UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules

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Detailed Chapter 9 जैविक अणुओं UP Board Solutions for Class 11 Biology

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Class 11 Biology Chapter 9 जैविक अणुओं UP Board Solutions PDF

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

 

Question 1. वृहत अणु क्या है? उदाहरण दीजिए ।
Answer: जो तत्त्व अम्ल अविलेय अंश में पाये जाते हैं वे वृहत् अणु या वृहत् जैविक अणु कहलाते हैं। उदाहरणार्थ :
(i) न्यूक्लिक अम्ल ।
In simple words: वृहत् अणु (macromolecules) बड़े जैविक अणु होते हैं जो कोशिकाओं में पाए जाते हैं और अम्ल में अघुलनशील होते हैं, जैसे न्यूक्लिक अम्ल।

🎯 Exam Tip: वृहत् अणुओं की परिभाषा और उनके मुख्य उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह जैव-अणुओं की मूलभूत समझ प्रदान करता है।

 

Question 2. ग्लाइकोसाइडिक, पेप्टाइड तथा फॉस्फोडाइएस्टर बन्धों का वर्णन कीजिए।
Answer:1. ग्लाइकोसाइडिक बन्ध (Glycosidic Bond) : बहुलकीकरण में मोनोसैकेराइड अणु एक-दूसरे के पीछे जिस सहसंयोजी बन्ध द्वारा जुड़ते हैं उसे ग्लाइकोसाइडिक बन्ध कहते हैं। इस बन्ध में एक मोनोसैकेराइड अणु का ऐल्डिहाइड या कीटोन समूह दूसरे अणु के एक ऐल्कोहॉलिय अर्थात् हाइड्रॉक्सिल समूह (-OH) से जुड़ता है जिसमें कि जल (\(H_2O\)) का एक अणु पृथक् हो जाता है। 2. पेप्टाइड बन्ध (Peptide Bond) : जिस बन्ध द्वारा अमीनो अम्लों के अणु एक-दूसरे से आगे-पीछे जुड़ते हैं, उसे पेप्टाइड या ऐमाइड बन्ध कहते हैं। यह बन्ध सहसंयोजी होता है और एक अमीनो अम्ल के कार्बोक्सिलिक समूह की अगले अमीनो अम्ल के अमीनो समूह से अभिक्रिया के फलस्वरूप बनता है। इसमें जल का एक अणु हट जाता है। 3. फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध (Phosphodiester Bonds) : न्यूक्लीक अम्ल के न्यूक्लिओटाइड्स (nucleotides) फॉस्फोडाइएस्टर बन्धों (phosphodiester bonds) द्वारा एक-दूसरे से संयोजित होकर पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला बनाते हैं। फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध समीपवर्ती दो न्यूक्लियोटाइड्स के फॉस्फेट अणुओं के मध्य बनता है। DNA की दोनों पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं के नाइट्रोजन क्षारक हाइड्रोजन बन्धों द्वारा जुड़े होते हैं।
In simple words: ग्लाइकोसाइडिक बन्ध शर्कराओं को, पेप्टाइड बन्ध अमीनो अम्लों को, और फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध न्यूक्लियोटाइड्स को जोड़ते हैं, जिससे बड़े जैविक अणु बनते हैं।

🎯 Exam Tip: इन तीनों बन्धों की संरचनात्मक विशेषताओं और उन अणुओं के प्रकारों को समझने पर ध्यान दें जिन्हें वे जोड़ते हैं, यह जैव-अणुओं की मूलभूत संरचना को समझने में सहायक है।

 

Question 3. प्रोटीन की तृतीयक संरचना से क्या तात्पर्य है?
Answer: प्रोटीन की तृतीयक संरचना के अन्तर्गत प्रोटीन की एक लम्बी कड़ी अपने ऊपर ही ऊन के एक खोखले गोले के समान मुड़ी हुई होती है यह संरचना प्रोटीन के त्रिआयामी रूप को प्रदर्शित करती है।
In simple words: प्रोटीन की तृतीयक संरचना एक त्रिआयामी, गोलाकार या रेशेदार आकार है जो एक पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के अपने ऊपर मुड़ने से बनता है, जिससे प्रोटीन को उसका विशिष्ट कार्य करने की क्षमता मिलती है।

🎯 Exam Tip: प्रोटीन की विभिन्न संरचनात्मक स्तरों- प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक और चतुष्क - के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है, खासकर तृतीयक संरचना जो प्रोटीन के कार्य से सीधे संबंधित होती है।

 

Question 4. 10 ऐसे रुचिकर सूक्ष्म जैव अणुओं का पता लगाइए जो कम अणुभार वाले होते हैं व इनकी संरचना बनाइए। ऐसे उद्योगों का पता लगाइए जो इन यौगिकों का निर्माण विलगन द्वारा करते हैं? इनको खरीदने वाले कौन हैं? मालूम कीजिए ।
Answer: सूक्ष्म जैव अणु जीवधारियों में पाए जाने वाले सभी कार्बनिक यौगिकों को जैव अणु कहते हैं।
(i) कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates); जैसे : ग्लूकोस, फ्रक्टोस, राइबोस, डिऑक्सीराइबोस शर्करा, माल्टोस आदि ।
(ii) वसा व तेल (Fat & Oils) : पामिटिक अम्ल, ग्लिसरॉल, ट्राइग्लिसराइड, फॉस्फोलिपिड्स, कोलेस्टेरॉल आदि ।
(iii) ऐमीनो अम्ल (Amino Acids) : ग्लाइसीन, ऐलेनीन, सीरीन आदि ।
(iv) नाइट्रोजन क्षारक (Nitrogenous Base) : ऐडेनीन (adenine), ग्वानीन : (guanine), थायमीन (thymine), यूरेसिल (uracil), सायटोसीन (cytosine) आदि ।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस चित्र में जीव ऊतकों में पाए जाने वाले कम अणुभार के कार्बनिक यौगिकों की संरचनाएँ प्रदर्शित हैं। इसमें शर्कराएँ (ग्लूकोस, राइबोस), ऐमीनो अम्ल (ग्लाइसीन, ऐलेनीन, सीरीन), वसा व तेल (पामिटिक अम्ल, ग्लिसरॉल, ट्राइग्लिसराइड, फॉस्फोलिपिड, कोलेस्टेरॉल) और नाइट्रोजन क्षारक (ऐडेनीन, यूरेसिल) तथा न्यूक्लियोटाइड्स/न्यूक्लियोसाइड्स (ऐडीनोसीन, यूरीडीन, एडेनीलिक अम्ल) की संरचनाएं शामिल हैं। ये संरचनाएं विभिन्न जैविक अणुओं के मूल घटकों को दर्शाती हैं। शर्करा उद्योग, तेल एवं घी उद्योग, औषधि उद्योग आदि इनका निर्माण करते हैं। मनुष्य इनका उपयोग अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु करती है।
In simple words: सूक्ष्म जैव अणु छोटे कार्बनिक यौगिक होते हैं जो जीवों में पाए जाते हैं, जैसे शर्कराएँ, अमीनो अम्ल, वसा अम्ल और नाइट्रोजन क्षारक, जिनकी संरचनाएं जीववैज्ञानिक प्रक्रियाओं और औद्योगिक उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जैव-अणुओं के नाम, उनके मुख्य उदाहरण और वे किन जैविक प्रक्रियाओं या उद्योगों में उपयोग होते हैं, यह जानना आपको बेहतर अंक दिलाएगा।

 

Question 5. प्रोटीन में प्राथमिक संरचना होती है, यदि आपको जानने हेतु ऐसी विधि दी गई है जिसमें प्रोटीन के दोनों किनारों पर ऐमीनो अम्ल है तो क्या आप इस सूचना को प्रोटीन की शुद्धता अथवा समांगता (homogeneity) से जोड़ सकते हैं?
Answer: प्रोटीन्स की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ लम्बी व रेखाकार होती हैं। प्रोटीन कुण्डलन एवं वलन द्वारा विभिन्न प्रकार की आकृति धारण करती हैं। इन्हें प्रोटीन्स के प्राकृत संरूपण (native conformations) कहते हैं। प्रोटीन के प्राकृत संरूपण चार स्तर के होते हैं- प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुष्क स्तर। पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े ऐमीनो अम्लों के अनुक्रम प्रोटीन की संरचना का प्राथमिक स्तर प्रदर्शित करते हैं। प्रोटीन में ऐमीनो अम्लों का अनुक्रमे इसके जैविक प्रकार्य का निर्धारण करता है। पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के एक सिरे पर प्रथम ऐमीनो अम्ल का खुला ऐमीनो समूह तथा दूसरे सिरे पर अन्तिम ऐमीनो अम्ल का खुला कार्बोक्सिल समूह (carboxyl group) होता है। अतः इन सिरों को क्रमशः N-छोर तथा C-छोर कहते हैं। इससे प्रोटीन की शुद्धता या समांगता प्रदर्शित होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक काल्पनिक प्रोटीन के अंश की प्राथमिक संरचना को दर्शाता है, जिसमें N-छोर और C-छोर स्पष्ट रूप से दिखाए गए हैं। इसमें विभिन्न ऐमीनो अम्ल अवशिष्टों - सीरीन (Ser), सिस्टीन (Cys), टायरोसीन (Tyr) और ग्लूटामिक अम्ल (Glu) - को उनके एकल-अक्षरीय और त्रि-अक्षरीय कूटों के साथ दर्शाया गया है, जो एक पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े हुए हैं।
In simple words: प्रोटीन की प्राथमिक संरचना में अमीनो अम्लों का क्रम और उसके N-छोर (अमीनो समूह) तथा C-छोर (कार्बोक्सिल समूह) की पहचान प्रोटीन की शुद्धता और एकरूपता को समझने में मदद करती है, क्योंकि यह क्रम प्रोटीन की विशिष्ट पहचान है।

🎯 Exam Tip: प्रोटीन की प्राथमिक संरचना और उसके N-छोर व C-छोर की अवधारणा को स्पष्ट रूप से समझें, क्योंकि यह प्रोटीन की पहचान, शुद्धता और उसके जैविक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. चिकित्सार्थ अभिकर्ता (therapeutic agents) के रूप में प्रयोग में आने वाले प्रोटीन का पता लगाइए व सूचीबद्ध कीजिए। प्रोटीन की अन्य उपयोगिताओं को बताइए । (जैसे-सौन्दर्य प्रसाधन आदि) ।
Answer: साइटोक्रोम 'C', हीमोग्लोबिन तथा इम्यूनोग्लोबिन 'G' चिकित्सार्थ अभिकर्ता के रूप में प्रयोग में आने वाले प्रोटीन हैं। प्रोटीन के निम्नलिखित कार्यों की वजह से इनकी उपयोगिता अधिक है। 1. लगभग सभी एन्जाइम्स (enzymes) प्रोटीन के बने होते हैं। 2. श्रोम्बिन (thrombin) तथा फाइब्रिनोजेन (fibrogen) रुधिर प्रोटीन्स हैं जो चोट लगने पर रुधिर का थक्का बनने में सहायक होती हैं। 3. एक्टिन तथा मायोसिन (actin & myosin) संकुचन प्रोटीन्स हैं जो सभी कंकालीय पेशियों के संकुचन में भाग लेती हैं। 4. रेशम में फाइब्रोइन (fibroin) प्रोटीन होती है। 5. कुछ हार्मोन्स; जैसे-अग्र पिट्यूटरी ग्रन्थि का वृद्धि हार्मोन (somatotropic) तथा अग्न्याशय ग्रन्थि से स्रावित इन्सुलिन (insulin) हार्मोन शुद्ध प्रोटीन के बने होते हैं। 6. एन्टीबॉडीज या इम्यूनोग्लोब्यूलिन जोकि शरीर की सुरक्षा करती है प्रोटीन से ही बनी होती है।
In simple words: प्रोटीन शरीर में विभिन्न महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाते हैं, जैसे चिकित्सीय उपचार (साइटोक्रोम, हीमोग्लोबिन, इम्यूनोग्लोबिन), एंजाइम के रूप में रासायनिक प्रतिक्रियाओं को उत्प्रेरित करना, रक्त का थक्का जमाना, मांसपेशियों का संकुचन, हार्मोनल क्रियाएँ और प्रतिरक्षा प्रणाली में सुरक्षा प्रदान करना।

