ओर ध्यान दिया है तथा राष्ट्रीय वन नीति घोषित की है, जिसके अनुसार भूमि के 33% भाग पर वन होने चाहिए। वन महोत्सव तथा सामाजिक वानिकी इसी दिशा में हमारे कदम हैं। वस्तुतः वन-सम्पदा हमारी धरोहर है, हमें इसे नष्ट नहीं करना चाहिए। हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि हम इसे बढ़ाकर आगे आने वाली पीढ़ियों को दें। हमें इस सम्पत्ति का ब्याज ही काम में लेना चाहिए, इसके मूल को कम नहीं करना चाहिए, तभी हम आज के भयावह पर्यावरण असन्तुलन से राहत पा सकते हैं।
वन-संरक्षण के उपाय
पर्यावरण के संरक्षणार्थ वनों को संरक्षण अत्यन्त आवश्यक प्रतीत होता है। वन-संरक्षण हेतु देश में संशोधित राष्ट्रीय वन नीति 1988 में लागू की गई है। इस वन नीति के मुख्य लक्ष्य पारिस्थितिकीय सन्तुलन के संरक्षण और पुन:स्थापन द्वारा पर्यावरण स्थायित्व को बनाए रखना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु वन-संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं-
1. व्यापक वृक्षारोपण और सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों के द्वारा वन और वृक्ष के आच्छादन में महत्त्वपूर्ण बढ़ोतरी की जाए।
2. वन उत्पादनों के उचित उपयोग को बढ़ावा देना और लकड़ी के अनुकूलन विकल्पों की खोज की जाए।
3. वनों पर पड़ रहे दबाव को न्यूनतम करने के लिए जन-साधारण; विशेषकर महिलाओं को अधिकतम सहयोग प्रदान करने के लिए प्रेरित करना।
4. नदियों, झीलों और जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्रों में भूमि-कटाव और वनों के क्षरण पर नियन्त्रण किया जाए।
5. वन संरक्षण और प्रबन्धन हेतु ग्रामीण समितियों का गठन किया जाए।
6. आदिवासी बहुल क्षेत्रों में नष्ट हो चुके वनों को पुनः हरा-भरा करने के लिए विशेष प्रायोजित रोजगार योजना के माध्यम से वनों को पुनर्जीवित किया जाए।
7. प्राकृतिक और मानव द्वारा लगी वनों की आग (दावानल) पर नियन्त्रण करना तथा वनों में आग। लगने की घटनाओं में कमी लाकर वनों की उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना।
8. रेगिस्तानी, बंजर और अनुपयुक्त अन्य प्रकार की भूमि पर उसकी प्रकृति के अनुरूप प्रजातियों की वनस्पति का विस्तार करना भी वन-संरक्षण में सहायक कदम होगा।
वास्तव में वन-सम्पदा हमारे लिए प्रकृति का अमूल्य वरदान है, अतः हमें इस सम्पत्ति का ब्याज ही काम में लेना चाहिए, इसके मूल को कभी भी कम नहीं करना चाहिए, तभी हम आज के भयावह पर्यावरण, असन्तुलन से राहत पा सकते है।
In simple words: भारत में वनों का वितरण और प्रकार जलवायु, वर्षा और मिट्टी पर निर्भर करता है, जिसमें उष्णकटिबंधीय सदाबहार, पर्णपाती, शुष्क, मरुस्थलीय, पर्वतीय और ज्वारीय वन शामिल हैं। वन आर्थिक रूप से लकड़ी, लाख, गोंद जैसे उत्पाद प्रदान करते हैं, और पर्यावरणीय रूप से जलवायु संतुलन, प्रदूषण नियंत्रण और मृदा संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके संरक्षण के लिए वृक्षारोपण और सामुदायिक भागीदारी आवश्यक है।
🎯 Exam Tip: वनों के वर्गीकरण, उनके वितरण, आर्थिक और पर्यावरणीय महत्व तथा संरक्षण के उपायों को विस्तार से तैयार करें, क्योंकि यह एक व्यापक प्रश्न है।