🎯 Exam Tip: प्रोटीन के विशिष्ट उदाहरणों और उनके संबंधित कार्यों को याद रखें, खासकर चिकित्सकीय और शारीरिक प्रक्रियाओं में उनकी भूमिका पर ध्यान दें।

 

Question 7. ट्राइग्लिसराइड के संगठन का वर्णन कीजिए।
Answer: एक ग्लिसरॉल (glycerol or glycerine) अणु से एक-एक करके तीन वसीय अम्ल अणुओं के तीन सहसंयोजी बन्धों (covalent bonds) द्वारा जुड़ने से वास्तविक वसा का एक अणु बनता है। इन बन्धों को एस्टर बन्ध (ester bonds) कहते हैं। ग्लिसरॉल एक ट्राइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल (trihydric alcohol) होता है, क्योंकि इसकी कार्बन श्रृंखला के तीनों कार्बन परमाणुओं से एक-एक हाइड्रॉक्सिल समूह (hydroxyl group, -OH) जुड़ा होता है। एस्टर बन्ध प्रत्येक हाइड्रॉक्सिल समूह तथा एक वसीय अम्ल के कार्बोक्सिल समूह (COOH) के बीच बनती है। इसीलिए वसा अणु को ट्राइग्लिसराइड या ट्राइऐसिलग्लिसरॉल (triglyceride or triacylglycerol) कहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक ट्राइग्लिसराइड अणु के संश्लेषण की प्रक्रिया को दर्शाता है। इसमें एक ग्लिसरॉल अणु के तीन हाइड्रॉक्सिल (-OH) समूह तीन वसीय अम्लों (ओलेइक अम्ल, पामिटोलेइक अम्ल, और स्टीयरिक अम्ल) के कार्बोक्सिल (-COOH) समूहों के साथ एस्टर बन्ध बनाकर जुड़ते हैं, जिससे जल के तीन अणु मुक्त होते हैं और एक ट्राइग्लिसराइड अणु का निर्माण होता है।
In simple words: ट्राइग्लिसराइड एक वसा का अणु होता है जो एक ग्लिसरॉल अणु के साथ तीन वसीय अम्ल अणुओं के एस्टर बन्धों द्वारा जुड़ने से बनता है।

🎯 Exam Tip: ट्राइग्लिसराइड की मूल संरचना- ग्लिसरॉल और तीन वसीय अम्ल- तथा एस्टर बन्धों के निर्माण की प्रक्रिया को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह वसा के जैव-रासायनिक महत्व का आधार है।

 

Question 8. क्या आप प्रोटीन की अवधारणा के आधार पर वर्णन कर सकते हैं कि दूध का दही अर्थवा योगर्ट में परिवर्तन किस प्रकार होता है?
Answer: दूध की विलेय प्रोटीन केसीनोजन (caseinogen) को अविलेय केसीन (casein) में बदलने का कार्य रेनिन (rennin) एन्जाइम तथा स्ट्रेप्टोकोकस जीवाणु करते हैं। ये किण्वन द्वारा दूध को ही या योगर्ट में बदल देते हैं; क्योंकि केसीनोजन प्रोटीन अवक्षेपित हो जाती है।
In simple words: दूध का दही या योगर्ट में परिवर्तन केसीनोजन प्रोटीन के रेनिन एन्जाइम और स्ट्रेप्टोकोकस जीवाणुओं द्वारा किण्वन से होता है, जिससे केसीनोजन अविलेय केसीन में बदलकर अवक्षेपित हो जाता है।

🎯 Exam Tip: दूध से दही बनने की प्रक्रिया में रेनिन एन्जाइम और लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया की भूमिका और केसीनोजन प्रोटीन का केसीन में रूपांतरण, ये प्रमुख बिंदु हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए।

 

Question 9. क्या आप व्यापारिक दृष्टि से उपलब्ध परमाणु मॉडल (बॉल व स्टिक नमूना) का प्रयोग करते हुए जैव अणुओं के उन प्रारूपों को बना सकते हैं?
Answer: बॉल व स्टिक नमूना (Ball and Stick Model) के द्वारा जैव अणुओं के प्रारूपों को प्रदर्शित किया जा सकता है।
In simple words: हाँ, व्यापारिक बॉल व स्टिक मॉडल का उपयोग करके जैव अणुओं की त्रिआयामी संरचनाओं को आसानी से बनाया और प्रदर्शित किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: बॉल व स्टिक मॉडल जैसे भौतिक मॉडल की क्षमता को समझें, क्योंकि ये जटिल आणविक संरचनाओं को दृश्य रूप से समझने में बहुत सहायक होते हैं।

 

Question 10. ऐमीनो अम्लों का दुर्बल क्षार से अनुमापन (itrate) कर, ऐमीनो अम्ल में वियोजी क्रियात्मक समूहों का पता लगाने का प्रयास कीजिए ।
Answer: ऐमीनो अम्लों का दुर्बल क्षार से अनुमापन करने से कार्बोक्सिल समूह (-COOH) तथा ऐमीनो समूह (-NH2) पृथक् हो जाते हैं।
In simple words: अमीनो अम्लों का दुर्बल क्षार से अनुमापन करके, उनके वियोजी कार्बोक्सिल (-COOH) और अमीनो (-NH2) समूहों की पहचान की जा सकती है, क्योंकि ये समूह pH परिवर्तन पर आयनीकृत होते हैं।

🎯 Exam Tip: अमीनो अम्लों में कार्बोक्सिल और अमीनो समूहों की आयनीकरण क्षमता और अनुमापन वक्रों पर उनके प्रभाव को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उनके उभयधर्मी (amphoteric) व्यवहार को दर्शाता है।

 

Question 11. ऐलेनीन ऐमीनो अम्ल की संरचना बताइए ।
Answer: ऐलेनीन में R समूह अत्यधिक जलरोधी हाइड्रोकार्बन समूह होते हैं जिन्हें पार्श्व श्रृंखलाएँ कहते हैं। इसमें पाश्र्व श्रृंखला मेथिल समूह की होती है।
\[\text{COO-}\\ \text{H}_3\text{N}^{+}-\text{C}-\text{H}\\ \text{CH}_3\\ \text{Methyl group}\]
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस चित्र में ऐलेनीन नामक ऐमीनो अम्ल की संरचना प्रदर्शित है। इसमें एक केंद्रीय कार्बन परमाणु (\(\alpha\)-कार्बन) है, जिससे एक अमीनो समूह (\(\text{H}_3\text{N}^+\)), एक कार्बोक्सिल समूह (\(\text{COO}^-\)), एक हाइड्रोजन परमाणु (\(\text{H}\)), और एक मेथिल समूह (\(\text{CH}_3\)) की पार्श्व श्रृंखला (R समूह) जुड़ी हुई है। मेथिल समूह ऐलेनीन को उसकी विशिष्ट पहचान देता है।
In simple words: ऐलेनीन एक अमीनो अम्ल है जिसमें केंद्रीय कार्बन से एक अमीनो समूह, एक कार्बोक्सिल समूह, एक हाइड्रोजन और एक मेथिल समूह (उसकी पार्श्व श्रृंखला) जुड़ा होता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न अमीनो अम्लों की संरचनाओं को याद करना महत्वपूर्ण है, खासकर उनके R-समूहों पर ध्यान दें जो प्रत्येक अमीनो अम्ल को अद्वितीय बनाते हैं।

 

Question 12. गोंद किससे बने होते हैं? क्या फेविकोल इससे भिन्न है?
Answer: गोंद (Gum) : यह एक द्वितीयक उपापचयज (secondary metabolite) है। यह एक कार्बोहाइड्रेट बहुलक (polymer) है। गोंद पौधों की काष्ठ वाहिकाओं (xylem vessels) से प्राप्त होने वाला उत्पाद है। यह कार्बनिक घोलक में अघुलनशील होता है। गोंद जल के साथ चिपचिपा घोल (sticky solution) बनाता है। फेविकोल (fevicol) एक कृत्रिम औद्योगिक उत्पाद है।
In simple words: गोंद पौधों से प्राप्त एक प्राकृतिक कार्बोहाइड्रेट बहुलक है जो पानी में चिपचिपा घोल बनाता है, जबकि फेविकोल एक कृत्रिम औद्योगिक चिपकने वाला पदार्थ है, इसलिए वे भिन्न हैं।

🎯 Exam Tip: प्राकृतिक और कृत्रिम पदार्थों के बीच के अंतर को समझना और गोंद जैसे प्राकृतिक बहुलकों के स्रोत और गुणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 13. प्रोटीन, वसा व तेल, ऐमीनो अम्लों का विश्लेषणात्मक परीक्षण बताइए एवं किसी भी फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण कीजिए?
Answer: प्रोटीन एवं ऐमीनो अम्ल का परीक्षण प्रोटीन के वृहत् अणु (macromolecules) ऐमीनो अम्लों की लम्बी श्रृंखलाएँ होते हैं। ऐमीनो अम्ल पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े रहते हैं। इनका आण्विक भार बहुत अधिक होता है। अण्डे की सफेदी, सोयाबीन, दालों (मटरे, राजमा आदि) में प्रोटीन (ऐमीनो अम्ल) प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। अण्डे की सफेदी या दालों (सेम, चना, मटरे, राजमा) आदि को जल के साथ पीसकर पतली लुगदी बना लेते हैं। इसे जल के साथ उबाल कर छान लेते हैं। निस्वंद द्रव में प्रोटीन (ऐमीनो अम्ल) होती है। प्रयोग 1 : एक परखनली में 3 मिली प्रोटीन नियंद लेकर, इसमें 1 मिली सान्द्र नाइट्रिक अम्ल (\(HNO_3\)) मिलाइए। सफेद अवक्षेप बनता है। परखनली को गर्म करने पर अवक्षेप घुल जाता है तथा विलयन का रंग पीला हो जाता है। अब इसे ठण्डा करके इसमें 10% सोडियम हाइड्रॉक्साइड (\(NaOH\)) विलयन मिलाते हैं। परखनली में विलयन का रंग पीले से नारंगी हो जाता है। प्रयोग 2 : एक परखनली में प्रोटीन नियंद की 1 मिली मात्रा लेकर इसमें लगभग 1 मिली मिलन अभिकर्मक (Millon's Reagent) मिलाने पर हल्के पीले रंग का अवक्षेप बनता है। इस अवक्षेप में 4-5 बूंदें सोडियम नाइट्रेट (\(NaNO_3\)) की मिलाकर विलयन को गर्म करने पर अवक्षेप का रंग लाल हो जाता है। वसा व तेल का परीक्षण ये जल में अविलेय और ईथर, पेट्रोल, क्लोरोफॉर्म आदि में घुलनशील (विलेय) होती हैं। साधारण ताप पर जब वसाएँ ठोस होती हैं तो वसा (चर्बी-fat) और जब ये तरल होती हैं तो तेल (oil) कहलाती हैं। पादप वसाएँ असंतृप्त (नारियल का तेल तथा ताड़ का तेल संतृप्त) तथा जन्तु वसाएँ संतृप्त होती हैं। प्रयोग 1 : मूंगफली के कच्चे दाने लेकर उनको सफेद कागज पर रखकर पीस लीजिए। अब इस कागज के टुकड़े को प्रकाश के किसी स्रोत की ओर रखकर देखिए। यह अल्पपारदर्शी नजर आता है। इस पर एक बूंद पानी डालकर देखिए। कागज पर पानी का प्रभाव नहीं होता। यह प्रयोग जन्तु वसा (देशी घी) के साथ भी किया जा सकता है। प्रयोग 2 : एक परखनली में 0-5 मिली परीक्षण तेल या वसा तथा 0-5 मिली जल (दोनों बराबर मात्रा में) लेते हैं। अब इसमें 2-3 बूंदें सुडान-III विलयन की डालकर हिलाते हैं तथा पाँच मिनट तक ऐसे ही रख देते हैं। परखनली में जल तथा तेल की पृथक् पर्तों में, तेल की पर्त लाल नजर आती है। (नोट-फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण उपर्युक्त विधियों द्वारा किया जा सकता है ।)
In simple words: प्रोटीन का परीक्षण नाइट्रिक अम्ल और मिलन अभिकर्मक से रंग परिवर्तन द्वारा होता है, जबकि वसा का परीक्षण सुडान-III विलयन और कागज पर ग्रीस स्पॉट टेस्ट से किया जाता है, जिससे जैविक नमूनों में उनकी उपस्थिति का पता चलता है।

🎯 Exam Tip: प्रोटीन और वसा के परीक्षणों में उपयोग होने वाले अभिकर्मकों और रंग परिवर्तनों को याद रखें, साथ ही विभिन्न जैविक नमूनों में इन परीक्षणों को कैसे लागू किया जाए, इस पर भी ध्यान दें।

 

Question 14. पता लगाइए कि जैवमण्डल में सभी पादपों द्वारा कितने सेलुलोस का निर्माण होता है? इसकी तुलना मनुष्यों द्वारा उत्पादित कागज से कीजिए। मानव द्वारा प्रतिवर्ष पादप पदार्थों की कितनी खपत की जाती है? इसमें वनस्पतियों की कितनी हानि होती है?
Answer: सेलुलोस (cellulose) पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पाए जाने वाला कार्बोहाइड्रेट है। यह जटिल बहुलक होता है। पादपों में सेलुलोस की मात्रा सर्वाधिक होती है। यह पादप कोशिकाओं की कोशिका भित्ति को यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। पौधों के काष्ठीय भागों व कपास तथा रेशेदार पौधों में इसकी मात्रा बहुत अधिक होती है। काष्ठ में लगभग 50% तथा कपास के रेशे में इसकी मात्रा लगभग 90% होती है। मनुष्य द्वारा सेलुलोस का उपयोग ईंधन तथा इमारती लकड़ी के रूप में, तन्तुओं के रूप में वस्त्र निर्माण, कृत्रिम रेशे निर्माण, कागज निर्माण में प्रमुखता से किया जाता है। नाइट्रोसेलुलोस का उपयोग विस्फोटक पदार्थ के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग पारदर्शी प्लास्टिक सेलुलॉयड, (celluloid) बनाने के लिए किया जाता है जिससे खिलौने, कंघे आदि बनाए जाते हैं। मनुष्य सेलुलोस का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनस्पतियों को हानि पहुँचा रहा है। इसके फलस्वरूप प्राकृतिक वन क्षेत्रों में निरन्तर कमी होती जा रही है। पारितन्त्र के प्रभावित होने के कारण अनेक पादप प्रजातियाँ विलुप्त होती जा रही हैं।
In simple words: सेलुलोस पृथ्वी पर सबसे प्रचुर कार्बोहाइड्रेट है, जो पौधों द्वारा भारी मात्रा में निर्मित होता है और मनुष्य द्वारा लकड़ी, वस्त्र और कागज जैसे विभिन्न उत्पादों के लिए बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है, जिससे वनों का अत्यधिक दोहन और पारिस्थितिक असंतुलन होता है।

🎯 Exam Tip: सेलुलोस के महत्व, उसके विभिन्न उपयोगों और मानवीय गतिविधियों के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को समझना, विशेष रूप से वनोन्मूलन और प्रजातियों के विलुप्तीकरण के संदर्भ में, महत्वपूर्ण है।

 

Question 15. एन्जाइम के महत्त्वपूर्ण गुणों का वर्णन कीजिए ।
Answer: एन्जाइमों के महत्त्वपूर्ण गुण निम्नवत् हैं- 1. विकर (enzymes), उत्प्रेरकों (catalyst) के रूप में कार्य करते हैं और जीवों (living organisms) में अभिक्रिया की दर (rate of reaction) को प्रभावित करते हैं। 2. क्रियाधारों (reactants or substrate) को उत्पादों (products) में बदलने के लिए एन्जाइम की बहुत सूक्ष्म मात्रा अथवा सान्द्रता की आवश्यकता होती है। 3. एन्जाइम उत्प्रेरक (enzyme catalyst) उच्च अणुभार के, जटिल, नाइट्रोजनी कार्बनिकः यौगिक, प्रोटीन होते हैं जो जीवित कोशिकाओं में उत्पन्न होते हैं। एन्जाइम का अणु उसके क्रियाधार के अणु की तुलना में बहुत बड़ा होता है। एन्जाइम का आणविक भार हजारों से लेकर लाखों तक होता है, जबकि क्रियाधारों का अणुभार प्रायः कुछ सैकड़ों में ही होता है। 4. ये किसी रासायनिक क्रिया को प्रारम्भ नहीं करते, बल्कि क्रिया की गति को उत्प्रेरित (catalysed) करते हैं। 5. अधिकांश एन्जाइम जल अथवा नमक के घोल में घुलनशील होते हैं। कोशिकाद्रव्य में ये कोलॉइडी (colloidal) विलयन बनाते हैं। 6. एन्जाइम जीवों में होने वाली समस्त शरीर-क्रियात्मक अभिक्रियाओं (physiological reactions), जैसे-जल-अपघटन, ऑक्सीकरण, अपचयन, अपघटन आदि को उत्प्रेरित करते हैं। 7. एन्जाइम प्रायः विशिष्ट (specific) होते हैं, अर्थात् एक एन्जाइम एक विशेष क्रिया का ही उत्प्रेरण करता है। उदाहरणार्थ-एन्जाइम इन्वटेंस (invertase) केवल सुक्रोस के जल-अपघटन को उत्प्रेरित करता है। इन्वटेंस एन्जाइम द्वारा माल्टोस का ग्लूकोस में जल-अपघटन उत्प्रेरित नहीं होता 8. एन्जाइम ताप परिवर्तन से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। किसी एन्जाइम की उत्प्रेरक सक्रियता जिस ताप पर सर्वाधिक होती है उसे अनुकूलन ताप (optimum temperature) कहते हैं। अनुकूलन ताप पर अभिक्रिया की दर उच्चतम होती है। अधिक ताप पर एन्जाइम की विकृति (denatured) हो जाती है अर्थात् एन्जाइम की प्रोटीन संरचना और उसकी उत्प्रेरक सक्रियता नष्ट हो जाती है। एन्जाइमों का अनुकूलन ताप साधारणतः 25-40°C होता है। बहुत कम ताप पर एन्जाइम निष्क्रिय (inactive) हो जाते हैं। 9. एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रियाओं की दर pH परिवर्तमं से बहुत प्रभावित होती है। प्रत्येक एन्जाइम एक विशेष pH माध्यम में ही पूर्ण सक्रिय होता है। प्रत्येक एन्जाइम की उत्प्रेरक सक्रियता जिस pH पर अधिकतम होती है उसे अनुकूलनःH (optimum pH) कहते हैं। एन्जाइमों की अनुकूलन pH साधारणतः 5-7 होती है। 10. कुछ एन्जाइम अम्लीय माध्यम में तथा कुछ क्षारीय माध्यम में क्रिया करते हैं। 11. कुछ एन्जाइम कोशिका के अन्दर सक्रिय होते हैं तथा कुछ एन्जाइम कोशिका के बाहर भी सक्रिय होते हैं।
In simple words: एन्जाइम जैविक उत्प्रेरक होते हैं जो रासायनिक अभिक्रियाओं की गति को बढ़ाते हैं, ये विशिष्ट होते हैं, प्रोटीन से बने होते हैं, और तापमान तथा pH के प्रति संवेदनशील होते हैं, तथा जीवों में विभिन्न शारीरिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।

🎯 Exam Tip: एन्जाइमों के प्रमुख गुणों जैसे उनकी उत्प्रेरक प्रकृति, विशिष्टता, प्रोटीन संरचना, और ताप व pH के प्रति संवेदनशीलता को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये उनकी कार्यप्रणाली के मूल आधार हैं।

 

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. एन्जाइम की रासायनिक प्रकृति (स्वभाव) है।
(क) वसा
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स
(ग) हाइड्रोकार्बन
(घ) प्रोटीन
Answer: (घ) प्रोटीन
In simple words: एन्जाइम मुख्य रूप से प्रोटीन से बने होते हैं, जो उनकी विशिष्ट संरचना और जैविक उत्प्रेरक गुणों के लिए जिम्मेदार होते हैं।

🎯 Exam Tip: यह एक मौलिक तथ्य है कि एन्जाइम प्रोटीन होते हैं; इस जानकारी को याद रखना जैव-रसायन विज्ञान के कई अन्य अवधारणाओं को समझने में मदद करेगा।

 

Question 2. उस विकर (एन्जाइम) का नाम लिखिए जो बेकरी उद्योग में प्रयुक्त होता है।
(क) फॉस्फेटेज
(ख) एमाइलेज
(ग) जाइमेज
(घ) फॉस्फोरिलेज
Answer: (ख) एमाइलेज
In simple words: एमाइलेज एन्जाइम बेकरी उद्योग में आटे में मौजूद स्टार्च को शर्करा में तोड़ने का काम करता है, जो खमीर के लिए भोजन प्रदान करता है और बेक्ड उत्पादों को उठने और स्वाद देने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न उद्योगों में प्रयुक्त होने वाले एन्जाइमों के नाम और उनके विशिष्ट कार्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उनके व्यावहारिक अनुप्रयोगों को दर्शाता है।

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. फॉस्फो-प्रोटीन्स के दो उदाहरण दीजिए।
Answer: फॉस्फो-प्रोटीन्स में फॉस्फोरस सम्मिलित होता है; जैसे-दुग्ध प्रोटीन-केसीन (castin), अण्डे की पीतक प्रोटीन-फॉस्फोवाइटिन (phosphovitin) आदि ।
In simple words: फॉस्फो-प्रोटीन वे प्रोटीन होते हैं जिनमें फॉस्फोरस होता है; इसके दो उदाहरण दूध में पाया जाने वाला केसीन और अंडे के पीले भाग में पाया जाने वाला फॉस्फोवाइटिन हैं।

🎯 Exam Tip: फॉस्फो-प्रोटीन के उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि ये विभिन्न जैविक कार्यों, जैसे पोषक तत्वों के भंडारण में भूमिका निभाते हैं।

 

Question 2. वसा अम्ल क्या है?
Answer: वसा अम्ल (fatty acids) लम्बी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला वाले कार्बोक्सिलिक अम्ल (carboxylic acids) हैं।
In simple words: वसा अम्ल लंबी कार्बन-हाइड्रोजन श्रृंखला वाले कार्बनिक अणु होते हैं जिनके एक सिरे पर कार्बोक्सिल समूह होता है।

🎯 Exam Tip: वसा अम्लों की रासायनिक संरचना, विशेषकर लंबी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला और कार्बोक्सिल समूह की उपस्थिति को समझना आवश्यक है, क्योंकि यह उनकी शारीरिक भूमिकाओं का आधार है।

 

Question 3. दो आवश्यक वसा अम्लों के नाम लिखिए।
Answer: जन्तुओं में वसीय अम्ल प्रायः संतृप्त होते हैं तथा पादपों में असंतृप्त । मनुष्य सहित सभी स्तनियों में लाइनोलीक (linoleic) तथा लाइनोलीनिक (linolenic) वसीय अम्ल शरीर की कोशिकाओं में संश्लेषित नहीं होते अतः ये दोनों केवल पादपों से प्राप्त होते हैं तथा आवश्यक (essential) वसीय अम्ल कहलाते हैं।
In simple words: लाइनोलीक अम्ल और लाइनोलीनिक अम्ल दो आवश्यक वसा अम्ल हैं जिन्हें मानव शरीर स्वयं नहीं बना सकता और इन्हें भोजन से प्राप्त करना होता है।