Question 2. जीवमण्डल निचय (आरक्षित क्षेत्र) क्या हैं? इसके उद्देश्य बताइए तथा यूनेस्को द्वारा भारत के मान्यता प्राप्त जीवमण्डल निचय का वर्णन कीजिए।
Answer: जीवमण्डल निचय
देश में जैव विविधता की सुरक्षा और संरक्षण के लिए विभिन्न उपाय किए जा रहे हैं। जीवमण्डल निचय भी इनमें एक है। ये विशेष प्रकार के भौमिक और तटीय पारिस्थितिक तन्त्र हैं, जिन्हें यूनेस्को के मानव और जीवमण्डल प्रोग्राम (MAB) के अन्तर्गत मान्यता प्राप्त है।
जीवमण्डल निचय के तीन मुख्य उद्देश्य हैं, जो निम्नांकित चित्र द्वारा स्पष्ट होते हैं
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र जीवमण्डल निचय के तीन मुख्य उद्देश्यों को दर्शाता है: संरक्षण, विकास और व्यवस्था। संरक्षण का अर्थ है जीव विविधता और पारिस्थितिक तंत्रों की सुरक्षा, जबकि विकास पर्यावरण और विकास के बीच समन्वय स्थापित करता है। व्यवस्था अनुसन्धान और देख-रेख के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन के रूप में कार्य करती है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि भारत के 14 जीवमण्डल निचय, जिनमें से 4 यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त हैं, प्रभावी ढंग से प्रबंधित हों।
भारत में 14 जीवमण्डल निचय हैं। इनमें से 4
1. नीलगिरि जीवमण्डल निचय-इस आरक्षित क्षेत्र की स्थापना 1986 की गई थी। यह भारत का पहला जीवमण्डल निचय है। इस निचय में वायनाड वन्य जीवन सुरक्षित क्षेत्र नगरहोल, बाँदीपुर और मुदुमलाई, लिम्बूर का सारा वन से ढका ढाल, ऊपरी नीलगिरि पठार, सायलेण्ट वैली और सिद्वानी पहाड़ियाँ सम्मिलित हैं। इस जीवमण्डल निचय का कुल क्षेत्र 5,520 वर्ग किलोमीटर है।
2. नन्दादेवी जीवमण्डल निचय-जय जीवमण्डल निचय उत्तराखण्ड में स्थित है। इसमें चमोली, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों के भाग सम्मिलित हैं। इस निचय में शीतोष्ण कटिबन्धीय वन तथा कई प्रकार के वन्य जीव; जैसे-हिम तेन्दुआ, काला भालू, भूरा भालू, कस्तूरी मृग, हिममुर्गा, बाज और काला बाज आदि पाए जाते हैं।
3. सुन्दरवन जीवमण्डल निचय-यह पश्चिम बंगाल में गंगा नदी के दलदली डेल्टा पर स्थित है। यह विशाल क्षेत्र 9,630 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यहाँ मैंग्रोव वृक्ष, लवणीय और ताजा जल प्राप्त है। सबको पर्यावरण के अनुरूप ढालते हुए बाघ पानी में तैरते हैं और चीतल, भौंकने वाला मृग, जंगली सूअर जैसे दुर्लभ जीव भी पाए जाते हैं।
4. मन्नार की खाड़ी का जीवमण्डल निचय-यह निचय लगभग एक लाख पाँच हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है और भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है। समुद्री जीव विविधता के मामले में यह क्षेत्र विश्व के सबसे धनी क्षेत्रों में से एक है। इस जीवमण्डल निचय में 21 द्वीप हैं और इन पर अनेक ज्वारनदमुख पुलिन, तटीय पर्यावरण के जंगल, समुद्री घासे, प्रवालद्वीप, लवणीय अनूप और मैंग्रोव पाए जाते हैं।
In simple words: जीवमंडल निचय यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त विशेष पारिस्थितिक क्षेत्र हैं जिनका उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण, सतत विकास और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना है। भारत में 14 जीवमंडल निचय हैं, जिनमें से नीलगिरि, नंदादेवी, सुंदरवन और मन्नार की खाड़ी प्रमुख हैं, जो अपने विशिष्ट भूगोल और समृद्ध जैव विविधता के लिए जाने जाते हैं।