🎯 Exam Tip: आवश्यक वसा अम्लों के नामों को याद रखें और समझें कि उन्हें आवश्यक क्यों कहा जाता है, क्योंकि यह पोषण और स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा किस रूप में उपस्थित होती है?
Answer: स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा (milk sugar) एक डाइसैकेराइड (disaccharide) लैक्टोज (lactose) के रूप में पायी जाती है। यह हेटेरोडाइसैकेराइड (heterodisaccharide) होती है, क्योंकि इसका एक अणु ग्लूकोज एवं गैलेक्टोज के एक-एक अणु 3-1,4 से ग्लाइकोसिडिक बन्ध द्वारा जुड़ने से बनता है। यह पानी में कम घुलनशील तथा कम मीठी होती है।
In simple words: स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा लैक्टोज के रूप में पाई जाती है, जो ग्लूकोज और गैलेक्टोज से बनी एक डाइसैकेराइड है।

🎯 Exam Tip: लैक्टोज की संरचना को समझें, विशेषकर यह कि यह किन मोनोसैकेराइड इकाइयों (ग्लूकोज और गैलेक्टोज) से बना है और कैसे ग्लाइकोसिडिक बन्ध उन्हें जोड़ता है।

 

Question 5. प्रोटीन की संरचनात्मक इकाइयों को क्या कहते हैं? जन्तुओं में ये कितने प्रकार के होते हैं?
Answer: प्रोटीन की संरचनात्मक इकाइयों को अमीनो अम्ल (amino acids) कहते हैं। ये जन्तु शरीर में 20 होते हैं जिनमें से 10 अमीनो अम्ल आवश्यक कहे जाते हैं, क्योंकि इनका संश्लेषण शरीर नहीं कर सकता है। शेष अनावश्यक कहलाते हैं जिनका संश्लेषण जन्तु शरीर स्वयं कर लेता है।
In simple words: प्रोटीन की संरचनात्मक इकाइयां अमीनो अम्ल कहलाती हैं; जन्तु शरीर में 20 प्रकार के अमीनो अम्ल होते हैं, जिनमें से 10 आवश्यक होते हैं और भोजन से प्राप्त किए जाने चाहिए।

🎯 Exam Tip: आवश्यक और अनावश्यक अमीनो अम्लों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पोषण संबंधी आवश्यकताओं से जुड़ा है।

 

Question 6. उपापचयी निष्क्रिय पदार्थ किसे कहते हैं? पौधों में संचित पदार्थ कार्बोहाइड्रेट का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
Answer: उपापचयी क्रिया के फलस्वरूप प्राप्त उत्पादों के निष्क्रिय रहने की अवस्था को उपापचयी निष्क्रिय पदार्थ कहते हैं। पौधों में संचित पदार्थ मण्ड (कार्बोहाइड्रेट) होता है जो कि एक पॉलिसैकेराइड है। इसमें ग्लूकोज इकाइयों से बने दो प्रकार के होमोपॉलिसैकेराइड अणु होते हैं-10 से 30% तक ऐमाइलोस के तथा 70 से 90% का ऐमाइलोपेक्टिन के अणु। ऐमाइलोपेक्टिन के अणु शाखान्वित और संकेन्द्रीय रूप से कुण्डलित होते हैं। ऐमाइलोस और ऐमाइलोपेक्टिन के अणु प्रायः समूहों में एकत्रित होकर विभिन्न आकृतियों एवं माप के मण्ड कण बना लेते हैं।
In simple words: उपापचयी निष्क्रिय पदार्थ वे होते हैं जो चयापचय के अंत में निष्क्रिय रहते हैं, और पौधों में संचित कार्बोहाइड्रेट मण्ड (स्टार्च) होता है, जो ऐमाइलोस और ऐमाइलोपेक्टिन नामक ग्लूकोज बहुलकों से बना होता है।

🎯 Exam Tip: पौधों में स्टार्च की संरचना (ऐमाइलोस और ऐमाइलोपेक्टिन के घटकों सहित) और उनके भंडारण कार्य को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह ऊर्जा भंडारण का एक प्रमुख तरीका है।

 

Question 7. न्यूक्लियोसाइड्स तथा न्यूक्लियोटाइड्स में दो अन्तर बताइए ।
Answer:1. एक न्यूक्लियोटाइड न्यूक्लिक अम्ल की एक पूर्ण इकाई है, जबकि न्यूक्लियोसाइड में एक फॉस्फेट मूलक (\(PO_4\)) की कमी होती है। 2. स्वभाव में न्यूक्लियोसाइड्स क्षारकीय होते हैं जबकि न्यूक्लियोटाइड्स अम्लीय होते हैं।
In simple words: न्यूक्लियोटाइड में शर्करा, नाइट्रोजन क्षारक और फॉस्फेट समूह तीनों होते हैं, जबकि न्यूक्लियोसाइड में केवल शर्करा और नाइट्रोजन क्षारक होते हैं (फॉस्फेट समूह नहीं होता)।

🎯 Exam Tip: न्यूक्लियोसाइड और न्यूक्लियोटाइड के बीच मुख्य संरचनात्मक अंतर (फॉस्फेट समूह की उपस्थिति या अनुपस्थिति) को समझना और उनके अम्लीय/क्षारकीय गुणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. ATP तथा ADP के पूरे नाम लिखिए।
Answer:1. ATP = ऐडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट (adenosine triphosphate) 2. ADP = ऐडीनोसीन डाइफॉस्फेट (adenosine diphosphate)
In simple words: ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) और ADP (एडेनोसिन डाइफॉस्फेट) कोशिका में ऊर्जा के मुख्य वाहक हैं, जो एक फॉस्फेट समूह के अंतर से भिन्न होते हैं।

🎯 Exam Tip: ATP और ADP के पूर्ण नामों को याद रखना जीव विज्ञान के लिए आवश्यक है, क्योंकि ये कोशिका के ऊर्जा चयापचय के केंद्र में हैं।

 

Question 9. जीवधारियों में खनिजों के दो कार्य लिखिए। या जीवन के लिए आवश्यक दो महत्त्वपूर्ण खनिज तत्त्वों के नाम लिखिए तथा इनके महत्त्व बताइए ।
Answer:1. कई धात्विक खनिज अनेक एन्जाइम्स को क्रियाशील बनाते हैं अर्थात् सह-कारक (co-factor) का कार्य करते हैं; जैसे-लौह (Fe) एवं कॉपर (Cu)। 2. कुछ खनिज; जैसे-सोडियम, पोटैशियम तथा क्लोराइड्स आयन्स के रूप में कोशिका कला की पारगम्यता (permeability) तथा विद्युत विभव को प्रभावित करते हैं।
In simple words: खनिज जीवधारियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं; वे एंजाइमों के सह-कारक के रूप में कार्य करते हैं (जैसे लौह और कॉपर) और कोशिका झिल्ली की पारगम्यता तथा विद्युत विभव को नियंत्रित करते हैं (जैसे सोडियम, पोटैशियम और क्लोराइड)।

🎯 Exam Tip: शरीर में खनिजों के दो प्रमुख कार्यों (एंजाइम सक्रियण और झिल्ली कार्य) और उनके विशिष्ट उदाहरणों को याद रखें।

 

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. संदेश वाहक RNA पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ।
Answer: संदेशवाहक-RNA m-RNA, DNA के ऊपर निर्देशित सूचना का संदेशवाहक है। इसकी जीवन अवधि अल्प होती है। इसका संश्लेषण तीव्र गति से होता है। इसका अणुभार तथा लम्बाई सूचना संदेश के अनुसार कम या अधिक होती रहती है। m-RNA के विषय में सर्वप्रथम जानकारी ब्रेनर आदि (Brenner etal) ने 1961 ई० में दी। नीरेनबर्ग तथा मथाई (Nirenberg and Matthaei) ने 1961 ई० में प्रयोगशाला में कोशिका के बाहर प्रोटीन संश्लेषण में इसे दर्शाया। बेसीलस सबटिलिस (Bacillus subtilis) के m-RNA की अर्द्धआयु केवल 2-30 मिनट होती है। इसका अणुभार 50,000 से 2,00,000 डाल्टन तक हो सकता है। m-RNA सदैव एकरज्जुकी (single stranded) होता है। इसमें मिलने वाले क्षारक यूरेसिल, साइटोसीन, ग्वानीन तथा एडीनीन हैं। यह केन्द्रक में DNA से बनता है तथा प्रत्येक जीन अपना अलग m-RNA अनुलेखित (transcribe) करती है। जब m-RNA केवल एक जीन (सिस्ट्रोन) से बना होता है तब इसको मोनोसिस्ट्रोनिक अथवा मोनोजीनिक m-RNA (monocistronic or monogenic m-RNA) कहते हैं। यूकैरियोट का m-RNA मोनोसिस्ट्रोनिक होता है। जब एक m-RNA दो या अधिक जीन से बनते हैं तब उसे पॉलिसिस्ट्रोनिक अथवा पॉलिजीनिक m-RNA (polycistronic or polygenic m-RNA) कहते हैं। प्रोकैरियोट का m-RNA पॉलिसिस्ट्रोनिक होता है। एक मोनोसिस्ट्रोनिक m-RNA की संरचना के निम्नलिखित भाग हैं 1. कैप (Cap) : यूकैरियोट तथा कुछ विषाणुओं के m-RNA पर 5' अन्त (5'end) पर 7-मिथाइल ग्वानोसीन समूह मिलता है। यह कैप (cap) कहलाता है। इस कैप के द्वारा ही m-RNA राइबोसोम से जुड़ता है। प्रोटीन संश्लेषण की गति इसकी उपस्थिति से तीव्र हो जाती है। क्योंकि यदि m-RNA पर कैप न हो तो वह राइबोसोम के साथ ठीक से नहीं जुड़ पाता है तथा प्रोटीन संश्लेषण की गति अति धीमी हो जाती है। 2. नॉन कोडिंग क्षेत्र : (Non-coding Region )-कैप के पश्चात् 10 से 100 न्यूक्लिओटाइड होते हैं जो प्रोटीन संश्लेषण में भाग नहीं लेते हैं। इस क्षेत्र में 'A' तथा 'U' अधिक मात्रा में होते हैं। 3. इनीशिएसन कोडोन (Initiation Codon) : सभी प्रोकैरियोट तथा यूकैरियोट में प्रोटीन संश्लेषण की शुरुआत इनीशिएशन कोडोन AUG से होती है। 4. कोडिंग क्षेत्र (Coding Region) : यह AUG के पश्चात् उपस्थित क्षारक क्रमों का क्षेत्र है जो प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया में भाग लेता है। इसमें उपस्थित सभी न्यूक्लिओटाइड एक जीन के निर्देश को प्रोटीन में अनुवादित करते हैं। 5. टर्मिनेटिंग कोडोन (Terminating Codon) : ये क्षारक क्रम UAA, UAG या UGA से अंकित होते हैं। इन कोडोन के आते ही प्रोटीन बनने की श्रृंखला समाप्त हो जाती है। 6. पॉली 'A' क्रम (Poly 'A' Sequence) : m-RNA के छोर (end) पर एक लम्बी लगभग 200 न्यूक्लिओटाइड की श्रृंखला होती है जो Adenylic acid (poly'A' अर्थात् AAAAAA....A) क्रम में रहती है। यह m-RNA की पूँछ (tail) है। यह m-RNA के साइटोप्लाज्म तक पहुँचने से पूर्व केन्द्रक में जोड़ी जाती है।
In simple words: संदेशवाहक RNA (mRNA) एक एकल-रज्जुकी अणु है जो DNA से आनुवंशिक जानकारी को प्रोटीन संश्लेषण के लिए राइबोसोम तक ले जाता है; इसकी संरचना में कैप, नॉन-कोडिंग क्षेत्र, प्रारंभन और समापन कोडोन, कोडिंग क्षेत्र और पॉली-A पूँछ जैसे महत्वपूर्ण भाग होते हैं जो प्रोटीन निर्माण की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं।

🎯 Exam Tip: mRNA की संरचना के विभिन्न भागों (जैसे कैप, कोडोन, पॉली-A पूँछ) और प्रोटीन संश्लेषण में उनकी भूमिका को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह जीन अभिव्यक्ति का एक केंद्रीय तंत्र है।

 

Question 2. ए०टी०पी० की संरचना तथा कार्य लिखिए। या पादप कोशिका में ऊर्जा की मुद्रा क्या है? किन्हीं तीन ऊर्जा वाहकों का नाम लिखिए ।
Answer: ए०टी०पी० या ऐडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट सभी जीवित कोशिकाओं में ए०टी०पी० अणु महत्त्वपूर्ण संरचना वाले पदार्थ हैं। ये अपने अन्तिम दो फॉस्फेट समूहों के अन्तर्गत अत्यधिक ऊर्जा को इस प्रकार संचित रखते हैं कि आवश्यकतानुसार (कम ऊर्जा वाले स्थान या समय में) टूटकर इसको मुक्त कर देते हैं और इस ऊर्जा का उपयोग जीव अपने कार्यों के सम्पादन हेतु कर लेता है। इस प्रकार, ये ऊर्जा के सिक्के (energy coins) हैं, जो सभी प्रकार की उपापचयिक क्रियाओं में, फिर चाहे ये उपचयी (anabolic) हों अथवा अपचयी (catabolic), अपना स्थान रखते हैं ऊर्जा ग्रहण करते हैं अथवा ऊर्जा मुक्त करते हैं, अतः इन्हें उपापचयी (metabolic) जगत का सिक्का भी कहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र दर्शाता है कि कैसे ग्लूकोज के क्रमिक उपापचय (catabolism) से ATP का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में, ATP के फॉस्फेट समूहों में ऊर्जा बन्धीकरण होता है। जब इस ATP का जल अपघटन होता है, तो एक फॉस्फेट समूह (\(\text{PO}_4\)) मुक्त होता है और ADP (एडेनोसिन डाइफॉस्फेट) बनता है, जिससे कोशिका की विभिन्न गतिविधियों के लिए ऊर्जा मुक्त होती है। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि ATP कोशिका में ऊर्जा मुद्रा के रूप में कैसे कार्य करता है। किसी भी ऐसे स्थान पर, कोशिका में जहाँ ऊर्जा की कमी होती है, ATP का एक उच्च ऊर्जा बन्ध टूट जाता है और यह ADP (ऐडीनोसीन डाइफॉस्फेट) में बदल जाता है। इस प्रकार जो ऊर्जा प्राप्त होती है। वह सभी प्रकार की उपापचयी (metabolic) अभिक्रियाओं में प्रयुक्त होती है। विभिन्न प्रकार की ऑक्सीकारक क्रियाओं में (विशेषकर श्वसन में) ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही ऊर्जा ABP से ATP बनाने के लिए प्रयुक्त की जाती है। ऊर्जा वाहक (Energy carriers)-पादप कोशिका में ए०टी०पी० (ATP) के अतिरिक्त कई अन्य पदार्थ भी ऊर्जा वाहक का कार्य करते हैं; जैसे 1. ऐसीटिल को-एन्जाइम 'ए' (acetyl co-enzyme ('A') 2. ग्वानोसीन ट्राइफॉस्फेट (guanosine triphosphate = GTP) 3. निकोटिनेमाइड ऐडीनीन डाइन्यूक्लियोटाइड (nicotinamide adenine dinucleotide =NAD) इन ऊर्जा वाहकों का मुख्य मध्यस्थ यौगिक भी ए०टी०पी० ही होता है।
In simple words: ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) कोशिका की ऊर्जा मुद्रा है, जो अपने फॉस्फेट बन्धों में ऊर्जा संचित रखती है और विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के लिए ऊर्जा प्रदान करती है, तथा एसिटिल को-एन्जाइम 'ए', GTP और NAD जैसे अन्य अणु भी ऊर्जा वाहक के रूप में कार्य करते हैं।

🎯 Exam Tip: ATP की संरचना (विशेषकर फॉस्फेट बन्धों में ऊर्जा), उसके कार्य और कोशिका में ऊर्जा के अन्य वाहकों के नाम को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कोशिकीय ऊर्जा चयापचय का आधार है।

 

Question 3. एन्जाइम के कार्यों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: एन्जाइम्स वे रासायनिक पदार्थ हैं जो जीवों में होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं की गति को प्रेरित करते हैं। ये सामान्यतः अभिक्रिया में भाग नहीं लेते हैं। ये मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार के रासायनिक परिवर्तनों को प्रेरित करते हैं। 1. जल अपघटन (Hydrolysis) : जब पदार्थ के अणु जल के अणु ग्रहण करके अपेक्षाकृत छोटे अणुओं में विघटित हो जाते हैं, इस प्रकार की क्रियाओं को जल अपघटन कहते हैं; जैसे-प्रोटीन्स जल अपघटन द्वारा प्रोटिओजेज, पेप्टोन्स, पॉलिपेप्टाइड्स (proteoses, peptones, polypeptides) तथा अन्त में अमीनो अम्ल (amino acid) में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी प्रकार मण्ड, शर्करा आदि के मोनोसैकेराइड्स (monosaccharides) में परिवर्तन भी जल अपघटन क्रिया के ही उदाहरण हैं। जीवित कोशिकाओं में निर्जलीकरण (dehydration) की भी उतनी ही सम्भावनाएँ हैं जितनी कि जल अपघटन की होती हैं। इन्हें भी एन्जाइम्स ही प्रेरित करते हैं। 2. कार्बोक्सिलीकरण (Carboxylation) : इस प्रकार की क्रियाओं में COOH-समूह विलग होने से कार्बन डाइऑक्साइड (\(CO_2\)) का निर्माण होता है। पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid), डीकार्बोक्सीलेज (decarboxylase) एन्जाइम द्वारा ऐसीटैल्डिहाइड (acetaldehyde) तथा \(CO_2\) में विघटित हो जाता है। यद्यपि इस क्रिया में को-फैक्टर तथा को-एन्जाइम भी कार्य करते हैं और यह क्रिया अत्यधिक जटिल होती है। 3. ऑक्सीकरण व अवकरण (Oxidation and reduction) : उपापचय क्रिया के समय खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ऊर्जा उत्पन्न होती है। ग्लूकोज के एक ग्राम अणु से,0 व \(CO_2\), बनने में ऑक्सीकरण के फलस्वरूप 4-1 cal ऊर्जा उत्पन्न होती है। सदैव ही ऑक्सीकरण की क्रिया के अन्तर्गत एक पदार्थ का ऑक्सीजन क्षय अथवा हाइड्रोजन ग्रहण द्वारा अवकरण होता है। ऑक्सीजन क्षय द्वारा अवकृत पदार्थ ऑक्सीजन दाता (Oxygen donor) कहलाता है। तथा ऑक्सीकृत पदार्थ ग्राहक (acceptor) कहलाता है। इसी प्रकार हाइड्रोजन ग्रहण द्वारा अवकृत पदार्थ हाइड्रोजन ग्राहक (hydrogen acceptor) तथा अवकारक पदार्थ हाइड्रोजन दाता (hydrogen donor) कहलाते हैं।
In simple words: एन्जाइम विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं जैसे जल अपघटन (बड़े अणुओं को तोड़ना), कार्बोक्सिलीकरण (कार्बन डाइऑक्साइड जोड़ना/हटाना) और ऑक्सीकरण-अवकरण (इलेक्ट्रॉन/हाइड्रोजन का स्थानांतरण) को उत्प्रेरित करते हैं, जो जीवों में ऊर्जा उत्पादन और आणविक रूपांतरण के लिए महत्वपूर्ण हैं।

🎯 Exam Tip: एन्जाइमों द्वारा उत्प्रेरित की जाने वाली विभिन्न प्रकार की रासायनिक अभिक्रियाओं (जल अपघटन, कार्बोक्सिलीकरण, ऑक्सीकरण-अवकरण) के विशिष्ट उदाहरणों और उनके महत्व को याद रखें।

 

Question 4. विकर के प्रकार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
Answer: सन् 1961 में अन्तर्राष्ट्रीय जैव रसायनज्ञ संघ (IUB) ने विकर वर्गीकरण वे नामकरण की एक नवीन पद्धति का अनुसरण किया। इसके अनुसार विकर का नाम “स्वव्याख्या' (self explanatory) द्वारा सम्पन्न होता है। इस पद्धति के अनुसार विकरों का वर्गीकरण छः मुख्य वर्गों में किया गया है 1. ऑक्सीडोरिडक्टेजेज (Oxidoreductases) : इस वर्ग में ऑक्सीकरण-अपचयन (oxidation-reduction) की अभिक्रियाएँ उत्प्रेरित करने वाले विकर आते हैं। ये इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण (electron transport) को उत्प्रेरित करते हैं। उदाहरणार्थ
(i) सक्सिनिक अम्ल (Succinic acid) \(\xrightarrow{\text{सक्सिनेट डीहाइड्रोजिनेस (Succinate dehydrogenase)}}\) फ्यूमैरिक अम्ल (Fumaric acid) \(+\) \(\text{FADH}_2\)
(ii) Cytochrome-oxidase (साइटोक्रोम-ऑक्सीडेज) ऑक्सीजन का अपचयन करके cyt. a3 का ऑक्सीकरण करता है। 2. ट्रान्सफरेजेज (Transferases) : वे विकर जो एक क्रियाधार (substrate) से H के अतिरिक्त अन्य किसी भी समूह को दूसरे अणु में स्थानान्तरित कर देते हैं, ट्रान्सफरेज कहलाते हैं। स्थानान्तरित होने वाले समूह प्रायः अमीनो एसाइल, मिथाइल ग्लूकोसिल, फॉस्फेट, थायोल, कीटोन, फार्माइल आदि होते हैं; जैसे- डी-हेक्सोज-6-फॉस्फोट्रान्सफरेज (हेक्सोकाइनेज-hexokinase) ATP से एक फॉस्फेट अणु का स्थानान्तरण ग्लूकोस को कर देता है। 3. हाइड्रोलेजेज (Hydrolases) : वे विकर जो क्रियाधार (substrate) का जल अपघटन (hydrolysis) करते हैं, हाइड्रोलेज कहलाते हैं; जैसे-पाचक एन्जाइम, ग्लूटामीन हाइड्रोलेज (ग्लूटामिनेज- glutaminase) आदि । 4. लायेजेज (Lyases or Desmolases) : वे विकर जो जल अपघटन के अतिरिक्त किसी अन्य विधि से क्रियाधार (substrate) में से समूहों को हटाते या जोड़ते हैं, लायेजेज कहलाते हैं; जैसे 1. मैलेट-हाइड्रोलायेज (फ्यूमेरेज-fumerase) 2. डीकार्बोक्सीलेज (कार्बनिक एनहाइड्रेज-carbonic anhydrase) 3. कीटोज-1-फॉस्फेट ऐल्डिहाइड लायेज (ऐल्डोलेज-aldolase) आदि । 5. आइसोमेरेजेज (Isomerases) : ये विकर क्रियाधार (substrate) में समूहों की अन्तः अवस्था में परिवर्तन कर पुनर्व्यवस्था को उत्प्रेरित करते हैं अर्थात् किसी यौगिक के एक समावयवी (isomer) को दूसरे समावयवी में बदलते हैं। इन्हें आइसोमेरेज कहते हैं, जैसे 1. ट्रायोज आइसोमेरेज (triose isomerase) 2. फॉस्फोहेक्सोसआइसोमेरेज (phosphohexoseisomerase) 3. फॉस्फोग्लिसरोम्यूटेज (phosphoglyceromutase) आदि । 6. लाइगेजेज (Ligases) : ये विकर सिन्थेटेज (synthetase) के नाम से भी जाने जाते हैं। ये ATP से ऊर्जा प्राप्त कर यौगिकों को जोड़ने की अभिक्रिया को उत्प्रेरित करते हैं; जैसे 1. को-एन्जाइम ए लाइगेज (ऐसीटाइल को-एन्जाइम-ए सिन्थेटेज) 2. अमोनिया लाइगेज (ग्लूटामीन सिन्थेटेज) आदि ।।
In simple words: एन्जाइमों को छह मुख्य वर्गों में वर्गीकृत किया गया है: ऑक्सीडोरिडक्टेजेज (ऑक्सीकरण-अपचयन), ट्रान्सफरेजेज (समूह स्थानांतरण), हाइड्रोलेजेज (जल अपघटन), लायेजेज (समूह हटाना या जोड़ना), आइसोमेरेजेज (आइसोमेराइजेशन), और लाइगेजेज (जोड़ना), ये सभी विशिष्ट रासायनिक अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं।