🎯 Exam Tip: जीवमंडल निचय की परिभाषा, उनके उद्देश्यों (संरक्षण, विकास, व्यवस्था) और यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त भारतीय जीवमंडल निचयों के नाम और उनकी मुख्य विशेषताओं को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 3. भारत के जीवरिजर्व क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति, विस्तार और क्षेत्रफल का विवरण दीजिए।
Answer: भारत में 14 जीव रिजर्व क्षेत्र या जीवमण्डल निचय हैं। इनका नाम, कुल भौगोलिक क्षेत्रफल, स्थिति और विस्तार अग्र्रांकित तालिका में दिया गया है
| क्र०सं० | जीवमण्डल निचय | कुल भौगोलिक क्षेत्रफल (वर्ग किमी) | स्थिति और विस्तार/प्रान्त |
|---|---|---|---|
| 1. | नीलगिरि | 5,520 | वायनाद, नगरहोल, बाँदीपुर, मुदुमलाई, निलम्बूर, सायलेण्ट वैली, सिरुवली पहाड़ियाँ (तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक)। |
| 2. | नन्दा देवी | 2,236.74 | चमोली, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जिलों के भाग (उत्तराखण्ड), गारो पहाड़ियों का हिस्सा (मेघालय)। |
| 3. | नोकरेक | 820 | गारो पहाड़ियों का हिस्सा (मेघालय)। |
| 4. | मानस | 2,837 | कोकराझार, बोगाई गाँव, बरपेटा, नलबीड़ीं, कामरूप व दारांग जिलों के हिस्से (असम)। |
| 5. | सुन्दरवन | 9,630 | गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र का डेल्टा व इसका हिस्सा (पश्चिम बंगाल)। |
| 6. | मन्नार की खाड़ी | 10,500 | भारत और श्रीलंका के मध्य मन्नार की खाड़ी का भारतीय हिस्सा (तमिलनाडु)। |
| 7. | ग्रेट निकोबार | 885 | अण्डमान-निकोबार के सुदूर दक्षिणी द्वीप। |
| 8. | सिमिलीपाल | 4,375 | मयूरभंज जिले के भाग (उड़ीसा)। |
| 9. | डिब्रू-साइकोवा | 765 | डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया जिलों के भाग (असम)। |
| 10. | दिहांग-देबाँग | 5,111.50 | अरुणाचल प्रदेश में सियांग और देबांग जिलों के भाग। |
| 11. | कंचनजंगा | 2,619.92 | उत्तर और पश्चिम सिक्किम के भाग। |
| 12. | पंचमढ़ी | 4,926.28 | बेतूल, होशंगाबाद और छिन्दवाड़ा जिलों के भाग (मध्य प्रदेश)। |
| 13. | अगस्त्यमलाई | 1,701 | केरल में अगस्त्यथीमलाई पहाड़ियाँ। |
| 14. | अचनकुमर-अमरकंटक | 3,835.51 | मध्य प्रदेश में अनूपपुर और दिदोरी जिलों के भाग और दत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले का भाग। |
In simple words: भारत में 14 जीवमंडल निचय हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रफल, स्थिति और विस्तार है, जैसे नीलगिरि तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में फैला है, नंदादेवी उत्तराखंड में है, और सुंदरवन पश्चिम बंगाल के डेल्टा क्षेत्र में स्थित है।
🎯 Exam Tip: भारत के सभी 14 जीवमंडल निचयों के नाम, उनके क्षेत्रफल और विशेष रूप से उनकी भौगोलिक स्थिति (राज्य/जिले) को तालिका के रूप में याद रखना अत्यधिक स्कोरिंग हो सकता है।
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