🎯 Exam Tip: एन्जाइमों के छह प्रमुख वर्गों के नाम, उनके मुख्य कार्य और प्रत्येक वर्ग के कम से कम एक उदाहरण को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह एन्जाइम वर्गीकरण और कार्यप्रणाली की पूरी समझ प्रदान करता है।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. कार्बोहाइड्रेट्स के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए। मानव शरीर में कार्बोहाइड्रेट्स का क्या महत्त्व है? या कार्बोहाइड्रेट्स की प्रमुख श्रेणियों के नाम लिखिए। इन श्रेणियों में प्रमुख अन्तर क्या होते हैं? इन्हें सैकेराइड्स क्यों कहते हैं?
Answer: कार्बोहाइड्रेट्स तथा उनके प्रकार (संवर्ग) या श्रेणियाँ ये कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के यौगिक हैं तथा इनका सामान्य सूत्र \((CH_2O)_n\) होता है अर्थात् इनमें कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का अनुपात 1: 2 : 1 का होता है। कार्बोहाइड्रेट्स को सैकेराइड्स (saccharides) भी कहते हैं क्योंकि इनके छोटे अणु स्वाद में मीठे होते हैं। स्पष्टतः इनमें हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का अनुपात जेल के समान (\(H_2O\)) होता है। कुछ कार्बोहाइड्रेट्स में सल्फर, नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस तत्त्व भी होते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण सभी क्लोरोफिल युक्त जीवाणुओं, शैवालों, पौधों आदि के द्वारा किया जाता है। कार्बोहाइड्रेट्स के प्रमुखतः तीन प्रकार (संवर्ग) होते हैं
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र डी-ग्लूकोज अणु के दो संरचनात्मक रूपों को दर्शाता है: (A) चक्रीय संरचना और (B) रेखीय श्रृंखला संरचना। चक्रीय संरचना में, ग्लूकोज एक पायरानोस रिंग बनाता है जिसमें ऑक्सीजन परमाणु और पाँच कार्बन परमाणु होते हैं, जबकि रेखीय श्रृंखला में यह एक खुली एल्डोहेक्सोस श्रृंखला के रूप में मौजूद होता है।
(i) मोनोसैकेराइड्स (Monosaccharides) : ये सरलतम कार्बोहाइड्रेट्स हैं तथा सबसे छोटे होते हैं। इन्हें प्रायः सरल शर्कराएँ (simple sugars) कहते हैं तथा ये स्वाद में मीठे और जल में घुलनशील होते हैं। इनके बनने की इस क्रिया को बहुलीकरण (polymerization) कहते हैं। इनमें उपस्थित कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर इन्हें ट्राइओज (triose) जैसे ग्लिसरैल्डिहाइड (glyceraldehyde); टेट्रोज (tetrose) जैसे इरिथ्रोज (erythrose); पेण्टोज (pentose) जैसे राइबोज (ribose), डीऑक्सीराइबोज (deoxyribose) आदि; हेक्सोज (hexose) जैसे ग्लूकोज (\(C_6H_{12}O_6\)), फ्रक्टोज (fructose) आदि, हेप्टोज (heptose) जैसे हेप्टट्यू लोज (heptulose) आदि वर्गों में वर्गीकृत किया गया है।
(ii) ऑलिगोसैकेराइड्स (Oligosaccharides) : ऐसे कार्बोहाइड्रेट्स दो से दस तक मोनोसैकेराइड इकाइयों से मिलकर इनके बहुलक के रूप में होते हैं। इनके बनने की इस क्रिया को बहुलीकरण (polymerization) कहते हैं। बेहुलीकरण के लिए मोनोसैकेराइड्स ग्लाइकोसिडिक बन्ध (glycosidic bond) के द्वारा जुड़ते हैं। ये भी अधिकतर स्वाद में मीठे तथा जल में घुलनशील होते हैं। ये रेखीय श्रृंखला में होते हैं किन्तु जल में घुलने पर चक्रीय स्वरूप में आ जाते हैं। इसी अवस्था में इनका बहुलीकरण भी होता है। ग्लाइकोसिडिक बन्ध बनाने में एक मोनोसैकेराइड का ऐल्डिहाइड या कीटोन (aldehyde or ketone) समूह दूसरे मोनोसैकेराइड के हाइड्रोक्सिल (ऐल्कोहॉलीय) समूह से जुड़ता है तथा जल का एक अणु बनाता है। सामान्यतः ऑलिगोसैकेराइड्स डाइसैकेराइड्स (disaccharides) ही पाये जाते हैं। इनमें दो मोनोसैकेराइड्स होते हैं। अधिक मोनोसैकेराइड्स वाले ऑलिगोसैकेराइड्स अन्य कार्बनिक यौगिकों जैसे-प्रोटीन्स, लिपिंड्स के साथ मिलकर ग्लाइकोप्रोटीन्स, ग्लाइकोलिपिड्स आदि बनाते हैं। जन्तुओं में ये प्रायः कोशिका कला (plasma membrane) का बाह्य आवरण बनाते हैं। डाइसैकेराइड प्रमुखतः माल्टोज (maltose), सुक्रोज (sucrose) आदि होते हैं।
(iii) पॉलिसैकेराइड्स (Polysaccharides) : इन्हें ग्लाइकन्स (glycans) भी कहते हैं। ये सामान्यतः संगृहीत खाद्य के रूप में जीवद्रव्य में पाये जाते हैं। इनके निर्माण में दस से अधिक (कभी-कभी काफी जैसे सैकड़ों, हजारों) मोनोसैकेराइड इकाइयाँ (शाखित या अशाखित रेखीय श्रृंखला में) आपस में सम्बन्धित होती हैं; जैसे-मण्ड (starch), सेल्यूलोज (cellulose), ग्लाइकोजन (glycogen) आदि । इनका अणुभार (molecular weight) लाखों में होता है। कार्बोहाइड्रेट्स का मानव शरीर में महत्त्व मानव शरीर में कार्बोहाइड्रेट्स का महत्त्व इस प्रकार है 1. ये श्वसन आधार (respiratory substrate) होते हैं। इन्हीं से ऊर्जा (energy) उत्पन्न की जाती है, इसीलिए इन्हें 'जीव का ईंधन' कहते हैं अर्थात् ये शरीर के लिए ऊर्जा के प्रमुख स्रोत है 2. अन्य कार्बनिक अथवा अकार्बनिक अणुओं या मूलकों से मिलकर ये अनेक महत्त्वपूर्ण पदार्थ बनाते हैं; जैसे-पेण्टोज शर्कराएँ न्यूक्लिक अम्लों के अणुओं का अनिवार्य भाग होती हैं। ये ATP के संश्लेषण में भी सहायक होते हैं। 3. इनका महत्त्व खाद्य संचय के लिए अत्यधिक है; जैसे शरीर में ये ग्लाइकोजन (glycogen) के रूप में संचित रहते हैं। 4. ये रुधिर का थक्का जमने (clotting) से रोकने में सहायक होते हैं; जैसे-हीपैरिन (heparin)। 5. शर्करा के कुछ अणु अस्थि सन्धियों पर स्नेहक (चिकनाई) का कार्य करते हैं। 6. कोशिका कला की बाहरी सतह पर ग्लाइकोप्रोटीन्स तथा ग्लाइकोलिपिड्स के रूप में संयुक्त कार्बोहाइड्रेट्स की उपस्थिति कलाओं की पहचान बनाती है और ग्राही का कार्य करती है। 7. लारे, म्यूकस, रुधिर समूह के एण्टीजेन्स में भी शर्करा के अणु उपस्थित होते हैं।
In simple words: कार्बोहाइड्रेट्स कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बने जैविक अणु होते हैं जिन्हें सैकेराइड्स भी कहते हैं, जो मोनोसैकेराइड्स (सरल शर्कराएँ), ऑलिगोसैकेराइड्स (कुछ शर्करा इकाइयों से बने) और पॉलिसैकेराइड्स (कई शर्करा इकाइयों से बने जटिल बहुलक) में वर्गीकृत होते हैं; ये मानव शरीर के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत, संरचनात्मक घटक और कई जैविक प्रक्रियाओं में सहायक होते हैं।

🎯 Exam Tip: कार्बोहाइड्रेट्स के वर्गीकरण (मोनोसैकेराइड, ऑलिगोसैकेराइड, पॉलिसैकेराइड) को उनके संरचनात्मक अंतर और प्रमुख उदाहरणों के साथ याद रखें, साथ ही मानव शरीर में उनके विभिन्न कार्यों पर विशेष ध्यान दें।

 

Question 2. एन्जाइम की क्रिया-विधि का वर्णन कीजिए । विभिन्न प्रकार के कारकों को एन्जाइम की क्रिया-विधि पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए। या विकर की संरचना का वर्णन कीजिए तथा इसकी उत्प्रेरित अभिक्रियाओं को प्रभावित करने वाले किन्हीं दो कारकों का वर्णन संक्षेप में कीजिए ।
Answer: एन्जाइम्स एन्जाइम्स (enzyme, Gr, en = in; zyme = yeast) विशेष प्रकार के कार्बनिक उत्प्रेरक (organic catalysts) हैं जो जीवों में रासायनिक प्रक्रियाओं के उत्प्रेरण के लिए उत्तरदायी होते हैं। जीवतन्त्र में एन्जाइम्स की उपस्थिति का ज्ञान बहुत पुराना है। यद्यपि एन्जाइम (enzyme) नाम तब पड़ा, जब कुहने (Kuhne, 1878) ने यीस्ट (yeast) में पाये जाने वाले खमीर को इस नाम से पुकारा । प्रायः सभी एन्जाइम्स प्रोटीन (protein) के बने होते हैं। इनकी संरचना जटिल तथा अणुभार भी बहुत अधिक होता है। जीव तन्त्र के बाहर अर्थात् प्रयोगशाला में इनका संश्लेषण अभी सम्भव नहीं है। वैज्ञानिकों ने कई एन्जाइम्स (enzymes) को कोशिकाओं से निकालकर उनके रवे (crystals) प्राप्त किये हैं। अनेक एन्जाइम; जैसे- पेप्सिन (pepsin) में शुद्ध प्रोटीन के साथ अन्य पदार्थ जुड़े रहते हैं। अनेक एन्जाइम में प्रोटीन के साथ किसी धातु; जैसे-लोहा (Fe), जस्ता (Zn), ताँबा (Cu) आदि के अंश सम्बद्ध होते हैं, जैसे-साइटोक्रोम्स (cytochromes) में लोहा होता है आदि । एज़ाइम के प्रोटीन तथा नॉन-प्रोटीन भाग क्रमशः एपोएन्जाइम (apoenzyme) तथा प्रोस्थेटिक ग्रुप (prosthetic group) कहलाते हैं तथा सम्पूर्ण एन्जाइम को होलोएन्जाइम (holoenzyme) कहते हैं। कुछ एन्जाइम्स की सक्रियता उनसे लगे हुए आयनों (ions) पर निर्भर करती है। ऐसे आयनों को डायलिसिस (dialysis) द्वारा विलग किया जा सकता है। इस प्रकार के आयन सक्रिय कारक होते हैं। एन्जाइम्स की क्रिया-विधि वास्तव में, एन्जाइम जिस क्रिया के प्रति अपनी सक्रियता प्रदर्शित करते हैं, वे अपने-आप भी होती हैं। किन्तु अत्यधिक धीमी गति से । एन्जाइम कैसे कार्य करता है? इस बारे में समय-समय पर अनेक विचारधाराएँ प्रस्तुत की गई हैं, जैसे. हेनरी (Henry, 1903) ने बताया कि एन्जाइम अपने क्रियाधार या सब्सट्रेट (substrate) से मिलकर एक यौगिक बना लेते हैं। बाद में, इस सिद्धान्त को एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स (enzyme-substrate complex) परिकल्पना कहा गया। इसके अनुसार, एन्जाइम के बाह्य तल पर विशेष प्रकार की संरचनाएँ होती हैं जिनको टेम्प्लैट (template) कहते हैं। इन्हीं में आधारीय पदार्थों के अणु हँस जाते हैं। इन अणुओं की संरचना टेम्प्लैट के अनुसार होती है। इस प्रकार बनने वाले विशिष्ट घनिष्ठ साहचर्य की स्थापना के विषय में निम्नलिखित दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये हैं 1. ताला-कुँजी सिद्धान्त इस विचारधारा को वैज्ञानिक एमिल फिशर (Emil Fisher, 1894) ने दिया। इसके अनुसार, एन्जाइम क्रियाधार (substrate) के साथ क्रिया कर एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स (enzyme-substrate complex) नामक अत्यधिक सक्रिय अस्थाई यौगिक बनाता है। इस कॉम्प्लेक्स से अन्त में एन्जाइम अलग हो जाता है तथा क्रियाधार से नया पदार्थ बनता है।
\[\text{ENZYME + SUBSTRATE MOLECULE} \xrightarrow{\text{REACTION-A decomposition}} \text{ENZYME-SUBSTRATE COMPLEX} \xrightarrow{\text{activation of substrate}} \text{ENZYME + NEW COMPOUND}\]
\[\text{ENZYME + NEW COMPOUND} \xrightarrow{\text{ENZYME-SUBSTRATE COMPLEX}} \xrightarrow{\text{synthesis) REACTION-B}} \text{ENZYME + SUBSTRATE MOLECULE}\]
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एन्जाइम की क्रिया-विधि के दो प्रमुख सिद्धान्तों - ताला-कुँजी सिद्धान्त (A) और प्रेरित आसंजन सिद्धान्त (B) - के आधार पर एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स के निर्माण की तुलना करता है। ताला-कुँजी सिद्धान्त में, एन्जाइम का सक्रिय स्थल क्रियाधार के लिए एक निश्चित और पूरक आकार होता है। प्रेरित आसंजन सिद्धान्त में, क्रियाधार के जुड़ने पर एन्जाइम का सक्रिय स्थल आकार बदलता है ताकि वह क्रियाधार को बेहतर ढंग से फिट कर सके, जिससे एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स बनता है और उत्पाद मुक्त होते हैं।
2. प्रेरित आसंजन सिद्धान्त कॉशलेण्ड (Koshland, 1960) द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त में ये माना गया है कि एन्जाइम का सक्रिय स्थल (active site) स्थिर संरचना का न होकर परिवर्तन योग्य होता है। एक विशेष प्रकार का क्रियाधार (substrate) एक विशेष एन्जाइम के सक्रिय स्थल में परिवर्तन प्रेरित करने में सक्षम होता है अर्थात् प्रारम्भ में सब्सट्रेट की रचना तथा सक्रिय स्थल की रचना अनुपूरक (complementary) नहीं होती, किन्तु सक्रिय स्थल में परिवर्तन प्रेरित कर यह क्रियाधार इसे अपने अनुपूरक बना लेता है और एन्जाइम के साथ संयुक्त हो जाता है। इसके बाद की क्रियाओं में सक्रिय स्थल क्रियाधार के बॉण्ड्स (bonds) को विच्छेदित कर उत्पादक पदार्थों को मुक्त कर देता है। एन्जाइम की सक्रियता को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित कारक एन्जाइम की क्रियाशीलता को प्रभावित करते हैं 1. ताप (Temperature) : एन्जाइम को जिस स्थान पर कार्य करना है, वहाँ का ताप; सामान्यतः 35° से 45°C होना चाहिये । इससे अधिक या कम ताप पर एन्जाइम की क्रियाशीलता कम हो जाती है। 60°-65°C ताप तथा इससे अधिक ताप पहुँचने पर एन्जाइम प्रायः नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार, कम ताप पर भी इनकी क्रियाशीलता घटती है और 0°C पर पहुँचने पर ये प्रायः निष्क्रिय होकर परिरक्षित (preserve) हो जाते हैं। 2. pH का मान (Value of pH) : कुछ एन्जाइम्स अम्लीय माध्यम में तथा अन्य क्षारीय माध्यम में क्रियाशील होते हैं, इसके विपरीत ये कार्य नहीं करेंगे । वास्तव में, प्रत्येक एन्जाइम एक विशेष pH माध्यम में ही उच्चतम क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। pH मान कम या अधिक होने पर एन्जाइम की सक्रियता कम हो जाती है। pH परिवर्तन से अभिक्रिया की दिशा भी बदल सकती है। pH परिवर्तन से एन्जाइम, क्रियाधार, सक्रियकारक व संदमकों की घुलनशीलता तथा आयनीकरण प्रभावित होते हैं। एन्जाइमों पर अम्लीय अथवा क्षारीय आयनों युक्त अनेक पाश्र्व श्रृंखलाएँ पायी जाती हैं । pH परिवर्तनों से इन पार्श्व श्रृंखलाओं में परिवर्तन होने से आयनीकरण प्रभावित होता है। 3. आर्द्रता (Humidity) : 10-25% आर्द्रता पर एन्जाइम सक्रियता समाप्त हो जाती है। अनुकूलतम बिन्दु तक आर्द्रता बढ़ाने पर एन्जाइम की सक्रियता बढ़ती है। 4. अन्तिम उत्पादों की सान्द्रता (Concentration of end products) : अन्तिम उत्पादों के संचयन (accumulation) से एन्जाइम की सक्रियता कम हो जाती है। उत्पाद संचयन से अभिक्रिया का विपरीत दिशा में तीव्र होना, एन्जाइम की सतह पर संचयन से एन्जाइम का निष्क्रिय होना अथवा उत्पादों द्वारा pH प्रभावित होना आदि पाया जाता है। कभी-कभी उत्पाद सक्रिय स्थल पर जुड़कर उसे अवरुद्ध कर देता है। इस घटना को पुनर्निवेशित संदमन (feedback inhibition) कहते हैं। 5. सक्रियकारक (Activators) : अनेक अकार्बनिक आयन अथवा परमाणु सूक्ष्म मात्रा में रहकर एन्जाइमों की सक्रियता बढ़ा देते हैं; जैसे-\(\text{K}^+\), \(\text{Mg}^{++}\), \(\text{Mn}^{++}\), \(\text{CI}^-\) आदि । सक्रियकारक क्रियाधार व एन्जाइम के जुड़ने में सहायक होते हैं। 6. प्रोटीनविष (Protein poisons) : भारी धातु (\(\text{Hg}^{++}\), \(\text{Ag}^{++}\), \(\text{Pb}^{++}\) आदि)-\(\text{COOH}\) अथवा \(\text{-SH}\) से जुड़ जाते हैं। ऑक्सीकारक (oxidants) \(\text{S-S}\) बन्ध बनाकर एन्जाइम की संरचना में परिवर्तन कर देते हैं। साइनाइड्स (cyanides), कार्बन मोनोऑक्साइड (carbon monoxide), फ्लोराइड्स (fluorides) आदि सक्रियकारक के साथ जुड़कर सम्मिश्र बनाते हैं। ये सब अप्रतियोगी संदमक (non-competitive inhibitors) कहलाते हैं। 7. क्रियाधार आकृतिक अनुरूप पदार्थ (Substrate analogues) : क्रियाधार आकृतिक अनुरूप पदार्थ एन्जाइम के सक्रिय स्थल के लिये होड़ करते हैं। इनकी उपस्थिति से एन्जाइम सक्रियता में कमी होती है। इन पदार्थों को प्रतियोगी संदमक (competitive inhibitors) कहते हैं। इस संदमन को क्रियाधार की सान्द्रता बढ़ाने से दूर किया जा सकता है। 8. विकिरण (Radiant rays) : उच्च ऊर्जा किरणों (X-rays, gamma rays, ultraviolet rays) आदि से विभिन्न बन्ध टूटकर (\(\text{-SH}\)) नये बन्ध (\(\text{S-S}\)) बनते हैं जिससे एन्जाइम सक्रियता कम हो जाती है। 9. क्रियाधार की सान्द्रता (Substrate concentration) : यदि एन्जाइम की मात्रा अधिक हो तो क्रियाधार की सान्द्रता बढ़ाने से अभिक्रिया की दर में वृद्धि होती है। 10. एन्जाइम की सान्द्रता (Enzyme concentration) : यदि क्रियाधार की सान्द्रता अधिक हो तो एन्जाइम की सान्द्रता बढ़ाने से अभिक्रिया की दर में वृद्धि होती है। एन्जाइम के द्वारा सम्पादित प्रतिक्रियाएँ प्रतिवर्ती (reversible) होती हैं। अतः संश्लेषणात्मक (synthetic) प्रतिक्रिया होगी या विखण्डनात्मक (decompositional), इसका निर्णय अन्य दशाओं पर निर्भर होगा, न कि एन्जाइम पर। सामान्यतः किसी भी ऐसी प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पादित (produced) पदार्थ को अन्य प्रक्रियाओं के द्वारा हटाया जाते रहना चाहिये । इसलिये एन्जाइम प्रक्रियाएँ सामूहिक एवं शृंखलाबद्ध (serial) होती हैं, क्योंकि प्रत्येक क्रिया में बना हुआ उत्पाद (product) अगली प्रतिक्रिया के लिये आधारीय पदार्थ (substrate) का कार्य करता है।
In simple words: एन्जाइम जैविक उत्प्रेरक हैं जो विशिष्ट क्रियाधारों पर कार्य करते हैं, उनके कार्य को ताला-कुँजी या प्रेरित आसंजन मॉडल द्वारा समझाया जा सकता है, और उनकी गतिविधि तापमान, pH, सक्रियकारक, संदमक और क्रियाधार/एंजाइम सांद्रता जैसे कारकों से प्रभावित होती है।

🎯 Exam Tip: एन्जाइम क्रिया-विधि के ताला-कुँजी और प्रेरित आसंजन सिद्धान्तों, साथ ही एन्जाइम गतिविधि को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों (तापमान, pH, संदमक, क्रियाधार की सान्द्रता) को समझना और उनके प्रभाव को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. एन्जाइम की क्रिया-विधि का वर्णन कीजिए । विभिन्न प्रकार के कारकों को एन्जाइम की क्रिया-विधि पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए। या विकर की संरचना का वर्णन कीजिए तथा इसकी उत्प्रेरित अभिक्रियाओं को प्रभावित करने वाले किन्हीं दो कारकों का वर्णन संक्षेप में कीजिए ।
Answer:
एन्जाइम्स
एन्जाइम्स (enzyme, Gr, en = in; zyme = yeast) विशेष प्रकार के कार्बनिक उत्प्रेरक (organic catalysts) हैं जो जीवों में रासायनिक प्रक्रियाओं के उत्प्रेरण के लिए उत्तरदायी होते हैं। जीवतन्त्र में एन्जाइम्स की उपस्थिति का ज्ञान बहुत पुराना है। यद्यपि एन्जाइम (enzyme) नाम तब पड़ा, जब कुहने (Kuhne, 1878) ने यीस्ट (yeast) में पाये जाने वाले खमीर को इस नाम से पुकारा । प्रायः सभी एन्जाइम्स प्रोटीन (protein) के बने होते हैं। इनकी संरचना जटिल तथा अणुभार भी बहुत अधिक होता है। जीव तन्त्र के बाहर अर्थात् प्रयोगशाला में इनका संश्लेषण अभी सम्भव नहीं है। वैज्ञानिकों ने कई एन्जाइम्स (enzymes) को कोशिकाओं से निकालकर उनके रवे (crystals) प्राप्त किये हैं। अनेक एन्जाइम- जैसे- पेप्सिन (pepsin) में शुद्ध प्रोटीन के साथ अन्य पदार्थ जुड़े रहते हैं। अनेक एन्जाइम में प्रोटीन के साथ किसी धातु- जैसे-लोहा (Fe), जस्ता (Zn), ताँबा (Cu) आदि के अंश सम्बद्ध होते हैं- जैसे-साइटोक्रोम्स (cytochromes) में लोहा होता है आदि । एज़ाइम के प्रोटीन तथा नॉन-प्रोटीन भाग क्रमशः एपोएन्जाइम (apoenzyme) तथा प्रोस्थेटिक ग्रुप (prosthetic group) कहलाते हैं तथा सम्पूर्ण एन्जाइम को होलोएन्जाइम (holoenzyme) कहते हैं। कुछ एन्जाइम्स की सक्रियता उनसे लगे हुए आयनों (ions) पर निर्भर करती है। ऐसे आयनों को डायलिसिस (dialysis) द्वारा विलग किया जा सकता है। इस प्रकार के आयन सक्रिय कारक होते हैं।
एन्जाइम्स की क्रिया-विधि
वास्तव में, एन्जाइम जिस क्रिया के प्रति अपनी सक्रियता प्रदर्शित करते हैं, वे अपने-आप भी होती हैं। किन्तु अत्यधिक धीमी गति से । एन्जाइम कैसे कार्य करता है? इस बारे में समय-समय पर अनेक विचारधाराएँ प्रस्तुत की गई हैं, जैसे. हेनरी (Henry, 1903) ने बताया कि एन्जाइम अपने क्रियाधार या सब्सट्रेट (substrate) से मिलकर एक यौगिक बना लेते हैं। बाद में, इस सिद्धान्त को एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स (enzyme-substrate complex) परिकल्पना कहा गया। इसके अनुसार, एन्जाइम के बाह्य तल पर विशेष प्रकार की संरचनाएँ होती हैं जिनको टेम्प्लैट (template) कहते हैं। इन्हीं में आधारीय पदार्थों के अणु हँस जाते हैं। इन अणुओं की संरचना टेम्प्लैट के अनुसार होती है। इस प्रकार बनने वाले विशिष्ट घनिष्ठ साहचर्य की स्थापना के विषय में निम्नलिखित दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये हैं
1. ताला-कुँजी सिद्धान्त
इस विचारधारा को वैज्ञानिक एमिल फिशर (Emil Fisher, 1894) ने दिया। इसके अनुसार, एन्जाइम क्रियाधार (substrate) के साथ क्रिया कर एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स (enzyme-substrate complex) नामक अत्यधिक सक्रिय अस्थाई यौगिक बनाता है। इस कॉम्प्लेक्स से अन्त में एन्जाइम अलग हो जाता है तथा क्रियाधार से नया पदार्थ बनता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ताला-कुँजी सिद्धान्त के आधार पर एन्जाइम की क्रिया-विधि को दर्शाता है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे एक विशिष्ट एन्जाइम (कुंजी) एक विशिष्ट क्रियाधार (ताला) के साथ जुड़कर एन्जाइम-क्रियाधार कॉम्प्लेक्स बनाता है, और फिर उत्पाद में परिवर्तित होकर एन्जाइम को मुक्त कर देता है। यह प्रक्रिया दो चरणों (A और B) में विघटन और संश्लेषण की क्रिया को दर्शाती है।
चरण A-substrate + enzyme → enzyme-substrate complex.
चरण B-enzyme-substrate complex → enzyme + product.
2. प्रेरित आसंजन सिद्धान्त
कॉशलेण्ड (Koshland, 1960) द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त में ये माना गया है कि एन्जाइम का सक्रिय स्थल (active site) स्थिर संरचना का न होकर परिवर्तन योग्य होता है। एक विशेष प्रकार का क्रियाधार (substrate) एक विशेष एन्जाइम के सक्रिय स्थल में परिवर्तन प्रेरित करने में सक्षम होता
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ताला-कुँजी सिद्धान्त (A) और प्रेरित आसंजन सिद्धान्त (B) के आधार पर एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स के निर्माण की तुलना करता है। ताला-कुँजी सिद्धान्त में एन्जाइम का सक्रिय स्थल और क्रियाधार पूरी तरह से पूरक होते हैं, जबकि प्रेरित आसंजन सिद्धान्त में क्रियाधार के जुड़ने पर एन्जाइम का सक्रिय स्थल अपनी संरचना में परिवर्तन करके क्रियाधार के अनुरूप हो जाता है। है अर्थात् प्रारम्भ में सब्सट्रेट की रचना तथा सक्रिय स्थल की रचना अनुपूरक (complementary) नहीं होती, किन्तु सक्रिय स्थल में परिवर्तन प्रेरित कर यह क्रियाधार इसे अपने अनुपूरक बना लेता है और एन्जाइम के साथ संयुक्त हो जाता है। इसके बाद की क्रियाओं में सक्रिय स्थल क्रियाधार के बॉण्ड्स (bonds) को विच्छेद कर उत्पादक पदार्थों को मुक्त कर देता है।
एन्जाइम की सक्रियता को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित कारक

एन्जाइम की क्रियाशीलता को प्रभावित करते हैं
1. ताप (Temperature) : एन्जाइम को जिस स्थान पर कार्य करना है, वहाँ का ताप; सामान्यतः 35° से 45°C होना चाहिये । इससे अधिक या कम ताप पर एन्जाइम की क्रियाशीलता कम हो जाती है। 60°-65°C ताप तथा इससे अधिक ताप पहुँचने पर एन्जाइम प्रायः नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार, कम ताप पर भी इनकी क्रियाशीलता घटती है और 0°C पर पहुँचने पर ये प्रायः निष्क्रिय होकर परिरक्षित (preserve) हो जाते हैं।
2. pH का मान (Value of pH) : कुछ एन्जाइम्स अम्लीय माध्यम में तथा अन्य क्षारीय माध्यम में क्रियाशील होते हैं, इसके विपरीत ये कार्य नहीं करेंगे । वास्तव में, प्रत्येक एन्जाइम एक विशेष pH माध्यम में ही उच्चतम क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। pH मान कम या अधिक होने पर एन्जाइम की सक्रियता कम हो जाती है। pH परिवर्तन से अभिक्रिया की दिशा भी बदल सकती है। pH परिवर्तन से एन्जाइम, क्रियाधार, सक्रियकारक व संदमकों की घुलनशीलता तथा आयनीकरण प्रभावित होते हैं। एन्जाइमों पर अम्लीय अथवा क्षारीय आयनों युक्त अनेक पाश्र्व श्रृंखलाएँ पायी जाती हैं । pH परिवर्तनों से इन पार्श्व श्रृंखलाओं में परिवर्तन होने से आयनीकरण प्रभावित होता है।
3. आर्द्रता (Humidity) : 10-25% आर्द्रता पर एन्जाइम सक्रियता समाप्त हो जाती है। अनुकूलतम बिन्दु तक आर्द्रता बढ़ाने पर एन्जाइम की सक्रियता बढ़ती है।
4. अन्तिम उत्पादों की सान्द्रता (Concentration of end products) : अन्तिम उत्पादों के संचयन (accumulation) से एन्जाइम की सक्रियता कम हो जाती है। उत्पाद संचयन से अभिक्रिया का विपरीत दिशा में तीव्र होना, एन्जाइम की सतह पर संचयन से एन्जाइम का निष्क्रिय होना अथवा उत्पादों द्वारा pH प्रभावित होना आदि पाया जाता है। कभी-कभी उत्पाद सक्रिय स्थल पर जुड़कर उसे अवरुद्ध कर देता है। इस घटना को पुनर्निवेशित संदमन feedback inhibition) कहते हैं।
5. सक्रियकारक (Activators) : अनेक अकार्बनिक आयन अथवा परमाणु सूक्ष्म मात्रा में रहकर एन्जाइमों की सक्रियता बढ़ा देते हैं; जैसे-\(K^+\), \(Mg^{++}\), \(Mn^{++}\), \(Cl^-\) आदि । सक्रियकारक क्रियाधार व एन्जाइम के जुड़ने में सहायक होते हैं।
6. प्रोटीनविष (Protein poisons) : भारी धातु (\(Hg^{++}\), \(Ag^{++}\), \(Pb^{++}\) आदि)-COOH अथवा -SH से जुड़ जाते हैं। ऑक्सीकारक (oxidants) S-S बन्ध बनाकर एन्जाइम की संरचना में परिवर्तन कर देते हैं। साइनाइड्स (cyanides), कार्बन मोनोऑक्साइड (carbon monoxide), फ्लोराइड्स (fluorides) आदि सक्रियकारक के साथ जुड़कर सम्मिश्र बनाते हैं। ये सब अप्रतियोगी संदमक (non-competitive inhibitors) कहलाते हैं।
7. क्रियाधार आकृतिक अनुरूप पदार्थ (Substrate analogues) : क्रियाधार आकृतिक अनुरूप पदार्थ एन्जाइम के सक्रिय स्थल के लिये होड़ करते हैं। इनकी उपस्थिति से एन्जाइम सक्रियता में कमी होती है। इन पदार्थों को प्रतियोगी संदमक (competitive inhibitors) कहते हैं। इस संदमन को क्रियाधार की सान्द्रता बढ़ाने से दूर किया जा सकता है।
8. विकिरण (Radiant rays) : उच्च ऊर्जा किरणों (X-rays, gamma rays, ultraviolet rays) आदि से विभिन्न बन्ध टूटकर (-SH) नये बन्ध (S-S) बनते हैं जिससे एन्जाइम सक्रियता कम हो जाती है।
9. क्रियाधार की सान्द्रता (Substrate concentration) : यदि एन्जाइम की मात्रा अधिक हो तो क्रियाधार की सान्द्रता बढ़ाने से अभिक्रिया की दर में वृद्धि होती है।
10. एन्जाइम की सान्द्रता (Enzyme concentration) : यदि क्रियाधार की सान्द्रता अधिक हो तो एन्जाइम की सान्द्रता बढ़ाने से अभिक्रिया की दर में वृद्धि होती है। एन्जाइम के द्वारा सम्पादित प्रतिक्रियाएँ प्रतिवर्ती (reversible) होती हैं। अतः संश्लेषणात्मक (synthetic) प्रतिक्रिया होगी या विखण्डनात्मक (decompositional), इसका निर्णय अन्य दशाओं पर निर्भर होगा, न कि एन्जाइम पर। सामान्यतः किसी भी ऐसी प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पादित (produced) पदार्थ को अन्य प्रक्रियाओं के द्वारा हटाया जाते रहना चाहिये । इसलिये एन्जाइम प्रक्रियाएँ सामूहिक एवं शृंखलाबद्ध serial) होती हैं, क्योंकि प्रत्येक क्रिया में बना हुआ उत्पाद (product) अगली प्रतिक्रिया के लिये आधारीय पदार्थ (substrate) का कार्य करता है।
In simple words: एन्जाइम विशेष कार्बनिक उत्प्रेरक होते हैं जो जीवों में रासायनिक अभिक्रियाओं की गति को बढ़ाते हैं। इनकी क्रिया-विधि ताला-कुँजी या प्रेरित आसंजन सिद्धान्त पर आधारित होती है, जहाँ एन्जाइम क्रियाधार से जुड़कर कॉम्प्लेक्स बनाता है और उसे उत्पाद में बदल देता है। इनकी सक्रियता ताप, pH, आर्द्रता और उत्पाद की सांद्रता जैसे कारकों से प्रभावित होती है।

🎯 Exam Tip: एन्जाइम की रासायनिक प्रकृति, क्रिया-विधि के सिद्धान्त (ताला-कुँजी और प्रेरित आसंजन) और उनकी सक्रियता को प्रभावित करने वाले कारकों को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि ये प्रश्न अक्सर उच्च अंक वाले होते हैं।

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Yes, our experts have revised the UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 9 जैविक अणुओं as per 2026 exam pattern. All textbook exercises have been solved and have added explanation about how the Biology concepts are applied in case-study and assertion-reasoning questions.

How do these Class 11 UP Board solutions help in scoring 90% plus marks?

Toppers recommend using UP Board language because UP Board marking schemes are strictly based on textbook definitions. Our UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 9 जैविक अणुओं will help students to get full marks in the theory paper.

Do you offer UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 9 जैविक अणुओं in multiple languages like Hindi and English?

Yes, we provide bilingual support for Class 11 Biology. You can access UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 9 जैविक अणुओं in both English and Hindi medium.

Is it possible to download the Biology UP Board solutions for Class 11 as a PDF?

Yes, you can download the entire UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 9 जैविक अणुओं in printable PDF format for offline study on any device.